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सोमवार, 16 दिसंबर 2024

वर्ष 2025 : मीडिया इंडस्ट्री के लिए अनंत संभावनाओं का दौर

 - प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी


वर्तमान युग में मीडिया इंडस्ट्री तीव्र गति से परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। तकनीकी प्रगति और उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव के चलते, मीडिया और मनोरंजन के पारंपरिक स्वरूप में काफी परिवर्तन हुआ है। वर्ष 2024 ने इस बदलाव को और गति दी है, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) के बढ़ते प्रभाव के कारण। वर्ष 2025 की ओर देखते हुए, यह स्पष्ट है कि एआई, डिजिटल मीडिया और नई तकनीकों का प्रभाव मीडिया इंडस्ट्री की दिशा को और अधिक प्रभावित करेगा।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के योगदान से मीडिया में क्रांति

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) ने मीडिया इंडस्ट्री में न केवल कार्यप्रणाली को सरल बनाया है, बल्कि नई संभावनाओं के द्वार भी खोले हैं। एआई के माध्यम से सामग्री निर्माण, उपभोक्ता डेटा का विश्लेषण और दर्शकों की पसंद का सटीक अनुमान लगाना अब आसान हो गया है। उदाहरणस्वरूप:

· सामग्री निर्माण और संपादन: एआई-संचालित उपकरण जैसे GPT मॉडल्स, डीपफेक टेक्नोलॉजी और इमेज जनरेशन प्लेटफॉर्म कंटेंट क्रिएटर्स के लिए समय और लागत बचाते हैं। न्यूज़ चैनल्स अब रियल-टाइम न्यूज़ अपडेट्स और अनुकूलित समाचार प्रस्तुति के लिए एआई-सक्षम वर्चुअल एंकर का उपयोग कर रहे हैं।

· डिजिटल विज्ञापन: एआई एल्गोरिदम उपभोक्ताओं की सर्च और ब्राउज़िंग आदतों का विश्लेषण करके व्यक्तिगत विज्ञापन तैयार करते हैं। इससे न केवल विज्ञापनदाता, बल्कि उपभोक्ता भी लाभान्वित होते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी पसंद का ही कंटेंट देखने को मिलता है।

· ऑडियंस इंगेजमेंट: चैटबॉट्स और वर्चुअल असिस्टेंट दर्शकों के सवालों का जवाब देकर और उनकी पसंद के कंटेंट का सुझाव देकर मीडिया कंपनियों की पहुंच और प्रभाव को बढ़ा रहे हैं।

एआई से जुड़ी चुनौतियाँ

हालांकि एआई ने मीडिया इंडस्ट्री में असंख्य अवसर प्रदान किए हैं, लेकिन यह नई चुनौतियाँ भी लेकर आया है।

· नैतिकता और पारदर्शिता: एआई आधारित फेक न्यूज़ और डीपफेक टेक्नोलॉजी की वजह से गलत सूचनाओं का प्रसार बढ़ सकता है।

· मानव संसाधन का विस्थापन: पारंपरिक कार्यबल को एआई द्वारा रिप्लेस किए जाने का खतरा बना हुआ है।

· डेटा गोपनीयता: एआई को प्रशिक्षित करने के लिए आवश्यक डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा है।

भारत और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का बाजार

भारत, विश्व में एआई के विकास और उपयोग के मामले में अग्रणी देशों में शामिल हो रहा है। वर्ष 2024 में भारत का एआई बाजार लगभग $7 बिलियन तक पहुँच चुका है। अनुमान है कि 2025 तक यह $12 बिलियन तक बढ़ जाएगा। भारतीय एआई क्षेत्र में वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 20-25% के आसपास है।

वर्ष 2024 में, भारत में एआई के क्षेत्र में लगभग 4 लाख पेशेवर काम कर रहे हैं। सरकार और निजी कंपनियाँ मिलकर एआई स्टार्टअप्स और अनुसंधान में भारी निवेश कर रही हैं। 2025 तक, एआई आधारित नौकरियों की संख्या में 30% तक वृद्धि की उम्मीद है।

भारतीय मीडिया कंपनियाँ एआई-संचालित ट्रेंड एनालिसिस, कंटेंट पर्सनलाइजेशन और विज्ञापन ऑप्टिमाइज़ेशन पर भारी ध्यान केंद्रित कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर रिलायंस जियो और टाटा जैसे बड़े कॉर्पोरेट्स मीडिया और एआई के समागम के लिए बड़े स्तर पर निवेश कर रहे हैं।

भारत में डिजिटल मीडिया का बढ़ता प्रभाव

भारत में डिजिटल मीडिया का प्रभाव पारंपरिक मीडिया की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2024 में, भारत में लगभग 700 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, जिनमें से अधिकांश स्मार्टफोन के माध्यम से डिजिटल सामग्री का उपभोग कर रहे हैं।

नेटफ्लिक्स, अमेज़ॅन प्राइम, डिज़्नी+ हॉटस्टार जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स भारत में मनोरंजन का नया केंद्र बन गए हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, और यूट्यूब पर स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री का उपभोग बढ़ रहा है। डिजिटल न्यूज़ पोर्टल्स जैसे इनशॉर्ट्स और स्क्रॉल ने पारंपरिक न्यूज़ चैनल्स की जगह लेनी शुरू कर दी है।

वर्ष 2024 में, भारत में डिजिटल विज्ञापन का आकार लगभग $4.5 बिलियन था। 2025 तक, यह $6.8 बिलियन तक पहुँचने की संभावना है। डिजिटल मीडिया में पर्सनलाइज्ड विज्ञापन और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग एक नया ट्रेंड बन चुका है। भारत में 70% इंटरनेट उपयोगकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। सरकार की डिजिटल इंडिया पहल और सस्ती डेटा सेवाओं के कारण ग्रामीण भारत में डिजिटल कंटेंट का उपभोग तेजी से बढ़ रहा है।

2025 की उम्मीदें: मीडिया इंडस्ट्री का भविष्य

·  तकनीकी प्रगति का तेज़ी से उपयोग: वर्ष 2025 में एआई और मशीन लर्निंग के उपयोग से मीडिया इंडस्ट्री में और अधिक नवाचार की उम्मीद है। दर्शक लाइव पोल्स, क्विज़ और अन्य इंटरैक्टिव माध्यमों के ज़रिए कंटेंट के साथ जुड़ेंगे। वर्चुअल रियलिटी और ऑग्मेंटेड रियलिटी  आधारित कंटेंट मीडिया इंडस्ट्री का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगा।

· स्थानीय और क्षेत्रीय कंटेंट का विस्तार: स्थानीय भाषाओं में कंटेंट की माँग बढ़ेगी, जिससे क्षेत्रीय मीडिया कंपनियों को नए अवसर मिलेंगे। 2025 तक, 60% से अधिक डिजिटल कंटेंट स्थानीय भाषाओं में होगा।

· नियामक और नैतिकता पर ज़ोर: एआई और डिजिटल मीडिया के बढ़ते उपयोग को ध्यान में रखते हुए सरकार डेटा सुरक्षा और फेक न्यूज़ की रोकथाम के लिए सख्त नियम लागू कर सकती है। "मीडिया ट्रांसपेरेंसी" के लिए नए मानक स्थापित होंगे।

· उपभोक्ता-केंद्रित दृष्टिकोण: मीडिया इंडस्ट्री उपभोक्ताओं के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए व्यक्तिगत और अनुकूलित सेवाओं पर ध्यान केंद्रित करेगी। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर फ्री-टू-व्यू और पे-पर-व्यू जैसे मॉडल और प्रचलित होंगे।

कुल मिलाकर वर्ष 2024 का वर्ष भारतीय मीडिया इंडस्ट्री के लिए नवाचार और चुनौतियों का संगम रहा है। एआई और डिजिटल मीडिया ने पारंपरिक मीडिया के स्वरूप को बदलते हुए उपभोक्ताओं की नई पीढ़ी की जरूरतों को पूरा किया है। वर्ष 2025 में, तकनीकी प्रगति और क्षेत्रीय कंटेंट के विस्तार के साथ, भारतीय मीडिया इंडस्ट्री विश्व स्तर पर अपनी पहचान और मजबूत करेगी। हालांकि, नैतिकता, डेटा सुरक्षा, और फेक न्यूज़ जैसे मुद्दों से निपटना महत्वपूर्ण होगा। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले वर्ष मीडिया इंडस्ट्री के लिए अनंत संभावनाओं का दौर होगा।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

                        'एक एशिया' के विचार को साकार करना हम सबकी जिम्‍मेदारी : प्रो. द्विवेदी

'सार्क जर्नलिस्‍ट फोरमके प्रतिनिधिमंडल ने किया आईआईएमसी का दौरा



नई दिल्‍ली12 जनवरी। सार्क देशों के पत्रकार संगठन सार्क जर्नलिस्‍ट फोरम (एसजेएफ) के प्रति‍निधिमंडल ने गुरुवार को भारतीय जन संचार संस्‍थान का दौरा किया। आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी ने नेपालभूटानश्रीलंका और बांग्‍लादेश से आए तीस से अधिक प्रति‍निधियों का अंगवस्‍त्र और स्‍मृति चिन्‍ह देकर अभिनंदन किया। इस अवसर पर संस्थान के डीन (अकादमिक) प्रो. गोविंद सिंहडीन छात्र (कल्याण) प्रो. प्रमोद कुमारडॉ. मीता उज्‍जैनडॉ. पवन कौंडल, डॉ. प्रतिभा शर्मा एवं सहायक कुलसचिव ऋतेश पाठक भी उपस्थित रहे।

आईआईएमसी के महानिदेशक ने स्‍वामी विवेकानंद की जयंती पर उनका स्‍मरण करते हुए कहा कि वे पहले ऐसे विचारक थेजिन्‍होंने एक एशिया की अवधारणा प्रस्‍तुत की। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि जब एक एशिया’ बनेगातभी इस क्षेत्र की शांतिअखंडताविकास और समृद्धि को बढ़ावा मिलेगा। उन्‍होंने कहा कि हम सबका एक ही इतिहास है और आज भी हम सब एक जैसी संस्‍कृतिखानपानरहन-सहन साझा करते हैं। यही हमारी ताकत है। सांस्‍कृतिक रूप से एक होकर ही हम पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति के अतिक्रमण को रोक सकते हैं।

प्रो. द्विवेदी के अनुसार स्‍वामी विवेकानंद ने एक सदी  पहले ही पश्चिमी देशों को कह दिया था कि 20वीं सदी आपकी होगीलेकिन 21वीं सदी भारत की होगी। अब 21वीं सदी में हैं और उनकी बातें सच होती नजर आ रही हैं। उन्होंने 'सार्क जर्नलिस्‍ट फोरमका आह्वान करते हुए कहा कि पत्रकार होने के नाते 'एक एशियाके विचार को साकार करना हम सबकी जिम्‍मेदारी है।

इस अवसर पर एसजेएफ के अध्‍यक्ष राजू लामा ने कहा कि आईआईएमसी में आकर वे बेहद गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि मुझे भारत के बहुत सारे राजनेताओं और स्‍वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानकारी थीलेकिन यह पहली बार हैजब उन्‍हें भारत के पहले हिंदी समाचार पत्र उदंत मार्तंड’ के संस्‍थापक संपादक पंडित युगल किशोर शुक्‍ल के योगदान के बारे में पता चला। लामा ने कहा कि एसजेएफशुक्‍ल जी के पत्रकारिता में अविस्‍मरणीय योगदान के लिए उन्‍हें अपनी आदरांजलि अर्पित करता है।

अपनी यात्रा के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने आईआईएमसी के विभिन्‍न विभागोंपुस्तकालय और संस्थान द्वारा संचालित सामुदायिक रेडियो 'अपना रेडियो 96.9 एफएमका भी दौरा किया।



शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

स्किल डेवलपमेंट से होगा आत्मनिर्भर भारत का निर्माण : प्रो. संजय द्विवेदी

आईआईएमसी के महानिदेशक ने दिया समाधानमूलक पत्रकारिता पर जोर

जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर में व्याख्यानमाला का आयोजन



जोधपुर, 13 दिसंबर। "स्किल डेवलपमेंट से समाज आत्मनिर्भर बनता है। भारत की कौशल के क्षेत्र में गौरवमयी परंपरा रही है। यहां के लोगों ने अपनी संस्कृति एवं हुनर से विश्व को चमत्कृत किया है।" यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी ने जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला को संबोधित  करते हुए व्यक्त किए। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के. एल. श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार श्री पदम मेहता एवं पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. एस. के. मीना सहित समस्त संकाय सदस्य, शोधार्थी और विद्यार्थी भी उपस्थित रहे।

    'मीडिया के सामाजिक और राजनीतिक सरोकार' विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए प्रो. द्विवेदी ने कहा कि किसी भी सभ्य समाज के निर्माण के लिए अच्छे सामाजिक मूल्यों की स्थापना जरूरी है। एक अच्छा मनुष्य ही अच्छा पत्रकार बन सकता है। उन्होंने कहा कि मीडिया के माध्यम से अधिकार बोध के साथ कर्तव्य बोध को भी जागृत करने की आवश्यकता है। वर्तमान युग में समस्या के बजाय समाधानमूलक पत्रकारिता की आवश्यकता है। मीडिया का सामाजिक सरोकार इसी प्रकार के संवाद को बल देने का है।

   आईआईएमसी के महानिदेशक के अनुसार आधुनिक शिक्षा में नैतिक शिक्षा, पर्यावरण जागरूकता एवं कौशल विकास पर जोर दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पहले मनुष्य ने प्रकृति के साथ समझौता किया। उसका वहां के जंगल, नदियों, पर्वतों से रिश्ता था। आज उसी पर्यावरण प्रेम की आवश्यकता है।

मीडिया साक्षरता की आवश्यकता : प्रो. द्विवेदी

 अपने जोधपुर प्रवास के दौरान प्रो. संजय द्विवेदी ने समाचार पत्र 'दैनिक जलते दीप' के संस्थापक संपादक स्व. माणक मेहता की 48वीं पुण्यतिथि पर आयोजित संगोष्ठी को भी संबोधित किया। 'डिजिटल समय में प्रिंट मीडिया' विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो. द्विवेदी ने कहा कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इसे रोका नहीं जा सकता, ऐसे में परिवर्तन के साथ ही चलना होगा। उन्होंने कहा कि आज विश्व की 51 प्रतिशत से अधिक की आबादी सोशल मीडिया पर है, ऐसे में आमजन तक मीडिया की आसान पहुंच हो गई है। मीडिया को एक छत के नीचे लाने का कार्य डिजिटल मीडिया ने किया है, जहां खबरे पढ़ने के अलावा देखी और सुनी जा सकती हैं। 

 भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक ने कहा कि मीडिया खत्म नहीं हो रहा है, बल्कि उसका स्वरूप बदल रहा है। उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया के उपयोग से अलग तरह के सामाजिक संकट भी पैदा हो रहे हैं। ऐसे में मीडिया साक्षरता की आवश्यकता है। गांधीजी के 'बुरा ना देखें, बुरा ना सुने और बुरा ना बोलें' की तर्ज पर उन्होंने कहा कि अब 'बुरा ना शेयर करें, बुरा ना टाइप करें और बुरा ना लाइक करें'। 

  संगोष्ठी की अध्यक्षता राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति जस्टिस एनएन माथुर ने की। इस अवसर पर जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के कुलपति प्रो. के. एल. श्रीवास्तव, सूरसागर विधायक श्रीमती सूर्यकांता व्यास, वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. कल्याण सिंह शेखावत, वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र बोडा एवं 'दैनिक जलते दीप' के समाचार संपादक गुरूदत्त अवस्थी भी मौजूद रहे।

बुधवार, 20 जुलाई 2022

पत्रकारिता से साहित्य में चली आई ‘न हन्यते’

                                                                              - इंदिरा दांगी



आचार्य संजय द्विवेदी की नई किताब 'न हन्यते' को खोलने से पहले मन पर एक छाप थी कि पत्रकारिता के आचार्य की पुस्तक है और दिवंगत प्रख्यातों के नाम लिखे स्मृति-लेख हैं, जैसे समाचार पत्रों में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ करते ही हैं; लेकिन पुस्तक का पहला ही शब्द-चित्र मेरी इस धारणा को तोड़ता है। ‘सत्ता साकेत का वीतरागी’ में वे पूर्व प्रधानमंत्री और भारत के महान नेता अटल बिहारी वाजपेयी को देश के बड़े बेटे के तौर पर याद करते हैं; राजनीति से ऊपर जिसके लिये देश था। इसीलिये उनके देहवसान पर पूरा देश रोया और ये संस्मरण फिर उनकी स्मृति से हमें नम कर जाता है।

  ‘उन्हें भूलना है मुश्किल’ वैचारिकता के शिल्प-स्तर पर एक नये प्रयोग का संस्मरण था, जबकि लेखक ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम प्रवक्ता श्री माधव गोविंद वैध के जीवन की अनगिनत उपलब्धियों के बजाय उनको घर के ऐसे बड़े-बुज़ुर्ग के तौर पर याद किया है, जिनका जीवन आगे आने वाली पीढ़ियों के लिये रोशनी का एक स्तंभ रहेगा। ‘बौद्धिक तेज से दमकता व्यक्तित्व’ संस्मरण-रेखाचित्र अनिल माधव दवे को पाठक के ज़हन में राजनेता और प्रचारक के अलावा धरती के हितैषी की छवि और छाप भी देता है। जब लेखक उनकी वसीयत बयान करते हैं कि “...मेरी स्मृति में कोई स्मारक, पुरस्कार, प्रतिमा स्थापन न हो। मेरी स्मृति में यदि कोई कुछ करना चाहते हैं तो वृक्ष लगाएं।” जिस राजनेता का सर्वस्व जल, जंगल, जमीन के नाम रहा हो और जिसके कार्यालय का नाम ही ‘नदी का घर’ हो, उसकी वसीयत वृक्षों के सिवाय और क्या होती। 

   ‘उन्होने सिखाया ज़िंदगी का पाठ’ में लेखक ने अपने पत्रकारिता-गुरु प्रोफेसर कमल दीक्षित को याद किया है; ऐसे ही गुरुजनों के परिश्रम, अनुशासन और मेधा ने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलवाई। ‘रचना, सृजन और संघर्ष से बनी शख्सियत’ में शिव अनुराग पटैरया को याद करते हुए संजय जी शब्द-रेखाओं से कैसा अविस्मरणीय चित्र खींचते हैं, “वे ही थे जो खिलखिलाकर मुक्त हंसी हंस सकते थे, खुद पर भी, दूसरों पर भी।” ऐसे पात्र दुर्लभ हैं आज–समय में भी, साहित्य में भी। ‘सरोकारों के लिये जूझने वाली योद्धा’ संस्मरण पाठक को एक ऐसी शिक्षिका दविंदर कौर उप्पल से मिलवाता है, जो सख्त, अनुशासन प्रिय, नर्म और ममतामयी थीं। लेखक ने अपनी शिक्षिका के समग्र व्यक्तित्व को अपनी एक पंक्ति से जैसे अमिट बना दिया है, “पूरी जिंदगी में उन्होंने किसी की मदद नहीं ली।”

     ‘बहुत कठिन है उन–सा होना’ शिल्प के स्तर पर पुस्तक का सबसे लाजवाब संस्मरण है, जिसमें लेखक ने छतीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी को याद करते हुए लिखा है, “वे दरअसल पढ़ने-लिखने वाले इंसान थे। बहुपठित और बहुविग्य। किंतु वे ‘शक्ति’ चाहते थे, जो साहित्य और संस्कृति की दुनिया उन्हें नहीं दे सकती थी। इसलिये शक्ति जिन-जिन रास्तों से आती थी, वह उन सब पर चले। वे आईपीएस बने, आईएएस बने, राजनीति में गये और सीएम बने।...वे कलेक्टर थे तो जननेता की तरह व्यवहार करते थे, जब मुख्यमंत्री बने तो कलेक्टर सरीखे दिखे।” व्यक्तित्वों का ऐसा मूल्यांकन सिर्फ साहित्य में ही संभव है।

     संजय जी की लेखनी की एक विशिष्टता है कि वे अपनी रचना में ऐसा वातावरण, ऐसी भाषा रचते हैं कि किसी अपरिचित पात्र के वर्णन में भी पाठक को आत्मीय की स्मृति-सा आस्वादन मिलता है। ‘ध्येयनिष्ठ संपादक और प्रतिबद्ध पत्रकार’ संस्मरण में अपने पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति राधेश्याम शर्मा को वे किस तरह याद करते हैं देखिये, “वे आते तो सबसे मिलते और परिवारों में जाते। अपने साथियों और अधीनस्थों के परिजनों, बच्चों की स्थिति, प्रगति, पढ़ाई और विवाह सब पर उनकी नजर रहती थी।”

     श्यामलाल चतुर्वेदी पर लिखा संस्मरण ‘समृद्ध लोकजीवन के स्वप्नद्रष्टा’ जहां आपको छत्तीसगढ़ के लोकसेवक पत्रकार से मिलवायेगा, तो ‘पत्रकरिता के आर्चाय’ रेखाचित्र में आप एक पुरोधा डॉ. नंदकिशोर त्रिखा से मिलेंगे, जिन्होंने मूल्यों के आधार पर पत्रकारिता की। ‘भारतबोध के अप्रतिम व्याख्याता’ एक मार्मिक रेखाचित्र बन पड़ा है, जिसमें मुज़फ्फर हुसैन से हम मिलते हैं, जिन्होंने सिर्फ लेखन के बूते न सिर्फ जीवन जिया, सत्ता के गलियारों से लेकर आम सभाओं तक में सम्मान पाया, अपने समुदाय की चिंता की और कट्टरपंथियों से कभी नहीं डरे। ‘संवेदना से बुनी राजनीति का चेहरा’ में जे. जयललिता की अपार लोकप्रियता और जनसेवक की छवि का पता और पड़ताल है तो ‘छत्तीसगढ़ का गांधी’ में संत पवन दीवान का भोला संत-व्यक्तित्व। ‘एक ज़िंदादिल और बेबाक इंसान’ में लेखक ने अपने पुराने युवा संवाददाता साथी देवेंद्र कर को याद किया है, वहीं ‘स्वाभिमानी जीवन की पाठशाला’ संस्मरण में बसंत कुमार तिवारी के जुझारू व्यक्तित्व और किरदार को शब्द दिये हैं। 

    ‘माओवादियों के विरुद्ध सबसे प्रखर आवाज़’ महेंद्र कर्मा जैसे जनसेवक, जननायक से हमें रूबरू करता शब्द-चित्र है। ‘माटी की महक’ प्रख्यात राजनेता नंदकुमार पटेल और उनके पुत्र दिनेश पटेल के साथ अपने निजी समय और सम्पर्क को याद करते हुए संजय जी नक्सली हिंसा में शहीद अपने इन प्रिय व्यक्तित्वों के बहाने पाठकों से झकझोर देने वाले सवाल करते हैं कि इनका कुसूर क्या था? ‘ध्येयनिष्ठ जीवन’ शब्द-चित्र में लखीराम अग्रवाल को ऐसे मार्मिक ढंग और शैली में याद किया है कि जो इस राजनेता को जानते भी नहीं रहे होंगे, वे भी अब उन्हें सम्मान से याद करेंगे। बलिराम कश्यप पर लिखा शब्द-चित्र ‘जनजातियों की सबसे प्रखर आवाज’ का कथ्य तो पाठक को हिला कर रख देता है। जब हम एक ऐसे राजनेता को जानते हैं जिसके पुत्र को माओवादियों ने मार डाला, फिर भी जो बस्तर के दूर-दराज इलाकों में जाकर जन-जन से मिलता रहा, क्योंकि वंचित आदिवासी ही उनकी संतान थी।

    ‘न तो थके और न ही हारे’ में एक ईमानदार पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री को लेखक ने याद किया है। पुस्तक का अंतिम संस्मरण कानू सान्याल पर ‘विकल्प के अभाव की पीड़ा’ है। नक्सलवाद को हम उसके रक्तरंजित परिचय से याद करते हैं, लेकिन लेखक नक्सलबाड़ी आंदोलन के इस नायक को कानू दा कहते हुए जिन शब्दों में याद करते हैं, वे शब्द न सिर्फ इस अभिशप्त नायक को सम्मान देते हैं; बल्कि लेखक को पत्रकारिता से परे साहित्य की दुनिया का हिस्सा बना जाते हैं। लेखक के ही शब्दों में इस (अ)नायक को नमन, “वे भटके हुए आंदोलन का आख़िरी प्रतीक थे, किंतु उनके मन और कर्म में विकल्पों को लेकर लगातार एक कोशिश जारी रही।”

पुस्तक : न हन्यते

लेखक : प्रो. संजय द्विवेदी

मूल्य : 250 रुपये

प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, 4754/23, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली-110002

(लेखिका देश की प्रख्यात कहानीकार एवं उपन्यासकार हैं। इन दिनों भोपाल में रहती हैं।)

'पॉजिटिव' होने के लिए 'पॉजिटिव लाइफ' जीना जरूरी: प्रो. द्विवेदी

'मेंटल हेल्थ ऑफ यंग मीडिया प्रोफेशनल्स' विषय पर नागपुर में सेमिनार का आयोजन

आईआईएमसी, अमरावती एवं यूनीसेफ के संयुक्त तत्वावधान में हुआ कार्यक्रम का आयोजन



नागपुर, 18 जुलाई। ''पत्रकारों को जीवन और जीविका के बीच संतुलन बनाए रखने की जरुरत है। सकारात्मक होने के लिए सकारात्मक जीवन जीना आवश्यक है। मीडियाकर्मियों को लोकमंगल के साथ-साथ आत्ममंगल पर भी विचार करना चाहिए। ध्यान, प्राणायाम और नेचुरोपैथी को अपना कर पत्रकार मानसिक तनाव को दूर कर सकते हैं और अपने पत्रकारिता कर्म को श्रेष्ठ बना सकते हैं।'' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी ने 'मेंटल हेल्थ ऑफ यंग मीडिया प्रोफेशनल्स' विषय पर आईआईएमसी, अमरावती एवं यूनीसेफ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। 

    नागपुर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता दैनिक भास्कर, नागपुर के समूह संपादक प्रकाश दूबे ने की। आयोजन में वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. कृपाशंकर चौबे विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।

    कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि यदि मन स्वस्थ रहेगा, तो विचार भी स्वस्थ रहेंगे। मन और शरीर पर ध्यान देने की जरुरत है, लेकिन स्वास्थ्य की अतिरिक्त चिंता भी तनाव का बड़ा कारण है। अपने कार्य को बड़ा मानने से अहंकार पैदा होता है, जो तनाव का प्रमुख कारक है। पत्रकार अगर पत्रकारिता को सेवा मानकर काम करेंगे, तो तनाव दूर रहेगा। 

     सेमिनार के प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए दैनिक भास्कर, नागपुर के समूह संपादक प्रकाश दूबे ने कहा कि जीवन में गिरावट तनाव का प्रमुख कारण है। पत्रकारों को हताशा से बचना चाहिए। मीडियाकर्मियों को भाषाओं को सीखने की जरुरत है, भाषा न जानने से हताशा होती है। उन्होंने पत्रकारों एवं उनके परिवार के सदस्यों की शारीरिक एवं मानसिक जांच कराने की पुरजोर मांग की। 

   इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय ने कहा कि दुनिया चलाने की सोच से पत्रकारों में तनाव पैदा होता है। अन्य व्यवसायों की तुलना में पत्रकारिता में तनाव, अनिद्रा और हताशा ज्यादा है। अगर पत्रकार जीवन और जीविका में अंतर करना सीखेंगे, तो यह तनाव कम हो सकता है।

     महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. कृपाशंकर चौबे ने कहा कि पत्रकारों को कई काम एक साथ करने होते हैं, इसलिए वे तनावग्रस्त ज्यादा होते हैं। तनाव से रचनात्मकता कम होती है। इससे मुक्ति के लिए पत्रकारों को आवश्यक कदम उठाने चाहिए।

    सेमिनार के द्वितीय सत्र की अध्यक्षता आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने की। इस सत्र में प्रख्यात मनोचिकित्सक एवं साइकिएट्रिक सोसायटी, नागपुर के अध्यक्ष डॉ. सागर चिद्दलवार ने मानसिक स्वास्थ्य के महत्व एवं आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की। पत्र सूचना कार्यालय के शशिन राय, 'तरुण भारत' के डिजिटल हेड शैलेश पांडे और 'द हितवाद' के चीफ रिपोर्टर कार्तिक लोखंडे ने भी द्वितीय सत्र में अपने विचार व्यक्त किए।

     सेमिनार में विषय प्रवर्तन आईआईएमसी के डीन (छात्र कल्याण) प्रो. (डॉ.) प्रमोद कुमार ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन भारतीय जन संचार संस्थान, पश्चिमी क्षेत्रीय केंद्र, अमरावती के क्षेत्रीय निदेशक प्रो. (डॉ.) वी.के. भारती ने दिया। कार्यक्रम में एनबीबीएस एलयूपी (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के निदेशक डॉ. बी.एस. द्विवेदी, यूनीसेफ की संचार विशेषज्ञ स्वाति महापात्र, मीडियाकर्मियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों की भी उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

कैलेंडर के साथ जिंदगी भी बदल जाए तो बेहतर

                                                                -प्रो. संजय द्विवेदी

 

    यह साल जा रहा है, बहुत सी कड़वी यादें देकर। कोरोना और उससे उपजे संकटों से बने बिंब और प्रतिबिंब आज भी आंखों में तैर रहे हैं और डरा रहे हैं। यह पहला साल है, जिसने न जाने कितने जानने वालों की मौत की सूचनाएं दी हैं। पहले भी बीमारियां आईं, आपदाएं आईं किंतु उनका एक वृत्त है, भूगोल है, उनसे प्रभावित कुछ क्षेत्र रहे हैं। यह कोरोना संकट तो अजब है, जहां कभी भी और कोई भी मौत की तरह दर्ज हो रहा है। इस बीमारी की मार चौतरफा है रोजी पर, रोजगार पर, तनख्वाह पर, शिक्षा पर, समाज पर और कहां नहीं। डरे हुए लोग रोज उसके नए रूपों की सूचनाओं से हैरत में हैं। बचा-खुचा काम वाट्सएप और अन्य सामाजिक माध्यमों पर ज्ञान और सूचनाएं उड़ेलते लोग कर रहे हैं। यह कितना खतरनाक है कि हम चाहकर भी कुछ कर नहीं पा रहे। अपनी अस्त-व्यस्त होती जिंदगी और उसे तिल-तिल खत्म होता देखने के सिवा। ऐसे में नए साल का इंतजार भी है और भरोसा भी है कि शायद चीजें बदल जाएं। कैलेंडर का बदलना, जिंदगी का बदलना हो जाए। नया साल उम्मीदों का भी है, सपनों का भी। उन चीजों का भी जो पिछले साल खो गयीं या हमसे छीन ली गयीं।

      मनुष्य की जिजीविषा ही उसकी शक्ति है, इसलिए खराब हालात के बाद भी, टूटे मन के बाद भी लगता है कि सब कुछ ठीक होगा और एक सुंदर दुनिया बनेगी । 2021 का साल इस मायने में बहुत सारी उम्मीदों का साल है, टूटे सपनों को पूरा करने के लिए फिर से जुटने का साल है। 2020 की बहुत सारी छवियां हैं, करोना से टूटते लोग हैं, महानगरों से गांवों को लौटते लोग हैं, बीमारी से मौत की ओर बढ़ते लोग हैं, नौकरियां खोते और गहरी असुरक्षा में जीते हुए लोग हैं। मनुष्य इन्हीं आपदाओं से जूझकर आगे बढ़ता है और पाता है पूरा आकाश। इसीलिए श्री अटल बिहारी वाजपेयी लिख पाए-

जड़ता का नाम जीवन नहीं है,

पलायन पुरोगमन नहीं है।

आदमी को चाहिए कि वह जूझे

परिस्थितियों से लड़े,

एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े।

    हमें अपने सपनों को सच करना है, हर हाल में। आपदा को अवसर में बदलते हुए आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते हुए। इस जाते हुए साल ने हमें दर्द दिए हैं, आंसू दिए हैं पर वह हमें तोड़ नहीं पाया है। न हमारी जिजाविषा को, न हमारे मन को, न ही जीवन की गति को। नए अवसरों और नए रास्तों की तलाश में यह सारा वर्ष गुजरा है। हमारा समय, संवाद और शिक्षा सब कुछ डिजिटल होती दिखी। अब कक्षाओं का डिजिटल होना भी एक सच्चाई है। संवाद, वार्तालाप, कार्यशालाओं, संगोष्ठियों को डिजीटल माध्यमों पर करना संभव हुआ है। इसे ज्यादा सरोकारी, ज्यादा प्रभावशाली बनाने की विधियां निरंतर खोजी जा रही हैं। इस दिशा में सफलता भी मिल रही है। गूगल मीट, जूम, जियो मीट, स्काइप जैसे मंच आज की डिजिटल बैठकों के सभागार हैं। जहां निरंतर सभाएं हो रही हैं, विमर्श निरंतर है और संवाद 24X7  है। कहते हैं डिजिटल मीडिया का सूरज कभी नहीं डूबता। वह सदैव है, सक्रिय है और चैतन्य भी। हमारे विचार, व्यवहार और आदतों में भी बदलाव साफ दिख रहा है। हम बदल रहे हैं, देश बदल रहा है। अब वह पुराने साल को बिसार कर नए साल में नई आदतों के साथ प्रवेश कर रहा है। ये आदतें सामाजिक व्यवहार की भी हैं और निजी जीवन की भी। यह व्यवहार और आदतों को भी बदलने वाला साल है। स्वास्थ्य, सुरक्षा और डिजिटल दुनिया की त्रिआयामी कड़ी ने इस जाते हुए साल को खास बनाया है। 2020 ने हमें प्रकृति के साथ रहना सिखाया, पर्यावरण के प्रति ममत्व पैदा किया तो हाथ जोड़कर नमस्कार को विश्व पटल पर स्थापित कर दिया। साफ-सफाई के प्रति हमें चैतन्य किया। इसका असर भी दिखा साफ आसमान, साफ नदियां, खिला-खिला सा पूरा वातावरण,चहचहाते पक्षी कुछ कह रहे थे। दर्द देकर भी इसने बहुत कुछ सिखाया है, समझाया है। हमें कीमत समझायी है- अपनी जमीन की, माटी की, गांव की और रिश्तों की। परिवार की वापसी हुई है। जिसे हमारे विद्वान वक्ता श्री मुकुल कानिटकर घरवास की संज्ञा दे रहे हैं। लाकडाउन में जीवन के नए अनुभवों ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। नई पदावली से हम परिचित हुए हैं। एक नए जीवन ने हमारी जीवनशैली में प्रवेश किया है।

     हम कोरोना से सीखकर एक नई जिंदगी जी रहे हैं। बीता हुआ समय हमें अनेक तरह से याद आता है। हम सब स्मृतियों के संसार में ही रहते हैं। बीते साल की ये यादें हमें बताएंगी कि हमने किस तरह इस संकट से जूझकर इससे निजात पाई थी। किस तरह हमारे कोरोना योद्धाओं ने हमें इस महासंकट से जूझना और बचना सिखाया। अपनी जान पर खेलकर हमें जिंदगी दी। वे चिकित्सा सेवाओं के लोग हों, पुलिसकर्मी हों, पत्रकार हों या विविध सेवाओं से जुड़े लोग सब अग्रिम मोर्चे पर तैनात थे। बहुत सारे सामाजिक संगठनों और निजी तौर पर लोगों ने राहत पहुंचाने के भी अनथक प्रयास किए, इसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। किस तरह हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक राष्ट्रनायक की तरह देश को जोड़कर इस संकट में साथ रहना और संकटों से जूझने की शक्ति दी। कल्पना कीजिए उन जैसा नायक न होता तो हमारा क्या होता? उनके प्रेरित करने वाले वक्तव्यों ने, संवादों ने हमें संबल दिया और घने अँधेरे और कठिन समय में भी हम संबल बनाकर रख सके। संवाद और संचार कैसे टूटे मनों को जोड़ने का काम करता है और एक आदर्श संचारक इस शक्ति का कैसे उपयोग करता है, हमारे प्रधानमंत्री इसके उदाहरण हैं। इस साल ने हमें मनुष्य बने रहने का संदेश दिया है। अहंकार और अकड़ को छोड़कर विनीत बनने की सीख हमें मिली है। क्योंकि प्रकृति की मार के आगे किसी की नहीं चलती और बड़े-बड़े सीधे हो जाते हैं। प्रकृति से संवाद और प्रेम का रिश्ता हमें बनाना होगा, तभी यह दुनिया रहने लायक बचेगी। महात्मा गांधी ने कहा था पृथ्वी हर मनुष्य की जरूरत को पूरा कर सकती है, परंतु पृथ्वी मनुष्य के लालच को पूरा नहीं कर सकती है।   

     नए साल-2021 की पहली सुबह का स्वागत करते हुए हम एक अलग भाव से भरे हुए हैं। इस साल ने तमाम बुरी खबरों के बीच उजास जगाने वाली खबरें भी दी हैं, अयोध्या में राममंदिर की नींव का रखा जाना, नए संसद भवन का शिलान्यास, नई राष्ट्रीय शिक्षा का आना, राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी की परिकल्पना, सेना में महिलाओं को स्थाई कमीशन के साथ बोडो ग्रुप और सरकार के बीच समझौता साधारण खबरें नहीं हैं। इसके साथ ही हमारी राजनीति, संस्कृति और साहित्य की दुनिया के अनेक नायक हमें इस साल छोड़कर चले गए उसका दुख भी विरल है। जिनमें पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, राजनेता रामविलास पासवान, जसवंत सिंह, अहमद पटेल, अजीत जोगी, रघुवंश प्रसाद सिंह, अमर सिंह, अजीज जोगी, लालजी टंडन, तरूण गोगोई पूर्व क्रिकेटर और उप्र सरकार के मंत्री चेतन चौहान, एमडीएच मसाले के महाशय धर्मपाल गुलाटी, पत्रकार अश्विनी कुमार चोपड़ा, ललित सुरजन, राजीव कटारा, मंगलेश डबराल, वरिष्ठ पत्रकार और समाज चिंतक मा.गो.वैद्य, रंगकर्मी ऊषा गांगुली, उपन्यासकार कृष्ण बलदेव वैद्य, गिरिराज किशोर, राहत इंदौरी, विष्णुचंद्र शर्मा, अहद प्रकाश जैसे अनेक नाम हैं, जिनकी याद हमें लंबे समय तक आती रहेगी। इन विभूतियां न होना एक ऐसा शून्य रच रहा है जिसे भर पाना कठिन है। 

   बावजूद इसके उम्मीद है कि नववर्ष सारे संकटों से निकाल कर नया उजाला हमारी जिंदगी में लाएगा। उस रौशनी से हिंदुस्तान फिर से जगमगा उठेगा। एक नया भारत बनने की ओर है,यह आकांक्षावान भारत है, उत्साह से भरा, उमंगों से भरा, नए सपनों से उत्साहित और नयी चाल में ढलने को तैयार। निराला जी की इन पंक्तियों की तरह-

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव

नवल कंठ, नव जलद-मन्द्र रव;

नव नभ के नव विहग-वृंद को

नव पर, नव स्वर दे!



शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

‘कोरोना वारियर्स’ की मेरी लिस्ट में पत्रकारों का स्थान बेहद खास : डॉ. हर्षवर्धन

 


आईआईएमसी के सत्रारंभ समारोह के समापन अवसर पर बोले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री

नई दिल्ली, 27 नवंबर ''कोरोना महामारी की रोकथाम में पत्रकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कोरोना वारियर्स की मेरी लिस्ट में पत्रकारों का स्थान बेहद खास है। मैं उनके जज्बे, जुनून और साहस को सलाम करता हूं।'' यह विचार केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने शुक्रवार को भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के सत्रारंभ समारोह-2020 के अंतिम दिन व्यक्त किये। इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, अपर महानिदेशक श्री के. सतीश नम्बूदिरिपाड सहित आईआईएमसी के सभी केंद्रों के संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।

'कोरोना महामारी में स्वास्थ्य पत्रकारिता' विषय पर बोलते हुए डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि कोरोना के दौर में भी पत्रकारों ने लोगों के लिए ग्राउंड जीरोसे लगातार रिपोर्टिंग की है। इस दौरान हमने  अपने कई पत्रकारों को भी खोया है। उन्होंने कहा कि पिछले तीन दशकों में मैंने पत्रकारों से बहुत कुछ सीखा है। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए संकट के समय पत्रकार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

श्री हर्षवर्धन ने कहा कि मैं भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी से आग्रह करता हूं कि वे स्वास्थ्य पत्रकारिता पर एक कोर्स शुरू करें, जिससे स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर कम्युनिकेटर तैयार किये जा सकें। इसके अलावा मैं चाहता हूं कि आईआईएमसी विज्ञान के क्षेत्र में भी अच्छे पत्रकार एवं कम्युनिकेटर तैयार करने पर ध्यान दें। 

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि भारत सरकार चाहती है कि वर्ष 2022 तक सभी बच्चों को अच्छी सेहत और अच्छा खानपान मिले। और इस अभियान में पत्रकारों का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने कहा कि एक वक्त में हमने भारत को पोलियो मुक्त बनाने का सपना देखा था और इस सपने को साकार करने में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मैं चाहता हूं कि इस महामारी के समय में भी पत्रकार नकारात्मक माहौल को सकारात्मक माहौल में बदलने में मदद करें।

डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि अगर आपने लॉकडाउन में अपने घरों में रहकर समय बिताया है, कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने और फैलने के लिए शारीरिक दूरी का पालन किया है, साफ-सफाई पर ध्यान दिया है और हमेशा अपने चेहरे को ढककर रखा है या मास्क पहना है, तो आपने भी कोरोना वायरस संक्रमण को फैलने से रोकने में अहम भूमिका निभाई है। 

इससे पहले कार्यक्रम के प्रथम सत्र में 'मीडिया ट्रायल : अच्छा या बुरा?' विषय पर बोलते हुए दूरदर्शन के महानिदेशक श्री मयंक अग्रवाल ने कहा कि मीडिया ट्रायल इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी पत्रकारिता की दिशा क्या है और आप कैसी पत्रकारिता करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि अगर पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धांतों के साथ मीडिया ट्रायल होता है, तो ये अच्छा है।

नेटवर्क 18 के मैनेजिंग एडिटर श्री ब्रजेश सिंह ने कहाकि नानावटी केस भारत में मीडिया ट्रायल का सबसे पहला उदाहरण है। मीडिया ट्रायल सिर्फ सनसनी या टीआरपी के लिए नहीं होता, बल्कि कई बार मीडिया ट्रायल केस को एक नई दिशा भी देता है। एसोसिएटेड प्रेस टीवी की साउथ एशिया हेड सुश्री विनीता दीपक ने कहा कि मीडिया ट्रायल के नाम पर मीडिया को कटघरे में खड़ा करना ठीक नहीं हैं। मीडिया अपना काम बखूबी जानता है और कर भी रहा है।

समारोह के समापन सत्र में आईआईएमसी के पूर्व छात्रों ने नए विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया।  पूर्व विद्यार्थियों के इस सत्र में आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर श्री सुप्रिय प्रसाद, न्यूज़ नेशन के कंसल्टिंग एडिटर श्री दीपक चौरसिया, हिन्दुस्तान टाइम्स के चीफ कंटेट ऑफिसर प्रसाद सान्याल एवं कौन बनेगा करोड़पति के इस सीज़न की पहली करोड़पति श्रीमती नाज़िया नसीम ने हिस्सा लिया।