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शनिवार, 15 जून 2024

'इंडिया' की आंखों से भारत को मत देखिए!

-भारतीयता को नए संदर्भों  में व्याख्यायित करना जरूरी 

-प्रो. संजय द्विवेदी



    आजकल राष्ट्रीयता,भारतीयता, राष्ट्रत्व और राष्ट्रवाद जैसे शब्द चर्चा और बहस के केंद्र में है। ऐसे में यह जरूरी है कि हम भारतीयता पर एक नई दृष्टि से सोचें और जानें कि आखिर यह क्या है? ‘राष्ट्र’ सामान्य तौर पर सिर्फ भौगोलिक नहीं बल्कि ‘भूगोल-संस्कृति-लोग’ के तीन तत्वों से बनने वाली इकाई है। इन तीन तत्वों से बने राष्ट्र में आखिर सबसे महत्वपूर्ण तत्व कौन सा है? जाहिर तौर पर वह ‘लोग’ ही होगें। इसलिए लोगों की बेहतरी,भलाई, मानवता का स्पंदन ही किसी राष्ट्रीयता का सबसे प्रमुख तत्व होना चाहिए।

        जब हम लोगों की बात करते हैं तो भौगोलिक इकाईयां टूटती हैं। अध्यात्म के नजरिए से पूरी दुनिया के मनुष्य एक हैं। सभी संत, आध्यात्मिक नेता और मनोवैज्ञानिक भी यह मानने हैं कि पूरी दुनिया पर मनुष्यता एक खास भावबोध से बंधी हुयी है। यही वैश्विक अचेतन (कलेक्टिव अनकांशेसनेस) हम-सबके एक होने का कारण है। स्वामी विवेकानंद इसी बात को कहते थे कि इस अर्थ में भारत एक जड़ भौगोलिक इकाई नहीं है। बल्कि वह एक चेतन भौगोलिक इकाई है, जो सीमाओं और सैन्य बलों पर ही केंद्रित नहीं है। भारतीय राष्ट्रवाद मनुष्य के विस्तार व विकास पर केंद्रित है। जिसे भारत ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ कहकर संबोधित किया। यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ राजनीतिक सत्ता का उच्चार नहीं है। उपनिषद् का उच्चार है। सारी दुनिया के लोग एक परिवार, एक कुटुम्ब के हैं, इसे समझना ही दरअसल भारतबोध को समझना है। यह भाव ही मनुष्य की सांस्कृतिक एकता के विस्तार का प्रतीक है। हमारे सांस्कृतिक मूल्य, मानवतावादी सांस्कृतिक मूल्यों पर केंद्रित हैं। हमारी भारतीय अवधारणा में राज्य निर्मित भौगोलिक-प्रशासनिक इकाईयां प्रमुख स्थान नहीं रखतीं बल्कि हमारी चेतना, संस्कृति, मूल्य आधारित जीवन और परंपराएं ही यहां हमें राष्ट्र बनाती हैं। हमारे सांस्कृतिक इतिहास की ओर देखें तो आर्यावर्त की सीमाएं कहां से कहां तक विस्तृत हैं, जबकि सच यह है कि इस पूरे भूगोल पर राज्य बहुत से थे, राजा अनेक थे- किंतु हमारा सांस्कृतिक अवचेतन हमें एक राष्ट्र का अनुभव करता था। एक ऐतिहासिक सत्य यह  भी यह है  कि हमारा राष्ट्रीयता दरअसल राज्य संचालित नहीं था, वह समाज और बौद्धिक चेतना से संपन्न संतों, ऋषियों द्वारा संचालित थी। एक विद्वान कहते हैं राजा राज्य बनाते हैं, राष्ट्र ऋषि बनाते हैं। वही भारतबोध इस व्यापक भूगोल की चेतना में समाया हुआ था। यहां का ज्ञान विस्तार जिस तरह चारों दिशाओं में हुआ,वह बात हैरत में डालती है।

    आप देखें तो भगवान बुद्ध पूरी दुनिया में अपने संदेश को यूं ही नहीं फैला पाए, बल्कि उस ज्ञान में एक ऐसा नवाचार,नवचेतन था, जिसे दुनिया ने स्वतः आगे बढ़कर ग्रहण किया। भारत कई मायनों में अध्यात्म और चेतना की भूमि है। सच कहें तो दुनिया की तमाम स्थितियों से भारत एक अलग स्थिति इसलिए पाता है, क्योंकि यह भूमि संतों के लिए, ज्ञानियों के लिए उर्वर भूमि है। दुनिया के तमाम विचारों की सांस्कृतिक चेतना जड़वादी है, जबकि भारत की चेतना जैविक है। इसलिए भारत मरता नहीं है, क्योंकि वह जड़वादी और हठवादी नहीं है। यहां का मनुष्य सांस्कृतिक एकता के लिए तो खड़ा होता है पर विचारों में जड़ता आते ही उससे अलग हो जाता है। हमारा ईश्वर आंतरिक उन्नयन और पाप क्षय के लिए काम करता है। हमारे संत भी आध्यात्मिक उन्नयन और पापों के क्षय के लिए काम करते हैं। मनुष्य की चेतना का आत्मिक विस्तार ही हमारी राष्ट्रीयता का लक्ष्य है। इसलिए यह सिर्फ एक खास भूगोल, एक खास विचारधारा और पूजा पध्दति में बंधे लोगों के उद्धार के लिए नहीं, बल्कि समूची मानवता की मुक्ति के काम करने वाला विचार है। यहां मानव की मुक्ति ही उसका लक्ष्य है। यह राष्ट्रीयता सैन्यबल और व्यापार बल से चालित नहीं है, बल्कि यह चेतना के विस्तार, उसके व्यापक भावबोध और मनुष्य मात्र की मुक्ति के विचार से अनुप्राणित है।

   भारतीय संदर्भ में भारतबोध को समझना वास्तव में मानवतावाद के व्यापक परिप्रेक्ष्य को समझना है। यह विचार कहता है- “ संतों को सीकरी से क्या काम” और फिर कहता है ‘’कोई नृप होय हमें क्या हानि”। इस मायने में हम राज या राज्य पर निर्भर रहने वाले समाज नहीं थे। राजा या राज्य एक व्यवस्था थी, किंतु जीवन मुक्त था-मूल्यों पर आधारित था। पूरी सांस्कृतिक परंपरा में समाज ज्यादा ताकतवर था और स्वाभिमान के साथ उदार मानवतावाद और एकात्म मानवदर्शन पर आधारित जीवन जीता था। वह चीजों को खंड-खंड करके देखने का अभ्यासी नहीं था। इसलिए इस राष्ट्रीयता में जो समाज बना, वह राजा केंद्रित नहीं, संस्कृति केंद्रित समाज था। जिसे अपने होने-जीने की शर्तें पता थीं, उसे उसके कर्तव्य ज्ञात थे। उसे राज्य की सीमाएं भी पता थीं और अपनी मुक्ति के मार्ग भी पता थे। इस समाज में गुणता की स्पर्धा थी- इसलिए वह एक सुखी और संपन्न समाज था। इस समाज में भी बाजार था, किंतु समाज- बाजार के मूल्यों पर आधारित नहीं था। आनंद की सरिता पूरे समाज में बहती थी और आध्यात्मिकता के मूल्य जीवन में रसपगे थे। भारतीय समाज जीवन अपनी सहिष्णुता के नाते समरसता के मूल्यों का पोषक है। इसीलिए तमाम धाराएं,विचार,वाद और पंथ इस देश की हवा-मिट्टी में आए और अपना पुर्नअविष्कार किया, नया रूप लिया और एकमेक हो गए। भारतीयता हमारे राष्ट्र का अनिवार्य तत्व है। भारतीयता के माने ही है स्वीकार। दूसरों को स्वीकार करना और उन्हें अपनों सा प्यार देना। यह राष्ट्रवाद विविधता को साधने वाला, बहुलता को आदर देने वाला और समाज को सुख देने वाला है। इसी नाते भारत का विचार आक्रामकता का, आक्रमण का, हिंसा या अधिनायकवाद का विचार नहीं है। यह श्रेष्ठता को आदर देने वाली,विद्वानों और त्यागी जनों को पूजने वाली संस्कृति है। अपने लोक तत्वों को आदर देना ही यहां भारतबोध है। इसलिए यहां भूगोल का विस्तार नहीं, मनों और दिलों को जीतने की संस्कृति जगह पाती है।

   यहां शांति है, सुख है, आनंद है और वैभव है। यह देकर, छोड़कर और त्याग कर मुक्त होती है। समेटना यहां ज्ञान को है। संपत्ति, जमीन और वैभव को नहीं। इसलिए फकीरी यहां आदर पाती है और सत्ताएं लांछन पाती हैं। इसलिए यहां लोकसत्ता का भी मानवतावादी होना जरूरी है। यहां सत्ता विचारों से, कार्यों से और आचरण से लोकमानस का विचार करती है तो ही सम्मानित होती है। वैसे भी भारतीय समाज एक सत्ता निरपेक्ष समाज है। वह सत्ताओं की परवाह न करने वाला स्वाभिमानी समाज है। इसलिए उसने जीवन की एक अलग शैली विकसित की है, जो उसके भारतबोध ने उसे दी है। यही स्वाभिमान एक नागरिक का भी है और राष्ट्र का भी। इसलिए वह अपने अध्यात्म के पास जाता है, अपने लोक के पास जाता है और सत्ता या राज्य के चमकीले स्वप्न उसे रास नहीं आते। इसी राष्ट्र तत्व को खोजते हुए राजपुत्र सत्ता को छोड़कर वनों, जंगलों में जाते रहे हैं, ज्ञान की खोज में,सत्य की खोज में, लोक के साथ सातत्य और संवाद के लिए। राम हों, कृष्ण हों, शिव हों, बुद्ध हों, महावीर हों- सब राजपुत्र हैं, संप्रुभ हैं और सब राज के साथ समाज को भी साधते हैं और अपनी सार्थकता साबित करते हैं। इसलिए हमारी राष्ट्रीयता की अलग कथा है, उसे पश्चिमी पैमानों से नापना गलत होगा। आज इस वक्त जब भारतीयता की अनाप-शनाप व्याख्या हो रही है, हमें ठहरकर सोचना होगा कि क्या सच में हममें अपने राष्ट्र की थोड़ी भी समझ बची है? 'भारत' को 'इंडिया' की आंखों से देखने से हमें वही दिखाई देगा ,जो सत्य से बहुत दूर होगा। आइए हम भारत की आंखों से ही भारत को देखने का अभ्यास करें।  

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान,(IIMC) नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक हैं)

मंगलवार, 25 जनवरी 2022

बंटवारा रोकें और पाएं आजादी का अमृत

 

हम गुलाम थे तो एक थे, आजाद होते ही क्यों बंट गए

-प्रो.संजय द्विवेदी


 

  भारत की त्रासदी है कि बंटवारे की राजनीति आज भी यहां फल-फूल रही है। आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए भी हम इस रोग से मुक्त नहीं हो पाए हैं। यह सोचना कितना व्यथित करता है कि जब हम गुलाम थे तो एक थे, आजाद होते ही बंट गए। यह बंटवारा सिर्फ भूगोल का नहीं था, मनों का भी था। इसकी कड़वी यादें आज भी तमाम लोगों के जेहन में ताजा हैं। आजादी का अमृत महोत्सव वह अवसर है कि हम दिलों को जोड़ने, मनों को जोड़ने का काम करें। साथ ही विभाजन करने वाली मानसिकता को जड़ से उखाड़ फेंकें और राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ आगे बढ़ें। भारत चौदहवीं सदी के ही पुर्तगाली आक्रमण के बाद से ही लगातार आक्रमणों का शिकार रहा है। 16वीं सदी में डच और फिर फ्रेंच, अंग्रेज, ईस्ट इंडिया कंपनी इसे पददलित करते रहे। इस लंबे कालखंड में भारत ने अपने तरीके से इसका प्रतिवाद किया। स्थान-स्थान पर संघर्ष चलते रहे। ये संघर्ष राष्ट्रव्यापी, समाजव्यापी और सर्वव्यापी भी थे। इस समय में आपदाओं, अकाल से भी लोग मरते रहे। गोरों का यह  वर्चस्व तोड़ने के लिए हमारे राष्ट्र नायकों ने संकल्प के साथ संघर्ष किया और आजादी दिलाई। आजादी का अमृत महोत्सव मनाते समय सवाल उठता है कि क्या हमने अपनी लंबी गुलामी से कोई सबक भी सीखा है?

जड़ों की ओर लौटें-

   आजादी के आंदोलन में हमारे नायकों की भावनाएं क्या थीं? भारत की अवधारणा क्या है? यह जंग हमने किसलिए और किसके विरूद्ध लड़ी थी? क्या यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन का अभियान था? इन सवालों का उत्तर देखें तो हमें पता चलता है कि यह लड़ाई स्वराज की थी, सुराज की थी, स्वदेशी की थी, स्वभाषाओं की थी, स्वावलंबन की थी। यहां स्व बहुत ही खास है। समाज जीवन के हर क्षेत्र, वैचारिकता ही हर सोच पर अपना विचार चले। यह भारत के मन की और उसके सोच की स्थापना की लड़ाई भी थी। महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, वीर सावरकर हमें उन्हीं जड़ों की याद दिलाते हैं।  आज देश को जोड़नेवाली शक्तियों के सामने एक गहरी चुनौती है, वह है देश को बांटने वाले विचारों से मुक्त कराना। भारत की पहचान अलग-अलग तंग दायरों में बांटकर, समाज को कमजोर करने के कुत्सित इरादों को बेनकाब करना। देश के हर मानविंदु पर सवाल उठाकर, नई पहचानें गढ़कर मूर्तिभंजन का काम किया जा रहा है। नए विमर्शों और नई पहचानों के माध्यम से नए संघर्ष भी खड़े किए जा रहे हैं।

न भूलें इस आजादी का मोल-

    खालिस्तान, नगा, मिजो, माओवाद, जनजातीय समाज में अलग-अलग प्रयास, जैसे मूलनिवासी आदि मुद्दे बनाए जा रहे हैं। जेहादी और वामपंथी विचारों के बुद्धिजीवी भी इस अभियान में आगे दिखते हैं। भारतीय जीवन शैली, आयुर्वेद, योग, भारतीय भाषाएं, भारत के मानबिंदु, भारत के गौरव पुरूष, प्रेरणापुंज सब इनके निशाने पर हैं। राष्ट्रीय मुख्यधारा में सभी समाजों, अस्मिताओं का एकत्रीकरण और विकास के बजाए तोड़ने के अभियान तेज हैं। इस षडयंत्र में अब देशविरोधी विचारों की आपसी नेटवर्किंग भी साफ दिखने लगी है। संस्थाओं को कमजोर करना, अनास्था, अविश्वास और अराजकता पैदा करने के प्रयास भी इन गतिविधियों में दिख रहे हैं। 1857 से 1947 तक के लंबे कालखंड में लगातार लड़ते हुए। आम जन की शक्ति भरोसा करते हुए। हमने यह आजादी पाई है। इस आजादी का मोल इसलिए हमें हमेशा स्मरण रखना चाहिए।

भारतीयता हमारी पहचान-

      दुनिया के सामने लेनिन, स्टालिन,माओ के राज के उदाहरण सामने हैं। मानवता का खून बहाने के अलावा इन सबने क्या किया। इनके कर्म आज समूचे विश्व के सामने हैं। यही मानवता विरोधी और लोकतंत्र विरोधी विचार आज भारत को बांटने का स्वप्न देख रहे हैं। आजादी अमृत महोत्सव और गणतंत्र दिवस का संकल्प यही हो कि हम लोगों में भारतभाव, भारतप्रेम, भारतबोध जगाएं। भारत और भारतीयता हमारी सबसे बड़ी और एक मात्र पहचान है, इसे स्वीकार करें। कोई किताब, कोई पंथ इस भारत प्रेम से बड़ा नहीं है। हम भारत के बनें और भारत को बनाएं। भारत को जानें और भारत को मानें। इसी संकल्प में हमारी मुक्ति है। हमारे सवालों के समाधान हैं। छोटी-छोटी अस्मिताओं और भावनाओं के नाम पर लड़ते हुए हम कभी एक महान देश नहीं बन सकते। इजराइल, जापान से तुलना करते समय हम उनकी जनसंख्या नहीं, देश के प्रति उन देशों के नागरिकों के भाव पर जाएं। यही हमारे संकटों का समाधान है।

गणतंत्र दिवस को संकल्पों का दिन बनाएं-

   समाज को तोड़ने उसकी सामूहिकता को खत्म करने के प्रयासों से अलग हटकर हमें अपने देश को जोड़ने के सूत्रों पर काम करना है। जुड़कर ही हम एक और मजबूत रह सकते हैं। समाज में देश तोड़ने वालों की एकता साफ दिखती है, बंटवारा चाहने वाले अपने काम पर लगे हैं। इसलिए हमें ज्यादा काम करना होगा। पूरी सकारात्मकता के साथ, सबको साथ लेते हुए, सबकी भावनाओं का मान रखते हुए। यह बताने वाले बहुत हैं कि हम अलग क्यों हैं। हमें यह बताने वाले लोग चाहिए कि हम एक क्यों हैं, हमें एक क्यों रहना चाहिए। इसके लिए वासुदेव शरण अग्रवाल, धर्मपाल, रामधारी सिंह दिनकर,मैथिलीशरण गुप्त, जयशकंर प्रसाद, विद्यानिवास मिश्र, निर्मल वर्मा, रामविलास शर्मा जैसे अनेक लेखक हमें रास्ता दिखा सकते हैं। देश में भारतबोध का जागरण इसका एकमात्र मंत्र है। गणतंत्र दिवस को हम अपने संकल्पों का दिन बनाएं, एक भारत-श्रेष्ठ भारत और आत्मनिर्भर भारत का संकल्प लेकर आगे बढ़ें तो यही बात भारत मां के माथे पर सौभाग्य का तिलक बन जाएगी। हमारी आजादी के आंदोलन के महानायकों के स्वप्न पूरे होंगें, इसमें संदेह नहीं।

बुधवार, 12 मई 2021

रचना, सृजन और संघर्ष से बनी थी पटैरया की शख्सियत

                                                                   -प्रो. संजय द्विवेदी

   वे ही थे जो खिलखिलाकर मुक्त हंसी हंस सकते थे, खुद पर भी, दूसरों पर भी। भोपाल में उनका होना एक भरोसे और आश्वासन का होना था। ठेठ बुंदेलखंडी अंदाज उनसे कभी बिसराया नहीं गया। वे अपनी हनक, आवाज की ठसक, भरपूर दोस्ताने अंदाज और प्रेम को बांटकर राजपुत्रों के शहर भोपाल में भी एक नई दुनिया बना चुके थे, जो उनके चाहने वालों से भरी थी। 12 मई,2021 की सुबह जब वरिष्ठ पत्रकार श्री शिवअनुराग पटैरया ने अपनी कर्मभूमि रहे इंदौर शहर में आखिरी सांसें लीं तो भोपाल बहुत रीता-रीता हो गया। मेरे जैसे लोग जो छात्र जीवन से उनके संरक्षण और अभिभावकत्व में ही इस शहर और यहां की पत्रकारिता को थोड़ा-बहुत जान पाए, उन सबके लिए उनका न होना एक ऐसा शून्य रच रहा है, जिसे भर पाना कठिन है। 1958 में मप्र के छतरपुर जिले में जन्में श्री पटैरया की समूची जीवन यात्रा रचना, सृजन और संघर्ष का उदाहरण है।

   भोपाल की पत्रकारिता अनेक दिग्गज नामों से भरी पड़ी है। लेकिन शिवअनुराग पटैरया ही ऐसे थे जिनके पास कोई भी मुक्त होकर जा सकता। वे किसी को उसके पद और उपयोगिता के आधार पर नहीं आंकते थे। तमाम नौजवानों को उन्होंने जैसा स्नेह,संरक्षण और अपनापन दिया, वह महानगरों में दुर्लभ ही है। वे धुन के धनी थे। छतरपुर जैसी छोटी जगह से आकर जिस आत्मविश्वास से उन्होंने इंदौर, भोपाल और मुंबई में झंडे गाड़े वह साधारण नहीं था। एक आंचलिक पत्रकार से संपादक का शिखर पाना सबके बूते की बात नहीं होती। किंतु वे बने और बाद में उन्होंने खुद को एक लेखक और शोधकर्ता के रूप में भी साबित किया।

लेखन से बनाई खास जगहः

  उनमें कुछ नया करने की बेचैनियां मैंने हमेशा महसूस की। वे नक्सलवाद पर किताब लिखने के बाद, अचानक युद्ध संवाददाता के प्रशिक्षण के लिए चले जाते हैं। फिर युद्ध की रिपोर्टिंग पर किताब लिखने लगते हैं। उससे मुक्त होकर वे  मध्यप्रदेश संदर्भ जैसी भारी भरकम और परिश्रम से भरी किताब के लिए संदर्भ जुटाने लगते हैं। अलग राज्य बना तो छत्तीसगढ़ का भी संदर्भ ग्रंथ रचते हैं। वे अचानक पानी के मुद्दे पर काम करना प्रारंभ करते हैं और मप्र की जल निधियां, मप्र की गौरवशाली जल परंपरा जैसी दो पुस्तकें लिखते हैं। सही मायने में उनकी यही रचनाशीलता और सतत सक्रियता उनकी शक्ति थी। वे लिखकर ही मुक्त हो सकते थे। अपनी पत्रकारीय व्यस्तताओं के बाद भी वे 25 से अधिक किताबें हमें सौंपकर जा चुके हैं। जिनमें ज्यादातर संदर्भ ग्रंथ की तरह हैं। इसके अलावा उन्होंने प्रख्यात पत्रकार राजेंद्र माथुर पर मोनोग्राफ भी लिखा। उन्हें राजेंद्र माथुर सम्मान,मेदिनी पुरस्कार,डा.शंकरदयाल शर्मा अवार्ड जैसे सम्मानों से अलंकृत किया गया था। श्री पटैरया न सिर्फ पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में बल्कि मध्यप्रदेश के सार्वजनिक जीवन में भी सार्थक हस्तक्षेप रखते थे। उनके मार्गदर्शन में पत्रकारों की एक लंबी पूरी पीढ़ी तैयार हुई। पत्रकारिता शिक्षण-प्रशिक्षण में उनकी गहरी रूचि थी। इसलिए वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में अकादमिक कार्यों में सहयोग हेतु हमेशा तत्पर रहते। सप्रे संग्रहालय की गतिविधियों में भी उनकी सक्रियता दिखती थी।

आत्मीय पिता, पति और दोस्तः

  पटैरया जी सबसे खास बात यह थी वे बहुत सार्वजनिक व्यक्ति होने के साथ-साथ बेहद पारिवारिक व्यक्ति  भी थे। वे बहुत मीठा बोलते थे, परिवार में भी सब ऐसा ही करते थे। उनकी पत्रकारिता में, टीवी डिबेट में उनका खरा-खरा बोलना निजी जिंदगी में नहीं दिखता। उनका कोई विरोधी नहीं था। वे सबके प्रति आत्मीय भाव रखते और मधुरता से मिलते। घर में पहुंचने पर उनका आतिथ्य आपको द्रविद कर देता। मैंने अपनी आंखों से देखा है, वे अपने बेटी और बेटे को कितना समय देते और कितना स्नेह करते। भाभी के प्रति सम्मान और प्रेम देखते ही बनता। अपनी खूब व्यस्तताएं भी उन्हें परिवार की जरूरतों से अलग नहीं कर पातीं। अपने घर के बुजुर्गों, भाई और उसका परिवार। सारा कुछ उनकी जिंदगी था। दोस्तों के साथ भी उनका यही व्यवहार था। वे आपकी जरूरत पर आपके साथ होते। रिश्तों को जीना और उन्हें निभाना वे रोज अपने आचरण से सिखाते थे।

    मैं पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद लगभग चौदह साल रायपुर, बिलासपुर और मुंबई में पत्रकारिता करता रहा। 2009 में भोपाल लौटा तो भी उनका वही व्यवहार, प्रेम और सहजता कायम थी। इस बीच वे कई अखबारों के संपादक रह चुके थे। भोपाल के सार्वजनिक जीवन में उनकी एक बड़ी जगह थी। किंतु उनका दोस्ताना व्यवहार और दिल जीत लेने की कोशिशें कम नहीं होतीं थीं। 2009 से लगातार मेरे जन्मदिन पर वे बुके और मिठाई लेकर आते जरूर। एक बार वे घर आ गए और मैं हबीबगंज स्टेशन पर लोकगायक पद्मश्री से अलंकृत श्री भारती बंधु को लेने स्टेशन गया था।दूसरा व्यक्ति होता तो चीजें घर छोड़कर जाता, किंतु वे ऐसा कैसे कर सकते थे। वे हबीबगंज स्टेशन पर बुके के साथ खड़े थे। साथ गए हमारे विद्यार्थियों को भी बहुत आश्चर्य हुआ कि पटैरया जी रिश्तों को कैसे निभाते थे। मैं भोपाल में शहर के आखिरी छोर सलैया में रहता हूं। एक बार वे हमारे घर एक पूजा में आ रहे थे। रात को रास्ता खोजते भटक गए, फिर भी देर रात आए। हमें खुशी हुई। मेरी पत्नी भूमिका और बिटिया को अपना आशीर्वाद दिया और कहा भूमिका जी इस शहर ने संजय को संजयजी होते हुए देखा है। इसकी मुझे बहुत खुशी है। वे आत्मीयता से सराबोर थे। रास्ता भटकने की थकान गायब थी। कहा महाराज अब कुछ खिला भी दो, जंगल में तो बस ही गए हो।

सत्ता से आलोचनात्मक विमर्श का रिश्ताः

 मैंने देखा राजपुत्रों से पटैरया जी की बहुत बनती है। कांग्रेस- भाजपा दोनों दलों के शीर्ष नेताओं से उनका याराना था। उनके पास खबरें बहुत होती थीं। एक तरह से वे मध्यप्रदेश की राजनीति का बेहद समृध्द संदर्भ थे। उनकी जिंदगी और पत्रकारिता इन्हीं जीवंत रिश्तों से बनी और बुनी गई थी। किंतु रिश्तों को उन्होंने कभी बाजार में इस्तेमाल नहीं किया। इन दिनों टीवी डिबेट्स का वे जरूरी चेहरा बन गया थे, किंतु उनकी आवाज सच बोलते हुए न तो कभी कांपती थी, न ही उस वक्त वे किसी तरह का दोस्ताना निभाते थे। सच को, उसके सही संदर्भों के साथ व्यक्त करना उनकी शक्ति थी। इसे वे जानते थे। लेखन में भी उनका यह संतुलन कायम था। अपनी पत्रकारिता में राजेंद्र माथुर, अच्युतानंद मिश्र के प्रभाव को वे गहरे महसूस करते थे। उनकी समूची पत्रकारिता इसी सत्यान्वेषण से बनी थी। दिल्ली से लौटकर जब भोपाल जाऊंगा, मेरी सुबहें और शामें पटैरया जी के बिना कैसी बेरौनक होंगीं, सोचकर दिल कांप जाता है। मेरे अभिभावक और आत्मीय बड़े भाई को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि।

बुधवार, 5 मई 2021

कोरोना संकट से जूझने एकजुटता की जरूरत

                           दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय संकट में समाज को दीजिए संबल

-प्रो. संजय द्विवेदी

   कोरोना संकट ने देश के दिल को जिस तरह से छलनी किया है, वे जख्म आसानी से नहीं भरेंगें। मन में कई बार भय, अवसाद, आसपास होती दुखद घटनाओं से, समाचारों से, नकारात्मक विचार आते हैं। अपनों को खो चुके लोगों को कोई आश्वासन काम नहीं आता। उनके दुखों की सिर्फ कल्पना की जा सकती है। ऐसे में चिंता होती है, लगता है सब खत्म हो जाएगा। कुछ नहीं हो सकता। डाक्टर और मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं भय, नकारात्मक विचारों से इम्यूनिटी कमजोर होती है। यही सब कारण हैं कि अब पाजीटिव हीलिंग की बात प्रारंभ हुई है। जो हो रहा है दर्दनाक, भयानक है, किंतु हमारी मेडिकल सेवाओं के लोग, सुरक्षा के लोग, सेना, सफाई कर्मचारी, मीडिया के लोग, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता इन्हीं संकटों में सब करते ही हैं। हमें भी फोन, सोशल मीडिया आदि माध्यमों से भय का विस्तार कम करना चाहिए। कठिन समय में सबको संभालने और संबल देने की जरूरत है। आपदाओं में सामाजिक सहकार बहुत जरूरी है। इसी से यह बुरा वक्त जाएगा।

   कोरोना के बहाने जहां एक ओर हिंदुस्तान के कुछ लोगों की लुटेरी मानसिकता सामने आई है, जो आपदा को अवसर मानकर जीवन उपयोगी चीजों से लेकर, दवाओं, आक्सीजन और हर चीज की कालाबाजारी में लग गए हैं। तो दूसरी ओर ऐसे भी उदाहरण हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती, सिख समाज, मुस्लिम समाज के अलावा अनेक सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक संगठनों ने खुद को सेवा के काम में झोंक दिया है। विश्वविद्यालयों के छात्रों, मेडिकल छात्रों की पहलकदमियों के अनेक समाचार सामने हैं। मुंबई के एक नौजवान अपनी दो महंगी कारें बेच देते हैं तो नागपुर के एक वयोवृध्द नागरिक एक नौजवान के लिए अपना अस्पताल बेड छोड़ देते हैं और तीन दिन बाद उनकी मृत्यु हो जाती है। इन्हीं कर्मवीरों में सोनू सूद जैसे अभिनेता हैं जो लगातार लोगों की मदद में लगे हैं। लोग अपने निजी कमाई से सिलेंडर बांट रहे हैं, खाना और दवाईयां पहुंचा रहे हैं। सेवा कर रहे हैं। यही असली भारत है। इसे पहचानने की जरूरत है। सही मायने में कोरोना संकट ने भारतीयों के दर्द सहने और उससे उबरने की शक्ति का भी परिचय कराया है। यह संकट जितना गहरा है, उससे जूझने का माद्दा उतना ही बढ़ता जा रहा है।

    अकेले स्वास्थ्य सेवाओं और पुलिस के त्याग की कल्पना कीजिए तो कितनी कहानियां मिलेंगी। दिनों और घंटों की परवाह किया बिना अहर्निश सेवा और कर्तव्य करते हुए कोविड पाजीटिव होकर अनेक की मृत्यु। ये घटनाएं बताती हैं कि लूटपाट गिरोह के अलावा ऐसे हिंदुस्तानी भी हैं जो सेवा करते हुए प्राण भी दे रहे हैं। अब सिर्फ सीमा पर बलिदान नहीं हो रहे हैं। पुलिस, चिकित्सा सेवाओं, सफाई सेवाओं, मीडिया के लोग भी अपने प्राणों की आहुति दे रहे हैं। राजनीति की तरफ देखने की हमारी दृष्टि थोड़ी अनुदार है, किंतु यह काम ऐसा है कि आप लोगों से दूर नहीं रह सकते। उप्र में अभी तीन विधायकों की मृत्यु हुई। उसके पूर्व कोरोना दौर में दो मंत्रियों की मृत्यु हुई, जिसमें प्रख्यात क्रिकेटर चेतन चौहान जी का नाम भी शामिल था। अनेक मुख्यमंत्री कोरोना पाजिटिव हुए। अनेक केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक इस संकट से जूझ रहे हैं। मानव संसाधन मंत्री श्री रमेश पोखरियाल निशंक और सूचना प्रसारण मंत्री श्री प्रकाश जावडेकर अभी भी कोरोना से संघर्ष कर रहे हैं। कुल मिलाकर यह एक ऐसी जंग है, जो सबको साथ मिलकर लड़नी है। सही मायने में यह महामारी है। यह अमीर-गरीब, बड़े-छोटे में भेद नहीं करती। इसे जागरूकता, संयम, सावधानी, धैर्य और सामाजिक सहयोग से ही हराया जा सकता है।

    ऐसे कठिन समय में आरोप-प्रत्यारोप,सरकारों के कोसने के अलावा हमें कुछ नागरिक धर्म भी निभाने होंगें। मदद का हाथ बढ़ाना होगा। इस असामान्य परिस्थिति के शिकार लोगों के साथ खड़े होना होगा। न्यूनतम अनुशासन का पालन करना होगा। सही मायने में यह युद्ध जैसी स्थिति है, अंतर यह है कि यह युद्ध सिर्फ सेना के भरोसे नहीं जीता जाएगा। हम सबको मिलकर यह मोर्चा जीतना है। केंद्र और राज्य की सरकारें अपने संसाधनों के साथ मैदान में हैं। हम उनकी कार्यशैली पर सवाल उठा सकते हैं। किंतु हमें यह भी देखना होगा कि छोटे शहरों को छोड़ दें, जहां स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं। हमारे दो सबसे बड़े शहर दिल्ली और मुंबई भी इस आपदा में घुटने टेक चुके हैं। जबकि हम चाहकर भी दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों जितनी सुविधाएं भोपाल, नागपुर, रांची, लखनऊ,हैदराबाद, चेन्नई, गुवाहाटी, चंड़ीगड़ और पटना में  नहीं जुटा सकते। हम समस्या पर गर्जन-तर्जन तो बहुत करते हैं, किंतु उसके मूल कारणों पर ध्यान नहीं देते। हमारे संकटों का मूल कारण है हमारी विशाल जनसंख्या, गरीबी, अशिक्षा और देश का आकार। कुछ विद्वान इजराइल और इंग्लैंड माडल अपनाने की सलाह दे रहे हैं। 

   इजराइल की 90 लाख की आबादी, इंग्लैंड 5 करोड़,60 लाख की आबादी में वैक्सीनेशन कर वे अपनी पीठ ठोंक सकते हैं किंतु हिंदुस्तान में 13 करोड़ वैक्सीनेशन के बाद भी हम अपने को कोसते हैं। जबकि वैक्सीनिशेन को लेकर समाज में भी प्रारंभ में उत्साह नहीं था। तो कुछ राजनीतिक दलों के नेता जो खुद तो वैक्सीन ले चुके थे, लेकिन जनता को भ्रम में डाल रहे थे। 139 करोड़ के देश में कुछ भी आसान नहीं है। किंतु जनसंख्या के सवाल पर बात करना इस देश में खतरनाक है,जबकि वह इस देश का सबसे बड़ा संकट है। हम कितनी भी व्यवस्थाएं  खड़ी कर  लें। वह इस देश में नाकाफी ही होंगीं। सरकार कोरोना संकट में 80 करोड़ लोगों के मुफ्त राशन दे रही है। जो किसी भी लोककल्याणकारी राज्य का कर्तव्य है।  लेकिन 80 करोड़ की संख्या क्या आपको डराती नहीं? मुफ्तखोरी, बेईमानी और नीचे तक फैले भ्रष्टाचार ने हमारे राष्ट्रीय चरित्र को नष्ट कर दिया है। आदर्श बचे नहीं हैं। ऐसे में जल्दी और ज्यादा पाने, सरकारी धन को निजी धन में बदलने की होड़ ने सारा कुछ बिखरा दिया है। देश के किसी भी संकट पर न तो देश के राजनीतिक दल, ना ही बुद्धिजीवी एक मत हैं। एक व्यक्ति से लड़ते हुए वे कब देश और उसकी आवश्यक्ताओं के विरूद्ध हो जाते हैं कि कहा नहीं जा सकता।

   कोरोना महामारी ने एक बार हमें अवसर दिया है कि हम अपने वास्ताविक संकटों को पहचानें और उसके स्थाई हल खोजें। राष्ट्रीय सवालों पर एकजुट हों। दलीय राजनीति से परे राष्ट्रीय राजनीति को प्रश्रय दें। कोरोना के विरूद्ध जंग प्रारंभ हो गयी है। समूचा समाज एकजुट होकर इस संकट से जूझ रहा। समाज के दानवीरता और दिनायतदारी की कहानियां लोकचर्चा में हैं। ये बात बताती है भारत तमाम समस्याओं के बाद भी अपने संकटों से दो-दो हाथ करना जानता है। किंतु सवाल यह है कि उसके मूल संकटों पर बात कौन करेगा?

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं।)  

मंगलवार, 4 मई 2021

सांसों को साधिए मिलेगी वायरस से लड़ने की शक्ति

 

मेरे अनुभवःकोरोना से यूं जीती जंग

-प्रो. संजय द्विवेदी



   ये सच में बहुत कठिन दिन हैं। डरावने, भय और आशंकाओं से भरे हुए। मीडिया में आती खबरें दहशत जगा रही थीं। कई मित्रों,शुभचिंतकों और जानने वालों की मौत की खबरें सुनकर आंखें भर आती थीं। लगता था यह सिलसिला कब रूकेगा? बुखार आया तो लगा कि हमारे भी बुरे दिन आ गए हैं। रात में सोना कठिन था। फिल्में देखने और पढ़ने-लिखने में भी मन नहीं लग रहा था। बुखार तो था ही, तेज खांसी ने बेहाल कर रखा था। एक रोटी भी खा पाना कठिन था। मुंह बेस्वाद था। कोरोना का नाम ही आतंकित कर रहा था। मन कहता था मौसमी बुखार ही है, ठीक हो जाएगा। बुद्धि कहती थी अरे भाई कोरोना है, मौसमी बुखार नहीं है। अजीब से हालात थे। कुछ अच्छा सोचना भी कठिन था।

   मुझे और मेरी पत्नी श्रीमती भूमिका को एक ही दिन बुखार आया। बुखार के साथ खांसी भी तेज थी। जो समय के साथ तेज होती गई। टेस्ट पाजिटिव आने के बाद मैंने तत्काल गंगाराम अस्पताल, दिल्ली के डाक्टर अतुल गोगिया से आनलाईन परामर्श लिया। उनकी सुझाई दवाएं प्रारंभ कीं। इसके साथ ही होम्योपैथ और आर्युवेद ही भी दवाएं लीं। हम लगभग 20 दिन बहुत कष्ट में रहे। साढ़े छः साल की बेटी शुभ्रा की ओर देखते तो आंखें पनीली हो जातीं। कुछ आशंकाएं और उसका अकेलापन रूला देता। करते क्या, उसे अलग ही रहना था। मैं और मेरी पत्नी भूमिका एक कक्ष में आइसोलेट हो गए। वह बहुत समझाने पर रोते हुए उसी कमरे के सामने एक खाट पर सोने के लिए राजी हो गयी। किंतु रात में बहुत रोती, मुश्किल से सोती। दिन में तो कुछ सहयोगी उसे देखते, रात का अकेलापन उसके और हमारे लिए कठिन था। एक बच्चा जो कभी मां-पिता के बिना नहीं सोया, उसके यह कठिन था। धीरे-धीरे उसे चीजें समझ में आ रही थीं। हमने भी मन को समझाया और उससे दूरी बनाकर रखी।

लीजिए लिक्विड डाइटः

   दिन के प्रारंभ में गरम पानी के साथ नींबू और शहद, फिर ग्रीन टी, गिलोय का काढ़ा और हल्दी गरम पानी। हमेशा गर्म पानी पीकर रहे। दिन में नारियल पानी, संतरा या मौसमी का जूस आदि लेते रहे। आरंभ के तीन दिन लिक्विड डाइट पर ही रहे। इससे हालात कुछ संभले। शरीर खुद बताता है, अपनी कहानी। लगा कुछ ठीक हो रहा है। फिर खानपान पर ध्यान देना प्रारंभ किया। सुबह तरल पदार्थ लेने के बाद फलों का नाश्ता जिसमें संतरा,पपीता, अंगूर,किवी आदि शामिल करते थे। हालात सुधरे तो किताबें उठाईं और पढ़ना प्रारंभ किया। सबसे पहले शरद पवार की जीवनी पढ़ी अपनी शर्तों पर, फिर देवराहा बाबा की जीवनी पढ़ी जिसे श्री ललन प्रसाद सिन्हा ने बहुत श्रध्दाभाव से लिखा है। इसके साथ ही यशस्वी भारत( परमपूज्य मोहन भागवत), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ( श्री सुनील आंबेकर) की किताबें पढ़ गया। इस बीच राजनीतिक फिल्में देखने का मन भी बना। व्यस्त दिनचर्चा के कारण बहुत सारी फिल्में देख नहीं सका उन्हें देखा। जिनमें रामगोपाल वर्मा की रक्तचरित्र -1 और 2, ताशकंद फाइल्स(विवेक अग्रिहोत्री), जेड प्लस( चंद्रप्रकाश द्विवेदी) के अलावा धर्म, एक्सिटेंडेंल प्राइम मिनिस्टर, इंदु सरकार भी देखी। इससे बाहर की बुरी खबरों से बचने में मदद मिली।

 खुद न करें इलाजः

   खान-पान, संयम और धीरज दरअसल एक पूंजी है। किंतु यह तब काम आती हैं, जब आपका खुद पर नियंत्रण हो। मेरी पहली सलाह यही है कि बीमारी को छिपाना एक आत्मछल है। खुद के साथ धोखा है। अतिरिक्त आत्मविश्वास हमें  कहीं का नहीं छोड़ता। इसलिए तुरंत डाक्टर की शरण में जाना आवश्यक है। होम आइसोलेशन का मतलब सेल्फ ट्रीटमेंट नहीं है। यह समझन है। प्रकृति के साथ, आध्यात्मिक विचारों के साथ, सकारात्मकता के साथ जीना जरूरी है। योग- प्राणायाम की शरण हमें लड़ने लायक बनाती है। हम अपनी सांसों को साधकर ही अच्छा, लंबा निरोगी जीवन जी सकते हैं।

    इन कठिन दिनों के संदेश बहुत खास हैं। हमें अपनी भारतीय जीवन पद्धति, योग, प्राणायाम, प्रकृति से संवाद को अपनाने की जरूरत है। संयम और अनुशासन से हम हर जंग जीत सकते हैं। भारतीय अध्यात्म से प्रभावित जीवन शैली ही सुखद भविष्य दे सकती है। अपनी जड़ों से उखड़ने के परिणाम अच्छे नहीं होते। हम अगर अपनी जमीन पर खड़े रहेंगें तो कोई भी वायरस हमें प्रभावित तो कर सकता है, पराजित नहीं। यह चौतरफा पसरा हुआ दुख जाएगा जरूर, किंतु वह जो बताकर जा रहा है, उसके संकेत को समझेंगें तो जिंदगी फिर से मुस्कराएगी।

मेरे सबकः

1.    होम आईसोलेशन में रहें किंतु सेल्फ ट्रीटमेंट न लें। लक्षण दिखते ही तुरंत डाक्टर से परामर्श लें।

2.    पौष्टिक आहार, खासकर खट्टे फलों का सेवन करें। संतरा, अंगूर, मौसम्मी, नारियल पानी, किन्नू आदि।

3.    नींबू,आंवला, अदरक,हल्दी, दालचीनी, सोंठ को अपने नियमित आहार में शामिल करें।

4.    नकारात्मकता और भय से दूर रहें। जिस काम में मन लगे वह काम करें। जैसे बागवानी, फिल्में देखना, अच्छी पुस्तकें पढ़ना।

5.    यह भरोसा जगाएं कि आप ठीक हो रहे हैं। सांसों से जुड़े अभ्यास, प्राणायाम, कपाल भाति, भस्त्रिका, अनुलोम विलोम 15 से 30 मिनट तक अवश्य करें।

6.    दो समय पांच मिनट भाप अवश्य लें। हल्दी-गुनगुने पानी से दो बार गरारा भी करें।

7.    दवा के साथ अन्य सावधानियां भी जरूरी हैं। उनका पालन अवश्य करें। शरीर को अधिकतम आराम दें। ज्यादा से ज्यादा नींद लें। क्योंकि इसमें कमजोरी बहुत आती है और शरीर को आराम की जरूरत होती है।

8.    अगर सुविधा है तो बालकनी या लान में सुबह की गुनगुनी धूप जरूर लें। साथ ही सप्ताह में एक बार डाक्टर की सलाह से विटामिन डी की गोलियां भी लें। साथ ही विटामिन सी और जिंक की टेबलेट भी ले सकते हैं।

 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

आशा-निराशा के झूलों में झूलता रहा पूरा साल



जा रहे साल-2019 के नाम



-प्रो. संजय द्विवेदी
     किसी भी जाते हुए साल, बीते हुए समय को लोग याद कहां करते हैं। कई बार बीते दिन सुखद ही लगते हैं। फिर भी यह दिन नहीं है, साल है। वह भी 2019 जैसा। जिसने भारत की राजनीति, समाज, संस्कृति और उसके बौद्धिक विमर्शों को पूरा का पूरा बदल दिया है। जाते हुए साल ने नागरिकता संशोधन कानून(सीएए) के नाम पर सड़कों पर जो आक्रोश देखा है,यह संकेत है कि आने वाले दिन भी बहुत आसान नहीं हैं। कड़वाहटों, नफरतों और संवादहीनता से हमारी राजनीतिक जमातों ने जैसा भारत बनाया है, वह आश्वस्त नहीं करता। डराता है। राष्ट्र की समूची राजनीति के सामने आज यह प्रश्न है वह इस देश को कैसा बनाना चाहती है। यह देश एक साथ रहेगा, एकात्म विचार करेगा या खंड-खंड चिंतन करता हुआ,वर्षों से चली आ रही सुविधाजनक राजनीति का अनुगामी बनेगा। वह सवालों से टकराकर उनके ठोस और वाजिब हल तलाशेगा या शुतुरर्मुग की तरह बालू में सिर डालकर अपने सुरक्षित होने की आभासी प्रसन्नता में मस्त रहेगा।
पुलवामा हमले से हिला देशः
     साल के आरंभिक दिनों में हुए पुलवामा हमले ने जहां हमारी आंतरिक सुरक्षा पर गहरे सवाल खड़े किए, वहीं साल के आखिरी दिनों में मची हिंसा बताती है कि हमारा सभ्य होना अभी शेष है। लोकतांत्रिक प्रतिरोध का माद्दा अर्जित करने और गांधीवादी शैली को जीवन में उतारने के लिए अभी और जतन करने होगें। हम आजाद तो हुए हैं पर देशवासियों में अभी नागरिक चेतना विकसित करने में विफल रहे हैं। यह साधारण नहीं है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और अपने ही लोगों को ही प्रताड़ित करने में हमारे हाथ नहीं कांप रहे हैं। पुलवामा में 40 सैनिकों की शहादत देने के बाद भी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर हमारी नागरिक चेतना में कोई चैतन्य नहीं है।राजनीतिक लाभ के लिए भारतीय संसद में बनाए गए कानूनों को रोकने की हमारी कोशिशें बताती हैं कि विवेकसम्मत और विचारवान नागरिक अभी हमारे समाज में अल्पमत में हैं। यह ठीक है कि सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे अपने नागरिकों में विश्वास की बहाली करें और उनसे संवाद करें। किंतु यहां यह भी देखना होगा कि विरोध के लिए उतरे लोग क्या इतने मासूम हैं और संवाद के लिए तैयार हैं? अथवा वे ललकारों और हुंकारों के बीच ही अपने राजनीतिक पुर्नजीवन की आस लगाए बैठे हैं। ऐसे समय में हमारे राजनीतिक नेतृत्व से जिस नैतिकता और समझदारी की उम्मीद की जाती है, क्या वह उसके लिए तैयार भी हैं?
मोदी हैं सबसे बड़ी खबरः
      इस साल की सबसे बड़ी खबर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही हिस्से रही। लगातार दूसरी बार एक गैरकांग्रेसी सरकार का सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ आना भारतीय राजनीतिक इतिहास की एक बड़ी घटना है। मोदी का जादू फिर सिर चढ़कर बोला और भाजपा 303 सीटें जीतकर सत्ता में वापस आई। 2014 में भाजपा को 282 सीटें मिली थीं।  इसी के साथ मोदी ऐसे प्रधानमंत्री भी बन गए जिन्होंने पं. जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के बाद तीसरे ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने, दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस साल अपना पद छोड़ दिया और काफी मान-मनौव्वल के बाद भी नहीं माने। अंततः श्रीमती सोनिया गांधी को यह पद स्वीकार करना पड़ा।
       साल के आखिरी महीने की कड़वाहटों को छोड़ दें तो जाता हुआ साल 2019 कई मामलों में बहुत उम्मीदें जगाने वाला साल भी है। कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति और राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला दो ऐसी बातें हैं जो इस साल के नाम लिखी जा चुकी हैं। इस मायने में यह साल हमेशा के लिए इतिहास के खास लम्हों में दर्ज हो गया है। भारतीय राजनीति में चीजों को टालने का एक लंबा अभ्यास रहा है। समस्याओं से टकराने और दो-दो हाथ करने और हल निकालने के बजाए, हमारा सोच संकटों से मुंह फेरने का रहा है। श्रीमती इंदिरा गांधी के बाद अरसे से एक ऐसे नायक का इंतजार होता रहा, जो निर्णायक पहल कर सके और फैसले ले सके। धारा 370 सही मायने में केंद्र सरकार का एक अप्रतिम दुस्साहस ही कहा जाएगा। किंतु हमने देखा कि इसे देश ने स्वीकारा और कांग्रेस पार्टी सहित अनेक राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस फैसले की सराहना की।
मंदिर पर सुप्रीम फैसलाः
    राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम फैसला भी इसी कड़ी में एक बहुत महत्वपूर्ण तारीख है। जिसने सदियों से चले आ रहे भूमि विवाद का निपटारा करके भारतीय इतिहास के सबसे खास मुकदमे का पटाक्षेप किया। तीन तलाक का मुद्दा एक ऐसा ही विषय था जिसने भारतीय मुस्लिम स्त्रियों की जिंदगी में छाए अंधेरों को काटकर एक नई शुरुआत की। यह एक ऐसा विषय था जिसे आस्था और संविधान की बहस में उलझाया गया। लेकिन मानवीय और संवैधानिक दृष्टि से यह बहुत बड़ा मुद्दा था। हालांकि स्त्री सुरक्षा के लिए यह साल भी बहुत उम्मीदें जगाकर नहीं गया। साल के प्रारंभ में उन्नाव दुष्कर्म कांड से लेकर साल के अंत में हैदराबाद की वेटनरी डाक्टर की निर्मम हत्या और दुराचार की घटनाओं ने बताया कि हमारे समाज में अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। हैदराबाद दुष्कर्म मामले के आरोपियों को पुलिस ने तत्काल मार गिराया किंतु निर्भया मामले के अपराधियों को आज तक फांसी के फंदों पर नहीं लटकाया जा सका। कानून की बेचारगी इस सबके बीच चर्चा का विषय बनी।
सामान्य वर्ग को आरक्षण की राहतः     
    जनवरी महीने में सामान्य वर्ग को दस प्रतिशत आरक्षण देने का बिल संसद ने पास किया। गुजरात इसे लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना। इस कानून ने आरक्षण पर मचे बवाल पर सामान्य वर्गों को राहत देने की भावभूमि बनाई। इस साल के एक महत्वपूर्ण उत्सव के रूप में प्रयागराज में कुंभ को भी याद किया जाएगा। इस कुंभ में 15 करोड़ लोगों ने स्नान किया और दुनिया के 190 देशों को आमंत्रण भेजे गए। कुंभ की व्यवस्थाओं को लेकर उप्र सरकार की काफी सराहना भी हुयी।
        इस साल ने हमें आशा, निराशा, उम्मीदों और सपनों के साथ चलने के सूत्र भी दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार युवाओं पर भारी उम्मीदें जता रहे थे। हम देखें तो भारत का स्टार्टअप तंत्र  जिस तरह से युवा शक्ति के नाते प्रभावी हुआ है, वह हमारी एक बड़ी उम्मीद है। सन 2019 में ही कुल 1300 स्टार्टअप प्रारंभ हुए। कुल 27 कंपनियों के साथ भारत में पहले ही चीन और अमरीका के बाद तीसरे सबसे ज्यादा यूनिकार्न (एक अरब से ज्यादा के स्टार्टअप) मौजूद हैं। भारत की यह प्रतिभा सर्वथा नई और स्वागतयोग्य है। वहीं दूसरी ओर मंदी की खबरों से इस साल बाजार थर्राते रहे। निजी क्षेत्रों में काफी लोगों की नौकरियां  गईं और नए रोजगार सृजन की उम्मीदें भी दम तोड़ती दिखीं। बहुत कम ऐसा होता है महंगाई और मंदी दोनों साथ-साथ कदमताल करें। पर ऐसा हो रहा है और भारतीय इसे झेलने के लिए मजबूर हैं। नीतियों का असंतुलन, सरकारों का अनावश्यक हस्तक्षेप बाजार की स्वाभाविक गति में बाधक हैं। भारत जैसे महादेश में इस साल की दूसरी तिमाही में विकास दर 4.5 फीसद रह गयी थी, अगले छह माह में यह क्या रूप लेगी कहा नहीं जा सकता। इस साल पांच फीसदी की विकास दर भी नामुमकिन लग रही है। सच तो यह है कि मोदी सरकार ने अपने प्रारंभिक दो सालों में जो भी बेहतर प्रदर्शन किया, नोटबंदी और जीएसटी ने बाद के दिनों में उसके कसबल ढीले कर दिए। बिजनेस टुडे के पूर्व संपादक प्रोसेनजीत दत्ता मानते हैं कि-यदि सहस्त्राब्दी का पहला दशक मुक्त बाजार सिद्धांत की अपार संभावनाओं वाला था तो यह दशक बेतरतीब सरकारी हस्तक्षेप वाला रहा। ऐसे में आने वाला साल किस तरह की करवट लेगा इसके सूत्रों को जानने के लिए मार्च,2020 तक नए बजट के बाद की संभावनाओं का इंतजार करना होगा। इसमें दो राय नहीं कि वैश्विक स्तर पर भारत की विदेश नीति में प्रधानमंत्री ने अपनी सक्रियता से एक नर्ई ऊर्जा भरी, किंतु भारत की स्थानीय समस्याओं, लालफीताशाही, शहरों में बढ़ता प्रदूषण, कानून-व्यवस्था के हालात ऐसे ही रहे तो उन संभावनाओं का दोहन मुश्किल होगा।
नवसंकल्पों और नवाचारों का समयः
    उदारीकरण की इस व्यवस्था के बीज इस अकेले साल के माथे नहीं डाले जा सकते। 1991 से लागू इस भूमंडलीकरण और उदारीकरण ने हमारे गांवों, किसानों और सामान्य जनों को बेहद अकेला छोड़ दिया है। किसानों की आत्महत्याएं, उनकी फसल का सही मूल्य, जनजातियों के जीवन और सुरक्षा जैसे सवाल आज नक्कारखाने में तूती की तरह ही हैं। मुख्यधारा की राजनीति के मुद्दे बहुत अलग हैं। उन्हें देश के वास्तविक प्रश्नों पर लाना कठिन ही नहीं असंभव ही है। जाता हुआ साल भी हमारे सामने विकराल जनसंख्या, शरणार्थी समस्या, घुसपैठ, कृषि संकट, महंगाई, बेरोजगारी जैसे तमाम प्रश्न छोड़कर जा रहा है। सन 2020 में इन मुद्दों की समाप्ति हो जाएगी, सोचना बेमानी है। बावजूद इसके हमारे बौद्धिक विमर्श में असंभव प्रश्नों पर भी बातचीत होने लगी है, यह बड़ी बात है। हमें अपने देश के सवालों पर, संकटों पर, बात करनी होगी। भले वे सवाल कितने भी असुविधाजनक क्यों न हों। 2019 का साल जाते-जाते कुछ बड़े मुद्दों का हल देकर जा रहा है। नए साल-2020 का स्वागत करते हुए हमें कुछ नवसंकल्प लेने होंगें, नवाचार करने होंगे और अपने समय के संकटों के हल भी तलाशने होगें। अलविदा- 2019!




गुरुवार, 3 नवंबर 2016

डा. सुशील त्रिवेदीः एक सक्रिय बुद्धिधर्मी

डा. सुशील त्रिवेदीः एक सक्रिय बुद्धिधर्मी
-संजय द्विवेदी


       मेरे जीवन में छत्तीसगढ़ की बहुत सारी स्मृतियां हैं, मैं खुद को उनसे ही बना हुआ महसूस करता हूं। छत्तीसगढ़ की बहुत सारी मोहक स्मृतियों में एक छवि बनती है डा.सुशील त्रिवेदी की। डा. त्रिवेदी का मेरे जीवन में होना एक ऐसी छाया की तरह है, जो पिता की तरह संरक्षण देती है और मां की तरह वात्सल्य और मित्र की तरह उत्साह। वे हर समय साथ होते हैं। जनसंपर्क उनकी विलक्षणता है तो विद्वता और अध्ययनशीलता उनकी पहचान।
      मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों में एक आला अफसर, लेखक और राजनीतिक विश्लेषक से अलग भी उनकी अनेक छवियां हैं, जिसमें वे मीडिया-जनसंपर्क के अध्येता, अनुवादक, संविधान और चुनाव के जानकार, कला समीक्षक, संस्कृतिकर्मी की सक्रिय भूमिकाओं में दिखते हैं। अपने काम के साथ-साथ इतनी विधाओं को एक साथ साध लेना, एक हुनर ही कहा जाएगा। कलेक्टर से लेकर छत्तीसगढ़ के राज्य निर्वाचन आयुक्त जैसे पद उनके जीवन को बड़ा नहीं करते, उन्हें बड़ा करती है उनकी जिजीविषा, सतत सक्रियता और निरंतर लेखन। अपनी सरकारी नौकरियों की व्यस्तता भरे जीवन के बावजूद परंपरा से उन्हें लिखने का संस्कार मिला है। उसमें वे कुछ जोड़ते ही हैं। उनके अवदान को उनकी 24 मौलिक पुस्तकों, 3 संपादित और 7 अनुदित ग्रंथों से समझा जा सकता है। यह साधारण नहीं है कि अवकाश प्राप्ति के बाद वे छत्तीसगढ़ के सवालों पर राष्ट्रीय मीडिया की जरूरत हैं। वे समझ का आईना हैं और चुनावी संदर्भों में उनकी वाणी सत्य पर ही जाकर ठहरती है।
    छत्तीसगढ़ के लंबे पत्रकारीय जीवन में मुझे रायपुर और बिलासपुर जैसे शहरों में रहने और लगभग पूरे छत्तीसगढ़ में जाने और लोगों से संवाद करने का मौका मिला। किंतु अनुभव की आंखें अलग होती हैं। हम जो जमीन पर जाकर देखते और महसूस करते, डा. त्रिवेदी रायपुर में ही महसूस कर रहे होते। नए बने छत्तीसगढ़ के बदलावों और उसकी पहचान से जुड़े सवालों, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक मुद्दों की उनमें गहरी समझ है। उनके पास बैठकर आप रिक्त नहीं आ सकते। उनके हर किस्से में एक संदेश है। रायपुर में जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ नाम से जो पहला सेटलाइट चैनल लांच हुआ, उसी वर्ष विधानसभा और लोकसभा के चुनाव लगभग आगे-पीछे हुए। रायपुर जैसी जगह पर हमें एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी, जो तटस्थ तरीके से स्थितियों का विश्वेषण कर सके। जाहिर तौर पर डा.सुशील त्रिवेदी हमारे संकटमोचक साबित हुए। हमारा चैनल उनकी उपस्थिति से न सिर्फ गंभीरता से देखा गया बल्कि चुनाव परिणाम भी अनुमानों के आसपास रहे। रायपुर से हमने जब मीडिया विमर्श नाम की पत्रिका शुरू की तो हमारे प्रथम सलाहकारों और लेखकों में वे शामिल थे। आज भी मीडिया विमर्श के हर अंक में वे एक अनिवार्य उपस्थिति हैं। मीडिया विमर्श के प्रकाशन को वे बहुत उम्मीद से देखते हैं। पत्रिका के पांच साल पूरे होने पर हमने रायपुर में एक समारोह का आयोजन किया, जिसके मुख्यअतिथि श्री प्रकाश जावडेकर थे। इस आयोजन में मीडिया विमर्श के सबसे सक्रिय लेखक के रूप में डा.सुशील त्रिवेदी का सम्मान श्री जावडेकर ने किया।
    देवेंद्र नगर की सरकारी अफसरों की कालोनी से लेकर उनकी सेवानिवृत्ति के बाद रामनगर कालोनी के उनके आवास पर उनसे अनेक मुलाकातें हुयी हैं, दोनों स्थितियों में मैंने कभी उनके व्यवहार में अंतर नहीं पाया। वे एक ऐसी शख्सियत हैं, जिसे हमेशा अपनों का साथ सुख देता है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ ही नहीं देश भर में उनके चाहने वालों का एक महापरिवार है, जिसके मुखिया वे खुद हैं। परिवार, समाज और देश तीनों के लिए उनके पास एक दिल है जो समान रूप से तीनों के लिए धड़कता है। वे हर भूमिका में पूर्ण हैं। उनके साथ होकर ही उनकी ऊंचाई को जाना जा सकता है। एक अधिकारी के रूप में उनके योगदान को उनके समकक्ष बयान करेगें किंतु एक लेखक, राजनीतिक विश्वेषक और कलाओं के संरक्षक की जो भूमिका है उसका हम सब मूल्यांकन कर सकते हैं। रायपुर के न जाने कितने पत्रकार मित्र हैं, जिनको डा. त्रिवेदी ने चुनाव रिर्पोटिंग के मायने समझाए, मदद की। चुनावों के दौरान चीजों और स्थितियों को समझने के लिए हम जैसे न जाने कितनों ने उनके जीवन के बहुमूल्य क्षणों का इस्तेमाल किया। उनकी सदाशयता कि उन्होंने अपना समय हमें देने के लिए कभी भी कृपणता नहीं दिखाई।
    आज भौगोलिक दूरियों के बावजूद भी उनकी वही गर्मजोशी कायम है। फोन पर उनकी आवाज गूंजती हैं, मीलों की दूरियों पलों में मिट जाती हैं। परिवार का कुशल क्षेम पूछना उनके वात्सल्य भाव का ही परिचायक है। वे दूर होकर भी अपनी छाया से संरक्षित करते हैं। भोपाल और रायपुर फिर मिल जाते हैं। कभी भोपाल उनका था, उनकी महक से चहकता। जनसंपर्क विभाग से लेकर राजभवन तक उनकी स्मृतियां हैं। कलाबोध, संस्कृतिबोध से रसपगा उनका मन भोपाल के बिना कितना रीता होगा, सोचता हूं। एक संस्कृतिधर्मी नगर भोपाल के निर्माण में, उसकी भावभूमि बनाने में जिन कुछ अफसरों की भूमिका रही, उसमें वे भी एक थे। अपनी पूरी गरिमा और मर्यादा के साथ। समय से संवाद करते हुए। कुछ रचते हुए। एक पूरी टीम को अपने आसपास और अपने जैसा बनाते हुए। इन अर्थों में वे एक विलक्षण संगठनकर्ता भी हैं, जिसके पास रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी, राजनेता, पत्रकार, अधिकारी, लेखक, पुरातत्वविद्, अनुवादक, संपादक, आम आदमी सभी बड़ी सहजता से आमदरफ्त कर सकते थे। उनके पास होना खुद के अधूरेपन को, खालीपन को भरना भी है। उनके पास आज सिर्फ यादें ही नहीं हैं, कर्म के बेहद सजीले पृष्ठ हैं, जिन्हें उनकी कर्मठता ने जीवंत किया है। एक पूरी परंपरा है जो उनके भोपाल से जाने के बाद भी उनकी यादों को सहेजकर खुद को शक्ति देती रहती है। रचनाधर्मियों का, संस्कृतिकर्मियों का भरा-पूरा परिवार जो उन्होंने बनाया वह आज भी उनसे उसी अंतरंगता से जुड़ा हुआ है।
   हालांकि छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद उनकी स्थानीय व्यस्तताएं बहुत हैं। इसलिए भोपाल में उनका सहज-स्वाभाविक प्रवास कम हुआ है। रायपुर में रहते हुए वे आज भी बेहद सक्रिय हैं। एक सक्रिय बुद्धिधर्मी (बुद्धिजीवी कहने का जोखिम नहीं लूंगा) के नाते उनकी एक अलग पहचान बनी है। वे अपनी बात अलग तरीके के अभ्यासी हैं। परिवार की विरासत को उन्होंने ऊंचाई दी है। एक बड़े ओहदे पर होने के बाद भी जिस तरह उन्होंने रिश्तों, परिवार और मित्रों को अपने जिंदगी में सबसे आगे रखा,वह चीज सीखने की है। आज जबकि वे अपने यशस्वी जीवन के 75 वर्ष पूर्ण कर चुके हैं, तब हम जैसे उनके चाहने वालों के लिए वे उतने ही जरूरी और महत्वपूर्ण हैं, जब उन्होंने हमें हमारी उंगलियां पकड़कर दुनिया के सामने ला खड़ा किया था। उनकी इस कृतज्ञता को व्यक्त करने के लिए शब्द कम पड़ेंगे। आप शतायु हों सर। इसी जीवंतता के साथ, कर्मठता के साथ, उजली चादर के साथ।

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष तथा मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं। डा. त्रिवेदी से संजय द्विवेदी के पारिवारिक एवं आत्मीय रिश्ते हैं।


शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

गुरू ज्ञान पर भारी है गूगल ज्ञान

अध्यापक-विद्यार्थी संबंधः नए रास्तों की तलाश
-संजय द्विवेदी

    ऐसे समय में जब आधुनिक संचार साधनों ने अध्यापकों को लगभग अप्रासंगिक कर दिया है, हमें सोचना होगा कि आने वाले समय में अध्यापक-विद्यार्थी संबंध क्या आकार लेगें, क्या शक्ल लेगें? यहां यह भी कहना जरूरी है कि ज्ञान का रिप्लेसमेंट असंभव है। लेकिन जिस तरह जीवन सूचनाओं के आधार पर बनाया, सिखाया और चलाया जा रहा है, उसमें ज्ञानी और गुणीजनों का महत्व धीरे-धीरे कम होगा। वैसे भी हमारे देश में समाज विज्ञानों में जिस तरह की शिक्षा पद्धति बनायी और अपनायी जा रही है। उसका असर उनके शोध पर भी दिखता है। तमाम बड़े परिसरों के बाद भी वैश्विक स्तर पर हमारी संस्थाएं बहुत काम की नहीं दिखतीं। उनकी गुणवत्ता पर अभी काफी काम करना शेष है।
   नए विचारों के लिए स्पेस कम होते जाना, नवाचारों के प्रति हिचक हमारी शिक्षा का बड़ा संकट है। साथ ही शिक्षकों द्वारा नयी पीढ़ी में सिर्फ अवगुण ढूंढना, इस नए समय के ऐसे मुद्दे हैं- जिनसे पूरा शिक्षा परिसर आक्रांत है। नई पीढ़ी की जरूरतें अलग हैं और जाहिर तौर पर वे बहुत आज्ञाकारी नहीं हैं। सब कुछ को वे सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि गुरूजी ऐसा कह रहे हैं। फिलवक्त हमारे समय की बहुत उर्जावान और संभावनाशील और जानकार पीढ़ी इस समय शिक्षकों के सामने उपस्थित है। परंपरागत शिक्षण की चुनौतियां अलग हैं और प्रोफेशनल शिक्षा के तल बहुत अलग हैं। यह पीढ़ी जल्दी और ज्यादा पाना चाहती है। उसे सब कुछ तुरंत चाहिए- इंस्टेंट। श्रम, रचनाशीलता और इंतजार उनके लिए एक बेमानी और पुराने हो चुके शब्द हैं। जाहिर तौर पर इस पीढ़ी से, इसी की भाषा में संवाद करना होगा। यह पीढ़ी नए तेवरों के साथ, सूचनाओं के तमाम संजालों के साथ हमारे सामने है। यहां अब विद्यार्थी की नहीं, शिक्षक की परीक्षा है। उसे ही खुद को साबित करना है।
सूचनाओं के बीच शिक्षाः
   हमारा समय सूचनाओं से आक्रांत है। सूचनाओं की बमबारी से भरा-पूरा। क्या लें क्या न लें-तय कर पाना मुश्किल है। आज के विद्यार्थी का संकट यही है कि वह ज्यादा जानता है। हां, यह संभव है कि वह अपने काम की बात कम जानता हो। उसके सामने इतनी तरह की चमकीली चीजें हैं कि उसकी एकाग्रता असंभव सी हो गयी है। वह खुद के चीजों और विषयों पर केंद्रित नहीं कर पा रहा है। क्लास रूम टीचिंग उसे बेमानी लगने लगी है। शिक्षक भी नए ज्ञान के बजाए पुरानी स्लाइड और पावर पाइंट से ज्ञान की आर्कषक प्रस्तुति के लिए जुगतें लगा रहे हैं, फिर भी विफल हो रहे हैं। वह कक्षा में बैठे अपने विद्यार्थी तक भी पहुंच पाने में असफल हैं। विद्यार्थी भी मस्त है कि क्लास में धरा है। टीचर से ज्यादा भरोसा गूगल पर जो है। गूगल भी ज्ञान दान के लिए आतुर है। हर विषय पर कैसी भी आधी-अधूरी जानकारी के साथ।
   इससे किताबों पर भरोसा उठ रहा है। किताबें इंतजार कर रही हैं कि लोग आकर उनसे रूबरू होगें। लेकिन सूचनाओं  से भरे इस समय में पुस्तकालय भी आन लाइन किए जा रहे हैं। यानि इन किताबों के सामने प्रतीक्षा के अलावा विकल्प नहीं हैं। यह प्रतीक्षा कितनी लंबी है कहा नहीं जा सकता।
मुश्किल में एकाग्रताः
  सच कहें तो इस कठिन समय का सबसे संकट है एकाग्रता। आधुनिक संचार साधनों ने सुविधाओं के साथ-साथ जो संकट खड़ा किया है वह है एकाग्रता और एकांत का संकट। आप अकेले कहां हो पाते हैं? यह मोबाइल आपको अकेला कहां छोड़ता है? यहां संवाद निरंतर है और कुछ न कुछ स्क्रीन पर चमक जाता है कि फिर आप वहीं चले जाते हैं, जिससे बचने के उपाय आप करना चाहते हैं। सूचनाएं, ज्यादा बातचीत और रंगीनियों ने हाल बुरा कर दिया है। सेल्फी जैसे राष्ट्रीय रोग की छोड़िए, जिंदगी ऐसे भी बहुत ज्यादा आकर्षणों से भर गयी है। ऐसे आकर्षणों के बीच शिक्षा के लिए समय और एकाग्रता बहुत मुश्किल सी है। बहुत सी सोशल नेटवर्किंग साइट्स का होना हमें कितना सामाजिक बना रहा है, यह सोचने का समय है। सोशल नेटवर्क एक नई तरह की सामाजिकता तो रच रहे हैं तो कई अर्थों में हमें असामाजिक भी बना रहे हैं। इसी के चलते गुरू ज्ञान पर भारी है गूगल ज्ञान। इस नए समय में शिक्षक को नई तरह से पारिभाषित करना प्रारंभ कर दिया है।
चाहिए तैयारी और नयी दृष्टिः
  जाहिर तौर पर शिक्षा और शिक्षकों के सामने नए विचारों को स्वीकारने और जड़ता को तोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। उन्हें परंपरा से हटकर नया ज्ञान, नए तरीके से प्रस्तुत करना होगा। प्रस्तुतिकरण की शैली में परिवर्तन लाना होगा। शिक्षक की सबसे बड़ी चुनौती- अपने विद्यार्थी के मन में ज्ञान की ललक पैदा करना है। उसे ज्ञान प्राप्ति के लिए जिज्ञासु बनाना है। उसकी एकाग्रता के जतन करना है और कक्षा में उसे वापस लाना है। वापसी इस तरह की कि वह कक्षा में सिर्फ शरीर से नहीं, मन से भी उपस्थित रहे। उसे नए संचार माध्यमों की सीमाएं भी बतानी जरूरी हैं और किताबों की ओर लौटाना जरूरी है। उसके मन में यह स्थापित करना होगा कि ज्ञान का विकल्प सूचनाएं नहीं हैं। सिर्फ सतही सूचनाओं से वह ज्ञान हासिल नहीं करता, बल्कि अपने स्थापित भ्रमों को बढ़ाता ही है। उसे यह भी बताना होगा कि उसे चयनित और उपयोगी ज्ञान के प्रति सजगता और ग्रहणशीलता बनानी होगी। 

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)