रविवार, 1 जून 2008

संस्कृत के बिना हम कितने बेचारे ?

भरोसा नहीं होता कि छत्तीसगढ़ जैसी महान धरती से देवभाषा संस्कृत के विरोध में भी कोई बेसुरी आवाज़ सामने आएगी। प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर शुक्ल ने 26 मई, 2008 को दैनिक भास्कर, रायपुर में लिखे अपने लेख 'संस्कृत की बजाय शिक्षा छत्तीसगढ़ी में क्यों नहीं’ लिखकर संस्कृत को पहली से लेकर पाँचवीं कक्षा तक पढ़ाए जाने का विरोध किया है। यह एक ऐसा हिंसक विचार है, जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है।

भाषा और मूल्यों को लेकर जिस तरह के विमर्श और चर्चाएं इन दिनों हवा में हैं, वह कई बार बहुत आतंकित करती हैं। अँगरेज़ी के बढ़ते साम्राज्यवाद के बीच हमारी बोलियाँ और भाषाएं जिस तरह सहमी व सकुचाई हुई सी दिखती हैं, उसमें ऐसे विचार अँगरेज़ी के प्रभुत्व को ही स्थापित करने का काम करेंगे। कुल मिलाकर संदेश यह है कि आइए हम भारतीय भाषा परिवार के लोग आपस में सिर फुटौव्वल करें, एक-दूसरे के कपड़े फाड़ें और अँगरेज़ी को राजरानी की तरह प्रतिष्ठित कर दें।

भारतीय भाषा परिवार की भाषाएं और बोलियाँ जिस तरह से एक-दूसरे से टकरा रही हैं। राजनीतिक आधार पर विभाजन करके अपनी राजनीति चलाने वाली ताकतें भाषा का भी ऐसा ही इस्तेमाल कर रही हैं। देश का विचार और हमारी सामूहिक संस्कृति का विचार लुप्त होता जा रहा है। भाषा, क्षेत्र, जाति, धर्म ऐसे अखाड़े बन गए हैं, जिसने हमारी सामूहिकता को नष्ट कर दिया है। राजनीति इन्हीं विभाजनों का सुख ले रही है। कितना अच्छा होता कि नंदकिशोर शुक्ल अँगरेज़ी को हटाने की बात करते, लेकिन उन्हें संस्कृत ही नज़र आई। वे संस्कृत को विद्वानों, पंडितों और पुरोहितों की भाषा घोषित करते हैं। शायद उन्हें नहीं पता कि भारत को देखने और समझने की दृष्टि अगर किसी भाषा के माध्यम से पाई जा सकती है तो वह संस्कृत ही है। सिर्फ़ हमारे धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, हमारी पूरी सांस्कृतिक परंपरा और उसका उत्कृष्ट साहित्य संस्कृत के ग्रंथों में भरा पड़ा है। यह कैसा हिंसक विचार है कि संस्कृत जैसी भाषा जिसे पूरे देश में समान श्रध्दा और आदर प्राप्त है, उसके ख़िलाफ़ सोचने वाले हमारे आपके बीच में ही बैठे हुए हैं।

संस्कृत भारतीय भाषा परिवार की सबसे पुरानी भाषा है। यह हमारे लोक जीवन में पैठी हुई है। सिर्फ़ धर्म के ही नाते नहीं, अपनी वैज्ञानिकता के नाते भी संस्कृत को कंप्यूटर विज्ञानी भी सबसे तार्किक भाषा मानते हैं। संस्कृत के ख़िलाफ़ किसी भी भाषा को खड़ा करना एक ऐसा अपराध है, जिसके लिए हमें पीढ़ियाँ माफ़ नहीं करेंगी। यह अपने पुरखों को बिसरा देने जैसा है, अपने अतीत को अपमानित और लांछित करने जैसा है। स्वयं को राष्ट्रवादी विचारक बताने वाले क्षेत्रीयता के आवेश में इस कदर आँखों पर पट्टियाँ बाँध लेंगे, इसकी कल्पना भी डरावनी है। उन्होंने अपने लेख में हल्बी, गोंडी, गुडूख, भद्री, जशपुरिया आदि को पढ़ाए जाने का भी विरोध किया है। क्या छत्तीसगढ़ी का मार्ग प्रशस्त करने का यही सही तरीका है? जिस तरह अँगरेज़ी ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को पददलित किया क्या उसी तरह राज्य की राजभाषा बन जाने के बाद छत्तीसगढ़ी भी छत्तीसगढ़ में बोली जाने वाली तमाम बोलियों को राज्य से निष्कासन दे देगी? क्या इसे छत्तीसगढ़ी का अधिनायकवाद नहीं कहा जाएगा?आज जबकि बाज़ारवाद की तेज़ हवा में हमारी तमाम बोलियाँ, तमाम शब्द, मुहावरे, लोकोक्तियाँ, लोकगीत नष्ट होने के कगार पर हैं, क्या इन्हें बचाना और साथ लेकर चलना हमारी जिम्मेदारी नहीं है?

छत्तीसगढ़ी राज्य के सबसे बड़े क्षेत्र में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। इसका आदर करते हुए ही छत्तीसगढ़ी को राज्य की राजभाषा का दर्जा दिया गया है। यह हर्ष और प्रसन्नता का विषय है कि सुदूर बस्तर से लेकर जशपुर व सरगुजा के वनांचलों तक से इस सूचना का स्वागत किया गया, भले ही वहां का लोकजीवन अन्य बोलियों के साथ अपनी दिनचर्या जी रहा है। क्या हम छत्तीसगढ़ी बोलने वालों को इस भावना का आदर करते हुए उन छोटे-छोटे समूहों में बोली जाने वाली बोलियों का आदर नहीं करना चाहिए। हमें यह ध्यान रखना होगा कि छत्तीसगढ़ी की भूमिका इस राज्य में बोली जा रही सभी बोलियों की बड़ी बहन की है। उनका संरक्षण एक संस्कृति का भी संरक्षण है और परंपरा का भी। किसी एक बोली के लुप्त होने से कितने हजार शब्द खो जाते हैं इसका आंकलन करना भाषाविज्ञानियों का काम है।

मैं नंदकिशोर शुक्ल सरीखा ज्ञानी नहीं हूँ किंतु इतना अवश्य कहना चाहता हूँ कि छत्तीसगढ़ी ने यदि लंबे संघर्ष के बाद राजकीय तौर पर सम्मान पाया है, तो उसे अपनी सहोदरा बोलियों को साथ लेकर चलना चाहिए न कि अपने अधिनायकत्व से उसे कुचलने के प्रयास में सहभागी होना चाहिए। छत्तीसगढ़ी भारतीय भाषा परिवार की एक ऐसी बोली है, जिसमें विपुल साहित्य रचा गया है। शायद भद्री, गोंडी, हल्बी, गुडूख, जशपुरिया के पास इतना समृध्द साहित्य न हो किंतु लोकजीवन में उसकी प्रतिष्ठा और उसका इतिहास ज़रूर है। ये बोलियाँ आदिवासी समाज के लोकजीवन में रची-बसी हैं। आदिवासियों के संघर्ष, जिजीविषा, उनकी लोककलाओं का इतिहास दर्ज़ होना अभी शेष है। बावजूद इसके उनके महत्व को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।

छत्तीसगढ़ी राज्य की स्थापना के पीछे भी इन्हीं वंचित तबकों को न्याय दिलाने की भावना प्रमुख थी। यदि इस नवसृजित राज्य में छत्तीसगढ़ के आदिवासी वर्ग की भावनाओं को स्थान नहीं मिला तो यह राज्य अपनी स्थापना का औचित्य खो बैठेगा? अपने लेख में उन्होंने डा. वेदप्रताप वैदिक के जिस वाक्य का संदर्भ दिया है, उसका भी मतलब यही है कि स्थानीय भाषाओं और बोलियों की उपेक्षा न की जाए। श्री शुक्ल स्वयं तर्क देते हैं कि कई देश अपनी मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करते हैं किसी अन्य भाषा में नहीं। क्या श्री शुक्ल संस्कृत जैसी महान भाषा और भद्री, गोंडी, हल्बी, गुडूख, जशपुरिया जैसी जनभाषाओं के खिलाफ़ माहौल बनाने की बजाय अँगरेज़ी के खिलाफ़ यही अभियान चलाएंगे? वे स्वयं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक कहते हैं। क्या उन्होंने संस्कृत के ख़िलाफ़ लेख लिखने के पूर्व अपने मातृ संगठन के विचारकों से बातचीत की है। मेरा यह मानना है कि कोई भी भारतवासी संस्कृत भाषा की उपेक्षा नहीं कर सकता। उसके ख़िलाफ़ सोचना और बोलना तो बहुत दूर की बात है।

छत्तीसगढ़ी में शिक्षा दिए जाने की माँग कतई नाजायज नहीं है और ऐसा होना ही चाहिए किंतु छत्तीसगढ़ी को किसी नारे की तरह इस्तेमाल करते हुए उसके राजनीतिक इस्तेमाल से बचना सबसे बड़ी ज़रूरत है। छत्तीसगढ़ी को अध्ययन, अध्यापन की भाषा बनाने के लिए आंदोलन होना चाहिए पर वह संस्कृत के तिरस्कार और तमाम जनबोलियों की मौत का त्यौहार मनाकर नहीं होगा। छत्तीसगढ़ी को यदि राजभाषा का दर्ज़ा मिला है, तो सरकार का यह नैतिक दायित्व है कि उसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए सारे जतन करे। जिस राजनीति ने इतने उत्सव के साथ छत्तीसगढ़ी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया उसी राजनीति के सबसे बड़े मंदिर विधानसभा में हाल में हुए सत्र में एक भी विधायक एक वाक्य भी छत्तीसगढ़ी में नहीं बोला। राजनीति का यह द्वंद समझा जा सकता है कि वह अपने सारे क्रिया व्यापार एक विदेशी भाषा में करती है और आम जनता के भावनात्मक शोषण के लिए जनभाषाओं के विकास की नारेबाजी करती है। क्या कारण है कि छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने के लिए पास किया गया विधेयक आज भी महामहिम राज्यपाल की कृपा का अभिलाषी है। जहाँ तक मुझे जानकारी है नंदकिशोर शुक्ल किसी राजनीति का हिस्सा नहीं हैं पर क्या कारण है कि वे स्वयं को एक तरफ़ राष्ट्रवादी विचारक कहते हैं, तो दूसरी तरफ़ वे इस तरह का बेसुरा राग भी अलापते हैं। छत्तीसगढ़ मां कौशल्या की भूमि है, तो संस्कृत भी सभी भाषाओं की जननी है। ऐसे में छत्तीसगढ़ के पुत्रों का कर्तव्य क्या यह नहीं बनता कि वे अपनी माँ का आदर करें। संस्कृत का सम्मान दरअसल अपनी संस्कृति, अपने पुरखों, अपनी परंपराओं का भी सम्मान है। ऐसा करके हम अपने प्रति ही ऋणमुक्त होते हैं। छत्तीसगढ़ की फ़िजाओं में इस तरह की बातें फैलाना वास्तव में इस क्षेत्र की तासीर के ख़िलाफ़ है। मुझे याद नहीं पड़ता कि दक्षिण के जिन राज्यों में हिंदी के ख़िलाफ़ कभी बहुत उग्र आंदोलन हुए वहाँ से भी कभी संस्कृत के ख़िलाफ़ कोई आवाज़ सुनने में आई हो।

श्री शुक्ल ने अगर यह शुरुआत की है तो छत्तीसगढ़ से प्रेम करने वाला कोई भी व्यक्ति इसकी प्रशंसा तो नहीं कर सकता, क्योंकि संस्कृत के बिना हम कितने बेचारे हो जाएँगे इसे बताने की आवश्यकता नहीं है। जब हजारों-हजार भाषाएं, हजारों-हजार बोलियाँ, हज़ारों शब्द लुप्त होने के कगार पर हैं और अँगरेज़ी का साम्राज्यवाद उन्हें निगलने के लिए खड़ा है, तो ऐसे समय में क्या हम ऐसी फ़िजूल की बहसों के लिए अपना वक्त खराब करते रहेंगे।

1 टिप्पणी:

  1. ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे11 जनवरी 2012 को 8:44 pm

    वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर शुक्ल की बुद्धी भ्रष्ट हो गयी है..और शुक्ल होने में भी संदेह है

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