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सोमवार, 27 जुलाई 2026

वर्चुअल दुनिया में 'लाइक' और असली जिंदगी में सन्नाटा!

 

'हाइपर कनेक्टिविटी' के दौर में युवाओं पर गहराता अकेलापन

-प्रो. संजय द्विवेदी



    सही मायनों में मानव सभ्यता के इतिहास में दुनिया इतनी कनेक्टेड कभी नहीं थी। एक क्लिक, एक संदेश और कुछ ही सेकेंड्स में सात समंदर पार बातचीत हो जाना किसी जादुई अहसास जैसा है। मोबाइल की चौबीस घंटे चमकती स्क्रीन ने इस जादुई दुनिया को हमारी हकीकत बना दिया है। लेकिन इस तकनीकी छलांग का दूसरा पहलू बेहद डरावना है। इतिहास के इस दौर में हम 'हाइपर कनेक्टेड' तो हैं, लेकिन शायद सबसे ज्यादा अकेले भी। सोशल मीडिया के आभासी मंचों पर हमारे दोस्तों और चाहने वालों की कतार बेहद लंबी है, मगर संकट के क्षणों में सिर रखने के लिए एक वास्तविक कंधा भी मयस्सर नहीं होता। हम निरंतर 'बातचीत' की भूलभुलैया में तो उलझे हैं, किंतु आंतरिक 'संवाद' के लिए तरस रहे हैं। सिर झुकाए और स्क्रीन के कोलाहल में डूबे समाज की बेचैनियां निरंतर बढ़ रही हैं। आधुनिक विमर्श में लाखों की भीड़ के बीच अकेले होने की त्रासदी इसी को कहते हैं।

    अकेलापन इस समय की सबसे बड़ी और चिंताजनक सामाजिक परिघटना बन चुका है। एक विचारक ने ठीक ही कहा है, "दोस्तों का न होना कोई अपराध नहीं है, लेकिन खुद में अकेला हो जाना एक त्रासदी है।"  सोशल मीडिया के इस दौर ने हमें अपनी ही बनाई भीड़ ने एकाकी कर दिया है। हालात इस हद तक बदल चुके हैं कि अब वास्तविक इंसानी रिश्तों की जगह 'एआई फ्रेंड्स' (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मित्र) ले रहे हैं। मशीनें हमारी सहायक, मार्गदर्शक और दोस्त बन रही हैं। मेरे जैसे मीडिया शिक्षक के लिए यह तथ्य रेखांकित करना बेहद पीड़ादायक है कि क्लासरूम में स्मार्टफोन की स्क्रीन पर चमकती युवा आँखें, फोन जेब में जाते ही एक अजीब से सन्नाटे और सामाजिक संकोच से घिर जाती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी पहचान और व्यक्तित्व का निर्माण अब वास्तविक समाज नहीं, बल्कि यह पाँच इंच की स्क्रीन कर रही है। सच तो यह है कि आज के युवाओं का एकांत भी शांत नहीं है, वह आभासी कोलाहल से भरा हुआ है।

       नए समय की माँग के अनुसार सोशल मीडिया पर उपस्थिति को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। तकनीक ने इस माध्यम को मोबाइल के जरिए हर हाथ और हर जेब तक पहुँचाया है। सोशल मीडिया पर मिलने वाले 'लाइक' और 'कमेंट्स' हमारे मस्तिष्क में तात्कालिक खुशी का संचार करते हैं। डिजिटल मंचों पर विचरते लोग इस आभासी प्रशंसा के आदी हो चुके हैं। यह क्षणिक खुशी एक नशे की तरह काम करती है। दिनभर लगातार पोस्ट करते, रील्स देखते और प्रतिक्रियाएं देते लोग अनजाने में ही इस माध्यम के गहरे चंगुल में फंस जाते हैं। 'डोपामाइन' का यह मायाजाल आज हमारे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है।

     डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अमूमन चमकती हुई चीजें ही परोसी जाती हैं। लोग अपनी सुनहरी यादों, सफलताओं और सबसे खूबसूरत पलों को ही यहाँ साझा करते हैं। सोशल मीडिया पर परोसी जा रही इस 'चमकीली जिंदगी' (रील्स, वेकेशन, महँगी पार्टियां) को देखकर सामान्य पृष्ठभूमि का युवा अपनी साधारण वास्तविक जिंदगी की तुलना उनकी 'रील्ड लाइफ' से करने लगता है। यह तुलना अंततः उसे हीनभावना की ओर धकेल देती है, जिससे 'तुलना का अवसाद' पैदा होता है। पूर्ववर्ती दौर में युवा फिल्मों से सीखते थे, लेकिन तब महीनों में कोई एक फिल्म आती थी जिसका प्रभाव लंबे समय तक रहता था। अब रील्स के दौर में यह मानसिक बमबारी हर सेकंड जारी है।

     हमें 'बातचीत' और 'संवाद' के बुनियादी अंतर को समझना होगा। आँखों में आँखें डालकर की जाने वाली आत्मीय बातचीत के बजाय लोग अब केवल मोबाइल स्कॉलिंग में उलझे हैं। यात्राओं, सार्वजनिक स्थानों, पार्कों और यहाँ तक कि कॉलेजों के कैम्पस में भी लोग आपस में बतियाने के बजाय सिर झुकाए स्क्रीन निहारते दिखते हैं। मोबाइल द्वारा दिए गए इस एकाकीपन ने हमारी संवादात्मक क्षमता को गंभीर रूप से पंगु बना दिया है। जिन भावनाओं को शब्दों में बयां किया जाना चाहिए था, उन्हें अब 'इमोजी', 'शॉर्ट्स' और 'टेक्स्ट' के छोटे टुकड़ों में समेटा जा रहा है। इसके कारण युवा पीढ़ी में वास्तविक सामाजिक कौशल तेजी से लुप्त हो रहे हैं। संवादहीनता के कारण मन की वास्तविक आकांक्षाएं अधूरी रह जाती हैं और हम एक ऐसे उदासीन समाज में तब्दील हो रहे हैं, जिसे स्क्रीन पर गुस्सा जाहिर करना तो आता है, लेकिन वास्तविक जीवन में प्रेम और करुणा व्यक्त करना नहीं।

     अकेलापन अब सिर्फ किसी व्यक्ति का निजी मामला या भावनात्मक उदासी नहीं रह गया है; यह एक गंभीर वैश्विक संकट का रूप ले चुका है। यह संकट इतना गहरा है कि इससे मानसिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी घातक चुनौतियाँ मिल रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा गठित 'सोशल कनेक्शन कमीशन' की महत्वपूर्ण रिपोर्ट इस बात पर विशेष प्रकाश डालती है कि सामाजिक अलगाव और अकेलापन दुनिया भर में एक मूक महामारी की तरह फैल रहे हैं, जिनका समाज पर गहरा लेकिन अनदेखा प्रभाव पड़ रहा है। नवीनतम वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर यह रिपोर्ट तत्काल वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देती है। आयोग के निष्कर्ष बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर हर छह में से एक युवा इस समय गंभीर अकेलेपन का अनुभव कर रहा है।

     विभिन्न शोध रिपोर्ट्स के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय युवा प्रतिदिन औसतन 4 से 5 घंटे स्मार्टफोन की स्क्रीन को दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय रहने वाले हर पाँच में से दो युवा (लगभग 40 प्रतिशत) किसी न किसी स्तर पर अकेलेपन या एंग्जायटी (घबराहट) का सामना कर रहे हैं। स्क्रीन-टाइम के इस अनियंत्रित फैलाव के कारण युवाओं में अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और 'नोमोफोबिया' (मोबाइल से दूर होने का डर) में करीब 30 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आए दिन ऐसी खबरें सामने आती हैं जहाँ माता-पिता द्वारा फोन छीन लिए जाने पर बच्चों ने आत्मघाती कदम उठा लिए या घर छोड़ दिया।

       यह समस्या केवल सामान्य पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं है; देश के सबसे तेज और तकनीकी रूप से उन्नत दिमाग वाले छात्र भी इस डिजिटल अकेलेपन और 'परफॉर्मेंस प्रेशर' के चक्रव्यूह में फंसे हैं। 'आईआईटी बॉम्बे' के 'स्टूडेंट वेलनेस सेंटर' (काउंसिलिंग सेल) ने छात्रों में सोशल मीडिया जनित अवसाद के गंभीर लक्षण दर्ज किए हैं। हालांकि, इसके सकारात्मक समाधान के रूप में छात्रों ने खुद परिसरों में 'डिजिटल डिटॉक्स' और 'नो गैजेट नाइट्स' जैसे जमीनी अभियानों की शुरुआत की है। इन अभियानों के तहत छात्र सप्ताह में एक शाम अपना फोन कमरों में छोड़कर केवल आपस में बातचीत करने, खेलने और कलात्मक गतिविधियों के लिए मैदानों में इकट्ठा होते हैं। यह अनूठी पहल साबित करती है कि तकनीक का कोई भी एल्गोरिदम कभी भी जीवंत इंसानी जुड़ाव का विकल्प नहीं बन सकता।

      इस चुनौतीपूर्ण समय में हम तकनीक या सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की वकालत नहीं कर सकते, क्योंकि मोबाइल विहीन आधुनिक जीवन की कल्पना अब असंभव है। समाधान पूरी तरह से तकनीक को छोड़ना नहीं, बल्कि 'डिजिटल हाइजीन' को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना है। हमें सजगता से अपने स्क्रीन टाइम को घटाकर 'ग्रीन टाइम' (प्रकृति, परिवार और वास्तविक मित्रों के साथ बिताया जाने वाला समय) को बढ़ाना होगा।

        अगली बार जब हम किसी कैफ़े, मेट्रो या ड्राइंग रूम में बैठें, तो इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में खोने के बजाय, अपने सामने उपस्थित व्यक्ति की बात को पूरी आत्मीयता से सुनें। समाज, संस्कृति और मनुष्यता को जिंदा रखने के लिए हमें इंसानों की संवेदनशीलता की ज़रूरत है, मशीनी एल्गोरिदम की नहीं। मनुष्य का जीवन अनमोल है, किंतु हमारी मनुष्यता उससे भी बड़ी है। मानव और अन्य जीवों के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि हमने भाषाएं विकसित कीं, बातचीत से संवाद की यात्रा तय की और कलाओं के माध्यम से संचार का मानवीय दायरा बढ़ाया। तकनीक को हमारा सहयोगी होना चाहिए था, संचालक नहीं। समय आ गया है कि हम अपनी वास्तविक खुशियों और आंतरिक आनंद को बचाए रखने के लिए तकनीक को वापस सहायक की भूमिका में लाएं, न कि उसे अपनी चेतना का नियंता बनने दें।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

 

 

 

 

डिजिटल चुनौती के बीच कैसे जिएं अखबार

 

पठनीयता के गहरे संकट से जूझते समाचार पत्र क्या करें?



   हां, सामने मीडिया की पढ़ाई करने की चाह रखने वाले विद्यार्थी ही थे, उम्मीद की जानी चाहिए कि वे कोई अखबार, मैगजीन या किताबें पढ़कर आए होंगे। लगभग 110 विद्यार्थियों से बात करते हुए यह अहसास हुआ कि अखबार अब उनकी जिंदगी में कोई जगह नहीं रखता। वे जो कुछ भी ग्रहण कर रहे हैं, आनलाइन ही कर रहे हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया के सामने बहुत गहरे संकट हैं। क्योंकि इस डिजिटल समय में उनके ई-पेपर ही पलटे जा रहे हैं। क्या अब हाथ में अखबार लेकर पढ़ने वाले दुर्लभ हो जाएंगें? 

बदल गए हैं पढ़ने के तरीके-

    डिजिटल मीडिया और स्मार्टफोन ने पढ़ने के तरीके को बदलकर रख दिया है। पोर्टल्स, सोशल मीडिया और न्यूज एप्स के कारण पाठकों को पल-पल की खबरें मुफ्त में उनके मोबाइल पर मिल रही हैं। जिससे 24 घंटे में एक बार आनेवाला अखबार क्या मुकाबला करेगे। रीयल टाइम अपडेट एक ऐसी घटना है जिसने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। ऐसे में अखबारों को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए नए रास्ते तलाशने की जरूरत है। नई पीढ़ी लंबी सामग्री पढ़ने के बजाए अब वीडियो, शार्ट्स, पाडकास्ड और विजुअल इंफ्रोग्राफिक्स के जरिए चीजों को देखना,सुनना और समझना सीख गई है। प्रिंट मीडिया के प्रति उसका आकर्षण खत्म सा है।

आर्थिक संकट से भी हैं हलाकान-

     इस परिघटना ने प्रिंट मीडिया से कमाई के मौके भी छीनने शुरु कर दिए हैं। हम जानते हैं अखबार मूलतः विज्ञापनों ( स्पेस सेलिंग) पर निर्भर हैं। अब जबकि कंपनियां अपना बड़ा बजट डिजिटल प्लेटफार्म जैसे गूगल,मेटा और यू-ट्यूब पर खर्च कर रही हैं, जहां वे अपने लक्षित समूह ( टारगेट आडियंस) तक आसानी से पहुंच रही हैं। इसकी लागत भी कम पड़ रही है। एल्गोरिद्म ने बाजार और ग्राहक की पहुंच को बहुत आसान बना दिया है। कागज, स्याही और छपाई की बढ़ती कीमतों से अखबार पहले ही हलाकान थे, बिजली और प्रिंटिंग मशीनों का रख-रखाव उनकी अलग चिंताओं को बढ़ाता रहा है। इन स्थितियों में अखबार की न सिर्फ लागत बढ़ जाती है बल्कि उसे लोगों तक पहुंचाना सरल नहीं रह गया है। अखबारों को सुबह छापना और लोगों के घरों तक पहुंचाना हमेशा ही कठिन काम था। भारत जैसे बाजार में जहां लोग पढ़ने के लिए खर्च को तैयार नहीं है, यह संकट और जटिल हो जाता है। आज भी हिंदुस्तान के बाजार में अखबार 3 से 7 रूपए के बीच ही बेचे जा रहे हैं। जो उसकी वास्तविक लागत से बहुत कम होता है। विज्ञापनों में आती कमी के बीच इसे छापना असंभव होता जाएगा। हम ध्यान से देखें तो हाकरों की नई पीढ़ी की रूचि अखबार बांटने में रूचि कम रख रही है। दूध या अन्य व्यवसाय के साथ अखबार वितरण भी किया जा रहा है। स्टाल कम हो रहे हैं जहां पत्र-पत्रिकाएं मिला करती थीं। स्टेशनों से लेकर नगरों, कस्बों तक अखबारों और पत्रिकाओं के स्टाल समाप्त हो रहे हैं या उनपर खाद्य सामग्री बिक रही है।

भरोसे का संकट बड़ी चुनौती-

     टीवी और डिजिटल मीडिया से होड़ कर रहे प्रिंट मीडिया ने भी गहरी रिर्पोटिंग और विश्लेषणात्मक सामग्री के बजाए हल्की-फुल्की प्रस्तुति से खुद को अप्रासंगिक बना लिया है। बहुत कम अखबार हैं जो सामग्री की गुणवत्ता और विचारों पर ध्यान क्रेंद्रित कर रहे हैं। ऐसे में जब आनलाइन उपलब्ध सामग्री जैसे ही विषयवस्तु अखबारों में होगी तो निश्चित ही पाठक दूर जाएंगें। कागज के निर्माण में पेड़ों की कटाई और जल की खपत जैसे मुद्दे उठाकर  भी अखबारों से दूर करने की एक नैतिक और व्यवहारिक चिंताएं खड़ी करने के प्रयास भी हो रहे हैं। ऐसे में राजस्व में गिरावट के कारण जहां मझोले और छोटे अखबारों के सामने अस्तित्व का संकट है तो बड़े अखबार भी संपादकीय बजट में कटौती, पत्रकारों की छंटनी जैसे काम कर रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य में अखबारों की अधिकाधिक निर्भरता कारपोरेट और सरकारी विज्ञापनों पर बहुत बढ़ गई है। संकट का असली सिरा यहीं है। भरोसे,विश्वसनीयता का संकट इन्हीं सब कारणों से बढ़ रहा है। निष्पक्ष पत्रकारिता बहुत चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।

आखिर रास्ता क्या है-

  जाहिर है संकटों से घिरे प्रिंट मीडिया के सामने विकल्प सीमित हैं। अब केवल संकटों की बात, समस्याओं का बातें करने से आगे समाधान परक पत्रकारिता की आवश्यक्ता है। जिसमें अखबार संकटों के साथ उनके संभावित समाधानों, सफल माडल्स और सकारात्मक प्रयासों की बात भी करें। व्याख्या, विश्लेषण और खोजी पत्रकारिता पर फोकस करके उन्हें खबर क्यों घटी और इसके मायने क्या हैं बताने होंगे। अखबार अब सूचना के वाहक नहीं उनके विश्लेषण और व्याख्याओं के वाहक बनें। डेटा, शोध और गहन मैदानी कवरेज ही वह रास्ता है जिससे प्रिंट स्वयं को प्रासंगिक बनाए रख सकता है। फैक्ट चेकिंग की अनिर्वायता के साथ हमें गलत खबरों का पर्दाफाश भी करना होगा। सबसे पहले खबर देने के बजाए सबसे सटीक खबर देने के सिद्धांत पर लौटना होगा। इसके साथ ही आत्मनिर्भर वित्तीय माडल पर काम करते हुए पाठक द्वारा पोषित मीडिया खड़ा करना होगा। पत्रकारों को तकनीक से डरने के बजाय उसका इस्तेमाल अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए करना चाहिए। डेटा एनालिसिस, ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद और रूटीन री-लेखन में एआई (AI) का इस्तेमाल करें ताकि पत्रकारों का समय फील्ड वर्क, मानवीय संवेदनाओं की कहानियों और खोजी रिपोर्टिंग में लग सके। पत्रकारिता तब तक निष्पक्ष नहीं हो सकती जब तक पत्रकार स्वयं सुरक्षित और आर्थिक रूप से निश्चिंत न हों।

मीडिया साक्षरता भी है जरूरी-

     मीडिया संस्थानों और समाज को मिलकर ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संवाददाताओं के लिए सुरक्षा कवर, बीमा और सम्मानजनक मानदेय सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाना होगा। पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को आम जनता के बीच 'मीडिया साक्षरता' की समझ बहुत जरूरी है। जब पाठक यह समझना सीख जाएंगे कि कौन-सी खबर प्रायोजित है, कौन-सा एजेंडा है और कौन-सी वास्तविक पत्रकारिता, तो वे खुद-ब-खुद घटिया और सनसनीखेज कंटेंट को नकारना शुरू कर देंगे। भरोसा वह शब्द है जो आसानी से अर्जित नहीं होता, अखबारों की स्वीकार्यता में विश्वसनीयता और प्रामणिकता का सर्वाधिक योगदान होगा। उम्मीद की जानी कि नई डिजिटल चुनौतियों के बीच भी कुछ लोग उस भरोसे को कायम रखेंगें, जो भारतीय पत्रकारिता ने अपनी लंबी यात्रा से अर्जित किया है।


 

 

बुधवार, 29 जुलाई 2020

थोड़ा डिजीटल हो जाएं !


-प्रो. संजय  द्विवेदी

    कोरोना काल ने सही मायने में भारत को डिजीटल इंडिया बना दिया है। पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र में इसका व्यापक असर हुआ है। प्राइमरी से लेकर उच्चशिक्षा संस्थानों ने आनलाईन कक्षाओं का सहारा लेकर नए प्रतिमान रचे हैं। आने वाले समय में यह चलन कितना प्रभावी होगा यह तो नहीं कहा जा सकता, किंतु संकट काल में संवाद, शिक्षा और सहकार्य के तमाम अवसर इस माध्यम से प्रकट हुए हैं।
  यह कहा जा रहा कि आनलाइन कक्षाएं वास्तविक कक्षाओं का विकल्प नहीं हो सकतीं क्योंकि एक शिक्षक की उपस्थिति में कुछ सीखना और उसकी वर्चुअल उपस्थिति में कुछ सीखना दोनों दो अलग-अलग परिस्थितियां हैं। संभव है कि हमारा अभ्यास वास्तविक कक्षाओं का है और हमारा मन और दिमाग इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि आनलाइन कक्षाएं भी सफल हो सकती हैं। दिमाग की कंडीशनिंग( अनुकूलन) कुछ ऐसी हुई है कि हम वर्चुअल कक्षाओं को वह महत्ता देने के लिए तैयार नहीं है जो वास्तविक कक्षाओं के देते हैं। फिर भी यह मानना होगा कि आभासी दुनिया आज तमाम क्षेत्रों में वास्तविक दुनिया को मात दे रही है। हमारे निजी जीवन में हम जिस तरह डिजीटल हुए हैं, क्या वह पहले संभव दिखता था। हमारी बैंकिग, हमारे बाजार, हमारा खानपान, तमाम तरह के बिल भरने की प्रक्रिया, टिकिटिंग और ट्रैवलिंग के इंतजाम क्या कभी आनलाइन थे। पर समय ने सब संभव किया है। आज एटीएम जरूरत है तथा आनलाइन टिकट वास्तविकता। हमारी तमाम जरूरतें आज आनलाईन ही चल रही हैं। ऐसे में यह कहना बहुत गैरजरुरी नहीं है कि आनलाइन माध्यम ने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं। आनलाइन शिक्षा के माध्यम को इस कोरोना संकट ने मजबूत कर दिया है।
   आनलाइन कक्षाओं ने संसाधनों का एक नया आकाश रच दिया है। जो व्यक्ति आपकी किसी क्लास, किसी आयोजन, कार्यशाला के लिए दो घंटे का समय लेकर नहीं आ सकता,यात्रा में लगने वाला वक्त नहीं दे सकता। वही व्यक्ति हमें आसानी से उपलब्ध हो जाता है। क्योंकि उसे पता है कि उसे अपने घर या आफिस से ही यह संवाद करना है और इसके लिए उसे कुछ अतिरिक्त करने की जरुरत नहीं है। यह अपने आप में बहुत गजब समय है। जब मानव संसाधन के स्मार्ट इस्तेमाल के तरीके हमें मिले हैं। आप दिल्ली, चेन्नई या भोपाल में होते हुए भी विदेश के किसी देश में बैठे व्यक्ति को अपनी आनलाईन कक्षा में उपलब्ध करा सकते हैं। इससे शिक्षण में विविधता और नए अनुभवों का सामंजस्य भी संभव हुआ है। इस शिक्षा का ना तो भूगोल है, न ही समय सीमा। इन लाकडाउन के दिनों में अनेक मित्रों ने कई विषयों में आनलाइन कोर्स कर अपने को ज्ञानसमृद्ध किया है। भोपाल का एक विश्वविद्यालय सूदूर अरुणाचल विश्वविद्यालय के विद्वान मित्रों के साथ एक साझा संगोष्ठी आनलाइन आयोजित कर लेता है। यह किसी विदेशी विश्वविद्यालय के साथ भी संभव है। यात्राओं में होने वाले खर्च, आयोजनों में होने वाले खर्च, खानपान के खर्च जोड़ें तो ऐसी संगोष्ठियां कितनी महंगी हैं। बावजूद इसके किसी व्यक्ति को साक्षात सुनना और देखना। साक्षात संवाद करना और वर्चुअल माध्यम से उपस्थित होना। इसमें अंतर है। यह रहेगा भी। बावजूद इसके जैसे-जैसे हम इस माध्यम के साथ हम सहज होते जाएंगें,यह माध्यम भी वही सुख देगा जो किसी की भौतिक उपस्थिति देती है। भावनात्मक स्तर पर इसकी तुलना सिनेमा से की जा सकती है। यह सिनेमा सा सुख है। अच्छा सिनेमा हमें भावनात्मक स्तर पर जोड़ लेता है। इसी तरह अच्छा संवाद भी हमें जोड़ता है भले ही वह वर्चुअल क्यों न हो। जबकि बोरिंग संवाद भले ही हमारे सामने हो रहे हों, हम हाल की पहली पंक्ति में बैठकर भी सोने लगते हैं या बोरियत का अनुभव करने लगते हैं।
  शिक्षा का असल काम है विषय में रूचि पैदा करना। अच्छा शिक्षक वही है जो आपमें जानने की भूख जगा दे। इसलिए प्रेरित करने का काम ही हमारी कक्षाएं करती हैं। पुरानी पीढ़ी शायद इतनी जल्दी यह स्वीकार न करे, किंतु नई पीढ़ी तो वर्चुअल माध्यमों के साथ ही ज्यादा सहज है। हमें दुकान में जाकर सैकड़ों चीजें में से कुछ चीजें देखकर,छूकर, मोलभाव करके खरीदने की आदत है। नई पीढ़ी आनलाइन शापिंग में सहज है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें नई पीढ़ी की चपलता, सहजता देखते ही बनती है। शायद हम जैसे शिक्षकों को  इस माध्यम के साथ वह सहजता न महसूस हो रही हो, संभव है कि आपकी वर्चुअल कक्षा में उपस्थित छात्र या छात्रा उसके साथ ज्यादा सहज हों। हमारा मन यह स्वीकारने को तैयार नहीं है कि कोई स्क्रीन हमारी भौतिक उपस्थिति से ज्यादा ताकतवर हो सकती है। किंतु आवश्यक्ता और मजबूरियां हमें नए विकल्पों पर विचार के लिए बाध्य करती हैं। आज आनलाइन शिक्षा एक वास्तविकता है, जिसे हम माने या न मानें स्वीकारना पड़ेगा। कोरोना के संकट ने हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। जिसमें क्लासरूम टीचिंग की प्रासंगिकता, उसकी रोचकता और जरुरत बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। ज्ञान को रोचक अंदाज में प्रस्तुत करने और सहज संवाद की चुनौती भी सामने है। आज का विद्यार्थी नए वर्चुअल माध्यमों के साथ सहज है, उसने डिजीटल को स्वीकार कर लिया है। इसलिए डिजीटल माध्यमों के साथ सहज संबंध बनाना शिक्षकों की भी जिम्मेदारी है। कक्षा के अलावा असाईनमेंट, नोट्स और अन्य शैक्षिक गतिविधियों के लिए हम पहले से ही डिजीटल थे। अब कक्षाओं का डिजीटल होना भी एक सच्चाई है। संवाद, वार्तालाप, कार्यशालाओं, संगोष्ठियों को डिजीटल माध्यमों पर करना संभव हुआ है। इसे ज्यादा सरोकारी, ज्यादा प्रभावशाली बनाने की विधियां निरंतर खोजी जा रही हैं। इस दिशा में सफलता भी मिल रही है। गूगल मीट, जूम, जियो मीट, स्काइप जैसे मंच आज की डिजीटल बैठकों के सभागार हैं। जहां निरंतर सभाएं हो रही हैं, विमर्श निरंतर है और संवाद 24X7  है। कहते हैं डिजीटल मीडिया का सूरज कभी नहीं डूबता। वह सदैव है, सक्रिय है और चैतन्य भी। माध्यम की यही शक्ति इसे खास बनाती है। यह बताती है कि प्रकृति सदैव परिर्वतनशील है और कुछ भी स्थायी नहीं है। मनुष्य ने अपनी चेतना का विस्तार करते हुए नित नई चीजें विकसित की हैं। जिससे उसे सुख मिले, निरंतर संवाद और जीवन में सहजता आए। डिजीटल मीडिया भी मनुष्य की इसी चेतना का विस्तार है। इसके आगे भी वह नए-नए रुप लेकर आता रहेगा। नया और नया और नया। न्यू मीडिया के आगे भी कोई और नया मीडिया है। उस सबसे नए की प्रतीक्षा में आइए थोड़ा डिजीटल हो जाएं।