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सोमवार, 14 मार्च 2016

अनथक यात्री की कहानी बयां करती किताब

       -लोकेन्द्र सिंह
 

  भारतीय राजनीति के 'अनथक यात्री' लखीराम अग्रवाल पर किसी पुस्तक का आना सुखद घटना है। सुखद इसलिए है, क्योंकि लखीरामजी जैसे राजपुरुषों की प्रेरक कथाएं ही आज हमें राजनीति के निर्लज्ज विमर्श से उबार सकती हैं। दलबंदी के गहराते दलदल में फंसकर इधर-उधर हाथ-पैर मार रहे राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं को सीख देने के लिए लखीरामजी जैसे नेताओं के चरित्र को सामने लाना बेहद जरूरी है। विचार के लिए किस स्तर का समर्पण चाहिए और विपरीत परिस्थितियों में भी राजनीतिक शुचिता कैसे बनाए रखी जाती है, यह सब सिखाने के लिए लखीरामजी सरीखे व्यक्तित्वों को अतीत से खींचकर वर्तमान में लाना ही चाहिए।
    लखीराम अग्रवाल सच्चे अर्थों में राजपुरुष थे। उन्होंने राजनीति का यथेष्ठ उपयोग समाजसेवा के लिए किया। शुचिता की राजनीति की नई लकीर खींच दी। शिखर पर पहुंचकर भी साधारण बने रहे। खुद को महत्वपूर्ण मानकर असामान्य व्यवहार कभी नहीं किया। वे अंत तक खुद को सच्चे अर्थों में जनप्रतिनिधि साबित करते रहे। ऐसे व्यक्तित्व की कहानियां बयां करती है-'लक्ष्यनिष्ठ लखीराम'। श्री लखीराम अग्रवाल स्मृति ग्रंथ 'लक्ष्यनिष्ठ लखीराम' का संपादन राजनीतिक विचारक संजय द्विवेदी ने किया है। श्री द्विवेदी ने अपना महत्वपूर्ण समय छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को दिया है। उन्होंने स्वदेश, दैनिक भास्कर, हरिभूमि और जी-24 घंटे संपादक रहते हुए छत्तीसगढ़ में राजनीतिक हलचलों को बेहद करीब से देखा है। लखीरामजी के प्रयासों से जब छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की जड़ें मजबूत हो रही थीं, तब इस पुस्तक के संपादक श्री द्विवेदी वहीं थे। इस संदर्भ में पुस्तक में शामिल उनके लेख 'भाजपा की जड़ें जमाने वाला नायक' और 'विचारधारा की राजनीति का सिपाही' को देख लेना उचित होगा। उन्होंने लखीरामजी के मिशन-विजन को नजदीक से देखा-समझा है। इसलिए यह पुस्तक अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि, इसमें उन सब बातों, घटनाओं और विचारों का समावेश निश्चिततौर पर है, जिनसे लखीरामजी की वास्तविक तस्वीर उभरकर सबके सामने आएगी।
      मौटे तौर पर पुस्तक में लखीरामजी से संबंधित सामग्री को तीन स्तरों में रखा गया है। परिचय और छवियों में लखीरामजी सहित इस स्मृतिग्रंथ के पांच भाग हो जाते हैं। पहला है मूल्यांकन, जिसमें पत्रकारों, संपादकों, शिक्षाविदों और लेखकों के अनुभव शामिल हैं। पुस्तक के सलाहकार संपादक बेनी प्रसाद गुप्ता लिखते हैं कि लखीरामजी की सूझ-बूझ के कारण बिना किसी हिंसक आंदोलन, धरना-प्रदर्शन या शोर-शराबे के छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हो गया। वरना हम देखते हैं कि राज्यों के निर्माण में कितना संघर्ष होता है। लखीरामजी जैसी राजनीतिक दूरदर्शिता कम ही देखने को मिलती है। सबको भरोसे में लेकर काम करना उनका विशेष गुण था। इसी खण्ड में वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर लखीरामजी के समाचार-पत्र प्रकाशन और प्रबंध के कौशल का जिक्र करते हैं। श्री नैयर अग्रवाल परिवार के दैनिक समाचार पत्र 'लोकस्वर' के संस्थापक संपादक रहे हैं। वे एक घटना के माध्यम से बताते हैं कि कभी भी लखीरामजी ने पत्रकारिता को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं किया। न कभी संपादक पर दबाव डाला। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने भी सहृदय संगठक के पत्रकारीय विशेषता को रेखांकित किया है। यह बहुत कम लोगों को पता होगा कि लखीरामजी ने नागपुर टाइम्स और युगधर्म जैसे समाचार-पत्रों में संवाददाता के रूप में काम किया था। लखीरामजी सिर्फ एक राजनेता नहीं थे बल्कि वे 'राजनीति के ओल्ड स्कूल के नेता' थे। इंडिया टुडे के संपादक रहे श्री जगदीश उपासने लिखते हैं कि लखीरामजी उन नेताओं में थे जो पार्टी-संगठन को प्रमुखता और उसके लिए समयानुकूल कार्यकर्ता तथा धन की व्यवस्था करने की परम्परागत राजनीतिक शैली में ढले थे। संगठन के पद पर कार्यकर्ता का चयन पार्टी को बढ़ाने की उसकी योग्यता के आधार पर तो होता ही था, वे यह भी देखते कि उस कार्यकर्ता की नियुक्ति से सांगठनिक संतुलन भी न बिगड़े। ऐसे में कई बार तो वे विरोध पर भी उतर आते थे। लेकिन, लखीरामजी का कौशल ऐसा था कि नाराज कार्यकर्ता उनके साथ एक बार लम्बी बातचीत के बाद फिर से पुराने उत्साह से काम पर लग जाता था। हरेक कार्यकर्ता उनके लिए अपने परिवार के सदस्य की तरह था।
      पुस्तक के दूसरे हिस्से 'राजनेताओं की स्मृतियां' में अनेक रोचक प्रसंग हैं। इस खण्ड में उन नेताओं के लेख शामिल हैं, जिन्होंने उनके राजनीतिक सहयात्री रहे। उन नेताओं ने भी अपनी यादें साझा की हैं, जिन्होंने लखीरामजी के सान्निध्य में रहकर पत्रकारिता का ककहरा सीखा है। एक सर्वप्रिय नेता के संबंध में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, अविभाज्य मध्यप्रदेश प्रभावशाली नेता कैलाश जोशी, मोतीलाल वोरा, स्व. विद्याचरण शुक्ल, कैलाश नारायण सारंग सहित अन्य नेताओं के विचारों का एक ही जगह संग्रह महत्वपूर्ण है। इस खण्ड में कैलाश जोशी और लखीराम अग्रवाल का एक-दूसरे के खिलाफ संगठन का चुनाव लडऩे का अविस्मरणीय और शिक्षाप्रद प्रसंग भी शामिल है। महज 21 वर्ष की युवावस्था में नगरपालिका में पार्षद चुना जाना। खरसिया नगरपालिका का अध्यक्ष चुने जाने का प्रसंग। भाजपा में विभिन्न दायित्व मिलने के किस्से और खरसिया के सबसे चर्चित उपचुनाव को समझने का मौका यह पुस्तक उपलब्ध कराती है। खरसिया उपचुनाव में लखीरामजी ने मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के खिलाफ दिलीप सिंह जूदेव को मैदान में उतारा था। चुनाव की ऐसी रणनीति उन्होंने बनाई थी कि कद्दावर नेता अर्जुन सिंह को पसीना आ गया था। हालांकि श्री जूदेव चुनाव हार गए। लेकिन, लखीरामजी के चुनावी प्रबंधन के कारण यह चुनाव ऐतिहासिक बन गया।
   बहरहाल, पुस्तक के तीसरे अध्याय में 'परिजनों की स्मृतियाँ' शामिल हैं। यह एक तरह से लखीरामजी के प्रति उनके अपनों के श्रद्धासुमन हैं। इस अध्याय में लखीरामजी के अनुज रामचन्द्र अग्रवाल, श्याम अग्रवाल, उनके बड़े बेटे बृजमोहन अग्रवाल, लखीराम अग्रवाल, सजन अग्रवाल और पुत्रवधु शशि अग्रवाल ने अपनी स्मृतियों को सबके सामने प्रस्तुत किया है। लखीरामजी का पारिवारिक जीवन भी कम प्रेरणास्पद नहीं है। उन्होंने उदाहरण प्रस्तुत किया है कि किस तरह पूरी ईमानदारी के साथ राजनीति और परिवार दोनों का संचालन किया जाता है। उनके लम्बे सार्वजनिक जीवन में कोई राजनीतिक कलंक नहीं है। राजनीति में अपनी पार्टी को और व्यक्तिगत जीवन में अपने परिवार को मजबूत करने के लिए लखीरामजी ने अथक परिश्रम किया है। जैसा कि शुरुआत में ही लिखा है कि ऐसे धवल राजनेताओं का चरित्र सबके सामने आना ही चाहिए। ताकि अपने मार्ग से भटक रही राजनीति इन्हें देख-सुन और स्मरण कर शायद संभल सके। 275 पृष्ठों की पुस्तक के अंतिम पन्नों पर ध्येयनिष्ठ राजनेता और समाजसेवी लखीराम अग्रवाल से संबंधित महत्वपूर्ण चित्रों का संग्रह है। इन चित्रों से होकर गुजरना भी महत्वपूर्ण होगा।
पुस्तक                        :          लक्ष्यनिष्ठ लखीराम
संपादक                       :         संजय द्विवेदी
प्रकाशक          :          मीडिया विमर्श
                     47, शिवा रॉयल पार्क, साज री ढाणी (विलेज रिसोर्ट) के पास,
                     सलैया, आकृति इकोसिटी से आगे, भोपाल - 462042
                      फोन : 9893598888

मूल्य             :         200 रुपये

बुधवार, 27 जुलाई 2011

विचार को समर्पित एक जीवनः लखीराम अग्रवाल

छत्तीसगढ़ जैसे इलाके में भाजपा की जड़ें जमाने वाले नायक की याद

-संजय द्विवेदी

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लखीराम अग्रवाल को याद करना सही मायने में राजनीति की उस परंपरा का स्मरण है जो आज के समय में दुर्लभ हो गयी है। वे सही मायने में हमारे समय के एक ऐसे नायक हैं जिसने अपने मन, वाणी और कर्म से जिस विचारधारा का साथ किया , उसे ताजिंदगी निभाया। यह प्रतिबद्धता भी आज के युग में साधारण नहीं है।

लखीराम अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ के एक छोटे से नगर खरसिया से जो यात्रा शुरू की वह उन्हें मप्र भाजपा के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद तक ले गयी। वे राज्यसभा के दो बार सदस्य भी रहे। लेकिन ये बातें बहुत मायने नहीं रखतीं। मायने रखते हैं वे संदर्भ और उनकी जीवन शैली जो उन्होंने पार्टी का काम करते समय लोगों को सिखायी। मप्र और छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी के लिए उनका योगदान किसी से छिपा नहीं है। वे अंततः एक कार्यकर्ता थे और उनका दिल संगठन के लिए ही धड़कता था। भाजपा दिग्गज कुशाभाऊ ठाकरे से उनकी मुलाकात ने सही मायने में लखीराम अग्रवाल को पूरी तरह रूपांतरित कर दिया। वे संगठन को जीने लगे। खरसिया नगर पालिका के अध्यक्ष के रूप में प्रारंभ हुयी उनकी राजनीतिक यात्रा में अनेक ऐसे पड़ाव हैं जो प्रेरित करते हैं और प्रोत्साहित करते हैं। वे यह भी बताते हैं कि कैसे एक साधारण परिवार का व्यक्ति भी एक असाधारण शख्सियत बन सकता है। लखीराम अग्रवाल के हिस्से बड़ी राजनीतिक सफलताएं नहीं हैं, खरसिया से वे विधानसभा का चुनाव नहीं जीत सके। उनका इलाका कांग्रेस का एक ऐसा गढ़ है जहां आजतक भाजपा का कमल नहीं खिल सका। किंतु अपनी इस कमजोरी को उन्होंने अपनी शक्ति बना लिया। वे छत्तीसगढ़ में कमल खिलाने के प्रयासों में लग गए। आज पूरे राज्य में कार्यकर्ताओं का पूरा तंत्र उनकी प्रेरणा से ही काम कर रहा है। वे कार्यकर्ता निर्माण की प्रक्रिया को समझते थे। उनके निर्माण और उनके व्यवस्थापन की चिंता करते थे। संगठन की यह समझ ही उन्हें अपने समकालीनों के बीच उंचाई देती है।

असाधारण बनने का कथाः आप देखें तो लखीराम अग्रवाल के पास ऐसा कुछ नहीं था जिसके आधार पर वे महत्वपूर्ण बनने की यात्रा शुरू कर सकें। खरसिया एक ऐसा इलाका था, जहां भाजपा का कोई आधार नहीं है। एक छोटा नगर जहां की राजनीतिक अहमियत भी बहुत नहीं है। इसके साथ ही लखीराम जी किसी विषय के गंभीर जानकार या अध्येता भी नहीं थे। किंतु उनमें संगठन शास्त्र की गहरी समझ थी। अपने निरंतर प्रवास और श्रम से उन्होंने सारी बाधाओं को पार किया। जशपुर के कुमार साहब दिलीप सिंह जूदेव, कवर्धा के एक डाक्टर रमन सिंह से लेकर तपकरा के एक नौजवान आदिवासी नेता नंदकुमार साय से लेकर आज की पीढ़ी के राजेश मूणत जैसे लोगों को साथ लेने और खड़ा करने का माद्दा उनमें था। छत्तीसगढ़ के हर शहर और क्षेत्र में उन्होंने ऐसे लोगों को खड़ा किया जो आज पार्टी की कमान संभाले हुए हैं। उनके इस चयन में शायद कुछ लोगों के साथ अन्याय भी हुआ हो। किंतु संगठन की समझ रखने वाले जानते हैं कि जब आप पद पर होते हैं तो कुछ फैसले लेते हैं और वह फैसला किसी के पक्ष में और कुछ के खिलाफ भी होता है। वे पूरी जिंदगी शायद इसलिए कार्यकर्ताओं से घिरे रहे और सर्वाधिक आलोचनाओं के शिकार भी हुए। आप मानिए कि उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। आलोचनाओं से अविचल रहकर उन्होंने सिर्फ बेहतर परिणाम दिए। खरसिया के उस उपचुनाव को याद कीजिए जिसमें कुमार दिलीप सिंह जूदेव को मप्र के कद्दावर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के खिलाफ मैदान में उतारा गया था। वह उपचुनाव हारकर भी भाजपा ने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में जो आत्मविश्वास अर्जित किया, वह एक इतिहास है। इसके बाद भाजपा ने छत्तीसगढ़ में पीछे मुड़कर नहीं देखा।

आतंक के बीच सरकार के सपनेः छत्तीसगढ़ राज्य का गठन इस क्षेत्र के निवासियों का एक बड़ा सपना था। इसमें दिल्ली में भाजपा की सरकार बनना एक सुखद संयोग साबित हुआ। यह भी संयोग ही था कि दिल्ली में राज्यसभा के सदस्य के नाते ही नहीं, एक संगठनकर्ता के नाते लखीराम अग्रवाल अपनी एक साख पहचान बना चुके थे। उनके प्रभाव और क्षमताओं का पूरा दल लोहा मानने लगा था। राज्य गठन को लेकर उनकी पहल का भी एक खास असर था कि तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के लिए सहमत हो गए। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ का अपना भूगोल प्राप्त हो गया। राज्य में कांग्रेस विधायकों की संख्या के आधार पर अजीत जोगी राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बने। उनकी कार्यशैली से भाजपा का संगठन हिल गया। भाजपा के 12 विधायकों का दलबदल करवाकर जोगी ने भाजपा की कमर तोड़ दी। ऐसे में संगठन के मुखिया के नाते लखीराम अग्रवाल के संयम, धैर्य और रणनीति ने भाजपा को सत्ता में लाने के लिए आधार तैयार किया। सरकारी आतंक के बीच भाजपा की वापसी साधारण नहीं थी। किंतु लखीराम अग्रवाल, डा. रमन सिंह, दिलीप सिंह जूदेव, नंदकुमार साय, रमेश बैस, बलीराम कश्यप, बृजमोहन अग्रवाल, वीरेंद्र पाण्डेय, बनवारीलाल अग्रवाल,प्रेमप्रकाश पाण्डेय जैसे नेताओं की एकजुटता और सतत श्रम ने भाजपा को अपनी सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।यह विजय साधारण विजय नहीं थी। ऐसे कठिन समय में संगठन में प्राण फूंकने और उसे नया आत्मविश्वास देने के लिए लखीराम अग्रवाल और तत्कालीन संगठन मंत्री सौदान सिंह के योगदान के बिसराया नहीं जा सकता। यह वही समय था जब लोग राज्य में भाजपा के समाप्त होने की घोषणाएं कर रहे थे और भाजपा का मर्सिया पढ़ रहे थे। किंतु समय ने करवट ली और भाजपा ने डा. रमन सिंह के नेतृत्व में अपनी सरकार बनायी।

याद करना है जरूरीः लखीराम अग्रवाल सही मायने में राज्य भाजपा के अभिभावक होने के साथ छत्तीसगढ़ में एक नैतिक उपस्थिति भी थे। उनके पास जाकर किसी भी स्तर का कार्यकर्ता अपनी बात कह सकता था। वे परिवार के एक ऐसे मुखिया थे जिनके पास सबकी सुनने का धैर्य और सबको सुनाने का साहस था। वे अपने कद और परिवार की मुखिया की हैसियत से किसी को भी कोई आदेश दे सकने की स्थिति में थे। उनकी बात प्रायः टाली नहीं जाती थी। वे एक ऐसा कंधा थे जिसपर आप अपनी पीड़ाएं उड़ेल सकते थे। असहमतियों के बावजूद वे सबके साथ संवाद करने के लिए दरवाजा खुला रखते थे। रायपुर से दिल्ली तक उन्होंने जो रिश्ते बनाए उनमें कृत्रिमता और बनावट नहीं थी। वे हमेशा अपने जीवन और कर्म से केवल और केवल पार्टी की सोचते रहे। जीवन के अंतिम दिनों में उन पर पुत्रमोह जैसे आरोप चस्पा करने के प्रयास हुए जो बेहद बचकानी सोच ही दिखते हैं। उनके पुत्र अमर अग्रवाल ने अपने गृहनगर खरसिया और रायगढ़ को छोड़कर छत्तीसगढ़ के एक अलग शहर बिलासपुर को अपना कार्यक्षेत्र बनाया,युवा मोर्चा के कार्यकर्ता के नाते काम प्रारंभ किया और वहां कांग्रेस की परंपरागत सीट पर चुनाव जीतकर अपनी जगह बनाई।आज वे छत्तीसगढ़ के सक्षम मंत्रियों में गिने जाते हैं। उनकी क्षमताओं पर किसी को संदेह नहीं है।ऐसे कठिन समय में जब राजनीति में मर्यादाविहीन आचरण के चिन्ह आम हैं। हर तरह का पतन राजनीतिक क्षेत्र में दिख रहा है। लखीराम अग्रवाल जैसे नायक की याद हमें प्रेरित करती है और बताती है कि कैसे व्यापार में रहकर भी शुचिता बनाए रखी जा सकती है। गृहस्थ होकर भी किस तरह से समाज के काम पूरा समय देकर किए जा सकते हैं। लखीराम का अपराध शायद सिर्फ यही था कि वे एक व्यापारी परिवार में पैदा हुए। क्या सिर्फ इस नाते समाज के लिए किए गए उनके योगदान को नजरंदाज कर दिया जाना चाहिए ? क्या आप इसे साहस नहीं मानेंगें कि एक व्यापारी किस तरह मप्र के सबसे कद्दावर मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह के खिलाप अपने क्षेत्र में व्यूह रचना तैयार करता है और जिसके परिणामों की चिंता नहीं करता? अजीत जोगी जैसे ताकतवर मुख्यमंत्री के सामने तनकर खड़ा होता है और अपने दल की सरकार की स्थापना के लिए पूरा जोर लगा देता है। आज जब परिवार जैसी पार्टी को, कंपनी की तरह चलाने की कोशिशें हो रही हैं क्या तब भी आपको लखीराम अग्रवाल की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक नहीं लगती?