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सोमवार, 27 जुलाई 2026

शब्दों का सामर्थ्य और विचारों की धरोहर है 'संजय उवाच'

 

समीक्षक - डॉ. प्रदीप डहेरिया


पुस्तकः संजय उवाच (प्रो.संजय द्विवेदी के व्याख्यान)

प्रकाशक: शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, शाहदरा, दिल्ली

मूल्य- 495/- रुपए

 


      कोई भी व्याख्यान समय की रेत पर मिट जाने वाली आवाज़ हो सकते हैं, लेकिन जब वे लिपिबद्ध होकर पुस्तक का आकार लेते हैं, तो वे इतिहास के अमर दस्तावेज़ बन जाते हैं। किसी भी समाज, राष्ट्र या संगठन को सही दिशा देने में उसके नेतृत्वकर्ता के विचारों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब उन सशक्त विचारों को केवल सुना ही नहीं, बल्कि 'भाषण संग्रह' के रूप में सहेजकर एक पुस्तक का रूप दे दिया जाता है, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शिका बन जाती है। हाल ही में प्रकाशित 'संजय उवाच' नामक यह पुस्तक, जो विशिष्ट, चुनिंदा एवं प्रभावी भाषणों का संकलन है। वह वैचारिक जगत में एक अनमोल उपहार की तरह ही है। पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार, संपादक, चिंतक और मीडिया अध्यापन की दुनिया में चर्चित व्यक्तित्व प्रोफेसर संजय द्विवेदी कृत है।

      प्रो. संजय द्विवेदी मूलतः प्रिंट माध्यमों के विशेषज्ञ हैं। अपने अधिकांश मीडिया जीवन में उन्होंने मुद्रित माध्यमों में महत्वपूर्ण और सघन लेखन किया है। उनकी इस शब्द साधना का ही प्रताप है कि वे प्राकृतिक तौर पर धाराप्रवाह तमाम विषयों पर बोलते हैं। संजय जी का टेलीविजन और डिजिटल मीडिया में भी बहुत लंबा अनुभव रहा है। वे कई राष्ट्रीय चैनलों का प्रमुख चेहरा रहे हैं। इसके अलावा शैक्षणिक जीवन का भी विस्तृत और नेतृत्वकारी अनुभव उनके वक्तव्यों में प्रस्तुत होता है। उनकी इस संचित शब्द निधि से संपन्न यह पुस्तक एक अद्वितीय कृति बन जाती है। डा. संजय की जी लेखन यात्रा में कई पुस्तकें शामिल हैं। लेकिन संजय उवाचइस मामले में अलग है कि उनके व्याख्यानों का सार इस पुस्तक में पढ़ने को मिलता है। यह उनके लिए एक उपहार है जिन लोगों ने संजय जी की मंत्रमुग्ध कर देने वाली संवाद शैली का स्वाद नहीं चखा है। उनकी बातचीत का साक्षात करने वाले अनायास ही देश, समाज, राजनीति, युवा और मीडिया आदि विषयों पर ऐसी बातें, सूचनाएं और संस्मरण पा जाते हैं जो कहीं और नहीं मिलते। और एक बात यह भी कि संजय जी जिस तरह आत्मसात करने वाली शैली में संवाद करते हैं, वह श्रोताओं को आनंदित करती है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही चुंबकीय शक्तियों से लबरेज हैं।

         'संजय उवाच, केवल कागज़ पर छपे हुए शब्द नहीं हैं, बल्कि यह उस गहरे अनुभव, संवेदनशीलता और दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण है जो डा. संजय द्विवेदी ने अपने सार्वजनिक जीवन में अर्जित किये हैं। किसी भी प्रकार के व्याख्यान की सबसे बड़ी खूबी उसका सीधा दिल तक पहुँचना होता है। इस पुस्तक में संकलित व्याख्यानों की भाषा इतनी सरल, सहज और सजीव है कि पाठक को पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो वह स्वयं सामने बैठकर वक्ता को सुन रहा हो। शब्दों का चयन और वाक्यों का प्रवाह हर वर्ग के पाठक को बांधे रखता है। इस दृष्टि से 'संजय उवाच' पुस्तक बिल्कुल फिट है। इस पुस्तक कि सबसे बड़ी ताकत इसकी विषय-वस्तु है। इसमें केवल एक ढर्रे पर बात नहीं की गई है, बल्कि सामाजिक सरोकार, राष्ट्र निर्माण, युवा प्रेरणा, संस्कृति, और वैश्विक चुनौतियों जैसे गंभीर विषयों पर बेहद व्यावहारिक और दूरदर्शी विचार प्रस्तुत किए गए हैं। प्रत्येक व्याख्यान पाठक को सोचने पर मजबूर करता है और एक नई दृष्टि देता है। आज के दौर में जहाँ चारों ओर सूचनाओं का अंबार है, वहाँ यह पुस्तक वैचारिक स्पष्टता लाती है। निराश मन में उत्साह फूंकना और युवाओं को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना इस पुस्तक का मूल स्वर है। संजय जी देश के नामी-गिरामी संवाद कार्यक्रमों में शिरकत करते रहते हैं। उनकी वाक कला के लोग कायल हैं। उनकी इस पुस्तक का हर शब्द पाठकों से सजीव संवाद करता लगता है। यह अवश्य पठनीय पुस्तक है।इसके पन्नों को पलटते हुए पाठक के भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार निश्चित ही होगा।

      प्रो. संजय द्विवेदी सरल और सहज व्यक्तित्व के स्वामी हैं। उनका अध्ययन और विषयों पर पकड़ आश्चर्यजनक है। वे पिछले लगभग तीन दशकों से निरंतर लेखन करते रहे हैं। उनके खाते में कई शानदार पुस्तकों का रिकार्ड दर्ज है। इसी तरह उनके संवाद कार्यक्रम भी देश के कोने-कोने में होते रहते हैं। संजय उवाचको पढ़ने के बाद उनके आगामी संवाद में श्रोताओं की तादाद और बढ़ने वाली है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद हर पाठक निश्चित तौर पर उनके भाषणों को सजीव सुनने के लिए उत्सुक होने वाला है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि 'संजय उवाच' पुस्तक शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और जनसंचार के छात्रों के लिए एक बेहतरीन संदर्भ ग्रंथ एवं व्यावहारिक गाइड साबित होगी।  मैं प्रो. संजय द्विवेदी को इस पुस्तक प्रकाशन के लिए तहेदिल से बधाई देता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि वे आगे भी अपने लेख एवं भाषणों के माध्यम से समाज को दिशा देते रहेंगे।

 


 

वर्चुअल दुनिया में 'लाइक' और असली जिंदगी में सन्नाटा!

 

'हाइपर कनेक्टिविटी' के दौर में युवाओं पर गहराता अकेलापन

-प्रो. संजय द्विवेदी



    सही मायनों में मानव सभ्यता के इतिहास में दुनिया इतनी कनेक्टेड कभी नहीं थी। एक क्लिक, एक संदेश और कुछ ही सेकेंड्स में सात समंदर पार बातचीत हो जाना किसी जादुई अहसास जैसा है। मोबाइल की चौबीस घंटे चमकती स्क्रीन ने इस जादुई दुनिया को हमारी हकीकत बना दिया है। लेकिन इस तकनीकी छलांग का दूसरा पहलू बेहद डरावना है। इतिहास के इस दौर में हम 'हाइपर कनेक्टेड' तो हैं, लेकिन शायद सबसे ज्यादा अकेले भी। सोशल मीडिया के आभासी मंचों पर हमारे दोस्तों और चाहने वालों की कतार बेहद लंबी है, मगर संकट के क्षणों में सिर रखने के लिए एक वास्तविक कंधा भी मयस्सर नहीं होता। हम निरंतर 'बातचीत' की भूलभुलैया में तो उलझे हैं, किंतु आंतरिक 'संवाद' के लिए तरस रहे हैं। सिर झुकाए और स्क्रीन के कोलाहल में डूबे समाज की बेचैनियां निरंतर बढ़ रही हैं। आधुनिक विमर्श में लाखों की भीड़ के बीच अकेले होने की त्रासदी इसी को कहते हैं।

    अकेलापन इस समय की सबसे बड़ी और चिंताजनक सामाजिक परिघटना बन चुका है। एक विचारक ने ठीक ही कहा है, "दोस्तों का न होना कोई अपराध नहीं है, लेकिन खुद में अकेला हो जाना एक त्रासदी है।"  सोशल मीडिया के इस दौर ने हमें अपनी ही बनाई भीड़ ने एकाकी कर दिया है। हालात इस हद तक बदल चुके हैं कि अब वास्तविक इंसानी रिश्तों की जगह 'एआई फ्रेंड्स' (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मित्र) ले रहे हैं। मशीनें हमारी सहायक, मार्गदर्शक और दोस्त बन रही हैं। मेरे जैसे मीडिया शिक्षक के लिए यह तथ्य रेखांकित करना बेहद पीड़ादायक है कि क्लासरूम में स्मार्टफोन की स्क्रीन पर चमकती युवा आँखें, फोन जेब में जाते ही एक अजीब से सन्नाटे और सामाजिक संकोच से घिर जाती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी पहचान और व्यक्तित्व का निर्माण अब वास्तविक समाज नहीं, बल्कि यह पाँच इंच की स्क्रीन कर रही है। सच तो यह है कि आज के युवाओं का एकांत भी शांत नहीं है, वह आभासी कोलाहल से भरा हुआ है।

       नए समय की माँग के अनुसार सोशल मीडिया पर उपस्थिति को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। तकनीक ने इस माध्यम को मोबाइल के जरिए हर हाथ और हर जेब तक पहुँचाया है। सोशल मीडिया पर मिलने वाले 'लाइक' और 'कमेंट्स' हमारे मस्तिष्क में तात्कालिक खुशी का संचार करते हैं। डिजिटल मंचों पर विचरते लोग इस आभासी प्रशंसा के आदी हो चुके हैं। यह क्षणिक खुशी एक नशे की तरह काम करती है। दिनभर लगातार पोस्ट करते, रील्स देखते और प्रतिक्रियाएं देते लोग अनजाने में ही इस माध्यम के गहरे चंगुल में फंस जाते हैं। 'डोपामाइन' का यह मायाजाल आज हमारे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है।

     डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अमूमन चमकती हुई चीजें ही परोसी जाती हैं। लोग अपनी सुनहरी यादों, सफलताओं और सबसे खूबसूरत पलों को ही यहाँ साझा करते हैं। सोशल मीडिया पर परोसी जा रही इस 'चमकीली जिंदगी' (रील्स, वेकेशन, महँगी पार्टियां) को देखकर सामान्य पृष्ठभूमि का युवा अपनी साधारण वास्तविक जिंदगी की तुलना उनकी 'रील्ड लाइफ' से करने लगता है। यह तुलना अंततः उसे हीनभावना की ओर धकेल देती है, जिससे 'तुलना का अवसाद' पैदा होता है। पूर्ववर्ती दौर में युवा फिल्मों से सीखते थे, लेकिन तब महीनों में कोई एक फिल्म आती थी जिसका प्रभाव लंबे समय तक रहता था। अब रील्स के दौर में यह मानसिक बमबारी हर सेकंड जारी है।

     हमें 'बातचीत' और 'संवाद' के बुनियादी अंतर को समझना होगा। आँखों में आँखें डालकर की जाने वाली आत्मीय बातचीत के बजाय लोग अब केवल मोबाइल स्कॉलिंग में उलझे हैं। यात्राओं, सार्वजनिक स्थानों, पार्कों और यहाँ तक कि कॉलेजों के कैम्पस में भी लोग आपस में बतियाने के बजाय सिर झुकाए स्क्रीन निहारते दिखते हैं। मोबाइल द्वारा दिए गए इस एकाकीपन ने हमारी संवादात्मक क्षमता को गंभीर रूप से पंगु बना दिया है। जिन भावनाओं को शब्दों में बयां किया जाना चाहिए था, उन्हें अब 'इमोजी', 'शॉर्ट्स' और 'टेक्स्ट' के छोटे टुकड़ों में समेटा जा रहा है। इसके कारण युवा पीढ़ी में वास्तविक सामाजिक कौशल तेजी से लुप्त हो रहे हैं। संवादहीनता के कारण मन की वास्तविक आकांक्षाएं अधूरी रह जाती हैं और हम एक ऐसे उदासीन समाज में तब्दील हो रहे हैं, जिसे स्क्रीन पर गुस्सा जाहिर करना तो आता है, लेकिन वास्तविक जीवन में प्रेम और करुणा व्यक्त करना नहीं।

     अकेलापन अब सिर्फ किसी व्यक्ति का निजी मामला या भावनात्मक उदासी नहीं रह गया है; यह एक गंभीर वैश्विक संकट का रूप ले चुका है। यह संकट इतना गहरा है कि इससे मानसिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी घातक चुनौतियाँ मिल रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा गठित 'सोशल कनेक्शन कमीशन' की महत्वपूर्ण रिपोर्ट इस बात पर विशेष प्रकाश डालती है कि सामाजिक अलगाव और अकेलापन दुनिया भर में एक मूक महामारी की तरह फैल रहे हैं, जिनका समाज पर गहरा लेकिन अनदेखा प्रभाव पड़ रहा है। नवीनतम वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर यह रिपोर्ट तत्काल वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देती है। आयोग के निष्कर्ष बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर हर छह में से एक युवा इस समय गंभीर अकेलेपन का अनुभव कर रहा है।

     विभिन्न शोध रिपोर्ट्स के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय युवा प्रतिदिन औसतन 4 से 5 घंटे स्मार्टफोन की स्क्रीन को दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय रहने वाले हर पाँच में से दो युवा (लगभग 40 प्रतिशत) किसी न किसी स्तर पर अकेलेपन या एंग्जायटी (घबराहट) का सामना कर रहे हैं। स्क्रीन-टाइम के इस अनियंत्रित फैलाव के कारण युवाओं में अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और 'नोमोफोबिया' (मोबाइल से दूर होने का डर) में करीब 30 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आए दिन ऐसी खबरें सामने आती हैं जहाँ माता-पिता द्वारा फोन छीन लिए जाने पर बच्चों ने आत्मघाती कदम उठा लिए या घर छोड़ दिया।

       यह समस्या केवल सामान्य पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं है; देश के सबसे तेज और तकनीकी रूप से उन्नत दिमाग वाले छात्र भी इस डिजिटल अकेलेपन और 'परफॉर्मेंस प्रेशर' के चक्रव्यूह में फंसे हैं। 'आईआईटी बॉम्बे' के 'स्टूडेंट वेलनेस सेंटर' (काउंसिलिंग सेल) ने छात्रों में सोशल मीडिया जनित अवसाद के गंभीर लक्षण दर्ज किए हैं। हालांकि, इसके सकारात्मक समाधान के रूप में छात्रों ने खुद परिसरों में 'डिजिटल डिटॉक्स' और 'नो गैजेट नाइट्स' जैसे जमीनी अभियानों की शुरुआत की है। इन अभियानों के तहत छात्र सप्ताह में एक शाम अपना फोन कमरों में छोड़कर केवल आपस में बातचीत करने, खेलने और कलात्मक गतिविधियों के लिए मैदानों में इकट्ठा होते हैं। यह अनूठी पहल साबित करती है कि तकनीक का कोई भी एल्गोरिदम कभी भी जीवंत इंसानी जुड़ाव का विकल्प नहीं बन सकता।

      इस चुनौतीपूर्ण समय में हम तकनीक या सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की वकालत नहीं कर सकते, क्योंकि मोबाइल विहीन आधुनिक जीवन की कल्पना अब असंभव है। समाधान पूरी तरह से तकनीक को छोड़ना नहीं, बल्कि 'डिजिटल हाइजीन' को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना है। हमें सजगता से अपने स्क्रीन टाइम को घटाकर 'ग्रीन टाइम' (प्रकृति, परिवार और वास्तविक मित्रों के साथ बिताया जाने वाला समय) को बढ़ाना होगा।

        अगली बार जब हम किसी कैफ़े, मेट्रो या ड्राइंग रूम में बैठें, तो इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में खोने के बजाय, अपने सामने उपस्थित व्यक्ति की बात को पूरी आत्मीयता से सुनें। समाज, संस्कृति और मनुष्यता को जिंदा रखने के लिए हमें इंसानों की संवेदनशीलता की ज़रूरत है, मशीनी एल्गोरिदम की नहीं। मनुष्य का जीवन अनमोल है, किंतु हमारी मनुष्यता उससे भी बड़ी है। मानव और अन्य जीवों के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि हमने भाषाएं विकसित कीं, बातचीत से संवाद की यात्रा तय की और कलाओं के माध्यम से संचार का मानवीय दायरा बढ़ाया। तकनीक को हमारा सहयोगी होना चाहिए था, संचालक नहीं। समय आ गया है कि हम अपनी वास्तविक खुशियों और आंतरिक आनंद को बचाए रखने के लिए तकनीक को वापस सहायक की भूमिका में लाएं, न कि उसे अपनी चेतना का नियंता बनने दें।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

 

 

 

 

डिजिटल चुनौती के बीच कैसे जिएं अखबार

 

पठनीयता के गहरे संकट से जूझते समाचार पत्र क्या करें?



   हां, सामने मीडिया की पढ़ाई करने की चाह रखने वाले विद्यार्थी ही थे, उम्मीद की जानी चाहिए कि वे कोई अखबार, मैगजीन या किताबें पढ़कर आए होंगे। लगभग 110 विद्यार्थियों से बात करते हुए यह अहसास हुआ कि अखबार अब उनकी जिंदगी में कोई जगह नहीं रखता। वे जो कुछ भी ग्रहण कर रहे हैं, आनलाइन ही कर रहे हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया के सामने बहुत गहरे संकट हैं। क्योंकि इस डिजिटल समय में उनके ई-पेपर ही पलटे जा रहे हैं। क्या अब हाथ में अखबार लेकर पढ़ने वाले दुर्लभ हो जाएंगें? 

बदल गए हैं पढ़ने के तरीके-

    डिजिटल मीडिया और स्मार्टफोन ने पढ़ने के तरीके को बदलकर रख दिया है। पोर्टल्स, सोशल मीडिया और न्यूज एप्स के कारण पाठकों को पल-पल की खबरें मुफ्त में उनके मोबाइल पर मिल रही हैं। जिससे 24 घंटे में एक बार आनेवाला अखबार क्या मुकाबला करेगे। रीयल टाइम अपडेट एक ऐसी घटना है जिसने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। ऐसे में अखबारों को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए नए रास्ते तलाशने की जरूरत है। नई पीढ़ी लंबी सामग्री पढ़ने के बजाए अब वीडियो, शार्ट्स, पाडकास्ड और विजुअल इंफ्रोग्राफिक्स के जरिए चीजों को देखना,सुनना और समझना सीख गई है। प्रिंट मीडिया के प्रति उसका आकर्षण खत्म सा है।

आर्थिक संकट से भी हैं हलाकान-

     इस परिघटना ने प्रिंट मीडिया से कमाई के मौके भी छीनने शुरु कर दिए हैं। हम जानते हैं अखबार मूलतः विज्ञापनों ( स्पेस सेलिंग) पर निर्भर हैं। अब जबकि कंपनियां अपना बड़ा बजट डिजिटल प्लेटफार्म जैसे गूगल,मेटा और यू-ट्यूब पर खर्च कर रही हैं, जहां वे अपने लक्षित समूह ( टारगेट आडियंस) तक आसानी से पहुंच रही हैं। इसकी लागत भी कम पड़ रही है। एल्गोरिद्म ने बाजार और ग्राहक की पहुंच को बहुत आसान बना दिया है। कागज, स्याही और छपाई की बढ़ती कीमतों से अखबार पहले ही हलाकान थे, बिजली और प्रिंटिंग मशीनों का रख-रखाव उनकी अलग चिंताओं को बढ़ाता रहा है। इन स्थितियों में अखबार की न सिर्फ लागत बढ़ जाती है बल्कि उसे लोगों तक पहुंचाना सरल नहीं रह गया है। अखबारों को सुबह छापना और लोगों के घरों तक पहुंचाना हमेशा ही कठिन काम था। भारत जैसे बाजार में जहां लोग पढ़ने के लिए खर्च को तैयार नहीं है, यह संकट और जटिल हो जाता है। आज भी हिंदुस्तान के बाजार में अखबार 3 से 7 रूपए के बीच ही बेचे जा रहे हैं। जो उसकी वास्तविक लागत से बहुत कम होता है। विज्ञापनों में आती कमी के बीच इसे छापना असंभव होता जाएगा। हम ध्यान से देखें तो हाकरों की नई पीढ़ी की रूचि अखबार बांटने में रूचि कम रख रही है। दूध या अन्य व्यवसाय के साथ अखबार वितरण भी किया जा रहा है। स्टाल कम हो रहे हैं जहां पत्र-पत्रिकाएं मिला करती थीं। स्टेशनों से लेकर नगरों, कस्बों तक अखबारों और पत्रिकाओं के स्टाल समाप्त हो रहे हैं या उनपर खाद्य सामग्री बिक रही है।

भरोसे का संकट बड़ी चुनौती-

     टीवी और डिजिटल मीडिया से होड़ कर रहे प्रिंट मीडिया ने भी गहरी रिर्पोटिंग और विश्लेषणात्मक सामग्री के बजाए हल्की-फुल्की प्रस्तुति से खुद को अप्रासंगिक बना लिया है। बहुत कम अखबार हैं जो सामग्री की गुणवत्ता और विचारों पर ध्यान क्रेंद्रित कर रहे हैं। ऐसे में जब आनलाइन उपलब्ध सामग्री जैसे ही विषयवस्तु अखबारों में होगी तो निश्चित ही पाठक दूर जाएंगें। कागज के निर्माण में पेड़ों की कटाई और जल की खपत जैसे मुद्दे उठाकर  भी अखबारों से दूर करने की एक नैतिक और व्यवहारिक चिंताएं खड़ी करने के प्रयास भी हो रहे हैं। ऐसे में राजस्व में गिरावट के कारण जहां मझोले और छोटे अखबारों के सामने अस्तित्व का संकट है तो बड़े अखबार भी संपादकीय बजट में कटौती, पत्रकारों की छंटनी जैसे काम कर रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य में अखबारों की अधिकाधिक निर्भरता कारपोरेट और सरकारी विज्ञापनों पर बहुत बढ़ गई है। संकट का असली सिरा यहीं है। भरोसे,विश्वसनीयता का संकट इन्हीं सब कारणों से बढ़ रहा है। निष्पक्ष पत्रकारिता बहुत चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।

आखिर रास्ता क्या है-

  जाहिर है संकटों से घिरे प्रिंट मीडिया के सामने विकल्प सीमित हैं। अब केवल संकटों की बात, समस्याओं का बातें करने से आगे समाधान परक पत्रकारिता की आवश्यक्ता है। जिसमें अखबार संकटों के साथ उनके संभावित समाधानों, सफल माडल्स और सकारात्मक प्रयासों की बात भी करें। व्याख्या, विश्लेषण और खोजी पत्रकारिता पर फोकस करके उन्हें खबर क्यों घटी और इसके मायने क्या हैं बताने होंगे। अखबार अब सूचना के वाहक नहीं उनके विश्लेषण और व्याख्याओं के वाहक बनें। डेटा, शोध और गहन मैदानी कवरेज ही वह रास्ता है जिससे प्रिंट स्वयं को प्रासंगिक बनाए रख सकता है। फैक्ट चेकिंग की अनिर्वायता के साथ हमें गलत खबरों का पर्दाफाश भी करना होगा। सबसे पहले खबर देने के बजाए सबसे सटीक खबर देने के सिद्धांत पर लौटना होगा। इसके साथ ही आत्मनिर्भर वित्तीय माडल पर काम करते हुए पाठक द्वारा पोषित मीडिया खड़ा करना होगा। पत्रकारों को तकनीक से डरने के बजाय उसका इस्तेमाल अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए करना चाहिए। डेटा एनालिसिस, ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद और रूटीन री-लेखन में एआई (AI) का इस्तेमाल करें ताकि पत्रकारों का समय फील्ड वर्क, मानवीय संवेदनाओं की कहानियों और खोजी रिपोर्टिंग में लग सके। पत्रकारिता तब तक निष्पक्ष नहीं हो सकती जब तक पत्रकार स्वयं सुरक्षित और आर्थिक रूप से निश्चिंत न हों।

मीडिया साक्षरता भी है जरूरी-

     मीडिया संस्थानों और समाज को मिलकर ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संवाददाताओं के लिए सुरक्षा कवर, बीमा और सम्मानजनक मानदेय सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाना होगा। पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को आम जनता के बीच 'मीडिया साक्षरता' की समझ बहुत जरूरी है। जब पाठक यह समझना सीख जाएंगे कि कौन-सी खबर प्रायोजित है, कौन-सा एजेंडा है और कौन-सी वास्तविक पत्रकारिता, तो वे खुद-ब-खुद घटिया और सनसनीखेज कंटेंट को नकारना शुरू कर देंगे। भरोसा वह शब्द है जो आसानी से अर्जित नहीं होता, अखबारों की स्वीकार्यता में विश्वसनीयता और प्रामणिकता का सर्वाधिक योगदान होगा। उम्मीद की जानी कि नई डिजिटल चुनौतियों के बीच भी कुछ लोग उस भरोसे को कायम रखेंगें, जो भारतीय पत्रकारिता ने अपनी लंबी यात्रा से अर्जित किया है।


 

 

मंगलवार, 30 जुलाई 2024

'सरस्वती प्रज्ञा सम्मान' से अलंकृत किए गए प्रो.संजय द्विवेदी



भोपाल। प्रख्यात मीडिया शिक्षक और लेखक प्रो.संजय द्विवेदी को 'सरस्वती प्रज्ञा सम्मान -2024' से सम्मानित किया गया है। उन्हें यह सम्मान भोपाल स्थित गांधी भवन में निर्दलीय प्रकाशन,जन संगठन दृष्टि की ओर से आयोजित समारोह में पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार श्री विजयदत्त श्रीधर ने प्रदान किया। इस अवसर पर नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय के प्रो.विजय कुमार कर्ण, गांधी भवन न्यास के सचिव दयाराम नामदेव, पत्रकार कैलाश आदमी, गांधीवादी विचारक आर के पालीवाल, प्रिंस अभिषेक अज्ञानी विशेष रूप से उपस्थित थे।

  प्रो.संजय द्विवेदी भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक हैं। वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के प्रभारी कुलपति भी रह चुके हैं। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण समाचार पत्रों में संपादक के रूप में काम किया है। मीडिया और राजनीतिक संदर्भों पर उनकी 35 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सक्रिय पत्रकार,लेखक और संपादक के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई है।

  इस अवसर पर अपने संबोधन में प्रो.द्विवेदी ने कहा हमारा मीडिया पश्चिमी मानकों पर खड़ा है, उसे भारतीय मूल्यों पर आधारित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि समाज के सब क्षेत्रों की तरह मीडिया भी औपनिवेशिक विचारों से मुक्त नहीं हो सका है। हमें संचार, संवाद की भारतीय अवधारणा पर काम करते हुए लोक-मंगल को केंद्र में रखना होगा और संचार के भारतीय माडल बनाने होंगे। इसके लिए समाधानपरक पत्रकारिता का विचार प्रासंगिक हो सकता है। कार्यक्रम का संचालन विमल भंडारी ने किया।

जिम्मेदारियों को बढ़ाता है सम्मान : प्रो. संजय द्विवेदी


 -खुशी फॉउण्डेशन एवं दिशा एजुकेशनल सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में सेवा शिखर सम्मान समारोह आयोजित

- विभिन्न क्षेत्रों की महान विभूतियों को सम्मान से नवाजा गया 



लखनऊ 27 जुलाई  - खुशी फॉउण्डेशन और दिशा एजुकेशनल सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को बौद्ध शोध संस्थान, गोमतीनगर के सभागार में सेवा शिखर सम्मान समारोह-2024 आयोजित किया गया। समारोह की अध्यक्षता  भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रो(डॉ ) संजय द्विवेदी ने की। 

प्रो. संजय द्विवेदी ने  कहा कि प्रतिभाओं के सम्मान से समाज में सकारात्मक चेतना पैदा होती है और लोग अच्छे कामों को करने हेतु प्रेरित होते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय परिवारों की शक्ति उनकी मूल्यनिष्ठा ही है। संस्कृति, संस्कार और परम्पराओं की रक्षा से ही भारत श्रेष्ठ बनेगा। खुशी समय जैसी संस्थाएं देश को जीवंत बनाए रखने में सहयोगी हैं। प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी ने कहा कि सेवा के बदले में मिलने वाले सम्मान की ख़ुशी ही कुछ अलग होती है। यह सम्मान समाज के अन्य लोगों में सेवा भाव को जगाने का पुनीत कार्य करता है। प्रो. द्विवेदी ने इस भव्य आयोजन के लिए ख़ुशी फाउंडेशन और दिशा एजुकेशनल सोसायटी के प्रतिनिधियों का आभार जताया। इसके साथ ही समाज के कमजोर वर्ग के हित में किये जा रहे उनके कार्यों को सराहा। 

इस मौके पर बौद्ध शोध संश्तान के अध्यक्ष हरगोविंद बौद्ध ने कहा कि सम्मान से नवाजी गयीं विभिन्न क्षेत्रों की महान विभूतियों के चेहरों पर ख़ुशी की झलक साफ़ देखी जा सकती थी। संस्था द्वारा सम्मानित लोगों की जिम्मेदारी अब और बढ़ जाती है कि वह और मनोयोग से अपने-अपने क्षेत्र में कार्य कर दूसरों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करें। कार्यक्रम को पापुलेशन सर्विसेज इंटरनेशनल इंडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मुकेश कुमार शर्मा ने सम्बोधित किया और कार्यक्रम की भरपूर सराहना की ।  धन्यवाद ज्ञापन दिशा एजुकेशनल एवं वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष प्रभात पांडेय ने किया। 

इनको मिला सम्मान : संतोष गुप्ता (सीइओ - इंडियन सोशल रेस्पोंसबिल्टी नेटवर्क), श्री बलबीर सिंह मान(सचिव - उम्मीद), श्री महेंद्र दीक्षित(प्रबंध निदेशक - सिग्मा ट्रेड विंग्स) , सचिन गुप्ता - निदेशक -ओलिवहेल्थ, डॉ आर पी सिंह (निदेशक - खेल, उत्तर प्रदेश), श्रीमती सुमोना एस पांडेय(आकाशवाणी) , मेदांता, लखनऊ,  दीपेश सिंह( ऑर्गॅनिक्स4यू), श्री नरेंद्र कुमार मौर्या (मैनेजिंग डायरेक्टर- रोहित ग्रुप), अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान , श्रीमती ममता शर्मा, श्रीमती रश्मि मिश्रा के अलावा कई अन्य क्षेत्रों में सराहनीय कार्य करने वालों को सेवा गौरव सम्मान से नवाजा गया।  

बच्चों की भाव भंगिमाओं ने लोगों के मन को मोहा : सम्मान समारोह की शुरुआत में पीहू द्विवेदी द्वारा गणेश वंदना एवं सरस्वती के साथ की गयी।  इसके बाद लखनऊ कनेक्शन वर्ल्ड वाइड द्वारा गीत गायन प्रस्तुत किया गया। गार्गी द्विवेदी द्वारा सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुत किया गया। इसके अलावा दीपा अवस्थी एवं निखिल कसुधान द्वारा भी शिव जी को समर्पित नृत्य प्रस्तुत किया गया। वहीं विद्याभूषण सोनी के भी मोहक नृत्य प्रस्तुति ने भी खूब तालियाँ बटोरी ।  प्रतुत और गार्गी द्विवेदी के नृत्य ने लोगों को नृत्यांगना डांस इंस्टीट्युट इंदिरानगर की डायरेक्टर और कोरियोग्राफर अनुपमा श्रीवास्तव की देखरेख में भानवी श्रीवास्तव ने गणेश वंदना प्रस्तुत कर लोगों को मन्त्रमुग्ध कर दिया।



शनिवार, 15 जून 2024

अबू धाबी के विद्यार्थियों से बोले प्रो. द्विवेदी - यह क्रियेटिविटी और आईडियाज का समय

 

-भारतीय विद्या भवन , अबू धाबी का आयोजन

-कम्युनिकेशन से ही होगा दुनिया के संकटों का समाधान




भोपाल। किसी भी इंसान को छोटी-छोटी समस्याओं पर नजर रखनी चाहिए। उनका हल सोचना चाहिए। बड़े और सफल आइडियाज इन्हीं से निकलते हैं।" यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी)के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने अबू धाबी के भारतीय विद्या भवन द्वारा संचालित इंटरनेशनल स्कूल में आयोजित आनलाईन संवाद कार्यक्रम में व्यक्त किए। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि यह समय क्रियेटिविटी और आईडियाज का है। दुनिया का हर संकट संवाद और संचार से हल किया जा सकता है। उन्होंने कहा संचार और संवाद की दुनिया में वही लोग स्थापित हो सकते हैं, जिनके पास नए विचार, नई भाषा और कहानी कहने की कला है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राइवेट इंटरनेशनल स्कूल, आबूधाबी की प्राचार्या वनिता वाल्टर ने की। इस अवसर पर प्रधानाचार्य सुरेश बालकृष्णन, उप-प्रधानाचार्या श्रीमती मिनी रमेश, हिंदी विभाग प्रमुख रवि शुक्ल भी उपस्थित रहे।

    विद्याथियों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए उन्होंने जहां मीडिया की दुनिया में अवसरों के बारे में  बताया, वहीं जीवन में भाषा की महत्ता पर भी बात की। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि अकसर कुछ नया देखते ही हम उसके उपभोग के बारे में सोचने लगते हैं, लेकिन उसे बेहतर बनाने की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। हर प्रोडक्ट या सर्विस अलग-अलग जगहों पर सफल नहीं हो सकती, लेकिन तुलना करने पर हम हर जगह के बारे में बेहतर जान सकते हैं। फिर पहले से मौजूद आइडिया में जरूरी बदलाव कर कुछ नया सोच सकते हैं। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि अपनी रुचि की चीजों के बारे में खूब पढ़िए। कुछ नया सीखने को मिले, तो इसके बारे में लोगों से बातें कीजिए। वे क्या सोचते हैं, यह जानने की कोशिश कीजिए। मन में जो भी विचार आते हैं, उन्हें अमलीजामा पहनाने की कोशिश कीजिए। इनके नतीजे अच्छे न निकलें, तो घबराइए मत, क्योंकि इसके बाद ही अच्छे आइडिया भी आएंगे। बस आपको अपनी क्रिएटिव सोच बनाए रखनी है। 

कार्यक्रम का संचालन विद्यालय की छात्राओं सुश्री अक्षया अनिल कुमार, नंदिनी त्रिवेदी ने किया। कार्यक्रम में 

सहभागी विद्यार्थी में कीर्तना नायर, प्रज्वल राव, अफ़शीन शेक, आकाश, साईं सिद्धार्थ प्रमुख रहे। कार्यक्रम में 

विद्यालय के भिन्न कक्षाओं  विद्यार्थियों ने सहभाग किया।

बुधवार, 7 जुलाई 2021

अजस्र ऊर्जा के स्रोत प्रो. कुठियाला

 

- प्रो. संजय द्विवेदी



     वे हैं तो जिंदगी में भरोसा है, आत्मविश्वास है। हमेशा लगता है, कुछ हुआ तो वे संभाल लेंगें। प्रो. बृजकिशोर कुठियाला की मेरी जिंदगी में जगह एक बॉस से ज्यादा है। वे पितातुल्य हैं, अभिभावक हैं। मेरी उंगलियां पकड़कर जमाने के सामने ला खड़े करने वाले स्नेही मार्गदर्शक हैं। उनके सान्निध्य में काम करने का मुझे अवसर मिला, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में वे मेरे कुलपति रहे।

    यह सन् 2010 की बात है, जब वे हमारे कुलपति बनकर आए। उनके साथ काम करना कठिन था। वे ना आराम करते हैं, न करने देते हैं। उनके लिए कई लोगटफ टास्क मास्टरका शब्द इस्तेमाल करते हैं। यह सच भी है। अपने साढ़े आठ साल के कार्यकाल में उन्होंने हमें बहुत सिखाया। चीजों को तराशा और एक तंत्र खड़ा किया। जब वे भोपाल आए तो उन्हें बहुत विरोधों का सामना करना पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक हो गया। वे जमे और खूब जमे। जमकर काम किया। नए नेतृत्व को विकसित कर उन्हें काम दिया। विश्वविद्यालय को कई दृष्टियों से समृद्ध बनाया। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय को विवि अनुदान आयोग से 12 बी की मान्यता, समस्त कर्मचारियों (दैनिक वेतनभोगी और संविदा) का नियमितीकरण, विश्वविद्यालय की 50 एकड़ भूमि पर परिसर निर्माण उनकी तीन ऐसी उपलब्धियां हैं, जिसे भूलना नहीं चाहिए। भारतीय संचारकों पर पुस्तकों का प्रकाशन, पत्रकारिता और जनसंचार पर केंद्रित पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन, अनेक श्रेष्ठ अकादमिक आयोजन, संगोष्ठियां उनकी उपलब्धि हैं।

    हमारे विचार ही हमारे शब्द बनते हैं और फिर ये शब्द ही हमारे कर्म बनते हैं। प्रो. कुठियाला ने क्रिया की इस गूढ़ मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को अपने जीवन में उतार के दिखाया है। विचार, वाणी और कर्म के संतुलन ने उनके संपूर्ण व्यक्तित्व में विश्वसनीयता एवं प्रभाव की वह दीप्ति पैदा की है, जिससे बचना उनके विरोधियों तक के लिए संभव नहीं है। उन्होंने जो सोचा, वही किया और जो नहीं कर सकते थे, उसके लिए कभी कहा नहीं। शब्द ब्रह्म होता है, यह उन्होंने जीकर दिखाया। शब्द जब आचरण से मंडित होता है, तब वह मंत्र की शक्ति प्राप्त कर लेता है। प्रो. कुठियाला के साथ यही बात साबित होती थी। उनका संपूर्ण जीवन एक प्रकार से अपने अंत:करण के पालन का जीवन रहा है।

     वे एक अप्रतिम प्रशासक हैं। कुशल शिक्षाविद् होने के साथ उनकी प्रशासनिक दक्षता हम सबके सामने है। वे परिणामकेंद्रित योजनाकार हैं। खुद काम करते हुए अपनी टीम को प्रेरित करते हुए वे आगे बढ़ते हैं। आज जब संचार और प्रबंधन की विधाएं एक अनुशासन के रूप में हमारे सामने हैं, तब हमें पता चलता है कि कैसे उन्होंने अपने पूरे जीवन में इन दोनों विधाओं को साधने का काम किया। एक संचारक के रूप में यदि उन्हें समझना है, तो हमें     भारतीयता को समझना होगा। यदि हमें उन्हें जानना है, तो भारतीय आत्मा, संस्कृति और संवाद को समझना होगा। ऊपरी तौर पर जब हम उनके जीवन को देखते हैं, तो वह जीवन अन्य की तुलना में थोड़ा ही बेहतर लगता है, लेकिन जब उसकी ऊपरी परतों को हटाकर उसके गहरे तल तक पहुंचते हैं, तो वही जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं लगता।

      प्रो. कुठियाला की जिंदगी का पाठ बहुत बड़ा है। वे अपने समय के सवालों पर जिस प्रखरता से टिप्पणियां करते हैं, वो परंपरागत संचारकों से उन्हें अलग खड़ा कर देता है। वे 21 देशों में शिक्षा, मीडिया, संस्कृति और सभ्यता के विषय पर भारत की बात कर चुके हैं। वे विश्वमंच पर सही मायने में भारत, उसके अध्यात्म, पुरुषार्थ और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को स्थापित करने वाले नायक हैं। अपने जीवन, लेखन और व्याख्यानों में वे जिस प्रकार की परिपक्वता दिखाते हैं, पूर्णता दिखाते हैं, वह सीखने की चीज है। उनमें नेतृत्व क्षमता, कुशल प्रबंधन के गुर, परंपरा और आधुनिकता का तालमेल दिखता है। वे आधुनिकता से भागते नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल करते हुए नए समय में संवाद को ज्यादा प्रभावकारी बना पाते हैं।

      73 वर्ष की उम्र में भी वे स्वयं को एक तेजस्वी युवा के रूप में प्रस्तुत करते हैं और उनके विचार भी उसी युवा चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शास्त्रीय प्रसंगों की भी ऐसी सरल व्याख्या करते हैं कि उनकी संचार कला अपने आप स्थापित हो जाती है। अपने कर्म, जीवन, लेखन, भाषण और संपूर्ण प्रस्तुति में उनका एक आदर्श प्रबंधक और कम्युनिकेटर का स्वरूप प्रकट होता है। किस बात को किस समय और कितने जोर से कहना है, यह उन्हें पता है। उनका पूरा जीवन कर्मयोग की मिसाल है। उनका नाम सुनते ही भारतीय शिक्षा पद्धति और भारतीय संस्कृति की गौरवान्वित छवि हमारी आंखों के सामने आ जाती है।

      एक संचारक की दृष्टि से प्रो. कुठियाला का नाम उन लोगों में शामिल है, जो बेहद सरल और सहज शब्दों में अपनी बात रखते हैं। जब हम एक कुशल संचारक को किसी कसौटी पर परखते हैं, तो संवाद और प्रतिसंवाद की बात करते हैं, लेकिन प्रो. कुठियाला की संचार कला में बात संवाद और प्रतिसंवाद की नहीं है, बल्कि बात प्रभाव की है, और उसमें वे लाजवाब हैं। इस संसार में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो अपने जीवनकाल में एक उदाहरण बन जाते हैं। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण अनुकरणीय और प्रेरणादायी होता है। प्रो. कुठियाला का पूरा जीवन ही राष्ट्रीय विचारों के लिए समर्पित रहा है। आज की पीढ़ी के लिए उनका जीवन दर्शन एक विचार है। अपने जीवन में उन्होंने समाज के अनेक क्षेत्रों में मौन तपस्वी की भांति अनथक कार्य किया है और हर जगह आत्मीय संबंध जोड़े हैं। उनका हर कार्य, यहां तक कि प्रत्येक शब्द एक प्रेरणा है। तन समर्पित, मन समर्पित और ये जीवन समर्पित...की राह को अंगीकार करने वाले प्रो. कुठियाला ने अपने आलेखों के माध्यम से समाज जीवन और लेखकों को जो दिशा प्रदान की, उसका जीवंत उदाहरण आज कई युवा पत्रकारों के लेखन में भी दिखाई दे रहा है। मेरे जैसे लेखक ने उनके लेखों को कई-कई बार पढ़कर दिशा प्राप्त की है। उनका अकाट्य लेखन कोई कागजी लेखन नहीं माना जा सकता, वे हर लेख को जीवंतता के साथ लिखते हैं। जैसे भाग्य का लिखा हुआ कोई मिटा नहीं सकता, वैसे ही उनके लेखन की जीवंतता को कोई मिटा नहीं सकता।

     अगर हम प्रो. कुठियाला को आधुनिक पत्रकारिता को दिशा प्रदान करने वाला साधक कहें, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि उनके लेखन में पूरे भारत का दर्शन होता है। उनकी जीवन कथा में संघर्ष है, राष्ट्रप्रेम है, समाजसेवा का भाव और लोकसंग्रह की कुशलता भी है। उनका जीवन खुला काव्य है, जो त्याग, तपस्या व साधना से भरा है। उन्होंने अपने को समष्टि के साथ जोड़ा और व्यष्टि की चिंता छोड़ दी। देखने में वे साधारण हैं, पर उनका व्यक्तित्व असाधारण है। एक पत्रकार और मीडिया शिक्षक होने के नाते अगर मुझे कहना हो, तो मैं उन्हें पत्रकारीय ज्ञान और आचार संहिता का साक्षात विश्वविद्यालय कहूंगा।

      पहचान और प्रतिष्ठा केवल प्रोफेशन, सेंसेशन और इंटेंशन से ही अर्जित नहीं की जाती है, बल्कि ईमानदारी, सादगी और ध्येयनिष्ठा ही किसी जीवन को टिकाऊ और अनुकरणीय बनाते हैं। प्रो. कुठियाला पत्रकारिता शिक्षा के इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो स्वार्थ नहीं, बल्कि सरोकारों और सत्यनिष्ठा के प्रतिमानों पर खड़ा है। उनके व्यक्तित्व का फलक इतना व्यापक है, जिसमें आप एक पत्रकार, शिक्षक, प्रबंधक, समाजकर्मी और गृहस्थ का अक्स पूरी प्रखरता से चिन्हित कर सकते हैं। उनके व्यक्तित्व का एक अहम पक्ष उनकी राष्ट्र आराधना में समर्पण का भी है। उन्होंने जो लिखा या कहा, उसे खुद के जीवन में उतारकर दिखाया।

    प्रो. कुठियाला एक व्यक्ति नहीं, विचार हैं, केवल पत्रकारिता के लिए नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों के लिए भी, भारतबोध के लिए भी, हमारी सामाजिक प्रतिबद्धताओं के लिए भी, जिनसे होकर समकालीन पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षा गुजरती है। जो व्यक्ति उच्च आयामों के साथ दूसरों की चिंता करते हुए जीवन का संचालन करता है, उसका जीवन समाज को प्रेरणा तो देता ही है, साथ ही समाज के लिए वंदनीय बन जाता है। प्रो. कुठियाला का ध्येयमयी जीवन हम सबके लिए एक ऐसा पथ है, जो जीवन को अनंत ऊंचाइयों की ओर ले जाने में समर्थ है।






मंगलवार, 15 जून 2021

पत्रकारिता की उजली परंपरा के वाहक

 

75 वीं वर्षगांठ (18 जून) पर विशेष

स्वदेश कुल की वैचारिक पत्रकारिता के कुलपति हैं राजेंद्र शर्मा

-प्रो.संजय द्विवेदी



      उनका हमारे बीच होना उस उम्मीद और आत्मविश्वास का होना है कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। पत्रकारिता के छीजते आभामंडल, प्रश्नांकित हो रही विश्वसनीयता और बाजार की तेज हवाओं के बीच जब विचार की पत्रकारिता सहमी हुई है तभी वे एक प्रकाशपुंज की तरह हमारे सामने आते हैं। बात स्वदेश समाचार पत्र समूह, भोपाल के प्रधान संपादक श्री राजेंद्र शर्मा की हो रही है। 18 जून,1946 को उज्जैन जिले के बड़नगर में जन्में श्री शर्मा इस समय स्वदेश के छह संस्करणों की कमान संभाल रहे हैं। इस कठिन समय में वे ही हैं, जो डटे हुए हैं और विचार की पत्रकारिता की मशाल को थामे हुए हैं। तमाम आदर्शों के आत्मसमर्पण के बाद भी वे न जाने किस विश्वास पर अपने उस विचार पर डटे हैं, जो उन्होंने अपनी युवा अवस्था में अपनाया था। उन्होंने रिश्ते बनाए, नाम कमाया किंतु समझौतों से उन्हें परहेज रहा। कठिन मार्ग ही उन्हें भाता है और वे उस पर ही चलते आ रहे हैं। सच कहने और लिखने की सजा भी भुगतते रहे हैं और अनेक साथियों से पीछे रह जाने का भी उन्हें कोई अफसोस नहीं है। ऐसे लोग ही किसी भी समय के नायक होते हैं और उनका होना हमेशा हमें प्रेरित करता है। अपनी सरलता,सहज स्नेह से किसी को भी अपना बना लेने वाले राजेंद्र जी सही मायने में अजातशत्रु हैं। पत्रकारिता में एक खास विचारधारा से जुड़े होकर काम करने के बाद भी उनका कोई शत्रु नहीं है, प्रतिद्वंदी नहीं है, आलोचक नहीं है। वे अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने वाले व्यक्ति हैं और शायद इसीलिए भोपाल ही नहीं देश की पत्रकारिता के शिखर संपादकों की सूची में उन्हें बड़े सम्मान से देखा जाता है।

विचारधारा के प्रति अविचल आस्थाः

    सभी राजनीतिक दलों के शिखर पुरुषों से उनके रिश्ते हैं, घर आना-जाना है, किंतु विचारधारा के साथ वे कभी समझौता करते नहीं देखे गए। उनका अखबार कम छपे, कम बिके पर अपनी राह चलता है। उस प्रवाह के साथ जिसे आदरणीय दीनदयालजी, अटल जी, माणिकचंद्र वाजपेयी जी जैसे तपस्वी पत्रकारों ने गढ़ा था। उन्हें पता है कि जब विचार की ही पत्रकारिता कठिन है तो विचारधारा का मार्ग तो और भी कठिन है। बाजार में उतर गई और कारपोरेट बनने को आतुर मीडिया समय में वे एक कठिन संकल्प के साथ हैं। स्वदेश समाचार पत्र समूह की विचारधारा स्पष्ट है और उसके लक्ष्य सबके सामने हैं। अपना अखबार होने के नाते उसके अपने भी उसकी बहुत परवाह नहीं करते फिर विरोधी क्यों करेंगें? ऐसा नहीं है कि देश में विचारधारा आधारित अखबारों की कोई परंपरा नहीं है। बावजूद इसके वर्तमान में ऐसे अखबारों को चलाना और स्पर्धा में बनाए रखना कठिन है। ऐसे अखबार इस मनोरंजक,नकारात्मक और जुगुत्सा जगाने वाली खबरों की पत्रकारिता के समय में अपने कंटेंट के नाते स्वयं ही स्पर्धा से बाहर हो जाते हैं। उनका वैचारिक आग्रह ही उन पर भारी पड़ता है। केरल में माकपा के मुखपत्र पीपुल्स डेली, बंगाल के पीपुल्स डेमोक्रेसी, कांग्रेस के नवजीवन, नेशनल हेराल्ड, कौमी आवाज, शिवसेना के सामना और दोपहर का सामना जैसे अखबारों की ओर देखें तो पता चलता है कि विचारधारा आधारित पत्र अपने कैडर तक भी नहीं पहुंच पाते। अगर विचारधारा और राजनीतिक प्रशिक्षण पर जोर दिया जाता तो निश्चय ही इन अखबारों की अपनी उपस्थिति बन पाती। सच तो यह है कि अगर ये अखबार विवादित और तेवर भरी टिप्पणियां न करें तो उनका उल्लेख भी नहीं होता। इन स्थितियों के बीच भी मध्यप्रदेश में अगर स्वदेश की आवाज कही और सुनी गयी तो इसके पीछे इसके यशस्वी संपादकों की परंपरा और समाज जीवन में उनकी गहरी उपस्थिति के कारण ही हो पाया। श्री माणिकचंद्र वाजपेयी मामा जी, श्री जयकृष्ण गौड़, श्री जयकिशन शर्मा, श्री बलदेव भाई शर्मा, श्री भगवतीधर वाजपेयी, श्री बबन प्रसाद मिश्र ( युगधर्म)  जैसे अनेक नाम इसके उदाहरण हैं। इसी परंपरा का सबसे प्रासंगिक नाम श्री राजेंद्र शर्मा का है, जिन्होंने पिछले पांच दशक से मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में अपनी यशस्वी पत्रकारिता के पदचिन्ह छोड़े हैं।

स्वदेश की विस्तार यात्रा के सारथीः

  श्री राजेंद्र शर्मा का पिंड पत्रकार का है,लेखक का है , संपादक का है। बावजूद इसके वे चुनौतियों से भागने वाले व्यक्ति नहीं हैं। एक सफल संपादक के नाते ग्वालियर में उनकी ख्याति हम सब जानते हैं। बावजूद इसके पत्रकार-संपादक होते हुए भी उन्होंने न सिर्फ प्रबंधन की जिम्मेदारियां संभाली, वरन स्वदेश के विस्तार की सफल योजनाएं बनाईं। जिसके चलते स्वदेश ग्वालियर और इंदौर से आगे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का प्रमुख पत्र बन सका। उसकी आवाज और उपस्थिति पूरे संयुक्त मध्यप्रदेश में महसूस की जाने लगी। आज ई-माध्यमों की उपस्थिति के बाद स्वदेश के सभी संस्करणों की वैश्विक उपस्थिति है। इसके लेख, समाचार और विचार वेबसाइट के माध्यम से दुनिया भर में पढ़े जाते हैं, जिनकी खबरों और लेखों को सुधी पाठक सोशल मीडिया पर शेयर करते रहते हैं। यह राजेंद्र जी का ही करिश्मा है कि उन्होंने स्वदेश के संपादकीय पृष्ठ को कभी प्राणहीन नहीं होने दिया। देश के शिखर संपादक और लेखक स्वदेश के संपादकीय पृष्ठ पर अपने विचारों से विमर्श के नित नए बिंदु देते हैं, जिससे लोकमत निर्माण का पत्रकारीय उद्देश्य पूर्ण होता है। बावजूद इसके प्रबंधन में उनकी व्यस्तता ने उनके मूल काम(लेखन) को प्रभावित किया है, इसमें दो राय नहीं है। प्रबंधन में उनकी गहरी संलग्नता न होती तो आज वे देश के श्रेष्ठतम लेखकों में गिने जाते। जिन्होंने उनकी आलंकारिक भाषा, साहसी कलम, गहरी सामाजिक संलग्नता से निकली अभिव्यक्ति देखी है, वे मानेंगें कि राजेंद्र जी अपने को जिस तरह और जितना अभिव्यक्त कर सकते थे, नहीं कर पाए। कहा भी जाता है कि संपादन का कर्म आपके व्यक्तिगत लेखन को खा जाता है। यहां तो राजेंद्र जी संपादन और प्रबंधन दोनों को साधते दिखते हैं, सो उनका लेखन तो इससे प्रभावित होना ही था। बावजूद इसके उनकी अन्य उपलब्धियां कम नहीं हैं, जो उन्हें हमारे समाज में आदर्श के रूप में प्रस्तुत करती हैं।

अप्रतिम संपादक, संदर्भों के सृजनकारः

   श्री राजेंद्र शर्मा एक दैनिक अखबार के संपादक तो हैं ही, साथ ही संदर्भों के सृजनहार भी हैं। उनके संपादन में जो पुस्तकें निकली हैं, उनका मूल्यांकन होना अभी शेष है। स्वदेश के विविध विषयों पर निकले विशेषांक अलग से समीक्षा और समालोचना की मांग करते हैं। इन सभी विशेषांकों का ऐतिहासिक महत्त्व है. क्योंकि ये पहली बार किसी भी व्यक्तित्व पर एकत्र की गयी अप्रतिम संदर्भ सामग्री है। मुझे लगता है श्री अटलविहारी वाजपेयी अमृत महोत्सव विशेषांक, राजमाता सिंधिया पुण्य स्मरण विशेषांक, लालकृष्ण आडवाणीः व्यक्ति और विचार, राष्ट्रऋषि गुरूजी, सुदर्शन स्मृति, भाजपा रजत जयंती विशेषांक, स्वामी विवेकानंद विशेषांक, माणिकचंद्र वाजपेयी विशेषांक, प्यारेलाल खंडेलवाल विशेषांक,जनादेश विशेषांक, आओ बनाएं अपना मध्यप्रदेश, विश्वसनीय छत्तीसगढ़, जननायक (श्री नरेंद्र मोदी पर एकाग्र) को जिन्होंने न देखा हो, उन्हें इन ग्रंथों/विशेषांकों को पलटकर देखना चाहिए। इसके साथ ही कर्इ वर्षों तक आप मध्यप्रदेश संदर्भ का भी संपादन- प्रकाशन करते रहे। ये सभी ग्रंथ सिर्फ विशेषांक नहीं हैं, एक पूर्ण संदर्भ ग्रंथ हैं। अफसोस है कि इस महत्त्वपूर्ण प्रदेय की उतनी चर्चा नहीं हुई, जैसी होनी चाहिए। जिद के धनी राजेंद्र जी इन ग्रंथों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देते हैं। ये सारे ग्रंथ(विशेषांक) महाकाय हैं। ग्लेज पेपर पर बहुत सुंदर प्रिंटिग के साथ छपे हैं, जिसे देखकर ही इनकी गुणवत्ता का पता चलता है। उनका यह प्रदेय निश्चित ही रेखांकित किया जाना चाहिए। किसी भी समाचार पत्र द्वारा ऐसे ग्रंथों का प्रकाशन एक अद्भुत घटना है, क्योंकि समाचार पत्र समूह प्रायः उन्हीं संदर्भों पर विशेषांक छापते हैं, जिनसे व्यावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति होती है। इस अर्थ में राजेंद्र जी के विषय चयन और उसकी प्रस्तुति सराहनीय है।

सामाजिक सरोकारों से जुड़ा जीवनः

  संपादक- प्रबंधक की आसंदी व्यस्तता की पराकाष्ठा है। इसके बीच भी राजेंद्र शर्मा सामाजिक सरोकारों, सामाजिक आंदोलनों, तमाम विधाओं के संगठनों से जुड़कर अपना सामाजिक उत्तरदायित्व भी निभाते हैं। वे सही अर्थों में सरोकारी, जीवंत और लोकाचारी व्यक्तित्व हैं। वे भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों की प्रतिनिधि संस्था इंडियन लैंग्वेज न्यूज पेपर एसोसिएशन(इलना) के दो बार अध्यक्ष रहे, ग्वालियर के श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष रहे। वे उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के उपाध्यक्ष भी रहे। ग्वालियर प्रेस क्लब के संस्थापक अध्यक्ष होने के साथ आप अखिलभारतीय संपादक सम्मेलन से भी जुड़े रहे। इसके साथ ही मप्र समाचार पत्र संघ, मप्र प्रेस सलाहकार परिषद, मप्र रेडक्रास सोसाइटी, मप्र अधिमान्यता समिति, मप्र पत्रकार कल्याण कोष, डीएवीपी की प्रेस एडवाइजरी कमेटी, श्रम सलाहकार परिषद, समाचार पत्र संचालकों की संस्था आईएनएस जैसे संगठनों में उनकी सक्रियता उनकी सामाजिक उपस्थिति का प्रमाण है। सबको पता है कि राजेंद्र जी के व्यक्तित्व को रचने और गढ़ने वाले संगठन का नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है, जिसके संपर्क में वे बाल्यकाल में ही आ गए थे। इसी भावधारा के चलते वे 25 वर्षों तक विश्व हिंदू परिषद, मध्यभारत प्रांत के अध्यक्ष रहे। मानस भवन, भोपाल और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से भी वे अनेक दायित्वों से जुड़े रहे हैं। उन्हें उप्र हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा पत्रकारिता भूषण, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान से भी अलंकृत किया गया है।

मेरे गुरु, मेरे अभिभावकः

    श्री राजेंद्र शर्मा की मेरे जीवन में बहुत खास जगह है। वे मेरे लिए पितातुल्य तो हैं ही, मेरे पत्रकारिता गुरू और अभिभावक भी हैं। उनकी स्नेहछाया में ही मैंने पत्रकारिता की मैदानी दीक्षा ली और उन्होंने बहुत कम आयु में ही श्री हरिमोहन शर्मा जी की संस्तुति पर मुझे अखबार का संपादक बना दिया। यह भरोसा साधारण नहीं था। उनके इस कदम से मुझमें अतिरिक्त आत्मविश्वास भी पैदा हुआ और पत्रकारिता के क्षेत्र में मैं कुछ कर सका। उनकी प्रेरणा, प्रोत्साहन और संरक्षण ने मेरी जिंदगी की हर कठिनाई का अंत ही नहीं किया, वरन विजेता भी बनाया। आपकी जिंदगी में जब ऐसे स्नेही अभिभावक होते हैं तो आपके लिए हर मंजिल आसान हो जाती है। आज भी वे मुझे बहुत उम्मीदों से देखते हैं। उनका यह भरोसा बचा और बना रहे इसके लिए मैं भी सतत कोशिशें भी करता हूं। उनका मार्गदर्शन और स्नेह पितृछाया की तरह ही है, जो आपको जीवन के झंझावातों से जूझने के लिए हौसला देती है। राजेंद्र जी का असली सच यह है कि वे एक वैचारिक योद्धा हैं जिन्होंने अपने जैसे न जाने कितने विचारवंत संपादक-पत्रकार तैयार किए हैं। स्वदेश को वैचारिक पत्रकारिता की नर्सरी यूं ही नहीं कहा जाता। स्वदेश में प्रशिक्षण प्राप्त कर अनेक संपादक और पत्रकार अपने क्षेत्र में यशस्वी हैं, उनकी प्रगति और ख्याति निश्चित ही राजेंद्र जी के लिए संतोष का बड़ा कारण है। श्री अक्षत शर्मा उनके सुयोग्य पुत्र और सक्षम उत्तराधिकारी हैं। अक्षत जी ने अपने पिता का सौंदर्य, आकर्षक व्यक्तित्व, सरलता, सहजता और सौजन्य पाया है। वे स्वदेश कुल को निश्चित ही आगे लेकर जाएंगें। स्वदेश कुल का शिक्षार्थी होने के नाते मैं स्वयं को गौरवशाली मानता हूं। साथ ही कामना करता हूं कि स्वदेश कुल के कुलपति श्री राजेंद्र शर्मा यूं ही हम सबको दिशाबोध कराते रहें। उनके स्वस्थ-सानंद व सुदीर्घ जीवन की मंगलकामनाएं, प्रार्थनाएं।

(लेखक भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक और वरिष्ठ पत्रकार हैं। स्वदेश, भोपाल और रायपुर संस्करणों से जुड़े रहे श्री द्विवेदी के श्री राजेंद्र शर्मा से पारिवारिक और आत्मीय रिश्ते हैं।)



शुक्रवार, 28 मई 2021

कोरोना संकट में संबल बनी पत्रकारिता

हिंदी पत्रकारिता दिवस (30 मई) पर विशेष

-प्रो.संजय द्विवेदी

      कोविड-19 के दौर में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाते हुए हम तमाम प्रश्नों से घिरे हैं। अंग्रेजी पत्रकारिता ने अपने सीमित और विशेष पाठक वर्ग के कारण अपने संकटों से कुछ निजात पाई है। किंतु भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के भी संकट जस के तस खड़े हैं। कोरोना संकट ने प्रिंट मीडिया को जिन गहरे संकटों में डाला है और उसके सामने जो प्रश्न उपस्थित किए हैं,उस पर संवाद जरूरी है। 30 मई,1826 को जब पं.युगुल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से हिंदी के पहले पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया तब से लेकर प्रिंट मीडिया ने अनेक दौर देखे हैं। वे दौर तात्कालिक संकटों के थे और टल गए। अंग्रेजों के दौर से लेकर आजाद भारत में आपातकाल के दिनों से भी उसने जूझकर मुक्ति पाई। किंतु नए कोरोना संकट ने अभूतपूर्व दृश्य देखें हैं। आगे क्या होगा इसकी इबारत अभी लिखी जानी है।

     कोरोना ने हमारी जीवन शैली पर निश्चित ही प्रभाव डाला है। कई मामलों में रिश्ते भी दांव पर लगते दिखे। रक्त संबंधियों ने भी संकट के समय मुंह मोड़ लिया, ऐसी खबरें भी मिलीं। सही मायने में यह पूरा समय अनपेक्षित परिर्वतनों का समय है। प्रिंट मीडिया भी इससे गहरे प्रभावित हुआ। तरह-तरह की अफवाहों ने अखबारों के प्रसार पर असर डाला। लोगों ने अखबार मंगाना बंद किया, कई स्थानों पर कालोनियों में प्रतिबंध लगे, कई स्थानों वितरण व्यवस्था भी सामान्य न हो सकी। बाजार की बंदी ने प्रसार संख्या को प्रभावित किया तो वहीं अखबारों का विज्ञापन व्यवसाय भी प्रभावित हुआ। इससे अखबारों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। इसका परिणाम अखबारों के पेज कम हुए, स्टाफ की छंटनी और वेतन कम करने का दौर प्रारंभ हुआ। आज भी तमाम पाठकों को वापस अखबारों की ओर लाने के जतन हो रहे हैं। किंतु इस दौर में आनलाईन माध्यमों का अभ्यस्त हुआ समाज वापस लौटेगा यह कहा नहीं जा सकता।

    सवा साल के इस गहरे संकट की व्याख्या करने पर पता चलता है कि प्रिंट मीडिया के लिए आगे की राहें आसान नहीं है। विज्ञापन राजस्व तेजी से टीवी और  डिजीटल माध्यमों पर जा रहा है,क्योंकि लाकडाउन के दिनों में यही प्रमुख मीडिया बन गए हैं। तकनीक में भी परिर्वतन आया है। जिसके लिए शायद अभी हमारे प्रिंट माध्यम उस तरह से तैयार नहीं थे। इस एक सवा साल की कहानियां गजब हैं। मौत से जूझकर भी खबरें लाने वाला मैदानी पत्रकार है, तो घर से ही अखबार चला रहा डेस्क और संपादकों का समूह भी है। किसे भरोसा था कि समूचा न्यूज रूम आपकी मौजूदगी के बिना, घरों से चल सकता है। नामवर एंकर घरों पर बैठे हुए एंकरिंग कर पाएंगें। सारे न्यूज रूम अचानक डिजीटल हो गए। साक्षात्कार ई-माध्यमों पर होने लगे। इसने भाषाई पत्रकारिता के पूरे परिदृश्य को प्रभावित किया है। जो परिवर्तन वर्षों में चार-पांच सालों में घटित होने थे, वे पलों में घटित होते दिखे। तमाम संस्थाएं इसके लिए तैयार नहीं थीं। कुछ का मानस नहीं था। कुछ सिर्फ ईपेपर और ई-मैगजीन निकाल रहे हैं। बावजूद इसके भरोसा टूटा नहीं है। हमारे सामाजिक ढांचे में अखबारों की खास जगह है और छपे हुए शब्दों पर भरोसा भी कायम है। इसके साथ ही अखबार को पढ़ने में होनी वाली सहूलियत और उसकी अभ्यस्त एक पीढ़ी अभी भी मौजूद है। कई बड़े अखबार मानते हैं कि इस दौर में उनके अस्सी प्रतिशत पाठकों  की वापसी हो गयी है, तो ग्रामीण अंचलों और जिलों में प्रसारित होने वाले मझोले अखबार अभी भी अपने पाठकों की वापसी का इंतजार कर रहे हैं। वे मानते हैं कि उनके भी 40 प्रतिशत पाठक तो लौट आए हैं, बाकी का इंतजार है। नई पीढ़ी का ई-माध्यमों पर चले जाना चिंता का बड़ा कारण है। वैसे भी डिजीटल ट्रांसफामेशन की जो गति है, वह चकित करने वाली है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि डिजीटल का सूरज कभी नहीं डूबता और वह 24X7 है।

     ऐसे कठिन समय में भी बहुलांश में पत्रकारिता ने अपने धर्म का निर्वाह बखूबी किया है। स्वास्थ्य, सरोकार और प्रेरित करने वाली कहानियों के माध्यम से पत्रकारिता ने पाठकों को संबल दिया है। निराशा और अवसाद से घिरे समाज को अहसास कराया कि कभी भी सब कुछ खत्म नहीं होता। संवेदना जगाने वाली खबरों और सरोकारों से जुड़े मुद्दों को अहमियत देते हुए आज भी पत्रकारिता अपना धर्म निभा रही है। संकट में समाज का संबल बनकर मीडिया नजर आया। कई बार उसकी भाषा तीखी थी, तेवर कड़े थे, किंतु इसे युगधर्म कहना ठीक होगा। अपने सामाजिक दायित्वबोध की जो भूमिका मीडिया ने इस संकट में निभाई, उसकी बानगी अन्यत्र दुर्लभ है। जागरूकता पैदा करने के साथ, विशेषज्ञों से संवाद करवाते हुए घर में भयभीत बैठे समाज को संबल दिया है। लोगों के लिए आक्सीजन, अस्पताल ,व्यवस्थाओं के बारे में जागरूक किया है। हम जानते हैं मनुष्य की मूल वृत्ति आनंद और सामाजिक ताना-बाना है। कोविड काल ने इसी पर हमला किया। लोगों का मिलना-जुलना, खाना-पीना, पार्टियां, होटल, धार्मिक स्थल, पर्व -त्यौहार, माल-सिनेमाहाल सब सूने हो गए। ऐसे दृश्यों का समाज अभ्यस्त कहां है? ऐसे में मीडिया माध्यमों ने उन्हें तरह-तरह से प्रेरित भी किया और मुस्कुराने के अवसर भी उपलब्ध कराए। इस दौर में मेडिकल सेवाओं, सुरक्षा सेवाओं, सफाई- स्वच्छता के अमले के अलावा बड़ी संख्या में अपना दायित्व निभाते हुए अनेक पत्रकार भी शहीद हुए हैं। अनेक राज्य सरकारों ने उन्हें फ्रंटलाइन वर्कर मानते हुए आर्थिक मदद का ऐलान किया है। केंद्र सरकार ने भी शहीद पत्रकारों के परिजनों को 5 लाख रूपए प्रदान करने की घोषणा की है। ऐसे तमाम उपायों के बाद भी पत्रकारों को अनेक मानसिक संकटों,वेतन कटौती और नौकरी जाने जैसे संकटों से भी गुजरना पड़ा है। बावजूद इसके अपने दायित्वबोध के लिए सजग पत्रकारों के उदाहरण बिखरे पड़े हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह संकट टलेगा और जिंदगी फिर से मुस्कुराएगी।