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सोमवार, 15 मई 2017

केजरीवालः हर रोज नया बवाल

-संजय द्विवेदी

    अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी में इन दिनों जो कुछ चल रहा है, उससे राजनीतिज्ञों के प्रति अविश्वास और गहरा हुआ है। वे उम्मीदों को तोड़ने वाले राजनेता बनकर रह गए हैं। साफ-सुथरी राजनीति देने का वादा करके बनी आम आदमी पार्टी को सत्ता देने में दिल्ली की जनता ने जितनी तेजी दिखाई, उससे अधिक तेजी केजरीवाल और उनके दोस्तों ने जनता की उम्मीदें तोड़ने में दिखाई है।
  भारतीय राजनीति में अन्ना हजारे के चेलों ने जिस तेजी से भरोसा खोया, उस तेजी से तो जयप्रकाश नारायण और महात्मा गांधी के चेले भी नहीं गिरे। दिल्ली की सत्ता में आकर अपनी अहंकारजन्य प्रस्तुति और देहभाषा से पूरी आप मंडली ने अपनी आभा खो दी है। खीजे हुए, नाराज और हमेशा गुस्सा में रहने वाली यह पूरी टीम रचनात्मकता से खाली है। एक महान आंदोलन का सर्वनाश करने का श्रेय इन्हें दिया जा सकता है किंतु भरोसे को तोड़ने का पाप भी इन सबके नाम जरूर दर्ज किया जाएगा। जिस भारतीय संसदीय राजनीति के दुर्गुणों को कोसते हुए ये उसका विकल्प देने का बातें कर रहे थे, उन सारे दुर्गुणों से जिस तरह स्वयं ग्रस्त हुए वह देखने की बात है। राजनीति के बने-बनाए मानकों को छोड़कर नई राह बनाने कि हिम्मत तो इस समूह से गायब दिखती है। उसके अपनों ने जितनी जल्दी पार्टी से विदाई लेनी शुरू की तो लगा कि पार्टी अब बचेगी नहीं, किंतु सत्ता का मोह और प्रलोभन लोगों को जोड़े रखता है। सत्ता जितनी बची है,पार्टी भी उतनी ही बच तो जाए तो बड़ी बात है।
   योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और प्रो. आनंद कुमार जैसे चेहरों से प्रारंभ हुई रुसवाई की कहानियां रोज बन रही हैं। कपिल मिश्र इस पूरी जंग में सबसे नया किंतु सबसे प्रभावी नाम हैं। उन्होंने जिस तरह केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमला किया, वह बताता है कि पार्टी में कुछ भी बेहतर नहीं चल रहा है। एक नई पार्टी जिसने एक नई राजनीति और नई संभावनाओं का अहसास कराया था, उसने बहुत कम समय में खासा निराश किया है। आम आदमी पार्टी का संकट यह है कि वह अपने परिवार में पैदा हो रहे संकटों के लिए भी भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है। जबकि भाजपा एक प्रतिद्वंदी दल है और उससे किसी राहत की उम्मीद आप को क्यों करनी चाहिए। मुंह खोलते ही आप के नेता प्रधानमंत्री को कोसना शुरू कर देते हैं। भारत जैसे देश में जहां संघीय संरचना है वहां यह बहुत संभव है कि राज्य व केंद्र में अलग-अलग सरकारें हों। उनकी विचारधाराएं अलग-अलग हों। किंतु ये सरकारें समन्वय से काम करती हैं, एक दूसरे के खिलाफ सिर्फ तलवारें ही नहीं भांजतीं। ऐसा लगता है जैसे दिल्ली में पहली बार कोई सरकार बनी हो। सरकार बनाकर और अभूतपूर्व बहुमत लाकर निश्चित ही अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम ने एक ऐतिहासिक काम किया था। किंतु सरकार भी ठीक से चलाकर भी दिखाते तो उससे वे इतिहासपुरूष बन सकते थे। एक राज्य को संभालने की क्षमता प्रदर्शित किए बिना वे प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न देखते हैं। जबकि जिस नरेंद्र मोदी को सुबह-शाम वे कोसते हैं वे भी गुजरात में तीन बार लगातार बेहतर सरकार चलाने के ट्रैक रिकार्ड के चलते दिल्ली पहुंचे हैं। ऐसे में सिर्फ आलोचना के लिए आलोचना का काम आम आदमी पार्टी को नित नए विवादों में फंसा रहा है। अब तक वे अन्य दलों के सारे नेताओं को चोर और बेईमान कहने की सुविधा से लैस थे, किंतु अब उनके अपने ही उनकी नीयत पर शक कर रहे हैं। जिन पत्थरों से आम आदमी पार्टी ने दूसरे दलों के नेताओं को घायल किया था, वही पत्थर अब उनकी ओर हैं।
     नितिन गडकरी जैसे अनेक नेताओं के खिलाफ आरोप और बाद में माफी मांग लेना का चलन बताता है कि आम आदमी पार्टी को मीडिया का इस्तेमाल आता है। लेकिन यह भी मानना होगा कि समाज बहुत बड़ा और मीडिया उसका बहुत छोटा हिस्सा है। जनमत को साधने के लिए एक बार झूठ काम आ सकता है किंतु बार-बार सफलताओं के लिए आपको विश्वसनीयता कायम करनी पड़ती है। आज की तारीख में आम आदमी पार्टी विश्वसनीयता के सबसे निचले तल पर है। अरविंद केजरीवाल कभी उम्मीदों का चेहरा था। हिंदुस्तान की आकाक्षांओं के प्रतीक थे, भ्रष्टाचार के विरूध्द एक प्रखर हस्तक्षेप थे, आज वे निराश करते नजर आते हैं। यह निराशा भी बहुत गहरी है और उजास कहीं नजर नहीं आती। अपने आंदोलनकारी तेवरों से वे जनता के दिलों में बहुत जल्दी जगह बना सके। शायद इसका कारण यह था कि वे दिल्ली में आंदोलन कर रहे थे और ऐसे समय में कर रहे थे , जब सोशल मीडिया और टीवी मीडिया की विपुल उपस्थिति के चलते व्यक्ति रातोंरात स्थापित हो सकता है। उनके दिखाए सपनों और वादों के आधार अनेक युवा अपना कैरियर छोड़कर उनके साथ वालंटियर के रूप में मैदान में उतरे। उन सबके साझा प्रयासों ने दिल्ली में उन्हें सत्ता दिलाई। किंतु अपने अहंकार, संवादहीनता और नौकरशाही अकड़ से उन्होंने अपने परिवार को बहुत जल्दी बिखेर दिया। उनके प्रारंभिक अनेक साथी आज अनेक दलों में जा चुके हैं। आंदोलन के मूल नायक अन्ना हजारे उनसे मिलना पसंद नहीं करते। ये उदाहरण बताते हैं कि आंदोलन खड़ा करना और उसे परिणाम तक ले जाना दो अलग-अलग बातें हैं। एक संगठन को खड़ा करना और अपने कार्यकर्ताओं में समन्वय बनाए रखना सरल नहीं होता।

    आम आदमी पार्टी जो एक वैकल्पिक राजनीति का माडल बन सकती थी, आज निराश करती नजर आ रही है। यह निराशा उसके चाहने वालों में तो है ही, देश के बौद्धिक वर्गों में भी है। लोकतंत्र इन्हीं विविधताओं और सक्रिय हस्तक्षेपों से सार्थक व जीवंत होता है। आम आदमी पार्टी में वह उर्जा थी कि वह अपनी व्यापक प्रश्नाकुलता से देश की सत्ता के सामने असुविधाजनक सवाल उठा सके। उनकी युवा टीम प्रभावित करती है। उनकी काम करने की शैली, सोशल मीडिया से लेकर परंपरागत माध्यमों के इस्तेमाल में उनकी सिद्धता, भ्रष्टाचार के विरूध्द रहने का आश्वासन लोगों में आप के प्रति मोह जगाता था। वह सपना बहुत कम समय में धराशाही होता दिख रहा है। सिर्फ एक आदमी की महत्वाकांक्षा, उसके अंहकार, टीम को लेकर न चल सकने की समस्या ने आम आदमी पार्टी को चौराहे पर ला खड़ा किया है। दल का अनुशासन तार-तार है। पहले दूसरे दलों और नेताओं की हर बात को मीडिया के माध्यम से सामने लाने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अब अपनी सामान्य दलगत समस्याओं को भी टीवी पर तय करने लगे हैं। ऐसे में दल के कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जा रहा है। ऐसे में वे कहते रहे हैं कि यह भाजपा करवा रही है। जबकि अपने दल में अनुशासन और संवाद कायम करना आम आदमी पार्टी के नेताओं का काम है। यह काम भाजपा का नहीं है। आम आदमी पार्टी में मची घमासान राजनीतिक दलों के लिए सबक भी है कि सिर्फ  चुनावी सफलताओं से मुगालते में आ जाना ठीक नहीं है। अंततः आपको लोगों से संवाद बनाए रखना होता है। दल हो या परिवार समन्वय, संवाद और सहकार से ही चलते हैं, अहंकार-संवादहीनता और दुर्व्यवहार से नहीं। आज की राजनीति के शासकों को चाहिए कि राजा की तरह नहीं, समन्वयवादी राजनेता की आचरण करें। अरविंद केजरीवाल के पास अभी भी आयु और समय दोनों है, पर सवाल यह है कि वे क्या चीजों के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हैं या नहीं। या केजरीवाल को यही लगता है कि उनकी सरकार, संगठन में सब जगह उन्हें नरेंद्र मोदी के लोगों ने घेर रखा है। राजनीति सच को स्वीकारने और सुधार करने  से आगे ही बढ़ती है, पर क्या वे इसके लिए तैयार हैं?

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

आम’ नहीं ‘खास’ हो गए ‘आप


-संजय द्विवेदी


   आम आदमी पार्टी के साथ जो हो रहा है उसे लेकर मुख्यधारा के राजनीतिक दलों में खासी प्रसन्नता है। राजनीति के क्षेत्र में ऐसा कम ही होता है जब कोई नया दल मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को इस तरह हिलाकर रख दे। राजनीति के बने-बनाए तरीके से अलग काम करने और उसके अनुरूप आचरण से किसी को समस्या नहीं होती किंतु जब कोई दल नए विचारों के साथ सामने आता है तो समस्या खड़ी होती है।
   आम आदमी पार्टी ने जिस तरह जाति, धर्म, क्षेत्र की बाड़बंदी तोड़कर दिल्ली चुनाव में सबका समर्थन प्राप्त किया, वह बात चौंकानेवाली थी। यह बात बताती है कि उम्मीदों और उजले सपनों की उम्मीद अभी भी देश की जनता में बाकी है। लोग चाहते हैं कि बदलाव हों और सार्थक बदलाव हों। लोग साथ आते हैं और साथ भी देते हैं। आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल निश्चय ही इस सपने को जगाने और भुनाने में सफल रहे हैं। किंतु यह मानना कठिन है, यह अकेले अरविंद का करिश्मा है। यह उस समूह का करिश्मा है, जिसने जड़ता को तोड़कर एक नई राजनीतिक शैली का वादा किया। इसमें अरविंद के वे साथी जो दृश्य में हैं शामिल हैं, वे भी हैं जो अदृश्य हैं। वे लोग भी हैं, जिन्होंने अनाम रहकर इस दल के लिए समर्थन जुटाया। वह समर्थन सड़क पर हो, सोशल मीडिया में हो या कहीं और। ऐसे में अरविंद केजरीवाल को अपने इन साथियों की उम्मीदों को तोड़ने का हक नहीं है। प्रशांत भूषण,योगेंद्र यादव, मयंक गांधी से लेकर अंजलि दमानिया के सवाल असुविधाजनक जरूर हो सकते हैं, पर अप्रासंगिक नहीं हैं। क्योंकि यह आदत स्वयं आम आदमी पार्टी ने उनमें जगाई है। आम आदमी पार्टी  का चरित्र ही पहले दिन से ऐसा है कि वहां ऐसे सवाल उठेंगें ही। रोके जाने पर और उठेंगें। आम आदमी पार्टी का सच यह है कि वह अभी पार्टी बनी नहीं है। वह दल बनने की प्रक्रिया में है। उसका वैचारिक मार्ग भी अभी स्वीकृत नहीं है।वह विविध विचारों के अनुयायियों का एक ऐसा क्लब है, जिसने भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए सपना देखा और एकजुट हुआ। अब इस समूह ने आंदोलन की सीमाएं देखकर खुद सत्ता के सपने देखने शुरू किए हैं और बहुत आसानी से बड़ी सफलताएं पाई हैं। जाहिर है कि उन्हें इसका हक है कि वे सपने देखें और उनकी ओर दौड़ लगाएं। वाराणसी से लेकर अमेठी तक युद्धघोष करने वाली टीम अब दिल्ली की सत्ता में है और संभलकर चलना चाहती है। संभलकर चलना ऐसा कि दिल्ली देखें या देश यहां इसका सवाल भी अहम है।
    राजनीतिक दलों में ऐसे वैचारिक द्वंद कोई बड़ी बात नहीं है। यह तो सब दलों में होता है। किंतु अरविंद केजरीवाल ने इन सवालों से निपटने का जो तरीका अपनाया वह सवालों के घेरे में है। मुखिया मुख सो चाहिए खान-पान में एक की उक्ति को केजरीवाल सार्थक नहीं कर पाए। उन्हें समस्या से निपटने के लिए व्यक्तिगत संवाद का तरीका अपनाना चाहिए था। वे यहीं चूक गए, उन्होंने अपने गणोंको यह काम सौंप दिया जो अपने नेता की भक्ति में इतने बावले हुए कि उनको मर्यादाओं का ख्याल भी न रहा। सत्ता और ऐसी बहुमत वाली सरकार किसी में भी अहंकार भर सकती है। अब सही मायने मेंपांच साल केजरीवाल का नारा एक हकीकत है। देखें तो किसी भी सत्ता को सवाल खड़े करने वाले लोग नहीं सुहाते, इसलिए व्यक्तिगत आरोपों की लीला चरम पर है। अरविंद केजरीवाल के खेमे के माने जाने वाले मित्रों ने भी पत्र लिखे, ट्यूटर-फेसबुक पर कमेंट किए, टीवी इंटरव्यू दिए और पार्टी की बातें बाहर ले गए। इसी काम के लिए एक पक्ष को सजा और दूसरे पक्ष को मजा लेने की आजादी कैसे दी जा सकती है। यह ठीक है कि अरविंद बीमार हैं, उन्हें अपना स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए बाहर जाने की आजादी है। किंतु वह विवादित बैठक भी टाली जा सकती थीं और संवाद के लिए नए रास्ते खोजे जा सकते थे। क्या ही अच्छा होता कि प्रशांत-योगेंद्र यादव का सर कलम करने से पहले अरविंद इस बैठक को स्थगित करते, स्वास्थ्य लाभ लेने बंगलौर जाते और वहां एक-एक को बुलाकर सीधी बात कर लेते। इससे संवाद के सार्थक क्षण बनते और एक- दूसरे के प्रति प्रायोजित सद्भाव मीडिया में भी दिखता। इससे निश्चित ही रास्ते निकलते। किंतु अरविंद के उत्साही मैनेजरों ने पार्टी को 8-11 में बंटा हुआ साबित कर दिया और यह भी साबित किया कि उनको संवाद नहीं मनमानी में यकीन है।
  यह आश्चर्य ही है कि पार्टी के भीतर आपसी संवाद से ज्यादा संवाद नेताओं ने टीवी चैनलों पर किया। आम आदमी पार्टी की यह टीवी चपल और वाचाल टीम आज बेकार वक्तव्यों, ट्वीट्स व आरोपों-प्रत्यारोंपों के बीच फंसी हुयी है।यह बात उनकी राजनीतिक अनुभवहीनता को ही प्रकट करती है। अरविंद केजरीवाल निश्चय ही पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं। वे इस दल की धुरी हैं किंतु कोई भी संगठन एक नेता की छवि पर नहीं चलता, उसे ताकत देने वाले लोग बड़ी संख्या में पीछे काम करते हैं। नेपथ्य में काम कर रहे लोगों की एक शक्ति होती है और वे दल का आधार होते हैं। आम आदमी पार्टी ने स्टिंग के जो खेल खेले, आज उस पर भारी पड़ रहे हैं। हर व्यक्ति एक- दूसरे को अविश्वास से देख रहा है। एक दल का मुख्यमंत्री और विधायक भी अगर संवाद के तल पर आशंकाओं से घिरे हों तो क्या कहा जा सकता है। विधायक स्टिंग कर रहे हैं और अपने नेताओं को बेनकाब कर रहे हैं। यह अविश्वास राजनीतिक क्षेत्र में पहली बार इस रूप में प्रकट होकर जगह पा रहा है। एक राजनीतिक दल के नाते ही नहीं, एक मनुष्य होने के नाते हमारे सारे क्रिया-व्यापार भरोसे की नींव पर चलते हैं किंतु आम आदमी पार्टी इन स्टिंग आपरेशनों की प्रणेता के रूप में उभरी हैं- जहां अविश्वास ही केंद्र में है। भरोसे का यह संकट बताता है कि अभी भी आम आदमी पार्टी को एक दल की तरह, एक परिवार की तरह व्यवहार करना सीखना है। वे सब आंदोलन के साथी हैं, पर लगता है कि इतनी जल्दी सफलताओं ने उन्हें बौखला दिया है। क्या वे जीत को स्वीकार कर विनयी भाव से जनसेवा की ओर अग्रसर होगें या उनकी परिवार की महाभारत और नए रंग दिखाएगी कहना असंभव है।
    ऐसे कठिन समय में अरविंद केजरीवाल की यह जिम्मेदारी है कि वे जब स्वस्थ होकर लौटें तो कारकूनों के बजाए संवाद की बागडोर स्वयं लें। आज भी बहुत कुछ बिगड़ा नहीं है और लड़कर सबने अपनी हैसियत भी बता दी है कि हमाम में सब नंगें हैं। इन्हें फिर एक मंच पर लाना आम आदमी पार्टी के नेता होने के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी अरविंद केजरीवाल की ही है। वे माफी मांगकर दिल्ली का दिल जीत चुके हैं, साधारण संवाद से फिर से अपनों का दिल भी जीत सकते हैं। किंतु इसके लिए उन्हें खुद का दिल भी बड़ा करना पड़ेगा। उम्मीद तो की जानी चाहिए कि वे बंगलौर से कुछ ऐसी ही उम्मीदें जगाते हुए दिल्ली लौटेंगें।

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

भाजपा की हार या आप की जीत !

-संजय द्विवेदी


   दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम में भाजपा की पराजय की चर्चा हर जुबान पर है। जाहिर तौर पर इस हार ने भाजपा के अश्वमेघ के अश्व को रोक दिया है और नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी के जलवे में भी कमी आई है। दिल्ली का चुनाव सही मायने में बहुत छोटा चुनाव है, किंतु इसके संदेश बहुत बड़े हैं। मुंबई के मेयर से ज्यादा दिल्ली के मुख्यमंत्री का न कार्यक्षेत्र है, न ही बजट। किंतु राज्य तो राज्य है और महापालिका एक छोटी इकाई है। दिल्ली के चुनाव दरअसल जिस वातावरण और हाईपिच पर लड़ा गया, उसने इस छोटे से राज्य की राजनीतिक महत्ता को बहुत बढ़ा दिया है।
अप्रासंगिक कांग्रेसः
   आंदोलन से उपजी एक पार्टी के सामने दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का जो हाल हुआ, उसके सदमे से उबर पाना दोनों के लिए आसान नहीं होगा। पंद्रह साल तक दिल्ली में राज करने वाली कांग्रेस का खाता भी न खुलना और भाजपा का तीन सीटों पर सिमट जाना कोई साधारण सूचना नहीं है। यह बात बताती है कि जनता के बीच किस तरह हमारे राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की हैसियत दिल्ली के अंदर घटी है। जहां तक कांग्रेस की बात है वह दिल्ली के चुनावों में अप्रासंगिक हो चुकी थी। अपने परंपरागत वोट प्रतिशत को भी वह, आप के खाते में जाने से रोक नहीं पाई। वहीं दिल्ली में भाजपा की हार के जो मोटे कारण समझ में आते हैं, वह सब लोगों की समझ में हैं। पता नहीं क्यों यह बात भाजपा का आलाकमान नहीं समझ सका।
काडर की नाराजगीः
भाजपा एक काडर बेस पार्टी है। सालों साल से उसके कार्यकर्ता और संघ परिवार के समविचारी संगठन उसका वोट आधार हैं। यह काडर इस चुनाव में अपने नेताओं के फैसलों से हैरान दिखा। दिल्ली एक बिखरा हुआ राज्य नहीं है, वह एक इकाई है और एक सरीखा सोचती है। वह इतनी बड़ी भी नहीं कि एक जगह का प्रभाव दूसरी जगह न पड़े। दिल्ली भाजपा की उपेक्षा इस चुनाव का सबसे बड़ा कारण है। इसकी शुरूआत हुई दिल्ली भाजपा के सबसे प्रमुख चेहरे डा. हर्षवर्धन के स्वास्थ्य मंत्रालय से हटाए जाने से। यह क्रम जारी रहा। आयातित नेताओं को टिकट देना, मुख्यमंत्री का प्रत्याशी भी आयात करना और स्थानीय नेताओं को घर बिठाना। यहां तक की दिल्ली भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय खुद भी टिकट नहीं ले पाए। लेकिन कृष्णा तीरथ और विनोद कुमार बिन्नी जैसों को घर बैठे टिकट मिल गया। यह उत्तर प्रदेश जैसा राज्य नहीं कि पूरब की घटनाएं पश्चिम को, पूर्वांचल की घटनाएं बुंदेलखंड और रूहेलखंड को प्रभावित न करें। एक इकाई होने के नाते चीजों को होता हुआ देखकर कार्यकर्ता अवाक थे किंतु कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। मीडिया और पैसे के रूतबे की सवारी गांठ रहे आलाकमान के पास कार्यकर्ताओं को सुनने-गुनने का अवकाश भी नहीं था। कई राज्यों की विजय ने उनके चुनावी प्रबंधन के कौशल को स्थापित कर दिया था। यानी कार्यशैली पर सवाल नहीं उठ सकते थे, क्योंकि सफलता साथ-साथ थी। यह अकेली बात कार्यकर्ताओं को अवसाद में डाल चुकी थी।
  भाजपा और संघ परिवार के कार्यकर्ता आज भी भावनात्मक आधार पर कार्य करने वाला समूह है, यहां यह कहने में संकोच नहीं है कि वे राजनीतिक रूप से उतना विचार नहीं करते। राजनीतिक तरीके से चीजों को न सोचने के कारण वे भावनात्मक आधार पर फैसले करते हैं, जिसका भाजपा को अकसर नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे में निराशा की स्थिति में वे घर बैठना पसंद करते हैं। दिल्ली में जहां आप के कार्यकर्ता राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित और आक्रामक थे, घर-घर संवाद कर रहे थे। वहीं भाजपा का कार्यकर्ता चुनाव के करीब आते-आते उदासीन होता गया। चुनाव जब प्रारंभ हुए उस समय का टेम्पो भी भाजपा अंत तक कायम नहीं रख सकी। भाजपा का पूरा चुनाव अभियान मीडिया शोर, साधनों की बहुलता और देश भर के सांसदों, संगठन की सक्रियता के बावजूद, इसी उदासीनता का शिकार हो गया। शायद यह पहली बार था जब टीम मोदी को पराजय हाथ लगी है। यह संवाद आम है कि मोदी-शाह-जेटली ही भाजपा बन गए हैं और भाजपा का शेष नेतृत्व स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है। चुनावी प्रबंधन, धनशक्ति, दल से बड़ी होती हुई दिखती है। जाहिर तौर पर दिल्ली के चुनावों को इससे अलग करके देखना संभव नहीं है।
आक्रामक और शब्द की हिंसा से भरा चुनावः
 कहते हैं दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम जहां सीधे संपर्क, संवाद और बातचीत में संयम का परिचय दे रही थी, वहीं भाजपा का प्रचार अभियान आक्रामक और शब्द की हिंसा से भरा था। लोकतंत्र में हिस्सा ले रहे लोग नक्सली हैं या बदनसीब हैं, यह बात समझ से परे है। फिर अरविंद केजरीवाल ने उपद्रवी गोत्र को जिस तरह व्याख्यायित किया, वह बात भी भाजपा के खिलाफ गयी। विज्ञापनों में अन्ना की फोटो पर माला, केजरीवाल के परिवार का जिक्र, सब उल्टे पड़े। केजरीवाल एक ऐसे बेचारे की तरह प्रस्तुत होने लगे जैसे भारत की सरकार ने दिल्ली के लोगों पर हमला कर दिया हो। गुजराती अस्मिता की बात करनेवाले प्रधानमंत्री इस बात को गहरे समझ रहे होंगे। बाहरी लोगों, बाहरी ताकतों और बाहरी नेताओं ने इस पूरे चुनाव में भाजपा की एक बड़ी पराजय की भूमिका तैयार की। इस चुनाव में लालकृष्ण आडवानी से लेकर विजय कुमार मल्होत्रा जैसे नेताओं की भूमिका क्या थी? यह भी सवाल पूछे जा रहे हैं। जबकि ऐसे नेता दिल्ली की रगों को जानते हैं, पहचानते हैं। क्योंकि इन सबने नगर निगम से लेकर लोकसभा की राजनीति इसी शहर में की है।
हारे को हरिनामः
 अब जबकि भाजपा यह चुनाव हार चुकी है। भाजपा के ताकतवर समूह के सामने चुप रहने वाले लोग भी आवाजें जरूर उठाएंगे। प्रधानमंत्री ने इस चुनाव में स्वयं को झोंककर खुद इस चुनाव को मोदी बनाम केजरीवाल में बदल दिया था। इससे पार्टी यह भले कहती रहे कि यह मोदी की हार नहीं है, इसके कोई मायने नहीं हैं। सच्चाई यह है कि दिल्ली के लोग भाजपा के साथ चलने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने एक चमकीली प्रगति का आश्वासन दे रही राजसत्ता के बजाए एक भगोड़े मुख्यमंत्री के इस आश्वासन पर भरोसा किया है कि वह अब नहीं भागेगा।
कैसे बनी अमीरों की पार्टीः

आखिर आठ महीनों में ऐसा क्या हुआ कि भाजपा और उसके नेता नरेंद्र मोदी जहां हर भारतीय के आशा के केंद्र बने हुए थे, दिल्ली वालों के लिए वे अमीरों की पार्टी और अमीरों के नेता बन गए। यह आम आदमी पार्टी का संवाद कौशल ही कहा जाएगा कि उन्होंने एक चायवाले से अपना जीवन शुरू करने वाले प्रधानमंत्री को कारपोरेट और अमीरों के नेता के रूप में स्थापित कर दिया। मफलर और प्रधानमंत्री के 10 लाख के कोट की कहानियां कैसे जन-मन में स्थापित कर दी गयीं, इस पर भी भाजपा के कम्युनिकेशन विभाग को सोचना चाहिए। एक ऐसी पार्टी जिसने अभी कुछ समय पूर्व, पूरे देश का प्यार पाया है, उसे दिल्ली में एक नई-नवेली पार्टी अगर पराजित करती है, तो यह साधारण नहीं है। इस चुनाव से भाजपा का कुछ नहीं बिगड़ा है, वह बहुत बड़ी पार्टी है और अगले पांच सालों के लिए देश की राजसत्ता के लिए जनादेश से संयुक्त है। किंतु भाजपा का जो बिगड़ा है, वह है उसकी और उसके नेता की छवि, जिसकी भरपाई के लिए उसने आज से कोशिशें शुरू नहीं कीं, तो कल बहुत देर हो जाएगी। सत्ता, संगठन, प्रभावी नेतृत्व और धन तो ठीक है किंतु जनता का भरोसा भी चाहिए। बहुत कम समय में मोदी- शाह और भाजपा को यह संदेश दिल्ली की जनता ने दिया है, यह उनके ऊपर है कि वे दिल्ली को सिर्फ एक राज्य का संदेश मानते हैं या देश की जनता का संयुक्त संदेश... मरजी टीम मोदी की।

रविवार, 1 जून 2014

अरविंद केजरीवालः भरोसा तोड़ता नायक

अरविंद केजरीवालः भरोसा तोड़ता नायक
-संजय द्विवेदी
   हमारे जैसे देश के तमाम लोग अरविंद केजरीवाल से नाराज हैं। देश की जनता की उम्मीदों का चेहरा और एक समय में मध्यवर्ग के हीरो बन चुके इस आदमी को आखिर हुआ क्या है? शायद ही कोई हो जो अपनी मेहनत से अर्जित सार्वजनिक छवि को खुद मटियामेट करे। आज लोगों को यह सवाल मथ रहा है कि क्या अरविंद केजरीवाल अंततः और प्रथमतः एक आंदोलनकारी ही बनकर रह जाएंगें? सवाल यह भी उठता है कि जिन सवालों को लेकर उनका आंदोलन खड़ा हुआ और वह बाद में एक पार्टी में तब्दील हुआ,वे सवाल तो आज भी जस के तस हैं। अरविंद सही मायने में एक ऐसे नायक हैं, जिन्होंने लोगों में सपने जगाए भी और उन्हें अपने हाथों से तोड़ा भी।
     अरविंद केजरीवाल पर भरोसा करते हुए दिल्ली की जनता ने जिस तरह से उनके पक्ष में अपनी एकजुटता दिखाई, वह अभूतपूर्व थी। किंतु लगता है कि इस सफलता ने उनमें विनम्रता के बजाए अहंकार ही भरा। सत्ता को छोड़कर भागना और बाद में उसके लिए पछताना। साथियों का एक-एक कर अलग होते जाना, यह बताता है कि वे कहीं न कहीं अपनी कार्यशैली से लोगों को आहत कर रहे थे। उनके नासमझ फैसले बताते हैं कि राजनीति में अपनी जमीन छोड़ना कितना खतरनाक होता है। दिल्ली, हरियाणा,पंजाब जैसे राज्यों को केंद्र बनाकर अपनी एक ठोस राजनीतिक जमीन बनाने के बजाए उनका वामन से विराट बनने का सपना, उनकी रणनीतिक  विफलता तो है ही दिल तोड़ने वाली भी है। दिल्ली में एक आंदोलन से उपजी पार्टी ने जिस तरह का वातावरण बनाकर राजधानी में अपनी पैठ बनाई, उसके नेताओं का बनारस, अमेठी की ओर पलायन बताता था कि वे एक गहरे भ्रम के शिकार हैं। अरविंद इसलिए दोषी नहीं हैं कि वे राजनीतिक तौर पर असफल हो गए। यह कोई बड़ी बात नहीं है। वे असफल इसलिए हुए हैं कि उन्होंने जो जनविश्वास अर्जित किया था वह खो दिया। लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया और उन्हीं कठघरों में कैद होकर रह जाए जिसमें भारतीय राजनीति अब तक कैद है और उसे वहां से निकालने की जरूरत लोग गहरे महसूस करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि अपने दल के विस्तार का सपना देखना गुनाह नहीं है, किंतु विस्तार एक चरणबद्ध और सुनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा है। टीवी पर बनी आत्मछवि से मुग्ध होकर देश के सभी मैदानों में कमजोर सिपाही उतारने के बजाए कुछ ठोस जगहों पर ठोस काम करके दिखाया जाए। अरविंद यहीं चूक गए। उनके सलाहकार जो उन्हें प्रधानमंत्री का राजपथ दिखा रहे थे, उनसे भी गहरी चूक हुई है। लगता है कि वे इस देश के भौगोलिक-सामाजिक व्याप और आकांक्षाओं को नहीं समझते। आम आदमी पार्टी अंतिम दिनों तक मीडिया के केंद्र में रही। ये देखना आश्चर्यजनक था कि मीडिया के सभी आयोजनों में देश में अनेक प्रमुख दलों की उपस्थिति के बावजूद अगर तीन प्रतिनिधि बुलाए जाते थे उनमें एक कांग्रेस, एक भाजपा और एक आम आदमी पार्टी का होता था। टीवी मीडिया के सभी चुनावी प्रोमो में राहुल,मोदी और केजरीवाल की छवि रहती थी। जबकि देश में तमाम ऐसे नेता और दल हैं जो केजरीवाल से बड़ा सामाजिक और भौगोलिक आधार रखते हैं। मीडिया कवरेज में विसंगति थी। हर क्षेत्र में लड़ रहे आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार के बारे में दो प्रमुख दलों के साथ जरूर बताया जाता था। यह बात बताती है मीडिया में इस दल की मौजूदगी कैसी थी। अरविंद ने कई बार मीडिया पर भी गुस्सा जताया लेकिन देखा जाए तो आम आदमी पार्टी को उसकी हैसियत से ज्यादा जगह मीडिया में मिली। शायद उनका दिल्लीपति होना इसका कारण रहा हो। आप देखें तो मीडिया का असंतुलन इसी से पता चलता है कि इस विकराल चुनावी शोर में सीमांध्र, तेलंगाना, उड़ीसा के विधानसभा परिणामों को बिल्कुल जगह नहीं मिली। इसी तरह ममता बनर्जी और जयललिता का की भारी विजय पर बात कहां हो रही है। आप कल्पना करें ममता और जयललिता सरीखी लोकसभा सीटें आम आदमी पार्टी को मिली होतीं तो मीडिया में बैठे उनके क्रांतिकारी दोस्त मोदी की जीत को भी पराजय में बदल देते और केजरीवाल को भविष्य का प्रधानमंत्री घोषित कर देते। लेकिन देश की जनता बहुत समझदार है। वह आपके आचरण, देहभाषा, वादों और इरादों को तुरंत स्कैन कर लेती है।
   इसमें भी कोई दो राय नहीं कि देश में जो बैचैनियां पल रही थीं। जो अंसतोष मन में पनप रहा था, उसे स्वर देने का प्रारंभिक काम अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव जैसे लोगों ने किया। सही मायने में ये लोग ही संसद में न होने के बावजूद वास्तविक प्रतिपक्ष बन गए थे। साहस के साथ मंत्रियों, सरकार और गांधी परिवार पर जैसे हमले इन्होंने किए, उसने सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का वातावरण तैयार किया। भारतीय मध्यवर्ग और आम लोगों में एक भरोसा बनाया कि कुछ बदल सकता है। इतना ही नहीं उदास और हताश लोगों को राजनीतिक विमर्श में शामिल करने का श्रेय भी काफी हद तक इस समूह को जाता है। किंतु इन बैचैनियों, आलोड़नों को संभालने के आत्मविश्वास से अरविंद खाली थे। आगे उनके दल और उनकी राह क्या होगी कहना कठिन है। जनांदोलनों की धार को लंबे समय के लिए कुंद और भोथरा बनाकर वे चले गए हैं, यह कहने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। देश में उपस्थित तमाम चुनौतियों के मद्देनजर जनांदोलन और सामाजिक शक्तियों की एकजुटता जरूरी है। जनता के एजेंडे पर बात और सरकारों की निगहबानी जरूरी है। किंतु अरविंद ने जनांदोलनों की विश्वसनीयता को जो क्षति पहुंचाई है, उसकी मिसाल खोजे नहीं मिलेगी। अन्ना हजारे का आंदोलन दरअसल उनके चेहरे और निष्पाप भोलेपन के नाते एक विश्वसनीयता अर्जित कर सका। दूसरी बात उसकी टाईमिंग बहुत सटीक थी। यह ऐसा समय था जब बाबा रामदेव बुरी तरह पिटकर वापस जा चुके थे। देश में सरकारविहीनता के खिलाफ गुस्सा फैल रहा था और ऐसे समय में अन्ना और उनके समर्थकों ने एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया जिसमें आम आदमी उम्मीदें देखने लगा। बाद की कथाएं सबको पता हैं। राजनीतिक दल बनाने का अरविंद का फैसला और दिल्ली के चुनावों के अप्रत्याशित परिणामों ने यह संदेश भी दिया कि कांग्रेस के दिन अब लद गए हैं। बावजूद इसके दिल्ली में सरकार बनाना आम आदमी पार्टी के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ। क्या ही अच्छा होता कि अरविंद भाजपा को समर्थन देकर उन्हें ज्यादा विधायक होने के नाते सरकार बनाने का मौका देते और उसकी निगहबानी करते। राजनीतिक प्रशिक्षण का एक दौर इससे पूरा होता और कम सीटों पर लोकसभा का चुनाव लड़कर वे बेहतर संभावनाओं को जन्म दे सकते थे। समाज के पढ़े-लिखे वर्ग, मध्य वर्ग और तमाम संवेदनशील लोगों ने आम आदमी पार्टी में एक वैकल्पिक राजनीति की उम्मीदें देखनी शुरू कर दी थीं। इन उम्मीदों को इस दल के नेताओं ने स्वयं घराशाही कर दिया। दिल्ली की सफलता को पचा न पाने और बड़े सपनों ने छोटी सफलताएं भी छीन लीं। उनके द्वारा खड़े किए गए प्रखर आंदोलन और मुखर राजनीति का काफी लाभ नरेंद्र मोदी और उनके दल को मिला। एक देशव्यापी संगठन आधार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेटवर्क ने इस असंतोष और पीड़ा को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। जिस काम को अन्ना हजारे ने शुरू किया उसे नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों ने अंजाम तक पहुंचाया। अपने 12 साल गुजरात के मुख्यमंत्रित्वकाल की विश्लसनीयता उनके साथ थी। काम करने वाले व्यक्ति की छवि, विकास व सुशासन के मुद्दे उन्हें मदद दे रहे थे। एक तरफ सरकार से भागता नायक था दूसरी तरफ आशाएं जगाता हुआ हीरो, लोगों ने दूसरे पर भरोसा जताया। वाराणसी और अमेठी की जंग ने सारा कुछ बहुत साफ-साफ कह दिया है। इन परिणामों के बावजूद आम आदमी पार्टी के चरित्र में बहुत परिवर्तन आता नहीं दिख रहा है। वहां मंथन और चिंतन के बजाए इस्तीफों का दौर जारी है। जबकि सच्चाई यह है कि राजनीति में कुछ भी खत्म नहीं होता। एक नवोदित पार्टी  होने के नाते उसे मिले वोट और सफलताएं बेमानी नहीं हो जाते हैं। राजनीतिक विमर्श में चाहे-अनचाहे आम आदमी पार्टी एक खास जगह घेर रही है। मीडिया, लेखक समुदाय में उसके प्रति सदभाव रखने वाले क्रांतिकारियों की कमी भी नहीं है। किंतु सत्ता जाने की विकलता और सत्ता पाने लिप्सा को आज भी यह दल छिपा नहीं पा रहा है। जब कांग्रेस के खिलाफ जनरोष था तो वे नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़े रहे थे, अब मोदी सरकार की निगहबानी का समय है तो वे आपस में लड़ रहे हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी को अपनी कार्यशैली और फैसलों पर फिर से विचार करने की जरूरत है। वरना भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों की तरह वे भी ऐतिहासिक भूलें करते और उनके लिए क्षमा मांगते रह जाएंगें।
(लेखक राजनीतिक विश्वेषक हैं)

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

चुनाव जो मीडिया में ज्यादा और मैदान में कम लड़ा जा रहा

मीडिया की सर्वव्यापी उपस्थिति से जीवंत हो रहा है लोकतंत्र

-संजय द्विवेदी



बेहतर चुनाव कराने की चुनाव आयोग की लंबी कवायद, राजनीतिक दलों का अभूतपूर्व उत्साह,मीडिया सहभागिता और सोशल मीडिया की धमाकेदार उपस्थिति ने इस लोकसभा चुनाव को वास्तव में एक अभूतपूर्व चुनाव में बदल दिया है। चुनाव आयोग के कड़ाई भरे रवैये से अब दिखने में तो उस तरह का प्रचार नजर नहीं आता, जिससे पता चले कि चुनाव कोई उत्सव भी है, पर मीडिया की सर्वव्यापी और सर्वग्राही उपस्थित ने इस कमी को भी पाट दिया है। मोबाइल फोनों से लैस हिंदुस्तानी अपने कान से ही अपने नेता की वाणी सुन रहा है। वे वोट मांग रहे हैं। मतदाता का उत्साह देखिए वह कहता है मुझे रमन सिंह का फोन आया। तो अगला कहता है मेरे पास नरेंद्र मोदी का फोन आ चुका है। शायद कुछ को राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल का भी फोन आया हो। यानि यह चुनाव मीडिया के कंधों पर लड़ा जा रहा है। एक टीवी स्क्रीन पर जैसे ही नरेंद्र मोदी प्रकट होते हैं, तुरंत दूसरा चैनल राहुल गांधी का इंटरव्यू प्रसारित करने लगता है। इसके बाद सबके लिए सोशल मीडिया का मैदान खुलता है, जहां इन दोनों साक्षात्कारों की समीक्षा जारी है।
    वास्तव में इस चुनाव में मीडिया ने जैसी भूमिका निभाई है, उसे रेखांकित किया जाना चाहिए। टेलीविजन पर मुद्दों पर इतनी बहसों का आकाश कब इतना निरंतर और व्यापक था? टीवी माध्यम अपनी सीमाओं के बावजूद जनचर्चा को एक व्यापक विमर्श में बदल रहा है। आपने गलती की नहीं कि आसमान उठा लेने के लिए प्रसार माध्यम तैयार बैठै हैं। सोशल मीडिया की इतनी ताकतवर उपस्थिति कभी देखने को नहीं मिली। इसके प्रभावों का आकलन शेष है। किंतु एक आम हिंदुस्तानी की भावनाएं, उसका गुस्सा,उत्साह, सपने, आकांक्षाएं, तो कभी खीज और बेबसी भी यहां पसरी पड़ी है। वे कह रहे हैं ,सुन रहे हैं और प्रतिक्रिया कर रहे हैं। वे मीडिया की भी आलोचना कर रहे हैं। कभी केजरीवाल तो कभी मोदी के ओवरडोज से वे भन्नाते भी हैं। किंतु यह जारी है और यहां सृजनात्मकता का विस्फोट हो रहा है। इंडिया टीवी पर चला नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू कैसे इस दौर का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला इंटरव्यू बना इसे भी समझिए। अब किसी एक माध्यम की मोनोपोली नहीं रही। एक माध्यम दूसरे की सवारी कर रहा है। एक मीडिया दूसरे मीडिया को ताकत दे रहा है और सभी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए प्रतीत हो रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने शायद इसीलिए अपने साक्षात्कार में यह कहा कि सोशल मीडिया नहीं होता तो आम हिंदुस्तानी की क्रियेटिविटी का पता ही नहीं चलता। आप देखें तो यहां रचनात्मकता कैसे प्रकट होकर लोकव्यापी हो रही है। यहां लेखक, संपादक और रिर्पोटर नहीं हैं, किंतु सृजन जारी है। प्रतिक्रिया जारी है और इस बहाने एक विमर्श भी खड़ा हो रहा है, जिसे आप लोकविमर्श कह सकते हैं। सामाजिक बदलाव ने काफी हाउस, चाय की दूकानों, पटिए और ठीहों पर नजर गड़ा दी है, वे टूट रहे हैं या अपनी विमर्श की ताकत को खो रहे हैं। किंतु समानांतर माध्यमों ने इस कमी को काफी हद तक पूरा किया है। मोबाइल के स्मार्ट होते जाने ने इसे व्यापक और संभव बनाया है। अखबार भी अब सोशल साइट्स पर चल रहे एक लाइना विमर्शों, जोक्स  और संवादों को अपने पन्नों पर जगह दे रहे हैं। यह नया समय ही है, जिसने एक पंक्ति के विचार को महावाक्य में बदल दिया है। सूक्तियों में संवाद का समय लौट आया लगता है। एक पंक्ति का विचार किताबों पर भारी है। आपके लंबे और उबाउ वक्तव्यों पर टिप्पणी है- इतना लंबा कौन पढ़ेगा, फिर हिंदी भी तो नहीं आती। माध्यम आपको अपने लायक बनाना चाहता है। वह हिंग्लिश और रोमन में लिखने के लिए प्रेरित करता है। वह बता रहा है कि यहां विचरण करने वाली प्रजातियां अलग हैं और उनके व्यवहार का तरीका भी अलग है।
  मतदान इस दौर में चुनाव आयोग के अभियानों, मीडिया अभियानों और जनसंगठनों के अभियानों से एक प्रतिष्ठित काम बन गया है। वोट देकर आती सोशल मीडिया की अभ्यासी पीढ़ी अपनी उंगली दिखाती है। यानि वोट देना इस दौर में एक फैशन की तरह भी विस्तार पा रहा है। इस जागरूकता के लिए चुनाव आयोग के साथ सोशल मीडिया को भी सलाम भेजिए। कोऊ नृप होय हमें का हानि का मंत्रजाप करने वाले हमारे समाज में एक समय में ज्यादातर लोग वोट देकर कृपा ही कर रहे थे। बहाने भी गजब थे पर्ची नहीं मिली, धूप बहुत है, लाइन लंबी है, मेरे वोट देने से क्या होगा? पर इस समय की सूचनाएं अलग हैं, लोग विदेशों से अपनी सरकार बनाने आए हैं। दूल्हा मंडप में जाने से पहले मतदान को हाजिर है। जाहिर तौर पर ये उदाहरण एक समर्थ होते लोकतंत्र में अपनी उपस्थिति जताने और बताने की कवायद से कुछ ज्यादा हैं। वरना वोट निकलवाना तो राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं का ही काम हुआ करता था। वो ही अपने मतदाता को मतदान केंद्र तक ले जाने के लिए जिम्मेदार हुआ करते थे। लेकिन बदलते दौर में समाज में अपेक्षित चेतना का विस्तार हुआ है। मीडिया का इसमें एक अहम रोल है। देश में पिछले सालों में चले आंदोलनों ने समाज में एक अभूतपूर्व किस्म की संवेदना और चेतना का विस्तार भी किया है। बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, श्री श्री रविशंकर से लेकर अरविंद केजरीवाल के साथियों के योगदान को याद कीजिए। नरेंद्र मोदी जैसे जिन नेताओं ने काफी पहले इस माध्यम की शक्ति को पहचाना वो आज इसकी फसल काट रहे हैं। ये बदलते भारत का चेहरा है। उसकी आकांक्षाओं और सपनों को सच करने का विस्फोट है। मीडिया ने इसे संभव किया है। सोशल मीडिया के व्यापक प्रसार ने देश की एकता और अखंडता के सरोकारों को भी व्यापक किया है। हमें भले लगता हो कि सोशल मीडिया पर सिर्फ फुरसती लोग इकट्टे हैं, किंतु एक नाजायज टिप्पणी करके देखिए और हिंदुस्तानी मन की प्रतिक्रियाएं आप तक आ जाएंगीं। वास्तव में यह नया माध्यम युवाओं का ही माध्यम है किंतु इस पर हर आयु-वर्ग के लोग विचरण कर रहे हैं। कुछ संवाद, कुछ आखेट तो कुछ अन्यान्न कारणों से यहां मौजूद हैं। बावजूद लोकविमर्श के तत्व यहां मिलते हैं। मोती चुनने के लिए थोड़ा श्रम तो लगता ही है। अपने स्वभाव से ही बेहद लोकतांत्रिक होने के नाते इस मीडिया की शक्ति का अंदाजा लगाना मुश्किल है। यहां टीवी का ड्रामा भी है तो प्रिंट माध्यमों की गंभीरता भी है। यहां होना, कनेक्ट होना है। सोशलाइट होना है, देशभक्त होना है।  
   एक समय में हिंदुस्तान का नेता बुर्जुग होता था। आज नौजवान देश के नेता हैं। इस परिघटना को भी मीडिया के विस्तार ने ही संभव किया है। पुराने हिंदुस्तान में जब तक किसी राजनेता को पूरा देश जानता था, वह बूढ़ा हो जाता था। बशर्ते वह किसी राजवंश का हिस्सा न हो। आज मीडिया क्रांति रातोरात आपको हिंदुस्तान के दिल में उतार सकती है। नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल की परिघटना को ऐसे ही समझिए। आज देश मनोहर पारीकर और माणिक सरकार को भी जानता है, अन्ना हजारे को भी पहचानता है। उसने राहुल गांधी की पूरी युवा बिग्रेड के चेहरों को भी मीडिया के माध्यम से ही जाना है। यानि मीडिया ने हिंदुस्तानी राजनीति में किसी युवा का नेता होना भी संभव किया है। मीडिया का सही, रणनीतिक इस्तेमाल इस देश में भी, प्रदेश में भी ओबामा जैसी घटनाओं को संभव बना सकता है। अखिलेश यादव को आज पूरा हिंदुस्तान पहचानता है तो इसमें मुलायम पुत्र होने के साथ –साथ टीवी और सोशल मीडिया की देश व्यापी उपस्थिति का योगदान भी है। वे टीवी के स्क्रीन से लेकर मोबाइल स्क्रीन तक चमक रहे हैं। रंगीन हो चुके अखबार भी अब उनकी खूबसूरत तस्वीरों के साथ हाजिर हैं। काले-सफेद हर्फों में छपे काले अक्षर तब ज्यादा मायने रखते होंगें किंतु इस दौर में बढ़ी आंखों की चेतना को रंगीन चेहरे अधिक भाते हैं। माध्यम एक दूसरे से होड़ कर रहे हैं। टीवी में अखबार दिखने लगा है, अखबार थोड़ा टीवी होना चाहते हैं। सोशल मीडिया एक साथ सब कुछ होना चाहता है।माध्यमों ने राजनीति को भी सुंदर और सुदर्शन बनाया है। दलों के नेता और प्रवक्ता भी अब रंगीन कुर्तों में नजर आने लगे हैं। फैब इंडिया जैसे कुरतों के ब्रांड इसी मीडिया समय में लोकप्रिय हो सकते थे। राजनीति में सफेदी के साथ कपड़ों की सफेदी भी घटी है। चेहरा टीवी के लिए, नए माध्यमों के लिए तैयार हो रहा है। इसलिए वह अपडेट है और स्मार्ट भी। अब माध्यम नए-नए रूप धरकर हमें अपने साथ लेना चाहते हैं। वे जैसा हमें बना रहे हैं, हम वैसा ही बन रहे हैं। सही मायने में यह मीडियामय समय है जिसमें राजनीति, समाज और उसके संवाद के सारे एजेंडे यहीं तय हो रहे हैं। टीवी की बहसों से लेकर सोशल साइट्स पर व्यापक विमर्शों के बावजूद कहीं कुछ कमी है जिसे हमारे प्रखर होते लोकतंत्र में हमें सावधानी से खोजना है। इस बात पर बहस हो सकती है कि यह लोकसभा चुनाव जितना मीडिया पर लड़ा गया, उतना मैदान में नहीं।
(लेखक मीडिया विशेषज्ञ और राजनीतिक विश्वेषक हैं)
  

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

ऐतिहासिक चुनाव अभियान और निशाने पर मोदी


-संजय द्विवेदी
      हिंदुस्तान के लोकतांत्रिक इतिहास में शायद ये सबसे महत्वपूर्ण चुनाव हैं, जिसमें दिल्ली की गद्दी के बैठै शासकों के बजाए गुजरात राज्य के विकास माडल और उसके मुख्यमंत्री के चाल, चेहरे और चरित्र पर बात हो रही है। प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की किताब और उनके बयान बताते हैं कि देश पिछले दस सालों से कैसे बेचारे प्रधानमंत्री के हवाले था। इस पूरी चुनावी जंग से वे गायब हैं। प्रचार अभियान से भी गायब हैं। विपक्षी दल भी अति उदारता बरतते हुए उन्हें निशाने पर नहीं ले रहे हैं।
   जाहिर तौर पर मनमोहन सिंह के लिए सहानुभूति चौतरफा है। ऐसे ईमानदार प्रधानमंत्री जिनके शासनकाल में घोटालों के अब तक के तमाम रिकार्ड टूट गए। ऐसे महान अर्थशास्त्री जिनके राज में देश की अर्थव्यवस्था औंधें मुंह गिरी हुयी है और महंगाई अपने चरम पर है। किंतु इतिहास की इस घड़ी में वे ही ऐसे हैं जो कांग्रेस के पहले गैर गांधी प्रधानमंत्री हैं जो बिना गांधी हुए कुर्सी पर दस साल का वक्त काट ले गए। इसके पहले पीवी नरसिंह राव ही थे जो पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे, किंतु मनमोहन सिंह ने उनका भी रिकार्ड तोड़ दिया। शायद उनके गैर राजनीतिक होने का लाभ उन्हें मिला और वे इतनी लंबी पारी खेल ले गए। अपने पूरे दस साल के कार्यकाल में वे दो ही बार सक्रिय नजर आए। एक अमरीका से साथ परमाणु करार को स्वीकारने के समय और दूसरे रिटेल में एफडीआई लागू करवाने के वक्त। जाहिर तौर पर ये दोनों कदम भारत की जनता को रास नहीं आए पर उन्होंने इसे संभव किया और इन दो अवसरों पर वे सरकार गिराने की हद तक आत्मविश्वासी और साहसी दिखे। लेकिन जाते-जाते उन्होंने न सिर्फ दल बल्कि देश को एक अविश्वास और निराशा से भर दिया। मनमोहन सिंह राजनीति इस कदर निराश करती है कि एक राज्य के नेता नरेंद्र मोदी भी हमें आदमकद दिखने लगे। निराशा यहां तक घनी थी कि लोग अरविंद केजरीवाल जैसे साधारण कद काठी के एक आंदोलनकारी को भी विकल्प के रूप में देखने लगे। जबकि अनुभव, विद्वता और ईमानदारी में जब मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री बने थे तो एक चमकते चेहरे थे। आज उनकी सारी योग्यताएं औंधे मुंह पड़ी हैं। हालात यह हैं कि लोग उनके बारे में इस बेहद रोमांचक और हाईपर चुनाव में भी बात नहीं करना चाहते। देखें तो सारी चर्चा के केंद्र में नरेंद्र मोदी हैं। यानी कि कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने मान लिया है कि मोदी प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं और उनको रोकना जरूरी है।
   राहुल गांधी, मुलायम सिंह,मायावती, ममता बनर्जी,नीतिश कुमार सबके निशाने पर नरेंद्र मोदी है। ऐसे में लगता है कि नरेंद्र मोदी ने अपने सधे हुए चुनाव अभियान से न सिर्फ अपने प्रतिपक्षियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है वरन कांग्रेस कार्यकर्ताओं में बहुत हताशा भर दी है। चुनाव के ठीक पहले जिस तरह से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी बढ़ने शुरू हुए उससे भी भाजपा को एक मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलनी प्रारंभ हो गयी थी। फिर तमाम नेताओं का भाजपा प्रवेश भी यह संदेश देने में सफल रहा कि हवा बदल रही है। रामविलास पासवान, रामदास आठवले, उदित राज का साथ भाजपा के सामाजिक आधार को स्वीकृति दिलाने वाला साबित हुआ तो तमाम दिग्गज कांग्रेसियों से भाजपा प्रवेश ने एक नई तरह की शुरूआत कर दी। मप्र में हाल में तीन कांग्रेस विधायक भाजपा की शरण में जा चुके हैं। इसके साथ ही कांग्रेस के कई सांसद उदयप्रताप सिंह (होशंगाबाद), जगदंबिका पाल (डुमरियागंज) भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इन हालात ने कांग्रेस के आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया है। इसके साथ ही उसके सहयोगी दल भी चुनाव प्रचार में मोदी के साथ कांग्रेस पर ही हमले कर रहे हैं। आप देखें तो समय ने इतिहास की इस घड़ी में नरेंद्र मोदी को बैठै-बिठाए अनेक अवसर दिए। जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के नेतृत्व में छेड़े गए ऐतिहासिक आंदोलन। इन आंदोलनों से निपटने का कांग्रेस का जो तरीका रहा, उसने जनता में गुस्सा भरा और भाजपा को एक विकल्प के रूप में देखने के लिए विचारों का निर्माण किया। भाजपा भी पिछले दो लोकसभा चुनाव हारकर आत्मविश्वास से रिक्त हो चुकी थी। इन आंदोलनों में सहयोग करते हुए उसने अपनी मैदानी सक्रियता बढ़ाई। पीढ़ीगत परिवर्तन से गुजर रही भाजपा को नरेंद्र मोदी एक उम्मीद की तरह नजर आने लगे। इस बीच अरविंद केजरीवाल के साथियों ने राजनीति में प्रवेश कर दिल्ली में चुनावी सफलता तो पा ली किंतु वे उस सफलता को संभाल नहीं पाए। अनुभवहीनता और महत्वाकांक्षांओं के भंवर में फंसकर उन्होंने एक बार फिर मोदी और भाजपा को ही ताकत दी। केजरीवाल आज खुद अपनी विफलता को स्वीकार कर चुके हैं। किंतु इस घटना ने देश के लोगों को मजबूर कर दिया कि वे भाजपा और उसके नेता नरेंद्र मोदी को एक बार अवसर देने का मन बनाएं।
  नरेंद्र मोदी की समूची राजनीतिक यात्रा में उफान उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद ही आया। किंतु बहुत संयम से उन्होंने अपने आपको गुजरात तक सीमित रखा और अपनी महत्वाकाक्षाएं प्रकट नहीं होने दीं। इस बीच वे गुजरात में काम करते रहे और अपनी लाईन बड़ी करते गए। 2002 के दंगों के आरोपों के बावजूद वे बिना हो-हल्ले और मीडिया से सीमित संवाद करते हुए कानूनी मोर्चों और मीडिया की एकतरफा वारों को सहते हुए आगे बढ़ते गए। इतिहास की इस घड़ी में समय ने यह अवसर उनके लिए स्वयं बनाया, क्योंकि भाजपा दो लोकसभा चुनाव हार कर एक नए चेहरे की तलाश में थी। मोदी गुजरात में खुद को साबित कर चुके थे। टेक्नोसेवी होने के नाते वे सोशल मीडिया और उसकी ताकत को पहचान रहे थे। गुजरात और खुद को उन्होंने एक ब्रांड की तरह स्थापित कर लिया। विकास और सुशासन उनके मूलमंत्र बने। इसे उन्होंने जितना किया, उतना ही विज्ञापित भी किया।
    केंद्र में एक फैसले न लेती हुयी सरकार। राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर  महंगाई, भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में पल रहे तमाम आंदोलन और बेचैनियां इस राष्ट्र को मथ रही थीं। नायक निराश कर रहे थे। युवा सड़कों पर थे। बदलाव के ताप से देश गर्म था। बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, श्रीश्री रविशंकर जैसे तमाम लोग अलख जगा रहे थे। इस बीच दिल्ली में हुई नृशंश बलात्कार की घटना ने देश को झकझोर दिया। आप देखें तो देश स्वयं एक ऐसे नायक की तलाश कर रहा था जो इन चीजों को बदल सके। बड़ी संख्या में आए नौजवान वोटर, प्रोफेशनल्स की आकांक्षाएँ हिलोरे ले रही थीं। देश के युवा आईकान राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल निराश करते नजर आए। जाहिर तौर पर जो इस नाउम्मीदी में जो चेहरा नजर आया वह नरेंद्र मोदी का था। अपने साधारण अतीत और आकर्षक वर्तमान से जुड़ती उनकी कहानियां एक फिल्म सरीखी हैं। इसके लिए वे तैयार भी थे। शायद इसीलिए चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये चुनाव एक लंबी मुहिम के बाद लड़े जा रहे हैं। इस मुहिम में नरेंद्र मोदी ने बहुत पहले अपना अभियान आरंभ कर दिया था। वे पूरे देश को मथ रहे थे। अब वे देश का चेहरा भी बन गए हैं। निश्चय ही अपने सामाजिक और भौगोलिक आधार में भाजपा आज भी कई राज्यों में अनुपस्थित है। किंतु इस चुनाव में मोदी के चेहरे के सहारे वह पूर्ण बहुमत के सपने भी देख रही है। भारत जैसे महादेश में कोई भी दल आज इस तरह का दावा नहीं कर सकता। किंतु ये चुनाव जिस अंदाज में लड़े जा रहे हैं उसमें राजग व भाजपा के समर्थकों के लिए मोदी उम्मीद का चेहरा हैं तो विरोधियों के लिए वे महाविनाशक हैं। उनके पक्ष और विपक्ष में सेनाएं सजी हुयी हैं। उनके खिलाफ विषवमन व आरोपों की एक लंबी धारा है तो दूसरी ओर उम्मीदों का एक आकाश भी है। अब फैसला तो जनता को लेना है कि वह किसके साथ जाना पसंद करती है हालांकि यह तो उनके विरोधी भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री पद के सभी उपलब्ध दावेदारों में मोदी सबसे चर्चित चेहरा हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं) 

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

केजरीवालः पलायन या नई मंजिल की तलाश ?


-संजय द्विवेदी
    दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह का वातावरण बनाकर अपनी सरकार को शहीद किया, ऐसे दृश्य भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नहीं देखे गए। सच कहें तो वे एक ऐसे नायक की तरह सामने आए जो अपनी ही सरकार से मुक्ति चाहता था। ऐसा करके अरविंद को क्या हासिल होगा, अभी इसका आकलन होना शेष है किंतु यह तो तय है कि यदि वे चाहते तो सरकार बनी रह सकती थी। कांग्रेस के जिन नेताओं ने इस सरकार को समर्थन दिया था उनको भी कल्पना नहीं रही होगी यह सरकार इतनी जल्दी गिर जाएगी।
   दो महीने से भी कम समय में अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह से काम किया उसने कोई उम्मीद नहीं जगाई पर इतना तो साबित कर ही दिया कि उन पर अराजकतावादी होने का आरोप बहुत नाजायज नहीं है। सत्ता में होकर जिस अपेक्षित धैर्य, गंभीरता और सबको साथ लेकर चलने के औदार्य की जरूरत है, वह अरविंद और उनके साथियों में पहले दिन से नदारद है। देश सेवा के अहंकार से भरी देहभाषा और न जाने किस भ्रष्टाचार से जूझने की कसमें खाते अरविंद की विदाई ने सही मायने में देश को निराश किया है। जिस दौर में गठबंधन एक राजनीतिक मजबूरी हो चुके हों उसमें यह जिद कि पूरा बहुमत मिलने पर ही सरकार चलाएंगें एक तरह का बाल हठ ही है और राजनीतिक नासमझी भी है। 1990 के बाद देश की राजनीति और उसका विमर्श पूरी तरह बदल गया है। खासकर विचारधारा के स्तर पर विविध विरोधी विचारधाराओं के दल भी साथ आकर सरकार चला रहे हैं। आप देखें तो पहले  गठबंधन को लेकर कांग्रेस रवैया खासा अलग रहा है। एक अखिलभारतीय पार्टी होने के नाते वह गठबंधन की सरकारों को समर्थन तो देती रही पर खुद गठबंधनों का नेतृत्व करने से केंद्रीय स्तर पर परहेज करती रही। किंतु राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के रूप में अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के प्रयोग के बाद कांग्रेस की हिचक दूर हुयी और वह सत्ता में पिछले दस सालों से बनी हुयी है। यानि कि विरोधी विचारों के दलों के साथ मिलकर सरकार चलाने की मजबूरी को दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस भी समझते हैं। किंतु दिल्ली की सरकार के नायक केजरीवाल इस बात को नहीं समझ सके। अगर पूर्ण बहुमत मिलने पर ही सरकार बनाना था तो उसी समय आप को सत्ता से दूर हो जाना था जब वह जनता के पास जाकर सत्ता में जाने की अनुमति मांग रहे थे। पर यह कितना विरोधाभास है कि जो पार्टी सत्ता को लेकर संकोच से इतनी भरी हो कि वह दिल्ली की जनता के बीच जाकर रायशुमारी करती रही। वही सत्ता छोड़ने के वक्त अपने नेता की सनक पर सत्ता से बाहर हो जाती है और दिल्ली के लोगों की राय उसके लिए बेमानी हो जाती है। यानि यह अरविंद और उनके साथियों की मरजी है कि वे कब किस सवाल पर जनता से राय पूछें और कब न पूछें।
       तमाम अप्रिय प्रसंगों के बीच अरविंद और उनके साथी अब सत्ता मुक्त हैं। यानि अब वे अपनी करने के लिए स्वतंत्र और स्वच्छंद भी हैं। लेकिन दिल्ली के बहुत कम दिनों के सत्ता प्रसंग ने उनके द्वंद्वों को उजागर ही किया है। सत्ता ने उनके विचारों और व्यवहारों को दूरी को तो उजागर किया ही है, अहंकार और अहमन्यता से भरी देहभाषा ने उनकी सनकों का भी लोकव्यापीकरण किया है। खुद को उजली परंपरा का उत्तराधिकारी मानना और दूसरों को कीचड़ में लिपटा हुआ कहने की उनको आजादी है किंतु आंदोलनों की उजास और संषर्घ की आंच को उन सबने धीमा किया है ,इसमें दो राय नहीं है। उनका सत्ता छोड़कर भागना बताता है कि वे सत्ता तो चाहते हैं पर अपनी शर्तों पर चाहते हैं। वे यह मानने को तैयार नही हैं कि दिल्ली विधानसभा की 70 में वे सिर्फ 28 सीटें वे जीते हैं और शेष दिल्ली ने जनादेश दूसरे दलों को दिया है। ऐसे में शेष जनादेश प्राप्त दलों को हाशिए पर रखकर, उनकी आवाज न सुनकर वे एक अधिनायकत्व से भरी पारी खेलना चाहते हैं। जाहिर है लोकतंत्र में इस तरह के हठों के लिए जगह कहां है। समन्वय,संवाद और लोकतांत्रिक विमर्श में उनका यकीन ही नहीं दिखता। वे संवाद को सिर्फ सौदा समझते हैं। जबकि संवाद, लोकतंत्र की बुनियाद बनाता है। अगर संवाद न होगा तो लोकतंत्र के मायने क्या रह जाएंगें? आरोप- आरोप और आरोप की राजनीति इस देश को कहीं नहीं ले जाएगी, हमें यह समझने की जरूरत है।
    एक मुख्यमंत्री के नाते वे जनता का बहुत भला कर सकते थे। लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के दर्द को कम कर सकते थे। किंतु वे भाग गए, इस पलायन में भी वे अवसर ढूंढ सकते हैं। किंतु इसे कहा तो पलायन ही जाएगा। एक ऐसी चीज के लिए जिद जो हो नहीं सकती ,वह बताती है कि अरविंद किस कदर सरकार गिराने पर आमादा थे और सरकार की शहादत के नाम पर आगामी लोकसभा चुनाव में अपने दल का विस्तार चाहते थे। उनकी घबराहट और पलायन दोनों के संदेश साफ हैं कि वे सत्ता के साथ सहज नहीं थे। उन पर पड़ने वाले दबावों को वे झेल सकने की स्थिति में नहीं थे। उनका राजनीतिक डीएनए एक विद्गोही का है, सो सत्ता में रहते हुए वे उस तरह के आचरण करने पर आलोचना की जद में आ रहे थे (याद कीजिए उनका दिल्ली के सीएम के रूप में दिया गया घरना)। आप देखें तो पूरी राजनीतिक प्रक्रिया और तंत्र को लांछित करते अरविंद और उनके साथी मीडिया के द्वारा जरा सी आलोचना पर किस कदर बौखला पड़ते हैं। भाषा और उसके संयम का तो खैर जाने ही दीजिए। अरविंद और उनके साथियों ने सही मायने में देश की जनता और दिल्ली के लोगों से छल किया है। उन्होंने उन लोगों की उम्मीदों के साथ छल किया है, जो उनकी तरफ बहुत आशा से देख रहे थे। दिल्ली की सरकार को पूरी तनदेही और जवाबदेही से चलाते हुए वे एक जनपक्षधर राजनेता की तरह उभर सकते थे।

   अब सवाल यह है कि जिनसे एक छोटा सा राज्य दिल्ली और दो दलों का गठबंधन नहीं संभलता वे केंद्रीय राजनीति में आकर क्या करना चाहते हैं? यहां उन्हें कैसे और कब पूर्ण बहुमत मिलेगा और कब वे सत्ता के लिए तैयार होंगें, कहा नहीं जा सकता। अरविंद अपनी अपनी तमाम खूबियों के बावजूद अंततः एक आंदोलनकारी हैं। यही उनकी शक्ति और सीमा दोनों है। जबकि देश को एक मजबूत, कद्दावर प्रशासक का इंतजार है। जो देश को उसकी तमाम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, व क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ साध सके। दिल्ली में गठबंधन की ही सही, पर एक मजबूत सरकार दे सके। जो देश के सवालों से टकरा सके न कि उनका सामना होते ही पलायन कर जाए। आम आदमी पार्टी ने देश के लोगों की तमाम सदिच्छाओं के बावजूद जिस तरह निराश किया है, उसमें यही लगता है यह दल भी कुछ विद्रोही युवाओं का संगठन बनकर रह जाएगा। भारत जैसे महादेश के प्रश्नों और उसके मर्म तक पहुंचकर उसके प्रश्नों से जूझने की शक्ति तो फिलहाल आप में नहीं दिखती। उसके साथ जुड़े तमाम बुद्धिजीवी, रचनाकारों और पत्रकारों को चाहिए वे एक लंबी और सुदीर्ध तैयारी के साथ लोगों के बीच प्रकट हों, तभी यह देश आप जैसे प्रयोगों पर भरोसा कर पाएगा। लोगों की भावनाओं से खेलने ,उन्हें उद्वेलित करने और उनका इस्तेमाल करने से इस तरह के तमाम भावी प्रयोग और आंदोलन भी शक के घेरे में आएंगें कृपया ऐसा मत कीजिए। उम्मीद है कि कि आम आदमी पार्टी अपने भावी कदमों में अपेक्षित परिपक्वता का परिचय देगी और देश की जनाकांक्षाओं को सही संदर्भ में समझकर आचरण करेगी।

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

नरेंद्र मोदी से कौन डरता है?

-संजय द्विवेदी
    आखिर नरेंद्र मोदी में ऐसा क्या है कि वे सबके निशाने पर हैं। अपनी पार्टी के भीतर एक लंबा युद्ध लड़कर आखिरकार जब वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हो ही चुके हैं तो अन्य दलों को उनके नाम से घबराहट क्यों हैं। आखिर क्या कारण है कि दंगों की लंबी सूची दर्ज करा चुके उप्र के सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव उन्हें नहीं डराते किंतु मोदी के नाम से सेकुलर खेमों में हाहाकार व्याप्त है। मुजफ्फरनगर के बाद के हालात में भी मुलायम सेकुलर खेमे के चैंपियन हैं और उनके नाम से किसी को कोई आपत्ति नहीं है। क्या यह हमारी राजनीति का चयनित दृष्टिकोण नहीं है? राजनीति के इसी रवैये की परतें अब खुल रही हैं। केजरीवाल हमें अपनी सादगी से डराते हैं, तामझाम और सत्ता के प्रतीकों को छोड़कर डराते हैं तो मोदी की काम करने की शैली, विकास और सुशासन के लिए किए गए उनके प्रयास डराते हैं।
   लगता है कि हमारी राजनीति अब सुविधा और सामान्यीकरणों की शिकार हो रही है। परिवर्तन लाने की संभावना से भरे नायक हमें डराते हैं। यह यथास्थितिवादी चरित्र क्या इस देश की राजनीति और समाज जीवन को विकलांग नहीं बना रहा है? कोई भी ऐसा नायक जो संभावनाओं से भरा है हमें क्यों डराता है? आखिर क्या कारण है कि विकास की जिन संभावनाओं और सुशासन के जिन मानकों को गुजरात में मोदी और उनकी सरकार ने संभव किया है, उसे देश में दुहराने से हम डरते हैं ? जबकि मायावती, मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव, उमर अब्दुला जैसा प्रशासन हमें नहीं डराता। हमें नए-नवेले केजरीवाल की राजनीति से ठंड में पसीने आ जाते हैं क्योंकि वे कुछ ऐसे असुविधाजनक सवाल उठाते हैं जिनकी मुख्यधारा की राजनीतिक में स्वीकार्यता नहीं है। आखिर हमारी राजनीति इतनी बेचारगी से क्यों भर गयी है? क्यों नए प्रतीक, नए प्रयोग, क्रांतिकारी विचार हमें आह्लादित नहीं करते? उनके साथ खड़े होने में हमें संकोच क्यों होता है ?कांग्रेस- भाजपा और तीसरे मोर्चे के बंटे हुए मैदान में कोई नया खिलाड़ी हमें आतंकित क्यों करने लगता है?
    क्यों हमें सांप सूंघ जाता है जब दिल्ली के लुटियन जोन में बसने वाले लोगों के अलावा कोई नरेंद्र मोदी दिल्ली की तरफ बढ़ता है? क्या नरेंद्र मोदी इस देश के एक बेहद समृद्ध राज्य के अरसे से मुख्यमंत्री नहीं हैं? उनके शासन करने के तरीके को लेकर तमाम विवादों के बावजूद क्या उनका राज्य समृद्घि के शिखर नहीं छू रहा है। महाराष्ट्र जैसे विकसित इलाके जब नकारात्मक सूचनाओं से भरे हों तो क्या मोदी का सुशासन साथी हमें आकर्षित नहीं करता। उदारीकरण के पैदा हुए तमाम अवसरों ने हमें व्यापक संभावनाओं से भर दिया है। किंतु क्या कोई दिशाहीन सरकार इन अवसरों का लाभ ले सकती है। नरेंद्र मोदी जैसे अनुभवी और केजरीवाल जैसे अनुभवहीन कैसी भी सरकार चलाएंगें वह मनमोहन सिंह और शीला दीक्षित की सरकार से बेहतर ही होगी। सच तो यह है कि मनमोहन सिंह की दिशाहारा-थकाहारा सरकार ने राहुल गांधी जैसे भोले युवा के लिए प्रधानमंत्री बनने के मार्ग में जैसी मुसीबतें खड़ी कर दी हैं कि उनका इस चुनाव में प्रधानमंत्री बन पाना असंभव ही दिखता है। जबकि सत्य यह है कि राहुल गांधी चाहते तो पांच साल पहले ही प्रधानमंत्री बन सकते थे। किंतु उनकी मां और कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने न जाने किन स्वदेशी-विदेशी दबावों में मनमोहन सिंह को झेलने का निर्णय लिया था। मनमोहन सिंह- पी.चिदंबरम- मोंटेंक सिंह अहलूवालिया और कपिल सिब्बल जैसों ने कांग्रेस को जिस मुहाने पर ला खड़ा किया है कि अब अंधेरा घना होता जा रहा है। प्रधानमंत्री पद के लिए उपलब्ध उम्मीदवारों में नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी निश्चित ही आमने-सामने हैं किंतु मोदी के पास चमकदार, विकासोन्मुखी राजनीति के साल हैं तो राहुल गांधी के पास दस की कांग्रेसी सरकार के कारनामे हैं। राहुल गांधी और सोनिया गांधी को इनके कामों का हिसाब देना होगा। राहुल गांधी के सामने तमाम चुभते हुए सवाल हैं। जिनमें प्रमुख यह कि अगर राहुल गरीब समर्थक और आम आदमी समर्थक नीतियों  के पैरोकार हैं, अगर वे कलावतियों की जिंदगी में उजाला चाहते हैं तो आखिर मनमोहन सिंह इस सरकार के दस तक प्रधानमंत्री कैसे और क्यों बने रहे जिनकी समूची राजनीति बाजार समर्थक और विदेशी इशारों पर चलती रही। उन्हें देश में इस सवाल से जूझना होगा कि एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के राज में महंगाई चरम पर क्यों है? रूपया इस दुर्गति को क्यों प्राप्त है? उन्हें यह भी बताना होगा कि एक ईमानदार प्रधानमंत्री के राज में रोज घोटाले क्यों हो रहे हैं? जाहिर तौर पर राहुल के सामने बहुत असुविधाजनक सवाल आएंगें।
    इसके विपरीत नरेंद्र मोदी को यह सुविधा हासिल है उनके पास गुजरात जैसे विकसित राज्य के मुख्यमंत्री और बेहतर प्रशासक होने का तमगा है। साथ ही पिछले दस साल की केंद्र सरकार की नाकामियों का इतिहास भी नरेंद्र मोदी को मदद देता नजर आता है। इतिहास ने इस कठिन समय में नरेंद्र मोदी को स्वयं ऐसे अवसर दिए हैं जिसका लाभ उन्हें मिल सकता है। सही मायने में देश में कुशासन, भ्रष्टाचार और अकमर्ण्यता को लेकर एक आलोड़न है। जनता के मन में रोष भरा हुआ है। टेलीविजन समय ने इस पूरे बेशर्म समय को खूबसूरती से दर्ज किया है। इसके चलते सत्ता विरोधी और कांग्रेस विरोधी रूझान सर्वत्र प्रकट हो रहा है। इसके चलते ही कांग्रेस ने बड़ी चालाकी से कल तक अपने विरोधी रहे केजरीवाल और उनके मित्रों की ओर बड़ी आस से देखना शुरू कर दिया है। उन्हें लगता है सत्ता विरोधी वोटों को बांटकर वे अपनी सत्ता बचा लेगें। कांग्रेस की पूरी रणनीति दिल्ली प्रदेश के चुनाव के बाद बदल गयी लगती है। वे पूरी तरह से अब केजरीवाल की पार्टी द्वारा किए जाने वाले सत्ता और केंद्र विरोधी वोटों के बंटवारे पर केंद्रित हो चुके हैं। कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी की यह दशा सोचनीय लगती है। जिस कांग्रेस ने देश की आजादी के आंदोलन का नेतृत्व किया है उसके नेतृत्व का इस तरह बेचारा होना एक बड़ा प्रश्न है। इक्कीसवीं सदी में देश एक मजबूत भारत चाहता है। उसके सपने अलग हैं। हिंदुस्तान के नौजवानों की आंखों में एक बेहतर भविष्य उमड़-घुमड़ रहा है। वे लोकतंत्र की इस बेचारगी को ठगे-ठगे से देख रहे हैं। सामने मोदी आएं या केजरीवाल सभी उम्मीदें जगाते हैं। लोग उनकी तरफ दौड़ जाते हैं। दिल्ली की केंद्र सरकार ने जिस तरह लोगों का दिल तोड़ा है कि लोग उम्मीदों से खाली हो चुके हैं। ऐसे कठिन समय में नरेंद्र मोदी एक आस जगाते हुए नेता हैं। उनके पास भाजपा जैसी बड़ी पार्टी और संघ परिवार का व्यापक आधार है। उनकी पार्टी के पास दिल्ली से लेकर राज्यों में सरकार चलाने के अनुभव हैं। राजग के रूप में उनके नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने एक बेहतर गठबंधन सरकार चलायी है। ऐसे में भाजपा अगर अकेले दम पर 200 सीटों के आसपास पहुंच सकी तो कोई कारण नहीं कि दिल्ली को फिर एक भाजपाई प्रधानमंत्री मिल सकता है। देखना है कि भाजपा इस बेहद खूबसूरत अवसर का किस तरह लाभ उठा पाती है। 

 (लेखक राजनीतिक विश्वेषक हैं)