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गुरुवार, 6 अगस्त 2026

राजेंद्र माथुर- विचारों की पत्रकारिता के नायक

 जयंती ( 7 अगस्त) पर विशेष-

-प्रो.संजय द्विवेदी



  राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण लगने लगते हैं। उन्होंने जो कुछ पाया, एकाएक नहीं पाया; संघर्ष से पाया, नियमित लेखन से पाया और अपनी रचनाशीलता से पाया। इसी संघर्ष की वृत्ति ने उन्हें असाधारण पत्रकार और संपादक बना दिया। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात से तय होता है कि आखिर उनके लेखन में विचारों की गहराई कितनी है। अपने अखबार को ऊंचाइयों पर ले जाने का उनका संकल्प कितना गहरा है और हमारे समय के प्रश्नों के जवाब तलाशने तथा नए सवाल खड़े करने की कितनी प्रश्नाकुलता संबंधित व्यक्ति में है। राजेंद्र माथुर का संपादकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात की गवाही देता है कि वे असहज प्रश्नों से मुंह नहीं चुराते, बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं। वे सवालों से जूझते हैं और उनके सही एवं प्रासंगिक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं।

     वे सही मायने में पत्रकारिता में विचारों के एक ऐसे प्रतीक पुरुष बनकर सामने आए, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से एक बौद्धिक उत्तेजना का सृजन किया और हिंदी को एक ऐसी भाषा तथा विराट अनुभव-संसार दिया, जिसकी प्रतीक्षा में वह सालो से खड़ी थी। इस मायने में राजेंद्र माथुर की उपस्थिति अपने समय में एक कद्दावर पत्रकार-संपादक की मौजूदगी है। वरिष्ठ पत्रकार श्री सूर्यकांत बाली के मुताबिक,माथुर साहब जैसा बोलते थे, वैसा ही लिखते थे। वे धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत बोलते थे, तो धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत लिखते भी थे। श्री बाली आगे लिखते हैं कि वह एक ऐसा संपादक है, जिसके मन-समुद्र में विचारों की लहरें एक के बाद एक लगातार, अनवरत उठती हैं; कोई लहर किसी दूसरी लहर को नष्ट कर आगे बढ़ने के अहंकार का शिकार नहीं होती। और पूर्णिमा की कोई ऐसी भली रात हर महीने आती है, जब ये लहरें किसी विराट-सर्वोच्च को छू लेने को बेताब हो उठती हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय एवं संपादकीय व्यक्तित्व में एक बौद्धिक आकर्षण दिखता है। उनके लेखन में भारत-जिज्ञासा, भारत-अनुराग और भारत-स्वप्न पूरी समग्रता में प्रकट होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है कि  राजेंद्र माथुर हिंदी पत्रकारिता के उस संधिकाल में संपादक के रूप में सामने आए थे, जब हिंदी अखबार अपने पुरखों के पुण्य के संचित कोष को बढ़ा नहीं पा रहे थे। यह जमा-पूंजी इतनी नहीं थी कि हिंदी की पत्र-पत्रिकाएं व्यावसायिकता की बढ़ती हुई चुनौती को स्वीकार करते हुए इसे बाजार के दबाव से बचा सकें। राजेंद्र माथुर में बौद्धिकता और सच्चरित्रता का असाधारण संगम था, इसीलिए वे हिंदी पत्रकारिता में शिखर स्थान पा सके। वे असाधारण शैलीकार थे। अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक होने के बावजूद उनकी हिंदी लेखन शैली बिंब-प्रधान थी। उनके मुहावरे अपने होते थे। उनमें अभिव्यंजना की अद्भुत शक्ति थी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में वे एक शैलीकार के रूप में याद किए जाएंगे।

  राजेंद्र माथुर एक श्रेष्ठ संपादक थे। उनकी उपस्थिति ही 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' को एक ऐसा समाचार पत्र बनाने में सफल हुई, जिस पर हिंदी पत्रकारिता को नाज है। 'नवभारत टाइम्स' में श्री माथुर के सहयोगी रहे श्री विष्णु खरे ने लिखा है कि, राजेंद्र माथुर महान संपादक होने का अभिनय करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते थे। दरअसल, लिबास से लेकर बोलचाल तक उनकी कोई बनावटी शैली या लहजा नहीं था; वे अपने मामूलीकरण में विश्वास करते थे, वैशिष्ट्य में नहीं। उनकी संपादकीय आदेशों या हुक्मों से नहीं, एक गुणात्मक तथा नैतिक विकिरण से चलती थी। वे एक आणविक ताप या विद्युत संयंत्र की तरह बेहद चुपचाप काम करते थे, जो अपने प्रभाव से लगभग उदासीन रहता है। लेकिन वे बेहद परिश्रमी संपादक थे और शायद एक या दो उपसंपादकों की मदद से एक दस पेज का अखबार रोज निकाल सकते थे। वे अजातशत्रु और धर्मराज युधिष्ठिर जैसे थे, लेकिन जरूरत पड़ने पर वज्र की तरह कठोर भी हो सकते थे। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व बेहद प्रेरक था। आज की पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में घुस आई तमाम बुराइयों से उनका व्यक्तित्व एकदम अलग था। संपादक की जैसी शास्त्रीय परिभाषाएं बताई गई हैं, श्री माथुर उन पर पूरी तरह फिट बैठते हैं। उनका व्यक्तित्व बौद्धिक ऊंचाइयां लिए हुए था। अपनी पत्रकारिता को कुछ पाने और लाभ लेने की सीढ़ी बनाना उन्हें नहीं आता था।

     उनके समकक्ष पत्रकारों की राय में, जिस समय वे दिल्ली में 'नवभारत टाइम्स' जैसे बड़े अखबार के संपादक थे, वे सत्ता के लाभ उठा सकते थे। आज की पत्रकारिता में जिस तरह पत्रकार एवं संपादक सत्ता से लाभ लेकर मंत्री से लेकर राज्यसभा की सीटें ले रहे हैं, श्री माथुर भी ऐसे प्रलोभनों के पास जा सकते थे। किंतु उन्होंने तमाम चर्चाओं के बीच इससे खुद को बचाया। पत्रकार विष्णु खरे अपने लेख में इस बात की पुष्टि भी करते हैं। सही मायने में राजेंद्र माथुर एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने अपने पत्रकारीय व्यक्तित्व को वह ऊंचाई दी जिसके लिए पीढ़ियां उन्हें याद कर रही हैं। विष्णु खरे उनके इन्हीं व्यक्तित्व की खूबियों को रेखांकित करते हुए कहते हैं, राजेंद्र माथुर का जीवन और उनके कार्य एक खुली पुस्तक की तरह थे। कानाफूसी, चुगलखोरी, षड्यंत्र, झूठ-फरेब, मक्कारी उनके स्वभाव में थे ही नहीं। वे किसी चीज को गोपनीय रखना ही नहीं चाहते थे और अक्सर कई ऐसी सूचनाएं निहायत मामूली ढंग से देते थे, जिन पर दूसरे लोग कारोबार कर लेते हैं। इसलिए उनसे बातें करना बेहद असुविधाजनक स्थितियां पैदा कर देता, क्योंकि वे कभी भी किसी के द्वारा कही गई बात को जगजाहिर कर देते थे और वह व्यक्ति अपना मुंह छिपाता फिरता था। उनकी स्मरण शक्ति अद्वितीय थी और भारतीय तथा विश्व राजनीति में सतही और चालू दिलचस्पी न रखने के बावजूद राष्ट्रीय व विदेशी घटनाक्रम तथा इतिहास में उनकी पैठ आश्चर्यजनक थी। एक सच्चे पत्रकार की तरह उन्हें जमाने भर के विषयों के बारे में जानकारी थी और वे घंटों अपने प्रबुद्ध श्रोताओं को मंत्रमुग्ध रख सकते थे। 'नवभारत टाइम्स' के प्रधान संपादक बन जाने के बाद वे भविष्य में क्या बनेंगे, इसको लेकर उनके मित्रों में दिलचस्प अटकलबाजियां होती थीं और बात राष्ट्रसंघ और मंत्रिमंडल तक पहुंचती थी। लेकिन अपने अंतिम दिनों तक राजेंद्र माथुर 'एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया' जैसी पेशेवर संस्था के काम में ही स्वयं को होमते रहे।

    उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी हिंदी पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे संपादक थे, जो लगातार यह सोचते रहे कि हिंदी पत्रकारिता का विचार-दारिद्र्य कैसे दूर किया जाए और कैसे हिंदी में एक संपूर्ण अखबार निकले तथा उसे व्यापक लोकस्वीकृति भी मिल सके। 'नवभारत टाइम्स' के कार्यकारी संपादक रहे स्व. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उनकी इन चिंताओं को निकटता से देखा था। वे लिखते हैं, माथुर साहब का गहन इतिहास-बोध, शुद्ध श्रद्धा और उससे उत्पन्न गरिमामय अतीत की मरीचिका पर आधारित हिंदी पत्रकारिता की कमजोर आधारभूमि के बारे में उन्हें बार-बार सचेत करता रहता था। वे भूतकाल के वायवीय स्वर्णिम अतीत में जीने वाले नहीं थे। वे स्वप्नदर्शी थे और अपने सपनों की उदात्तता के साथ उन्होंने कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य उन्हें बार-बार विचलित तो कर देता था, लेकिन एक कुशल अभियात्री की तरह उन्होंने अपने जहाज की दिशा को क्षणिक प्रलोभनों के लिए किसी अन्य रास्ते पर डालने के बारे में क्षणिक विचार भी नहीं किया।

     उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की विशिष्टता यह भी है कि वे अंग्रेजी के प्राध्यापक और विद्वान होने के बावजूद अपने लेखन की भाषा के नाते हिंदी को चुनते हैं। हिंदी उनकी सांसों में बसती थी। हिंदी पत्रकारिता को नई जमीन तोड़ने के लिए प्रेरित करने और हिंदी लेखकों एवं पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी का निर्माण करने का काम श्री माथुर जीवन भर करते रहे। इंदौर से लेकर दिल्ली तक उनकी पूरी यात्रा में एक भारत-प्रेम, भारत-बोध और हिंदी-प्रेम साफ नजर आता है। शायद इसी के चलते वे देश की पत्रकारिता को एक नई और सही दिशा देने में सफल रहे। श्री मधुसूदन आनंद लिखते हैं, माथुर साहब ने अंग्रेजी में एम.ए. किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ अंग्रेजी पत्रकारों को भी विस्मय में डालती थी। लेकिन उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को चुना, तो शायद इसलिए कि वे अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। अगर यह कहा जाए कि हिंदी पत्रकारों की एक पीढ़ी माथुर साहब को पढ़कर पली और बढ़ी है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। उनके असामयिक निधन के बाद 'नवभारत टाइम्स' को देश के दूर-दूर के इलाकों से हजारों पत्र प्राप्त हुए थे। ये वे पाठक थे, जो उनके उत्कट राष्ट्र-प्रेम, समाज के प्रति उनके सरोकारों, इतिहास की अतल गहराइयों से अनमोल तथ्य ढूंढ कर लाने के उनके सामर्थ्य और शालीन भाषा में राजनेताओं की खिंचाई करने के उनके साहस पर मुग्ध थे। शब्दों का कारोबार करने वाले हमारे जैसे अनपढ़ों और बौद्धिक संस्कारहीनों के साथ तो नियति ने सचमुच अन्याय किया है। उनके लेखन से हम जैसे लोगों को एक दृष्टि तो मिलती ही थी, ज्ञान का वह विपुल भंडार भी कभी बातचीत से तो कभी उनके लेखन से टुकड़ों-टुकड़ों में मिल जाता था, जो प्रायः अंग्रेजी में ही उपलब्ध है और जिसे पढ़कर पचा लेना प्रायः कठिन होता है।

पत्रकारीय सहयोगियों और मित्रों की नजर से देखें, तो राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय व्यक्तित्व की कुछ खूबियां साफ नजर आती हैं

  • अध्ययनशीलता: वे बेहद अध्ययनशील संपादक एवं पत्रकार थे। उनका अध्ययन और विषयों के प्रति उनके ज्ञान की गहराई उन्हें अपने सहयोगियों के बीच अलग ही व्यक्तित्व प्रदान करती थी।
  • भारतीयता के प्रति समर्पण: उनका लेखन भारतीयता और उसके मूल्यों को पूरी तरह समर्पित था।
  • पदलाभ से मुक्ति: उनके मन में किसी प्रकार की पद-लाभ की कामना नहीं थी। वे अपने काम के प्रति समर्पित थे और किसी गंदी राजनीति का हिस्सा नहीं थे।
  • मानवीय गुण व अहंकारहीनता: उनमें मानवीय गुण भरे हुए थे, जिसके चलते वे मानवीय कमजोरियों और पद के अहंकार के शिकार नहीं हुए। एक बड़े अखबार के संपादक का पद, रुतबा और अहम् उन्हें छू नहीं पाया।

यह उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता थी, जिसे उनके सहयोगी रहे सूर्यकांत बाली इन शब्दों में रेखांकित करते हैं,हमारे प्रधान संपादक को कोई पांचवां काम आता है, इस पर तो मुझे पूरा शक है: बस सोचना, पढ़ना, बतियाना और लिखना, उनकी सारी दुनिया इन चार कामों में सिमट चुकी थी। श्री माथुर के व्यक्तित्व पर यह एक मुकम्मल टिप्पणी है, जो बताती है कि वे किस तरह के पत्रकार-संपादक थे। उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व इसीलिए एक अलग किस्म की आभा के साथ सामने आता है, जिसमें एक बौद्धिक तेज और आकर्षण निरंतर दिखता है। जाहिर तौर पर ऐसे उदाहरण आने वाली पत्रकार-पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं कि किस तरह उन्होंने खुद को तैयार किया और असहज एवं वैश्विक सवालों पर इतनी कम आयु में लेखन शुरू कर अपनी देशव्यापी पहचान बनाई। शायद इसीलिए देश के दो महत्वपूर्ण अखबारों 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' के प्रधान संपादक पद तक वे पहुंच पाए। यह यात्रा एक ऐसा सफर है, जिसमें श्री माथुर ने जो रचा और लिखा, वह आज भी पत्रकारिता की पूंजी और धरोहर है। पत्रकारिता का लेखन सामयिक होता है और उसकी तात्कालिक पहचान होती है। श्री माथुर के पत्रकारीय लेखन के बहाने हम लगभग चार दशक की राजनीति, उसकी समस्याओं और चिंताओं से रूबरू होते हैं। यह एक दैनिक इतिहास की तरह का लेखन है, जिससे हम अपने विगत में झांक सकते हैं और गलतियों से सबक लेकर नए रास्ते तलाश सकते हैं।

     उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक ऐसे लेखक-संपादक के तौर पर सामने आते हैं, जो पूर्णकालिक पत्रकार थे। वे किसी साहित्य की परंपरा से आने वाले संपादक नहीं थे। अतः उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यकार-संपादकों द्वारा दी गई भाषा और उसके मुहावरों से अलग एक अनूठी पत्रकारीय भाषा का अनुभव दिया। हिंदी को संवाद, संचार और सूचना की भाषा बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही मायने में वे एक ऐसे संपादक और लेखक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने बहुत से अनछुए विषयों को हिंदी के अनुभव का विषय बनाया, जिन पर पहले अंग्रेजी के पत्रकारों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने भावनाओं से ऊपर विचार और बौद्धिकता को महत्व दिया। इसके चलते हिंदी को एक नई भाषा, एक नया अनुभव और अभिव्यक्ति का एक नया संबल मिला। उनकी बौद्धिकता ने हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों के सामने सम्मान से खड़े होने लायक बनाया, जिससे हिंदी पत्रकारिता ने एक नया आत्मविश्वास और नई ऊर्जा हासिल की।  आज हिंदी पत्रकारिता पर जिस तरह बाजारवादी ताकतों का दबाव गहरा रहा है, ऐसे समय में राजेंद्र माथुर के बहाने हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल एक आवश्यक विमर्श बन गई है। शायद उनकी स्मृति के बहाने हम कुछ ऐसे रास्ते तलाश पाएं, जो हमें इस कठिन समय में अपने मूल्यों के साथ काम करने का हौसला दे सकें।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

 

युवा शक्ति के जागरण से ही बनेगा समर्थ भारत


-प्रो.संजय द्विवेदी

 


   भारत इस अर्थ में गौरवशाली है कि वह एक युवा देश है। युवाओं की संख्या के हिसाब से भी, अपने सामर्थ्य और चैतन्य के आधार पर भी भारत पूरी दुनिया में एक विशिष्ट स्थान रखता है। भारत एक ऐसा अनूठा देश है, जिसके सारे नायक युवा हैं। हमारे गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक चेतना के केंद्र श्रीराम, श्रीकृष्ण, जगदगुरू शंकराचार्य और आधुनिक युग के नायक स्वामी विवेकानंद तक सभी युवा नायक रहे हैं। युवा कोई केवल शारीरिक आयु नहीं है, युवा वास्तव में एक विराट चेतना है, जिसमें अपार ऊर्जा बसती है, गहरा भरोसा बसता है, अडिग विश्वास बसता है, सुंदर सपने पलते हैं और नई आकांक्षाएं लगातार धड़कती हैं। इसलिए युवा होना भारत को बेहद रास आता है।

      भारत के सारे भगवान युवा हैं। वे कभी बुजुर्ग नहीं होते, वे सदैव शाश्वत युवा रहते हैं। यही युवा चेतना और ऊर्जा भारत की जीवंतता का मुख्य आधार है। आज जबकि दुनिया के तमाम देशों में युवा शक्ति का भारी अभाव दिखता है, भारत का चेहरा उनमें बिल्कुल अलग और ओजस्वी दिखाई देता है।  छात्र होना यदि निरंतर सीखना और ज्ञान अर्जित करना है, तो युवा होना अपने कर्म को पूजा मानकर पूरी लगन से राष्ट्र निर्माण में जुट जाना है। एक सीख है, तो दूसरा प्रचंड कर्म है। सीखी गई हर चीज को हमारे युवा ही परिणाम देते हैं और उसे धरातल पर साकार करते हैं। ऐसे में भारत की इस विराट छात्र शक्ति को सीखने के बेहतर और पारदर्शी अवसर देना,उनकी अंतर्निहित प्रतिभा के उन्नयन के लिए नए अनंत आकाश उपलब्ध कराना, हमारे समाज और चुनी हुई सरकारों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि हमारे छात्र को छात्र जीवन में ठीक से गढ़ा नहीं जाएगा, तो वह आगे चलकर एक आदर्श और जिम्मेदार नागरिक कैसे बनेगा?

      देश के प्रति अपनी मौलिक जिम्मेदारियों का निर्वहन वह किस प्रकार करेगा? भारत के शिक्षा परिसर ही नए भारत के निर्माण की असली आधारशिला हैं, अतः उनका वैचारिक रूप से जीवंत होना और निरंतर सक्रिय रहना बेहद जरूरी है। अराजनैतिक छात्र शक्ति का निर्माण आज हमारे समाज की एक बड़ी विडंबना बन चुकी है। देश में पूरी तरह से एक ऐसा कृत्रिम वातावरण बनाया जा रहा है जिसमें छात्र सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचे, अपने व्यक्तिगत करियर और पैकेज के बारे में सोचे। उसमें सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों, राष्ट्र के प्रति गहरे सद्भाव और संवेदनशीलता कैसे पैदा हो, इस ओर गंभीर प्रयास आज बहुत जरूरी हैं। यह अत्यंत आवश्यक है कि वे अपने देश के बारे में गहराई से जानें, उसकी विविधताओं और बहुलताओं का सम्मान करें, तथा ऐसे प्रबुद्ध नागरिक बनें जो विश्वमंच पर भारत की मान-प्रतिष्ठा को बढ़ा सकें। अतीत में तमाम सामाजिक संगठनों से जुड़कर हमारी छात्र-युवा शक्ति अनेक प्रकार के सामाजिक और रचनात्मक प्रकल्पों को चलाती भी रही है। किंतु दुर्भाग्यवश, हमारी वर्तमान औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में ऐसी कोई जीवंत व्यवस्था पूरी तरह नदारद दिखाई देती है। आज ऐसा महसूस होता है कि वर्तमान शिक्षा से हमारे युवा जो कुछ भी प्राप्त कर रहे हैं, उससे वे संवेदनशील मनुष्य कम और संवेदनहीन मशीन ज्यादा बन रहे हैं। वे कॉरपोरेट जगत के लिए काम के लोग तो बनते हैं, किंतु नागरिक और राष्ट्रीय चेतना से लैस संपूर्ण मनुष्य नहीं बन पाते हैं।

        छात्रों और युवाओं में राष्ट्रीय चेतना किसी भी सामान्य व्यक्ति की तुलना में  बहुत ज्यादा और प्रखर होती है। इसलिए यदि हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में ही राष्ट्रीय भाव और सामाजिक मूल्य समाहित होते, तो आज देश के हालात बिल्कुल अलग और बेहतर होते। हालात यह हैं कि जो छात्र और युवा व्यक्तिगत रूप से सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से नहीं जुड़े हैं, उनकी राष्ट्रीय विषयों पर कोई स्पष्ट सोच या राय नहीं बन पाती है, क्योंकि उन्हें इस दिशा में सोचने और खुलकर काम करने का अवसर ही नहीं मिलता। इस प्रकार हमने अनजाने में या किसी सुनियोजित व्यवस्था के तहत छात्र-युवाओं को पूरी तरह अराजनैतिक और नितांत व्यक्तिगत सोच वाला बना दिया है। आज का मुख्यधारा का छात्र-युवा केवल तात्कालिक आनंद और बाहरी उत्सवों में मस्त है। वह लेट-नाइट पार्टियों, सोशल मीडिया के आभासी संसार और मस्त माहौल को ही अपना सर्वस्व समझ रहा है। ऐसी गंभीर स्थितियों में यह बेहद जरूरी है कि छात्रों का स्वस्थ राजनीतिकरण हो, उन्हें एक मजबूत वैचारिक आधार से लैस किया जाए, और देश के बुनियादी प्रश्नों पर वे खुलकर परिसरों में संवाद करें। आज देश के तमाम बड़े शिक्षा परिसरों  में छात्रसंघ चुनाव भी नहीं कराए जाते। आखिर एक लोकतांत्रिक देश में छात्रों के राजनीतिकरण और उनकी वैचारिक प्रखरता से किसे डर लगता है? सच तो यह है कि सत्ताएं हमेशा चाहती हैं कि युवा मस्त-मस्त जीवन जीते रहें, और समाज में खड़े बुनियादी सवालों से कभी न टकराएं। वे पार्टियों में झूमते रहें और फौरी मनोरंजन ही उनके जीवन का आधार बना रहे।

       मनोरंजन और सिर्फ अपने करियर से आगे सोचने वाली युवा शक्ति का अभाव आज हमारे समय की सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती है। आवश्यकता आज इस बात की है कि हमारे शिक्षा परिसरों को ज्यादा जीवंत, उत्तरदायी और प्रासंगिक बनाया जाए। हमारे परिसरों को सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों पर विमर्श और प्रशिक्षण का मुख्य केंद्र बनाया जाए।अगर हमारे परिसर जीवंत होंगे, तो उनसे निकलने वाला नया समाज भी उतना ही जीवंत और जागरूक बनेगा। भारतीय परंपरा में संवाद और विवाद की अनंत धाराएं रही हैं। यह समाज मूलतः एक संवादित समाज है। जिन दिनों संचार के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तो भी हमारा समाज उतना ही संवादित और वैचारिक रूप से सक्रिय था। कुंभ के विशाल आयोजनों से लेकर अनेक मेलों में समाज आपस में संवाद करता था और महत्वपूर्ण विषयों पर मंथन करता था। नए समय ने समाज के इस आपसी संवाद के अनेक मार्ग बंद कर दिए हैं। सामयिक प्रश्नों पर संवाद बेहद कम होने के कारण नई पीढ़ी को देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक चुनौतियों से रू-ब-रू होने का अवसर ही नहीं मिलता। इसलिए देश के युवा आज अपने समय की वास्तविक चुनौतियों को नहीं पहचान पा रहे हैं।

             युवाओं को एक ऐसा रोबोटिक युवा बनाया जा रहा है जो करियर और मनोरंजन से आगे कभी न सोच सके। इस प्रकार सामाजिक सोच का स्वाभाविक विकास पूरी तरह बाधित हो रहा है। ऐसे में देश के छात्र संगठनों को अपनी बड़ी जिम्मेदारी निभानी होगी। छात्र संगठनों की यह जिम्मेदारी है कि वे राजनीतिक दलों के पिछलग्गू बनने के बजाय अपने संकुचित दायरे से बाहर आएं। आज जहां व्यावसायिकता के कारण शिक्षा और शिक्षक छात्रों का साथ छोड़ रहे हैं, छात्र संगठनों को वहीं पर छात्रों का साथ पकड़ना होगा। छात्र संघों को छात्रों की सर्वांगीण प्रतिभा के उन्नयन का मार्ग प्रशस्त करना होगा। छात्र संघ अपनी भूमिका का विस्तार करते हुए सिर्फ छात्र समस्याओं और संकीर्ण राजनीतिक कामों के बजाय देश के बड़े सवालों पर सोचने और उन पर निरंतर विमर्श का कार्य भी कर सकते हैं। छात्र शक्ति की सक्रिय और जागरूक भागीदारी से देश में आमूल-चूल परिवर्तन आ सकता है। एक बार राष्ट्र कल्याण का मिशन और ध्येय पैदा होते ही छात्र एक ऐसी अपराजेय युवा शक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जिससे देश का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होता है। आज देश के सभी क्षेत्रों में रचनात्मक जन-आंदोलन कमजोर हुए हैं। इन आंदोलनों के कमजोर होने के कारण विविध क्षेत्रों की वास्तविक और शोषित आवाजें नीति-निर्धारकों तक सुनाई देनी बंद हो गई हैं। इसके चलते सत्ताओं का अतिरेक और आत्मविश्वास अनियंत्रित रूप से बढ़ रहा है। जनसंगठन और छात्र संगठन एक सामाजिक दंड शक्ति के रूप में काम करें,इसके लिए उन्हें पूरी सजगता के साथ सचेतन प्रयास करने होंगे। इससे सत्ता और प्रशासन को भी सामाजिक शक्ति और जनभावना का विचार करना पड़ता है।

      लोकतंत्र में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी ही उसे सफल और सार्थक बनाती है। अगर नागरिक जागरूक नहीं होते, तो उनको उसके भयंकर परिणाम भोगने पड़ते हैं। एक सोया हुआ समाज कभी भी न्याय प्राप्ति की उम्मीद नहीं कर सकता। एक जागृत समाज ही अपने हितों की रक्षा करता हुआ अपने राष्ट्र की चौमुखी प्रगति में अपना अमूल्य योगदान देता है। अगर छात्रों में छात्र जीवन से ही ये राष्ट्रीय मूल्य स्थापित कर दिए जाएं, तो वे आगे चलकर देश के एक सक्रिय और ईमानदार नागरिक बनेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्हें अपनी जड़ों से गहरा प्रेम होगा, अपनी संस्कृति से प्रेम होगा, अपने समाज और उसके लोगों से सच्चा प्यार होगा। वह कभी किसी से नफरत नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसके मन में राष्ट्रीय भावना का प्रवेश हो चुका होगा। वह राष्ट्र को सदैव सर्वोपरि मानेगा और राष्ट्र के सभी नागरिकों को अपना भाई- बंधु समझेगा। वह जानेगा कि उसके द्वारा किए गए हर कार्य का क्या सामाजिक परिणाम है। उसे बखूबी पता होगा कि देश के समक्ष उपस्थित विभिन्न चुनौतियों का सामना उसे किस तरह करना है। देश के छात्र संगठन अपनी-अपनी विचारधाराओं और राजनीतिक धाराओं को मजबूत करते हुए भी का यह पावन भाव अपने संपर्क में आने वाले हर युवा में भर सकते हैं। सही मायने में यही जागरूक युवा आगे चलकर एक समर्थ, आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करेंगें।


बुधवार, 7 जनवरी 2026

कोई अच्छा है तो अच्छा क्यों है?

 

लेखक -प्रो. संजय द्विवेदी


चित्र परिचय- इंद्रेश कुमार

    करीब दो दशक पहले की बात है श्री इंद्रेश कुमार से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेरी मुलाकात हुयी थी। आरएसएस के उन दिनों वे राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, जयपुर उनका केंद्र था। दैनिक हरिभूमि का स्थानीय संपादक होने के नाते मैं उनका इंटरव्यू करने पहुंचा था। अपने बेहद निष्पाप चेहरे और सुंदर व्यक्तित्व से उन्होंने मुझे प्रभावित किया। बाद में मुझे पता चला कि वे मुसलमानों को आरएसएस से जोड़ने के काम में लगे हैं। रायपुर में भी उनके तमाम चाहने वाले अल्पसंख्यक वर्ग में भी मौजूद थे। उनसे थोड़े ही समय के बाद आरएसएस की प्रतिनिधि सभा में रायपुर में फिर मुलाकात हुयी। वे मुझे पहचान गए। उनकी स्मरण शक्ति पर थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि वे सालों पहले हुयी मुलाकातों और मेरे जैसे साधारण आदमी को भी याद रखते हैं। इस नायाब आदमी पर एक मौजूं शेर है, जो उनकी शख्सियत पर फिट बैठता है-

मसला यह भी इस दुनिया में

कोई अच्छा है तो अच्छा क्यों है।

   सही मायनों में यह व्यक्तित्व एक ऐसा अभियान में लगा है जो कई बार विफल हो चुका है। कट्टरपंथी ताकतें बहुत आसानी से मुस्लिम समाज को भ्रमित करने में कामयाब होती रही हैं। ऐसे कठिन समय में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक इंद्रेश जी हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते हैं। वह मुसलमानों को राष्ट्रवाद की राह पर डालकर सदियों से उलझे रिश्तों को ठीक करने की बात करते हैं। क्योंकि आज नहीं अगर दस साल बाद भी इंद्रेश कुमार अपने इरादों में सफल हो जाते हैं तो भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं की दुकान बंद हो जाएगी। वे एक ऐसा आदमी हैं जो सदियों से जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिशें कर रहे हैं।

      अब उन इंद्रेश कुमार की भी सोचिए जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन में काम करते रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज का संगठन है। ऐसे संगठन में रहते हुए मुस्लिम समाज से संवाद बनाने की कोशिश क्या उनके अपने संगठन (आरएसएस) में भी तुरंत स्वीकार्य हो गयी होंगी। जाहिर तौर पर इंद्रेश कुमार की लड़ाई अपनों से भी रही होगी और बाहर खड़े राजनीतिक षडयंत्रकारियों से भी है। वे अपनों के बीच भी अपनी सफाई देते रहे हैं कि वे आखिर मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास क्यों कर रहे हैं,  जबकि संघ का मूल काम हिंदू समाज का संगठन है। किंतु इंद्रेश कुमार की कोशिशें रंग लाने लगी हैं। वे एक ऐसे काम को अंजाम दे रहे हैं जिसकी जड़ें हिंदुस्तान के इतिहास में बहुत भयावह और रक्तरंजित हैं। मुसलमानों के बीच कायम भयग्रंथि और कुठांओं को निकालकर उन्हें 1947 के बंटवारे को जख्मों से अलग करना भी आसान काम नहीं है। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद जैसे महानायकों की मौजूदगी के बावजूद हम देश का बंटवारा नहीं रोक पाए। उस आग में आज भी कश्मीर जैसे इलाके सुलग रहे हैं।

     तमाम हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम रिश्ते अविश्वास की आग में जल रहे हैं। ऐसे कठिन समय में इंद्रेश कुमार क्या इतिहास की धारा की मोड़ देना चाहते हैं और उन्हें यह तब क्यों लगना चाहिए कि यह काम इतना आसान है। देश को पता है कि इंद्रेश कुमार, आरएसएस के ऐसे नेता हैं जो मुसलमानों और हिंदू समाज के बीच संवाद के सेतु बने हैं। वे लगातार मुसलमानों के बीच काम करते हुए देश की एकता को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। हिंदू- मुस्लिम एकता का यह राष्ट्रवादी दूत इसीलिए एक समय राजनीतिक षडयंत्रों का शिकार भी हुआ। संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल पुलिस का इस्तेमाल करते रहे हैं, किंतु राजनीतिक दल इस स्तर पर गिरकर एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व पर कलंक लगाने का काम करेंगें, यह देखना भी शर्मनाक था। इससे इतना तो साफ है कि कुछ ताकतें देश में ऐसी जरूर हैं जो हिंदू-मुस्लिम एकता की दुश्मन हैं। उनकी राजनीतिक रोटियां सिकनी बंद न हों, इसलिए दो समुदायों को लड़ाते रहने में ही इनकी मुक्ति है। शायद इसीलिए इंद्रेश कुमार निशाने पर थे क्योंकि वे जो काम कर रहे हैं वह इस देश की विभाजनकारी और वोटबैंक की राजनीति के अनूकूल नहीं था। लेकिन समय ने उन्हें बेदाग साबित किया।

   हमें यह समझने की जरूरत है कि आखिर वे कौन से लोग हैं जो हिंदू-मुस्लिम समाज की दोस्ती में बाधक हैं। वे कौन से लोग हैं जिन्हें भय के व्यापार में आनंद आता है। हिंदुस्तान के 20 करोड़ मुसलमानों को देश की मुख्यधारा में लाने की यह कोशिश अगर विफल होती है तो शायद फिर कोई इंद्रेश कुमार हमें ढूंढना मुश्किल होगा । कुछ लोग इंद्रेश कुमार जैसे लोगों के इरादे पर शक करके हम वही काम कर रहे हैं जो मुहम्मद अली जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग ने किया था जिन्होंनें महात्मा गांधी को एक हिंदू धार्मिक संत और कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहकर लांछित किया था। राष्ट्र जीवन में ऐसे प्रसंगों की बहुत अहमियत नहीं है।
इस देश को यह कहने का साहस पालना ही होगा कि हमें एक नहीं हजारों इंद्रेश कुमार चाहिए जो एक हिंदू संगठन में काम करते हुए भी मुस्लिम समाज के बारे में सकारात्मक सोच रखते हों।

     मुस्लिम समाज के संकट वस्तुतः भारतीय राजनीति और समाज के ही संकट हैं। उनकी चुनौतियां कम या ज्यादा गंभीर हो सकती हैंपर वे शेष भारतीय समाज के संकटों से जरा भी अलग नहीं है। सही अर्थों में पूरी भारतीय राजनीति का चरित्र ही कमोबेश भावनात्मक एवं तात्कालिक महत्व के मुद्दों के इर्द-गर्द नचाता रहा है। आम जनता का दर्दउनकी आकांक्षाएं और बेहतरी कभी भारतीय राजनीति के विमर्श के केंद्र में नहीं रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति का यह सामूहिक चरित्र हैअतएव इसे हिंदूमुस्लिम या दलित राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखने को कोई अर्थ नहीं है और शायद इसलिए ‘जनता का एजेंडा’ किसी की राजनीति का एजेंडा नहीं है। मुस्लिम नेताओं पर यह आरोप तो आसानी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कौम को आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़ा बनाए रखालेकिन क्या यही बात अन्य वर्गों की राजनीति कर रहे लोगों तथा मुख्यधारा की राजनीति करने वालों पर लागू नहीं होती ? बेरोजगारीअशिक्षाअंधविश्वासगंदगीपेयजल ये समूचे भारतीय समाज के संकट हैं और यह भी सही है कि हमारी राजनीति के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक परिवेश में आश्चर्यजनक ही है। देश की मुस्लिम राजनीति का एजेंडा भी हमारी मुख्यधारा की राजनीति से ही परिचालित होता है। जाहिर है मूल प्रश्नों से भटकाव और भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द समूची राजनीति का ताना बुना जाता है। इंद्रेश जी जैसे लोग समाज की सामूहिक चिंताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंथिक राजनीतिक के बजाए राष्ट्र प्रथम का भाव भरने का प्रयास कर रहे हैं।

      आप देखें तो हिंदुस्तान के हर मुसलमान नेता को एक ढोंग रचना पड़ता है। एक तरफ तो वह स्वयं को अपने समाज के बीच अपनी कौम और उसके प्रतीकों का रक्षक बताता हैवहीं दूसरी ओर उसे अपने राजनीतिक मंच (पार्टी) पर भारतीय राष्ट्र- राज्य के साथ अपनी प्रतिबद्धता का स्वांग रचना पड़ता है। समूचे भारतीय समाज की स्वीकृति पाने के लिए सही अर्थों में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। आज की राजनीति में तो ऐसा संभव नहीं दिखता। भारतीय समाज में ही नहींहर समाज में सुधारवादियों और परंपरावादियों का संघर्ष चलता रहा है। मुस्लिम समाज में भी ऐसी बहसें चलती रही हैं। इस्लाम के भीतर एक ऐसा तबका पैदा हुआजिसे लगता था कि हिंदुत्व के चलते इस्लाम भ्रष्ट और अपवित्र होता जा रहा है। वहीं मीर तकी मीरनजीर अकबरवादीअब्दुर्रहीम खानखानारसखान की भी परंपरा देखने को मिलती है। हिंदुस्तान का आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर एक शायर था और उसे सारे भारतीय समाज में आदर प्राप्त था। एक तरफ औरंगजेब था तो दूसरी तरफ उसका बड़ा भाई दारा शिकोह भी थाजिसनें ‘उपनिषद्’ का फारसी में अनुवाद किया। इसलिए यह सोचना कि आज कट्टरता बढ़ी हैसंवाद के अवसर घटे हैं-गलत है। आक्रामकता अकबर के समय में भी थीआज भी है।

     यहां यह बात रेखांकित किए जाने योग्य है कि अल्पसंख्यक अपनी परंपरा एवं विरासत के प्रति बड़े चैतन्य होते हैं। वे चाहते हैं कि कम होने के नाते कहीं उनकी उपेक्षा न हो जाए । यह भयग्रंथि उन्हें एकजुट भी रखती है। अतएव वे भावनात्मक नारेबाजियों से जल्दी प्रभावित होते हैं। सो उनके बीच राजनीति प्रायः इन्हीं आधारों पर होती है। यह अकारण नहीं था कि नमाज न पढ़ने वाले मोहम्मद अली जिन्नाजो नेहरू से भी ज्यादा अंग्रेज थेमुस्लिमों के बीच आधार बनाने के लिए कट्टर हो गए ।  मुस्लिम राजनीति वास्तव में आज एक खासे द्वंद में हैंजहां उसके पास नेतृत्व का संकट है । मुस्लिम समाज में अब राजनीति के अलावा सामाजिकआर्थिकसमाज सुधारशिक्षा जैसे सवालों पर बातचीत शुरु हो गई है । सतह पर दिख रहा मुस्लिम राजनीति का यह ठंडापन एक परिपक्वता का अहसास कराता है । मुस्लिम समाज में वैचारिक बदलाव की यह हवा जितनी तेज होगीसमाज उतना ही प्रगति करता दिखेगा। एक सांस्कृतिक आवाजाहीसांस्कृतिक सहजीविता ही इस संकट का अंत है । जाहिर है इसके लिए नेतृत्व का पढ़ालिखा और समझदार होना जरुरी है । नए जमाने की हवा से ताल मिलाकर यदि देश का मुस्लिम अपने ही बनाए अंधेरों को चीरकर आगे आ रहा है तो भविष्य उसका स्वागत ही करेगा । वैसे भी धार्मिक और जज्बाती सवालों पर लोगों को भड़काना तथा इस्तेमाल करना आसान होता है । गरीब और आम मुसलमान ही राजनीतिक षडयंत्रों में पिसता तथा तबाह होता हैजबकि उनका इस्तेमाल कर लोग ऊंची कुर्सियां प्राप्त कर लेते हैं और उन्हें भूल जाता हैं । अभिजात्य और जमाने की दौड़ में आगे आ गए मुस्लिम नेता दरअसल अपने कौम की खिदमत और उसे रास्ता बताने के बजाए उन्हें उसी बदहाली में रहने देना चाहते हैं ।इस संदर्भ में प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी का यह शेर हमारी मुस्लिम राजनीति के ही नहींसमूची भारतीय राजनीति के चरित्र को बेनकाब करता है-

इस्लाम की अजमत का क्या जिक्र करुं हमदम

काउंसिल में बहुत सैय्यदमस्जिद में फकत जुम्मन

भारतीय समाज में इंद्रेश कुमार जैसे लोग इसलिए एक नया उजाला लेकर आ रहे हैं। संवाद के माध्यम से नया भारत बना रहे हैं।

   दूसरी ओर भाजपा भी आगे बढ़कर मुस्लिम समाज से संवाद कर रही है तो मुस्लिम नेतृत्व को भी भरोसा रखते हुए उनकी बात सुननी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हौव्वा खड़ा कर आरएसएस के लिए प्रलाप किया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि संघ मुस्लिम विरोधी है। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। आरएसएस के नेताओं ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के सहयोग से मुस्लिम समाज से संवाद प्रारंभ किया है। आपातकाल के समय जमाते इस्लामी और आरएसएस के नेता कई जेलों में एक साथ थे। उनके बीच बेहतर रिश्ते भी विकसित हुए थे। इसलिए मुस्लिम वोटों की ठेकेदारी करने के बजाए मुस्लिम समाज को स्वतंत्र रूप से सोचने और अपने फैसले करने का अवसर देना चाहिए। भाजपा भी अब राजनीतिक रूप से अछूत नहीं है। उसकी अटलजी के नेतृत्व वाली सरकार में उमर अब्दुला से लेकर सभी तथाकथित सेकुलर दलों के लोग मंत्री रह चुके हैं। अटलजी से लेकर नरेंद्र मोदी जी तक  की सरकारों में क्या उनके चरित्र में कहीं अल्पसंख्यक विरोधी रवैया ध्वनित होता हैसच्चाई तो यह है कि वाजपेयी सरकार ने न सिर्फ डा. एपीजे कलाम को देश के राष्ट्रपति पद पर प्रतिष्ठित किया वरन बाद के राष्ट्रपति चुनाव में एक ईसाई आदिवासी पीए संगमा को अपना समर्थन दिया था। सही तो यह है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी के विरूद्ध अभियान चलाने वाले मुस्लिम वोटों के सौदागर हिंदु-मुस्लिम रिश्तों में सहजता के विरोधी हैं।

 इंद्रेश कुमार को हमारे समय का ऐसा नायक कहा जा सकता है जो वैश्विक तौर पर बन गयी इस्लाम की छवि को बदलने के लिए भारतीय मुसलमानों का नेतृत्व कर रहे हैं। वे मानवता के अग्रदूत हैं जहां सब राष्ट्र प्रथम की भावना रखकर देश के नवनिर्माण में लगे हैं। वे यह मानते हैं कि देश सबके योगदान और सबकी प्रगति से ही विश्वगुरु बनेगा। अपनी-अपनी भूमिका सबको निभानी होगी। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच उनकी साधना का प्रतिफल है। एक नया सवेरा आएगा, ऐसा भरोसा उनकी संकल्पशक्ति से होता है। वे शतायु हों और एक समर्थ, समरस और आत्मीयता से भरा भारत अपनी आँखों से देखें,यही प्रार्थना है।



सामाजिक समरसता से बनेगी सुंदर दुनिया

                                                                     -प्रो. संजय द्विवेदी



    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारतीय समाज के पुनर्गठन की वह प्रयोगशाला है, जो विचार, सेवा और अनुशासन के आधार पर एक सांस्कृतिक राष्ट्र का निर्माण कर रही है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की अनोखी भारतीय दृष्टि से उपजा यह संगठन आज अपनी शताब्दी मना रहा है। यह केवल संगठन विस्तार की नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक अनवरत यात्रा है।

     सौ वर्षों की इस साधना में संघ और इसके स्वयंसेवकों ने देश की चेतना को जाग्रत किया है। उन्होंने दिखाया कि न तो किसी सरकारी सहयोग की आवश्यकता होती है और न ही प्रचार के माध्यम से प्रसिद्धि की। यदि लक्ष्य पवित्र हो, मार्ग अनुशासित हो और कार्यकर्ता समर्पित हों। सेवा संघ का मूल है और सामाजिक समरसता उसका लक्ष्य। एक समरस समाज ही अपने सपनों में रंग भर सकता है और इससे ही सुंदर समाज का सृजन संभव है। गैरबराबरी को खत्म करते हुए मन में सुंदर समरस भावों का सृजन राष्ट्र प्रथम की भावना से ही संभव है।

सेवा: राष्ट्र के हृदय को स्पर्श करती संवेदना-

संघ के स्वयंसेवकों की सेवा-भावना समाज के सबसे वंचित वर्गों तक पहुंचती है। गिरिजनों और वनवासियों से लेकर महानगरों की झुग्गी बस्तियों तक, संघ प्रेरित संगठन जैसे सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, एकल विद्यालय, राष्ट्र सेविका समिति और आरोग्य भारती अखंड सेवा के भाव से कार्यरत हैं। इन संस्थाओं का उद्देश्य केवल राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि लोगों को आत्मनिर्भर, शिक्षित और संस्कारित बनाना है। सेवा, संघ के लिए कर्मकांड नहीं, जीवनधर्म है। जो मानवता को जोड़ता है, पोषित करता है और राष्ट्र के लिए भावनात्मक एकता निर्मित करता है।संघ जैसा समावेशी, उदार और लचीला संगठन ढूंढने से नहीं मिलेगा। अपने में परिवर्तन करने, आत्मसमीक्षा करने और अपना दायरा बढ़ाते जाने के लिए संघ ख्यात रहा है। जिस तरह संघ ने समाज जीवन के सब क्षेत्रों, सब वर्गों में, सभी विचारवंतों में, सभी सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी सेवा भावना से जगह बनाई है, वह उसकी सोच को प्रकट करता है। इस अर्थ में संघ कहीं से जड़वादी संगठन नहीं है, जिसके कारण सांप्रदायिक और दायराबंद सोच पनपती है। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच, राष्ट्रीय सिख संगत, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, एकल विद्यालय जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने यह स्थापित किया कि समाज को जोड़ना और सेवा के माध्यम से भारत को बदलना ही उसका लक्ष्य है। सभी सरसंघचालकों ने स्वयंसेवकों में यह भाव भरने का प्रयास किया और यह सूक्ति ही उनका ध्येय वाक्य बन गयी- नर सेवा नारायण सेवा।

    अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के बीच अपने वनवासी कल्याण आश्रमसेवा भारती जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने जो मैदानी और जमीनी काम किया है उसका मुकाबला सिर्फ जबानी जमा खर्च से सामाजिक परिवर्तन कर दावा करने वाले लोग नहीं कर सकते। संघ में सेवा एक संस्कार हैमुख्य कर्तव्य है। यहां सेवा कार्य का प्रचार नहींएक आत्मीय परिवार का सृजन महत्व का है। अनेक अवसरों पर कुछ फल और कम्बल बांटकर अखबारों में चित्र छपवाने वाली राजनीति इसको नहीं समझ सकती। समाज में व्याप्त भेदभाव, छूआछूत, को मिटाने के लिए संत रविदास ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके आदर्शों और कर्मों से सामाजिक एकता की मिसाल हमें देखने को मिलती है लेकिन वर्तमान दौर में इस सामाजिक विषमता को मिटाने के सरकारी प्रयास असफल ही कहे जा सकते हैं। कहीं-कहीं आशा की किरण समाज क्षेत्र में कार्यरत सेवा भारती जैसे संस्थानों के प्रकल्पों में दृष्टिगोचर होती है।

    भारत गावों में बसता है, गांवों में आज भी सामाजिक कुरीतियां कम नहीं हुयी हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने छुआछूत को मिटाने का नारा दिया, उनका जीवन भी सामाजिक समरसता की मिसाल है। गांधी जी ने स्वाधीनता आंदोलन में जितने भी प्रकल्प तय किए, उनका ध्येय भारत की सामाजिक विषमता को पाटना था। वे चाहते थे कि समाज में ऊंच-नीच, भेदभाव, लिंग अनुपात और आर्थिक सम्पन्नता,विपन्नता की खांई खत्म हो और भारत एक लय, एक स्वर, एक समानता और एक अखंडता के साथ मंडलाकार प्रवृत्ति में विश्व का नेतृत्व करे। कुछ ऐसी ही परिकल्पना पं. दीनदयाल उपाध्याय ने भी की। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामाजिक एकता के इसी प्रकल्प को आगे बढ़ा रहे हैं। आजादी के लगभग अस्सी वर्षों के बाद भी भारत से गरीबी हटी नहीं है और सामाजिक विषमता दूर नहीं हो सकी है। इस विषमता से समाज में लड़ाई-झगड़े, वैमनस्यता और ऊंच-नीच की प्रवृत्ति बढ़ी है। इस समस्या को भारत में मिटाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ आगे आया और सेवा के अनेक प्रकल्प शुरू किए। उनके इन सेवा प्रकल्पों का उद्देश्य भेदभाव से मुक्त, स्वाभिमानी-समरस और आत्मनिर्भर समाज बनाना था। सेवा भारती, संघ का एक ऐसा ही संगठन है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक जागरण एवं कौशल विकास के लगभग हजारों केंद्रों के द्वारा प्रकल्प चला रहा है। सेवा भारती इस मुहिम में तीन दशक से जुटा हुआ है। वर्ष 2017 में सेवा भारती का रजत जयंती वर्ष था। इस वर्ष में सेवा भारती अपने प्रकल्पों का आत्मावलोकन किया और नए प्रकल्पों पर विचार करते हुए नए प्रकल्प प्रारंभ किए। रजत जयंती वर्ष पर सेवा भारती भोपाल के लाल परेड मैदान पर ऐसे हजारों श्रम साधकों का संगम भी आयोजित किया। इस संगम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत स्वयं उपस्थित रहे। इस आयोजन में श्रमिकों और गरीब व पिछड़े वर्गों के लिए जीवन समर्पित करने वाले साधकों का सम्मान भी किया गया।

  आरएसएस निरंतर समाज के पिछड़े वर्गों की ओर देखता रहा है और विविध प्रकल्पों के जरिए उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहा है। यह सच है कि संत रविदास एक ऐसे संत थे जिन्होंने जीवन भर श्रम की साधना की। श्रम को प्रतिष्ठा करने वाले इस महान संत के शिष्यों में काशी नरेश व भक्त मीराबाई भी रहीं। अपने धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास के कारण संत रविदास जी ने दिल्ली के शासक सिकंदर लोधी को भी कह दिया था कि मैं प्राण त्याग दूंगा पर अपना धर्म नहीं छोडूंगा। हमारे अनेक संतों की तरह संत रविदास जी ने भी जन्म के आधार पर ऊंच-नीच को नकार दिया था। भोपाल में श्रम साधक समागम उन्हीं संत रविदास जी की जयंती पर आयोजित किया गया था।

     उम्मीद की जानी चाहिए कि संत रविदास की दृष्टि समाज के अंतिम छोर तक पहुंचेगी और जाति, पंथ के आधार पर भेदभाव को मिटाने में कारगर हो सकेगी। यह साधारण नहीं है कि मध्यप्रदेश आरंभ से ही संघ की एक प्रयोगशाला रहा है, जहां उसने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रों में विविध प्रयोग किए हैं। बैतूल एक ऐसा जिला है, जहां पर सैकड़ों गांवों को केंद्र बनाकर ग्रामीण विकास का एक नया अध्याय लिखने की पहल हुयी है। संघ के सरसंचालक मोहन भागवत ने ग्रामीण विकास के इन प्रकल्पों को सराहा था। इसके तहत बैतूल जिले में नशामुक्ति, आर्थिक-सामाजिक विकास, पर्यावरण जैसे विषयों पर हो रहे ये काम निश्चय ही बदलते भारत की बानगी पेश करते हैं।

   मध्यप्रदेश एवं देश के तमाम राज्यों में सरकारी स्तर पर भी कई योजनाएं श्रमिक और निचले तबके के  उत्थान के लिए बनती रही हैं। उन योजनाओं से इन वर्गों में कोई आमूलचूल बदलाव हुआ हो ऐसा कम ही दिखाई देता है। आजादी के सत्तर वर्षों में यदि सरकारी योजनाएं आम आदमी तक पहुंच पाती तो संत रविदास,राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बाबा साहेब आंबेडकर और पं. दीनदयाल उपाध्याय के सपने सच हो जाते। किंतु अफसोस है कि बदलाव की यह गति उतनी तेज नहीं रही जितनी होनी चाहिए। सरकारें आज भी उन्हीं के लिए योजना बना रही हैं और हर बजट में अधिक वित्त का प्रावधान करती हैं किंतु धरातल पर सूरतेहाल नहीं बदलते। यही कारण है कि सामाजिक विषमता अमरबेल की तरह पनप रही है। इस वर्ग के जो व्यक्ति समाज का नेतृत्व करते हैं, वह भी आगे आ जाने पर पीछे मुड़कर नहीं देखते हैं। बाद में अपने लोग ही उन्हें बेगाने लगने लगते हैं। सरकारी स्तर पर इस सामाजिक विषमता को पाटना नामुमकिन लगता है। इसमें समाज और सामाजिक संगठनों की सहभागिता जरूरी है। इसी ध्येय को आत्मसात कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक विषमता को दूर करने का बीड़ा उठाया है और सेवा प्रकल्पों में श्रम साधकों के माध्यम से सामाजिक साधना का काम निरंतर किया जा रहा है। भोपाल के इस महती आयोजन में शामिल होने वाले लोग दरअसल वे हैं जो दैनिक रोजी-रोजी कमाने के लिए रोज अपना पसीना बहाते हैं। इन वर्गों से संवाद और उनकी एकजुटता के बहाने संघ एक बड़ी सामाजिक पहल कर रहा है, इसमें दो राय नहीं है।

जातिभेद से मुक्ति जरूरी-

   सामाजिक समरसता के बिना कोई भी राष्ट्र अग्रणी नहीं बन सकता। गुरु घासीदास कहते हैं- मनखे-मनखे एक हैं। किंतु जातिवाद ने इस भेद को गहरा किया है। तमाम प्रयासों के बाद भी आज भी हम इस रोग से मुक्त नहीं हो सके हैं। भेदभाव ने हमारे समाज को विभाजित कर रखा है, जिसके चलते दुनिया में हमारी छवि ऐसी बनाई जाती है कि हम अपने ही लोगों से मानवीय व्यवहार नहीं करते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे- अस्पृश्यता ईश्वर और मानवता के प्रति अपराध है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे पू. बालासाहब देवरस ने इस संकट को रेखांकित करते हुए बसंत व्याख्यानमाला में कहा था कि- अगर छूआछूत गलत नहीं है दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है, इसे मूल से नष्ट कर देना चाहिए। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि जो कुछ भी सैकड़ों सालों से परंपरा के नाम पर चल रहा है वह हमारा धर्म नहीं है। इतिहास में हुए इन पृष्ठों का कोई भी सभ्य समाज समर्थन नहीं कर सकता। जबकि हमारे धर्म ग्रंथ और शास्त्र इससे अलग हैं। हमारे ऋषि और ग्रंथों के रचयिता सभी वर्गों से हैं। भगवान बाल्मीकि और वेद व्यास इसी परंपरा से आते हैं। यानि यह भेद शास्त्र आधारित नहीं है। यह विकृति है। इससे मुक्ति जरूरी है।हमें इसके सचेतन प्रयास करते हुए अपने आचरण, व्यवहार और वाणी से समरसता का अग्रदूत बनना होगा। सभी समाजों और वर्गों से संवाद और सहकार बनाकर हम एक आदर्श समाज की रचना में सहयोगी हो सकते हैं। इससे समाज का सशक्तिकरण भी होगा। समानता का व्यवहार, वाणी संयम, परस्पर सहयोग, संवेदनशीलता से हम दूरियों को घटा सकते हैं और भ्रम के जाले साफ कर सकते हैं। साथ ही अपने गांव, नगर के मंदिर, जलश्रोत, श्मशान सबके लिए समान रूप से खुल होने ही चाहिए। इसमें कोई भी भेद नहीं होना चाहिए।

वैचारिक आंदोलन से बदलेगा समाज-

     राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है। उसने दिखाया है कि संगठन, विचार और समर्पण के बल पर समाज को बदला जा सकता है, और राष्ट्र का नव निर्माण संभव है। संघ की यात्रा सेवा से समरसता तक, अनुशासन से राष्ट्रधर्म तक और शाखा से संसद तक हर पड़ाव पर भारत की आत्मा को जागृत करती है। वह भारत को केवल एक राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना के रूप में स्थापित करना चाहता है। संघ के कार्य को कोई चाहे जितना विरोध करे, किंतु उसकी राष्ट्रनिष्ठा, सेवा भावना और समर्पण को नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि विरोधी भी व्यक्तिगत रूप से संघ के कार्यों की प्रशंसा करते हैं, और कहीं-न-कहीं उससे प्रेरित भी होते हैं। संघ की शताब्दी यात्रा भारत की उस यात्रा का प्रतीक है, जो हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति और साधना का प्रतिफल है। यह यात्रा निरंतर चल रही है-भारत के निर्माण, उत्थान और पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में। इसमें सामाजिक समरसता और सेवा का मंत्र सबसे प्रमुख है। संघ के स्वयंसेवक शताब्दी वर्ष में एक समरस, सशक्त समाज के सृजन को स्थायित्व देने में जुटे हैं ताकि भारतविरोधी शक्तियां हमें बांटकर अपने कुचक्रों में सफल न हो सकें। एक समरस समाज सभी संकटों का हल है यही समझकर हमें निरंतर आगे बढ़ना है। संघ के सामाजिक सेवा प्रकल्पों को अपेक्षित सहयोग और समय देना भी जरूरी है। समाज की सामूहिक शक्ति से जल्दी और ज्यादा बेहतर परिणाम पाए जा सकते हैं, इसमें दो राय नहीं है।