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बुधवार, 24 दिसंबर 2025

अटलजीः वाक् शक्ति की आराधना से छुए शिखर

 

उनकी पत्रकारिता, कविता और भाषणों में  छिपे हैं संचार के असाधारण सूत्र

-      प्रो.संजय द्विवेदी



   हमारे यहां शब्द को ब्रम्ह कहा गया है। शब्द की साधना, वाक् की साधना ईश्वर की ही साधना है। भारत रत्न श्री अटलबिहारी वाजपेयी हमारे समय के ऐसे नायक हैं जिन्होंने संवाद और संचार के माध्यम से जो जगह बनाई वह दुर्लभ है। हम उनके समूचे व्यक्तित्व का आकलन करेंगे तो पाएंगे संचार और संवाद ही दो ऐसे तत्व हैं, जिन्होंने उन्हें गढ़ा था। उन्होंने भारतीय राजनीति और समाज को अपने व्यक्तित्व-कृतित्व से इस तरह प्रभावित किया जिसकी मिसाल नहीं मिलती।

      हर राजनेता अपने कुछ विलक्षण गुणों के लिए जाना जाता है। हमारे देश में त्याग,बलिदान, लोकसेवा, ग्रामीण विकास, समाज सुधार के कामों में रुचि लेकर काम करके बढ़े अनेक नायक दिखते हैं। आजादी के आंदोलन में अनेक नायक समाज सुधार के प्रकल्पों से जुड़े थे। खुद राष्ट्रपिता महात्मा एक समाज सुधारक और आंदोलनकारी की तरह सामने आते हैं। लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव और अपनी समाज सुधार की चेतना से समाज में अलग तरह का जागरण किया। बाबा साहब आंबेडकर गैरबराबरी के विरुद्ध संघर्ष से जननायक बन जाते हैं। नेताजी सुभाषचंद्र बोस अपनी रणनीतिक कुशलता और सैन्य रूचियों से एक अलग संसार रच देते हैं। लालबहादुर शास्त्री और दीनदयाल उपाध्याय अपनी निजी ईमानदारी और त्याग से आकर्षित करते हैं। नानाजी देशमुख अपने ग्राम स्वराज्य के संकल्पों से जगह बनाते हैं। इसी तरह अनेक नायक अलग-अलग कामों के माध्यम से सामने आगे आते हैं।

संवाद नायक अटलजी-

       इन सबके बीच अटलजी का किस्सा बहुत अलग है। वे प्रथमतः और अंततः संवाद नायक हैं। अनोखे संवाद नायक। ह्दय से ह्दय का संवाद करने वाले नायक। उन्हें सुनना इस देश का स्वभाव बन गया। वे कविताएं पढ़ रहे हों या भाषण दे रहे हों, उनका संवेदनशील मन लोगों के दिलों को स्पर्श करता है। अपनी भाषणकला से वे असाधारण नायक बने। हिंदी में होने वाले उनके व्याख्यानों ने सारे देश को एक सूत्र में बांध दिया। उनके दल के वैचारिक और भौगोलिक विस्तार में सहायक बना। वे ही ऐसे हैं जो प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज के दौर तक प्रासंगिक बने रहे। अपनी बीमारी के बाद भी उनका मौन बहुत मुखर था। उनके निधन के बाद का समय याद कीजिए किस तरह सारा देश जुड़ गया था, वर्तमान प्रधानमंत्री सहित सारी सरकार और लाखों लोग पैदल चलकर उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। उनमें नौजवानों की संख्या बहुत थी जिन्होंने उन्हें देखा नहीं था। आनलाईन या टीवी माध्यमों पर सुना था। उनकी कविताएं और भाषण आज भी लोकतंत्र को राह दिखाते हैं।

    एक साधारण परिवार में जन्में इस राजनेता ने अपनी भाषण कला,पत्रकारिता, लेखन, देहभाषा और विचारधारा के प्रति सातत्य का जो परिचय दिया वह आज की राजनीति और समाज में दुर्लभ है। उनकी समूची यात्रा में उनका संवाद कौशल बार-बार उभरकर सामने आता है, जो उन्हें उनके समकालीन नेताओं से बहुत अलग बनाता है। अटल जी का मूल्यांकन करें तो वे मूलतःसंचारक ही हैं। उनकी इस प्रतिभा को पं. दीनदयाल उपाध्याय ने पहचान लिया था और इसलिए जब उन्होंने लखनऊ से स्वदेश, राष्ट्रधर्म और पांचजन्य जैसे प्रकाशन प्रारंभ किए तो उनकी नजर अटलजी ही पड़ी। इसके पहले से अटलजी एक कवि के रूप में लोकप्रिय हो चुके थे। मंचों पर उनकी कविताएं सुनीं जाने लगीं थीं। उनका कवि रूप भी बहुत संवादी है। उनकी कविताएं अप्रतिम संचार करती हैं। वे लिखते हैं-

उजियारे में, अंधकार में, कल कहार में,

बीच धार में, क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।


    उनकी संचार और संवाद कला ही उन्हें भारत जैसे महादेश का नायक बनाने में सबसे महत्वपूर्ण है। एक बड़े परिवार का उत्तराधिकार पाकर कुर्सियां हासिल करना बहुत सरल है किंतु वाजपेयी की पृष्ठभूमि और उनका संघर्ष देखकर लगता है कि संवादकला कैसे एक सामान्य परिवार से आए बालक को महानायक बना सकती है। वे लोगों के स्वप्न को साकार करने वाले नायक बने। लोगों ने उनके भाषण सुने और भरोसा किया। इन अर्थों में अटल जी का संवाद ह्दय से ह्दय का संवाद बन जाता है।

    याद कीजिए अटल जी की कविता तन-मन हिंदू मेरा परिचय। वे अपनी कविताओं, लेखों ,भाषणों और जीवन से जो कुछ प्रकट करते रहे उसमें इस मातृ-भू की अर्चना के सिवा क्या है। वे सही मायने में भारतीयता के ऐसे अग्रदूत बने जिसने न सिर्फ सुशासन के मानकों को भारतीय राजनीति के संदर्भ में स्थापित किया वरन अपनी विचारधारा को आमजन के बीच स्थापित कर दिया। उनके अद्भुत संचार शैली की कविताएं, भाषण और लेख उनको लोगों के बीच ले गए। जिसने उन्हें सुना, उनका दीवाना हो गया। जब वे पहली बार संसद पहुँचे, तो उनकी भाषण कला से संसद भी प्रभावित हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी श्री वाजपेयी की तारीफ की। इसके बाद श्री वाजपेयी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
यशस्वी संपादक एवं पत्रकार-

  अटल जी के संचार और संवाद के अनेक रूप हैं। जिसमें वे खुद को व्यक्त करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आरंभिक प्रकाशनों स्वदेश, राष्ट्रधर्म और पांचजन्य के साथ वे दैनिक वीर अर्जुन(दिल्ली) के भी संपादक बने। इस तरह उनका लेखन और संपादक कौशल सामने दिखता है। वाराणसी शहर ने उनके अंदर के पत्रकार को पहचाना था और उसे मंच प्रदान किया था। उनके पत्रकारिता जीवन की शुरुआत वाराणसी के 'समाचार' नामक अखबार से हुई थी। यह अखबार 1942 में भईया जी बनारसी ने शुरू किया था। उस समय इस अखबार का कार्यालय चेतगंज स्थित हबीबपुरा मोहल्ले में था। अटल जी ने 1977 में एक चुनावी रैली में इस बात की जानकारी दी थी। इस अखबार के लिए नानाजी देशमुख और बाला साहब देवरस भी लिखा करते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी पत्रकारों, साहित्यकारों से उनका संवाद बना रहा है। वे अखबारों के आयोजनों में भी जाते रहे। पत्रकारिता पर राय देते रहे। ऐसे ही 20 जनवरी 1982 कोतरुण भारतकी रजत जयंती पर अटल जी ने कहा था किसमाचार पत्र के ऊपर एक बड़ा राष्ट्रीय दायित्व है। भले हम समाचार पत्रों की गणना उद्योग में करें, कर्मचारियों के साथ न्याय करने की दृष्टि से आज यह आवश्यक भी होगा, लेकिन समाचार पत्र केवल उद्योग नहीं है, उससे भी कुछ अधिक है।    अटल जी ने स्वयं कई साक्षात्कारों में बताया था कि वह अपने पत्रकारिता जीवन से काफी खुश थे। साल 1953 में भारतीय जनसंघ के नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर को विशेष दर्जा देने का विरोध कर रहे थे। जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट सिस्टम को विरोध करने मुखर्जी श्रीनगर चले गए। वे परमिट सिस्टम को तोड़कर श्रीनगर गए थे। इस घटना को कवर करने के लिए पत्रकार के रूप में वाजपेयी वहां थे। अटलजी ने इंटरव्यू में बताया, मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन मैं वापस आ गया। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही डॉ. मुखर्जी की बीमारी के कारण मृत्यु हो गई। इस घटना से वाजपेयी पूरी तरह से हिल गए। इसके बाद उन्होंने राजनीति में आने का निर्णय लिया। 

       वे पत्रकारिता में शुचिता के पक्षधर थे। वे नहीं चाहते थे पत्रकारिता में किसी का अंधसमर्थन हो। वरिष्ठ पत्रकार श्री हेमंत शर्मा ने एक लेख में अटल जी इस भावना को रेखांकित करते हुए लिखा है-मैं उस समय लखनऊ में जनसत्ता का स्टेट ब्यूरो चीफ था। अटलजी लखनऊ से ही चुनाव लड़ा करते थे. उन दिनों टीवी था नहीं, अखबार ही चलते थे। अटलजी दिल्ली से जो कुछ भी इनपुट दिया करते थे वो अगले दिन उन्हें अखबार में छपा मिला करता था। इसीलिए भी वह मुझे सबसे ज्यादा स्नेह करते थे। उन दिनों मैंने उनके पक्ष में दो-तीन रिपोर्टें लिखीं। पहले और दूसरे पर उन्होंने कहा, “बहुत अच्छा लिखा।इससे मुझे काफी हिम्मत मिली। लेकिन तीसरे लेख पर उन्होंने अपने अंदाज में कहा, “भई, दिल्ली में आपका बड़ा रसूख है। आपकी विश्वसनीयता बहुत है। आप पत्रकारिता में अपने विश्वास को बनाये रखिए. हमारे बारे में ज्यादा लिखेंगे तो दूसरा पक्ष आपके प्रति अलग भाव रखेगा। आज ऐसा कहने वाले राजनेता दुर्लभ हैं जो दूसरे के मान की चिंता करते हैं। कुल मिलाकर इससे पत्रकारिता की शुचिता पर उनका भरोसा पता चलता है।

    पत्रकार तवलीन सिंह की किताब दरबार में वे लिखती हैं- “21 महीने के बाद इमरजेंसी हटी थी। इसके बाद विपक्ष ने एकजुटता से इंदिरा गांधी का मुकाबला करने का फैसला किया। इसी एकजुटता में पहली रैली दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित की गई।रैली को लेकर पत्रकारों में एक्साइटमेंट था। प्रेस गैलरी में हम सब गपशप कर रहे थे। इस रैली में कम से कम लोग पहुंचे, इसके लिए इंदिरा गांधी ने दूरदर्शन पर उस समय पर सुपर-डुपर हिट फिल्म बॉबीका प्रसारण करवा दिया। लेकिन बॉबीभी लोगों को रामलीला मैदान आने से न रोक सकी। शाम के लगभग 6 बजे नेताओं का काफिला आयावे सब लोग सफेद एम्बेसडर कारों से आए। उनमें से अधिकर बूढ़े हो चुके थे। बोलने का क्रम शुरू हुआ। एक-एक करके माइक पर आते और बोरिंग स्पीच देते। हर कोई जेल में अपने अनुभव बता रहा था। भीड़ भी बोर हो रही थी और अब थकने लगी थी। तभी मैंने हिंदुस्तान टाइम्स के अपने साथी से कहा कि अगर किसी ने बहुत कुछ हटकर नहीं बोला तो लोग यहाँ और टिकने वाले नहीं हैं। रात के 9 बज चुके थे। हालांकि बारिश रुक चुकी थी लेकिन सर्दी थी। तभी उस साथी ने मुस्काराकर जवाब दिया… चिंता मत करो, जब तक अटलजी नहीं बोल लेते, कोई नहीं जाएगा। ये लोग उन्हें ही सुनने आए हैं। फिर लगभग 9:30 के आसपास अटलजी की बारी आईजैसे ही बोलने के लिए खड़े हुए। भीड़ उत्साह से भर गई, तमाम लोग खड़े होकर तालियां बजाने लगे। नारे लगे।  अटल बिहारी जिंदाबाद… अटलजी ने दोनों हाथ जोड़कर भीड़ का अभिवादन स्वीकार किया फिर हवा में दोंनो हाथ लहराकर भीड़ से शांत होने का इशारा किया। फिर एक मंझे हुए अभिनेता की तरह आंखें बंद करते हुए बोले… बाद मुद्दत के मिले हैं दीवाने अपने चिरपरिचित अंदाज में अटलजी थोड़ा रुके। इतने भर में भीड़ बौरा गई। जब शोर शांत हुआ तो फिर आंखें बंद की और लंबी खामोशी के बाद बोलना शुरू किया… कहने-सुनने को बहुत हैं अफसाने भीड़ अब उम्मादी/बेकाबू सी हो चुकी थी… खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आज़ादी कौन जाने!जाहिर है संवाद पर ऐसी पकड़ उनकी ही थी। वे किसी भी सभा का मूल आकर्षण होते थे।विपक्ष अनेक सर्वदलीय सभाओं में दिग्गजों के बीच भी उनका भाषण अंत में करवाया जाता था, क्योंकि जनता उनको ही सुनने के लिए आती थी। उनका एक अलग आकर्षण था। उनके ऐसे अनेक किस्से लोकविमर्श में हैं।

           अटल जी का गांव आगरा जिले के बटेश्वर में हैं। वहां अटल बिहारी वाजपेयी और मामा जी के नाम से विख्यात माणिकचंद्र वाजपेयी दो पत्रकार निकले। मामा जी और अटल जी दोनों स्वदेश के संपादक रहे। अटल जी के मन में पत्रकारिता के प्रति इतना आदर था कि उन्होंने मामा जी का सम्मान समारोह प्रधानमंत्री आवास पर आयोजित किया और उनके बारे में न सिर्फ विचार रखे वरन उनके चरण भी छुए। यह उनकी विनम्रता थी जो मामा जी के गुणों का सार्वजनिक सम्मान कर रही थी। देश के अनेक लेखकों से उनका संवाद और पत्राचार था। किताबों को पढ़ना और उन पर टिप्पणी करना उनकी रुचि का हिस्सा था।

 संवाद से समन्वय-

 अटल जी का संवाद पर बहुत गहरा भरोसा था। वे हर बार कहते थे कि कोई भी ऐसा संकट नहीं जो बातचीत से हल न किया जा सके। उनके शब्दों पर लोग विश्वास करते थे। इसीलिए वे एक ऐसी सरकार के नायक बने जिसने भारतीय राजनीति में समन्वय की राजनीति की शुरुआत की।किसी भी मिली- जुली सरकार को चलाना संवाद के बगैर संभव नहीं है। वह एक ऐसी राष्ट्रीय सरकार बनी जिसमें विविध विचारों, क्षेत्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले तमाम लोग शामिल थे। दो दर्जन दलों के विचारों को एक मंत्र से साधना आसान नहीं था। किंतु अटल जी की राष्ट्रीय दृष्टि, उनकी साधना, संवाद कौशल और बेदाग व्यक्तित्व ने सारा कुछ संभव कर दिया। वे सही मायने में भारतीयता और उसके औदार्य के उदाहरण बन गए। उनकी सरकार ने अस्थिरता के भंवर में फंसे देश को एक नई राजनीति को राह दिखाई। यह रास्ता मिली-जुली सरकारों की सफलता की मिसाल बन गया। भारत जैसे देशों में जहां मिलीजुली सरकारों की सफलता एक चुनौती थी, अटलजी ने साबित किया कि स्पष्ट विचारधारा,राजनीतिक चिंतन, संवाद और समन्वय, साफ नजरिए से भी परिवर्तन लाए जा सकते हैं। विपक्ष भी उनकी कार्यकुशलता और व्यक्तित्व पर मुग्ध था। यह शायद उनके विशाल व्यक्तित्व के चलते संभव हो पाया, जिसमें सबको साथ लेकर चलने की भावना थी। देश प्रेम था, देश का विकास करने की इच्छाशक्ति थी। उनकी नीयत पर किसी कोई शक नहीं था। शायद इसीलिए उनकी राजनीतिक छवि एक ऐसे निर्मल राजनेता की बनी जिसके मन में विरोधियों के प्रति भी कोई दुराग्रह नहीं था।

    उनकी सरकार सुशासन के उदाहरण रचने वाली साबित हुई। जनसमर्थक नीतियों के साथ महंगाई पर नियंत्रण रखकर सरकार ने यह साबित किया कि देश यूं भी चलाया जा सकता है। सन् 1999 के राजग के चुनाव घोषणापत्र का आकलन करें तो पता चलता है कि उसने सुशासन प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धताजैसे विषय को उठाने के साथ कहा-लोगों के सामने हमारी प्रथम प्रतिबद्धता एक ऐसी स्थायी, ईमानदार, पारदर्शी और कुशल सरकार देने की है, जो चहुंमुखी विकास करने में सक्षम हो। इसके लिए सरकार आवश्यक प्रशासनिक सुधारों के समयबद्ध कार्यक्रम शुरू करेगी, इन सुधारों में पुलिस और अन्य सिविल सेवाओं में किए जाने वाले सुधार शामिल हैं।राजग ने देश के सामने ऐसे सुशासन का आदर्श रखा जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण, संघीय समरसता, आर्थिक आधुनिकीकरण, सामाजिक न्याय, शुचिता जैसे सवाल शामिल थे। आम जनता से जुड़ी सुविधाओं का व्यापक संवर्धन, आईटी क्रांति, सूचना क्रांति इससे जुड़ी उपलब्धियां हैं।

     अपनी कुशल संवाद शैली से उन्होंने देश में सकारात्मकता का संचार किया और अपने दल और सहयोगियों के लिए जनसमर्थन जुटाया। चुनाव अभियान सही मायने में लोकसंचार के सबसे बड़े उदाहरण हैं, जिसमें आप निरंतर संवाद करते हुए जनता का भरोसा हासिल करते हैं। भारत जैसे महादेश में अटल जी ने इसे संभव किया। अटल जी जिस तरह पूरे देश का निरंतर प्रवास किया, उसने न सिर्फ उनकी संवेदात्मक ग्रहणशीलता को व्यापक किया बल्कि सरोकारी भी बनाया। विपक्ष के नेता के रूप में संसद में उनके व्याख्यान संचार और संवाद कला उदाहरण हैं। उन्होंने बहुत संवेदना के साथ पूरी मर्यादा में रहते हुए लोकतंत्र को मजबूती देना का काम किया। एक सांसद के रुप में उनकी सक्रियता राज्यसभा और लोकसभा में हुए उनके व्याख्यान उनकी अध्ययनशीलता और देशप्रेम का उदाहरण हैं। जब वे सदन में खड़े होते थे, तब उन्हें सुनने की लालसा सांसदों को भी रहती थी। उनके सुनने के सांसद अपनी व्यस्तताओं के बीच भी सदन में रहते थे। नये सांसदों के वे प्रेरणापुरुष ही थे। नयी पीढ़ी को इस तरह प्रेरित और प्रशिक्षित करना उनका विरल योगदान है। जो लोग आज भी याद करते हैं। संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मर्यादा का उन सरीखा समर्थक दुर्लभ है। उनका संसदीय जीवन ऐसी कथा है जिस पर शोध किए जाने की जरूरत है।  

एक भारतीय प्रधानमंत्री-

 संचार और संवाद की सफलता बहुत कुछ देहभाषा (बाडी लैंग्वेंज) पर निर्भर करती है। जैसे महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस अपनी देहभाषा से बहुत कुछ कहते थे। अटलजी ने भी अपनी देहभाषा, वेशभूषा से देश को जोड़ा। लोग उनमें अपनी छवि देख पाए। खुद को उनसे जोड़ पाए।अटलबिहारी बाजपेयी सही मायने में एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो भारत को समझते थे। भारतीयता को समझते थे। राजनीति में उनकी खींची लकीर इतनी लंबी है जिसे पारकर पाना संभव नहीं दिखता। अटलजी सही मायने में एक ऐसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं जिसने राष्ट्रवाद को सर्वोपरि माना। देश को सबसे बड़ा माना। देश के बारे में सोचा और अपना सर्वस्व देश के लिए अर्पित किया।

       उनकी समूची राजनीति राष्ट्रवाद के संकल्पों को समर्पित रही। वे भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश मंत्री भी रहे। उनकी यात्रा सही मायने में एक ऐसे नायक की यात्रा है जिसने विश्वमंच पर भारत और उसकी संस्कृति को स्थापित करने का प्रयास किया। मूलतः पत्रकार और संवेदनशील कवि रहे अटल जी के मन में पूरी विश्वमानवता के लिए एक संवेदना है। यह बार-बार उनकी वाणी से, लेखों से कविताओं से मुखर होती है। यही भारतीय तत्व है। इसके चलते ही उनके विदेश मंत्री रहते पड़ोसी देशों से रिश्तों को सुधारने के प्रयास हुए तो प्रधानमंत्री रहते भी उन्होंने इसके लिए प्रयास जारी रखे। भले ही कारगिल का धोखा मिला, पर उनका मन इन सबके विपरीत एक प्रांजलता से भरा रहा। उन्होंने संवाद किया और भरोसा किया। बदले की भावना न तो उनके जीवन में थी न राजनीति में। इसी के चलते वे अजातशत्रु कहे जाते रहे। उनकी यही संवेदना भी इस कविता में व्यक्त होती है-

छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता

टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।

हाजिरजवाबी और संवादशैली-वे अपनी हाजिर जवाबी और मजाकिया अंदाज में गंभीर बात कहने की खूबी से हर किसी का दिल जीत लेते थे। फरूर्खाबाद में 1991 में ऐसे ही एक वाकये को उस दौर के साक्षी लोग आज भी यादों में संजोए हैं। तब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी भाजपा प्रत्याशी ब्रह्मदत्त द्विवेदी के समर्थन में आयोजित जनसभा को संबोधित करने आए थे। मंच काफी ऊंचा बना था तो पहले इस पर ही चुटकी ली। बोले, “मुझे नहीं पता कि मैं मंच पर खड़ा हूं या मचान पर। उनका इतना कहना था कि मैदान में भीड़ के बीच ठहाकों के साथ तालियां गूंज गई। दरअसल, अटल बिहारी वाजपेयी जी के कार्यक्रम की अचानक सूचना पर आननफानन में एक ट्रक को खड़वा कर उसे मंच का रूप दे दिया गया था।

   भारत-पाक रिश्तों में सहजता लाने के लिए वे 1999 में बस से लाहौर गए थे। वहां पहुंचने पर पाकिस्तानी मीडिया की एक महिला पत्रकार ने उनसे कश्मीर को लेकर सवाल पूछने के साथ ही शादी का प्रस्ताव भी दे दिया। महिला पत्रकार ने कहा, “मैं आपसे शादी करना चाहती हूं, लेकिन मुंह दिखाई में कश्मीर लूंगी।इस पर अटल जी ने खूबसूरत जवाब देकर सबको हैरान कर दिया। उन्होंने कहा, “मैं शादी के लिए तैयार हूं, लेकिन मुझे दहेज में पूरा पाकिस्तान चाहिए।उनका यह जवाब मीडिया की सुर्खियां बन गया था और काफी चर्चित रहा। ऐसे अनेक उदाहरण अटल जी की हाजिर जबावी के मशहूर हैं। एक बार वे मेरे शहर बस्ती (उत्तर प्रदेश) में थे। वहां की सभा में काफी विलंब से पहुंचे। लोग इंतजार करते रहे और अंततः अटलजी आए। वे बोले, “मैं देर से आया हूं लेकिन दूर से आया हूं।लोगों की तालियों ने उनका समर्थन किया। वे फिर बोले मैंने आज दिल्ली की लोकसभा सीटों पर प्रचार किया और उन्हें मथ डाला और इस मंथन से अमृत निकलेगा। उनके भाषण कविता की तरह दिलों में उतर जाते थे। मैंने अमीनाबाद (लखनऊ) में उन्हें एक चुनावी सभा में ही सुना। उन सभा बिजली चली गयी। वे बोलते रहे। भीड़ थोड़ी इधर- उधर हुई तो वो बोले अरे भाई मैं सुनने की चीज हूं, देखने की नहीं। फिर क्या था तालियां बजने लगीं। इस बीच माइक भी बंद हो गया। उन्होंने गहरे व्यंग्यबोध से कहा अरे भाई क्या माइक भी चंदे में लाए हो। इस तरह उनका हास्य, व्यंग्य और सरलता से संवाद दिलों में उतर जाता था।

    सही मायने में राजनीति में उनकी अनुपस्थिति इसलिए भी बेतरह याद की जाती है, क्योंकि उनके बाद मूल्यपरक राजनीति का अंत होता दिखता है। क्षरण तेज हो रहा है, आदर्श क्षरित हो रहे हैं। उसे बचाने की कोशिशें असफल होती दिख रही हैं। आज भी वे एक जीवंत इतिहास की तरह हमें प्रेरणा दे रहे हैं। वे एक ऐसे नायक हैं जिसने हमारे इसी कठिन समय में हमें प्रेरणा दी और हममें ऊर्जा भरी और स्वाभिमान के साथ साफ-सुथरी राजनीति का पाठ अपने समूचे जीवन और संवाद से अटलजी जो पाठ पढ़ाते हैं उसमें राजनीति कम और राष्ट्रीय चेतना ज्यादा है। सारा जीवन एक तपस्वी की तरह जीते हुए भी वे राजधर्म को निभाते हैं। सत्ता में रहकर भी वीतराग उनका सौंदर्य है। वे एक लंबी लकीर खींच गए हैं, इसे उनके चाहनेवालों को न सिर्फ बड़ा करना है बल्कि उसे दिल में भी उतारना होगा। उनके सपनों का भारत तभी बनेगा और सामान्य जनों की जिंदगी में उजाला फैलेगा।

     स्वतंत्र भारत के इस करिश्माई नेता का व्यक्तित्व और कृतित्व सदियों तक याद किया जाएगा, वे धन्य हैं जिन्होंने अटल जी को देखा, सुना और उनके साथ काम किया है। ये यादें और उनके काम ही प्रेरणा बनें तो भारत को परमवैभव तक पहुंचने से रोका नहीं जा सकता। उनकी कविता और भाषण दोनों देश के लिए हैं। लोगों को जगाने के लिए हैं। ऐसी ही एक कविता में वे कहते हैं-

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।

ऐसी अनेक कविताएं और लोकप्रिय भाषणों से लोगों के दिलों में वे बसे रहे। उन्हें सुनने के लिए विरोधी दलों के लोग भी जाते थे। उनको सुनने का सुख विरल था। लंबे समय तक विपक्ष में रहने के बाद भी उनकी लोकप्रियता अपार थी। लोग बताते हैं कि देश में प्रधानमंत्री के बाद अगर किसी की सभा में स्वस्फूर्त सर्वाधिक लोग आते थे तो वे अटल जी थे। उन्होंने वाक् को साध लिया था। उसी की आराधना की थी। अनोखे संचारक, विरल वक्ता, संवेदनशील कवि, मंचों के नायक, अप्रतिम संसदविद् जैसी उनकी अनेक छवियां हैं। वे संचार के महानायक थे। लोक में व्याप्त उनकी स्मृति इतनी सघन है कि आज भी लोग उनका नाम सुनकर श्रद्धा से भर जाते हैं।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

भारतीय संस्कृति, धर्म और नीति की शिक्षा के पक्षधर थे मालवीय : मुरली मनोहर जोशी


राष्ट्र निर्माण था अटल बिहारी वाजपेयी की पत्रकारिता का लक्ष्य : अशोक टंडन

भारतीय जन संचार संस्थान में 'शुक्रवार संवादकार्यक्रम का आयोजन



नई दिल्ली23 दिसंबर। भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के उपलक्ष्य में भारतीय जन संचार संस्थान द्वारा आयोजित 'शुक्रवार संवाद' को संबोधित करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि पंडित मदन मोहन मालवीय भारतीय संस्कृतिधर्म और नीति की शिक्षा के पक्षधर थे। महामना के शिक्षा दर्शन के मूल में विद्यार्थियों के शारीरिकमानसिकबौद्धिक और आध्यात्मिक विकास की अवधारणा थी। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के तत्कालीन मीडिया सलाहाकार श्री अशोक टंडनआईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदीअपर महानिदेशक श्री आशीष गोयलडीन (अकादमिक) प्रो. गोविंद सिंह एवं डीन (छात्र कल्याण) प्रो. प्रमोद कुमार सहित आईआईएमसी के सभी केंद्रों के संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।

'मदन मोहन मालवीय की शिक्षा दृष्टि' विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि मालवीय जी स्वतंत्रता सेनानीराजनीतिज्ञ और शिक्षाविद् ही नहींबल्कि एक बड़े समाज सुधारक भी थे। देश से जातिगत बेड़ियों को तोड़ने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान था। उनका कहना था कि जो शिक्षा लोगों में भेदभाव करेगीवो हमें स्वीकार नहीं है।

डॉ. जोशी ने कहा कि मालवीय जी की दूरदृष्टि कहां तक जाती थीइस पर समग्र रूप से विचार करने के लिए उनके जीवन के विविध पहलुओं का अध्ययन आवश्यक है। मालवीय जी भारतीय समाज एवं राष्ट्र के निर्माण के लिए ऐसे लोगों का सृजन करना चाहते थेजो समग्र रूप से विकसित होंआधुनिक ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में दक्ष हों और भारतीय संस्कृति में निहित मूल्यों पर चलने वाले हों।

इस अवसर पर 'अटल बिहारी वाजपेयी और पत्रकारिता के मूल्य' विषय पर विचार व्यक्त करते हुए श्री अशोक टंडन ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते थे। अटलजी जनता की बातों को ध्यान से सुनते थे और उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करते थे। श्री टंडन ने कहा कि अटल जी ने कठिन परिस्थितियों में पत्रकारिता की शुरुआत की और वह अखबार में खबर लिखनेसंपादन करने और प्रिंटिंग के साथ साथ समाचार पत्र वितरण का कार्य भी स्वयं करते थे।

श्री टंडन के अनुसार अटल जी ने मूल्यों की पत्रकारिता की और इसी वजह से आज भी पत्रकार अटल जी को अपना रोल मॉडल मानते हैं। उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी राजनेता बनने से पहले एक पत्रकार थे। वह देश और समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा से पत्रकारिता में आए थे। उनके जीवन का लक्ष्य पत्रकारिता के माध्यम से पैसे कमाना नहींबल्कि राष्ट्र निर्माण था। उनकी कविताएं नौजवानों में उत्साह जगाने वाली थीं। अटल जी का मानना था कि समाचार पत्रों के ऊपर एक बड़ा राष्ट्रीय दायित्व है। भले ही हम समाचार पत्रों की गणना उद्योग में करेंलेकिन समाचार पत्र केवल उद्योग नहीं हैंउससे भी कुछ अधिक हैं।

कार्यक्रम का संचालन डिजिटल मीडिया विभाग की प्रमुख डॉ. रचना शर्मा ने किया।

शनिवार, 18 अगस्त 2018

भारतीय राष्ट्रवाद के प्रखर प्रवक्ता अटल जी


भारतीय प्रतिपक्ष के सबसे चमकदार नेता, जिसने कभी अपनी प्रासंगिकता नहीं खोयी
-प्रो.संजय द्विवेदी



         अटलजी नहीं रहे। पिछले दस वर्षों से सार्वजनिक जीवन में उनकी अनुपस्थिति के बाद भी मन को यही सूचना भरोसा देती थी कि वे हैं और हमारे बीच हैं। उनका मौन भी इतना मुखर था कि उनकी अनुपस्थिति कभी खली ही नहीं। वे हम सब भारतीयों के मन में ऐसे रचे-बसे थे कि लगता था कि जब हमें जरूरत होगी वे जरूर बोल पड़ेगें। पिछले छः दशकों से उनकी समूची सार्वजनिक जीवन की यात्रा में भारत और देश-देशांतर को नापती हुयी उनकी अनेक छवियां हैं। पूरे भारत को उन्होंने मथ डाला था। सार्वजनिक जीवन में उपस्थित वे एक ऐसे यायावर थे जिनमें निरंतर संवाद करने की शक्ति थी। वे ही थे जो भाषणों से, लेखों से, कविताओं से और देहभाषा से देश को संबोधित करते और चमत्कृत करते आ रहे थे। हर व्यक्ति का समय होता है। जब वह शिखर पर होता है। लेकिन अटल जी का कोई समय ऐसा नहीं था, जब वे घोर नेपथ्य में रहें हों। वे भारतीय प्रतिपक्ष के सबसे चमकदार नेता थे, जिसने कभी अपनी प्रासंगिकता नहीं खोयी। पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु से लेकर डा. मनमोहन सिंह को सत्ता सौंपने तक वे जीवंत, प्राणवान, स्फूर्त और प्रासंगिक बने रहे।  
       अटलजी भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे प्रखर और मुखर प्रवक्ता थे। उन्होंने अपनी युवावस्था में जिस विचार को स्वीकार किया, उसका जीवन भर साथ निभाया। सही मायनों में वे विचारधारा के प्रति अविचल प्रतिबद्धता के भी उदाहरण हैं। एक विचार के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देने की भावना से वे ताजिंदगी लैस रहे। उन्होंने जो कहा उसे जिया और अपने जैसै हजारों लोग खड़े किए। एक पत्रकार, संपादक, लेखक, कवि, राष्ट्रनेता, संगठनकर्ता, संसदविद्, हिंदीसेवी, प्रखर वक्ता, प्रशासक जैसी उनकी अनेक छवियां हैं और वे हर छवि में पूर्ण हैं। इस सबके बीच उनकी सबसे बड़ी पहचान यही है कि वे भारतीय राष्ट्रवाद के हमारे समय के सबसे लोकप्रिय नायक हैं। वे अपने हिंदुत्व पर गौरव करते हुए भारतीयता की समावेशी भावना के ही प्रवक्ता हैं। शायद इसीलिए वे लिख पाते हैं-
होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम
मैंने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम। 
गोपालराम के नामों पर कब मैंने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिंदू करने घरघर में नरसंहार किया
कोई बतलाए काबुल में जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी
भूभाग नहीं, शतशत मानव के हृदय जीतने का निश्चय। 
हिंदू तनमन, हिंदू जीवन, रगरग हिंदू मेरा परिचय!
     भारतीय राजनीति में होते हुए भी अटल जी राजनीति की तंग सीमाओं से नहीं घिरे। वे व्यापक हैं, विस्तृत हैं और अपने विचारों में भारतीय जीवन मूल्यों का अवगाहन करते हैं। उनकी सोच पूरी सृष्टि के लिए है, वे भारत की आत्मा में रचे-बसे हैं। इसीलिए वे हमें अपने जीवन से भी सिखाते हैं और वाणी से भी। उनकी वाणी, जीवन और कृति हमें भारतीयता का ही पाठ देते हैं। वे अपनी भाव-भंगिमा, सरलता और व्यवहार से भी सिखाते हैं। भारत उनकी वाणी में, उनकी सांसों में पलता है। भारतीयता को वे अपने तरीके से पारिभाषित करते रहे हैं। उनमें हिंदुत्व का आग्रह था पर वे जड़वादी या कट्टर कहीं से भी नहीं हैं। वे हिंदुत्व को उसके सही संदर्भों में समझते और व्याख्यायित करते हैं। अपनी कविता में वे लिखते हैं-
मैं अखिल विश्व का गुरु महान, देता विद्या का अमरदान। 
मैंने दिखलाया मुक्तिमार्ग, मैंने सिखलाया ब्रह्मज्ञान। 
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर। 
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर
   अटलजी भारतप्रेमी हैं। वे भारतीयता और हिंदुत्व को अलग-अलग नहीं मानते। उनके लिए भारत एक जीता जागता राष्ट्रपुरूष है। वे अपनी कविताओं में प्रखर राष्ट्रवादी स्वर व्यक्त करते हैं। उनकी राजनीति भी इसी भाव से प्रेरित है। इसलिए उनका दल यह कह पाया- दल से बड़ा देश। राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पित कर देने की भावना वे बार-बार व्यक्त करते हैं। भारत का सांस्कृतिक एकता और उसके यशस्वी भूगोल को वे एक कविता के माध्यम से व्यक्त करते हैं।  वे लिखते हैं -
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,/ जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।…..
इसका कंकर-कंकर शंकर है,/ इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये,/ मरेंगे तो इसके लिये।
     अटलजी मूलतः कवि और पत्रकार हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में थे और उन्हें पं. दीनदयाल उपाध्याय राजनीति में ले आए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वे प्रतिबद्ध स्वयंसेवक रहे। ताजिंदगी राष्ट्र प्रथम उनका जीवन मंत्र रहा। राजनीति की काली कोठरी में भी वे निष्पाप और निष्कलंक रहे। अपने समावेशी भारतीय चरित्र की छाप उन्होंने राजनीति पर भी छोड़ी। गठबंधन सरकारों को चलाने का अनुपम प्रयोग किया। 1967 में संविद सरकारें बनीं, 1977 में जनता प्रयोग, नवें दशक में वीपी सिंह की जनता दल सरकार और बाद में वे खुद इस प्रयोग के सर्वोच्च नायक बने। वे पांच साल सरकार चलाने वाले पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। उनके व्यक्तित्व ने ही यह संभव किया था कि विविध विरोधी विचारों को साथ लेकर वे चल सके। लंबे समय तक प्रतिपक्ष के नेता के नाते उनकी भाषणकला, कविता का कौशल उनकी पूरी राजनीति पर इस तरह भारी है कि उनके राजनायिक कौशल, कूटनीतिक विशेषताओं और सुशासन की पहल करने वाले प्रशासक की उनकी अन्य महती भूमिकाओं पर नजर ही नहीं जाती। जबकि एक विदेशमंत्री और प्रधानमंत्री के नाते की गयी उनकी सेवाओं का तटस्थ मूल्यांकन और विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए हमें उनकी कई विशेषताओं का पता लगता है।  अब समय आ गया है कि उनकी इन विशिष्टताओं का मूल्यांकन जरूर करना चाहिए।
     संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को गुंजायमान करने के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। विदेश मंत्री के रूप में दुनिया के तमाम देशों के साथ उन्होंने जिस तरह से रिश्ते बनाए वे उन्हें एक वैश्विक राजनेता के तौर पर स्थापित करते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में सड़कों का संजाल बिछाने और संचार क्रांति खासकर मोबाइल क्रांति के जनक के रूप में उन्हें याद किया जाना चाहिए। विकास और सुशासन उनके शासन के दो मंत्र रहे। यहां यह बात भी खास है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को धर्म-जाति और क्षेत्रवाद की गलियों से निकाल कर विकास  और सुशासन के दो मंत्रों के आधार खड़ा करने की कोशिश की। एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व किस तरह राष्ट्र के बड़े सवालों को केंद्र में लाकर सामान्य मुद्दों को किनारे करता है वे इसके उदाहरण हैं। समन्वयवादी राजनीति और क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पुष्टि करते हुए जिस तरह वे बिना विवाद के तीन राज्यों (उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़) का गठन करते हैं, वह भी उनके नेतृत्व कौशल का ही कमाल था। पोखरण में परमाणु विस्फोट उनकी राजनीतिक दृढृता का उदाहरण ही था। इसी के साथ प्रख्यात वैज्ञानिक  डा.एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाकर उन्होंने यह साबित किया कि भारतीयता के नायकों को सम्मान  देना जानते हैं और कहीं से संकुचित और कट्टर नहीं हैं। भारतीय राजनीति को उन्होंने यह भी संदेश दिया कि हमारे मुस्लिम समाज से हमें कैसे नायकों का चयन करना चाहिए?  आप कल्पना करें कि अटल जी जैसा प्रधानमंत्री और डा. कलाम जैसा राष्ट्रपति हो तो विश्वमंच पर देश कैसा दिखता रहा होगा। इसे अटल जी ने संभव किया। यह एक गहरी राजनीति थी और इसके राष्ट्रीय अर्थ भी थे। किंतु यह थी राष्ट्रीय और राष्ट्रवादी राजनीति।
     काश्मीर के सवाल पर बहुत दृढ़ता से उन्होंने जम्हूरियत, काश्मीरियत और इंसानियत का नारा दिया। पाकिस्तान से बार-बार छल के बाद भी वे बस से इस्लामाबाद गए और बाद में कारगिल में उसे मुंहतोड़ जवाब भी दिया। लेकिन संवाद नहीं छोड़ा क्योंकि वे संवाद नायक थे। किसी भी स्थिति में संवाद की कड़ी न टूटे, वे इस पर विश्वास करते थे। संवाद के माध्यम से हर समस्या हल हो सकती है, वे इस मंत्र पर भरोसा करते थे। उनकी बातें आज भी इसलिए कानों में गूंजती हैं। वे संकटों से मुंह फेरने वालों में नायकों में न थे। वे संवाद से संकटों का हल खोजने में भरोसा रखते थे। इसीलिए पिछले दस सालों का उनका मौन भी एक संवाद था। उनकी छः दशकों की तपस्या मुखर थी। भारत के लगभग हर शहर और तमाम गांवों तक फैली उनकी यादें, संवाद और भाषण लोगों की स्मृतियों में हैं। वे नहीं हैं, पर हैं। दिल्ली ही नहीं, देश का हर नागरिक अगर उनकी अंतिम यात्रा में खुद को शामिल करना चाहता था तो यह भी अकारण नहीं था। पांच लाख लोग दिल्ली की सड़कों पर थे। देश के ताकतवर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अटलजी के तमाम अनुयायी राजपुरुष अगर पांच किलोमीटर पैदल चलकर उन्हें विदा देते हैं तो यह सामान्य बात नहीं है।  उनके प्रति भावनाओं का ज्वार सिर्फ दिल्ली नहीं समूचे देश में था, जहां लोग टीवी चैनलों, मोबाइल की स्क्रीनों पर चिपके अपने प्रिय नेता की अंतिम यात्रा को देख रहे थे। यह भी साधारण नहीं था कि पिछले चौदह सालों से नेपथ्य में जा चुके एक नेता के लिए यह दीवानगी युवाओं में भी देखी गयी। ऐसे युवा जो अभी 18-20 के हैं, जिन्होंने अटलजी को न देखा है, न सुना है। उनके प्रधानमंत्री पद पर रहते ये युवा चार या पांच साल के रहे होगें। किंतु यह संभव हुआ और लोग खुद को उनसे जोड़ पाए। भारतरत्न अटल जी इस योग्य थे, इसलिए लोग उनसे खुद को संबद्ध(कनेक्ट) पाए। संवाद के अधिपति को खामोश देखकर, देश मुखर हो गया। देश की आंखें गीली थीं। प्रकृति ने उनकी अंतिम यात्रा के समय नम आँखों से विदाई दी। बारिश की बूंदें दिल्ली के दर्द में यूं ही शामिल नहीं हुयीं। राष्ट्रवादी नायक की विदाई पर समूचे राष्ट्र की पनीली थीं। अटल जी ने खुद का परिवार नहीं बसाया, किंतु उनकी अंतिम यात्रा ने साबित किया कि वे एक महापरिवार के महानायक थे। यह परिवार है- एक सौ पचीस करोड़ भारतीयों का परिवार।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

धर्मांतरणः हंगामा क्यों है बरपा?

                       -  संजय द्विवेदी

   धर्मान्तरण के मुद्दे पर मचे बवाल ने यह साफ कर दिया है कि इस मामले पर शोर करने वालों की नीयत अच्छी नहीं है। किसी का धर्म बदलने का सवाल कैसे एक सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाया जाता है और कैसे इसे मुद्दा बनाने वाले धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनाने के विषय पर तैयार नहीं होते, इसे देखना रोचक है। भारत जैसे देश में जहां बहुत सारे पंथों को मानने वाले लोग रहते हैं यह विषय चर्चा के केंद्र में रहा है। खासकर ईसाई मिशनरियों और मुस्लिम संगठनों की विस्तारवादी नीति के चलते यह मुद्दा हमेशा उठता आया है। लेकिन जादू यह है कि धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनाने के लिए अल्पसंख्यक संगठन और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल तैयार नहीं हैं। यहीं पर हमारे विचारों के दोहरेपन का पता चलता और नीयत का भी। यानि हिंदू समाज के लोग धर्म बदलते रहें तो कोई समस्या नहीं किंतु कोई अन्य धर्मावलंबी हिंदू बन जाए तो पहाड़ सिर पर उठा लो। मतलब आप करें तो लीला कोई अन्य करे तो पाप
   आप देखें तो धर्मांतरण की बढ़ती वृत्ति ने ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार को गिरिजनों और आदिवासियों के बीच जाकर काम करने की प्रेरणा का आधार भी दिया है। आज ईसाई मिशनरियों की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित वनवासी कल्याण आश्रम और सेवाभारती जैसे संगठनों के कार्यकर्ता आपको आदिवासियों, गिरिजनों एवं वंचितों के बीच कार्य करते दिख जाएंगे। बात सिर्फ सेवा को लेकर लगी होड़ की होती तो शायद इस पूरे चित्र में हिंसा को जगह नहीं मिलती । लेकिन धर्मबदलने का जुनून और अपने धर्म बंधुओं की तादाद बढ़ाने की होड़ ने सेवाके इन सारे उपक्रमों की व्यर्थता साबित कर दी है। हालांकि ईसाई मिशनों से जुड़े लोग इस बात से इनकार करते हैं कि उनकी सेवाभावना के साथ जबरिया धर्मान्तरण का लोभ भी जुड़ा है। किंतु विहिप और संघ परिवार इनके तर्कों को खारिज करता है। आज धर्मान्तरण की यह बहस ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां सिर्फ तलवारें भांजी जा रही हैं। तर्क तथा शब्द अपना महत्व खो चुके हैं। जिन राज्यों में व्यापक पैमाने पर धर्मान्तरण हुआ है मसलन मिजोरम, अरुणाचल, मेंघालय, नागालैंड, छत्तीसगढ़ के ताजा हालात तथा कश्मीर में मुस्लिम बहुसंख्या के नाते उत्पन्न परिस्थितियों ने हिंदू संगठनों को इन बातों के लिए आधार मौजूद कराया है कि धर्म के साथ राष्ट्रांतरण की भी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। जाहिर है यह भयग्रंथि हिंदू मानसमें एक भय का वातावरण बनाती है।
   धर्मान्तरण की यह प्रक्रिया और इसके पूर्वापर पर नजर डालें तो इतिहास में तमाम महापुरुषों ने अपना धर्म बदला था। उस समय लोग अपनी कुछ मान्यताओं, आस्थाओं और मानदंडों के चलते धर्म परिवर्तन किया करते थे। वे किसी धर्म की शरण में जाते थे या किसी नए पंथ या धर्म की स्थापना करते थे। लंबे विमर्शों, बहसों और चिंतन के बाद यथास्थिति को तोड़ने की अनुगूंज इन कदमों में दिखती थी। गौतम बुद्ध, महावीर द्वारा नए मार्गों की तलाश इसी कोशिश का हिस्सा था वहां भी एक विद्रोह था। बाद में यह हस्तक्षेप हमें आर्य समाज, ब्रह्मा समाज, रामकृष्ण मिशन जैसे आंदोलनों में दिखता है। धर्म के परंपरागत ढांचे को तोड़कर कुछ नया जोड़ने और रचने की प्रक्रिया इससे जन्म लेती थी। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का बौद्ध धर्म स्वीकारना, एक लालच या राजनीति से उपजा फैसला नहीं था। यह एक व्यक्ति के हृदय और धर्म परिवर्तन की घटना है, उसके द्वारा की गई हिंसा की ग्लानि से उपजा फैसला है। बाद के दिनों में बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकारना एक लंबी विचार-प्रक्रिया से उपजा फैसला था। इसी प्रकार केशवचंद्र सेन भी ईसाई धर्म में शामिल हो गए थे। उदाहरण इस बात के भी मिलते हैं कि शुरुआती दौर के कई ईसाई धर्म प्रचारक ब्राम्हण पुजारी बन गए। कुछ पादरी ब्राह्मण पुजारियों की तरह रहने लगे । इस तरह भारतीय समाज में धर्मातरण का यह लंबा दौर विचारों के बदलाव के कारण होता रहा । सो यह टकराव का कारण नहीं बना । लेकिन सन 1981 में मीनाक्षीपुरम में 300 दलितों द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम ग्रहण करने की घटना ने एक बड़ा रूप ले लिए । सामंतों और बड़ी जातियों के अत्याचार से संतप्त जनों की इस प्रतिक्रिया ने कथित हिंदूवादियों के कान खड़े कर दिए। सही अर्थों में मीनाक्षीपुरम की घटना आजाद भारत में धर्मान्तरण की बहस को एक नया रूप देने में सफल रही । इसने न सिर्फ हमारी सड़ांध मारती जाति-व्यवस्था के खिलाफ रोष को अभिव्यक्त दी वरन हिंदू संगठनों के सामने यह चुनौती दी कि यदि धार्मिक-जातीय कट्टरता के माहौल को कम न किया गया तो ऐसे विद्रोह स्थान-स्थान पर खड़े हो सकते हैं। इसी समय के आसपास महाराष्ट्र में करीब 3 लाख दलितों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया । 26 जनवरी 1999 को तेजीपुर (उ.प्र.) में कई दलित काश्तकारों ने बौद्ध धर्म अपना लिया । लेकिन इन घटनाओं को इसलिए संघ परिवार ने इतना तूल नहीं दिया, क्योंकि वे बौद्धों को अलग नहीं मानते । लेकिन मिशनरियों द्वारा किए जा रहे धर्मान्तरण की कुछेक घटनाओं ने उन्हें चौकस कर दिया । संघ परिवार ने धर्म बदल चुके आदिवासियों को वापस स्वधर्म में लाने की मुहिम शुरू की, जिसमें स्व. दिलीप सिंह जूदेव जैसे नेता आगे आए। इस सबके साथ ईसाई मिशनों की तरह संघ परिवार ने भी सेवा के काम शुरू किए। इससे बिहार के झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में जमीनी संघर्ष की घटनाएं बढ़ी । जिसकी परिणति कई प्रदेशों में हिंसक संघर्ष रूप में सामने आई । इसका इस्तेमाल कर पाक प्रेरित आतंकियों ने भी हिंदू-ईसाई वैमनस्य फैलाने के लिए कुछ सालों पूर्व चर्चों में विस्फोट कराए थे। इन तत्वों की पहचान दीनदार अंजमुन के कार्यकर्ताओं के रूप में हो चुकी है। पूर्वाचल के राज्यों में आईएसआई प्रेरित आतंकियों से चर्च के रिश्ते भी प्रकाश में आए हैं। ऐसे एकाध उदाहरण भी देश के सद्भाव व सह अस्तित्व की विरासत को चोट पहुंचाने के लिए काफी होते हैं। जाहिर है ऐसे संवेदनशील प्रश्नों पर नारेबाजियों के बजाए ठंडे दिमाग से काम लेना चाहिए। लेकिन भारत जैसे विशाल देश में जहां साक्षरता के हालात बदतर हैं, लोग भावनात्मक नारों के प्रभाव में आसानी से आ जाते हैं। जरूरत इस बात की है कि हिंदू समाज धर्मान्तरण के कारकों एवं कारणों का हल स्वयं में ही खोजे। धर्म परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति का बुनियादी हक है। कोई भी व्यक्ति का यह हक उससे ले नहीं सकता, लेकिन इस प्रश्न से पीड़ित जनों को चाहिए कि वे लड़ाई हिंदू समाज में पसरी अमानवीय जाति प्रथा और पाखंडपूर्ण बहुरूपिएपन के खिलाफ शुरू करें।
   समाज को जोड़ने, उसमें समरसता घोलने का दायित्व बहुसंख्यक समाज और उसके नेतृत्व का दावा करने वालों पर है। सामाजिक विषमता के दानव के खिलाफ यह जंग जितनी तेज होती जाएगी। धर्मान्तरण जैसे प्रश्न जिनके मूल में अपमान ,तिरस्कार, उपेक्षा और शोषण है, स्वतः समाप्त करने के बजाए वंचितों के दुख-दर्द से भी वास्ता जोड़ना चाहिए। इस सवाल पर बहुसंख्यक समाज को सकारात्मक रुख अपनाकर बतौर चुनौती इसे स्वीकारना भी चाहिए। इसके दो ही मंत्र हैं-सेवा और सद्भाव ।
   राज्यसभा और लोकसभा को रोककर ये सवाल हल नहीं होंगें। हमें उस मानसिकता को भी देखना होगा जो पूरी दुनिया को एक रंग में रंगना चाहते हैं। क्यों उनमें विपरीत पूजा पद्धतियों के प्रति स्वीकार्यता नहीं है। ये दुनिया इंसानों के रहने लायक दुनिया बने। अगर हम विविधता और बहुलता का सम्मान नहीं करते तो ऐसे संकट हमारे सामने हमेशा खड़े होंगें। धर्म के लिए खून बहाते लोग अपने धर्म बंधुओं के भी खून की होली खेल रहे हैं। मानवता पर ऐसे विचार बोझ समान ही हैं। हमारी देश की परंपरा सबको आदर देने और सभी पंथों को मान देने की रही है। यहां धर्म जीवन शैली के रूप में पारिभाषित है। यह अधिनायकवादी वृत्तियों का वाहक नहीं है। हमारा धर्म उदात्त मानवीय संवेदना और सहअस्तित्व पर आधारित है। इसे खून बहा रही जमातों, लालच के आधार पर या धोखे के आधार धर्म बदलने के प्रयासों की प्रतिस्पर्धा में मत देखिए। हमारी अपनी पहचान और स्वायत्ता दूसरों को ही नहीं, विरोधियों को भी आदर देने में है। यही भारतीयता है, इसे आप कायरता कहते हैं तो कहते रहिए। क्योंकि आपकी बहादुरी के किस्सों ने सिर्फ खून बहाया है, अब इसे रोकने की जरूरत है। भारतीय विचार सबको साथ लेकर चलने वाला विचार है,वह किसी के खिलाफ कैसे हो सकता है? हम उन हथियारों से नहीं लड़ सकते, जो दुनिया में अशांति का कारण बने हुए हैं। हमारे समय के सबसे बड़े हिंदू नेता श्री अटलबिहारी वाजपेयी इसी हिंदू दर्शन को व्यक्त करते हुए जो लिखते हैं, वह कविता उनके समर्थकों को जरूर पढ़नी चाहिए। क्योंकि दूसरे विचारों से प्रेरित होकर अपना मूल विचार और स्वभाव छोड़ने की जरूरत कहां हैं? श्रेष्ठ होने का मतलब सभ्य होना भी है, शिष्ठ होना भी है। वह भाषा में भी, व्यवहार में भी और आचरण में भी। बकौल अटल जी-

होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम

मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम।

गोपाल, राम के नामों पर कब मैने अत्याचार किया

कब दुनिया को हिन्दु करने घर घर मे नरसंहार किया।

कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी

भूभाग नही शत शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय।

हिन्दु तन –मन, हिन्दु- जीवन रग- रग हिन्दु मेरा परिचय॥

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

केजरीवालः पलायन या नई मंजिल की तलाश ?


-संजय द्विवेदी
    दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह का वातावरण बनाकर अपनी सरकार को शहीद किया, ऐसे दृश्य भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नहीं देखे गए। सच कहें तो वे एक ऐसे नायक की तरह सामने आए जो अपनी ही सरकार से मुक्ति चाहता था। ऐसा करके अरविंद को क्या हासिल होगा, अभी इसका आकलन होना शेष है किंतु यह तो तय है कि यदि वे चाहते तो सरकार बनी रह सकती थी। कांग्रेस के जिन नेताओं ने इस सरकार को समर्थन दिया था उनको भी कल्पना नहीं रही होगी यह सरकार इतनी जल्दी गिर जाएगी।
   दो महीने से भी कम समय में अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह से काम किया उसने कोई उम्मीद नहीं जगाई पर इतना तो साबित कर ही दिया कि उन पर अराजकतावादी होने का आरोप बहुत नाजायज नहीं है। सत्ता में होकर जिस अपेक्षित धैर्य, गंभीरता और सबको साथ लेकर चलने के औदार्य की जरूरत है, वह अरविंद और उनके साथियों में पहले दिन से नदारद है। देश सेवा के अहंकार से भरी देहभाषा और न जाने किस भ्रष्टाचार से जूझने की कसमें खाते अरविंद की विदाई ने सही मायने में देश को निराश किया है। जिस दौर में गठबंधन एक राजनीतिक मजबूरी हो चुके हों उसमें यह जिद कि पूरा बहुमत मिलने पर ही सरकार चलाएंगें एक तरह का बाल हठ ही है और राजनीतिक नासमझी भी है। 1990 के बाद देश की राजनीति और उसका विमर्श पूरी तरह बदल गया है। खासकर विचारधारा के स्तर पर विविध विरोधी विचारधाराओं के दल भी साथ आकर सरकार चला रहे हैं। आप देखें तो पहले  गठबंधन को लेकर कांग्रेस रवैया खासा अलग रहा है। एक अखिलभारतीय पार्टी होने के नाते वह गठबंधन की सरकारों को समर्थन तो देती रही पर खुद गठबंधनों का नेतृत्व करने से केंद्रीय स्तर पर परहेज करती रही। किंतु राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के रूप में अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के प्रयोग के बाद कांग्रेस की हिचक दूर हुयी और वह सत्ता में पिछले दस सालों से बनी हुयी है। यानि कि विरोधी विचारों के दलों के साथ मिलकर सरकार चलाने की मजबूरी को दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस भी समझते हैं। किंतु दिल्ली की सरकार के नायक केजरीवाल इस बात को नहीं समझ सके। अगर पूर्ण बहुमत मिलने पर ही सरकार बनाना था तो उसी समय आप को सत्ता से दूर हो जाना था जब वह जनता के पास जाकर सत्ता में जाने की अनुमति मांग रहे थे। पर यह कितना विरोधाभास है कि जो पार्टी सत्ता को लेकर संकोच से इतनी भरी हो कि वह दिल्ली की जनता के बीच जाकर रायशुमारी करती रही। वही सत्ता छोड़ने के वक्त अपने नेता की सनक पर सत्ता से बाहर हो जाती है और दिल्ली के लोगों की राय उसके लिए बेमानी हो जाती है। यानि यह अरविंद और उनके साथियों की मरजी है कि वे कब किस सवाल पर जनता से राय पूछें और कब न पूछें।
       तमाम अप्रिय प्रसंगों के बीच अरविंद और उनके साथी अब सत्ता मुक्त हैं। यानि अब वे अपनी करने के लिए स्वतंत्र और स्वच्छंद भी हैं। लेकिन दिल्ली के बहुत कम दिनों के सत्ता प्रसंग ने उनके द्वंद्वों को उजागर ही किया है। सत्ता ने उनके विचारों और व्यवहारों को दूरी को तो उजागर किया ही है, अहंकार और अहमन्यता से भरी देहभाषा ने उनकी सनकों का भी लोकव्यापीकरण किया है। खुद को उजली परंपरा का उत्तराधिकारी मानना और दूसरों को कीचड़ में लिपटा हुआ कहने की उनको आजादी है किंतु आंदोलनों की उजास और संषर्घ की आंच को उन सबने धीमा किया है ,इसमें दो राय नहीं है। उनका सत्ता छोड़कर भागना बताता है कि वे सत्ता तो चाहते हैं पर अपनी शर्तों पर चाहते हैं। वे यह मानने को तैयार नही हैं कि दिल्ली विधानसभा की 70 में वे सिर्फ 28 सीटें वे जीते हैं और शेष दिल्ली ने जनादेश दूसरे दलों को दिया है। ऐसे में शेष जनादेश प्राप्त दलों को हाशिए पर रखकर, उनकी आवाज न सुनकर वे एक अधिनायकत्व से भरी पारी खेलना चाहते हैं। जाहिर है लोकतंत्र में इस तरह के हठों के लिए जगह कहां है। समन्वय,संवाद और लोकतांत्रिक विमर्श में उनका यकीन ही नहीं दिखता। वे संवाद को सिर्फ सौदा समझते हैं। जबकि संवाद, लोकतंत्र की बुनियाद बनाता है। अगर संवाद न होगा तो लोकतंत्र के मायने क्या रह जाएंगें? आरोप- आरोप और आरोप की राजनीति इस देश को कहीं नहीं ले जाएगी, हमें यह समझने की जरूरत है।
    एक मुख्यमंत्री के नाते वे जनता का बहुत भला कर सकते थे। लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के दर्द को कम कर सकते थे। किंतु वे भाग गए, इस पलायन में भी वे अवसर ढूंढ सकते हैं। किंतु इसे कहा तो पलायन ही जाएगा। एक ऐसी चीज के लिए जिद जो हो नहीं सकती ,वह बताती है कि अरविंद किस कदर सरकार गिराने पर आमादा थे और सरकार की शहादत के नाम पर आगामी लोकसभा चुनाव में अपने दल का विस्तार चाहते थे। उनकी घबराहट और पलायन दोनों के संदेश साफ हैं कि वे सत्ता के साथ सहज नहीं थे। उन पर पड़ने वाले दबावों को वे झेल सकने की स्थिति में नहीं थे। उनका राजनीतिक डीएनए एक विद्गोही का है, सो सत्ता में रहते हुए वे उस तरह के आचरण करने पर आलोचना की जद में आ रहे थे (याद कीजिए उनका दिल्ली के सीएम के रूप में दिया गया घरना)। आप देखें तो पूरी राजनीतिक प्रक्रिया और तंत्र को लांछित करते अरविंद और उनके साथी मीडिया के द्वारा जरा सी आलोचना पर किस कदर बौखला पड़ते हैं। भाषा और उसके संयम का तो खैर जाने ही दीजिए। अरविंद और उनके साथियों ने सही मायने में देश की जनता और दिल्ली के लोगों से छल किया है। उन्होंने उन लोगों की उम्मीदों के साथ छल किया है, जो उनकी तरफ बहुत आशा से देख रहे थे। दिल्ली की सरकार को पूरी तनदेही और जवाबदेही से चलाते हुए वे एक जनपक्षधर राजनेता की तरह उभर सकते थे।

   अब सवाल यह है कि जिनसे एक छोटा सा राज्य दिल्ली और दो दलों का गठबंधन नहीं संभलता वे केंद्रीय राजनीति में आकर क्या करना चाहते हैं? यहां उन्हें कैसे और कब पूर्ण बहुमत मिलेगा और कब वे सत्ता के लिए तैयार होंगें, कहा नहीं जा सकता। अरविंद अपनी अपनी तमाम खूबियों के बावजूद अंततः एक आंदोलनकारी हैं। यही उनकी शक्ति और सीमा दोनों है। जबकि देश को एक मजबूत, कद्दावर प्रशासक का इंतजार है। जो देश को उसकी तमाम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, व क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ साध सके। दिल्ली में गठबंधन की ही सही, पर एक मजबूत सरकार दे सके। जो देश के सवालों से टकरा सके न कि उनका सामना होते ही पलायन कर जाए। आम आदमी पार्टी ने देश के लोगों की तमाम सदिच्छाओं के बावजूद जिस तरह निराश किया है, उसमें यही लगता है यह दल भी कुछ विद्रोही युवाओं का संगठन बनकर रह जाएगा। भारत जैसे महादेश के प्रश्नों और उसके मर्म तक पहुंचकर उसके प्रश्नों से जूझने की शक्ति तो फिलहाल आप में नहीं दिखती। उसके साथ जुड़े तमाम बुद्धिजीवी, रचनाकारों और पत्रकारों को चाहिए वे एक लंबी और सुदीर्ध तैयारी के साथ लोगों के बीच प्रकट हों, तभी यह देश आप जैसे प्रयोगों पर भरोसा कर पाएगा। लोगों की भावनाओं से खेलने ,उन्हें उद्वेलित करने और उनका इस्तेमाल करने से इस तरह के तमाम भावी प्रयोग और आंदोलन भी शक के घेरे में आएंगें कृपया ऐसा मत कीजिए। उम्मीद है कि कि आम आदमी पार्टी अपने भावी कदमों में अपेक्षित परिपक्वता का परिचय देगी और देश की जनाकांक्षाओं को सही संदर्भ में समझकर आचरण करेगी।