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मंगलवार, 30 जुलाई 2024

'सरस्वती प्रज्ञा सम्मान' से अलंकृत किए गए प्रो.संजय द्विवेदी



भोपाल। प्रख्यात मीडिया शिक्षक और लेखक प्रो.संजय द्विवेदी को 'सरस्वती प्रज्ञा सम्मान -2024' से सम्मानित किया गया है। उन्हें यह सम्मान भोपाल स्थित गांधी भवन में निर्दलीय प्रकाशन,जन संगठन दृष्टि की ओर से आयोजित समारोह में पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार श्री विजयदत्त श्रीधर ने प्रदान किया। इस अवसर पर नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय के प्रो.विजय कुमार कर्ण, गांधी भवन न्यास के सचिव दयाराम नामदेव, पत्रकार कैलाश आदमी, गांधीवादी विचारक आर के पालीवाल, प्रिंस अभिषेक अज्ञानी विशेष रूप से उपस्थित थे।

  प्रो.संजय द्विवेदी भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक हैं। वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के प्रभारी कुलपति भी रह चुके हैं। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण समाचार पत्रों में संपादक के रूप में काम किया है। मीडिया और राजनीतिक संदर्भों पर उनकी 35 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सक्रिय पत्रकार,लेखक और संपादक के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई है।

  इस अवसर पर अपने संबोधन में प्रो.द्विवेदी ने कहा हमारा मीडिया पश्चिमी मानकों पर खड़ा है, उसे भारतीय मूल्यों पर आधारित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि समाज के सब क्षेत्रों की तरह मीडिया भी औपनिवेशिक विचारों से मुक्त नहीं हो सका है। हमें संचार, संवाद की भारतीय अवधारणा पर काम करते हुए लोक-मंगल को केंद्र में रखना होगा और संचार के भारतीय माडल बनाने होंगे। इसके लिए समाधानपरक पत्रकारिता का विचार प्रासंगिक हो सकता है। कार्यक्रम का संचालन विमल भंडारी ने किया।

जिम्मेदारियों को बढ़ाता है सम्मान : प्रो. संजय द्विवेदी


 -खुशी फॉउण्डेशन एवं दिशा एजुकेशनल सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में सेवा शिखर सम्मान समारोह आयोजित

- विभिन्न क्षेत्रों की महान विभूतियों को सम्मान से नवाजा गया 



लखनऊ 27 जुलाई  - खुशी फॉउण्डेशन और दिशा एजुकेशनल सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को बौद्ध शोध संस्थान, गोमतीनगर के सभागार में सेवा शिखर सम्मान समारोह-2024 आयोजित किया गया। समारोह की अध्यक्षता  भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रो(डॉ ) संजय द्विवेदी ने की। 

प्रो. संजय द्विवेदी ने  कहा कि प्रतिभाओं के सम्मान से समाज में सकारात्मक चेतना पैदा होती है और लोग अच्छे कामों को करने हेतु प्रेरित होते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय परिवारों की शक्ति उनकी मूल्यनिष्ठा ही है। संस्कृति, संस्कार और परम्पराओं की रक्षा से ही भारत श्रेष्ठ बनेगा। खुशी समय जैसी संस्थाएं देश को जीवंत बनाए रखने में सहयोगी हैं। प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी ने कहा कि सेवा के बदले में मिलने वाले सम्मान की ख़ुशी ही कुछ अलग होती है। यह सम्मान समाज के अन्य लोगों में सेवा भाव को जगाने का पुनीत कार्य करता है। प्रो. द्विवेदी ने इस भव्य आयोजन के लिए ख़ुशी फाउंडेशन और दिशा एजुकेशनल सोसायटी के प्रतिनिधियों का आभार जताया। इसके साथ ही समाज के कमजोर वर्ग के हित में किये जा रहे उनके कार्यों को सराहा। 

इस मौके पर बौद्ध शोध संश्तान के अध्यक्ष हरगोविंद बौद्ध ने कहा कि सम्मान से नवाजी गयीं विभिन्न क्षेत्रों की महान विभूतियों के चेहरों पर ख़ुशी की झलक साफ़ देखी जा सकती थी। संस्था द्वारा सम्मानित लोगों की जिम्मेदारी अब और बढ़ जाती है कि वह और मनोयोग से अपने-अपने क्षेत्र में कार्य कर दूसरों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करें। कार्यक्रम को पापुलेशन सर्विसेज इंटरनेशनल इंडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मुकेश कुमार शर्मा ने सम्बोधित किया और कार्यक्रम की भरपूर सराहना की ।  धन्यवाद ज्ञापन दिशा एजुकेशनल एवं वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष प्रभात पांडेय ने किया। 

इनको मिला सम्मान : संतोष गुप्ता (सीइओ - इंडियन सोशल रेस्पोंसबिल्टी नेटवर्क), श्री बलबीर सिंह मान(सचिव - उम्मीद), श्री महेंद्र दीक्षित(प्रबंध निदेशक - सिग्मा ट्रेड विंग्स) , सचिन गुप्ता - निदेशक -ओलिवहेल्थ, डॉ आर पी सिंह (निदेशक - खेल, उत्तर प्रदेश), श्रीमती सुमोना एस पांडेय(आकाशवाणी) , मेदांता, लखनऊ,  दीपेश सिंह( ऑर्गॅनिक्स4यू), श्री नरेंद्र कुमार मौर्या (मैनेजिंग डायरेक्टर- रोहित ग्रुप), अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान , श्रीमती ममता शर्मा, श्रीमती रश्मि मिश्रा के अलावा कई अन्य क्षेत्रों में सराहनीय कार्य करने वालों को सेवा गौरव सम्मान से नवाजा गया।  

बच्चों की भाव भंगिमाओं ने लोगों के मन को मोहा : सम्मान समारोह की शुरुआत में पीहू द्विवेदी द्वारा गणेश वंदना एवं सरस्वती के साथ की गयी।  इसके बाद लखनऊ कनेक्शन वर्ल्ड वाइड द्वारा गीत गायन प्रस्तुत किया गया। गार्गी द्विवेदी द्वारा सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुत किया गया। इसके अलावा दीपा अवस्थी एवं निखिल कसुधान द्वारा भी शिव जी को समर्पित नृत्य प्रस्तुत किया गया। वहीं विद्याभूषण सोनी के भी मोहक नृत्य प्रस्तुति ने भी खूब तालियाँ बटोरी ।  प्रतुत और गार्गी द्विवेदी के नृत्य ने लोगों को नृत्यांगना डांस इंस्टीट्युट इंदिरानगर की डायरेक्टर और कोरियोग्राफर अनुपमा श्रीवास्तव की देखरेख में भानवी श्रीवास्तव ने गणेश वंदना प्रस्तुत कर लोगों को मन्त्रमुग्ध कर दिया।



शनिवार, 24 मई 2014

सशक्त समाज के लिए जरूरी है स्वतंत्र पत्रकारिता


                                   


लेखक लोकेन्द्र सिंह की पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' विमोचित 
ग्वालियर, 24 मई। पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं का संप्रेषण नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता में संवेदनशील लेखन होना चाहिए। आज देश में जिस प्रकार से पत्रकारिता और राजनीति में विकृतियां उत्पन्न हो रही हैं, उनके मूल में विदेशी पूंजी निवेश है। इसलिए सशक्त समाज के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता बहुत आवश्यक है। वर्तमान में पत्रकार परतंत्र हो गए हैं, जब तक पत्रकारों को लिखने की आजादी प्राप्त नहीं होगी तब तक हम सशक्त समाज का निर्माण नहीं कर सकते। यह बात गणेश शंकर विद्यार्थी मंच एवं जीवाजी विश्वविद्यालय दूरस्थ शिक्षण अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में 'पत्रकारिता, राजनीति और देश' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में आमंत्रित वक्ताओं ने कही। गालव सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के प्रोडक्शन सहायक लोकेन्द्र सिंह राजपूत की पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' का विमोचन भी किया गया। 
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रघु ठाकुर थे। जबकि अध्यक्षता मुंशी प्रेमचंद सृजनपीठ उज्जैन के निदेशक जगदीश तोमर ने की। विशिष्ट अतिथियों के रूप में आईटीएम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष एवं राजनीतिक विश्लेषक संजय द्विवेदी उपस्थित थे। इस मौके पर स्वदेश के सम्पादक लोकेन्द्र पाराशर दूरस्थ शिक्षण अध्ययनशाला के उप निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा एवं पुस्तक के लेखक लोकेन्द्र सिंह भी मंचासीन थे।

राजनीति और पत्रकारिता एक सिक्के के दो पहलू : रघु ठाकुर
गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रघु ठाकुर ने कहा कि पत्रकारिता और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन्हें धर्म के रास्ते पर चलाना चाहिए। धर्म का तात्पर्य यह है कि वह समाज की पीड़ा को समझें। उन्होंने पत्रकारिता की आजादी की बात करते हुए कहा कि आज देश में लिखने वाले परतंत्र हो गए हैं। जब तक पत्रकारों को लिखने की आजादी नहीं होगी तब तक हम सशक्त समाज का निर्माण नहीं कर सकते। श्री ठाकुर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज राजनीति और पूंजी में एक रिश्ता बन गया है। राजनीति और पूंजी के घालमेल के कारण आज समाज प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को ऐसा लेखन करना चाहिए जिससे समाज सही दिशा पा सके। उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों के मालिक निजी स्वार्थ देखते हैं। पत्रकारों के भले के लिए मालिक नहीं सोच रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी अब तक देश के प्रमुख समाचार पत्रों ने मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की हैं। मजीठिया से संबंधित कोई समाचार भी समाचार-पत्रों में भेजा जाए तो एक लाइन भी नहीं छपेगा। उन्होंने मीडिया के वर्तमान स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के मीडिया के लिए खबर के मुख्य आधार हैं- क्राइम, कॉमेडी, क्रिकेट, सिनेमा और सेलेब्रिटी। सामाजिक सरोकार आज पत्रकारिता में कहीं पीछे छूट गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने आम चुनाव में खर्च की सीमा तय कर दी ७० लाख रुपए। ऐसे में क्या कोई आम आदमी चुनाव लड़ सकेगा। क्या आम आदमी चुनाव में खड़े होकर ७० लाख रुपए खर्च करने के क्षमता रखने वाले व्यक्ति से मुकाबला कर सकेगा। 

सवालों से मजबूत होता है लोकतंत्र : संजय द्विवेदी  
राजनीतिक विश्लेषक और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने कहा कि हिन्दुस्तान को समझने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि जनता को मीडिया और राजनेताओं से सवाल करते रहना चाहिए क्योंकि सवालों से ही लोकतंत्र मजबूत होता है। निष्पक्ष होकर पत्रकार को अपनी कलम चलानी चाहिए। किसी पार्टी विशेष से जुड़कर लिखेंगे तो उस लेखन में वह धार नहीं होगी। किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर लेखन करना भी ठीक नहीं। चुनाव के दौरान कई लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी सुपारी लेकर कलम चला रहे थे कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे। क्यों नहीं बनने देंगे, इसका किसी के पास वाजिब जवाब नहीं था। यह तरीका ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता, राजनीति और देश आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता देश हित में होनी चाहिए। श्री द्विवेदी ने मुजफ्फरनगर के दंगों का जिक्र करते हुए बताया कि मुजफ्फरनगर के दंगों की रिपोर्टिंग गलत तरीके से की गई। इसका नतीजा यहा रहा कि स्थितियां और अधिक बिगड़ीं।  
स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है : रमाशंकर सिंह
कार्यक्रम के विशिष्ट आईटीएम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह  ने कहा कि महात्मा गांधी भी मानते थे कि स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है। उन्होंने कहा कि आज मीडिया और राजनीति में गहरा रिश्ता हो गया है, जिसे समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज शेयर बाजार, सट्टा और सर्वे कई गलत तस्वीरें समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं, जिससे समाज प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान तभी आगे बढ़ेगा जब लोगों में सामाजिक न्याय के लिए भूख पैदा होगी। पत्रकारिता का यह दायित्व है कि लोगों में सामाजिक चेतना की भूख पैदा करे। 

कठपुतलियों की डोर अपने हाथ में ले जनता : लोकेन्द्र पाराशर
स्वदेश के सम्पादक लोकेन्द्र पाराशर ने कहा कि मीडिया और पत्रकारिता में भिन्नता है लेकिन समाज को दोनों एक ही दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया प्रबंधन हो रहा है तो उसमें पत्रकारिता नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज का दर्द लिखने के लिए लेखक या पत्रकार के मन में आग होनी चाहिए। यह आग एक से दूसरे के मन में जलनी चाहिए। पुस्तक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश कठपुतलियों के हाथ में नहीं होना चाहिए। अगर कठपुतलियों के हाथ में देश है भी तो इन कठपुतलियों की डोर हमारे हाथ में होनी चाहिए, किसी और के हाथ में डोर नहीं होनी चाहिए।

लोकेन्द्र ने देश के मानस को झकझोरा है : जगदीश तोमर
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश तोमर ने पत्रकारिता और पत्रकार को समाज का महत्वपूर्ण अंग बताया। उन्होंने कहा कि आजादी के समय भी हर पत्रकार एक स्वतंत्रता सेनानी की भूमिका में था। पत्रकार अच्छे से काम कर सके, सकारात्मक पत्रकारिता कर सके इसके लिए समाज को उसका साथ देना चाहिए। पत्रकारिता के मूल्यों में समय के साथ कमी आई है लेकिन यह सही नहीं है कि पत्रकारिता में सब बुरा ही बुरा है। पत्रकारिता एकदम भ्रष्ट हो गई है। पत्रकारिता में अब भी अच्छे लोग हैं। उनका साथ देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता आज भी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और वह अपना धर्म आज भी निभा रही है। श्री तोमर ने 'देश कठपुतलियों के हाथ मेंÓ पुस्तक के लेखक एवं युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह को बधाई देते हुए कहा कि लोकेन्द्र ने अपने आलेखों के माध्यम से देश के मानस को झकझोरने की कोशिश की है। उनके लेखों में सकारात्मकता है। पत्रकारिता को सही मायने में एक विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए। लोकेन्द्र ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से उसी विपक्ष की भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि लोकेन्द्र सिंह के आलेख ही नहीं बल्कि उनकी कहानियां भी विचारोत्तेजक हैं। वे लेखक हैं, कहानीकार हैं, कवि हैं। लोकेन्द्र बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी हैं।

प्रबुद्धजन रहे मौजूद : 
पुस्तक विमोचन समारोह और संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत सहकार्यवाह यशवंत इंदापुरकर, दूरदर्शन केन्द्र ग्वालियर के निदेशक संतोष अवस्थी, वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र श्रीवास्तव, सुरेश सम्राट, राकेश अचल, देव श्रीमाली, जनसम्पर्क विभाग के संयुक्त संचालक डॉ. एच.एल. चौधरी, सुभाष अरोरा, प्रो. ए.पी.एस. चौहान, डॉ. केशव ङ्क्षसह गुर्जर, प्रो. अयूब खान सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन कर किया गया। अतिथियों का स्वागत हरेकृष्ण दुबोलिया, विभोर शर्मा, गिरीश पाल, विवेक पाठक द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन जयंत तोमर ने एवं आभार दूरस्थ शिक्षण अध्ययन के उप निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा ने व्यक्त किया।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

घटनाओं के सुमंगल पक्ष को प्रचारित करे मीडियाः स्वामी निश्चलानंद

आध्यात्मिक संचार को दुनिया में स्थापित करना होगाः कुठियाला

भोपाल, 2 दिसंबर,2011। पुरी पीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती का कहना है कि दिशाहीन व्यापार तंत्र और दिशाहीन शासनतंत्र ने समाज जीवन के हर क्षेत्र को आक्रांत कर रखा है। इसका असर मीडिया पर भी देखा जा रहा है। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पत्रकारिता का धर्म विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।

स्वामी जी ने कहा कि पत्रकारिता को ये दोनों तंत्र निगलने का प्रयास कर रहे हैं, इससे पत्रकारिता लोकमंगल के दायित्व को नहीं निभा पा रही है। इस गठबंधन से निकलने के लिए पत्रकारिता के प्राध्यापकों, मीडियाकर्मियों और मीडिया छात्रों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि जिस देश में नारद मुनि और वेदव्यास जैसे पत्रकार एवं दिव्यदृष्टि संपन्न पुरोधा रहे हों, उस देश की पत्रकारिता में यह स्थितियां खतरनाक हैं। उनका कहना था कि पत्रकार ऐसी मेधा शक्ति उत्पन्न करें, जिससे भविष्य की घटनाओं का भी वे संकेत दे सकें। यह सारा कुछ प्रबल प्रारब्ध के बल से ही हासिल हो सकता है। छात्रों को समझाइस देते हुए स्वामी जी ने कहा कि पत्रकार को यदि समाज और अपना भविष्य उज्जवल बनाना है तो लोभ, भय, भावुकता और अविवेक को छोड़कर आगे आना होगा। इसके अलावा खबरों में सत्य, शिव और सुंदर की तलाश करनी होगी। ऐसी उजली पत्रकारिता ही देश का भविष्य गढ़ सकती है।

स्वामी जी ने कहना था कि मीडिया का आकार-प्रकार बहुत बढ़ गया है, उसका असर भी बढ़ रहा है। ऐसे में आज के मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार और जवाबदेह होने की जरूरत है। किंतु खेद है कि ऐसा नहीं हो रहा है। आज के दौर में मीडिया की पहुंच लोगों की जिंदगी से लेकर निजी घटनाओं तक में हो गयी है। जिसके परिणाम बहुत घातक हो रहे हैं। इसलिए मीडिया को चाहिए कि वह अपनी लक्ष्मणरेखा भी तय करे। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभावों ने हमारे जीवन और संस्कृति को आक्रांत कर रखा है। गुलामी के कालखंड की विकृतियों से हम अभी भी मुक्त नहीं हो सके हैं, इससे निजात पाने की जरूरत है, ताकि भारत का स्वाभिमान, सम्मान और स्वालंबन पूरी दुनिया में स्थापित हो सके। पत्रकारों का आह्वान करते हुए स्वामी जी ने कहा कि प्रत्येक घटना का सुमंगल पक्ष हो सकता है बस हमें उसे स्थापित करने की जरूरत है। उनका कहना था कि पश्चिम की पत्रकारिता हमारा आदर्श नहीं हो सकती। हमें अपने भारतीय विचारों पर खडी पत्रकारिता को स्वीकारना होगा क्योंकि वही हमें दुनिया में सम्मान दिला सकती है और समाज की स्वीकृति पा सकती है।

अपने संबोधन में कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने विश्वविद्यालय में पधारने पर महाराजश्री का स्वागत किया और कहा कि एक संस्कारवान पत्रकार पीढ़ी के निर्माण के लिए विश्वविद्यालय अनेक प्रयास कर रहा है। उन्होंने बताया कि विभिन्न पीठों के माध्यम से विश्वविद्यालय पत्रकारिता के वैकल्पिक दर्शन के निर्माण की भावभूमि तैयार कर रहा है। कुलपति ने कहा कि संचार के क्षेत्र में पूरी दुनिया के सामने आध्यात्मिक संचार के महत्व को स्थापित करते हुए उसे अध्ययन की विषयवस्तु भारत का दायित्व है। उन्होंने शंकराचार्य से आग्रह किया कि वे विश्वविद्यालय परिवार का निरंतर मार्गदर्शन करते रहें और समय-समय पर विद्यार्थियों व अध्यापकों से संवाद करें ताकि हमें सही दिशा मिल सके। कार्यक्रम के प्रारंभ में वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा, विवि के छात्र पराक्रम सिंह शेखावत, छात्रा सुरभि मालू ने अपने विचारों से जगदगुरू के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। पादुका पूजन एवं स्वस्ति वाचन से कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। आयोजन में नगर के अनेक गणमान्य नागरिक, विवि के शिक्षक एवं विद्यार्थी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन राघवेंद्र सिंह ने किया।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

प्रभाष जोशी स्मृति अंक हेतु लेख आमंत्रित

प्रभाष जोशी होने के मायने

त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श द्वारा प्रभाष जोशी स्मृति अंक का प्रकाशन किया जा रहा है। हिंदी पत्रकारिता को पहचान देने वालों में श्री प्रभाष जोशी सबसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। वे पत्रकारिता में प्रयोगधर्मिता एवं सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता के लिए जीवनभर प्रयत्नशील रहे। जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित देश की अग्रणी त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श द्वारा प्रभाष जोशी के योगदान का मूल्यांकन करने का प्रयत्न स्मृति अंक में किया जा रहा है। इस अंक के लिए लेखकगण अपने आलेख, विश्लेषण, यादें, विशेष पत्र और फोटोग्राफ्स भेज सकते हैं। सामग्री भेजने की अंतिम तारीख है 30 दिसंबर 2009। लेखों को इस पते पर भेजिएः संपादक, मीडिया विमर्श, 428, रोहित नगर, फेज-1, भोपाल-462039 (मध्यप्रदेश)। आप अपने लेख mediavimarsh@gmail.com पर मेल भी कर सकते हैं। लेखक अपने बारे में पूरा परिचय जरूर लिखें। मीडिया विमर्श का वेब संस्करण पढ़ने के लिए www.mediavimarsh.com पर विजिट कीजिए।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

दुनिया के तमाम लोग अपनी भाषा खो बैठेगें



भोपाल, 6 अगस्त। हिंदी के प्रख्यात कवि-आलोचक एवं दस्तावेज पत्रिका के संपादक डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का कहना है कि आने वाले समय में भाषा, टेक्नालाजी में कैद हो जाएगी और दुनिया के तमाम लोग अपनी भाषा खो बैठेगें। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा मीडिया की हिंदी और हिंदी का मीडिया विषय पर छात्रों से संवाद कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि हम भाषा के महत्व को समझ रहे होते तो हालात ऐसे न होते। भाषा में ही हमारे सारे क्रियाकलाप संपन्न होते हैं। मीडिया भी भाषा के संसार का एक हिस्सा है। हम जनता से ही भाषा लेते हैं और उसे ज्यादा ताकतवर और पैना बनाकर समाज को वापस करते हैं। इस मायने में मीडियाकर्मी की भूमिका साहित्यकारों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह साधारण नहीं है कि आज भी लोगों का छपे हुए शब्दों पर भरोसा बचा हुआ है। किंतु क्षरण यदि थोड़ी मात्रा में भी हो तो उसे रोका जाना चाहिए। श्री तिवारी ने कहा कि साहित्य की तरह मीडिया का भी एक धर्म है, एक फर्ज है। सच तो यह है कि हिंदी गद्य की शुरूआत ही पत्रकारिता से हुयी है। इसलिए मीडिया को भी अपनी भाषा के संस्कार, पैनापन और शालीनता को बचाकर रखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि भाषा सक्षम है तो उसमें जबरिया दूसरी भाषा के शब्दों का घालमेल ठीक नहीं है।


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि भाषा को लेकर पूरी दुनिया अनेक संघर्षों की गवाह है, किंतु यह दौर बहुत कठिन है जिसमें तमाम भाषाएं और बोलियां लुप्त होने के कगार पर हैं। ऐसे में हिंदी मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह अपनी बोलियों और देश की तमाम भाषाओं के संकट में उनके साथ खड़ी हो। श्री मिश्र ने कहा कि भाषा को जानबूझकर भ्रष्ट नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके पूर्व कुलपति श्री मिश्र ने शाल और श्रीफल से डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का सम्मान किया।


कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया तथा आभार प्रदर्शन मोनिका वर्मा ने किया। इस मौके पर पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष पुष्पेंद्रपाल सिंह, जनसंपर्क विभाग के अध्यक्ष डा. पवित्र श्रीवास्तव, मीता उज्जैन, संजीव गुप्ता, डा. अविनाश वाजपेयी, शलभ श्रीवास्तव तथा विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं मौजूद थे।

आजाद अभिव्यक्ति का माध्यम है ब्लागः रतलामी



ब्लाग की दसवीं सालगिरह पर पत्रकारिता विवि का आयोजन
भोपाल,18 अगस्त। ब्लाग की दसवीं सालगिरह पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग में एक समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर प्रख्यात ब्लागर रवि रतलामी के मुख्यआतिथ्य़ में केक काटकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।


कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री रतलामी ने कहा कि ब्लाग आजाद अभिव्यक्ति का एक ऐसा माध्यम है जिसने हिंदी ही नहीं बल्कि सभी क्षेत्रीय भाषाओं को ताकत दी है। पावर पाइंट के माध्यम से ब्लाग के इतिहास-विकास की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि यह भविष्य का बहुत सशक्त माध्यम है। ब्लागर इसके जरिए न सिर्फ अपनी बात कह सकते हैं वरन इसे पूर्णकालिक रोजगार के रूप में भी अपना सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह ऐसा माध्यम है जिसके मालिक आप खुद हैं और इससे आप अपनी बात को न सिर्फ लोगों तक पहुंचा सकते हैं वरन त्वरित फीडबैक भी पा सकते हैं।


समारोह के अध्यक्ष पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष पुष्पेंद्रपाल सिंह ने कहा कि आज भले ही इस माध्यम में कई कमजोरियां नजर आ रही हैं पर समय के साथ यह अभिव्यक्ति के गंभीर माध्यम में बदल जाएगा। कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया। संचालन कृष्णकुमार तिवारी ने तथा आभार प्रदर्शन देवाशीष मिश्रा ने किया। इस मौके पर प्रवक्ता मोनिका वर्मा, शलभ श्रीवास्तव एवं विभाग के छात्र- छात्राएं मौजूद थे।

सोमवार, 26 मई 2008

0 डा. तिवारी पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से विभूषित



रायपुर। पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से विभूषित होने के बाद 'दस्तावेज के संपादक डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि संवेदना का विकास ही साहित्यिक पत्रकारिता का बुनियादी आदर्श है। भारतीय परंपरा का मूल स्वर सहिष्णुता है, जिसकी कमी के कारण समाज में अशांति का वातावरण बन रहा है।

महंत घासीदास स्मृति संग्रहालय सभागार में आयोजित एक गरिमामय समारोह में गोरखपुर से पिछले तीन दशकों से अनवरत निकल रही त्रैमासिक पत्रिका 'दस्तावेज के संपादक डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को प्रख्यात कवि-कहानीकार विनोद कुमार शुक्ल ने शाल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह, प्रशस्ति पत्र और ग्यारह हजार रुपए नगद देकर पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से विभूषित किया।

पूर्वज साहित्यकार पुरस्कार के लिए नहीं, दंड के लिए पत्रिकाएं निकालते थे - तिवारी
‘साहित्यिक पत्रकारिता की जगह’’ विषय पर अपने व्याख्यान में कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता में सहिष्णुता को प्रोजेक्ट करने की जरूरत है। पूंजी की माया महाराक्षस की तरह मुंह फाड़े खड़ी है, जो आंत्यांतिक रूप से मनुष्य का अहित करने वाली है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज साहित्यकार पुरस्कार के लिए नहीं, दंड के लिए पत्रिकाएं निकालते थे। पत्रकारों का एक पैर पत्रिका के दफ्तर में रहता था, तो दूसरा पैर जेल में। पहले लोग खतरा उठाकर कहना, लिखना चाहते थे। उस युग में साहित्य और अनुशासन एक थे। पत्रकारिता में यदि आदर्श स्थापित करना है, तो हमें पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए। डा. तिवारी ने कहा कि परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष हमारे संपादकों, पत्रकारों को अपनी जमीन, मनुष्यता से दूर कर रहा है। ज्ञान का भंडार किसी को मुक्त नहीं कर सकता।

डा. तिवारी ने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता में आजकल दो विमर्श चर्चित हैं, दलित विमर्श और स्त्री विमर्श। उन्होंने कहा कि ऐसा करके स्त्री और पुरूष को एक-दूसरे के खिलाफ आमने-सामने खड़ा कर दिया गया है। दूसरा क्या वैविध्यपूर्ण जटिल संरचना वाले समाज में दलित बिना सहयोग के अपना उध्दार कर लेंगे। उन्होंने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता दोनों के लक्ष्य समान हैं और संवेदना, सहिष्णुता से ही पत्रकारिता, साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता में नए आयाम स्थापित किए जा सकते हैं।

साहित्य और पत्रकारिता के बीच समन्वय की पहल- हिमांशु द्विवेदी
कार्यक्रम के अध्यक्ष हरिभूमि के प्रबंध संपादक हिमांशु द्विवेदी ने कहा कि मौजूदा समय में जबकि पिता का सम्मान घर के भीतर नहीं बचा है, संजय द्विवेदी द्वारा अपने दादा के नाम पुरस्कार की परंपरा स्थापित करना सराहनीय पहल है। उन्होंने कहा कि संस्कारों से कटने के समय में इस सम्मान से साहित्य और पत्रकारिता के बीच समन्वय स्थापित होगा और नए रिश्तों के संतुलन बनेंगे।

साहित्यिक पत्रकारिता में डॉ. तिवारी का अमूल्य योगदान – विनोद कुमार शुक्ल
मुख्य अतिथि विनोद कुमार शुक्ल ने कहा कि ने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता में अपने अवदान, तेवर के लिए 'दस्तावेज को पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान मिलने और इसके संपादक डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की उपस्थिति से यह सम्मान ही सम्मानित हुआ है। उन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता में डा. तिवारी के योगदान को अमूल्य बताया।

दस्तावेज विचार है – अष्टभुजा शुक्ल
विशिष्ट अतिथि प्रख्यात कवि अष्टभुजा शुक्ल ने कहा कि 'दस्तावेज पत्रिका हाड़-मांस का मनुष्य नहीं है, वह विचार है। हम सब जानते हैं कि विचार का वध संभव नहीं है। यही वजह है कि यह पत्रिका 'जीवेत् शरद: शतम् के साथ 'पश्येव शरद: शतम् के भाव को भी लेकर तीन दशकों में 117 अंक निकल चुकी है।

साहित्यिक पत्रकारिता की डगर कठिन - जोशी
विशिष्ट अतिथि कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता की डगर काफी कठिन है। इस मुश्किल सफर पर तीस सालों से अनवरत चल रही 'दस्तावेज और इसके संपादक डा. तिवारी के योगदान की चर्चा बिना साहित्यिक पत्रकारिता की बात अधूरी है।

कार्यक्रम की शुरुआत में अपने स्वागत भाषण में हरिभूमि, रायपुर के स्थानीय संपादक संजय द्विवेदी ने कहा कि भले ही मेरे दादा और रचनाधर्मी स्वर्गीय पं. बृजलाल द्विवेदी की कर्मभूमि उत्तर प्रदेश है पर छत्तीसगढ़ उनकी याद के बहाने किसी बड़े कृतिकार के कृतित्व को रेखांकित करने की स्थायी भूमि होगी और आयोजक होने के नाते यह मेरे लिए गर्व का विषय भी होगा। उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ का यही सखाभाव आज की वैश्विक खतरों से जूझने की भी वैचारिकी हो सकता है। कार्यक्रम को विशिष्ट अतिथि प्रख्यात कथाकार जया जादवानी और जादूगर ओपी शर्मा ने भी संबोधित किया।

इस अवसर पर पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान के निर्णायक मंडल के सदस्य रमेश नैयर, सच्चिदानंद जोशी, गिरीश पंकज को समिति की संयोजक भूमिका द्विवेदी और संजय द्विवेदी ने स्मृति चिन्ह प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन राजकुमार सोनी ने तथा आभार प्रदर्शन कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के रीडर शाहिद अली ने किया।

इस मौके पर पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजनपीठ के अध्यक्ष बबन प्रसाद मिश्र, छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी के संचालक रमेश नैयर, छत्तीसगढ़ निर्वाचन आयोग के आयुक्त डा. सुशील त्रिवेदी, वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र पांडेय, छत्तीसगढ़ वेवरेज कार्पोरेशन के चैयरमेन सच्चिदानंद उपासने, साहित्य अकादमी के सदस्य गिरीश पंकज, वरिष्ठ पत्रकार बसंत कुमार तिवारी, दैनिक भास्कर के संपादक,दिवाकर मुक्तिबोध, नई दुनिया के संपादक रवि भोई, मनोज त्रिवेदी, पद्मश्री महादेव प्रसाद पांडेय, हसन खान, डा. रामेंद्रनाथ मिश्र, डा. राजेंद्र मिश्र, जयप्रकाश मानस, डॉ. राजेन्द्र सोनी, डा. मन्नूलाल यदु, डा. रामकुमार बेहार, डा. विनोद शंकर शुक्ल, राहुल कुमार सिंह, राम पटवा, नंदकिशोर शुक्ल, राजेश जैन, रमेश अनुपम, डा. राजेंद्र दुबे, संजय शेखर, रामशंकर अग्निहोत्रि, पारितोष चक्रवर्ती राजेंद्र ओझा, डा. सुभद्रा राठौर, सनत चतुर्वेदी, आशुतोष मंडावी, भारती बंधु, डा. सुरेश, राजू यादव, डा. सुधीर शर्मा, जागेश्वर प्रसाद, केपी सक्सेना दूसरे, चेतन भारती, एसके त्रिवेदी, रामेश्वर वैष्णव, बसंतवीर उपाध्याय, गौतम पटेल सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, पत्रकार एवं आम नागरिक उपस्थित उपस्थित थे।

रविवार, 25 मई 2008

छत्तीसगढ़ की पहचान


छत्तीस गढ़ों से संगठित जनपद छत्तीसगढ़ । लोकधर्मी जीवन संस्कारों से अपनी ज़मीन और आसमान रचता छत्तीसगढ़। भले ही राजनैतिक भूगोल में उसकी अस्मितावान और गतिमान उपस्थिति को मात्र 7-8 वर्ष हुए हैं, पर सच तो यही है कि अपने सांस्कृतिक हस्तक्षेप की सुदीर्घ परंपरा से वह साहित्य के राष्ट्रीय क्षितिज में ध्रुवतारा की तरह स्थायी चमक के साथ जाना-पहचाना जाता है । यदि उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान आदि से हिंदी संस्कृति के सूरज उगते रहे हैं तो छत्तीसगढ़ ने भी निरंतर ऐसे-ऐसे चाँद-सितारों की चमक दी है जिससे अपसंस्कृति के कृष्णपक्ष को मुँह चुराना पड़ा है । जनपदीय भाषा- छत्तीसगढ़ी के प्रति तमाम श्रद्धाओं और संभ्रमों के बाद यदि हिंदी के व्यापक वृत में छत्तीसगढ़ धनवान बना रहा है तो इसमें उस छत्तीसगढ़िया संस्कार की भी भूमिका भी रेखांकित होती है जिसकी मनोवैज्ञानिक उत्प्रेरणा के बल पर आज छत्तीसगढ़ सांवैधानिक राज्य के रूप में है । कहने का आशय यही कि ब्रज, अवधी आदि लोकभाषाओं की तरह उसने भी हिंदी को संपुष्ट किया है । कहने का आशय यह भी कि लोकभाषाओं के विरोध में न तो राष्ट्रीय हिंदी रही है न ही छत्तीसगढ़ की हिंदी । इस वक्त यह कहना भी मेरे लिए ज़रूरी होगा कि छत्तीसगढ़ की असली पहचान उसकी सांस्कृतिक अस्मिता है, जिसमें भाषायी तौर पर हिंदी और सहयोगी छत्तीसगढ़ी दोनों की सांस्कृतिक उद्यमों, सक्रियताओं, प्रभावों और संघर्षों को याद किया ही जाना चाहिए।


आज जब समूची दुनिया में (और विडम्बना यह भी कि भारतीय बौद्धिकी में भी) अपने इतिहास, अपने विरासत और अपने दिशाबोधों को बिसार देने का वैचारिक चिलम थमाया जा रहा है । पृथक किन्तु उज्ज्वल अस्मिताओं को लीलने के लिए वैश्वीकरण को खड़ा किया जा रहा है । अपनी सुदीर्घ उपस्थितियों को रेखांकित करते रहना ज़रूरी हो गया है । सो मैं आज की इस महत्वपूर्ण आयोजन का फायदा उठाते हुए छत्तीसगढ़ की साहित्यिकता पर स्वयं को केंद्रित करना चाहूँगा । बात मैं समकालीन साहित्यक विभूतियों, प्रतिभाओं, नायकों और उनके कृतित्व पर नहीं बल्कि उस अतीत की ज़मीन का विंहगावलोकन चाहूँगा जिसके बिना समकालीनता के पैर लड़खड़ा सकते हैं । और इसलिए भी कि समकालीन रचनात्मकता और स्थायी दिव्यता के बीच अभी समय की आलोचकीय आँधी बाक़ी है । जबकि हमारे श्रेष्ठ पुरातन की समकालीनता आज भी हम सबको अपने पास बुलाती है ।

तो सीधे-सीधे मै अपने मूल कथन की ओऱ लौटता हूँ - पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक वल्लभाचार्य ने पूर्व मीमांसा, भाषा उत्तर मीमांसा या ब्रज सूत्र भाषा, सुबोधिनी, सूक्ष्मटीका, तत्वदीप निबंध तथा सोलह प्रकरण की रचना की, जो रायपुर जिले के चम्पारण (राजिम के समीप) में पैदा हुए थे। अष्टछाप के संस्थापक विट्ठलाचार्य उनके पुत्र थे। मुक्तक काव्य परम्परा की बात करें तो राजा चक्रधर सिंह सबसे पहले नज़र आते हैं । वे छत्तीसगढ़ के गौरव पुरुष हैं। उनके जैसा संस्कृति संरक्षक राजा विरले ही हुए हैं । वे हिन्दी साहित्य के युग प्रणेता पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का जीवनपर्यन्त नियमित आर्थिक सहयोग करते रहे। रम्यरास, जोश-ए-फरहत, बैरागढ़िया राजकुमार, अलकापुरी, रत्नहार, काव्यकानन, माया चक्र, निकारे-फरहत, प्रेम के तीर आदि उनकी ऐतिहासिक महत्व की कृतियां हैं। उनकी कई कृतियाँ 50 किलो से अधिक वजन की हैं ।

भारतेंदु युग का जिक्र करते ही ठाकुर जगमोहन सिंह का नाम हमें चकित करता है, जिनकी कर्मभूमि छत्तीसगढ़ ही रहा और जिन्होंने श्यामा स्वपन जैसी नई भावभूमि की औपन्यासिक कृति हिन्दी संसार के लिए रचा। वे भारतेन्दु मंडल के अग्रगण्य सदस्य थे। जगन्नाथ भानु, मेदिनी प्रसाद पांडेय, अनंतराम पांडेय को इसी श्रृंखला मे याद किया जाना चाहिए । यहाँ सुखलाल प्रसाद पांडेय का विशेष उल्लेख करना समीचीन होगा कि उन्होंने शेक्सपियर के नाटक कॉमेडी ऑफ एरर्स का गद्यानुवाद किया, जिसे भूलभुलैया के नाम से जाना जाता है।

द्विवेदी युग में भी छत्तीसगढ़ की धरती ने अनेक साहित्य मनीषियों की लेखनी के चमत्कार से अपनी ओजस्विता को सिद्ध किया। इस ओजस्विता को चरितार्थ करने वालों में लोचन प्रसाद पांडेय का नाम अग्रिम पंक्ति में है। आपकी प्रमुख रचनाएं हैं – माधव मंजरी, मेवाड़गाथा, नीति कविता, कविता कुसुम माला, साहित्य सेवा, चरित माला, बाल विनोद, रघुवंश सार, कृषक बाल सखा, जंगली रानी, प्रवासी तथा जीवन ज्योति। दो मित्र आपका उपन्यास है। पंडित मुकुटधर पांडेय, लोचन प्रसाद के लघु भ्राता थे जिन्होंने छायावाद काव्यधारा का सूत्रपात किया। वे पद्मश्री से सम्मानित होने वाले छत्तीसगढ़ के प्रथम मनीषी हैं। पदुमलाल पन्नालाल बख्शी की झलमला को हिन्दी की पहली लघुकथा मानी जाती है। इन्होंने ग्राम गौरव, हिन्दी साहित्य विमर्श, प्रदीप आदि कृति रचकर हिन्दी साहित्य में अतुलनीय योगदान दिया। छत्तीसगढ़ के शलाका पुरुष बख्शी जी विषय में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि उन्होंने सरस्वती जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका का सम्पादन किया। रामकाव्य के अमर रचनाकार डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ने कौशल किशोर, साकेत संत, रामराज्य जैसे ग्रंथ लिखकर चमत्कृत किया। निबंधकार मावली प्रसाद श्रीवास्तव का कवित्व छत्तीसगढ़ की संचेतना को प्रमाणित करती है। इंग्लैंड का इतिहास और भारत का इतिहास उनकी चर्चित कृतियाँ हैं। उनकी रचनाएँ सरस्वती, विद्यार्थी, विश्वमित्र, मनोरमा, कल्याण, प्रभा, श्री शारदा जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में समादृत होती रही हैं । छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास निबंध सरस्वती के मार्च १९१९ में प्रकाशित हुआ था, जो छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय पहचान प्रदान करता है । प्यारेलाल गुप्त छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ रचनाकारों में एक हैं जिन्होंने सुधी कुटुम्ब (उपन्यास) आदि उल्लेखनीय कृतियाँ हमें सौंपी। द्वरिका प्रसाद तिवारी विप्र की किताब गांधी गीत, क्रांति प्रवेश, शिव स्मृति, सुराज गीत (छत्तीसगढ़ी) हमारा मार्ग आज भी प्रशस्त करती हैं। काशीनाथ पांडेय, धनसहाय विदेह, शेषनाथ शर्मा शील, यदुनंदन प्रसाद श्रीवास्तव, पंडित देवनारायण, महादेव प्रसाद अजीत, शुक्लाम्बर प्रसाद पांडेय, पंडित गंगाधर सामंत, गंभीरनाथ पाणिग्रही, रामकृष्ण अग्रवाल भी हमारे साहित्यिक पितृ-पुरुष हैं।

टोकरी भर मिट्टी का नाम लेते ही एक विशेषण याद आता है और वह है – हिन्दी की पहली कहानी। इस ऐतिहासिक रचना के सर्जक हैं – माधव राव सप्रे।पंडित रविशंकर शुक्ल मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री मात्र नहीं थे, उन्होंने आयरलैण्ड का इतिहास भी लिखा था। पंडित राम दयाल तिवारी एक योग्य समीक्षक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। शिवप्रसाद काशीनाथ पांडेय का कहानीकार आज भी छत्तीसगढ़ को याद आता है।

मुक्तिबोध हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले कवि हैं। वे कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। उनकी विश्व प्रसिद्ध कृतियाँ हैं – चांद का मुँह टेढा़ है, अंधेरे में, एक साहित्यिक की डायरी। इस कालक्रम के प्रमुख रचनाकार रहे - घनश्याम सिंह गुप्त, बैरिस्टर छेदीलाल ।

आधुनिक काल में श्रीकांत वर्मा राष्ट्रीय क्षितिज पर प्रतिष्ठित कवि की छवि रखते हैं, जिनकी प्रमुख कृतियाँ माया दर्पण, दिनारम्भ, छायालोक, संवाद, झाठी, जिरह, प्रसंग, अपोलो का रथ आदि हैं। हरि ठाकुर सच्चे मायनों में छत्तीसगढ़ के जन-जन के मन में बसने वाले कवियों में अपनी पृथक पहचान के साथ उभरते हैं। जिनका सम्मान वस्तुतः छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के संघर्ष का सम्मान है। उन्होंने कविता, जीवनी, शोध निबंध, गीत तथा इतिहास विषयक लगभग दो दर्जन कृतियों के माध्यम से इस प्रदेश की तंद्रालस गरिमा को जगाया है। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – गीतों के शिलालेख, लोहे का नगर, अंधेरे के खिलाफ, हँसी एक नाव सी। गुरुदेव काश्यप, बच्चू जांजगीरी, नारायणलाल परमार, हरि ठाकुर के समकालीन कवि हैं।

प्रमोद वर्मा की तीक्ष्ण और मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि का जिक्र न करना बेमानी होगा । हिंदी रंग चेतना में हबीब तनवीर की रंग चेतना की गंभीर हिस्सेदारी स्थायी जिक्र का विषय हो चुका है ।

छत्तीसगढ़ के रचनाकारों ने सिर्फ़ कविता, कहानी ही नहीं उन तमाम विधाओं में अपनी सार्थक उपस्थिति को रेखांकित किया है जिससे हिंदी भाषा और उसकी संस्कृति समृद्ध होती रही है । आज की लोकप्रिय विधा लघुकथा का जन्म यहीं हुआ । हिंदी की पहली लघुकथा इसी ज़मीन की उपज है । यहाँ मैं उन सभी को स्मरण करते हुए खास तौर पर उर्दू की समानान्तर धारा की बात करना चाहता हूँ जिन्होंने देवनागरी को आजमाकर अपनी हिंदी-भक्ति को चरितार्थ किया । इसमें ग़ज़लकार मौलाना अब्दुल रउफ महवी रायपुरी, लाला जगदलपुरी, स्व. बंदे अली फातमी, स्व. मुकीम भारती, स्व. मुस्तफा हुसैन मुश्फिक, शौक जालंधरी, रजा हैदरी, अमीर अली अमीर की शायरी को क्या आम आदमी भूला सकता है ।

हिंदी की साहित्यिक दुनिया में राज्य के अधिवासी रचनाकारों के भावों, शैलियों की क्रांतिकारिता के तमाम जादुई प्रभावों और अनुसरणों को नमन करते हुए फिलहाल मैं हमारे अपने समय के एक बड़े आलोचक आदरणीय विश्वनाथ तिवारी के (किसी साक्षात्कार में उल्लेखित विचार) का जिक्र करते हुए यह भी कहना प्रांसगिक समझता हूँ – कि आज के समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में अतिवाद जब शीर्षस्थ है और यह भी कि ऐसे अतिवादों से छत्तीसगढ़ जैसा भूभाग कहीं अधिक ग्रस्त रहा है तब ऐसे समय में मेरे मन में और कदाचित् हिंदी की दुनिया के व्याकरणाचार्यों का मन भी क्या आकुल-व्याकुल नहीं होगा कि भूगोल से साहित्यिकी का आखिर कैसा संबंध है ? ऐसे प्रश्नों के जवाब देने की पहल भी इसी भूगोल से होनी चाहिए ।

खैर.... हिन्दी के साथ हम छत्तीसगढ़ी भाषा के रचनाकारों का स्मरण न करें तो यह अस्पृश्य भावना का परिचायक होगा। कबीर दास के शिष्य और उनके समकालीन (संवत 1520) धनी धर्मदास को छत्तीसगढ़ी के आदि कवि का दर्जा प्राप्त है, छत्तीसगढ़ी के उत्कर्ष को नया आयाम दिया – पं. सुन्दरलाल शर्मा, लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय, नरसिंह दास वैष्णव, बंशीधर पांडेय, शुकलाल पांडेय ने। कुंजबिहारी चौबे, गिरिवरदास वैष्णव ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में अपनी कवितीओं की अग्नि को साबित कर दिखाया। इस क्रम में पुरुषोत्तम दास एवं कपिलनाथ मिश्र का उल्लेख भी आवश्यक होगा। वर्तमान में छत्तीसगढ़ी रचनात्मकता भी लगातार जारी है । पर उसे समय के शिला पर कसौटी में कसा जाना अभी प्रतीक्षित है ।

यहाँ मैं अपनी संपूर्ण सदाशयता और विनम्रता के साथ यह भी कहना चाहूँगा कि यह योगदान कर्ताओं का सूचीकरण नहीं है । फिर मैं साहित्य का इतिहास लेखक भी नहीं हूँ बल्कि सच तो यह भी है कि मैं साहित्य का विद्यार्थी होने का दावा भी नहीं कर सकता । आखिर मैं ठहरा समाचार-जीवी । समाचारों के बीच स्वयं की तलाश करने वाला पत्रकार । मैं और आप स्वयं जानते हैं कि इस हॉल(सभाकक्ष) में और इस समय भी अपनी निजता के साथ देशभर में पढ़े लिखे जाने वाले सु-नामी बिराजे हुए हैं और जिनपर हमें ही नहीं समूचे हिंदी संसार को इस समय गर्व हो सकता है । सिर्फ इतना ही नहीं यहाँ ऐसे रचनाकार भी बैठे हुए हैं जिन्हें भले ही आज की कथित भारतीय रचनाकार बिरादरी नहीं जानती पर वे भी कई देश की सीमाओं को लाँघकर दर्जनों देशों के हजारों पाठकों के बीच जाने जाते हैं । ये सब के सब हमारे वर्तमान के ही संस्कृतिकर्मी नहीं बल्कि हमारे अतीत में पैठे हुए उन सभी नक्षत्रों की तरह हैं जो भावी समय के खरे होने की गारंटी देते हैं ।

अपनी बात के अंतिम चरण में यह बताते हुए बड़ा ही हर्ष हो रहा है कि भले ही मेरे दादा और रचनाधर्मी स्वर्गीय पं. बृजलाल द्विवेदी जी की कर्मभूमि उत्तरप्रदेश है पर छत्तीसगढ़ उनकी याद के बहाने किसी बड़े कृतिकार के कृतित्व को रेखांकित करने की स्थायी भूमि होगी । और यह आयोजक होने के नाते मेरे लिए गर्व का भी विषय होगा । आखिर उत्तरप्रदेश हिंदी के उज्ज्वल भूगोल के जनपद हैं । और यह सखाभाव दोनों में अनवरत बना रहेगा । यही सखाभाव आज की वैश्विक खतरों से जूझने की भी वैचारिकी हो सकता है कि समानधर्मा जनपद एक लय मे स्वयं को विन्यस्त करते रहें ।

अब तक मैं आपका बहुत समय ले चुका हूँ । परन्तु मैं समझता हूँ कि मुझे इतनी बात रखने का हक़ आपकी ओर से था क्योंकि आपने सदैव हमारी संस्था को अपना धैर्य और संबल दिया है । मै सभी पुनः का स्वागत करते हुए नमन करता हूँ। (पं.बृजलाल द्विवेदी अंलकरण समारोह-2008 में दिया गया स्वागत भाषण, मई 25, 2008, संस्कृति विभाग, रायपुर का सभागार)