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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

भारतीय संस्कृति, धर्म और नीति की शिक्षा के पक्षधर थे मालवीय : मुरली मनोहर जोशी


राष्ट्र निर्माण था अटल बिहारी वाजपेयी की पत्रकारिता का लक्ष्य : अशोक टंडन

भारतीय जन संचार संस्थान में 'शुक्रवार संवादकार्यक्रम का आयोजन



नई दिल्ली23 दिसंबर। भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के उपलक्ष्य में भारतीय जन संचार संस्थान द्वारा आयोजित 'शुक्रवार संवाद' को संबोधित करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि पंडित मदन मोहन मालवीय भारतीय संस्कृतिधर्म और नीति की शिक्षा के पक्षधर थे। महामना के शिक्षा दर्शन के मूल में विद्यार्थियों के शारीरिकमानसिकबौद्धिक और आध्यात्मिक विकास की अवधारणा थी। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के तत्कालीन मीडिया सलाहाकार श्री अशोक टंडनआईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदीअपर महानिदेशक श्री आशीष गोयलडीन (अकादमिक) प्रो. गोविंद सिंह एवं डीन (छात्र कल्याण) प्रो. प्रमोद कुमार सहित आईआईएमसी के सभी केंद्रों के संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।

'मदन मोहन मालवीय की शिक्षा दृष्टि' विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि मालवीय जी स्वतंत्रता सेनानीराजनीतिज्ञ और शिक्षाविद् ही नहींबल्कि एक बड़े समाज सुधारक भी थे। देश से जातिगत बेड़ियों को तोड़ने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान था। उनका कहना था कि जो शिक्षा लोगों में भेदभाव करेगीवो हमें स्वीकार नहीं है।

डॉ. जोशी ने कहा कि मालवीय जी की दूरदृष्टि कहां तक जाती थीइस पर समग्र रूप से विचार करने के लिए उनके जीवन के विविध पहलुओं का अध्ययन आवश्यक है। मालवीय जी भारतीय समाज एवं राष्ट्र के निर्माण के लिए ऐसे लोगों का सृजन करना चाहते थेजो समग्र रूप से विकसित होंआधुनिक ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में दक्ष हों और भारतीय संस्कृति में निहित मूल्यों पर चलने वाले हों।

इस अवसर पर 'अटल बिहारी वाजपेयी और पत्रकारिता के मूल्य' विषय पर विचार व्यक्त करते हुए श्री अशोक टंडन ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते थे। अटलजी जनता की बातों को ध्यान से सुनते थे और उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करते थे। श्री टंडन ने कहा कि अटल जी ने कठिन परिस्थितियों में पत्रकारिता की शुरुआत की और वह अखबार में खबर लिखनेसंपादन करने और प्रिंटिंग के साथ साथ समाचार पत्र वितरण का कार्य भी स्वयं करते थे।

श्री टंडन के अनुसार अटल जी ने मूल्यों की पत्रकारिता की और इसी वजह से आज भी पत्रकार अटल जी को अपना रोल मॉडल मानते हैं। उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी राजनेता बनने से पहले एक पत्रकार थे। वह देश और समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा से पत्रकारिता में आए थे। उनके जीवन का लक्ष्य पत्रकारिता के माध्यम से पैसे कमाना नहींबल्कि राष्ट्र निर्माण था। उनकी कविताएं नौजवानों में उत्साह जगाने वाली थीं। अटल जी का मानना था कि समाचार पत्रों के ऊपर एक बड़ा राष्ट्रीय दायित्व है। भले ही हम समाचार पत्रों की गणना उद्योग में करेंलेकिन समाचार पत्र केवल उद्योग नहीं हैंउससे भी कुछ अधिक हैं।

कार्यक्रम का संचालन डिजिटल मीडिया विभाग की प्रमुख डॉ. रचना शर्मा ने किया।

सोमवार, 14 जून 2021

हिंदी पत्रकारिता के प्रवर्तक के नाम पर होगा आईआईएमसी का पुस्तकालय


देश में पं. युगल किशोर शुक्ल के नाम पर बनेगा पहला स्मारक



नई दिल्ली, 14 जून। भारतीय जन संचार संस्थान का पुस्तकालय अब पं. युगल किशोर शुक्ल ग्रंथालय एवं ज्ञान संसाधन केंद्र के नाम से जाना जाएगा। हिंदी पत्रकारिता के प्रवर्तक पं. युगल किशोर शुक्ल के नाम पर यह देश का पहला स्मारक होगा। पुस्तकालय के नामकरण के अवसर पर आईआईएमसी द्वारा 17 जून को "हिंदी पत्रकारिता की प्रथम प्रतिज्ञा: हिंदुस्तानियों के हित के हेत" विषय पर एक विशेष विमर्श का आयोजन किया जाएगा। इस कार्यक्रम में देश के प्रमुख विद्वान अपने विचार व्यक्त करेंगे।

आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने बताया कि इस वेबिनार में दैनिक जागरण (दिल्ली-एनसीआर) के संपादक श्री विष्णु प्रकाश त्रिपाठी मुख्य अतिथि होंगे तथा पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार श्री विजयदत्त श्रीधर मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल होंगे। कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ताओं के रूप में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की निदेशक डॉ. सोनाली नरगुंदे, पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. सी. जय शंकर बाबु, कोलकाता प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री स्नेहाशीष सुर एवं आईआईएमसी, ढेंकनाल केंद्र के निदेशक प्रो. मृणाल चटर्जी अपने विचार प्रकट करेंगे।

प्रो. द्विवेदी ने इस आयोजन के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि भारत में हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत पं. युगल किशोर शुक्ल द्वारा 30 मई, 1826 को कोलकाता से प्रकाशित समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' से हुई थी। इसलिए 30 मई को पूरे देश में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि 'उदन्त मार्तण्ड' का ध्येय वाक्य था, ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ और इस एक वाक्य में भारत की पत्रकारिता का मूल्यबोध स्पष्ट रूप में दिखाई देता है।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि ये हमारे लिए बड़े गर्व का विषय है कि आईआईएमसी का पुस्तकालय अब पं. युगल किशोर शुक्ल के नाम से जाना जाएगा। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने स्वाधीनता से लेकर आम आदमी के अधिकारों तक की लड़ाई लड़ी है। समय के साथ पत्रकारिता के मायने और उद्देश्य चाहे बदलते रहे हों, लेकिन हिंदी पत्रकारिता पर देश के लोगों का विश्वास आज भी है।

शुक्रवार, 28 मई 2021

सकारात्‍मक खबरें देकर पाठकों में विश्वास पैदा करे मीडिया

हिंदी पत्रकारिता दिवस के उपलक्ष्‍य में भारतीय जन संचार संस्थान द्वारा ‘कोरोना काल के बाद की पत्रकारिता’ विषय पर चर्चा




नई दिल्ली, 28 मई “तन का कोरोना यदि तन से तन में फैलातो मन का कोरोना भी मीडिया के एक वर्ग ने बड़ी तेजी से फैलाया। मीडिया को लोगों के सरोकारों का ध्‍यान रखना होगा, उनके प्रति संवेदनशीलता रखनी होगी। यदि सत्‍य दिखाना पत्रकारिता का दायित्‍व हैतो ढांढस देनादिलासा देनाआशा देना, उम्‍मीद देना भी उसी का उत्‍तरदायित्‍व है। अमेरिका में 6 लाख मौते हुईंलेकिन वहां हमारे चैनलों जैसे दृश्‍य नहीं दिखाए गए। 11 सितम्‍बर के आतंकवादी हमले के बाद भी पीड़ितों के दृश्‍य नहीं दिखाए गए थे। हमारे यहां कुछ वर्जनाएं हैंजिन पर ध्‍यान देना होगा।  सत्‍य दिखाएं लेकिन कैसे दिखाएंइस पर गौर करना जरूरी है। चाकू चोर की तरह चलाना हैया सर्जन की तरह यह तय करना होगा,” यह कहना है वरिष्ठ पत्रकार श्री उमेश उपाध्याय का।  वे भारतीय जन संचार संस्थान द्वारा हिंदी पत्रकारिता दिवस के उपलक्ष्‍य में आयोजित शुक्रवार संवाद’ में कोरोना काल के बाद की पत्रकारिता’’ विषय पर मीडिया छात्रों को संबोधित कर रहे थे।  इस अवसर पर अमर उजाला डिजिटल के संपादक श्री जयदीप कर्णिक, दैनिक ट्रिब्‍यून चंडीगढ़ के संपादक श्री राजकुमार सिंह और हिंदुस्‍तान की कार्यकारी संपादक सुश्री जयंती रंगनाथन ने भी अपने विचार साझा किए।

इससे पहले भारतीय जन संचार संस्‍थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि समाज के अवसादचिंताएं कैसे दूर होंइस पर चिंतन आवश्‍यक है। यह सामाजिक संवेदनाएं जगाने का समय है। सारे काम सरकार पर नहीं छोड़े जा सकते। विद्यार्थियों के लिए इस समय जमीन पर जाकर कर काम करना जरूरी है। वे अपने आसपास के लोगों को संबल दें। हमें ऐसी शिक्षा चाहिएजो इंसान को इंसान बनाए।

श्री जयदीप कर्णिक ने कहा कि तकनीक की दृष्टि से कोरोना ने फास्‍ट फारवर्ड का बटन दबा दिया है। यूं तो पहले से ही डिजिटल इज़ फ्यूचर जुमला बन चुका थालेकिन जो तकनीकी बदलाव 5 साल में होना थावह अब पांच महीने में ही करना होगा। तकनीक के साथ चलना होगातभी कोई मीडिया घराने के रूप में स्‍थापित हो सकेगा। उन्होने कहा कि इस दौर में पत्रकारिता को भी अपने हित पर गौर करना होगा। कोरोना की पहली लहर में डिजिटल पर ट्रैफिक चार गुना बढ़ा थाजो दूसरी लहर में उससे भी कई गुना बढ़ गया। डिजिटल में यह जानने की सुविधा है कि पाठक क्‍या पढ़ना चाहता है और कितनी देर तक पढ़ना चाहता है। पत्रकार शुतुर्मुर्ग की तरह नहीं बन सकताजरूरी है कि  सत्‍य दिखाइए, पर इस तरह दिखाइए कि लोग अवसाद में न जाएं। हमें सलीके से सच दिखाना होगा।

श्री राजकुमार सिंह ने कहा कि कोरोना काल ने केवल पत्रकारिता को ही नहींबल्कि हमारी जीवन शैली और जीवन मूल्‍यों को भी झकझोर कर रख दिया। पत्रकारिता ने कई अनपेक्षित बदलाव देखे। उस पर कई तरफ से प्रहार हुआ। सबसे ज्‍यादा असर तो यह हुआ कि लोगों ने अखबार लेना बंद कर दिया। कोरोना की पहली लहर के बाद 40 से 50 प्रतिशत पाठक ही अखबारों की ओर लौट पाए। कोरोना काल में अपनी जान गँवाने वाले पत्रकारों का जिक्र करते हुए उन्होने कहा कि देश में ऐसा कोई आंकड़ा नहीं कि कितने पत्रकारों की जान गईं। यह आंकड़ा चिकित्‍सा जगत के लोगों की मौतों के आंकड़े से कहीं ज्‍यादा हो सकता है। पत्रकार भी फ्रंटलाइन योद्धा हैं उनकी भी चिंता की जानी चाहिए।

सुश्री जयंती रंगनाथन ने कहा कि मीडिया को सकारात्‍मक खबरें देनी होंगी। उसे लोगों को बताना होगा कि पुराने दिन लौट कर आएंगेलेकिन उसमें थोड़ा वक्‍त लगेगा। हमारा डीएनए पश्चिमी देशों से भिन्‍न हैजैसा वहां हैयहां ऐसा नहीं होगा। हमें भी अपने पाठकों की मदद करनी होगी। हमें लोगों के सरोकारों से जुड़ना होगा। सकारात्‍मक खबरों का दौर लौटेगा और प्रिंट मीडिया मजबूती से जमा रहेगा।

कार्यक्रम का संचालन “अपना रेडियो” और आईटी विभाग की विभागाध्‍यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) संगीता प्रणवेंद्र ने किया। डीन (अकादमिक)  प्रो. (डॉ.) गोविन्‍द सिंह  ने धन्‍यवाद ज्ञापन किया।



सोमवार, 10 मई 2021

नए समय में मीडिया शिक्षा की चुनौतियां

 

डिजीटल ट्रांसफार्मेशन के लिए तैयार हों नए पत्रकार

- प्रो. संजय द्विवेदी


     एक समय था जब माना जाता है कि पत्रकार पैदा होते हैं और पत्रकारिता पढ़ा कर सिखाई नहीं जा सकती। अब वक्त बदल गया है। जनसंचार का क्षेत्र आज शिक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। वर्ष 2020 को लोग चाहे कोरोना महामारी की वजह से याद करेंगे, लेकिन एक मीडिया शिक्षक होने के नाते मेरे लिए ये बेहद महत्वपूर्ण है कि पिछले वर्ष भारत में मीडिया शिक्षा के 100 वर्ष पूरे हुए थे। वर्ष 1920 में थियोसोफिकल सोसायटी के तत्वावधान में मद्रास राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में डॉक्टर एनी बेसेंट ने पत्रकारिता का पहला पाठ्यक्रम शुरू किया था। लगभग एक दशक बाद वर्ष 1938 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को एक सर्टिफिकेट कोर्स के रूप में शुरू किया गया। इस क्रम में पंजाब विश्वविद्यालय, जो उस वक्त के लाहौर में हुआ करता था, पहला विश्वविद्यालय था, जिसने अपने यहां पत्रकारिता विभाग की स्थापना की। भारत में पत्रकारिता शिक्षा के संस्थापक  कहे जाने वाले प्रोफेसर पीपी सिंह ने वर्ष 1941 में इस विभाग की स्थापना की थी। अगर हम स्वतंत्र भारत की बात करें, तो सबसे पहले मद्रास विश्वविद्यालय ने वर्ष 1947 में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की स्थापना की। 

   इसके पश्चात कलकत्ता विश्वविद्यालय, मैसूर के महाराजा कॉलेज, उस्मानिया यूनिवर्सिटी एवं नागपुर यूनिवर्सिटी ने मीडिया शिक्षा से जुड़े कई कोर्स शुरू किए। 17 अगस्त, 1965 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय जन संचार संस्थान की स्थापना की, जो आज मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में पूरे एशिया में सबसे अग्रणी संस्थान है।  आज भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, रायपुर में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय एवं जयपुर में हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय पूर्ण रूप से मीडिया शिक्षण एवं प्रशिक्षण का कार्य कर रहे हैं। भारत में मीडिया शिक्षा का इतिहास 100 वर्ष जरूर पूर्ण कर चुका है, परंतु यह अभी तक इस उलझन से मुक्त नहीं हो पाया है कि यह तकनीकी है या वैचारिक। तकनीकी एवं वैचारिकी का द्वंद्व मीडिया शिक्षा की उपेक्षा के लिए जहां उत्तरदायी है, वहां सरकारी उपेक्षा और मीडिया संस्थानों का सक्रिय सहयोग न होना भी मीडिया शिक्षा के इतिहास की तस्वीर को धुंधली प्रस्तुत करने को विवश करता है।

    भारत में जब भी मीडिया शिक्षा की बात होती है, तो प्रोफेसर के. . ईपन का नाम हमेशा याद किया जाता है। प्रोफेसर ईपन भारत में पत्रकारिता शिक्षा के तंत्र में व्यावहारिक प्रशिक्षण के पक्षधर थे। प्रोफेसर ईपन का मानना था कि मीडिया के शिक्षकों के पास पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा के साथ साथ मीडिया में काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव भी होना चाहिए, तभी वे प्रभावी ढंग से बच्चों को पढ़ा पाएंगे। आज देश के अधिकांश पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षण संस्थान, मीडिया शिक्षक के तौर पर ऐसे लोगों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिन्हें अकादमिक के साथ साथ पत्रकारिता का भी अनुभव हो। ताकि ये शिक्षक ऐसा शैक्षणिक माहौल तैयार कर सकें, ऐसा शैक्षिक पाठ्यक्रम तैयार कर सकें, जिसका उपयोग विद्यार्थी आगे चलकर अपने कार्यक्षेत्र में भी कर पाएं।  पत्रकारिता के प्रशिक्षण के समर्थन में जो तर्क दिए जाते हैं, उनमें से एक दमदार तर्क यह है कि यदि डॉक्टरी करने के लिए कम से कम एम.बी.बी.एस. होना जरूरी है, वकालत की डिग्री लेने के बाद ही वकील बना जा सकता है तो पत्रकारिता जैसे महत्वपूर्ण पेशे को किसी के लिए भी खुला कैसे छोड़ा जा सकता है?

    दरअसल भारत में मीडिया शिक्षा मोटे तौर पर छह स्तरों पर होती है। सरकारी विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में, दूसरे, विश्वविद्यालयों से संबंद्ध संस्थानों में, तीसरे, भारत सरकार के स्वायत्तता प्राप्त संस्थानों में, चौथे, पूरी तरह से प्राइवेट संस्थान, पांचवे डीम्ड विश्वविद्यालय और छठे, किसी निजी चैनल या समाचार पत्र के खोले गए अपने मीडिया संस्थान। इस पूरी प्रक्रिया में हमारे सामने जो एक सबसे बड़ी समस्या है, वो है किताबें। हमारे देश में मीडिया के विद्यार्थी विदेशी पुस्तकों पर ज्यादा निर्भर हैं। लेकिन अगर हम देखें तो भारत और अमेरिका के मीडिया उद्योगों की संरचना और कामकाज के तरीके में बहुत अंतर है। इसलिए मीडिया के शिक्षकों की ये जिम्मेदारी है, कि वे भारत की परिस्थितियों के हिसाब से किताबें लिखें।

    मीडिया शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए आज मीडिया एजुकेशन काउंसिल की आवश्यकता है। इसकी मदद से न सिर्फ पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षा के पाठ्यक्रम में सुधार होगा, बल्कि मीडिया इंडस्ट्री की जरुरतों के अनुसार पत्रकार भी तैयार किये जा सकेंगे। आज मीडिया शिक्षण में एक स्पर्धा चल रही है। इसलिए मीडिया शिक्षकों को ये तय करना होगा कि उनका लक्ष्य स्पर्धा में शामिल होने का है, या फिर पत्रकारिता शिक्षण का बेहतर माहौल बनाने का है। आज के समय में पत्रकारिता बहुत बदल गई है, इसलिए पत्रकारिता शिक्षा में भी बदलाव आवश्यक है। आज लोग जैसे डॉक्टर से अपेक्षा करते हैं, वैसे पत्रकार से भी सही खबरों की अपेक्षा करते हैं। अब हमें मीडिया शिक्षण में ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करने होंगे, जिनमें विषयवस्तु के साथ साथ नई तकनीक का भी समावेश हो।

    न्यू मीडिया आज न्यू नॉर्मल है। हम सब जानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण लाखों नौकरियां गई हैं। इसलिए हमें मीडिया शिक्षा के अलग अलग पहलुओं पर ध्यान देना होगा और बाजार के हिसाब से प्रोफेशनल तैयार करने होंगे। नई शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान देने की बात कही गई है। जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें इस पर ध्यान देना होगा। मीडिया शिक्षण संस्थानों के लिए आज एक बड़ी आवश्यकता है क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार करना। भाषा वो ही जीवित रहती है, जिससे आप जीविकोपार्जन कर पाएं और भारत में एक सोची समझी साजिश के तहत अंग्रेजी को जीविकोपार्जन की भाषा बनाया जा रहा है। ये उस वक्त में हो रहा है, जब पत्रकारिता अंग्रेजी बोलने वाले बड़े शहरों से हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के शहरों और गांवों की ओर मुड़ रही है। आज अंग्रेजी के समाचार चैनल भी हिंदी में डिबेट करते हैं। सीबीएससी बोर्ड को देखिए जहां पाठ्यक्रम में मीडिया को एक विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है। क्या हम अन्य राज्यों के पाठ्यक्रमों में भी इस तरह की व्यवस्था कर सकते हैं, जिससे मीडिया शिक्षण को एक नई दिशा मिल सके।

    एक वक्त था जब पत्रकारिता का मतलब प्रिंट मीडिया होता था। अस्सी के दशक में रिलीज हुई अमेरिकी फिल्म Ghostbusters (घोस्टबस्टर्स) में सेक्रेटरी जब वैज्ञानिक से पूछती है किक्या वे पढ़ना पसंद करते हैं? तो वैज्ञानिक कहता हैप्रिंट इज डेड। इस पात्र का यह कहना उस समय हास्य का विषय था, परंतु वर्तमान परिदृश्य में प्रिंट मीडिया के भविष्य पर जिस तरह के सवाल खड़े किये जा रहे हैं, उसे देखकर ये लगता है कि ये सवाल आज की स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठता है। आज दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों से हमें ये सूचनाएं मिल रही हैं कि प्रिंट मीडिया पर संकट के बादल हैं। ये भी कहा जा रहा है कि बहुत जल्द अखबार खत्म हो जाएंगे। वर्ष 2008 में अमेरिकी लेखक जेफ गोमेज ने प्रिंट इज डेड पुस्तक लिखकर प्रिंट मीडिया के खत्म होने की अवधारणा को जन्म दिया था। उस वक्त इस किताब का रिव्यू करते हुए एंटोनी चिथम ने लिखा था कि, यह किताब उन सब लोगों के लिएवेकअप कॉलकी तरह है, जो प्रिंट मीडिया में हैं, किंतु उन्हें यह पता ही नहीं कि इंटरनेट के द्वारा डिजिटल दुनिया किस तरह की बन रही है। वहीं एक अन्य लेखक रोस डावसन ने तो समाचारपत्रों के विलुप्त होने का, समय के अनुसार एक चार्ट ही बना डाला। इस चार्ट में जो बात मुख्य रूप से कही गई थी, उसके अनुसार वर्ष 2040 तक विश्व से अखबारों के प्रिंट संस्करण खत्म हो जाएंगे।         मीडिया शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों में इस तरह के बदलाव करने चाहिए, कि वे न्यू मीडिया के लिए छात्रों को तैयार कर सकें। आज तकनीक किसी भी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मीडिया में दो तरह के प्रारूप होते हैं। एक है पारंपरिक मीडिया जैसे अखबार और पत्रिकाएं और और दूसरा है डिजिटल मीडिया। अगर हम वर्तमान संदर्भ में बात करें तो सबसे अच्छी बात ये है कि आज ये दोनों प्रारूप मिलकर चलते हैं। आज पारंपरिक मीडिया स्वयं को डिजिटल मीडिया में परिवर्तित कर रहा है। जरूरी है कि मीडिया शिक्षण संस्थान अपने छात्रों को 'डिजिटल ट्रांसफॉर्म' के लिए पहले से तैयार करें। देश में प्रादेशिक भाषा यानी भारतीय भाषाओं के बाजार का महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी भाषा के उपभोक्ताओं का डिजिटल की तरफ मुड़ना लगभग पूरा हो चुका है। ऐसा माना जा रहा है कि वर्ष 2030 तक भारतीय भाषाओं के बाजार में उपयोगकर्ताओं की संख्या 500 मिलियन तक पहुंच जाएगी और लोग इंटरनेट का इस्तेमाल स्थानीय भाषा में करेंगे। जनसंचार की शिक्षा देने वाले संस्थान अपने आपको इन चुनौतियों के मद्देनजर तैयार करें, यह एक बड़ी जिम्मेदारी है।



प्रो. संजय द्विवेदी, संप्रति भारतीय जनसंचार संस्थान(आईआईएमसी),नई दिल्ली के महानिदेशक हैं।
 

 

 

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

कैलेंडर के साथ जिंदगी भी बदल जाए तो बेहतर

                                                                -प्रो. संजय द्विवेदी

 

    यह साल जा रहा है, बहुत सी कड़वी यादें देकर। कोरोना और उससे उपजे संकटों से बने बिंब और प्रतिबिंब आज भी आंखों में तैर रहे हैं और डरा रहे हैं। यह पहला साल है, जिसने न जाने कितने जानने वालों की मौत की सूचनाएं दी हैं। पहले भी बीमारियां आईं, आपदाएं आईं किंतु उनका एक वृत्त है, भूगोल है, उनसे प्रभावित कुछ क्षेत्र रहे हैं। यह कोरोना संकट तो अजब है, जहां कभी भी और कोई भी मौत की तरह दर्ज हो रहा है। इस बीमारी की मार चौतरफा है रोजी पर, रोजगार पर, तनख्वाह पर, शिक्षा पर, समाज पर और कहां नहीं। डरे हुए लोग रोज उसके नए रूपों की सूचनाओं से हैरत में हैं। बचा-खुचा काम वाट्सएप और अन्य सामाजिक माध्यमों पर ज्ञान और सूचनाएं उड़ेलते लोग कर रहे हैं। यह कितना खतरनाक है कि हम चाहकर भी कुछ कर नहीं पा रहे। अपनी अस्त-व्यस्त होती जिंदगी और उसे तिल-तिल खत्म होता देखने के सिवा। ऐसे में नए साल का इंतजार भी है और भरोसा भी है कि शायद चीजें बदल जाएं। कैलेंडर का बदलना, जिंदगी का बदलना हो जाए। नया साल उम्मीदों का भी है, सपनों का भी। उन चीजों का भी जो पिछले साल खो गयीं या हमसे छीन ली गयीं।

      मनुष्य की जिजीविषा ही उसकी शक्ति है, इसलिए खराब हालात के बाद भी, टूटे मन के बाद भी लगता है कि सब कुछ ठीक होगा और एक सुंदर दुनिया बनेगी । 2021 का साल इस मायने में बहुत सारी उम्मीदों का साल है, टूटे सपनों को पूरा करने के लिए फिर से जुटने का साल है। 2020 की बहुत सारी छवियां हैं, करोना से टूटते लोग हैं, महानगरों से गांवों को लौटते लोग हैं, बीमारी से मौत की ओर बढ़ते लोग हैं, नौकरियां खोते और गहरी असुरक्षा में जीते हुए लोग हैं। मनुष्य इन्हीं आपदाओं से जूझकर आगे बढ़ता है और पाता है पूरा आकाश। इसीलिए श्री अटल बिहारी वाजपेयी लिख पाए-

जड़ता का नाम जीवन नहीं है,

पलायन पुरोगमन नहीं है।

आदमी को चाहिए कि वह जूझे

परिस्थितियों से लड़े,

एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े।

    हमें अपने सपनों को सच करना है, हर हाल में। आपदा को अवसर में बदलते हुए आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते हुए। इस जाते हुए साल ने हमें दर्द दिए हैं, आंसू दिए हैं पर वह हमें तोड़ नहीं पाया है। न हमारी जिजाविषा को, न हमारे मन को, न ही जीवन की गति को। नए अवसरों और नए रास्तों की तलाश में यह सारा वर्ष गुजरा है। हमारा समय, संवाद और शिक्षा सब कुछ डिजिटल होती दिखी। अब कक्षाओं का डिजिटल होना भी एक सच्चाई है। संवाद, वार्तालाप, कार्यशालाओं, संगोष्ठियों को डिजीटल माध्यमों पर करना संभव हुआ है। इसे ज्यादा सरोकारी, ज्यादा प्रभावशाली बनाने की विधियां निरंतर खोजी जा रही हैं। इस दिशा में सफलता भी मिल रही है। गूगल मीट, जूम, जियो मीट, स्काइप जैसे मंच आज की डिजिटल बैठकों के सभागार हैं। जहां निरंतर सभाएं हो रही हैं, विमर्श निरंतर है और संवाद 24X7  है। कहते हैं डिजिटल मीडिया का सूरज कभी नहीं डूबता। वह सदैव है, सक्रिय है और चैतन्य भी। हमारे विचार, व्यवहार और आदतों में भी बदलाव साफ दिख रहा है। हम बदल रहे हैं, देश बदल रहा है। अब वह पुराने साल को बिसार कर नए साल में नई आदतों के साथ प्रवेश कर रहा है। ये आदतें सामाजिक व्यवहार की भी हैं और निजी जीवन की भी। यह व्यवहार और आदतों को भी बदलने वाला साल है। स्वास्थ्य, सुरक्षा और डिजिटल दुनिया की त्रिआयामी कड़ी ने इस जाते हुए साल को खास बनाया है। 2020 ने हमें प्रकृति के साथ रहना सिखाया, पर्यावरण के प्रति ममत्व पैदा किया तो हाथ जोड़कर नमस्कार को विश्व पटल पर स्थापित कर दिया। साफ-सफाई के प्रति हमें चैतन्य किया। इसका असर भी दिखा साफ आसमान, साफ नदियां, खिला-खिला सा पूरा वातावरण,चहचहाते पक्षी कुछ कह रहे थे। दर्द देकर भी इसने बहुत कुछ सिखाया है, समझाया है। हमें कीमत समझायी है- अपनी जमीन की, माटी की, गांव की और रिश्तों की। परिवार की वापसी हुई है। जिसे हमारे विद्वान वक्ता श्री मुकुल कानिटकर घरवास की संज्ञा दे रहे हैं। लाकडाउन में जीवन के नए अनुभवों ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। नई पदावली से हम परिचित हुए हैं। एक नए जीवन ने हमारी जीवनशैली में प्रवेश किया है।

     हम कोरोना से सीखकर एक नई जिंदगी जी रहे हैं। बीता हुआ समय हमें अनेक तरह से याद आता है। हम सब स्मृतियों के संसार में ही रहते हैं। बीते साल की ये यादें हमें बताएंगी कि हमने किस तरह इस संकट से जूझकर इससे निजात पाई थी। किस तरह हमारे कोरोना योद्धाओं ने हमें इस महासंकट से जूझना और बचना सिखाया। अपनी जान पर खेलकर हमें जिंदगी दी। वे चिकित्सा सेवाओं के लोग हों, पुलिसकर्मी हों, पत्रकार हों या विविध सेवाओं से जुड़े लोग सब अग्रिम मोर्चे पर तैनात थे। बहुत सारे सामाजिक संगठनों और निजी तौर पर लोगों ने राहत पहुंचाने के भी अनथक प्रयास किए, इसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। किस तरह हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक राष्ट्रनायक की तरह देश को जोड़कर इस संकट में साथ रहना और संकटों से जूझने की शक्ति दी। कल्पना कीजिए उन जैसा नायक न होता तो हमारा क्या होता? उनके प्रेरित करने वाले वक्तव्यों ने, संवादों ने हमें संबल दिया और घने अँधेरे और कठिन समय में भी हम संबल बनाकर रख सके। संवाद और संचार कैसे टूटे मनों को जोड़ने का काम करता है और एक आदर्श संचारक इस शक्ति का कैसे उपयोग करता है, हमारे प्रधानमंत्री इसके उदाहरण हैं। इस साल ने हमें मनुष्य बने रहने का संदेश दिया है। अहंकार और अकड़ को छोड़कर विनीत बनने की सीख हमें मिली है। क्योंकि प्रकृति की मार के आगे किसी की नहीं चलती और बड़े-बड़े सीधे हो जाते हैं। प्रकृति से संवाद और प्रेम का रिश्ता हमें बनाना होगा, तभी यह दुनिया रहने लायक बचेगी। महात्मा गांधी ने कहा था पृथ्वी हर मनुष्य की जरूरत को पूरा कर सकती है, परंतु पृथ्वी मनुष्य के लालच को पूरा नहीं कर सकती है।   

     नए साल-2021 की पहली सुबह का स्वागत करते हुए हम एक अलग भाव से भरे हुए हैं। इस साल ने तमाम बुरी खबरों के बीच उजास जगाने वाली खबरें भी दी हैं, अयोध्या में राममंदिर की नींव का रखा जाना, नए संसद भवन का शिलान्यास, नई राष्ट्रीय शिक्षा का आना, राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी की परिकल्पना, सेना में महिलाओं को स्थाई कमीशन के साथ बोडो ग्रुप और सरकार के बीच समझौता साधारण खबरें नहीं हैं। इसके साथ ही हमारी राजनीति, संस्कृति और साहित्य की दुनिया के अनेक नायक हमें इस साल छोड़कर चले गए उसका दुख भी विरल है। जिनमें पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, राजनेता रामविलास पासवान, जसवंत सिंह, अहमद पटेल, अजीत जोगी, रघुवंश प्रसाद सिंह, अमर सिंह, अजीज जोगी, लालजी टंडन, तरूण गोगोई पूर्व क्रिकेटर और उप्र सरकार के मंत्री चेतन चौहान, एमडीएच मसाले के महाशय धर्मपाल गुलाटी, पत्रकार अश्विनी कुमार चोपड़ा, ललित सुरजन, राजीव कटारा, मंगलेश डबराल, वरिष्ठ पत्रकार और समाज चिंतक मा.गो.वैद्य, रंगकर्मी ऊषा गांगुली, उपन्यासकार कृष्ण बलदेव वैद्य, गिरिराज किशोर, राहत इंदौरी, विष्णुचंद्र शर्मा, अहद प्रकाश जैसे अनेक नाम हैं, जिनकी याद हमें लंबे समय तक आती रहेगी। इन विभूतियां न होना एक ऐसा शून्य रच रहा है जिसे भर पाना कठिन है। 

   बावजूद इसके उम्मीद है कि नववर्ष सारे संकटों से निकाल कर नया उजाला हमारी जिंदगी में लाएगा। उस रौशनी से हिंदुस्तान फिर से जगमगा उठेगा। एक नया भारत बनने की ओर है,यह आकांक्षावान भारत है, उत्साह से भरा, उमंगों से भरा, नए सपनों से उत्साहित और नयी चाल में ढलने को तैयार। निराला जी की इन पंक्तियों की तरह-

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव

नवल कंठ, नव जलद-मन्द्र रव;

नव नभ के नव विहग-वृंद को

नव पर, नव स्वर दे!



गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

“भारत का भारत से परिचय कराने की जरुरत”

    साक्षात्कारकर्ता: सौरभ कुमार, विश्व संवाद केंद्र, मध्य प्रदेश

         

                                                                  

जब हम आपके पत्रकारिता के सफर को देखते हैं, तो उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर बस्ती से आपके मन में पत्रकारिता की रुचि जागी। आप पत्रकारिता की पढ़ाई करने के लिए मध्य प्रदेश आए। आपने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में ही अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई की। उसके बाद आपने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को अपनी कर्मभूमि बनाया। और जिस संस्थान से आप पढ़े, उसी संस्थान के सर्वोच्च पद पर पहुंचे। तो उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से आईआईएमसी तक का आपका सफर कैसा रहा? इस सफर के बारे में हमें विस्तार से बताइये।

मुझे ऐसा लगता है कि हर युवा को और हर विद्यार्थी को सपने देखने चाहिए। अपने सपनों को पूरा करने के लिए दौड़ लगानी चाहिए और अपेक्षित परिश्रम भी करना चाहिए। अगर आप सपने देखते हैं और उन सपनों को पूरा करने का आपके अंदर जज्बा है, तो सपने पूरे भी होते हैं। मैं ये नहीं कह रहा हूं कि मैंने कुलपति बनने का या आईआईएमसी के महानिदेशक बनने का सपना देखा था, मैंने एक अच्छा पत्रकार बनने का और किसी दैनिक समाचार पत्र का संपादक बनने का सपना देखा था। और ये ईश्वर की कृपा है कि बहुत कम उम्र में मेरा वो सपना पूरा हो गया। मैं बहुत कम आयु में संपादक बना। स्वदेश, हरिभूमि, दैनिक भास्कर जैसे महत्वपूर्ण समाचार पत्रों का मैं संपादक रहा। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के पहले सैटेलाइट चैनल जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ का इनपुट एडिटर और एंकर रहा। तो मेरा मानना है कि कई बार प्रकृति आपका साथ देती है, लेकिन सपने तो आपको ही देखने हैं और परिश्रम भी आपको ही करना है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए मेरा संदेश है कि सपने देखें और उन्हें पूरा करने के लिए अपेक्षित परिश्रम करें। और आप भरोसा करें कि इसमें ईश्वर आपका साथ निश्चित रूप से देगा।

पत्रकारिता के क्षेत्र में जितने भी बच्चे आते हैं, वे अपने सपने लेकर आते हैं। सबके अपने ख्वाब होते हैं। लेकिन खासतौर पर कोरोना काल में एक डर बच्चों के मन में बैठा है, कि उन्हें पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद नौकरी मिलेगी या नहीं। ये डर किस हद तक सही है और जो पत्रकारिता की शिक्षा है वो इस कोरोना के बाद किस तरह बदलेगी? पत्रकारिता में रोजगार किस तरह बदलेगा? और पत्रकारिता के अध्ययन को ज्यादा रोजगारमूलक बनाने के लिए हमें क्या परिवर्तन करने चाहिए?

समय- समय पर अनेक परिस्थितियां ऐसी आती हैं, जिसमें मानवता और मनुष्य, दोनों की परीक्षा होती है। मनुष्य का काम है साहस के साथ उसका मुकाबला करना। यह भी परीक्षा की घड़ी है। मेरा मानना है कि यह मनुष्य के विवेक, उसके साहस और उसकीजिजीविषा की परीक्षा है। कोरोना कोई स्थायी संकट नहीं है। दुनिया में तमामा ऐसे संकट आए और उसके बाद लगा कि सब कुछ खत्म हो जाएगा, पर ऐसा कुछ भी नहीं होता। अंत में विजय मनुष्यता की ही होती है। यानी जीतता मनुष्य ही है। यह सामयिक संकट है, तात्कालिक संकट है, आज आया है तो कल टल जाएगा। और कितने भी संकट हों, कितनी भी विपदाएं हों, अंत में मनुष्य ही जीतता है। इसलिए हमें इस बात का भरोसा रखना होगा कि हम इन संकटों से मुकाबला करने की अपनी हिम्मत छोड़ें। अगर हम हिम्मत बनाकर रखेंगे, तो निश्चित रूप से हमें सफलता मिलेगी।

कोराना हमें तकनीक के दौर में दो कदम आगे लेकर गया है। ऐसे में आपका क्या मानना है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में कौनसे नए रोजगार सृजित होने की संभावना है?

अगर आप देखें तो परिवर्तन बहुत पहले ही शुरू हो चुका था। 1991 के बाद मीडिया का ध्यान धीरे- धीरे डिजिटल की तरफ बढ़ने लगा। आज एक मीडिया कन्वर्जेंस का समय हमें दिख रहा है। यानी एक साथ आपको अनेक माध्यमों पर सक्रिय होना पड़ता है। और अगर हम 1991 के बाद के 30 सालों की इस यात्रा को देखें, तो इन 30 वर्षों की यात्रा में डिजिटल की तरफ मीडिया का झुकाव ज्यादा बढ़ा है। यानी आपको एक साथ कई प्लेटफॉर्म पर सक्रिय होना पड़ता है।

अगर आप प्रिंट मीडिया हाउस हैं, तो आपको प्रिंट के साथ साथ टीवी, रेडियो और डिजिटल पर भी रहना पड़ेगा और इसके अलावा ऑन ग्राउंड इवेंट्स भी करने पड़ेंगे। यानी एक साथ आप पांच विधाओं को साधते हैं। ऑन ग्राउंड इवेंट्स आज इसलिए महत्वपूर्ण हो गए हैं, क्योंकि आपको समाज के संपर्क में रहना है। आपको एक कहावत याद होगी, ''जो दिखता है, वो बिकता है'' यानी आज आपको लगातार अपनी मौजूदगी बनाए रखनी है।

अगर अखबार सिर्फ सोचे की मैं 24 घंटे में सिर्फ एक बार आउंगा और मेरी मौजूदगी बनी रहेगी, तो नहीं बनी रह सकती। उसे टीवी, रेडियो या डिजिटल में शिफ्ट होना पड़ेगा, ताकि 24 घंटे उसकी मौजूदगी बनी रहे। वो समय अब चला गया कि सिर्फ एक विधा से आपका काम चल जाएगा। आज आपको इन सभी माध्यमों पर एक साथ सक्रिय होना पड़ेगा और यही मीडिया की इस समय ताकत है। मैं यह बात पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि आज जो मीडिया कन्वर्जेंस के मंत्र को समझ गया, वही आगे सफल होगा। और जो मीडिया घराने पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं, उनका समय धीरे धीरे खत्म होता जा रहा है।

समाज में आज एक ऐसा वर्ग है, जो बार बार पत्रकारिता पर टिप्पणी कर रहा है। इन लोगों का कहना है कि पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है। इस टिप्पणी से आप कितने सहमत हैं?

हर प्रोफेशन में थोड़े से भटकाव होते हैं और थोड़ी सी अच्छाइयां भी होती हैं। किसी प्रोफेशन के बारे में आप ये नहीं कह सकते कि इस पेशे के लोग शत- प्रतिशत अपने काम को पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं। आप बताइये कि समाज का ऐसा कौन सा वर्ग है, जो शत- प्रतिशत ईमानदार है। ऐसे पेशे में काम करने वाले, लोग जो विधि की शपथ लेकर प्रोफेशन को शुरू करते हैं, वो भी अपने काम को पूरी ईमानदारी से नहीं करते। ऐसी स्थिति में आप देखिए कि पत्रकार तो कोई भी शपथ नहीं लेता, फिर भी अपने धर्म को निभाता है। इसलिए ये कहना गलत है कि पत्रकार एवं पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है।

मेरा ये मानना है कोई भी चीज पूरी खराब नहीं होती और पूरी अच्छी नहीं होती। हर पेशे में बहुत अच्छे लोग भी हैं और बहुत बुरे लोग भी हैं। तो पत्रकार सिर्फ अच्छे ही अच्छे कैसे हो सकते हैं। जैसा हमारा समाज होता है, वैसे ही हमारे समाज के सभी वर्गों के लोग होते हैं। उसी तरह का मीडिया भी है। तो हमें अपने समाज के शुद्धिकरण का प्रयास करना चाहिए। मीडिया बहुत छोटी चीज है और समाज बहुत बड़ी चीज है। मीडिया समाज का एक छोटा सा हिस्सा है। मीडिया ताकतवर हो सकता है, लेकिन समाज से ताकतवर नहीं हो सकता। राजनीति ताकतवर हो सकती है, लेकिन समाज से ताकतवर कभी नहीं हो सकती। यानी सबसे बड़ा समाज है। समाज को अगर हम स्वस्थ करेंगे, समाज की शक्ति को जगाने का प्रयास करेंगे, समाज की सामूहिकता के लिए काम करेंगे, तो अपने आप समाज में एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण होगा। ऐसे समाज में अच्छे डॉक्टर होंगे, अच्छे शिक्षक होंगे और अच्छे पत्रकार भी होंगे। यही तो 'रामराज्य' की कल्पना है।

रामायण का एक दोहा है 'दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज काहू नहीं व्यापा' यानी 'रामराज्य' में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। इसका ये मतलब नहीं है कि रामराज्य में वैद्य नहीं थे। पर वैद्य ईमानदारी से अपना काम करते थे। शिक्षक ईमानदारी से अपना कार्य करते थे। तो हमें भी ये प्रयास करना होगा कि कि हम अच्छा समाज बनाएं। अगर हम अच्छा समाज बनाएंगे, तो अच्छा मीडिया बनेगा। याद रखिए कि मीडिया अच्छा हो जाएगा और समाज बुरा रहेगा, ऐसा नहीं हो सकता। राजनीति बुरी रहेगी और समाज अच्छा रहेगा, ऐसा भी नहीं हो सकता। इसलिए मेरा मानना हैकि समाज अच्छा होगा, तो समाज जीवन के सभी क्षेत्र अच्छे होंगे।

आज जो पत्रकारिता के संस्थान है, उनका ध्यान इस विषय पर है कि अपनी शिक्षा को कैसे ज्यादा से ज्यादा रोजगारमूलक बनाएं। लेकिन इस शिक्षा में हम मूल्यों को किस तरह शामिल कर सकते हैं? हम कैसे छात्रों को इस तरीके से तैयार कर सकते हैं, कि वे मुश्किल से मुश्किल परिस्तिथि में भी अपने मूल्यों से नहीं डिगें?

एक शब्द है, जिसे बहुत लांछित किया गया है, जबकि मेरा मानना है कि वो शब्द बहुत अच्छा है। वो शब्द है 'प्रोफेशनलिज्म' प्रोफशनलिज्म बहुत अच्छी चीज है। अगर हम सब प्रोफशनल हो जाएं, प्रोफशनलिज्म के नियमों को मानने लगें, तो ये कितनी अच्छी चीज है। दरअसल मीडिया में प्रोफशनलिज्म आया ही नहीं है। मीडिया में थोड़ा सा बाजारूपन गया, थोड़ी सी व्यावसायिकता बढ़ गई, लेकिन प्रोफेशनलिज्म नहीं आया। प्रोफेशनलिज्म का आशय ये है कि अपने काम को पूरी ईमानदारी और प्रामाणिकता के साथ करना और उस काम का उचित मूल्य मिलना।

   मैं ये अपेक्षा करता हूं कि पत्रकारिता के अंदर प्रोफेशनलिज्म विकसित होगा और जैसे जैसे प्रोफेशनलिज्म विकसित होगा, वैसे वैसे अन्य व्यवसायों की तरह पत्रकारिता का सम्मान भी बढ़ेगा, इसमें भत्ते भी अच्छे होंगे और नियमन होगा। जो कार्य मैनेजमेंट के लोग कर पा रहे हैं, जो कार्य अन्य क्षेत्रों के लोग कर पा रहे हैं, वो हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं। इसका कारण है कि मीडिया एक असंगठित क्षेत्र है। आने वालों की भीड़ है, लेकिन कौन रहा है, इसका कोई चैक पाइंट नहीं है। इसलिए मीडिया शिक्षकों को भी एक प्रोफेशनल की तरह सोचना होगा। मीडिया में वही लोग आएं, जो इस काम के प्रति प्रतिबद्ध हैं। कम से कम इस प्रोफेशन की मर्यादा रख सकते हों। और इन लोगों को अपेक्षित शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त हो। हमें आज ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो संचार के असर और उसके प्रभाव को जानते हों। इस परिप्रेक्ष्य में कुछ नियमन पत्रकार संगठनों को भी करना होगा, वरना स्थितियां बदतर होती जाएंगी।

जब पत्रकारिता में मूल्यों की बात आती है, तो एक बड़ा वर्ग है जो ये कहता है कि नारद मुनि पहले पत्रकार थे और हमें उनके मूल्यों को ग्रहण करना चाहिए। मगर इसके साथ समाज का एक वर्ग ऐसा भी है, जो जब भी किसी प्रोफेशन का भारतीय दर्शन या भारतीय मूल्यों से जोड़ा जाता है, तो उसका विरोध करता है। जबकि पंडित युगुल किशोर शुक्ल ने जब भारत के पहले हिंदी समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' की शुरुआत की थी, तो उन्होंने इसके लिए लिए नारद जयंती का दिन चुना था। तो पत्रकारिता के मूल्यों को भारतीय दर्शन से जोड़ने के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

किसी भी समाज की एक चेतना होती है, जिससे स्वयं को जोड़े रखता है। आप हमारे आजादी के आंदोलन के नायकों को देखिए, वो कहां से अपने आप को जोड़ते हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को हम बहुत ही प्रोग्रेसिव व्यक्ति मानते हैं, लेकिन उनकी सबसे प्रिय नदी गंगा थी। आप महात्मा गांधी को देखिए, दीनदयाल उपाध्याय को देखिए, राम मनोहर लोहिया को देखिए, ये सभी लोग अपनी संस्कृति से जुड़े हुए थे।। लोहिया जी ने तो चित्रकूट में रामायण मेले की शुरुआत करवाई थी। उन्होंने राम और कृष्ण पर किताबें लिखी थीं। इसलिए मेरा मानना है कि अगर हम अपने इतिहास बोध से या अपने सांस्कृतिक बोध से कट जाते हैं, तो हमारे पास क्या बचेगा। हमें इसका आहृवान करना पड़ेगा कि आखिर हमारा इतिहास क्या है, हमारी परंपरा क्या है। मैथिलीशरण गुप्त ने भी लिखा है, हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगें अभी, आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी

    हिन्दुस्तान का जो सबसे बड़ा संकट है, वो हीनता का है। हम भूल गए हैं कि हम क्या थे। इसलिए हमारी ये कोशिश होनी चाहिए कि भारत का भारत से परिचय करवाएं। मेरा मानना है कि भारत को चीन बनने की आवश्यकता नहीं है। अमेरिका या ब्रिटेन जैसे देश हमारे आदर्श नहीं हैं। हम तो अपनी सॉफ्ट स्किल्स के आधार पर इस दुनिया को सुखमय बनाने के लिए जाने जाते हैं। हम ऐसा भी नहीं मानते कि हम सर्वश्रेष्ठ देश हैं। हम ये भी नहीं कहते कि सबसे महान संस्कृति हमारी है। बल्कि हम तो ये मानते हैं कि हम भी अच्छे हैं और आप भी अच्छे हो सकते हैं। हमारा अतिवादी रवैया नहीं है। हम अपने कौशल के आधार पर, अपने ज्ञान के आधार पर, अपनी विचारधारा के आधार पर आगे बढ़ना चाहते हैं।

  लेकिन अगर हमें अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा, भारत के मूल्य और मानबिंदुओं से नफरत है, तो हमें ये विचार करना होगा कि हमारी शिक्षा में कहीं कहीं कोई समस्या अवश्य है। आज हम अपने ही प्रतीकों से नफरत करते हैं, हमें अपने ही लोगों से नफरत है, हम अपने ही लोगों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। हमें अपनी ये सोच बदलने की जरुरत है। मेरा मानना है कि हमारी इस सोच का कारण हमारी शिक्षा पद्धति में जो पश्चिमी प्रभाव है, वह है। या फिर बहुत लंबे समय तक जो हम गुलाम रहे हैं, उस गुलामी के असर ने हमारे मन में हीनता के भाव को बहुत ज्यादा भर दिया है। लेकिन अब उस हीनता से हमें धीरे- धीरे मुक्ति भी मिल रही है। आप देखिए कि महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, राम मनोहर लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोग इस बात को बहुत पहले ही समझ गए थे। इसलिए हमें भी इस हीनता से बाहर आना होगा और भारत को भारत से परिचित कराना होगा। भारत जिस दिन भारत से परिचित हो जाएगा, उस दिन इसके सारे संकट समाप्त हो जाएंगे।

आज ऐसा कहा जाता है कि परंपरागत मीडिया की लड़ाई सोशल मीडिया के साथ है। लेकिन सोशल मीडिया में संवाद का स्तर काफी गिरता जा रहा है। और ये संवाद का स्तर सिर्फ उन लोगों की वजह से नहीं गिर रहा है, जो आम उपयोगकर्ता हैं, बल्कि इसका हिस्सा मीडिया और समाज के जाने-माने लोग भी हैं। तो क्या संवाद की शुचिता को बनाए रखने के लिए सोशल मीडिया पर रेगुलेशन किया जाना चाहिए? या फिर कोई और रास्ता है, जो ज्यादा बेहतर तरीके से इस स्थिति को संभाल सकता है?

देखिए हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और लोकतंत्र में रहते हुए सेंसरशिप जैसी बातों का समर्थन करना मैं ठीक नहीं समझता। लेकिन इस संबंध में दो शब्द मेरे ध्यान में आते हैं। एक शब्द है 'जर्नलिस्ट' और दूसरा शब्द है 'एक्टिविस्ट' अभी समस्या ये हो रही है कि जर्नलिस्ट के भेष में एक्टिविस्ट मीडिया में प्रवेश कर गए हैं। एक्टिविस्ट होना बुरा है, ऐसा मैं नहीं मानता। लेकिन मेरा कहना है कि अगर आप एक्टिविस्ट हैं, तो उसी भूमिका में रहिये, जर्नलिस्ट की भूमिका में मत आइये। जर्नलिस्ट बनकर आप जो भारत विरोधी विचारों या अपने निजी विचारों का समर्थन करते हैं, वो एक जर्नलिस्ट का काम नहीं है। जर्नलिस्ट और एक्टिविस्ट, दो अलग- अलग भूमिकाएं हैं। आप तय करें कि आप क्या हैं। तो अगर आप एजेंडा वाली पत्रकारिता करते हैं या अपना एजेंडा लेकर पत्रकारिता में आते हैं, तो मुझे लगता है कि आप पत्रकारिता का नुकसान करते हैं और मीडिया की विश्वसनीयता का क्षरण करते हैं। और तथ्यों को तोड़ने- मरोड़ने के आप अपराधी हैं। इसलिए आपको ऐसा करने से बचना चाहिए। 



(4 जुलाई 2020 को विश्व संवाद केंद्र, मध्य प्रदेश के यूट्यूब चैनल पर प्रकाशित)