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शनिवार, 11 मार्च 2017

आतंकवाद के विरूद्ध एकजुटता का समय

-संजय द्विवेदी

  देश की आतंरिक सुरक्षा को जिस तरह आतंकवादी संगठनों से लगातार चुनौती मिल रही है, उसमें हमारी एकजुटता, भाईचारा और समझदारी ही हमें बचा सकती है। आरोपों-प्रत्यारोपों से अलग हटकर अब हमें सोचना होगा कि आखिर हम अपने लोगों को कैसे बचाएं। अब यह कहने का समय नहीं है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, बल्कि हमें राष्ट्रधर्म निभाना होगा। हमारी मातृभूमि हमारे लिए सर्वस्व है और उसके लिए सबकुछ निछावर करने का भाव ही हमें जगाना है।
  देश प्रथम एक नारे की तरह नहीं, बल्कि संकल्प की तरह हमारे जीवन में उतरना चाहिए। हमें देखना होगा कि हम अपने नौजवानों में क्या राष्ट्रीय चेतना का संचार कर रहे हैं या हमने उन्हें दुनिया में बह रही जहरीली हवाओं के सामने झोंक दिया है। इंटरनेट और साइबर मीडिया पर भटकती यह पीढ़ी कहीं देश के दुश्मनों के हाथ में तो नहीं खेल रही है, यह देखना होगा। आईएस जैसे खतरनाक संगठन और तमाम विचारधाराओं द्वारा पोषित देशतोड़क गतिविधियों में शामिल युवा कैसा भारत बनाएगें, यह भी सोचना होगा। आज हमें खतरे के संकेत दिखने लगे हैं। विश्वविद्यालयों में युवाओं की देशविरोधी नारेबाजी के लिए उकसाया जा रहा है तो एक प्रोफेसर को हमने माओवादी संगठनों की मदद करने के आरोप में कोर्ट से सजा मिलते देखा। आखिर हम कैसा भारत बना रहे हैं।
   आज जबकि समूची दुनिया में हिंदुस्तानी गहरे संकट में हैं, तो हमें अपने देश को बचाना ही होगा। जिन्हें जन्नत का सपना दिख रहा है, उन्हें बताना होगा कि ट्रंप द्वारा खदेड़े गए हिंदुस्तानियों को अंततः इसी जमीन पर जगह मिलेगी। इतिहास हमें कई तरह से सिखाता है पर हम सीखते नहीं हैं। आप देखें 1947 में अपना वतन छोड़कर एक सुंदर सपना लेकर जो लोग पाकिस्तान गए थे, वे आज भी वहां मुजाहिर हैं। कराची की गलियां आज भी उनके रक्त से लाल हैं। इसी तरह दुनिया के तमाम देशों में हिंदुस्तानी रहते हैं और वहां के राष्ट्रजीवन में उनका श्रेष्टतम योगदान है। किंतु उनके हर संकट के समय उनकी अंतिम शरणस्थली हिंदुस्तान ही है। यह साधारण सी बात अगर हम समझ जाएं तो हमारे नौजवान किसी आईएस, आईएसआई या माओवादियों के भटकाव भले अभियानों के झांसे में नहीं आएंगे। हम यह भी स्वीकारते हैं कि राजसत्ता के खिलाफ उठने वाली हर आवाज देशद्रोही नहीं है, भारत में लोकतंत्र का होना इसका प्रमाण है। लोकतंत्र की जीवंतता इसी में है कि वहां संवाद और विमर्श निरंतर हों। लेकिन आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न होना, या ऐसे अभियानों को वैचारिक या नैतिक समर्थन देना स्वीकार कैसे किया जा सकता है। राज्य के आतंक के विरूद्ध भी आतंक फैलाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। देश में सुप्रीम कोर्ट से लेकर अनेक ऐसे फोरम हैं जहां जाकर लोगों ने अपने हक हासिल किए हैं। जनांदोलनों से सरकार को झुकाया है, किंतु हथियार उठाना और अपनी बौद्धिकता और तार्कितता से आतंक को महिमामंडित करना ठीक नहीं है।
     देश के बौद्धिक वर्गों की एक बड़ी जिम्मेदारी देश के लोगों के प्रति है। सिर्फ असंतोष को बढ़ाना या समाज में फैली विद्रूपता को ही लक्ष्य कर उसका प्रचार जिम्मेदारी नहीं है। दायित्व है लोगों को न्याय दिलाना, उनकी जिंदगी में फैले अँधेरे को कम करना। बंदूकें पकड़ा कर हम उनकी जिंदगी को और नरक ही बनाते हैं। देश में बस्तर से लेकर कश्मीर और वहां से लेकर पूर्वांचल के कई राज्यों में अनेक हिंसक आंदोलन सक्रिय हैं। पर हम विचार करें कि क्या इससे वास्तव में न्याय हासिल हुआ है। हममें से कई पंथ के आधार पर राज्य व्यवस्था के सपने देखते हैं। पर क्या हमें पता है कि पंथों के आधार पर चलने वाले राज्य सबसे पहले स्वतंत्रता और मनुष्यता का ही गला घोंटते हैं। आज अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप मुस्लिमों के निशाने पर हैं, पर क्या दुनिया के मुस्लिम राष्ट्रों ने अपना चेहरा देखा है? वहां मानवाधिकारों की स्थिति क्या है? इसी तरह वामविचारी मित्रों को लोकतंत्र की कुछ ज्यादा ही चिंता हो आई है। किंतु उनकी अपनी विचारधारा के आधार पर बने और चले देशों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन ही नहीं हुआ, बल्कि विचारधारा के नाम पर खून की होली खेली गई। ऐसे में सबसे ज्यादा चिंता हमें अपने देश और उसके लोकतंत्र को बचाने की होनी चाहिए। समृद्धि और स्वतंत्रता लोकतंत्र में ही साथ-साथ फल-फूल सकते हैं। इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। कोई भी पंथ आधारित राज्य या वामपंथी विचारों के आधार पर खड़ा देश लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा नहीं कर सकता, यह कटु सत्य नहीं है। यह बात तब और साबित होती है जब हमें पता चलता है अरब, ईरान और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम राष्ट्रों में बसने वालों में किस तरह अमरीकी वीजा पाने की ललक है। क्या समृद्धि और धन के लिए नहीं। अगर ऐसा है तो अरब में क्या कमी है? सच तो यह है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन को जीने की आजादी ही लोकतंत्र का मूल्य है, शायद इसलिए अमरीकी वीजा धनी-मानी मुस्लिम देशों के लोगों का सपना है। वो एक ऐसी दुनिया के सपने देखते हैं जहां वे अपनी जिंदगी को बेहतर तरीके से जी सकें। घुट-घुटकर पहरों में जीना कितनी भी समृद्धि के साथ किसे स्वीकार है? एक मनुष्य होने के नाते आरोपित बंधन हमें रास नहीं आते।

   दुनिया के तमाम देशों के बीच भारत एक उम्मीद का चेहरा है। जब दुनिया में खून के दरिया बह रहे हैं तो गौतम बुद्ध, महावीर, नानक की घरती रास्ता दिखाती है। उपनिषद् हमें बताते हैं कि अंतर्यात्रा पर निकलें। मन की यात्रा पर जाएं। खुद का परिष्कार करें। एक बेहतर दुनिया के लिए सुंदर सपनें देखें और उन्हें सच करने के लिए जिंदगी लगा दें। हमने विविधता के साथ जीने और रहने की शक्ति सालों की साधना से अर्जित की है। इसलिए दुनिया के तमाम विचार, पंथ और विविधताएं यहां की जमीन पर आईं और इसकी खुशबू को बढ़ाती रहीं। हजारों फूल खिलने दो, का विचार हमारा ही है। हमने कभी नहीं कहा कि हम ही अंतिम सत्य हैं। जबकि दुनिया में बह रहे खून के पीछे खुद को सबसे बेहतर समझने की समझ है। अब लंबे समय के बाद फिर आतंकवाद का दानव सिर उठाता दिख रहा है। हमारे नौजवान फिर एक जहरीली हवा के प्रभाव में आ रहे हैं। ऐसे कठिन समय में हमें फिर से अपनी राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रीय मनीषा का पुनर्पाठ करना होगा। देश के हर कोने से राष्ट्रीय चेतना को जगाने वाली शक्तियों को एक सूत्र में जोड़ना होगा। यह काम सरकार के भरोसे नहीं होगा। लोगों के भरोसे होगा। राजनीति का पंथ अलग है, वे तोड़कर ही अपने लक्ष्य संधान करते हैं। हमें जोड़ने के सूत्र खोजने होंगे। राष्ट्रीय सवालों पर देश एक दिखे, इतनी सी कोशिश भी हमें सुरक्षित रख सकती है। हर खतरे से और हर हमले से।

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

भारतीय नौजवानों में जहर घोलता आईएस

-संजय द्विवेदी


     समूची मानवता के लिए खतरा बन चुके खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के प्रति भारतीय युवाओं का आकर्षण निश्चित ही खतरनाक है। कश्मीर से लेकर केरल और अब गुजरात में दो संदिग्धों की गिरफ्तारी चिंतनीय है ही। आखिर आईएस के विचारों में ऐसा क्या है कि भारतीय मुस्लिम युवा अपनी मातृभूमि को छोड़कर, परिवार और परिजनों को छोड़कर एक ऐसी दुनिया में दाखिल होना चाहता है, जहां से लौटने का रास्ता बंद है। इंटरनेट के प्रसार और संचार माध्यमों की तीव्रता ने जो दुनिया रची है, उसमें यह संकट और गहरा हो रहा है। हमारे नौजवान अगर गुमराही के रास्ते पर चलकर अपनी जिंदगी को जहन्नुम बनाने पर आमादा हैं तो देश के बुद्धिजीवियों, राजनेताओं, अफसरों, धर्मगुरूओं को जरूर इस विषय पर सोचना चाहिए। सही मायने में यह वैश्विक आतंकवाद की वह नर्सरी है जिसमें मजहब के नाम पर बरगलाकर युवाओं को इसका शिकार बनाया जा रहा है।
 गुजरात की घटना हमारे लिए एक चेतावनी की तरह है जिसमें इन संदिग्धों के तार सीधे बाहर से जुड़े हुए हैं और एक संदिग्ध की पत्नी भी उसे ऐसे कामों के लिए प्रेरित करती नजर आती है। हमें देखना होगा कि आखिर हम कौन सी शिक्षा दे रहे हैं और कैसा समाज बना रहे हैं। एक आरोपी के पिता का यह कहना साधारण नहीं है कि मेरे लिए तो जहर पीने की नौबत है। जो नौजवान बहकावे में आकर ऐसे कदम उठाते हैं उनके माता-पिता और परिवार पर क्या गुजरती है, यह अनुभव किया जा सकता है। पंथिक भावनाओं में आकर एक बार उठा कदम पूरी जिंदगी की बरबादी का सबब बन जाता है। हमें ऐसे कठिन समय में अपने नौजवानों को बचाने के लिए कड़े और परिणाम केंद्रित कदम उठाने होगें।
जहरीली शिक्षा पर लगे रोकः यह कहना बहुत आसान है कि कोई मजहब आतंक नहीं सिखाता। किंतु मजहब के व्याख्याकार कौन लोग हैं, इस पर ध्यान देने की जरूरत है। मजहबी शिक्षा के नाम पर खुले मदरसों में क्या पढ़ाया जा रहा है इसे देखने की जरूरत है। वहां शिक्षा दे रहे लोग सिर्फ शिक्षा दे रहे हैं या शिक्षा के नाम पर कुछ और कर रहे हैं, इसे देखना जरूरी है। पूरी दुनिया में आतंक का कहर बरपा रहे संगठनों से हमारे देश के युवाओं का क्या रिश्ता हो सकता है? वे कौन से कारण हैं जिनके कारण हमारी नई पीढ़ी उन आतंकी संगठनों के प्रति आकर्षित हो रही है? एक पराई जमीन पर चल रही जंग में हमारे नौजवान आखिर क्यों कूदना चाहते हैं? क्यों हमारे नौजवान अपनी जमीन और अपने वतन को छोड़कर सीरिया की राह पकड़ रहे हैं? हम इसका विश्वेषण करें तो हमें कड़वी सच्चाईयां नजर आएगीं। भारत के सभी बड़े उलेमा और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने आईएस की हरकतों को इस्लाम विरोधी बताकर खारिज किया है। आखिर क्या कारण है कि भारत के युवा मुस्लिम धर्मगुरूओं और उलेमा की राय न सुनकर आईएस के बहकावे में आ रहे हैं? यही नहीं कश्मीर में शुक्रवार को हो रहे प्रदर्शनों में आईएस का झंडा लहराने की प्रेरणा क्या है? ऐसे अनेक कठिन सवाल हैं,जिनके उत्तर हमें तलाशने होगें।
अपने बच्चों को बचाना पहली जिम्मेदारीः आतंकवाद की इस फैलती विषबेल से अपने बच्चों को बचाना हमारी पहली जिम्मेदारी है। हमारे बच्चे अपनी मातृभूमि से प्रेम करें, अपने भारतीय बंधु-बांधवों से प्रेम करें, हिंसा-अनाचार और आतंकी विचारों से दूर रहें, आज यही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। हूरों के ख्वाब में वे आज की अपनी सुंदर जिंदगी को स्याह न करें, यह बात उन्हें समझाने  की जरूरत है। हमारे परिवार, विद्यालय और शिक्षक इस काम में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। पंथ की सीमाएं उन्हें बतानी होगीं। जीवन कितना अनमोल है, यह भी बताना होगा। धर्म की उन शिक्षाओं को सामने लाना होगा जिससे विश्व मानवता को सूकून मिले। भाईचारा बढ़े और खून खराबा रोका जा सके। आज हम आतंकवाद के लिए पश्चिमी देशों और अमरीका को दोष देते नहीं बैठे रह सकते। क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ हमारी जंग भले ही भोथरी हो, अमरीका और पश्चिमी देश अपने तरीके से आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं और सफल भी हैं। खासकर अमरीका और ब्रिटेन में आतंकी हमलों के बाद उन्होंने जो भी शैली अपनाई हो,वहां हमले नहीं हुए। दूसरी बात भारतीय राजनीति में विभाजनकारी और देशतोड़क शक्तियों का प्रभुत्व है, यहां देशहित से ऊपर वोट की राजनीति है। ऐसे में देश की एकजुटता प्रकट नहीं होती। एकजुटता प्रकट न होने से देश का मनोबल टूटता है और एक राष्ट्र के रूप में हम नहीं दिखते।

वसुधैव कुटुम्बकम् है विश्वशांति का मंत्रः भारत के अलावा दुनिया में पैदा हुए सभी पंथ विस्तारवादी हैं। धर्मान्तरण उनकी एक अनिवार्य बुराई है, जिससे तनाव खड़ा होता है। विवाद होते हैं। दुनिया के तमाम इलाकों में मची मारकाट इसी विस्तारवादी सोच का नतीजा है। स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझना और अपने विचार को शेष पर लादने की सोच ने सारे संकट रचे हैं। दूसरों को स्वीकारना अगर दुनिया को आता तो हमारी पृथ्वी इतनी अशांत न होती। इसके विपरीत भारत विविधता और बहुलता को साधने वाला देश है। भारतीय भूमि पर उपजे सभी पंथ विविधताओं को आदर देने वाले हैं और वसुधैव कुटुम्बकम् हमारा ध्येय मंत्र है। हमारी सोच में सभी पंथ प्रभु तक पहुंचने का मार्ग है, हम ही श्रेष्ठ हैं- हम ऐसा दावा नहीं करते। दुनिया के सब विचारों, सभी पंथों और नवाचारों का स्वागत करने का भाव भारतीय भूमि में ही निहित है। इसे भले ही भारत और सनातन धर्म की कमजोरी कहकर निरूपित किया जाए, किंतु शांति का मार्ग यही है। हमने सदियों से इसलिए विविध विचारों, पंथों, मतों को संवाद के अवसर दिए। फलने-फूलने के अवसर दिए, क्योंकि शास्त्रार्थ हमारी परंपरा का हिस्सा है। शास्त्रार्थ इस बात का प्रतीक है कि सत्य की खोज जारी है, ज्ञान की खोज जारी है। हमने सत्य को पा लिया ऐसा कहने वाली परंपराएं शास्त्रार्थ नहीं कर सकतीं, क्योंकि वे विचारों में ही जड़वादी हैं। उनमें नवाचार संभव नहीं है, संवाद संभव नहीं हैं। अपनी आत्ममुग्धता में वे अंधेरे रचती हैं और अपने लोगों के लिए अंधकार भरा जीवन। वहां उजास कहां है, उम्मीद कहां हैं?  दुनिया के तमाम हिस्सों में अगर हिंसा, आतंकवाद और खून के दरिया बह रहे हैं, तो उन्हें अपने विचारों पर एक बार पुर्नविचार करना ही चाहिए। आखिर सारे पंथ, मजहब और विचारधाराएं अगर एक बेहतर दुनिया के लिए ही बने हैं तो इतनी अशांति क्यों है भाई? भारत जैसा देश जो इस संकट में दुनिया को रास्ता दिखा सकता है, के नौजवान भी अगर भटकाव के शिकार होकर बंदूकें हाथ में लेकर मानवता की हत्या करते दिखेगें तो हमें मानना होगा कि भारतीयता कमजोर हो रही है। हमारा राष्ट्रवाद शिथिल पड़ रहा है। हमारा दार्शनिक आधार दरक रहा है। अन्यथा कोई कारण नहीं कि भारत जो विश्व मानवता के सामने एक वैकल्पिक दर्शन का वाहक है, उसके नौजवान किसी जहरीली हवा के शिकार होकर अपने ही देश के जीवन मूल्यों की बलि देते दिखें। इस संकटपूर्ण  समय में हमें अपने बच्चों को संभालना है। उन्हें भारत बोध कराना है। मानवता के मूल्यों की प्रसारक धरती से, फिर से शांति का संदेश देना है। पूरी दुनिया आपकी तरफ उम्मीदों से देख रही है। कृपया आतंक की आंधी में शामिल होकर अपनी माटी को कलंकित मत कीजिए।

शनिवार, 9 जनवरी 2016

सामना, शहादत और मातम!

सामना, शहादत और मातम!
जग नहीं सुनता कभी दुर्बल जनों का शांति प्रवचन
-संजय द्विवेदी

      पाकिस्तान के जन्म की कथा, उसकी राजनीति की व्यथा और वहां की सेना की मनोदशा को जानकर भी जो लोग उसके साथ अच्छे रिश्तों की प्रतीक्षा में हैं, उन्हें दुआ कि उनके स्वप्न पूरे हों। हमें पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाते समय सिर्फ इस्लामी आतंकवाद की वैश्विक धारा का ही विचार नहीं करना चाहिए बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि आखिर यह देश किस अवधारणा पर बना और अब तक कायम है? पाकिस्तान सेना का कलेजा अपने मासूम बच्चों के जनाजों को कंधा देते हुए नहीं कांपा (पेशावर काण्ड) तो पड़ोसी मुल्क के नागरिकों और सैनिकों की मौत उनके लिए क्या मायने रखती है।
    द्विराष्ट्रवाद की अवधारणा की मोटी समझ रखने वालों को यह पता है कि पाकिस्तान की एकता आज सिर्फ भारत घृणा पर ही टिकी हुयी है। भारत विरोध वहां की राजनीति का एक एजेंडा और कश्मीर उसका लक्ष्य है। शायद पाकिस्तान के बगल में भारत न होता तो पाकिस्तान कबके कई टुकड़ों में विभक्त हो गया होता। दो टुकड़े तो उसके काफी पहले हो चुके हैं। वह अपनी ही प्रेतछाया से लड़ता हुआ देश है। इस जमीन पर शायद इकलौता देश जो अपने पुराने देश से लड़ रहा है, जिससे वह जिद करके अलग हुआ था।
निरंतर है प्राक्सी वारः सीधे युद्ध में तीन बार मात खाकर पाकिस्तान ने यह समझ विकसित की अब प्राक्सी वार ही भारत को सताए-पकाए और छकाए रखने का तरीका है। 1947 में देश के बंटवारे के पीछे मंशा तो यही थी कि अब सबको जमीन मिल गयी है, घर के बंटवारे के बाद हम शांति से जी सकेंगे। पर ऐसा कहां हुआ। देश को नरेन्द्र मोदी के रूप में पहली बार एक सशक्त नेतृत्व मिला है, यह कहना और मानना ऐतिहासिक रूप से गलत है।
     श्री लालबहादुर शास्त्री, श्रीमती इंदिरा गांधी और श्री अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब हमारा नेतृत्व देता रहा है। किंतु क्या पाकिस्तान इन पराजयों से रत्ती भर सीख सका? आज की तारीख में हमें पाकिस्तान को आइसोलेट करना पड़ेगा। पाकिस्तान से निरंतर संवाद की जिदें भी उसे शक्ति देती हैं, और वह एक नए हमले की तैयारी कर लेता है। ऐसे खतरनाक और आतंकवादियों के पनाहगाह देश को अलग-थलग करके ही हम सुख- चैन से रह सकते हैं। अमन की आशा एक सपना है जो पाकिस्तान जैसे कुंठित राष्ट्र के साथ संभव नहीं है। आप देखें तो संवाद की ये कोशिशें नई नहीं है। शायद हमारे हर प्रधानमंत्री ने ऐसी कोशिशें की हैं, लेकिन सफलता उन्हें नहीं मिली।
बंद कीजिए ड्रामाः   बाघा सीमा पर हम कितने सालों से मोमबत्तियां जलाने से लेकर मिठाईयों का आदान-प्रदान और पैर पटकने की कवायद कर रहे हैं। यह सब देखने-सुनने और एक इवेंट के लिहाज से बहुत अच्छा है किंतु इससे हमें हासिल क्या हुआ? इस्लामिक देशों का एक पूरा संगठन बना हुआ है, जिसमें मिडिल ईस्ट के देशों के साथ मिलकर पाकिस्तान भारत के हितों को नुकसान पहुंचाता है। हिंदुस्तान के कुछ लीडरों ने हालात ऐसे कर दिए हैं कि आप बहस भी नहीं कर सकते।जो देश अपने सुरक्षा सवालों पर भी संवाद से डरता हो कि मुसलमान नाराज हो जाएंगे, उसे कोई नहीं बचा सकता। आखिर हिंदुस्तान का मुसलमान पहले हिंदुस्तानी है या मुसलमान? अगर हमें सुरक्षित रहना है, एक रहना है तो हम सबको मानना होगा कि हम पहले हिंदुस्तानी हैं, बाद में कुछ और। कोई भी पंथ अगर राष्ट्र से बड़ा होगा तो राष्ट्र एक नहीं रह सकता। इतने हमलों और इतना खून बहाने के बाद भी यह एक वाक्य का सबक हम नहीं सीख पा रहे हैं। जिस तरह की घुसपैठ व घटनाएं हो रही हैं, वे बताती हैं कि हम एक लापरवाह देश हैं। पाकिस्तानी रेंजर्स और पाक सेना तो घुसपैठियों के पीछे हैं हीं, हमारे अपने देश में भी सीमा सुरक्षा के काम में लगे लोग और देश के भीतर पाकिस्तानी इरादों के मददगार भी इसमें एक बड़ा कारण है। एक बिकाऊ हिंदुस्तानी कैसे अपनी मातृभूमि की रक्षा कर सकता है?
कितने धोखों के बादः  आज ईरान ने सऊदी अरब से राजनायिक संबंध तोड़ लिए। हमारी ऐसी क्या मजबूरी है कि हम पाकिस्तान को चिपकाए पड़े हैं। हमलों के बाद पाकिस्तान से जैसी प्रतिक्रियाएं आती हैं, वह कोई तारीफ के काबिल नहीं हैं। हम धोखे खाने के लिए उन्हें अवसर देते हैं। इंटलीजेंस इनपुट के बाद भी हमारे देश में घुसकर वे हमारी जमीन पर अपने नापाक इरादों को अंजाम दे जाते हैं, और हम अपने वसुधैव- कुटुम्बकम् के अंदाज पर मुग्ध हैं। अमरीका और पश्चिमी देशों के नकलीपन और दोहरेपन पर तो मत जाईए। वे हमें पाकिस्तान से संवाद बनाए रखने की सलाहें देते हैं किंतु पठानकोट हमला उनकी जमीन पर हुआ होता तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होती? 6 फरवरी,1913 को हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने एक विपक्षी दल के नेता के नाते कहा था पाकिस्तान को लव लेटर लिखना बंद कीजिए। आज वे रायसीना हिल्स में बैठकर अगर नोबेल पुरस्कार लेने के सपने देख रहे हैं, तो उन्हें अग्रिम बधाई। एक के बदले 10 सिर लेने की बात करने वाली शक्तियां आज सत्ता में हैं, पर क्या देश सुरक्षित है? नवाज शरीफ की पोती को आशीष दीजिए, पर सैनिकों की बेवाएं भी एक सवाल की तरह हमारे सामने हैं। इतना तो तय कीजिए की युद्ध के लिए सिर्फ हमारी ही जमीन का इस्तेमाल न हो। हम युद्धकामी लोग नहीं हैं, बिल्कुल युद्ध नहीं चाहते। भारत का मन बड़ा है और शांति का पक्षधर है। किंतु छद्म युद्ध भी हमारी जमीन पर ही क्यों लड़े जाएं। प्राक्सीवार के लिए पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर की जमीनों का इस्तेमाल क्यों नहीं होता? हमारे पास हजारों विकल्प हैं, पर हम धोखा खाने को अपनी शान समझ बैठे हैं। जिन देशों ने अपने एक नागरिक की मौत पर शहर के शहर खत्म कर दिए हम उनकी नजरों में अच्छा बनना चाहते हैं। हमारे देश के सबसे बड़े और सुरक्षित एयरफोर्स बेस पर हमला साधारण बात नहीं हैं, किंतु हमारी हरकतों ने इसे साधारण बना दिया है। सुरक्षा क्यों फेल हुयी, आगे हमले न होगें इसकी गारंटी क्या है? सुरक्षा समस्याओं पर हम संभलकर बात क्यों कर रहे हैं? एक जमाने में पाकिस्तान के प्रमुख जनरल जिया उल हक कहा करते थे भारत  को एक हजार जगह घाव दो। ये संख्या भी गिनें तो पूरी हो चुकी है। हमारी सरकार को और कितने घावों का इंतजार है? फिलहाल तो हमारे सैनिकों के सामने तीन ही विकल्प हैं- सामना, शहादत और मातम। इसी मंजर पर एक कवि की वाणी भी सुनिए-

हम चले थे विश्व भर को शांति का सन्देश देने,
किन्तु जिसको बंधु समझा, आ गया वह प्राण लेने
शक्ति की हमने उपेक्षा की, उसी का दंड पाया,
यह प्रकृति का ही नियम है, अब हमें यह जानना है।
जग नहीं सुनता कभी, दुर्बल जनों का शांति प्रवचन,
सर झुकाता है उसे, जो कर सके रिपु मान मर्दन।

सोमवार, 4 जनवरी 2016

आतंकवाद से कैसे लड़ें



-संजय द्विवेदी
     आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई कड़े संकल्पों के कारण धीमी पड़ रही है। पंजाब के हाल के वाकये बता रहे हैं कि हम कितनी गफलत में जी रहे हैं। राजनीतिक संकल्पों और मैदानी लड़ाई में बहुत अंतर है, यह साफ दिख भी रहा है। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के रहते हम वैसे भी शांति की उम्मीदें नहीं पाल सकते किंतु जब हमारे अपने ही संकल्प ढीले हों तो खतरा और बढ़ जाता है। आतंकवाद के खिलाफ लंबी यातना भोगने के बाद भी हमने सीखा बहुत कम है। किसी आतंकी को फांसी देते वक्त भी हमारे देश में उसे फांसी देने और न देने पर जैसा विमर्श चलता है उसकी मिसाल खोजने पर भी नहीं मिलेगी। आखिर हम आतंकवाद के खिलाफ जीरो टालरेंस का रवैया अपनाए बिना कैसे सुरक्षित रह सकते हैं।
    भारतीय राजनीति में किसी का सीना कितने भी इंच का हो फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लोकतंत्र में लोगों की लाशें बिछ रही हैं और हम राज्य की हिंसा पर विमर्श में व्यस्त हैं। एक मोमबत्ती गिरोह भी है जो हर आतंकी के लिए टेसुए बहाता है किंतु बहादुर सैनिकों की मौत उनके लिए सिर्फ एक कर्तव्य है। आतंकवाद के खिलाफ हमें निर्णायक लड़ाई लड़ने का संकल्प लेना होगा वरना सीमा से लेकर नक्सल इलाकों में खून बहता रहेगा और देखते रहने के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगें। इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री जो कि भारत के सर्वप्रमुख नेता हैं वे भारत के मूल स्वभाव जैसा ही व्यवहार कर पाएंगें। भारत का मूल मंत्र है- वसुधैव कुटुम्बकम्। पड़ोसियों के साथ बेहतर रिश्ते हमारी जरूरत है और आकांक्षा भी। लेकिन इस स्वभाव के बाद भी हमें मिल क्या रहा है, क्या पड़ोसियों की सदाशयता पाने में हम सफल हैं। हमारा कौन सा पड़ोसी देश है जो हमें सम्मान से देखता है। अब तो नेपाल भी आंखें दिखा रहा है और चीन से बेहतर रिश्ते बनाने में लगा है। बाकी देशों के बारे में हम बेहतर जानते हैं। इसके मायने यह हैं कि हमारी जो आपसी लड़ाईयां हैं, इनके चलते आकार में बड़े होने के बाद भी हम एक कमजोर देश हैं। हमारी ये कमजोरियों देश के अंदर बैठे आतंकी भी समझते हैं और देश के बाहर बैठे लोग तो चतुर सुजान हैं ही।

एक मजबूत भारत किसके लिए चुनौतीः

 खतरा हमें हर उस ताकत से है जिसकी आंखों में एक मजबूत भारत चुभता है। एक मजबूत भारत उन्हें नहीं चाहिए। वे इसे रोक नहीं सकते पर इस प्रक्रिया में व्यवधान डाल सकते हैं। भारत की समस्या मुख्यतः पाकिस्तान और चीन केंद्रित है। इन दो पड़ोसियों ने जेहादी आतंक और माओवादी आतंक के बीज को हमारे देश में पोषित किया है और राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर चुनौती दी है। एक समय में पंजाब में फैले आतंकवाद से हमने निजात पाई तो पाक ने कश्मीर को अपना केंद्र बनाकर एक नई चुनौती पेश कर दी। यह हालात आज भी संभले नहीं हैं। जेहाद का सपना लिए नौजवान आज भी गुमराह किए जा रहे हैं, तो खालिस्तान की आग भी धधकाने की कोशिशें होती हैं। भारत की राष्ट्रीय चेतना को कुंठित करना, भारतीय समाज में भेदभाव भर कर देशतोड़क गतिविधियों में, समाज का इस्तेमाल करना हमारे विरोधियों की शक्ति रही है। इसके चलते देश में तमाम देशतोड़क अभियान गति पा रहे हैं। अलग-अलग नामों से चल रहे इन हिंसक आंदोलनों की एक ही नीयत है भारत को कमजोर करना। वनांचलों से लेकर कश्मीर, पंजाब और पूर्वांचल के राज्यों में हिंसक गतिविधियों का ठीक से अध्ययन किया जाए तो यह सच सामने आएगा। भारत की एकता और उसकी अखंडता को चुनौती देती ये शक्तियां किस तरह देश के समाज को तोड़ना चाहती हैं यह सच भी सामने आएगा।
इजराइल सा माद्दा और पुतिन सा नेतृत्व जरूरीः

हमारे देश को अगर आतंकवाद की गहरी आग में नहीं जलना है तो नागरिकों में राष्ट्रभाव प्रबल करना होगा। इजराइल छोटा देश है किंतु हमारे लिए एक आदर्श बन सकता है। आतंकवाद के खिलाफ उसकी जंग हमें सिखाती है कि किस तरह अपनी अस्मिता के लिए पूरा देश एक होकर खड़ा होता है। रूस के कमजोर होते और बिखरे स्वरूप के बाद भी पुतिन जैसे नायक हमारे सामने उम्मीद की तरह हैं। हमारे अपने लोगों का खून बहता रहे और हम देखते रहें तो इसके मायने क्या हैं। यह सही बात है कि आतंक कहीं भी फैलाया जा सकता है। आतंकवादियों से जूझना साधारण बात नहीं है। किंतु क्या हमारा समाज और हमारी सरकारें इसके लिए तैयार हैं। सीमा सुरक्षा बल की चौकसी के बाद भी बस्तर के जंगलों तक विदेशी हथियार पहुंच रहे हैं, तो क्या हमारे अपने लोगों की मदद के बिना ऐसा हो रहा है। आजादी के इन सात दशकों में जैसा भारत हमने बनाया है वहां लोगों का थोड़ी लालच में बिक जाना बहुत आसान है। विदेशी ताकतें इतनी सशक्त और चाक चौबंद हैं कि उनके तंत्र को हमारी हर गतिविधि का पता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में अजीत ढोभाल जैसे योग्य अधिकारी की उपस्थिति के बाद भी हालात संभलने को कहां हैं। भारत- पाक के रिश्तों को बनाने के सचेतन प्रयासों के बीच आतंकी ताकतों की कोशिश रिश्तों पर पानी फेरने की है। भारत की नागरिक चेतना को जागृत किए बिना इस दानवी आतंकवाद के तमाम सिरों से निपट पाना संभव नहीं दिखता।


निर्णायक संघर्ष की जरूरतः

 भारतीय समाज और उसके नायकों के लिए जरूरी है कि वे एक निर्णायक संकल्प की ओर बढ़ें। आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ एक लड़ाई छेड़ी जाए चाहे वह जेहादी आतंक हो या माओवादी आंतक। भारतीय नागरिकों, मीडिया, सामाजिक रूप से प्रभावी वर्गों को यह चेतना नागरिकों के भीतर भरनी होगी कि अपने लोगों का खून बहाकर हम वसुधैव कुटुम्बकम् का मंत्रजाप नहीं कर सकते। दुनिया के हर ताकतवर देश ने जिस तरह आतंकवाद का सामना किया है, वही रास्ता हमारे लिए भी है। अमरिका अपने नागरिकों के रक्षा के लिए अलग तरीके से पेश आता है और ब्रिटेन अपने नागरिकों की रक्षा के लिए अलग तरीके से पेश आ रहा है तो भारत के लोगों की जान-माल क्या इतनी सस्ती है कि उन्हें अकारण नरभक्षियों के सामने निहत्था छोड़ दिया जाए? भारत का सरकार सहित राज्यों की सरकारों को यह विचार किए बिना कि इसके क्या परिणाम होंगें, राजनीतिक रूप से इसके क्या गणित बनेंगें, एक दृढ़ संकल्प के साथ आगे आना होगा। भारत की शक्ति और उसकी गरिमा को स्थापित करना होगा। एक साफ्ट स्टेट का लांछन लेकर हम कितना खून धरती पर बहने देंगें। अपने नागरिकों में राष्ट्रीय भावना भरना और देशद्रोही ताकतों के खिलाफ शत्रुओं सा व्यवहार ही हमें इस संकट से मुक्ति दिलाएगा। अपनी खुफिया सेवाओं को चुस्त-दुरूस्त बनाते हुए, सेना और अन्य सुरक्षा बलों का मनोबल बनाए रखते हुए हमे आगे बढ़ना होगा। सत्ता और व्यवस्था में नागरिकों के प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता भरनी होगी। क्योंकि लोकतंत्र की विफलता  भी कहीं न कहीं असंतोष का कारण बनती है। सामान्य जनों में रोष और विद्रोह की भावना पैदा करती है। इससे पहले हिंसा और बाद में आतंकवाद की समस्या पैदा होती है। एक आगे बढते देश के सामने बहुत से संकट हैं, उनमें आतंकवाद सबसे बड़ा है क्योंकि लोगों के जानमाल की रक्षा किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी है। हमारी सरकार की पहली और अंतिम प्रतिबद्धता लोगों की सुरक्षा है, पर क्या हम इस जिम्मेदारी पर खरे उतर रहे हैं  ?

शनिवार, 10 जनवरी 2015

असभ्यताओं के संघर्ष का समय !


दूसरे विश्वासों को सम्मान और राष्ट्रवाद से ही रूकेगी खून की होली
-संजय द्विवेदी
     फ्रांस से लेकर सीरिया, ईराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से लेकर दुनिया के तमाम देशों में बहता खून आखिर क्या कह रहा है? मानवता के शत्रु, पंथ की नकाब पहनकर मनुष्यों के खून की होली खेल रहे हैं। वे यह सारा कुछ पंथ राज्य की स्थापना के लिए हो रहा है। सैम्युल पी. हटिंग्टन ने अपनी किताब क्लैस आफ सिविलाइजेशन में इन खतरों पर बात करते हुए इसे सभ्यताओं के संघर्ष की संज्ञा दी थी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सभ्यताएं भी संघर्ष करती हैं? वास्तव में इसे तो असभ्यताओं के संघर्ष की संज्ञा दी जानी चाहिए। लगता है यह पूरा समय असभ्यताओं के विस्तार का समय है और लगता है कि असभ्यताओं का नया उपनिवेश भी स्थापित हो रहा है। अगर दुनिया के महादेशों में मानवता के अंश और बीज होते तो वे इन घटनाओं पर शर्मसार होते और उनकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए कदम उठाते। आखिर यह सिलसिला कब रूकेगा, इस प्रश्न के उत्तर भी नदारद हैं।
    हम देख रहे हैं कि 21 वीं सदी में यह खतरा और गहरा हो रहा है। अपने ही संप्रदाय बंधुओं का खून बहाने की वृत्ति भी देखी जा रही है। आतंकवादी संगठन नई तकनीकों और हथियारों से लैस हैं। वे राजसत्ता और समाज दोनों को चुनौती दे रहे हैं। मानवता सामने खड़ी सिसक रही है। ये चित्र हैरान करने वाले हैं किंतु इससे निजात पाना कठिन दिखता है।
   देखने में आ रहा है कि पंथ ने राष्ट्र-राज्य की सीमाएं तोड़कर एक नया संसार बना लिया है। जहां लोग अपने राष्ट्र की सीमाएं छोड़कर दूर देश में अपने पंथ की खातिर खून बहाने के लिए एकत्र हो रहे हैं। आंतकी संगठनों के आह्वान पर अपना देश छोड़कर खून बहाने के लिए निकलना साधारण नहीं है। भारत, फ्रांस और ब्रिटेन के नागरिक भी खून बहाने वाली जमातों में शामिल हैं। यह बात बताती है कि अब राष्ट्रीयता पर पंथ का विचार भारी पड़ रहा है। पंथ की उग्रता ने राष्ट्रों को शर्मशार किया है। क्या हमें उन पंथों की पहचान नहीं करनी चाहिए जो देश से बड़ा अपने पंथ को बता रहे हैं। क्या कारण है कि सांप्रदायिकता की भावना में हम अपने ही भाई का खून बहाने से नहीं चूकते। माटी का प्यार कमजोर हो रहा है और पांथिक भावनाएं मजबूत बन रही हैं। आज भारत जैसे देश के सामने यह बड़ा सवाल है कि वह नए विचारों के साथ खड़ा हो। क्योंकि वैश्विक आतंकवाद के सामने वह सबसे कमजोर शिकार है। देश के नागरिकों में राष्ट्रप्रेम की भावना को गहरा करना जरूरी है। अपनी शिक्षा में, अपने नागरिकबोध में हमें देशभक्ति की भावना को तीव्रतम करना होगा। हम भारतीय हैं और यही भारतबोध हमें जागृत करना है। यही भारतबोध हमारा धर्म है और हमारा पंथ उसके बाद है। आज यह सवाल हर नागरिक से पूछने की जरूरत है कि पहले राष्ट्र है या उसका पंथ। हमें हर मन में यह स्थापित करना होगा कि पंथ या पूजा पद्धति हमेशा द्वितीयक है और हमारा राष्ट्र सर्वोच्च है। तभी हम इस आंधी को रोक पाएंगें। मैं ही श्रेष्ठ हूं, मेरा पंथ ही सर्वश्रेष्ठ है की भावना चलते यह स्थितियां पैदा हुयी हैं। अगर तमाम देशों के लोग यह भाव अपने नागरिकों में भर पाते हैं कि मेरी माटी,मेरा देश सबसे बड़ा है- कोई भी पंथ या विचारधारा उसके बाद है तो खून बहने से रोका जा सकता था। भारत इसमें एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। क्योंकि हमारी सांस्कृतिक परंपरा के सूत्र वसुधैव कुटुम्बकम् की बात कहते हैं। यह विचार आशा का विचार है क्योंकि यह सर्वे भवंतु सुखिनः की अवधारणा पर काम करने वाला समाज है। संकट यह है कि हम अपने विचार को भूल रहे हैं। इसलिए आतंकी ताकतें कामयाब होती हुई दिखती हैं और उन्होंने हमारे युवाओं के हाथ में कहीं बंदूक, कही एके-47 तो कहीं पत्थर पकड़ा रखे हैं। पंथ के नाम पर हो रहे कत्लेआम के अलावा विचारधारा के नाम पर भी खून बहा रहे कम्युनिस्ट या उग्र माओवादी इसी विचार का हिस्सा हैं। क्या किसी विचार और पंथ या समूह को लोगों की हत्याओं की आजादी दी जा सकती है? एक सभ्य समाज में रह रहे हम लोगों का मुकाबला कैसे असभ्यों से है, जो असहमति या विविध विचारों को फलने-फूलने तो दूर, उसे सांस लेने की भी अनुमति नहीं दे रहे हैं। ऐसे में हमें तय करना होगा कि हम पंथों की उस जड़ पर चोट करें जो खुद को ही श्रेष्ठ मानती है और इतना तक तो ठीक है पर उन्हें न मानने वालों को खत्म कर देने के स्वप्न देखती है। विविधता और बहुलता एक प्राकृतिक तत्व है। यह ऊपरवाले के द्वारा ही बनाई गयी है। इसे जो नहीं समझते वे जाहिल हैं। उन्हें न तो धर्म का पता है, न पंथ, न ही प्रकृति को वे समझते हैं। हमें एक ऐसे समाज के निर्माण की ओर बढ़ना होगा जो विविध विश्वासों, विविध विचारों और पंथों के बीच सहजता से जी सके। एक- दूसरे के विश्वासों का आदर और उसकी अस्मिता की रक्षा कर सके। यह होगा, सिर्फ माटी के प्रति अटूट प्यार से। सबसे बड़ा है मेरा देश, मेरा राष्ट्र सर्वोपरि है। उसके एक-एक व्यक्ति से मेरा रिश्ता है। इस माटी का ऋण मुझे चुकाना है। यह भाव आते ही आप दूसरे देश में अपने पंथ की लड़ाई लड़ने नहीं जाएंगें। अपनी सेना और अपनी फौज पर पत्थर नहीं फेंकेंगें, अपने लोगों का खून बहाते हुए आपके हाथ कांपेंगें, मुंबई की अमर जवान ज्योति पर हमला करने की आप सोच भी नहीं पाएंगें।

   हम सब एक माटी के पुत्र और एक सांस्कृतिक प्रवाह के उत्तराधिकारी हैं। मेरा राष्ट्र ही मेरा देवता है, मैं इस मादरेवतन के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ दूंगा। आज इसी भावना की जरूरत है। ऐसा हो पाया तो हम दुनिया में शांति और सद् भावना को स्थापित होते हुए देख पाएंगें। खून बहाते लोगों को भी इससे सबक मिलेगा। आज जरूरत इस बात की है कि हम यह भावना स्थापित करें कि देश प्रथम। देश सबसे ऊपर होगा तो हम कई संकटों से निजात पा सकेंगें। अपने-अपने देश को सर्वोच्च बनाएं और विश्वबंधुत्व का प्रसार करें। भारत के वैश्विक परिवार दर्शन को दुनिया में स्थापित करें। यही दर्शन विश्वमानवता को सुख-शांति का मार्ग दिखा सकता है। कटुता को समाप्त कर सकता है। विभिन्न पंथों के आपसी संघर्ष ने पूरी दुनिया में सिर्फ खून की नदियां बहाई हैं। क्योंकि ये पंथ विस्तारवाद की भावना से पीड़ित हैं। ये चाहते हैं कि पूरी दुनिया एक ही रंग में रंग जाए। जबकि हमें पता है कि यह असंभव है। दुनिया में विविध विचार, विश्वास और आस्थाएं साथ-साथ सांस लेती हैं, ऐसा होना भी चाहिए। बावजूद इसके इस सत्य को स्वीकार कर लेने में कुछ पंथों को मुश्किल क्यों है, यह समझना कठिन है। दुनिया में खून बहने से रोकने का अब एक ही तरीका है कि हम अपने ही विश्वास को श्रेष्ठतम मानना बंद करें और दूसरों को भी जगह और सम्मान दें। इससे दुनिया ज्यादा सुंदर, ज्यादा मानवीय और ज्यादा रहने लायक बनेगी।

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

माओवादी कायर हैं और सरकारें बहादुर!

माओवादी हमलों से रक्तरंजित छत्तीसगढ़ कब मुक्त होगा ?

-संजय द्विवेदी

  भारतीय राज्य की सहनशीलता की कहानियां देखनी हों तो माओवाद से उनके संघर्ष के तरीके से साफ पता चल जाएंगी। राजनीति कैसे किसी राज्य को भोथरा और अनिर्णय का शिकार बना सकती है, इसे बस्तर इलाके में हमारे लड़ाई लड़ने के तरीके से समझा जा सकता है। बस्तर के दरभा घाटी में शनिवार को हुआ माओवादी आतंकवादियों का हमला फिर सात लोगों की जान ले चुका है।
   दरभा में ये तीसरा हमला है। पहले हमले में कांग्रेस दिग्गजों महेंद्र कर्मा, विद्याचरण शुक्ल,  नंदकुमार पटेल सहित अनेक राजनीतिक कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्या की गयी थी। उसी घाटी में आज तीसरी बार खून बहा है। हमले की बर्बरता देखिए वे संजीवनी नाम की सरकारी एंबुलेंस को भी नहीं छोड़ते। किंतु हमारे राज्य के पास इन विषयों से जूझने की फुसरत कहां हैं। लोग पूछने लगे हैं आखिर कितने हमलों के बाद? कितनी  जानें गंवाने के बाद आप चेतेंगें? हमारे नेताओं की पहली और आखिरी प्रतिक्रिया यही होती है नक्सली कायर हैं और कायराना हरकत कर रहे हैं। उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। वाह चलिए मान लिया कि माओवादी और नक्सलवादी कायर हैं तो हमारा भारतीय राज्य अपनी बहादुरी के सबूत कब देगा? रोज भारत मां के लाल आदिवासी, आम नागरिक, साधारण सैनिक और सिपाही मौत के घाट उतारे जा रहे हैं और जेड सुरक्षा में घूमते हमारे राजपुरूषों के लिए बस्तर हाशिए का विषय है। राष्ट्रीय मीडिया पूरे दिन अमेठी में राहुल गांधी के नामांकन पर झूम रहा है और वहां लुटाए गए पांच सौ किलो गुलाब के फूलों पर निहाल है। इधर खून से नहाती हुयी इस घरती के पुत्रों की चिंता न राज्य को है न केंद्र है।
    1970 के बाद बस्तर के इस इलाके में घुस आए माओवादी एक समानांतर सरकार चला रहे हैं किंतु हमारी सरकारें और राजनीति जबानी जमाखर्च से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। वे संविधान, चुनाव और गणतंत्र सबका मजाक बनाते हुए खूनी खेल खेल रहे हैं और हम माओवाद से लड़ने की नीति भी तय नहीं कर पाए हैं। विकास के कामों में आने वाले धन में अपना हिस्सा या लेवी सुनिश्चित कर ये नरभक्षी यहां मौत और भय का व्यापार कर रहे हैं। यूं जैसे जंगल में मंगल हो। बिछती हुयी लाशें, किसी को आंदोलित नहीं करतीं। अखबार भी इन खबरों को छापते-छापते थक चुके हैं। बस्तर से सिर्फ बुरी सूचनाओं का इंतजार ही होता है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या हम और हमारी सरकारें माओवादी आतंकवाद से लड़ना चाहती हैं? क्या सीआरपीएफ या पुलिस के जवानों और भोले-भाले आदिवासी समाज की मौतों से उन्हें फर्क पड़ता है या राजकाज की जिम्मेदारियों के बोझ तले उन्हें इस हाशिए पर पड़े इलाकों की सुध ही नहीं है। माओवादी आतंकवाद इस समय अपने सबसे विकृत रूप में पहुंच चुका है। बस्तर की घरती पर पल रहा यहा नासूर और इसे जड़ से उखाड़ने के संकल्प नदारद हैं। राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में अभी यह बहस पूरी नहीं हो पाई है कि यह एक राजनीतिक-सामाजिक समस्या है या हमारे गणतंत्र के खिलाफ एक सुनियोजित आतंकवादी कार्रवाई। ऐसे में सरकारी स्तर पर भ्रम बहुत गहरा है।
    माओवादी इलाकों में तैनात सुरक्षा बलों को भी पता नहीं है कि उन्हें लड़ना है या नहीं। वे सिर्फ हमले झेल रहे हैं, शहीद हो रहे हैं। सीआरपीएफ और पुलिस के न जाने कितने जवानों और आम नागरिकों की लाशों पर बैठी यह राजनीति आज भी माओवाद से निपटने के तरीकों को लेकर भ्रम में है। यह दिमागी दिवालिया रायपुर से लेकर दिल्ली तक पसरा हुआ है। प्रधानमंत्री इसे एक बड़ी समस्या करार दे चुके हैं पर उससे लड़ने के हथियार, विकल्प और संकल्पों से हमारी राजनीतिक-प्रशासनिक शक्तियां खाली हैं। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या हम वास्तव में माओवादी आतंकवाद से लड़ना चाहते हैं या हम इस बहाने आ रही मदद, धन और विकास के कामों के लिए आ रहे विपुल धन का दुरूपयोग करने के इच्छुक हैं। यह राज्य और राजनीति की निर्ममता ही कही जाएगी कि संकटग्रस्त इलाके भी उनके लिए आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का वरदान बन जाते हैं। इन इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद आतंक कम नहीं हो रहा है, क्योंकि हमारे पास इनसे निपटने के लिए नीति नहीं हैं। क्या कारण है कि हमारी सरकारों ने कश्मीर घाटी को फौजों से पाट रखा है और बस्तर के नागरिकों को मरने के लिए छोड़ दिया गया है? जबकि यह बातें प्रमाणित हो चुकी हैं कि सभी आतंकी संगठनों के आपसी रिश्ते हैं चाहे वे इस्लामी जेहादी हों या बस्तर के क्रांतिकारी या नेपाल के अतिवादी। जंगलों तक पहुंचते हथियार,लेवी वसूली के माध्यम से खड़ा हुआ माओवादियों का आर्थिक तंत्र बताता है कि हमारी सरकारें इस खूनी खेल के खिलाफ सिर्फ जुबानी लड़ाई लड़ रही हैं। यह बातें तब और दुख देती हैं जब हमें यह पता चलता है हमारे राजनीतिक नेताओं, व्यापारियों, अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच एक आम सहमति से इस इलाके के आर्थिक क्रिया व्यापार आराम से चल रहे हैं। राजनीति के इस घिनौने स्वरूप पर कई बार चिंताएं जतायी जा चुकी हैं। यह मानने का कोई कारण नहीं है भारतीय राज्य पर माओवादी भारी हैं। किंतु आम लोग यह जानना जरूर चाहेंगें कि अगर भारतीय राज्य माओवादी आतंकवाद से जूझना चाहता है तो उसके हाथ किसने बांध रखे हैं?
    यह एक सिद्ध तथ्य है कि माओवादी या नक्सलवादी एक खास विचारधारा से प्रेरित होकर काम करने वाले लोग हैं। जिनका अंतिम लक्ष्य भारत के गणतंत्र को समाप्त कर 2050 तक भारतीय राजसत्ता पर कब्जा करना है। अपने इस लक्ष्य को वे छिपाते भी नहीं हैं और पशुपति से तिरूपति के लाल गलियारे की कहानियां भी हमें पता हैं। इस घोषित लक्ष्य के बावजूद उनके पाले पोसे बुद्धिजीवियों और मानवाधिकारवादियों ने ऐसा वातावरण बना रखा है, जैसे वे जनमुक्ति की लड़ाई लड़ रहे हों। भारतीय राज्य की भीरूता देखिए कि वह भी इस दुष्प्रचार का शिकार हो रहा है। वह भी अपने नागरिकों की जान की कीमत पर। किसी भी राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों को भयमुक्त होकर जीने और अपने सपनों को सच करने के अवसर दे। किंतु इस जनतंत्र में माओवादी और उनके समर्थक मौज में हैं और आम जनता पिस रही है। देश इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। आने वाले दिनों में एक नई सरकार दिल्ली में होगी। ऐसे में देश की जनता राजनीतिक दलों से यह ठोस आश्वासन भी चाहती है कि वे माओवादी के सवाल पर क्या सोचते हैं और कैसा रवैया अपनाएंगें। राजसत्ता हासिल करने के लिए दौड़ लगा रहे नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी समेत इस देश के हर राजनेता और राजनीतिक दल से देश के माओवादी आतंक से पीड़ित इलाकों की जनता ठोस आश्वासन चाहती है। शायद माओवादी आतंकवाद से मुक्ति ही इस देश की सबसे प्राथमिक और अहम मांग है, क्योंकि इस संघर्ष में हम अपने आदिवासी समाज के उन बंधुओं को नरभक्षियों के सामने झोंक चुके हैं जो प्रकृतिजीवी होने के नाते शांति और सद्भाव से रहना चाहते हैं।

(लेखक माओवाद के जानकार और राजनीतिक विश्वेषक हैं)

बुधवार, 12 मार्च 2014

इस लहूलुहान लोकतंत्र में!

माओवादी आतंक के सामने सरकारों के घुटनाटेक रवैये से बढ़ा खतरा
-संजय द्विवेदी


वो काली तारीख भूली नही हैं अभी, 25 मई,2013 की शाम जब जीरम घाटी खून से नहा उठी थी। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं सहित 30 लोगों की निर्मम हत्या के जख्म अभी भरे नहीं थे कि जीरम घाटी एक बार फिर खून से लथपथ है। 11 मार्च,2014 की तारीख फिर एक काली तारीख के रूप में दर्ज हो गयी, जहां 16 जवानों की निर्मम हत्या कर नक्सली नरभक्षी अपनी जनक्रांति का उत्सव मनाने जंगलों में लौट गए। आखिर ये सिलसिला कब रूकेगा।
    माओवादी आतंकवाद के सामने हमारी बेबसी की हकीकत क्या है? साथ ही एक सवाल यह भी क्या भारतीय राज्य माओवादियों से लड़ना चाहता है? वह इस समस्या का समाधान चाहता है? खून बहाती जमातों से शांति प्रवचन की भाषा, संवाद की कोशिशें तो ठीक हैं किंतु खून का बहना कैसे रूकेगा? किसके भरोसे आपने एक बड़े इलाके की जनता और वहां तैनात सुरक्षा बलों को छोड़ रखा है। माओवाद से लड़ने की जब हमारी कोई नीति ही नहीं है तो कम वेतन पर काम करने वाले सुरक्षाकर्मियों और पुलिसकर्मियों को हमने इन इलाकों में मरने के लिए क्यों छोड़ रखा है? उनकी गिरती लाशों से सरकारों को फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वे किन्हीं और कामों में लगी हैं। राजनीति और नेताओं  के पास पांच साल की ठेकेदारी के सपनों के अलावा सोचने के लिए वक्त कहां हैं? वे चुनाव से आगे की नहीं सोचते। चुनाव नक्सली जिता दें या बंग्लादेशी घुसपैठिए उन्हें फर्क नहीं पड़ता। ऐसे खतरनाक समय में भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ घोषित युद्ध लड़ रहे माओवादी विचारकों के प्रति सद्भावना रखने वाले विचारकों की भी कमी नहीं है। उन्हें बहता हुआ खून नहीं दिखता क्योंकि वे विचारधारा के बंधुआ हैं। उन्हें लाल होती जमीन के पक्ष में कुतर्क की आदत है। इसलिए वे नरसंहारों के जस्टीफाई करने से भी नहीं चूकते। जबकि यह बात गले से उतरने वाली नहीं है कि माओवादी जनता के साथ हैं। ताजा मामले में भी हुयी घटना विकास के कामों को रोकने के लिए अंजाम दी गयी है।
   माओवादी नहीं चाहते कि भारतीय राज्य, राजनीति, राजनीतिक दलों की उपस्थिति उनके इलाकों में हो। वे किसी भी तरह की सामाजिक-राजनीतिक और विकास की गतिविधि से डरते हैं। वे अंधेरा बनाने और अंधेरा बांटने में ही यकीन रखते हैं और सही मायने में भय के व्यापारी हैं। इसमें दो राय नहीं कि उन्होंने जंगलों में अपनी सक्रियता से एक बड़े समाज को भारतीय राज्य के विरूद्ध कर दिया है। जो बंदूकें लेकर हमारे सामने खड़े हैं। किंतु उनकी इस साजिश के खिलाफ हमारी विफलताओं का पाप कहीं बड़ा है। यह भारतीय लोकतंत्र की विफलता ही है कि माओवादी हमारे बीच इतने शक्तिवान होते जा रहे हैं। हम न तो उनके सामाजिक आधार को कम कर पा रहे हैं न ही भौगोलिक आधार को। यह बात चिंता में डालने वाली है कि जो माओवादी निरंतर भारतीय राज्य को चुनौती देते हुए हमले कर रहे हैं उसके प्रतिकार के लिए हम क्या कर रहे हैं? अकेले छत्तीसगढ़ को लें तो वे 6 अप्रैल,2010 को दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 75 जवानों सहित 76 लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं। 25 मई,2013 को उनका दुस्साहस देखिए वे कांग्रेस के दिग्गज नेताओं विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल, उदय मुद्लियार सहित 30 लोगों की घेरकर निर्मम हत्या कर देते हैं और उसके बाद भी हम चेतते नहीं हैं। देश के 9 राज्य और 88 जिले आज माओवादी हिंसा से प्रभावित हैं। वर्ष 2013 में 1136 माओवादी आतंक की घटनाएं हो चुकी हैं। जाहिर तौर पर हमारी सरकारों का रवैया घुटनाटेक ही रहा है। इससे माओवादियों के मनोबल में वृद्धि हुयी है और वे ज्यादा आक्रामक तरीके से सामने आ रहे हैं। यह भी गजब है राजनीति ऐसे तत्वों और अभियानों से लड़ने के बजाए उनको पाल रही है। माओवादियों को सूचना, हथियार और मदद देने वालों में राजनीतिक दलों के लोग शामिल रहे हैं। कई ने तो चुनावों में उनका इस्तेमाल भी किया है। किंतु सवाल यह उठता है जो काम हम पंजाब में कर चुके हैं। आंध्र में कर चुके हैं, पश्चिम बंगाल में ममता कर चुकी हैं, उसे करने में छत्तीसगढ़ में परेशानी क्या है। क्या कारण है सशस्त्र बलों की क्षमता बढ़ाने पर हमारा जोर नहीं है। अब तक सैनिक मरते थे तो सरकारें लापरवाह दिखती थीं। अब जब हमारे बड़े राजनेताओं तक भी माओवादी आतंक पहुंच रहा है, तब राजनीति की निष्क्रियता आशंकित करती है। भारतीय राज्य की दिशाहीनता और कायरता ने ये दृश्य रचे हैं। इसे कहने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए कि जब कोई राज्य अपने लोगों की रक्षा न कर सके तो उसके होने के मायने क्या हैं।

   आवश्यकता इस बात की है कि हम कैसे भी हिंसक गतिविधियों को रोकें और अपने लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाएं। जनजातीय समाज इस पूरे युद्ध का सबसे बड़ा शिकार है। वे दोनों ओर से शोषण के शिकार हो रहे हैं। सही मायने में यह भारतीय लोकतंत्र की विफलता है कि हमने प्रकृति से आच्छादित सुंदर क्षेत्रों को रणक्षेत्र बना रखा है। ये इलाके जहां नीरव शांति, प्रेम, सहजता और सरल संस्कृति के प्रतीक थे आज अविश्वास,छल और मरने-मारने के खेल का हिस्सा बन गए हैं। सच तो यह है कि हमारी सरकारें माओवादी आतंकवाद के प्रति गंभीर नहीं है वे घटना होने के बयानबाजी के बाद फिर अपने नित्यकर्मों में लग जाती हैं। सही मायने में वे आतंकवाद से लड़ना नहीं चाहती हैं। उनमें इतना आत्मविश्वास नहीं बचा है कि वे देश के सामने उपस्थित ज्वलंत सवालों पर बात कर सकें। सरकारों का खुफिया तंत्र ध्वस्त है और पुलिस बल हताश। ऐसे में बस्तर जैसे इलाके एक खामोश मौत मर रहे हैं। यहां दिन-प्रतिदिन कठिन होती जिंदगी बताती है, ये युद्ध रूकने के आसार नहीं हैं। हिंसा और आतंक के खिलाफ खड़े हुए सलवा जूडुम जैसे आंदोलन भी अब खामोश हैं। माओवादी आतंक के खिलाफ एक प्रखर आवाज महेंद्र कर्मा अब जीवित नहीं हैं। माओवाद के खिलाफ इस इलाके में बोलना गुनाह है। कहीं कोई भी दादा लोगों (माओवादियों) का आदमी हो सकता है। पुलिस के काम करने के अपने अजीब तरीके हैं जिसमें निर्दोष ही गिरफ्त में आता है। न जाने कितने निर्दोष माओवादियों के नाम पर जेलों में हैं लेकिन माओवादी आंदोलन बढ़ रहा है क्योंकि सरकारें मान चुकी हैं यह युद्ध जीता नहीं जा सकता है। किंतु इस न जीते जाने युद्ध के चलने तक सरकार कितनी लाशों, कितनी मौतों, कितने जन-धन और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान के बाद मैदान में उतरेगी, कहना कठिन है।