सोमवार, 27 जुलाई 2026

शब्दों का सामर्थ्य और विचारों की धरोहर है 'संजय उवाच'

 

समीक्षक - डॉ. प्रदीप डहेरिया


पुस्तकः संजय उवाच (प्रो.संजय द्विवेदी के व्याख्यान)

प्रकाशक: शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, शाहदरा, दिल्ली

मूल्य- 495/- रुपए

 


      कोई भी व्याख्यान समय की रेत पर मिट जाने वाली आवाज़ हो सकते हैं, लेकिन जब वे लिपिबद्ध होकर पुस्तक का आकार लेते हैं, तो वे इतिहास के अमर दस्तावेज़ बन जाते हैं। किसी भी समाज, राष्ट्र या संगठन को सही दिशा देने में उसके नेतृत्वकर्ता के विचारों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब उन सशक्त विचारों को केवल सुना ही नहीं, बल्कि 'भाषण संग्रह' के रूप में सहेजकर एक पुस्तक का रूप दे दिया जाता है, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शिका बन जाती है। हाल ही में प्रकाशित 'संजय उवाच' नामक यह पुस्तक, जो विशिष्ट, चुनिंदा एवं प्रभावी भाषणों का संकलन है। वह वैचारिक जगत में एक अनमोल उपहार की तरह ही है। पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार, संपादक, चिंतक और मीडिया अध्यापन की दुनिया में चर्चित व्यक्तित्व प्रोफेसर संजय द्विवेदी कृत है।

      प्रो. संजय द्विवेदी मूलतः प्रिंट माध्यमों के विशेषज्ञ हैं। अपने अधिकांश मीडिया जीवन में उन्होंने मुद्रित माध्यमों में महत्वपूर्ण और सघन लेखन किया है। उनकी इस शब्द साधना का ही प्रताप है कि वे प्राकृतिक तौर पर धाराप्रवाह तमाम विषयों पर बोलते हैं। संजय जी का टेलीविजन और डिजिटल मीडिया में भी बहुत लंबा अनुभव रहा है। वे कई राष्ट्रीय चैनलों का प्रमुख चेहरा रहे हैं। इसके अलावा शैक्षणिक जीवन का भी विस्तृत और नेतृत्वकारी अनुभव उनके वक्तव्यों में प्रस्तुत होता है। उनकी इस संचित शब्द निधि से संपन्न यह पुस्तक एक अद्वितीय कृति बन जाती है। डा. संजय की जी लेखन यात्रा में कई पुस्तकें शामिल हैं। लेकिन संजय उवाचइस मामले में अलग है कि उनके व्याख्यानों का सार इस पुस्तक में पढ़ने को मिलता है। यह उनके लिए एक उपहार है जिन लोगों ने संजय जी की मंत्रमुग्ध कर देने वाली संवाद शैली का स्वाद नहीं चखा है। उनकी बातचीत का साक्षात करने वाले अनायास ही देश, समाज, राजनीति, युवा और मीडिया आदि विषयों पर ऐसी बातें, सूचनाएं और संस्मरण पा जाते हैं जो कहीं और नहीं मिलते। और एक बात यह भी कि संजय जी जिस तरह आत्मसात करने वाली शैली में संवाद करते हैं, वह श्रोताओं को आनंदित करती है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही चुंबकीय शक्तियों से लबरेज हैं।

         'संजय उवाच, केवल कागज़ पर छपे हुए शब्द नहीं हैं, बल्कि यह उस गहरे अनुभव, संवेदनशीलता और दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण है जो डा. संजय द्विवेदी ने अपने सार्वजनिक जीवन में अर्जित किये हैं। किसी भी प्रकार के व्याख्यान की सबसे बड़ी खूबी उसका सीधा दिल तक पहुँचना होता है। इस पुस्तक में संकलित व्याख्यानों की भाषा इतनी सरल, सहज और सजीव है कि पाठक को पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो वह स्वयं सामने बैठकर वक्ता को सुन रहा हो। शब्दों का चयन और वाक्यों का प्रवाह हर वर्ग के पाठक को बांधे रखता है। इस दृष्टि से 'संजय उवाच' पुस्तक बिल्कुल फिट है। इस पुस्तक कि सबसे बड़ी ताकत इसकी विषय-वस्तु है। इसमें केवल एक ढर्रे पर बात नहीं की गई है, बल्कि सामाजिक सरोकार, राष्ट्र निर्माण, युवा प्रेरणा, संस्कृति, और वैश्विक चुनौतियों जैसे गंभीर विषयों पर बेहद व्यावहारिक और दूरदर्शी विचार प्रस्तुत किए गए हैं। प्रत्येक व्याख्यान पाठक को सोचने पर मजबूर करता है और एक नई दृष्टि देता है। आज के दौर में जहाँ चारों ओर सूचनाओं का अंबार है, वहाँ यह पुस्तक वैचारिक स्पष्टता लाती है। निराश मन में उत्साह फूंकना और युवाओं को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना इस पुस्तक का मूल स्वर है। संजय जी देश के नामी-गिरामी संवाद कार्यक्रमों में शिरकत करते रहते हैं। उनकी वाक कला के लोग कायल हैं। उनकी इस पुस्तक का हर शब्द पाठकों से सजीव संवाद करता लगता है। यह अवश्य पठनीय पुस्तक है।इसके पन्नों को पलटते हुए पाठक के भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार निश्चित ही होगा।

      प्रो. संजय द्विवेदी सरल और सहज व्यक्तित्व के स्वामी हैं। उनका अध्ययन और विषयों पर पकड़ आश्चर्यजनक है। वे पिछले लगभग तीन दशकों से निरंतर लेखन करते रहे हैं। उनके खाते में कई शानदार पुस्तकों का रिकार्ड दर्ज है। इसी तरह उनके संवाद कार्यक्रम भी देश के कोने-कोने में होते रहते हैं। संजय उवाचको पढ़ने के बाद उनके आगामी संवाद में श्रोताओं की तादाद और बढ़ने वाली है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद हर पाठक निश्चित तौर पर उनके भाषणों को सजीव सुनने के लिए उत्सुक होने वाला है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि 'संजय उवाच' पुस्तक शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और जनसंचार के छात्रों के लिए एक बेहतरीन संदर्भ ग्रंथ एवं व्यावहारिक गाइड साबित होगी।  मैं प्रो. संजय द्विवेदी को इस पुस्तक प्रकाशन के लिए तहेदिल से बधाई देता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि वे आगे भी अपने लेख एवं भाषणों के माध्यम से समाज को दिशा देते रहेंगे।

 


 

वर्चुअल दुनिया में 'लाइक' और असली जिंदगी में सन्नाटा!

 

'हाइपर कनेक्टिविटी' के दौर में युवाओं पर गहराता अकेलापन

-प्रो. संजय द्विवेदी



    सही मायनों में मानव सभ्यता के इतिहास में दुनिया इतनी कनेक्टेड कभी नहीं थी। एक क्लिक, एक संदेश और कुछ ही सेकेंड्स में सात समंदर पार बातचीत हो जाना किसी जादुई अहसास जैसा है। मोबाइल की चौबीस घंटे चमकती स्क्रीन ने इस जादुई दुनिया को हमारी हकीकत बना दिया है। लेकिन इस तकनीकी छलांग का दूसरा पहलू बेहद डरावना है। इतिहास के इस दौर में हम 'हाइपर कनेक्टेड' तो हैं, लेकिन शायद सबसे ज्यादा अकेले भी। सोशल मीडिया के आभासी मंचों पर हमारे दोस्तों और चाहने वालों की कतार बेहद लंबी है, मगर संकट के क्षणों में सिर रखने के लिए एक वास्तविक कंधा भी मयस्सर नहीं होता। हम निरंतर 'बातचीत' की भूलभुलैया में तो उलझे हैं, किंतु आंतरिक 'संवाद' के लिए तरस रहे हैं। सिर झुकाए और स्क्रीन के कोलाहल में डूबे समाज की बेचैनियां निरंतर बढ़ रही हैं। आधुनिक विमर्श में लाखों की भीड़ के बीच अकेले होने की त्रासदी इसी को कहते हैं।

    अकेलापन इस समय की सबसे बड़ी और चिंताजनक सामाजिक परिघटना बन चुका है। एक विचारक ने ठीक ही कहा है, "दोस्तों का न होना कोई अपराध नहीं है, लेकिन खुद में अकेला हो जाना एक त्रासदी है।"  सोशल मीडिया के इस दौर ने हमें अपनी ही बनाई भीड़ ने एकाकी कर दिया है। हालात इस हद तक बदल चुके हैं कि अब वास्तविक इंसानी रिश्तों की जगह 'एआई फ्रेंड्स' (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मित्र) ले रहे हैं। मशीनें हमारी सहायक, मार्गदर्शक और दोस्त बन रही हैं। मेरे जैसे मीडिया शिक्षक के लिए यह तथ्य रेखांकित करना बेहद पीड़ादायक है कि क्लासरूम में स्मार्टफोन की स्क्रीन पर चमकती युवा आँखें, फोन जेब में जाते ही एक अजीब से सन्नाटे और सामाजिक संकोच से घिर जाती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी पहचान और व्यक्तित्व का निर्माण अब वास्तविक समाज नहीं, बल्कि यह पाँच इंच की स्क्रीन कर रही है। सच तो यह है कि आज के युवाओं का एकांत भी शांत नहीं है, वह आभासी कोलाहल से भरा हुआ है।

       नए समय की माँग के अनुसार सोशल मीडिया पर उपस्थिति को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। तकनीक ने इस माध्यम को मोबाइल के जरिए हर हाथ और हर जेब तक पहुँचाया है। सोशल मीडिया पर मिलने वाले 'लाइक' और 'कमेंट्स' हमारे मस्तिष्क में तात्कालिक खुशी का संचार करते हैं। डिजिटल मंचों पर विचरते लोग इस आभासी प्रशंसा के आदी हो चुके हैं। यह क्षणिक खुशी एक नशे की तरह काम करती है। दिनभर लगातार पोस्ट करते, रील्स देखते और प्रतिक्रियाएं देते लोग अनजाने में ही इस माध्यम के गहरे चंगुल में फंस जाते हैं। 'डोपामाइन' का यह मायाजाल आज हमारे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है।

     डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अमूमन चमकती हुई चीजें ही परोसी जाती हैं। लोग अपनी सुनहरी यादों, सफलताओं और सबसे खूबसूरत पलों को ही यहाँ साझा करते हैं। सोशल मीडिया पर परोसी जा रही इस 'चमकीली जिंदगी' (रील्स, वेकेशन, महँगी पार्टियां) को देखकर सामान्य पृष्ठभूमि का युवा अपनी साधारण वास्तविक जिंदगी की तुलना उनकी 'रील्ड लाइफ' से करने लगता है। यह तुलना अंततः उसे हीनभावना की ओर धकेल देती है, जिससे 'तुलना का अवसाद' पैदा होता है। पूर्ववर्ती दौर में युवा फिल्मों से सीखते थे, लेकिन तब महीनों में कोई एक फिल्म आती थी जिसका प्रभाव लंबे समय तक रहता था। अब रील्स के दौर में यह मानसिक बमबारी हर सेकंड जारी है।

     हमें 'बातचीत' और 'संवाद' के बुनियादी अंतर को समझना होगा। आँखों में आँखें डालकर की जाने वाली आत्मीय बातचीत के बजाय लोग अब केवल मोबाइल स्कॉलिंग में उलझे हैं। यात्राओं, सार्वजनिक स्थानों, पार्कों और यहाँ तक कि कॉलेजों के कैम्पस में भी लोग आपस में बतियाने के बजाय सिर झुकाए स्क्रीन निहारते दिखते हैं। मोबाइल द्वारा दिए गए इस एकाकीपन ने हमारी संवादात्मक क्षमता को गंभीर रूप से पंगु बना दिया है। जिन भावनाओं को शब्दों में बयां किया जाना चाहिए था, उन्हें अब 'इमोजी', 'शॉर्ट्स' और 'टेक्स्ट' के छोटे टुकड़ों में समेटा जा रहा है। इसके कारण युवा पीढ़ी में वास्तविक सामाजिक कौशल तेजी से लुप्त हो रहे हैं। संवादहीनता के कारण मन की वास्तविक आकांक्षाएं अधूरी रह जाती हैं और हम एक ऐसे उदासीन समाज में तब्दील हो रहे हैं, जिसे स्क्रीन पर गुस्सा जाहिर करना तो आता है, लेकिन वास्तविक जीवन में प्रेम और करुणा व्यक्त करना नहीं।

     अकेलापन अब सिर्फ किसी व्यक्ति का निजी मामला या भावनात्मक उदासी नहीं रह गया है; यह एक गंभीर वैश्विक संकट का रूप ले चुका है। यह संकट इतना गहरा है कि इससे मानसिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी घातक चुनौतियाँ मिल रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा गठित 'सोशल कनेक्शन कमीशन' की महत्वपूर्ण रिपोर्ट इस बात पर विशेष प्रकाश डालती है कि सामाजिक अलगाव और अकेलापन दुनिया भर में एक मूक महामारी की तरह फैल रहे हैं, जिनका समाज पर गहरा लेकिन अनदेखा प्रभाव पड़ रहा है। नवीनतम वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर यह रिपोर्ट तत्काल वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देती है। आयोग के निष्कर्ष बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर हर छह में से एक युवा इस समय गंभीर अकेलेपन का अनुभव कर रहा है।

     विभिन्न शोध रिपोर्ट्स के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय युवा प्रतिदिन औसतन 4 से 5 घंटे स्मार्टफोन की स्क्रीन को दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय रहने वाले हर पाँच में से दो युवा (लगभग 40 प्रतिशत) किसी न किसी स्तर पर अकेलेपन या एंग्जायटी (घबराहट) का सामना कर रहे हैं। स्क्रीन-टाइम के इस अनियंत्रित फैलाव के कारण युवाओं में अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और 'नोमोफोबिया' (मोबाइल से दूर होने का डर) में करीब 30 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आए दिन ऐसी खबरें सामने आती हैं जहाँ माता-पिता द्वारा फोन छीन लिए जाने पर बच्चों ने आत्मघाती कदम उठा लिए या घर छोड़ दिया।

       यह समस्या केवल सामान्य पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं है; देश के सबसे तेज और तकनीकी रूप से उन्नत दिमाग वाले छात्र भी इस डिजिटल अकेलेपन और 'परफॉर्मेंस प्रेशर' के चक्रव्यूह में फंसे हैं। 'आईआईटी बॉम्बे' के 'स्टूडेंट वेलनेस सेंटर' (काउंसिलिंग सेल) ने छात्रों में सोशल मीडिया जनित अवसाद के गंभीर लक्षण दर्ज किए हैं। हालांकि, इसके सकारात्मक समाधान के रूप में छात्रों ने खुद परिसरों में 'डिजिटल डिटॉक्स' और 'नो गैजेट नाइट्स' जैसे जमीनी अभियानों की शुरुआत की है। इन अभियानों के तहत छात्र सप्ताह में एक शाम अपना फोन कमरों में छोड़कर केवल आपस में बातचीत करने, खेलने और कलात्मक गतिविधियों के लिए मैदानों में इकट्ठा होते हैं। यह अनूठी पहल साबित करती है कि तकनीक का कोई भी एल्गोरिदम कभी भी जीवंत इंसानी जुड़ाव का विकल्प नहीं बन सकता।

      इस चुनौतीपूर्ण समय में हम तकनीक या सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की वकालत नहीं कर सकते, क्योंकि मोबाइल विहीन आधुनिक जीवन की कल्पना अब असंभव है। समाधान पूरी तरह से तकनीक को छोड़ना नहीं, बल्कि 'डिजिटल हाइजीन' को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना है। हमें सजगता से अपने स्क्रीन टाइम को घटाकर 'ग्रीन टाइम' (प्रकृति, परिवार और वास्तविक मित्रों के साथ बिताया जाने वाला समय) को बढ़ाना होगा।

        अगली बार जब हम किसी कैफ़े, मेट्रो या ड्राइंग रूम में बैठें, तो इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में खोने के बजाय, अपने सामने उपस्थित व्यक्ति की बात को पूरी आत्मीयता से सुनें। समाज, संस्कृति और मनुष्यता को जिंदा रखने के लिए हमें इंसानों की संवेदनशीलता की ज़रूरत है, मशीनी एल्गोरिदम की नहीं। मनुष्य का जीवन अनमोल है, किंतु हमारी मनुष्यता उससे भी बड़ी है। मानव और अन्य जीवों के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि हमने भाषाएं विकसित कीं, बातचीत से संवाद की यात्रा तय की और कलाओं के माध्यम से संचार का मानवीय दायरा बढ़ाया। तकनीक को हमारा सहयोगी होना चाहिए था, संचालक नहीं। समय आ गया है कि हम अपनी वास्तविक खुशियों और आंतरिक आनंद को बचाए रखने के लिए तकनीक को वापस सहायक की भूमिका में लाएं, न कि उसे अपनी चेतना का नियंता बनने दें।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

 

 

 

 

डिजिटल चुनौती के बीच कैसे जिएं अखबार

 

पठनीयता के गहरे संकट से जूझते समाचार पत्र क्या करें?



   हां, सामने मीडिया की पढ़ाई करने की चाह रखने वाले विद्यार्थी ही थे, उम्मीद की जानी चाहिए कि वे कोई अखबार, मैगजीन या किताबें पढ़कर आए होंगे। लगभग 110 विद्यार्थियों से बात करते हुए यह अहसास हुआ कि अखबार अब उनकी जिंदगी में कोई जगह नहीं रखता। वे जो कुछ भी ग्रहण कर रहे हैं, आनलाइन ही कर रहे हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया के सामने बहुत गहरे संकट हैं। क्योंकि इस डिजिटल समय में उनके ई-पेपर ही पलटे जा रहे हैं। क्या अब हाथ में अखबार लेकर पढ़ने वाले दुर्लभ हो जाएंगें? 

बदल गए हैं पढ़ने के तरीके-

    डिजिटल मीडिया और स्मार्टफोन ने पढ़ने के तरीके को बदलकर रख दिया है। पोर्टल्स, सोशल मीडिया और न्यूज एप्स के कारण पाठकों को पल-पल की खबरें मुफ्त में उनके मोबाइल पर मिल रही हैं। जिससे 24 घंटे में एक बार आनेवाला अखबार क्या मुकाबला करेगे। रीयल टाइम अपडेट एक ऐसी घटना है जिसने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। ऐसे में अखबारों को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए नए रास्ते तलाशने की जरूरत है। नई पीढ़ी लंबी सामग्री पढ़ने के बजाए अब वीडियो, शार्ट्स, पाडकास्ड और विजुअल इंफ्रोग्राफिक्स के जरिए चीजों को देखना,सुनना और समझना सीख गई है। प्रिंट मीडिया के प्रति उसका आकर्षण खत्म सा है।

आर्थिक संकट से भी हैं हलाकान-

     इस परिघटना ने प्रिंट मीडिया से कमाई के मौके भी छीनने शुरु कर दिए हैं। हम जानते हैं अखबार मूलतः विज्ञापनों ( स्पेस सेलिंग) पर निर्भर हैं। अब जबकि कंपनियां अपना बड़ा बजट डिजिटल प्लेटफार्म जैसे गूगल,मेटा और यू-ट्यूब पर खर्च कर रही हैं, जहां वे अपने लक्षित समूह ( टारगेट आडियंस) तक आसानी से पहुंच रही हैं। इसकी लागत भी कम पड़ रही है। एल्गोरिद्म ने बाजार और ग्राहक की पहुंच को बहुत आसान बना दिया है। कागज, स्याही और छपाई की बढ़ती कीमतों से अखबार पहले ही हलाकान थे, बिजली और प्रिंटिंग मशीनों का रख-रखाव उनकी अलग चिंताओं को बढ़ाता रहा है। इन स्थितियों में अखबार की न सिर्फ लागत बढ़ जाती है बल्कि उसे लोगों तक पहुंचाना सरल नहीं रह गया है। अखबारों को सुबह छापना और लोगों के घरों तक पहुंचाना हमेशा ही कठिन काम था। भारत जैसे बाजार में जहां लोग पढ़ने के लिए खर्च को तैयार नहीं है, यह संकट और जटिल हो जाता है। आज भी हिंदुस्तान के बाजार में अखबार 3 से 7 रूपए के बीच ही बेचे जा रहे हैं। जो उसकी वास्तविक लागत से बहुत कम होता है। विज्ञापनों में आती कमी के बीच इसे छापना असंभव होता जाएगा। हम ध्यान से देखें तो हाकरों की नई पीढ़ी की रूचि अखबार बांटने में रूचि कम रख रही है। दूध या अन्य व्यवसाय के साथ अखबार वितरण भी किया जा रहा है। स्टाल कम हो रहे हैं जहां पत्र-पत्रिकाएं मिला करती थीं। स्टेशनों से लेकर नगरों, कस्बों तक अखबारों और पत्रिकाओं के स्टाल समाप्त हो रहे हैं या उनपर खाद्य सामग्री बिक रही है।

भरोसे का संकट बड़ी चुनौती-

     टीवी और डिजिटल मीडिया से होड़ कर रहे प्रिंट मीडिया ने भी गहरी रिर्पोटिंग और विश्लेषणात्मक सामग्री के बजाए हल्की-फुल्की प्रस्तुति से खुद को अप्रासंगिक बना लिया है। बहुत कम अखबार हैं जो सामग्री की गुणवत्ता और विचारों पर ध्यान क्रेंद्रित कर रहे हैं। ऐसे में जब आनलाइन उपलब्ध सामग्री जैसे ही विषयवस्तु अखबारों में होगी तो निश्चित ही पाठक दूर जाएंगें। कागज के निर्माण में पेड़ों की कटाई और जल की खपत जैसे मुद्दे उठाकर  भी अखबारों से दूर करने की एक नैतिक और व्यवहारिक चिंताएं खड़ी करने के प्रयास भी हो रहे हैं। ऐसे में राजस्व में गिरावट के कारण जहां मझोले और छोटे अखबारों के सामने अस्तित्व का संकट है तो बड़े अखबार भी संपादकीय बजट में कटौती, पत्रकारों की छंटनी जैसे काम कर रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य में अखबारों की अधिकाधिक निर्भरता कारपोरेट और सरकारी विज्ञापनों पर बहुत बढ़ गई है। संकट का असली सिरा यहीं है। भरोसे,विश्वसनीयता का संकट इन्हीं सब कारणों से बढ़ रहा है। निष्पक्ष पत्रकारिता बहुत चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।

आखिर रास्ता क्या है-

  जाहिर है संकटों से घिरे प्रिंट मीडिया के सामने विकल्प सीमित हैं। अब केवल संकटों की बात, समस्याओं का बातें करने से आगे समाधान परक पत्रकारिता की आवश्यक्ता है। जिसमें अखबार संकटों के साथ उनके संभावित समाधानों, सफल माडल्स और सकारात्मक प्रयासों की बात भी करें। व्याख्या, विश्लेषण और खोजी पत्रकारिता पर फोकस करके उन्हें खबर क्यों घटी और इसके मायने क्या हैं बताने होंगे। अखबार अब सूचना के वाहक नहीं उनके विश्लेषण और व्याख्याओं के वाहक बनें। डेटा, शोध और गहन मैदानी कवरेज ही वह रास्ता है जिससे प्रिंट स्वयं को प्रासंगिक बनाए रख सकता है। फैक्ट चेकिंग की अनिर्वायता के साथ हमें गलत खबरों का पर्दाफाश भी करना होगा। सबसे पहले खबर देने के बजाए सबसे सटीक खबर देने के सिद्धांत पर लौटना होगा। इसके साथ ही आत्मनिर्भर वित्तीय माडल पर काम करते हुए पाठक द्वारा पोषित मीडिया खड़ा करना होगा। पत्रकारों को तकनीक से डरने के बजाय उसका इस्तेमाल अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए करना चाहिए। डेटा एनालिसिस, ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद और रूटीन री-लेखन में एआई (AI) का इस्तेमाल करें ताकि पत्रकारों का समय फील्ड वर्क, मानवीय संवेदनाओं की कहानियों और खोजी रिपोर्टिंग में लग सके। पत्रकारिता तब तक निष्पक्ष नहीं हो सकती जब तक पत्रकार स्वयं सुरक्षित और आर्थिक रूप से निश्चिंत न हों।

मीडिया साक्षरता भी है जरूरी-

     मीडिया संस्थानों और समाज को मिलकर ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संवाददाताओं के लिए सुरक्षा कवर, बीमा और सम्मानजनक मानदेय सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाना होगा। पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को आम जनता के बीच 'मीडिया साक्षरता' की समझ बहुत जरूरी है। जब पाठक यह समझना सीख जाएंगे कि कौन-सी खबर प्रायोजित है, कौन-सा एजेंडा है और कौन-सी वास्तविक पत्रकारिता, तो वे खुद-ब-खुद घटिया और सनसनीखेज कंटेंट को नकारना शुरू कर देंगे। भरोसा वह शब्द है जो आसानी से अर्जित नहीं होता, अखबारों की स्वीकार्यता में विश्वसनीयता और प्रामणिकता का सर्वाधिक योगदान होगा। उम्मीद की जानी कि नई डिजिटल चुनौतियों के बीच भी कुछ लोग उस भरोसे को कायम रखेंगें, जो भारतीय पत्रकारिता ने अपनी लंबी यात्रा से अर्जित किया है।


 

 

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्षों की कहानी

                                                 ‘तत्वमसि’ में है प्रचारकों की जिंदगी का बयान

-प्रो.संजय द्विवेदी



 देश में हुए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति सामान्यजन की जिज्ञासा बढ़ा दी है। इस बीच अपनी यात्रा के 100 साल संघ ने पूरे कर लिए हैं। इसलिए संघ की संपर्क गतिविधियां भी सामान्य दिनों से ज्यादा हैं। ऐसे समय में संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्रीधर पराड़कर का उपन्यास ‘तत्वमसि’ बड़ी सरलता से आरएसएस के बारे में बताता है। यह उपन्यास एक आत्मकथात्मक उपन्यास भी कहा जा रहा है, जिसके केंद्र में खुद लेखक और उसके अनुभव हैं। बावजूद इसके एक प्रचारक की जिंदगी के बहाने संघ को समझाने में यह उपन्यास पूरी तरह सफल है।

     कहानियों से चीजों को बताना आसान होता है, विचार कई बार भ्रमित भी करते हैं और उन्हें समझना सबके बस की बात नहीं। उसे वही ग्रहण कर सकता है जिसकी उस विचार विशेष में रुचि हो। शायद इसीलिए पूज्य सरसंघचालक डा. मोहन भागवत इस बात को रेखांकित करते रहे हैं कि “संघ को संघ के भीतर आकर ही समझा जा सकता है।” अपनी स्थापना के समय से ही संघ कुछ शक्तियों के निशाने पर रहा है। खासकर आजाद भारत में उसे इसके दंश कई बार भोगने पड़े। श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास उनके अर्जित अनुभवों का बयान भी है। इसलिए इस कृति की विश्वसनीयता बढ़ जाती है। सही मायनों में यह भोगा हुआ सत्य है, जिसकी अनुभूति इसे पढ़ते समय सहज ही होती है। 

     हम जानते हैं कि श्रीधर पराड़कर, संघ प्रेरित अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहे हैं और लंबे समय से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हैं। एक लेखक,चिंतक,विचारक और संगठनकर्ता के नाते वे राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिलब्ध हैं। ऐसे सरोकारी व्यक्ति का लेखन निश्चित ही बहुत सारे सवालों के जवाब लेकर आता है। किसी भी उपन्यास या कहानी की सबसे बड़ी सफलता है उसकी रोचकता। कहानी को सुनने-पढ़ने का मन होना। कथारस में बहते चले जाना। विचार और संगठन जैसी बोझिल समझी जाने वाली कथा को भी पराड़करजी ने जिस अंदाज में व्यक्त किया है उसने पुस्तक की पठनीयता बनाए रखी है। यह किताब न सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार तत्व, प्रचारकों की जीवन शैली, संघ के समावेशी चरित्र का बयान करती है बल्कि किस तरह वह समाज परिवर्तन को व्यक्ति परिर्वतन के माध्यम से संभव कर रहा है इसे भी बताती है। 

   उपन्यास के मुख्य पात्र परितोष बाबू संघ के प्रचारक हैं। प्रचारक परंपरा के बारे में समाज में न्यूनतम जानकारियां हैं। इस किताब में ‘प्रचारक परंपरा’ जो सामान्य वस्त्रों में रहकर भी ‘साधु परंपरा’ का पालन करती है का विषद वर्णन है। समाज जीवन में काम करते हुए आने वाली कठिनाइयों से लेकर,समाज के प्रश्नों का उत्तर भी प्रचारक खोजते हैं। भाषा की रवानी और कथा शैली ऐसी कि संगठन शास्त्र जैसे विषयों को किस्सागोई के साथ कहने में लेखक सफल रहे हैं। पत्रकार अनंत विजय ने किताब के फ्लैप पर ठीक ही लिखा है कि-“मेरे जानते हिंदी के किसी लेखक ने किसी संगठन को केंद्र में रखकर इस तरह का उपन्यास नहीं लिखा है। यह अभिनव प्रयोग है, जिसके मोहजाल में पाठक का पड़ना तय है।”

    पुस्तक के आरंभ में ही अपनी रेलयात्रा के माध्यम से परितोष बाबू न सिर्फ अपना स्वभाव,विचार रख देते हैं बल्कि समाज को लेकर अपनी सोच को भी प्रकट करते हैं। पहले दृश्य से बांध लेना इसे ही कहते हैं। यह उपन्यास एक कर्मनिष्ठ प्रचारक की जिंदगी से गुजरत हुए समाज के अनेक प्रश्नों के उत्तर भी देता चलता है। इसमें जो पात्र हैं वे बहुत सुनियोजित तरीके से कथा के उद्देश्य को पूरा करने में सहयोग करते हैं। विभिन्न पंथों और विचारों से जुड़े पात्रों का संवाद भी परितोष बाबू से होता है। यहां यह भी प्रकट होता है कि वे व्यक्ति से व्यक्ति का संवाद पसंद करते हैं। मुस्लिम युवा अफरोज से संवाद का अवसर आता है तो वे अपने सहयोगी से कहते हैं,-“ उन्हें बुलाना नहीं हम उनसे मिलने उनके घर जाएंगें।” इससे पता चलता है कि संघ की कार्यपद्धति क्या है। जहां वह व्यक्ति से नहीं बल्कि परिवार से जुड़ता है ताकि उनसे सच्चा जुड़ाव हो सके। उनके सुख-दुख अपने हो जाएं।

     यह उपन्यास इस अर्थ में विशिष्ठ है कि यह अपने समय और उसके सवालों से जूझता  है। उसके ठोस और वाजिब हल खोजने की कोशिशें भी करता है। संवाद के माध्यम से यह उपन्यास जो कहता है उसे बहुत बड़े वक्तत्वों से नहीं समझाया जा सकता। प्रो. संजय कपूर, विदेशी मूल की युवती नोरा, महेश बाबू, अफरोज,सदानंद, अनिता और स्नेहल जैसे पात्रों के बहाने जो ताना-बाना बुना गया है वह अप्रतिम है। सदानंद,अमित और स्नेहल से हुए संवाद में परितोष बाबू जिस तरह संघ से जुड़े सवालों के उत्तर देते हैं,वैसे ही वे समाज और परिवार के मुद्दों पर राय रखते हैं। वे एक ऐसे बुर्जग की तरह पेश आते हैं जिस पर सबकी आस्था है। भारतीय परिवारों में बुर्जगों की भूमिका क्या होनी चाहिए, क्या है इसे भी परितोष बाबू की छवि में देखा जा सकता है। परितोष बाबू जैसे लोग जिन्होंने अपना परिवार नहीं बनाया, उसकी मनोभूमि कैसे तैयार होती है। कैसे वे सब कुछ त्यागकर अपने समाज और देश की बेहतरी के स्वयं को आत्मार्पित कर देते हैं। यह सीखने वाली बात है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में बहुत से बने हुए भ्रमों, दुष्प्रचारों को यह उपन्यास एक जवाब है। भगवा ध्वज को गुरू मानना और सरसंघचालक परंपरा जैसे विषय भी सहज संवाद से सरल लगने लगते हैं।

   समकालीन कथासाहित्य में प्रायः एक ही तरह की कहानियां और उपन्यास पढ़कर जिस तरह के मनोविकार और अवसाद उपजते हैं, उसके बीच में यह उपन्यास एक ठंडी हवा के झोंके की तरह है। यह पाठकों को एक संगठन और उसके प्रचारक की कथा तो सुनाता ही है, नए भारत के निर्माण में जुटे राष्ट्रप्रेमियों से भी परिचित कराता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारतीय समाज के पुनर्गठन की वह प्रयोगशाला है, जो विचार, सेवा और अनुशासन के आधार पर एक सांस्कृतिक राष्ट्र का निर्माण कर रही है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की अनोखी भारतीय दृष्टि से उपजा यह संगठन आज अपनी शताब्दी मना रहा है। यह केवल संगठन विस्तार की नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक अनवरत यात्रा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सही निगाहों से देखना और उसका उचित मूल्यांकन किया जाना अभी शेष है, यह उपन्यास उस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। 



बुधवार, 7 जनवरी 2026

कोई अच्छा है तो अच्छा क्यों है?

 

लेखक -प्रो. संजय द्विवेदी


चित्र परिचय- इंद्रेश कुमार

    करीब दो दशक पहले की बात है श्री इंद्रेश कुमार से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेरी मुलाकात हुयी थी। आरएसएस के उन दिनों वे राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, जयपुर उनका केंद्र था। दैनिक हरिभूमि का स्थानीय संपादक होने के नाते मैं उनका इंटरव्यू करने पहुंचा था। अपने बेहद निष्पाप चेहरे और सुंदर व्यक्तित्व से उन्होंने मुझे प्रभावित किया। बाद में मुझे पता चला कि वे मुसलमानों को आरएसएस से जोड़ने के काम में लगे हैं। रायपुर में भी उनके तमाम चाहने वाले अल्पसंख्यक वर्ग में भी मौजूद थे। उनसे थोड़े ही समय के बाद आरएसएस की प्रतिनिधि सभा में रायपुर में फिर मुलाकात हुयी। वे मुझे पहचान गए। उनकी स्मरण शक्ति पर थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि वे सालों पहले हुयी मुलाकातों और मेरे जैसे साधारण आदमी को भी याद रखते हैं। इस नायाब आदमी पर एक मौजूं शेर है, जो उनकी शख्सियत पर फिट बैठता है-

मसला यह भी इस दुनिया में

कोई अच्छा है तो अच्छा क्यों है।

   सही मायनों में यह व्यक्तित्व एक ऐसा अभियान में लगा है जो कई बार विफल हो चुका है। कट्टरपंथी ताकतें बहुत आसानी से मुस्लिम समाज को भ्रमित करने में कामयाब होती रही हैं। ऐसे कठिन समय में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक इंद्रेश जी हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते हैं। वह मुसलमानों को राष्ट्रवाद की राह पर डालकर सदियों से उलझे रिश्तों को ठीक करने की बात करते हैं। क्योंकि आज नहीं अगर दस साल बाद भी इंद्रेश कुमार अपने इरादों में सफल हो जाते हैं तो भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं की दुकान बंद हो जाएगी। वे एक ऐसा आदमी हैं जो सदियों से जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिशें कर रहे हैं।

      अब उन इंद्रेश कुमार की भी सोचिए जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन में काम करते रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज का संगठन है। ऐसे संगठन में रहते हुए मुस्लिम समाज से संवाद बनाने की कोशिश क्या उनके अपने संगठन (आरएसएस) में भी तुरंत स्वीकार्य हो गयी होंगी। जाहिर तौर पर इंद्रेश कुमार की लड़ाई अपनों से भी रही होगी और बाहर खड़े राजनीतिक षडयंत्रकारियों से भी है। वे अपनों के बीच भी अपनी सफाई देते रहे हैं कि वे आखिर मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास क्यों कर रहे हैं,  जबकि संघ का मूल काम हिंदू समाज का संगठन है। किंतु इंद्रेश कुमार की कोशिशें रंग लाने लगी हैं। वे एक ऐसे काम को अंजाम दे रहे हैं जिसकी जड़ें हिंदुस्तान के इतिहास में बहुत भयावह और रक्तरंजित हैं। मुसलमानों के बीच कायम भयग्रंथि और कुठांओं को निकालकर उन्हें 1947 के बंटवारे को जख्मों से अलग करना भी आसान काम नहीं है। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद जैसे महानायकों की मौजूदगी के बावजूद हम देश का बंटवारा नहीं रोक पाए। उस आग में आज भी कश्मीर जैसे इलाके सुलग रहे हैं।

     तमाम हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम रिश्ते अविश्वास की आग में जल रहे हैं। ऐसे कठिन समय में इंद्रेश कुमार क्या इतिहास की धारा की मोड़ देना चाहते हैं और उन्हें यह तब क्यों लगना चाहिए कि यह काम इतना आसान है। देश को पता है कि इंद्रेश कुमार, आरएसएस के ऐसे नेता हैं जो मुसलमानों और हिंदू समाज के बीच संवाद के सेतु बने हैं। वे लगातार मुसलमानों के बीच काम करते हुए देश की एकता को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। हिंदू- मुस्लिम एकता का यह राष्ट्रवादी दूत इसीलिए एक समय राजनीतिक षडयंत्रों का शिकार भी हुआ। संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल पुलिस का इस्तेमाल करते रहे हैं, किंतु राजनीतिक दल इस स्तर पर गिरकर एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व पर कलंक लगाने का काम करेंगें, यह देखना भी शर्मनाक था। इससे इतना तो साफ है कि कुछ ताकतें देश में ऐसी जरूर हैं जो हिंदू-मुस्लिम एकता की दुश्मन हैं। उनकी राजनीतिक रोटियां सिकनी बंद न हों, इसलिए दो समुदायों को लड़ाते रहने में ही इनकी मुक्ति है। शायद इसीलिए इंद्रेश कुमार निशाने पर थे क्योंकि वे जो काम कर रहे हैं वह इस देश की विभाजनकारी और वोटबैंक की राजनीति के अनूकूल नहीं था। लेकिन समय ने उन्हें बेदाग साबित किया।

   हमें यह समझने की जरूरत है कि आखिर वे कौन से लोग हैं जो हिंदू-मुस्लिम समाज की दोस्ती में बाधक हैं। वे कौन से लोग हैं जिन्हें भय के व्यापार में आनंद आता है। हिंदुस्तान के 20 करोड़ मुसलमानों को देश की मुख्यधारा में लाने की यह कोशिश अगर विफल होती है तो शायद फिर कोई इंद्रेश कुमार हमें ढूंढना मुश्किल होगा । कुछ लोग इंद्रेश कुमार जैसे लोगों के इरादे पर शक करके हम वही काम कर रहे हैं जो मुहम्मद अली जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग ने किया था जिन्होंनें महात्मा गांधी को एक हिंदू धार्मिक संत और कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहकर लांछित किया था। राष्ट्र जीवन में ऐसे प्रसंगों की बहुत अहमियत नहीं है।
इस देश को यह कहने का साहस पालना ही होगा कि हमें एक नहीं हजारों इंद्रेश कुमार चाहिए जो एक हिंदू संगठन में काम करते हुए भी मुस्लिम समाज के बारे में सकारात्मक सोच रखते हों।

     मुस्लिम समाज के संकट वस्तुतः भारतीय राजनीति और समाज के ही संकट हैं। उनकी चुनौतियां कम या ज्यादा गंभीर हो सकती हैंपर वे शेष भारतीय समाज के संकटों से जरा भी अलग नहीं है। सही अर्थों में पूरी भारतीय राजनीति का चरित्र ही कमोबेश भावनात्मक एवं तात्कालिक महत्व के मुद्दों के इर्द-गर्द नचाता रहा है। आम जनता का दर्दउनकी आकांक्षाएं और बेहतरी कभी भारतीय राजनीति के विमर्श के केंद्र में नहीं रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति का यह सामूहिक चरित्र हैअतएव इसे हिंदूमुस्लिम या दलित राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखने को कोई अर्थ नहीं है और शायद इसलिए ‘जनता का एजेंडा’ किसी की राजनीति का एजेंडा नहीं है। मुस्लिम नेताओं पर यह आरोप तो आसानी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कौम को आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़ा बनाए रखालेकिन क्या यही बात अन्य वर्गों की राजनीति कर रहे लोगों तथा मुख्यधारा की राजनीति करने वालों पर लागू नहीं होती ? बेरोजगारीअशिक्षाअंधविश्वासगंदगीपेयजल ये समूचे भारतीय समाज के संकट हैं और यह भी सही है कि हमारी राजनीति के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक परिवेश में आश्चर्यजनक ही है। देश की मुस्लिम राजनीति का एजेंडा भी हमारी मुख्यधारा की राजनीति से ही परिचालित होता है। जाहिर है मूल प्रश्नों से भटकाव और भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द समूची राजनीति का ताना बुना जाता है। इंद्रेश जी जैसे लोग समाज की सामूहिक चिंताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंथिक राजनीतिक के बजाए राष्ट्र प्रथम का भाव भरने का प्रयास कर रहे हैं।

      आप देखें तो हिंदुस्तान के हर मुसलमान नेता को एक ढोंग रचना पड़ता है। एक तरफ तो वह स्वयं को अपने समाज के बीच अपनी कौम और उसके प्रतीकों का रक्षक बताता हैवहीं दूसरी ओर उसे अपने राजनीतिक मंच (पार्टी) पर भारतीय राष्ट्र- राज्य के साथ अपनी प्रतिबद्धता का स्वांग रचना पड़ता है। समूचे भारतीय समाज की स्वीकृति पाने के लिए सही अर्थों में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। आज की राजनीति में तो ऐसा संभव नहीं दिखता। भारतीय समाज में ही नहींहर समाज में सुधारवादियों और परंपरावादियों का संघर्ष चलता रहा है। मुस्लिम समाज में भी ऐसी बहसें चलती रही हैं। इस्लाम के भीतर एक ऐसा तबका पैदा हुआजिसे लगता था कि हिंदुत्व के चलते इस्लाम भ्रष्ट और अपवित्र होता जा रहा है। वहीं मीर तकी मीरनजीर अकबरवादीअब्दुर्रहीम खानखानारसखान की भी परंपरा देखने को मिलती है। हिंदुस्तान का आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर एक शायर था और उसे सारे भारतीय समाज में आदर प्राप्त था। एक तरफ औरंगजेब था तो दूसरी तरफ उसका बड़ा भाई दारा शिकोह भी थाजिसनें ‘उपनिषद्’ का फारसी में अनुवाद किया। इसलिए यह सोचना कि आज कट्टरता बढ़ी हैसंवाद के अवसर घटे हैं-गलत है। आक्रामकता अकबर के समय में भी थीआज भी है।

     यहां यह बात रेखांकित किए जाने योग्य है कि अल्पसंख्यक अपनी परंपरा एवं विरासत के प्रति बड़े चैतन्य होते हैं। वे चाहते हैं कि कम होने के नाते कहीं उनकी उपेक्षा न हो जाए । यह भयग्रंथि उन्हें एकजुट भी रखती है। अतएव वे भावनात्मक नारेबाजियों से जल्दी प्रभावित होते हैं। सो उनके बीच राजनीति प्रायः इन्हीं आधारों पर होती है। यह अकारण नहीं था कि नमाज न पढ़ने वाले मोहम्मद अली जिन्नाजो नेहरू से भी ज्यादा अंग्रेज थेमुस्लिमों के बीच आधार बनाने के लिए कट्टर हो गए ।  मुस्लिम राजनीति वास्तव में आज एक खासे द्वंद में हैंजहां उसके पास नेतृत्व का संकट है । मुस्लिम समाज में अब राजनीति के अलावा सामाजिकआर्थिकसमाज सुधारशिक्षा जैसे सवालों पर बातचीत शुरु हो गई है । सतह पर दिख रहा मुस्लिम राजनीति का यह ठंडापन एक परिपक्वता का अहसास कराता है । मुस्लिम समाज में वैचारिक बदलाव की यह हवा जितनी तेज होगीसमाज उतना ही प्रगति करता दिखेगा। एक सांस्कृतिक आवाजाहीसांस्कृतिक सहजीविता ही इस संकट का अंत है । जाहिर है इसके लिए नेतृत्व का पढ़ालिखा और समझदार होना जरुरी है । नए जमाने की हवा से ताल मिलाकर यदि देश का मुस्लिम अपने ही बनाए अंधेरों को चीरकर आगे आ रहा है तो भविष्य उसका स्वागत ही करेगा । वैसे भी धार्मिक और जज्बाती सवालों पर लोगों को भड़काना तथा इस्तेमाल करना आसान होता है । गरीब और आम मुसलमान ही राजनीतिक षडयंत्रों में पिसता तथा तबाह होता हैजबकि उनका इस्तेमाल कर लोग ऊंची कुर्सियां प्राप्त कर लेते हैं और उन्हें भूल जाता हैं । अभिजात्य और जमाने की दौड़ में आगे आ गए मुस्लिम नेता दरअसल अपने कौम की खिदमत और उसे रास्ता बताने के बजाए उन्हें उसी बदहाली में रहने देना चाहते हैं ।इस संदर्भ में प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी का यह शेर हमारी मुस्लिम राजनीति के ही नहींसमूची भारतीय राजनीति के चरित्र को बेनकाब करता है-

इस्लाम की अजमत का क्या जिक्र करुं हमदम

काउंसिल में बहुत सैय्यदमस्जिद में फकत जुम्मन

भारतीय समाज में इंद्रेश कुमार जैसे लोग इसलिए एक नया उजाला लेकर आ रहे हैं। संवाद के माध्यम से नया भारत बना रहे हैं।

   दूसरी ओर भाजपा भी आगे बढ़कर मुस्लिम समाज से संवाद कर रही है तो मुस्लिम नेतृत्व को भी भरोसा रखते हुए उनकी बात सुननी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हौव्वा खड़ा कर आरएसएस के लिए प्रलाप किया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि संघ मुस्लिम विरोधी है। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। आरएसएस के नेताओं ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के सहयोग से मुस्लिम समाज से संवाद प्रारंभ किया है। आपातकाल के समय जमाते इस्लामी और आरएसएस के नेता कई जेलों में एक साथ थे। उनके बीच बेहतर रिश्ते भी विकसित हुए थे। इसलिए मुस्लिम वोटों की ठेकेदारी करने के बजाए मुस्लिम समाज को स्वतंत्र रूप से सोचने और अपने फैसले करने का अवसर देना चाहिए। भाजपा भी अब राजनीतिक रूप से अछूत नहीं है। उसकी अटलजी के नेतृत्व वाली सरकार में उमर अब्दुला से लेकर सभी तथाकथित सेकुलर दलों के लोग मंत्री रह चुके हैं। अटलजी से लेकर नरेंद्र मोदी जी तक  की सरकारों में क्या उनके चरित्र में कहीं अल्पसंख्यक विरोधी रवैया ध्वनित होता हैसच्चाई तो यह है कि वाजपेयी सरकार ने न सिर्फ डा. एपीजे कलाम को देश के राष्ट्रपति पद पर प्रतिष्ठित किया वरन बाद के राष्ट्रपति चुनाव में एक ईसाई आदिवासी पीए संगमा को अपना समर्थन दिया था। सही तो यह है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी के विरूद्ध अभियान चलाने वाले मुस्लिम वोटों के सौदागर हिंदु-मुस्लिम रिश्तों में सहजता के विरोधी हैं।

 इंद्रेश कुमार को हमारे समय का ऐसा नायक कहा जा सकता है जो वैश्विक तौर पर बन गयी इस्लाम की छवि को बदलने के लिए भारतीय मुसलमानों का नेतृत्व कर रहे हैं। वे मानवता के अग्रदूत हैं जहां सब राष्ट्र प्रथम की भावना रखकर देश के नवनिर्माण में लगे हैं। वे यह मानते हैं कि देश सबके योगदान और सबकी प्रगति से ही विश्वगुरु बनेगा। अपनी-अपनी भूमिका सबको निभानी होगी। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच उनकी साधना का प्रतिफल है। एक नया सवेरा आएगा, ऐसा भरोसा उनकी संकल्पशक्ति से होता है। वे शतायु हों और एक समर्थ, समरस और आत्मीयता से भरा भारत अपनी आँखों से देखें,यही प्रार्थना है।



सामाजिक समरसता से बनेगी सुंदर दुनिया

                                                                     -प्रो. संजय द्विवेदी



    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारतीय समाज के पुनर्गठन की वह प्रयोगशाला है, जो विचार, सेवा और अनुशासन के आधार पर एक सांस्कृतिक राष्ट्र का निर्माण कर रही है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की अनोखी भारतीय दृष्टि से उपजा यह संगठन आज अपनी शताब्दी मना रहा है। यह केवल संगठन विस्तार की नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक अनवरत यात्रा है।

     सौ वर्षों की इस साधना में संघ और इसके स्वयंसेवकों ने देश की चेतना को जाग्रत किया है। उन्होंने दिखाया कि न तो किसी सरकारी सहयोग की आवश्यकता होती है और न ही प्रचार के माध्यम से प्रसिद्धि की। यदि लक्ष्य पवित्र हो, मार्ग अनुशासित हो और कार्यकर्ता समर्पित हों। सेवा संघ का मूल है और सामाजिक समरसता उसका लक्ष्य। एक समरस समाज ही अपने सपनों में रंग भर सकता है और इससे ही सुंदर समाज का सृजन संभव है। गैरबराबरी को खत्म करते हुए मन में सुंदर समरस भावों का सृजन राष्ट्र प्रथम की भावना से ही संभव है।

सेवा: राष्ट्र के हृदय को स्पर्श करती संवेदना-

संघ के स्वयंसेवकों की सेवा-भावना समाज के सबसे वंचित वर्गों तक पहुंचती है। गिरिजनों और वनवासियों से लेकर महानगरों की झुग्गी बस्तियों तक, संघ प्रेरित संगठन जैसे सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, एकल विद्यालय, राष्ट्र सेविका समिति और आरोग्य भारती अखंड सेवा के भाव से कार्यरत हैं। इन संस्थाओं का उद्देश्य केवल राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि लोगों को आत्मनिर्भर, शिक्षित और संस्कारित बनाना है। सेवा, संघ के लिए कर्मकांड नहीं, जीवनधर्म है। जो मानवता को जोड़ता है, पोषित करता है और राष्ट्र के लिए भावनात्मक एकता निर्मित करता है।संघ जैसा समावेशी, उदार और लचीला संगठन ढूंढने से नहीं मिलेगा। अपने में परिवर्तन करने, आत्मसमीक्षा करने और अपना दायरा बढ़ाते जाने के लिए संघ ख्यात रहा है। जिस तरह संघ ने समाज जीवन के सब क्षेत्रों, सब वर्गों में, सभी विचारवंतों में, सभी सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी सेवा भावना से जगह बनाई है, वह उसकी सोच को प्रकट करता है। इस अर्थ में संघ कहीं से जड़वादी संगठन नहीं है, जिसके कारण सांप्रदायिक और दायराबंद सोच पनपती है। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच, राष्ट्रीय सिख संगत, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, एकल विद्यालय जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने यह स्थापित किया कि समाज को जोड़ना और सेवा के माध्यम से भारत को बदलना ही उसका लक्ष्य है। सभी सरसंघचालकों ने स्वयंसेवकों में यह भाव भरने का प्रयास किया और यह सूक्ति ही उनका ध्येय वाक्य बन गयी- नर सेवा नारायण सेवा।

    अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के बीच अपने वनवासी कल्याण आश्रमसेवा भारती जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने जो मैदानी और जमीनी काम किया है उसका मुकाबला सिर्फ जबानी जमा खर्च से सामाजिक परिवर्तन कर दावा करने वाले लोग नहीं कर सकते। संघ में सेवा एक संस्कार हैमुख्य कर्तव्य है। यहां सेवा कार्य का प्रचार नहींएक आत्मीय परिवार का सृजन महत्व का है। अनेक अवसरों पर कुछ फल और कम्बल बांटकर अखबारों में चित्र छपवाने वाली राजनीति इसको नहीं समझ सकती। समाज में व्याप्त भेदभाव, छूआछूत, को मिटाने के लिए संत रविदास ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके आदर्शों और कर्मों से सामाजिक एकता की मिसाल हमें देखने को मिलती है लेकिन वर्तमान दौर में इस सामाजिक विषमता को मिटाने के सरकारी प्रयास असफल ही कहे जा सकते हैं। कहीं-कहीं आशा की किरण समाज क्षेत्र में कार्यरत सेवा भारती जैसे संस्थानों के प्रकल्पों में दृष्टिगोचर होती है।

    भारत गावों में बसता है, गांवों में आज भी सामाजिक कुरीतियां कम नहीं हुयी हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने छुआछूत को मिटाने का नारा दिया, उनका जीवन भी सामाजिक समरसता की मिसाल है। गांधी जी ने स्वाधीनता आंदोलन में जितने भी प्रकल्प तय किए, उनका ध्येय भारत की सामाजिक विषमता को पाटना था। वे चाहते थे कि समाज में ऊंच-नीच, भेदभाव, लिंग अनुपात और आर्थिक सम्पन्नता,विपन्नता की खांई खत्म हो और भारत एक लय, एक स्वर, एक समानता और एक अखंडता के साथ मंडलाकार प्रवृत्ति में विश्व का नेतृत्व करे। कुछ ऐसी ही परिकल्पना पं. दीनदयाल उपाध्याय ने भी की। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामाजिक एकता के इसी प्रकल्प को आगे बढ़ा रहे हैं। आजादी के लगभग अस्सी वर्षों के बाद भी भारत से गरीबी हटी नहीं है और सामाजिक विषमता दूर नहीं हो सकी है। इस विषमता से समाज में लड़ाई-झगड़े, वैमनस्यता और ऊंच-नीच की प्रवृत्ति बढ़ी है। इस समस्या को भारत में मिटाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ आगे आया और सेवा के अनेक प्रकल्प शुरू किए। उनके इन सेवा प्रकल्पों का उद्देश्य भेदभाव से मुक्त, स्वाभिमानी-समरस और आत्मनिर्भर समाज बनाना था। सेवा भारती, संघ का एक ऐसा ही संगठन है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक जागरण एवं कौशल विकास के लगभग हजारों केंद्रों के द्वारा प्रकल्प चला रहा है। सेवा भारती इस मुहिम में तीन दशक से जुटा हुआ है। वर्ष 2017 में सेवा भारती का रजत जयंती वर्ष था। इस वर्ष में सेवा भारती अपने प्रकल्पों का आत्मावलोकन किया और नए प्रकल्पों पर विचार करते हुए नए प्रकल्प प्रारंभ किए। रजत जयंती वर्ष पर सेवा भारती भोपाल के लाल परेड मैदान पर ऐसे हजारों श्रम साधकों का संगम भी आयोजित किया। इस संगम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत स्वयं उपस्थित रहे। इस आयोजन में श्रमिकों और गरीब व पिछड़े वर्गों के लिए जीवन समर्पित करने वाले साधकों का सम्मान भी किया गया।

  आरएसएस निरंतर समाज के पिछड़े वर्गों की ओर देखता रहा है और विविध प्रकल्पों के जरिए उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहा है। यह सच है कि संत रविदास एक ऐसे संत थे जिन्होंने जीवन भर श्रम की साधना की। श्रम को प्रतिष्ठा करने वाले इस महान संत के शिष्यों में काशी नरेश व भक्त मीराबाई भी रहीं। अपने धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास के कारण संत रविदास जी ने दिल्ली के शासक सिकंदर लोधी को भी कह दिया था कि मैं प्राण त्याग दूंगा पर अपना धर्म नहीं छोडूंगा। हमारे अनेक संतों की तरह संत रविदास जी ने भी जन्म के आधार पर ऊंच-नीच को नकार दिया था। भोपाल में श्रम साधक समागम उन्हीं संत रविदास जी की जयंती पर आयोजित किया गया था।

     उम्मीद की जानी चाहिए कि संत रविदास की दृष्टि समाज के अंतिम छोर तक पहुंचेगी और जाति, पंथ के आधार पर भेदभाव को मिटाने में कारगर हो सकेगी। यह साधारण नहीं है कि मध्यप्रदेश आरंभ से ही संघ की एक प्रयोगशाला रहा है, जहां उसने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रों में विविध प्रयोग किए हैं। बैतूल एक ऐसा जिला है, जहां पर सैकड़ों गांवों को केंद्र बनाकर ग्रामीण विकास का एक नया अध्याय लिखने की पहल हुयी है। संघ के सरसंचालक मोहन भागवत ने ग्रामीण विकास के इन प्रकल्पों को सराहा था। इसके तहत बैतूल जिले में नशामुक्ति, आर्थिक-सामाजिक विकास, पर्यावरण जैसे विषयों पर हो रहे ये काम निश्चय ही बदलते भारत की बानगी पेश करते हैं।

   मध्यप्रदेश एवं देश के तमाम राज्यों में सरकारी स्तर पर भी कई योजनाएं श्रमिक और निचले तबके के  उत्थान के लिए बनती रही हैं। उन योजनाओं से इन वर्गों में कोई आमूलचूल बदलाव हुआ हो ऐसा कम ही दिखाई देता है। आजादी के सत्तर वर्षों में यदि सरकारी योजनाएं आम आदमी तक पहुंच पाती तो संत रविदास,राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बाबा साहेब आंबेडकर और पं. दीनदयाल उपाध्याय के सपने सच हो जाते। किंतु अफसोस है कि बदलाव की यह गति उतनी तेज नहीं रही जितनी होनी चाहिए। सरकारें आज भी उन्हीं के लिए योजना बना रही हैं और हर बजट में अधिक वित्त का प्रावधान करती हैं किंतु धरातल पर सूरतेहाल नहीं बदलते। यही कारण है कि सामाजिक विषमता अमरबेल की तरह पनप रही है। इस वर्ग के जो व्यक्ति समाज का नेतृत्व करते हैं, वह भी आगे आ जाने पर पीछे मुड़कर नहीं देखते हैं। बाद में अपने लोग ही उन्हें बेगाने लगने लगते हैं। सरकारी स्तर पर इस सामाजिक विषमता को पाटना नामुमकिन लगता है। इसमें समाज और सामाजिक संगठनों की सहभागिता जरूरी है। इसी ध्येय को आत्मसात कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक विषमता को दूर करने का बीड़ा उठाया है और सेवा प्रकल्पों में श्रम साधकों के माध्यम से सामाजिक साधना का काम निरंतर किया जा रहा है। भोपाल के इस महती आयोजन में शामिल होने वाले लोग दरअसल वे हैं जो दैनिक रोजी-रोजी कमाने के लिए रोज अपना पसीना बहाते हैं। इन वर्गों से संवाद और उनकी एकजुटता के बहाने संघ एक बड़ी सामाजिक पहल कर रहा है, इसमें दो राय नहीं है।

जातिभेद से मुक्ति जरूरी-

   सामाजिक समरसता के बिना कोई भी राष्ट्र अग्रणी नहीं बन सकता। गुरु घासीदास कहते हैं- मनखे-मनखे एक हैं। किंतु जातिवाद ने इस भेद को गहरा किया है। तमाम प्रयासों के बाद भी आज भी हम इस रोग से मुक्त नहीं हो सके हैं। भेदभाव ने हमारे समाज को विभाजित कर रखा है, जिसके चलते दुनिया में हमारी छवि ऐसी बनाई जाती है कि हम अपने ही लोगों से मानवीय व्यवहार नहीं करते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे- अस्पृश्यता ईश्वर और मानवता के प्रति अपराध है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे पू. बालासाहब देवरस ने इस संकट को रेखांकित करते हुए बसंत व्याख्यानमाला में कहा था कि- अगर छूआछूत गलत नहीं है दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है, इसे मूल से नष्ट कर देना चाहिए। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि जो कुछ भी सैकड़ों सालों से परंपरा के नाम पर चल रहा है वह हमारा धर्म नहीं है। इतिहास में हुए इन पृष्ठों का कोई भी सभ्य समाज समर्थन नहीं कर सकता। जबकि हमारे धर्म ग्रंथ और शास्त्र इससे अलग हैं। हमारे ऋषि और ग्रंथों के रचयिता सभी वर्गों से हैं। भगवान बाल्मीकि और वेद व्यास इसी परंपरा से आते हैं। यानि यह भेद शास्त्र आधारित नहीं है। यह विकृति है। इससे मुक्ति जरूरी है।हमें इसके सचेतन प्रयास करते हुए अपने आचरण, व्यवहार और वाणी से समरसता का अग्रदूत बनना होगा। सभी समाजों और वर्गों से संवाद और सहकार बनाकर हम एक आदर्श समाज की रचना में सहयोगी हो सकते हैं। इससे समाज का सशक्तिकरण भी होगा। समानता का व्यवहार, वाणी संयम, परस्पर सहयोग, संवेदनशीलता से हम दूरियों को घटा सकते हैं और भ्रम के जाले साफ कर सकते हैं। साथ ही अपने गांव, नगर के मंदिर, जलश्रोत, श्मशान सबके लिए समान रूप से खुल होने ही चाहिए। इसमें कोई भी भेद नहीं होना चाहिए।

वैचारिक आंदोलन से बदलेगा समाज-

     राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है। उसने दिखाया है कि संगठन, विचार और समर्पण के बल पर समाज को बदला जा सकता है, और राष्ट्र का नव निर्माण संभव है। संघ की यात्रा सेवा से समरसता तक, अनुशासन से राष्ट्रधर्म तक और शाखा से संसद तक हर पड़ाव पर भारत की आत्मा को जागृत करती है। वह भारत को केवल एक राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना के रूप में स्थापित करना चाहता है। संघ के कार्य को कोई चाहे जितना विरोध करे, किंतु उसकी राष्ट्रनिष्ठा, सेवा भावना और समर्पण को नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि विरोधी भी व्यक्तिगत रूप से संघ के कार्यों की प्रशंसा करते हैं, और कहीं-न-कहीं उससे प्रेरित भी होते हैं। संघ की शताब्दी यात्रा भारत की उस यात्रा का प्रतीक है, जो हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति और साधना का प्रतिफल है। यह यात्रा निरंतर चल रही है-भारत के निर्माण, उत्थान और पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में। इसमें सामाजिक समरसता और सेवा का मंत्र सबसे प्रमुख है। संघ के स्वयंसेवक शताब्दी वर्ष में एक समरस, सशक्त समाज के सृजन को स्थायित्व देने में जुटे हैं ताकि भारतविरोधी शक्तियां हमें बांटकर अपने कुचक्रों में सफल न हो सकें। एक समरस समाज सभी संकटों का हल है यही समझकर हमें निरंतर आगे बढ़ना है। संघ के सामाजिक सेवा प्रकल्पों को अपेक्षित सहयोग और समय देना भी जरूरी है। समाज की सामूहिक शक्ति से जल्दी और ज्यादा बेहतर परिणाम पाए जा सकते हैं, इसमें दो राय नहीं है।

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

नए साल में क्या हों भारत के सपने?

 

डिग्रीधारी बेरोजगार हैं देश की सबसे बड़ी चुनौती

-प्रो.संजय द्विवेदी



 किसी राष्ट्र जीवन के प्रवाह में साल का बदलना कैलेंडर बदलने से ज्यादा कुछ नहीं होता। किंतु नए साल पर हम व्यक्ति और समाज के तौर कुछ संकल्प लेते ही हैं। नया साल हमें विहंगावलोकन का अवसर देता है और आगे क्या करना है इसका मार्ग भी दिखाता है। 2026 ऐसा ही एक साल है, जिसने हमें यह अवसर दिया है कि हम अपनी चुनौतियों को पहचानें और सपनों में रंग भरने के लिए आगे आएं। युवा देश होने के नाते अगर यह अवसरों का जनतंत्र है तो आकांक्षाओं का समुद्र भी लहलहा रहा है। लोग आगे बढ़ना चाहते हैं और अच्छी जिंदगी जीना चाहते हैं। यह संकट किसी भी समाज के संकट हो सकते हैं किंतु भारत को इससे जूझकर ही आगे बढ़ने का मार्ग मिलेगा।

रोजगार सृजन की गुणवत्ता-  भारत की युवा आबादी के सपने बहुत बड़े हैं। वे अच्छा रोजगार चाहते हैं।अस्थायी कम वेतन वाली नौकरियां समाज में असंतोष का ही कारण बनती हैं। गिग इकोनामी, कान्ट्रैक्ट वर्क और आटोमेशन के दौर में युवाओं का संकट गहरा किया है। देश में शिक्षा केंद्र बढ़ें हैं किंतु मुद्दा यह है कि क्या युवाओं को वहां शिक्षा मिल रही है। वे कौशल से युक्त हो रहे हैं या सिर्फ डिग्री उनके लिए बोझ बन रही है। उद्योगों के लिए तैयार युवा कहां हैं। शिक्षा प्रणाली यह विवशता अभी खत्म होती नहीं दिखती। पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण और उद्योग के बीच लंबी प्रतीक्षा आज भी बनी हुई है। ऐसे में डिग्रीधारी बेरोजगार इस देश की सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। बने रहेंगें।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उपजे संकट-

एआई, मशीन लर्निंग और आटोमेशन हमारे जैसे बहुत बड़ी आबादी वाले समाज के लिए संकट भी है और अवसर भी।  तकनीक से बढ़ती उत्पादकता और सक्षम मशीनें अंततः मनुष्य को हाशिए पर लगा रही हैं। बहुत सारा वर्कफोर्स बेमानी होने के आसार हैं। पारंपरिक कामों और नौकरियों पर खतरे के गहरे बादल हैं। कई जगह ये प्रारंभ भी हो गया है। इस साल हमें यह तय करना होगा कि हम सारा कुछ बाजार की शक्तियों के हवाले कर देंगे या अपेक्षित संवेदना के साथ मानवीय आवश्यक्ता के साथ संतुलन बनाएंगें।

कृषि संकट और ग्रामीण भारत-

 पिछले अनेक सालों में नगर केंद्रित विकास के प्रयोगों ने हमारे शहरों को नरक और गांवों को खाली कर दिया। गांधी का ग्राम स्वराज्य का स्वप्न हाशिए पर लगा दिया गया। भारत माता ग्रामवासिनी सिर्फ गीतों का स्वर रह गया। उजड़ते गांवों ने ऐसी कथा लिखी है जिससे कहकर- सुनकर दर्द बढ़ता ही है। बावजूद इसके हमारी आधी से अधिक आबादी की निर्भरता आज भी खेती पर है। जलवायु परिर्वतन, बढ़ती लागत, न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनिश्चितता और बाजार की अस्थिरता ने किसानों को गहरे संकट में डाल रखा है। खेती की उपज के मूल्य का अंतर किसान और बाजार के बीच कितना है,यह देखना जरूरी है। कृषि सुधार के अनेक प्रयासों के बाद भी खेती लाभ का व्यवसाय नहीं बन पा रही है। ऐसे में नई पीढ़ी खेती करने से दूर जा रही है और किसानों की जेब और आत्मसम्मान दोनों संकट में हैं।

   इसके साथ ही जल संकट और पर्यावरण का सवाल हमारी बड़ी चुनौती है। महानगरों की फिजाओं में घुलता जहर हमने देखा है। इससे हमारी राष्ट्रीय राजधानी भी मुक्त नहीं है।कई राज्य गंभीर भूजल संकट से जूझ रहे हैं। अनियमित मानसून, प्रदूषण और अंधाधुंध शहरीकरण ने पर्यावरण संतुलन को चौपट कर दिया है। जल,जंगल और जमीन के सवाल हमें देर तक और दूर तक परेशान करते रहेंगें। इसके चलते समाज में गहरा असंतोष पैदा हो  रहा है। नए साल में इन सवालों को संबोधित करने की जरूरत है।

स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट-

कोविड संकट ने हमें आईना दिखाया था कि हमारी स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल क्या है। उससे उबर कर हमने बहुत कुछ सीखा और खुद को कई मामलों में आत्मनिर्भर बनाया। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर शहर और गांव का खांई और भी गहरी होती जा रही है। आयुष्मान योजना जैसे प्रकल्प भी लगता है कि निजी क्षेत्र की लूट का कारण बन गए हैं। आयुष्मान और बीमा धारकों की हैसियत को देखकर इलाज करने वाले अस्पताल भी खड़े हो गए हैं। रोग के बजाए मरीज तलाशे जा रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधा देने वाले कुछ लोग कई मायने में अमानवीयता की हदें पार कर रहे हैं। निजी सेवाएं महंगी होते जाने से सरकारी तंत्र पर दबाव बहुत बढ़ गया है। सरकारी अस्पतालों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है किंतु सर्वाधिक मरीज उन्हीं के पास हैं। ऐसे में भारत का मध्यवर्ग गहरे संकट का शिकार है। उसकी सुनने वाला कोई नहीं है। महंगाई, शिक्षा-स्वास्थ्य खर्च, ईएमआई, अस्थाई नौकरियां, करों का बोझ मध्यवर्ग के लिए चुनौती है। इससे सामाजिक अस्थिरता और उपभोक्ता अर्थव्यवस्था का संकट संभव है।

राज्यों की वित्तीय चुनौतियां-

लोकलुभावन वायदों को पूरा करने में राज्यों ने अपनी आर्थिक स्थिति चौपट कर ली है। संघीय ढांचा संतुलन और सहयोग की धुरी पर टिका हुआ है किंतु हालात संकटपूर्ण हैं।राज्यों के खस्ताहाल आर्थिक तंत्र, कर वितरण और योजनाओं  के क्रियान्यवन से जुड़े संकटों को नए साल में हल करने की जरूरत है। इसके साथ ही भारत की जटिल भौगोलिक संरचना में वह हर तरफ विरोधी विचार के देशों से घिरा है। पाकिस्तान और चीन के बाद अब बांग्लादेश की शांत सीमा से भी संकट बढ़ रहा है। ऐसे में सुरक्षा चुनौतियां बहुत गंभीर हैं। ऐसे में गहरे रणनीतिक संतुलन, कूटनीति और धैर्य की जरूरत दिखती है। नए  साल में हमें इन संकटों से दो-चार होना पड़ेगा।

सूचना का शोर और भरोसे का संकट-

मीडिया को चौथा स्तंभ कहकर लोक ने समादृत किया है। किंतु वह गहरे सूचना शोर से जूझ रहा है जहां भरोसे का संकट गहरा हुआ है। फेक न्यूज, प्रौपेगेंडा, एल्गोरिदमिक एजेंडा और टीआरपी संस्कृति ने समूची मीडिया की नैतिकता और समझदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।2026 का साल मीडिया के लिए खुद के आत्ममूल्यांकन और आत्मपरिष्कार का साल भी है। इसके साथ ही सोशल मीडिया ने नए संकट खड़े किए हैं। मुख्यधारा का मीडिया भी इससे आक्रांत है। सोशल मीडिया संवाद के बजाए विवाद का मंच बना हुआ है। सामाजिक समरसता और सद्भाव से परे हटकर दी जा रही सूचना और कथाएं हमारे लिए विचार का विषय हैं। इससे हमारी स्वाभाविक सद्भावना खतरे में हैं।

   इन संकटों के बीच भी हम तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं। हमें अपने संकटों के हल खुद खोजने होंगें। नया साल वह अवसर है कि हम आत्ममूल्यांकन कर सही दिशा में सामूहिक प्रयत्नों का सिलसिला आगे बढ़ाएं। 2026 हमारे लिए सिर्फ आर्थिक वृद्धि का साल नहीं बल्कि हमारे राष्ट्रीय विवेक, सामाजिक संतुलन और संवेदनशीलता की परीक्षा भी है। अनेक गंभीर चुनौतियों के बाद भी हम नीति,नीयत और ताकतवर नेतृत्व से अपने संकटों का हल कर सकते हैं। आइए अपने भागीरथ हम स्वयं बनें और विकास के साथ करुणा को साधकर एक बार पुनः भारतबोध की यात्रा पर प्रयाण करें।