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गुरुवार, 19 मई 2016

अपनी भूमिका पर पुर्नविचार करें राष्ट्रीय दल

क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव से अखिलभारतीयता की भावना प्रभावित होगी
-संजय द्विवेदी

  अब जबकि आधा से ज्यादा भारत क्षेत्रीय दलों के हाथ में आ चुका है तो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे नए सिरे से अपनी भूमिका का विचार करें। भारत की सबसे पुरानी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, दोनों प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियां और भारतीय जनता पार्टी आम तौर पर पूरे भारत में कम या ज्यादा प्रभाव रखती हैं। उनकी विचारधारा उन्हें अखिलभारतीय बनाती है भले ही भौगोलिक दृष्टि से वे कहीं उपस्थित हों, या न हों। आज जबकि भारतीय जनता पार्टी ने असम के बहाने पूर्वोत्तर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा ली है और अरूणाचल की सत्ता में भागीदार बन चुकी है, तब भी तमिलनाडु, पांडिचेरी जैसे राज्य में उसका खाता भी न खुलना चिंता की बात है।
    केंद्र की सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ आई भारतीय जनता पार्टी असम में अपनी सफलता के साथ खुश हो सकती है, किंतु उसे यह विचार करना ही चाहिए कि आखिर क्षेत्रीय दलों का ऐसा क्या जादू है कि वे जहां हैं, वहां किसी राष्ट्रीय दल को महत्व नहीं मिल रहा है। भाजपा ने जिन प्रदेशों में सत्ता पाई है, कमोबेश वहां पर कांग्रेस की सरकारें रही हैं। क्षेत्रीय दलों की अपील, उनके स्थानीय सरोकारों, नेतृत्व का तोड़ अभी राष्ट्रीय दलों को खोजना है। भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, झारखंड में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई है। इनमें महाराष्ट्र और झारखंड को छोड़कर कहीं क्षेत्रीय दलों की प्रभावी मौजूदगी नहीं है। क्षेत्रीय क्षत्रपों की स्वीकृति और उनके जनाधार में सेंध लगा पाने में राष्ट्रीय राजनीतिक दल विफल रहे हैं। जयललिता, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू, नीतिश कुमार, अखिलेश और मुलायम सिंह यादव, महबूबा मुफ्ती के जनाधार को सेंध लगा पाने और चुनौती देने में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को पसीना आ रहा है। राष्ट्रीय दल या तो किसी क्षेत्रीय दल की बी टीम बनकर रहें या उस राज्य में खुद को समाप्त कर लें।  जैसे बिहार और पश्चिम बंगाल में राजनीतिक गठबंधनों में शामिल होने का लाभ कांग्रेस को मिला, वरना वह दोनों राज्यों से साफ हो सकती थी। इसी तरह भाजपा को भी पंजाब, कश्मीर और अरूणाचल में क्षेत्रीय दलों के साथ सरकार में शामिल होकर अपनी मौजूदगी जताने का अवसर मिला है। भाजपा ने तेजी से कांग्रेस की छोड़ी जमीन पर कब्जा जमाया है, किंतु क्षेत्रीय दलों के लिए वह कोई बड़ी चुनौती नहीं बन पा रही है। वामपंथी दल तो अब केरल, पं. बंगाल और त्रिपुरा तीन राज्यों तक सिमट कर रह गए हैं।
   क्षेत्रीय दलों का बढ़ता असर इस बात से दिखता है कि कश्मीर से लेकर नीचे तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों के ताकतवर मुख्यमंत्री नजर आते हैं। इन मुख्यमंत्रियों के प्रति उनके राज्य की जनता का सीधा जुड़ाव, स्थानीय सवालों पर इनकी संबद्धता, त्वरित फैसले और सुशासन की भावना ने उन्हें ताकतवर बनाया है। चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता इसी श्रेणी में आते हैं। ममता बनर्जी का अकेले दम पर दो बार सत्ता में वापस होना, यही कहानी बयान करता है। उड़िया में संवाद करने में आज भी संकोची नवीन पटनायक जैसे नेता राष्ट्रीय दलों के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
   ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्षेत्रीय दलों का बढ़ता असर क्या भारतीय राजनीति को प्रभावित करेगा और राष्ट्रीय दलों की हैसियत को कम करेगा। अथवा ताकतवर मुख्यमंत्रियों का यह कुनबा आगामी लोकसभा चुनाव में कोई चुनौती बन सकता है। शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने तो कहा ही है कि क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय राजनीति में अपनी बड़ी भूमिका के लिए तैयार हों। कल्पना करें कि नीतिश कुमार, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, जयललिता, चंद्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, अरविंद केजरीवाल जैसे नेता अगर किसी तीसरे मोर्चे या वैकल्पिक मोर्चे की ओर बढ़ते हैं, तो उसके क्या परिणाम आ सकते हैं। इसमें भाजपा का लाभ सिर्फ यह है कि वह केंद्र की सत्ता में है और राज्यों को केंद्र से मदद की हमेशा दरकार रहती है। ऐसे में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर भाजपा इन दलों को एकजुट होने देने में बाधक बन सकती है या फिर उन्हें एडीए के कुनबे में जोड़ते हुए केंद्र सरकार के साथ जोड़े रख सकती है। बहुत संभावना है कि आने वाले आम चुनावों तक हम ऐसा कुछ होता देख पाएं। इसके साथ ही यह भी संभावित है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने सलाहकारों से यह कहें कि वे एनडीए का कुनबा बढ़ाने पर जोर दें। किंतु यह सारा कुछ संभव होगा पंजाब और उत्तर प्रदेश के परिणामों से।
   पंजाब और उत्तर प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों का बहुत कुछ दांव पर नहीं है, किंतु इन दो राज्यों के चुनाव परिणाम ही भावी राजनीति की दिशा तय करेगें और 2019 के लोकसभा चुनाव की पूर्व पीठिका भी तैयार करेगें। नीतिश कुमार के संघमुक्त भारत के नारे की अंतिम परिणति भी उप्र और पंजाब के चुनाव के परिणामों के बाद पता चलेगी। देखना यह भी होगा कि इन दो राज्यों में भाजपा अपना वजूद किस तरह बनाती और बचाती है। उप्र के लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता के बाद वहां हुए सभी चुनावों और उपचुनावों में भाजपा को कोई बहुत बड़ी सफलता नहीं मिली है। उप्र का मैदान आज भी सपा और बसपा के बीच बंटा हुआ दिखता है। ऐसे में असम की जीत से उर्जा लेकर भाजपा संगठन एक बार फिर उप्र फतह के ख्वाब में है। इसके साथ पंजाब में अकाली दल-भाजपा गठबंधन के सामने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की चुनौती भी है। इस त्रिकोणीय संघर्ष में किसे सफलता होगी कहा नहीं जा सकता। कुल मिलाकर आने वाला समय राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ी चुनौती है। खासकर कांग्रेस के लिए यह समय गहरे संकट का है, जिसे स्थानीय नेतृत्व के बजाए आज भी गांधी परिवार पर ज्यादा भरोसा है।

   कांग्रेस जैसे बड़े राष्ट्रीय दल की सिकुड़न और कमजोरी हमारे लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है। क्योंकि राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का क्षरण दरअसल राजनीति में अखिलभारतीयता के प्रवाह को भी बाधित करता है। इसके चलते क्षेत्रीय राजनीति के स्थानीय सवाल राष्ट्रीय मुद्दों से ज्यादा प्रभावी हो जाते हैं। केंद्रीय सत्ता पर क्षेत्रीय दलों का अन्यान्न कारणों से दबाव बढ़ जाता है और फैसले लेने में मुश्किलें आती हैं। सब कुछ के बाद भी क्षेत्रीय राजनीतिक दल अपने स्थानीय नजरिए से उपर नहीं उठ पाते और ऐसे में राष्ट्रीय मुद्दों से समझौता भी करना पड़ता है। ध्यान दें, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 23 दलों की सम्मिलित उपस्थिति के नाते उसे कितने तरह के दबावों से जूझना पड़ा था और अच्छी नीयत के बाद भी उस सरकार का समग्र प्रभाव नकारात्मक ही रहा। यह अच्छी बात है कि वर्तमान सरकार को केंद्र में अपने दम पर बहुमत हासिल है किंतु आने वाले समय में यह स्थितियां बनी रहें, यह आवश्यक नहीं है। ऐसे में सभी राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों की राजनीति से सीखना होगा। स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा करते हुए, स्थानीय सवालों-मुद्दों और जनभावना के साथ स्वयं को रूपांतरित करना होगा। बिहार और दिल्ली की हार के बाद भाजपा ने असम में यह बात समझी और कर दिखाई है। यह समझ और स्थानीय सरोकार ही राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को खोयी हुयी जमीन दिला सकते हैं। इससे लोकतंत्र और राजनीति में अखिलभारतीयता की सोच दोनों को शक्ति मिलेगी।

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

सामाजिक न्याय की ताकतों की लीलाभूमि पर आखिरी जंग

मोदी इफेक्ट से घबराए समाजवादियों की एकता कितनी टिकाऊ होगी
-संजय द्विवेदी

  मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में पुराने जनता दल के साथियों का साथ आना बताता है कि भारतीय राजनीति किस तरह मोदी इफेक्ट से मुकाबिल है। प्रधानमंत्री होने के बाद भी जारी नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोकने के लिए हो रही यह कवायद बताती है कि समाजवादियों ने भविष्य के संकेत पढ़ लिए हैं और एकजुट होने लगे हैं। कभी एक रहे ये साथी जानते हैं कि वे साथ नहीं आए तो खत्म हो जाएंगें।
   उन्हें एकजुट करने के लिए बिहार, उप्र और हरियाणा के चुनावी परिणाम कारण बने हैं। उप्र और बिहार में जिस तरह लोकसभा चुनावों में भाजपा की आंधी चली उसमें जनता परिवार के पैर उखड़ गए। मुलायम अपने परिवार के अलावा कुछ हासिल न कर सके तो जेडीयू ही हालत भी खस्ता हो गयी। उत्तर प्रदेश और बिहार से ऐसे परिणामों की आस खुद भाजपा को भी नहीं थी। इसके बाद हुए हरियाणा के चुनाव परिणामों ने यह बता दिया कि माहौल क्या है और क्या होने जा रहा है। जाहिर तौर पर जनता परिवार के बिखरे साथियों के लिए यह समय चुनौती और चेतावनी दोनों का था। उन्हें लग गया कि राजनीति न सिर्फ बदल रही है बल्कि कई अर्थों में दो ध्रुवीय भी हो सकती है। कांग्रेस-भाजपा के बीच मैदान बंट गया तो छोटे दलों के दिल लद जाएंगें। किसी को कल्पना भी नहीं थी कि पिछले दो दशक से सामाजिक न्याय की ताकतों की लीलाभूमि बने उप्र और बिहार के लोग इस तरह का फैसला सुनाएंगें। हरियाणा जहां जातीय राजनीति ही अरसे से प्रभावी रही,पहली बार कमल खिला है। राजनीति की इस चौसर ने बहुत अलग संकेत दिए हैं। महाराष्ट्र में अपनी साधारण और दूसरे दर्जे की उपस्थिति से अलग भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर सबको चौंका दिया है। जबकि इन राज्यों में भाजपा कभी बहुत ताकतवर नहीं रही। अकेले उप्र में उसे राज्य में अपने दम पर सरकार बनाने का अवसर मिला था, वह भी रामजन्मभूमि आंदोलन के बाद। बिहार में वह जनता दल की सहयोगी ही रही, बाद में उसने जेडीयू के साथ सरकार बनायी। देश के बदलते राजनीतिक हालात में भाजपा एक बड़ा ध्रुव बनकर उभरी है। उसकी ताकत बढ़ी है और एक बड़ा मास लीडर उसे मिला है। ऐसे कठिन समय में कांग्रेस जैसे दल जहां अलग तरह  की चुनौतियों से जूझ रहे हैं तो छोटे दलों के सामने अस्तित्व का ही संकट है।
  उत्तर भारत के राज्यों में जिस तरह अराजक स्थितियां हैं लोग विकास के सपनों के पीछे एकजुट हो रहे हैं। उप्र और बिहार जैसे बड़े राज्य जो लोकसभा की ज्यादातर सीटें समेटे हुए हैं, में विकास की कामना जगाकर मोदी एक लंबी पारी की मांग कर रहे हैं। नीतिश कुमार ने बिहार में लालूप्रसाद यादव से हाथ मिलाकर अपनी सुशासन बाबू की छवि के विपरीत एक अलग राह पकड़ ली है। मुख्यमंत्री का पद छोड़कर अब वे पार्टी को फिर से खड़ी करना चाहते हैं। किंतु जिन नारों और विकास के सपनों ने मूर्ति गढ़ी थी वह टूट रही है। लालू विरोधी राजनीति नीतिश की प्राणवायु थी अब उस पर अकेला बीजेपी का दावा है। लालू विरोधी राजनीति की शुरूआत नीतिश ने ही की थी भाजपा उस अभियान में सहयोगी बनी थी। आज हालात बदल गए हैं नीतिश ने एक नया मार्ग पकड़ लिया है। उनकी छवि भी प्रभावित हो रही है।  
    मुलायम सिंह यादव की चिताएं उप्र का अपना गढ़ बचाने की हैं। उनके पुत्र अखिलेश यादव जहां उप्र में उम्मीदों का चेहरा बनकर उभरे थे और उन्हें जनता का अभूतपूर्व समर्थन भी मिला था, अब उनकी छवि ढलान पर है। वे युवाओं के आईकान बन सकते थे किंतु अनेक कारणों से वे एक दुर्बल शासक साबित हो रहे हैं और उनके दल के लोगों ने ही उन्हें सफल न होने देने का संकल्प ले रखा है ऐसा अनुभव हो रहा है। अंतर्विरोधों और आपसी कलह से घिरी उनकी सरकार को संभालने के लिए अक्सर नेताजी स्वयं मोर्चा संभालते हैं किंतु हालात काबू में नहीं आ रहे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के विधानसभा ही यह तय करेगें कि जनता परिवार का भविष्य क्या है। पिछले विधानसभा चुनावों  भाजपा की हालात उत्तर प्रदेश में बहुत खराब थी। किंतु लोकसभा में उसने श्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। राज्य स्तर पर लोग सपा के विकल्प के रूप में मायावती और उनकी पार्टी बसपा को देखते हैं। देखना है कि इस चुनाव में क्या वह जगह भाजपा ले पाती है? अथवा मायावती अपनी स्थिति में सुधार करते हुए एक विकल्प देने में सक्षम हो पाती हैं। नए बने जनता परिवार के मोर्चे के सभी दल क्षेत्रीय दल हैं जिन्हें अपने-अपने राज्यों में अपनी पतवार स्वयं खेनी है। अकेले बिहार में जेडीयू और राजद जैसी बड़ी पार्टियां साथ आ रही हैं जहां उनके आपसी विरोध सामने आ सकते हैं। उपचुनावों में बिहार में साथ आने का प्रयोग उनके पक्ष में जा चुका है। विधानसभा चुनावों में क्या यह दुहराया जा सकेगा यह एक बड़ा सवाल है। मोर्चे में कांग्रेस की स्थिति क्या होगी या वह एक अलग दल के रूप में चुनाव लड़ेगी यह एक बड़ा सवाल है। जहां तक समीकरणों का सवाल है भाजपा भी बिहार में स्थानीय तौर पर पासवान-कुशवाहा को साथ लेकर एक समीकरण तो बना ही रही है। कौन सा समीकरण भारी पड़ता है इसे देखना रोचक होगा।
     भारतीय जनता पार्टी ने इस बीच अपने आपको विकास, सुशासन और प्रगति के सपनों से जोड़कर एक नई यात्रा प्रारंभ की है। प्रधानमंत्री की संवाद कला, अभियान निपुणता और संगठन की एकजुटता ने उसे एक व्यापक आधार मुहैया कराया है। भाजपा इस अवसर का लाभ लेकर अपने सांगठनिक और वैचारिक विस्तार में लगी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अपने प्रचारक-स्वयंसेवक प्रधानमंत्री की सफलता सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय है। विदेश दौरों ने प्रधानमंत्री को एक विश्वनेता के रूप में स्थापित किया है तो उनके आत्मविश्वास से पूरी दुनिया भारत को एक नए नजरिए से देख रही है। ऐसे में अपने गढ़ों, मठों और जातीय गोलबंदी को बचाने के लिए सामाजिक न्याय की ताकतों का एकजुट होना साधारण नहीं है। कभी कमंडल को मंडल ने मात दी थी और उत्तर भारत का इलाका अलग तरह से प्रतिक्रिया देता नजर आया था। आज विकास और सुशासन के सवाल की ध्वजा भाजपा के हाथ में है। चलो चलें मोदी के साथ उसका प्रिय नारा है। देश के युवाओं और समाज जीवन के तमाम क्षेत्रों में मोदी ने उम्मीदों की एक लहर पैदा की है। अपनी सरकार के आरंभिक महीनों में भी उनकी लोकप्रियता का आलम बरकरार है। वे संवाद करते हुए सर्तकता बरत रहे हैं पर निरंतर संवाद कर रहे हैं। उनकी सरकार इच्छाशक्ति से भरी हुयी दिखती है। उनकी आलोचनाओं का आकाश अभी बहुत विस्तृत नहीं है। एक बड़ा मोर्चा बनाने की इच्छा से भी जनता परिवार खाली दिखता है, क्योंकि इस मोर्चे में कांग्रेस और वाममोर्चा की पार्टियां शामिल नहीं दिखतीं। वहीं ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और मायावती का साथ आना संभव नहीं दिख रहा है। इसके साथ ही लोकसभा में कुल 15 सांसदों के साथ यह मोर्चा बहुत अवरोध खड़े करने की स्थिति में नहीं है। स्वार्थों में एक होना और फिर बिखर जाने का अतीत इस जनता परिवार की खूबी रही है। नरेंद्र मोदी को यह श्रेय तो देना पड़ेगा कि उन्होंने इस बिखरे जनता परिवार को एक कर दिया इसके परिणाम क्या होंगें, इसे देखने के लिए थोड़ा इंतजार करना पडेगा। सही मायने में सामाजिक न्याय की ताकतों की लीलाभूमि बने उप्र और बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम ही जनता परिवार की राजनीति का भविष्य भी तय करेंगें। यह लड़ाई जनता परिवार की आखिरी जंग भी साबित हो सकती है।

                                                (लेखक राजनीतिक विश्वलेषक हैं)

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

अंगड़ाई लेता तीसरा मोर्चा

-संजय द्विवेदी


    तीसरा मोर्चा भारतीय राजनीति का एक अजूबा है किंतु वह है और हर चुनाव के पहले अपनी अहमियत जताने के लिए प्रकट हो ही जाता है। तीसरे मोर्चे के अलग-अलग शिल्पकार हर बार उसे खड़ा कर ही देते हैं और मंच पर उसके दिग्गजों की एकता बताती है कि सारा कुछ बदलने ही वाला है। इस बार इस एकता के सूत्रधार हैं माकपा नेता प्रकाश कारात। अब तक इस मोर्चे में लगभग 11 पार्टियां शामिल हो चुकी हैं जिनमें वाममोर्चा( सीपीआई, सीपीएम, आरएसपी, फारवर्ड ब्लाक), जेडी(एस), जेडी(यू), सपा, बीजेडी, झारखंड विकास मोर्चा और अन्नाद्रमुक शामिल हैं।
   जाहिर तौर पर ऐन चुनाव के वक्त इस कवायद के मायने बहुत स्पष्ट हैं। कांग्रेस की पलती हालत और भाजपा को सत्ता से रोकने की चाह में एकत्र ये दल एक सपने के तहत एकजुट हैं। किंतु संकट यह है कि इस मोर्चॆ में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी कई हैं। वहीं एक व्यापक मोर्चा बनने में भी इसमें खासी बाधाएं हैं। जैसे की मुलायम सिंह यादव के नाते मायावती इस मोर्चे के साथ नहीं आ सकतीं तो वहीं वाममोर्चा के नाते ममता बनर्जी भी इससे दूर हैं। ऐसे में तीसरे मोर्चे के दलों में व्यापक आम सहमति के आसार नजर नहीं आते हैं। हां उनकी उम्मीदें इस बात पर जरूर हैं कि अगर कांग्रेस सत्ता की दौड़ से बाहर होती है और 100 से 150 सीटों पर  सिमटती है ,तो तीसरे मोर्चे को समर्थन देकर वह भाजपा और मोदी का रथ रोक सकती है। यह एक ऐसी कल्पना है जिसके आधार पर ही यह एकजुटता व्यापक होती हुयी दिखती है। यह एकता दलअसल मुद्दों के आधार पर नहीं एक संभावित अवसर के नाम पर हैं।
  तीसरे मोर्चे में शामिल पार्टियों में सबसे बड़ी उम्मीद तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता हैं। उन्हें नरेंद्र मोदी के खेमे में माना जा रहा था। यह लगभग तय था कि वे राजग की सरकार बनने पर मोदी का समर्थन करेंगीं। किंतु प्रकाश करात की यह बड़ी सफलता है कि वे जयललिता को राजग की ओर जाने से खींच लाए। अब हालात यह हैं कि जयललिता की आंखों में प्रधानमंत्री का सपना तैरने लगा है। अपने खासे जनाधार और द्रमुक नेता करूणानिधि के परिवार में पड़ी फूट ने उनको एक अवसर दिया है कि वे इस तरह के सपने देख सकें। तमिलनाडु की 65 वर्षीय इस मुख्यमंत्री की पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में 9 सीटें जीती थीं। अब माहौल के मद्देनजर वे राज्य की चालीस लोकसभा सीटों में ज्यादातर पर जीत के सपने देख रही हैं। तीसरे मोर्चे में शामिल सभी दलों में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने पर जयललिता अपने सपनों को हकीकत में बदलता देख सकती हैं। आज हालात यह हैं कि पूरे तमिलनाडु में जयललिता की पार्टी उनको प्रधानमंत्री बनाने का अभियान चला रही है। पार्टी का एक ही नारा है तमिलनाडु और पांडिचेरी का सारी सीटें जीतकर लोकसभा में अपनी नेता को स्थापित करना।
  इसी तरह मोर्चे में शामिल मुलायम सिंह यादव के समर्थक भी उत्तर प्रदेश में भारी जीत दर्ज कराकर दिल्ली के सपने देख रहे हैं। 74 साल के हो चुके मुलायम सिंह यादव के लिए यह एक तरह से आखिरी पारी भी है। उप्र के मुख्यमंत्री और देश के रक्षामंत्री रह चुके मुलायम सिंह के लिए अब सिर्फ प्रधानमंत्री का पद ही बचा है। पिछले लोकसभा चुनावों में उनके दल को उप्र में 23 लोकसभा सीटें मिली थी। अब नेता जी चाहते हैं कि उप्र से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतें ताकि तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री के लिए वे सबसे आगे हों। बावजूद इसके उप्र में उनके बेटे अखिलेश यादव की सरकार की असफलताएं और दंगों के दाग शायद बड़ी जीत दिला पाएं। किंतु उनकी हर सभा में नेता जी को प्रधानमंत्री बनाने के गीत गाए जा रहे हैं। 80 लोकसभा सीटों वाले इस प्रदेश में मायावती के बाद अब भाजपा भी जोर बांध रही है। मोदी की लहर वहां एक भाजपा के लिए एक बड़ा अवसर बन सकती है।
 क्षेत्रीय दलों की बढ़ती हसरतें इसलिए भी उफान पर हैं क्योंकि लोगों को लग रहा है कि कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन बड़ी सफलताएं पाते हुए नहीं दिख रहे हैं। कांग्रेस जहां डूबता हुआ जहाज दिख रहा है वहीं भाजपा की बढ़त भी सीमित दिख रही है। फिर भाजपा देश के तमाम इलाकों से अभी भी अनुपस्थित है। ऐसे में तीसरे मोर्चे का उत्साह चरम पर है। वामपंथी नेताओं की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ मोदी के रथ को रोकने की है किंतु संकट यह है कि वाममोर्चा तो अपने गढ़ पश्चिम बंगाल में ही बेहाल है। ममता बनर्जी के तेवरों के चलते वाममोर्चा को लोकसभा चुनावों में भी बहुत बड़ी सफलता मिलने की उम्मीद नहीं दिखती। दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों इस संभावना से भरे- पूरे हैं कि वे अवसर आने पर राजग की राह पकड़ सकते हैं। शायद इसके चलते प्रकाश कारात अभी से उनको गठबंधनों के साथ बांधना चाहते हैं। इस बंधन से शायद नरेंद्र मोदी को समर्थन देने को लेकर दलों में हिचक पैदा हो। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अटलबिहारी वाजपेयी प्रयोग की सफलता से भी राजग को लेकर क्षेत्रीय दलों में एक स्वाभाविक आकर्षण है किंतु तीसरे मोर्चे के आगाज से तमाम दल अब अलग राह पकड़ रहे हैं। तीसरे मोर्चे की शक्ति ही उसकी सीमा है। एक तो यह मोर्चा किसी राजनैतिक प्रतिबद्धता के कारण नहीं कांग्रेस-भाजपा विरोध के बीच एक तीसरी तान छेड़ने का वाहक है। दूसरा इसके नेताओं का आपसी समन्वय भी गायब है।
 प्रधानमंत्री पद को लेकर भी राजनेताओं की महत्वाकांक्षाएं आपस में टकरा सकती हैं। एक समय में स्व. हरिकिशन सिंह सुरजीत तीसरे मोर्चे के नायक बने थे और तमाम क्षेत्रीय आकांक्षाओं का साधने का काम उन्होंने किया था। आने वाले समय में प्रकाश करात इस भूमिका में कितने प्रभावशाली साबित होते हैं कह पाना कठिन है। नेताओं के आपसी द्वंद, उनकी क्षेत्रीय अपील, राज्यों के मुद्दे और केंद्रीय राजनीति में एक प्रभावशाली हस्तक्षेप जैसे सवाल इससे जुड़े हैं। तीसरे मोर्चे की सरकारों को देखें तो वे प्रायः किसी राष्ट्रीय नेता के आभामंडल के इर्द-गिर्द बनती नजर आयी हैं। वीपी सिंह, चंद्रशेखर, इंद्रकुमार गुजराल ऐसे ही राजनेता थे। इनमें अकेले देवगौड़ा ऐसे थे जिन्हें क्षेत्रीय नेता कहा जा सकता है। दूसरी ओर इन दलों का संकट यह है कि वे भाजपा के खिलाफ सब एकजुट नहीं होगें। क्योंकि उनमें आपसी मतभेद बहुत गहरे हैं। उप्र में मुलायम और मायावती, प.बंगाल में वाममोर्चा और ममता बनर्जी, बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतिश कुमार के मतभेद बेहद गहरे हैं। ऐसे में वाममोर्चा नेताओं की कोशिशों के बावजूद तीसरा मोर्चा बहुत व्यापक आकार नहीं ले सकता।

   सत्ता कैसे विचारों को बदलती है उसे देखना हो तो वाजपेयी सरकार की याद कीजिए। सेकुलरिज्म और भाजपा विरोध के नारों की असलियत भी उस समय खुल गई जब भाजपा की गठबंधन की सरकार को उमर अब्दुल्ला से लेकर रामविलास पासवान, नीतिश कुमार, जार्ज फर्नांडीस, जलललिता, ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू की पार्टियां समर्थन देती नजर आईं। ऐसे में तीसरा मोर्चा एक सपना है जिसके सच चुनाव परिणामों के बाद ही सामने आएंगें। तीसरे मोर्चे की सारी कोशिश मोदी की रफ्तार और गति को थामने की है। राजग की ओर दलों को जाने से रोकने के लिए प्रकाश करात ने यह सारा कुछ रचा है, जिसके परिणाम अभी बहुत जाहिर नहीं हैं। अब जबकि चुनावी महाभारत का शंखनाद हो चुका है। सारे सेनानी मैदान में उतर चुके हैं तो यह देखना रोचक होगा कि कांग्रेस, भाजपा, आप के बीच एक चौथा कोण कौन सी लहरें पैदा करता है। अपने दिग्गज नायकों की मैदानी सफलताओं से भी तीसरे मोर्चे का भविष्य लिखा जाएगा, लेकिन क्या भरोसा कब कौन नेता अपनी फौज के साथ तीसरे मोर्चे को छोड़कर किसी दूसरे मोर्चे में खड़ा दिखा। यही एक बात तीसरे मोर्चे की विश्वसनीयता पर सबसे बड़ा सवाल है। डा. राममनोहर लोहिया कहा करते थे जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करती। शायद इसीलिए दिल्ली में बनी तीसरे मोर्चे की कोई सरकार पांच साल नहीं चली। प्रकाश करात की कोशिशों को सलाम कीजिए कि उन्होंने फिर से तीसरे मोर्चे को जिंदा कर दिया है और भारतीय राजनीति फिर एक रोचक मोड़ पर खड़ी हो गयी है।