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सोमवार, 16 दिसंबर 2024

वर्ष 2025 : मीडिया इंडस्ट्री के लिए अनंत संभावनाओं का दौर

 - प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी


वर्तमान युग में मीडिया इंडस्ट्री तीव्र गति से परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। तकनीकी प्रगति और उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव के चलते, मीडिया और मनोरंजन के पारंपरिक स्वरूप में काफी परिवर्तन हुआ है। वर्ष 2024 ने इस बदलाव को और गति दी है, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) के बढ़ते प्रभाव के कारण। वर्ष 2025 की ओर देखते हुए, यह स्पष्ट है कि एआई, डिजिटल मीडिया और नई तकनीकों का प्रभाव मीडिया इंडस्ट्री की दिशा को और अधिक प्रभावित करेगा।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के योगदान से मीडिया में क्रांति

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) ने मीडिया इंडस्ट्री में न केवल कार्यप्रणाली को सरल बनाया है, बल्कि नई संभावनाओं के द्वार भी खोले हैं। एआई के माध्यम से सामग्री निर्माण, उपभोक्ता डेटा का विश्लेषण और दर्शकों की पसंद का सटीक अनुमान लगाना अब आसान हो गया है। उदाहरणस्वरूप:

· सामग्री निर्माण और संपादन: एआई-संचालित उपकरण जैसे GPT मॉडल्स, डीपफेक टेक्नोलॉजी और इमेज जनरेशन प्लेटफॉर्म कंटेंट क्रिएटर्स के लिए समय और लागत बचाते हैं। न्यूज़ चैनल्स अब रियल-टाइम न्यूज़ अपडेट्स और अनुकूलित समाचार प्रस्तुति के लिए एआई-सक्षम वर्चुअल एंकर का उपयोग कर रहे हैं।

· डिजिटल विज्ञापन: एआई एल्गोरिदम उपभोक्ताओं की सर्च और ब्राउज़िंग आदतों का विश्लेषण करके व्यक्तिगत विज्ञापन तैयार करते हैं। इससे न केवल विज्ञापनदाता, बल्कि उपभोक्ता भी लाभान्वित होते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी पसंद का ही कंटेंट देखने को मिलता है।

· ऑडियंस इंगेजमेंट: चैटबॉट्स और वर्चुअल असिस्टेंट दर्शकों के सवालों का जवाब देकर और उनकी पसंद के कंटेंट का सुझाव देकर मीडिया कंपनियों की पहुंच और प्रभाव को बढ़ा रहे हैं।

एआई से जुड़ी चुनौतियाँ

हालांकि एआई ने मीडिया इंडस्ट्री में असंख्य अवसर प्रदान किए हैं, लेकिन यह नई चुनौतियाँ भी लेकर आया है।

· नैतिकता और पारदर्शिता: एआई आधारित फेक न्यूज़ और डीपफेक टेक्नोलॉजी की वजह से गलत सूचनाओं का प्रसार बढ़ सकता है।

· मानव संसाधन का विस्थापन: पारंपरिक कार्यबल को एआई द्वारा रिप्लेस किए जाने का खतरा बना हुआ है।

· डेटा गोपनीयता: एआई को प्रशिक्षित करने के लिए आवश्यक डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा है।

भारत और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का बाजार

भारत, विश्व में एआई के विकास और उपयोग के मामले में अग्रणी देशों में शामिल हो रहा है। वर्ष 2024 में भारत का एआई बाजार लगभग $7 बिलियन तक पहुँच चुका है। अनुमान है कि 2025 तक यह $12 बिलियन तक बढ़ जाएगा। भारतीय एआई क्षेत्र में वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 20-25% के आसपास है।

वर्ष 2024 में, भारत में एआई के क्षेत्र में लगभग 4 लाख पेशेवर काम कर रहे हैं। सरकार और निजी कंपनियाँ मिलकर एआई स्टार्टअप्स और अनुसंधान में भारी निवेश कर रही हैं। 2025 तक, एआई आधारित नौकरियों की संख्या में 30% तक वृद्धि की उम्मीद है।

भारतीय मीडिया कंपनियाँ एआई-संचालित ट्रेंड एनालिसिस, कंटेंट पर्सनलाइजेशन और विज्ञापन ऑप्टिमाइज़ेशन पर भारी ध्यान केंद्रित कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर रिलायंस जियो और टाटा जैसे बड़े कॉर्पोरेट्स मीडिया और एआई के समागम के लिए बड़े स्तर पर निवेश कर रहे हैं।

भारत में डिजिटल मीडिया का बढ़ता प्रभाव

भारत में डिजिटल मीडिया का प्रभाव पारंपरिक मीडिया की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2024 में, भारत में लगभग 700 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, जिनमें से अधिकांश स्मार्टफोन के माध्यम से डिजिटल सामग्री का उपभोग कर रहे हैं।

नेटफ्लिक्स, अमेज़ॅन प्राइम, डिज़्नी+ हॉटस्टार जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स भारत में मनोरंजन का नया केंद्र बन गए हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, और यूट्यूब पर स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री का उपभोग बढ़ रहा है। डिजिटल न्यूज़ पोर्टल्स जैसे इनशॉर्ट्स और स्क्रॉल ने पारंपरिक न्यूज़ चैनल्स की जगह लेनी शुरू कर दी है।

वर्ष 2024 में, भारत में डिजिटल विज्ञापन का आकार लगभग $4.5 बिलियन था। 2025 तक, यह $6.8 बिलियन तक पहुँचने की संभावना है। डिजिटल मीडिया में पर्सनलाइज्ड विज्ञापन और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग एक नया ट्रेंड बन चुका है। भारत में 70% इंटरनेट उपयोगकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। सरकार की डिजिटल इंडिया पहल और सस्ती डेटा सेवाओं के कारण ग्रामीण भारत में डिजिटल कंटेंट का उपभोग तेजी से बढ़ रहा है।

2025 की उम्मीदें: मीडिया इंडस्ट्री का भविष्य

·  तकनीकी प्रगति का तेज़ी से उपयोग: वर्ष 2025 में एआई और मशीन लर्निंग के उपयोग से मीडिया इंडस्ट्री में और अधिक नवाचार की उम्मीद है। दर्शक लाइव पोल्स, क्विज़ और अन्य इंटरैक्टिव माध्यमों के ज़रिए कंटेंट के साथ जुड़ेंगे। वर्चुअल रियलिटी और ऑग्मेंटेड रियलिटी  आधारित कंटेंट मीडिया इंडस्ट्री का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगा।

· स्थानीय और क्षेत्रीय कंटेंट का विस्तार: स्थानीय भाषाओं में कंटेंट की माँग बढ़ेगी, जिससे क्षेत्रीय मीडिया कंपनियों को नए अवसर मिलेंगे। 2025 तक, 60% से अधिक डिजिटल कंटेंट स्थानीय भाषाओं में होगा।

· नियामक और नैतिकता पर ज़ोर: एआई और डिजिटल मीडिया के बढ़ते उपयोग को ध्यान में रखते हुए सरकार डेटा सुरक्षा और फेक न्यूज़ की रोकथाम के लिए सख्त नियम लागू कर सकती है। "मीडिया ट्रांसपेरेंसी" के लिए नए मानक स्थापित होंगे।

· उपभोक्ता-केंद्रित दृष्टिकोण: मीडिया इंडस्ट्री उपभोक्ताओं के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए व्यक्तिगत और अनुकूलित सेवाओं पर ध्यान केंद्रित करेगी। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर फ्री-टू-व्यू और पे-पर-व्यू जैसे मॉडल और प्रचलित होंगे।

कुल मिलाकर वर्ष 2024 का वर्ष भारतीय मीडिया इंडस्ट्री के लिए नवाचार और चुनौतियों का संगम रहा है। एआई और डिजिटल मीडिया ने पारंपरिक मीडिया के स्वरूप को बदलते हुए उपभोक्ताओं की नई पीढ़ी की जरूरतों को पूरा किया है। वर्ष 2025 में, तकनीकी प्रगति और क्षेत्रीय कंटेंट के विस्तार के साथ, भारतीय मीडिया इंडस्ट्री विश्व स्तर पर अपनी पहचान और मजबूत करेगी। हालांकि, नैतिकता, डेटा सुरक्षा, और फेक न्यूज़ जैसे मुद्दों से निपटना महत्वपूर्ण होगा। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले वर्ष मीडिया इंडस्ट्री के लिए अनंत संभावनाओं का दौर होगा।

सोमवार, 25 नवंबर 2024

सजग इतिहासबोध की बानगी

 

-प्रो.संजय द्विवेदी



  अच्युतानंद मिश्र हिंदी के यशस्वी संपादक और पत्रकार हैं। आजादी के बाद की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को सहेजने, संरक्षित करने और उसके नायकों के योगदान को रेखांकित करने का उनका पुरूषार्थ विरल है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति रहते हुए उन्होंने स्वतंत्र भारत की हिंदी पत्रकारिता पर शोधकार्य का बीड़ा उठाया, जिसके चलते अनेक चीजें प्रकाश में आ सकीं। स्वतंत्र भारत की पत्रकारिता पर शोध परियोजना के माध्यम से उन्होंने देश भर के पत्रकारों,संपादकों और शोधकर्ताओं को विश्वविद्यालय से जोड़ा। उनकी शोध परक दृष्टि और कुशल संपादन क्षमता से शोध परियोजना को बहुत लाभ हुआ। इस दौरान अनेक विशिष्ठ आयोजनों के माध्यम से देश की श्रेष्ठतम बौद्धिक विभूतियों का विश्वविद्यालय में आगमन हुआ। शोध परियोजना के तहत देश भर में बौद्धिक आयोजन भी हुए। इन गतिविधियों से विश्वविद्यालय अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने में सफल रहा। यह हमारे तत्कालीन कुलपति अच्युतानंद जी के निजी संपर्कों और औदार्य के चलते हो पाया। यह साधारण नहीं है कि इस परियोजना में 80 से अधिक पुस्तकों और मोनोग्राफ का प्रकाशन हुआ। अपने इस कार्य को मिश्र जी इतिहास संरक्षण का विनम्र प्रयास कहते हैं।

     शोध परियोजना के तहत ही चार खंडों में प्रकाशित पुस्तक हिंदी के प्रमुख समाचारपत्र और पत्रिकाएंभी अच्युतानंद जी के संपादन में प्रकाशित हुई। चार खंडों में छपी इस किताब में अच्युतानंद जी की विलक्षण संपादकीय दृष्टि का परिचय मिलता है। इस किताब के बहाने हम हिंदी पत्रकारिता के उजले इतिहास से परिचित होते हैं। अच्युतानंद मिश्र विलक्षण संपादक हैं। चीजों को देखने और मूल्यांकन करने की उनकी दृष्टि विरल है। अपनी संपादन कला में माहिर संपादक जब आजाद भारत की हिंदी पत्रकारिता के योगदान को रेखांकित करने के लिए आगे आता है तो उसके द्वारा चयनित प्रतिनिधि पत्रों, पत्रिकाओं का चयन बहुत खास हो जाता है। इसके साथ ही वे ऐसे लेखकों का चुनाव करते हैं जो विषय के साथ न्याय कर सकें।

प्रथम खंड-

   पहले खंड में वे साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, दिनमान और रविवार का चयन करते हैं। जाहिर तौर पर ये चार प्रतिनिधि पत्रिकाएं हमारे तत्कालीन समय का न सिर्फ इतिहास लिखती हैं, बल्कि हिंदी समाज के बौद्धिक विकास में, चेतना के स्तर पर उन्हें समृद्ध करने में इनका बहुत बड़ा योगदान है। हिंदी समाज की निर्मिति में इन पत्रिकाओं का योगदान रेखांकित किया जाना शेष है। आजादी के बाद की पत्रकारिता की ये चार पत्रिकाएं न सिर्फ मानक बनीं, वरन अपनी संपादकीय दृष्टि, प्रस्तुति, कलेवर और भाषा के लिए भी याद की जाती हैं। व्यापक प्रसार और हिंदी समाज के मन और चेतना की समझ से निकली ये पत्रिकाएं पत्रकारिता का उजला इतिहास हैं।  ये बताती हैं कि कैसे हिंदी पत्रकारिता ने अपने बौद्धिक तेज और तेवरों से अंग्रेजी पत्रकारिता के समतुल्य आदर प्राप्त किया। इन पत्रिकाओं के यशस्वी संपादकों ने जो योगदान किया, उससे हिंदी पत्रकारिता आज भी प्रेरणा ले रही है।

    हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार, कभी कादम्बिनी के संपादक मंडल में रहे संत समीर ने अपने विस्तृत लेख में साप्ताहिक हिंदुस्तान के महत्वपूर्ण अवदान को रेखांकित किया है। गांधी जयंती, 2 अक्टूबर, 1950 को गांधी अंक के साथ साप्ताहिक हिंदुस्तान की यात्रा का शुभारंभ होता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पुत्र देवदास गांधी इस पत्रिका के प्रकाशन के मूल में थे। उस समय वे हिंदुस्तान समूह के प्रबंध निदेशक थे। वे चाहते थे कि हिंदी में एक ऐसी पत्रिका प्रकाशित हो जो स्पष्ट गांधीवादी नीति, उच्च पारिवारिक आदर्श, मानवीय मूल्यों की स्थापना के साथ शुद्ध,सरल सारगर्भित भाषा में छपे। आजादी के आंदोलन से निकले तपस्वी राजनेताओं की छाया में पत्रकारिता का भी विकास हो रहा था। पत्रकारिता उस समय तक प्रायः राष्ट्र के नवनिर्माण में अपनी भूमिका भी देख रही थी। साप्ताहिक हिंदुस्तान के राष्ट्रीय नवनिर्माण विशेषांकों को इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। संत समीर ने बड़ी कुशलता उस मनोविज्ञान का वर्णन किया है। जो आजादी के बाद की पत्रकारिता का भावभूमि बना।  समीर लिखते हैं यह दौर संपादकों की हस्ती का था। प्रकाशन संपादकों के नाम से पहचाने जाते थे। पत्रकारिता बाजार के दबावों से मुक्त थी और विचार पर केंद्रित थी। साहित्य और पत्रकारिता  प्रायः एक मंच पर थे, जाहिर है लेखक संपादकों का यह समय हिंदी पत्रकारिता का साहित्य से भी सेतु बनाए रखता था। जो सिर्फ पत्रकारिता में थे वे साहित्यिक संस्कारों से संयुक्त थे। निश्चय ही भाषा उसमें बहुत खास थी। उसका सही प्रयोग और विकास सबके ध्यान में था। पत्रिका के प्रथम संपादक मुकुट बिहारी वर्मा रहे, जो संस्थान के हिंदी अखबार दैनिक हिंदुस्तान के भी संपादक थे। बाद में बांकें बिहारी भटनागर को संपादन का दायित्व मिला। वे 1953 से 1666 तक संपादक रहे। फिर कुछ समय गोविंद केजरीवाल ने अस्थाई तौर पर काम देखा और फिर रामांनद दोषी लगभग एक साल संपादक रहे। साप्ताहिक हिंदुस्तान के संपादक के रूप में सबसे लंबा कार्यकाल मनोहर श्याम जोशी का था। उन्होंने इसे विविध प्रयोगों से एक शानदार पत्रिका में बदल दिया। फिर शीला झुनझुनवाला, राजेंद्र अवस्थी और मृणाल पाण्डेय को भी संपादक बनने का अवसर मिला। पत्रिका के बंद होने पर मृणाल जी इसकी संपादक थीं। साप्ताहिक हिंदुस्तान की समूची यात्रा गांधीवादी विचारों के संवाहक की रही। मनोहर श्याम जोशी का कार्यकाल इसका उत्कर्ष काल रहा जिसमें उसे बहुत लोकप्रियता मिली। अपने अनेक विशेषांकों से भी पत्रिका खासा चर्चा में रहीं जिनमें टालस्टाय अंक, अंतराष्ट्रीय कहानी विशेषांक, फिल्म विशेषांक, विश्व सिनेमा अंक की खासी चर्चा रहे। माना जाता है कि 60 से 70का दशक इस पत्रिका का सर्वश्रेष्ठ समय रहा है और बाद में बाजारवाद और अन्य कारणों से पत्रिका का प्रकाशन बंद हो गया। बताया जाता है कि जोशी जी के संपादन काल में पत्रिका के अंक डेढ़ पौने दो लाख तक छपे और विशेषांक तीन लाख तक। किंतु ऐसी लोकप्रिय पत्रिका का बंद होना हिंदी जगत की बहुत बड़ी बौद्धिक हानि थी इसमें दो राय नहीं।

     धर्मयुग का नाम लेते ही परंपरा और आधुनिकता से जुड़े एक ऐसे प्रकाशन की स्मृति कौंध जाती है, जिसने समय की शिला पर जो लिखा वह अमिट है। अपने यशस्वी संपादक धर्मवीर भारती और उनकी टीम ने जो रचा और जो प्रस्तुत किया, वह अप्रतिम है। आलोच्य पुस्तक में श्री सुधांशु मिश्र ने बहुत गंभीरता के साथ धर्मयुग की यात्रा और भावभूमि का अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस यात्रा से गुजरते हुए अद्भुत अनुभूति होती है कि किस तरह एक पत्रिका समाज की आवाज और जरूरत बन जाती है। इस खंड में पत्रिका के इतिहास विकास से लेकर उसके प्रदेय पर बहुत सार्थक चर्चा की गयी है। देश की आजादी के साथ ही हुए इस पत्रिका के प्रकाशन ने हिंदी समाज में क्रांति ला दी। हिंदी के विकास और उसे नए विषयों के साथ संवाद की क्षमता दी। पत्रिका के दिग्गज संपादकों ने हिंदी को सरोकारी पत्रकारिता का अहसास कराया। समाज जीवन के हर पक्ष पर सामग्री का प्रकाशन करते हुए यह एक संपूर्ण पत्रिका की तरह सामने आई। साहित्य और संस्कृति पत्रिका का मूल स्वर रहा।1960 से 1987तक इसके संपादक रहे धर्मवीर भारती की साहित्यिक प्रतिभा से सभी परिचित हैं। किंतु एक पत्रकार और संपादक के नाते उन्होंने जो किया वह स्वर्णिम इतिहास है। वे और धर्मयुग पर्याय ही हो गए। बाद में गणेश मंत्री पत्रिका के संपादक बने। हालांकि संपादक के रूप में प्रारंभ में प्रतीश नंदी का नाम जाता था। मंत्री जी का नाम कार्यवाहक संपादक के नाते जाता रहा। 1987 के अंत में वे इसके संपादक बने। किंतु बदली हुई परिस्थियों,बाजारवाद और नए समय में बहुत बेहतर करने के बाद भी धर्मयुग साप्ताहिक से पाक्षिक हुआ और उसका आकार भी घटा। धर्मयुग ने पाठकों के साथ-साथ लेखकों का भी एक नया संसार खड़ा किया। अनेक लेखकों को मंच और ख्याति यहां से मिली। चार दशकों तक हिंदी समाज पर इस पत्रिका की उपस्थिति बनी रही।

    संपादक श्री अच्युतानंद मिश्र ने दिनमान के खंड के अध्ययन का काम दिल्ली के चर्चित पत्रकार श्री उमेश चतुर्वेदी और मप्र के पत्रकार श्री सुधांशु मिश्र को सौंपा। जाहिर है हिंदी में वैचारिक पत्रकारिता का ध्वज ऊंचा करने का काम दिनमान ने किया। यशस्वी साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की परिकल्पना से बनी यह पत्रिका अपनी खास प्रवृत्तियों के लिए भी पहचानी गयी। अज्ञेय जी ने जो टीम दिनमान के लिए चुनी वह हिंदी पत्रकारिता की आदर्श टीम कही जा सकती है। विविध धाराओं और विशेषताओं के पत्रकार, साहित्यकार, कवि इस टीम का हिस्सा बने। जिनमें रघुवीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीकांत वर्मा,त्रिलोक दीप, जवाहरलाल कौल जैसे हिंदी पत्रकारिता के नायक शामिल थे। दिनमान का ध्येय वाक्य था राष्ट्र की भाषा में राष्ट्र का आह्वान  टाइम्स समूह की मालकिन रमा जैन की कल्पना टाइम जैसी विचार प्रधान पत्रिका निकालने का था। उसी संकल्पना से दिनमान की शुरूआत हुई। हालांकि पत्रिका के 28 फरवरी,1965 के अंक में छपी संपादक की टिप्पणी कहती है- ...दिनमान के लिए टाइम नमूना नहीं है। हां, समाचार संग्रह के लिए जितना बड़ा संगठन दिनमान कर सकेगा, करेगा।दिनमान जिंदगी के हर रूप को छूनेवाला बने अज्ञेय जी ने इसकी कोशिश की। बाद में रघुवीर सहाय इसके संपादक बने। वे 13 साल इसके संपादक रहे। बाद में कन्हैयालाल नंदन,सतीश झा, घनश्याम पंकज  भी इसके संपादक रहे। बाद में यह पत्र दिनमान टाइम्स के नाम से निकला और बाद में बंद हो गया। दिनमान की आरंभिक टीम में साहित्यकार ज्यादा थे। इसका असर उसके कथ्य और भाषा पर भी दिखता है। वैचारिकता के साथ उदारवादी और मानवीय चेहरा इसकी पहचान बना। पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी के निर्माण का श्रेय इस पत्रिका को जाता है। यह भी कहा जाता है कि दिनमान एक ऐसी पत्रिका बन पाई जो अंग्रेजी पत्रकारिता के बरक्स शान से खड़ी हो पाई।

      संपादक श्री अच्युतानंद मिश्र ने अपने समय की महत्वपूर्ण पत्रिका रविवार के अध्ययन का काम सुधांशु मिश्र को सौंपा। पुस्तक के अंतिम अध्याय में रविवार के इतिहास विकास और योगदान की गंभीर चर्चा की गयी है। पत्रिका के उद्भव और विकास के खंड में बताया गया है कि इसके प्रथम संपादक एमजे अकबर बने और पत्रिका का प्रकाशन 28 अगस्त, 1977 को प्रारंभ हुआ। आनंद बाजार समूह की इस पत्रिका ने बहुत कम समय में हिंदी जगत में अपनी खास जगह बना ली। प्रकाशन के आठ माह बाद सुरेंद्र प्रताप सिंह इसके संपादक बने। वे सात साल संपादक रहे। फिर उदयन शर्मा और विजित कुमार बसु इसके क्रमशः संपादक और कार्यवाहक संपादक बने और अंततः 22 अक्टूबर,1989 को इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया। पत्रिका देश में हो रहे राजनीतिक परिर्वतनों की साक्षी बनी और इसका मूल स्वर राजनैतिक ही रहा। तेवरों भरी राजनीतिक रिपोर्ताज इसकी पहचान बने। इसके साथ ही प्रादेशिक राजनीति, नक्सल संकट,दस्यु समस्या और सांप्रदायिक मुद्दों पर भी इसकी रिपोर्ट सराही गयी। अंतराष्ट्रीय विषयों के साथ-साथ, राजनीति में योगियों और तांत्रिकों की छाया के बारे में भी काफी कुछ छपा। आपातकाल के बाद की राजनीति और समाज को इस पत्रिका ने बहुत गंभीरता से रेखांकित किया।

पुस्तक का द्वितीय खंड –

पुस्तक के द्वितीय खंड में आज, हिंदुस्तान, दैनिक नवज्योति और नवभारत जैसे चार दैनिक अखबारों की चर्चा की गयी है। यह चार अखबार हिंदी पट्टी के न सिर्फ नामवर अखबार हैं बल्कि इनमें आजादी के पहले और बाद का भी इतिहास दर्ज है। इस खंड में आज के बारे में डा. धीरेंद्रनाथ सिंह(अब स्वर्गीय), हिंदुस्तान के बारे में संत समीर, दैनिक नवज्योति के बारे में सत्यनारायण जोशी और नवभारत के बारे में मनोज कुमार ने बहुत बेहतर तरीके से शोधपरक सामग्री प्रस्तुत की है। आज के उद्भव और विकास के अध्याय में बताया गया है कि राष्ट्ररत्न श्री शिवप्रसाद गुप्त ने अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान लंदन टाइम्स का कार्यालय देखा और वैसा ही अखबार भारत से निकालने का संकल्प लिया। यह भारत का एक ऐसा अखबार था जिसके विदेशों में भी प्रतिनिधि थे। आज राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा हुआ था। इसके यशस्वी संपादक बाबूराव विष्णुराव पराड़कर हिंदी के उन्नायकों में हैं। उनके संपादकीय नेतृत्व से भाषा का बहुत विकास हुआ, हिंदी आत्मनिर्भर बनी। पराड़कर जी के बाद इसके यशस्वी संपादकों में संपूर्णानंद जी, कमलापति शास्त्री, विद्याभास्कर, कालिका प्रसाद,श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार, रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर जैसे लोग रहे। जिन पर सारा हिंदी समाज गर्व करता है। यह एक संपूर्ण अखबार था जिसने स्थानीयता विकास और राष्ट्रीयता का विमर्श साथ में चलाया।

   दूसरे चयनित पत्र हिंदुस्तान के बारे में संत समीर ने विस्तार से वर्णन किया है। 12 अप्रैल,1936 को इस अखबार का प्रकाशन हुआ और जल्दी ही जनभावनाओं का आईना बन गया। यह पत्र भी राष्ट्रीय विचारों का संवाहक बना और आजादी की लड़ाई में सहयोगी रहा। कांग्रेस की विचारधारा से जुड़ा रहा यह पत्र विचारों की अलख जगाता रहा। इसे अनेक बार प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। इसके आद्य संपादक सत्यदेव विद्यालंकार रहे। आज यह पत्र काफी विस्तार कर उत्तर भारत के बहुत प्रसारित दैनिकों में शामिल हो चुका है। इसके यशस्वी संपादकों में मुकुट विहारी वर्मा, हरिकृष्ण त्रिवेदी, रतनलाल जोशी, चंद्रूलाल चंद्राकर, विनोद कुमार मिश्र, हरिनारायण निगम, मृणाल पाण्डेय, आलोक मेहता, अजय उपाध्याय के नाम उल्लेखनीय हैं। इन दिनों श्री शशि शेखर इसके संपादक हैं।

  राजस्थान के प्रमुख हिंदी दैनिक दैनिक नवज्योति पर सत्यनारायण जोशी ने अध्ययन प्रस्तुत किया है। 2 अक्टूबर,1936 को अजमेर से प्रकाशित  यह अखबार आज भी राजस्थान में एक प्रमुख उपस्थिति बनाए हुए है। अखबार ने अपने प्रकाशन के साथ ही सामंती शासन और अंग्रेजी सरकार दोनों को चुनौती दी। इस दौरान सरकार ने अपना दमन चक्र भी चलाया। इस तरह जनचेतना फैलाने और सामाजिक सरोकारों के प्रति सजगता के लिए यह पत्र ख्यात रहा है। कांग्रेस समर्थक पत्र होने के कारण इसका स्वतंत्रता आंदोलन से सीधी रिश्ता रहा। आदर्श, नीति और सिद्धांतों पर चलने वाले पत्रों में इसका हमेशा उल्लेख होगा।

  इसी क्रम में नवभारत समाचार पत्र का विशेष अध्ययन मनोज कुमार ने प्रस्तुत किया है। रामगोपाल माहेश्वरी इसके संस्थापक संपादक थे। 1938 में नागपुर से प्रारंभ हुआ यह पत्र आज भी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश का प्रमुख अखबार है। अपने समय में इसकी ख्याति एक गांधीवादी विचारों के समाचार पत्र की रही है। कांग्रेस से भी इसका जुड़ाव स्पष्ट ही है। स्वतंत्रता संग्राम में भी इस समाचार पत्र की सकारात्मक भूमिका रही है। पुस्तक में बताया गया है कि पत्र की रीति न काहू से दोस्ती न काहू से बैर वाली रही है। आजादी के बाद इसका काफी विस्तार हुआ यह पत्र मध्यभारत की आवाज बन गया। नवभारत से अनेक प्रमुख संपादक और पत्रकार जुड़े रहे जिनके योगदान से यह अखबार शिखर पर पहुंचा। जिनमें कुंजबिहारी पाठक, मायाराम सुरजन, कालिका प्रसाद दीक्षित कुसुमाकर, गंगा पाठक, मधुप पाण्डेय, विष्णु, दाऊलाल साखी, ध्यानसिंह राजा तोमर, विजयदत्त श्रीधर, राजेंद्र नूतन, जगत पाठक, गिरीश मिश्र, श्याम वेताल, गोविंदलाल वोरा,बबनप्रसाद मिश्र, कमल दीक्षित,राकेश पाठक आदि प्रमुख हैं।  

 पुस्तक का तृतीय खंड-

 पुस्तक के तीसरे खंड में संपादक श्री अच्युतानंद मिश्र ने नवभारत टाइम्स, नईदुनिया, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण और अमर उजाला चयन किया है। निश्चित तौर पर ये समाचार पत्र हिंदी पट्टी के ऐसे पत्र हैं जिनके बिना हिंदी पत्रकारिता का इतिहास अधूरा रहेगा। इन पांचों समाचार पत्रों के व्यापक प्रसार, विषय सामग्री और श्रेष्ठ संपादकों के नेतृत्व ने इन्हें खास बनाया है।

   बेनेट कोलमैन कंपनी के अखबार नवभारत टाइम्स की विकास यात्रा और उसके प्रदेय पर अमरेंद्रकुमार राय ने अध्ययन किया है। पहले यह अखबार नवभारत नाम से निकला और बाद में यह नवभारत टाइम्स बना। इसके प्रथम संपादक सत्यदेव विद्यालंकार थे। बाद के दिनों में सुरेंद्र बालूपुरी, राणा जंगबहादुर सिंह,अक्षय कुमार जैन,सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय,आनंद जैन, राजेंद्र माथुर,एसपी सिंह,विद्यानिवास मिश्र, सूर्यकांत बाली,रमेश चंद्र जैन, मधुसूदन आनंद जैसे दिग्गज संपादकों ने इसी दिशा दी और लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचा दिया। विश्लेषण में कहा गया है कि अपने आरंभिक दिनों की तरह यह पत्र अब साहित्य संस्कृति का वाहक नहीं रहा। बल्कि बाजार की हवाओं ने इसके रूख में बहुत परिवर्तन किया है। अब यह तमाम उत्पादों की तरह एक उत्पाद है।

     इंदौर से छपकर राष्ट्रीय ख्याति पाने वाले नईदुनिया के बारे में श्री शिवअनुराग पटैरया ने अपना अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस पत्र ने जो प्रतिष्ठा पाई वह आज भी इतिहास है। अपने दिग्गज संपादकों, श्रेष्ठ छाप-छपाई और प्रस्तुति, विषय वस्तु ने इसे राष्ट्रीय अखबारों के समतुल्य खड़ा कर दिया। 5 जून,1947 को सांध्य अखबार के तौर पर निकले इस अखबार के प्रधान संपादक थे कृष्णकांत व्यास और प्रकाशक थे कृष्णचंद्र मुद्गल। मुद्गल के हटने के बाद बाबू लाभचंद छजलानी के हाथ में इसकी कमान आई, साथ में नरेंद्र तिवारी और बसंतीलाल सेठिया भी जुड़ गए। इसके बाद से अखबार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। राहुल बारपुते, विष्णु चिंचालकर और रणवीर सक्सेना की त्रिमूर्ति ने अखबार का चेहरा बदलकर रख दिया। आधुनिक तकनीक, पाठकों से जीवंत रिश्ता, संपादकीय सामग्री की उत्कृष्ठता तीन कारणों ने अखबार को शिखर पहुंचा दिया। इस अखबार के संपादकों में राहुल बारपुते,अभय छजलानी, राजेंद्र माथुर ने इसे विविध प्रयोगों से राष्ट्रीय ख्याति दिलाई।

     कभी उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय दैनिक रहे स्वतंत्र भारत के बारे में रजनीकांत वशिष्ठ ने अध्ययन प्रस्तुत किया है। इसमें अखबार के उत्कर्ष से अवसान  तक की गाथा को उन्होंने बहुत अच्छे से पिरोया है। अशोक जी जैसे दिग्गज संपादकों ने इस अखबार को संवारा और इसने लंबी यात्रा तय की। जयपुरिया से थापर और बाद में अनेक मालिकों के हाथों से गुजरते हुए यह अखबार अब बहुत दुर्बल अवस्था में है। राजनाथ सिंह, घनश्याम पंकज, ज्ञानेंद्र शर्मा जैसे दिग्गज इसके संपादक रहे।

  उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से 21 सितंबर,1947 को प्रकाशित हुए दैनिक जागरण की प्रगति यात्रा विस्मयकारी और निरंतर है। पुस्तक में इसका अध्ययन बच्चन सिंह ने प्रस्तुत किया है। यह समूह अपनी निर्भीकता, जनपक्षधरता और स्थानीय खबरों को महत्व देकर आगे बढ़ा। विस्तारवादी सोच ने इसे हिंदी का सबसे प्रसारित अखबार भी बना दिया है। यह सही मायने में एक संपूर्ण अखबार है जिसने अपने पाठकों को हमेशा केंद्र में रखा है। रंगीन साप्ताहिक परिशिष्ठों और तकनीकी के नए प्रयोगों से एक सुदर्शन अखबार की प्रस्तुति कैसी होनी चाहिए, प्रबंधन का ध्यान सदैव इस ओर रहा है। राष्ट्रीय विचारों और भारतीयता के प्रति समर्पित यह समाचार उत्तरभारत के पाठकों में बहुत लोकप्रिय है। अपने वैचारिक पृष्ठों और आग्रहों के लिए भी यह चर्चित रहा है।

   अमर उजाला, अपनी खास तरह की पत्रकारिता और संपादकीय परंपरा को उन्नत करने वाले समाचार पत्रों में एक है। इसका अध्ययन अभय प्रताप ने किया है। अमर उजाला ने अपने प्रकाशन के साथ ही अपनी आचार संहिता प्रस्तुत की और अपने मानक तय किए। यह किसी भी प्रकाशन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अमर उजाला ने अपना व्यापक विस्तार किया  है और हिंदी के अग्रणी प्रकाशनों में शामिल है। एक व्यावसायिक पत्र होते भी अमर उजाला कुछ मूल्यों के साथ जुड़ा हुआ है। क्षेत्रीय पत्रकारिता का अग्रणी होने के साथ अमर उजाला को क्षेत्रीय पत्रकारिता के मूल्य विकसित करने चाहिए ऐसा सुझाव भी अध्ययनकर्ता ने दिया है।

   पुस्तक का चौथा खंड-

 पुस्तक के चौथे खंड में राजस्थान पत्रिका पर अचला मिश्र, युगधर्म पर अंजनी कुमार झा, दैनिक भास्कर पर सोमदत्त शास्त्री, देशबंधु पर डा. देवेशदत्त मिश्र, स्वदेश पर रामभुवन सिंह कुशवाह, और प्रभात खबर पर जेब अख्तर की टिप्पणी है। इस खंड में शामिल अखबारों का प्रभाव प्रमुख क्षेत्र मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़,राजस्थान और झारखंड रहा है। इन अखबारों ने पत्रकारिता की जो उजली परंपराएं स्थापित की उसने इन्हें राष्ट्रीय ख्याति दिलाई है। स्वदेश और युगधर्म तो राष्ट्रीय भावधारा के पोषक पत्र रहे। बहुत प्रसार न होने के बाद भी इनकी बात गंभीरता से सुनी जाती थी। इन समाचार पत्रों को असहमति के पक्ष की तरह भी देखा जाना चाहिए। तो वहीं दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और प्रभात खबर ने अपने व्यापक प्रसार क्षेत्र से हिंदी पत्रकारिता का गौरव बढ़ाया। इस खंड में चयनित अखबार संपादक के व्यापक दृष्टिकोण के परिचायक हैं किस तरह हिंदी क्षेत्र के सामान्य अखबारों ने भी निरंतर चलते हुए अपना न सिर्फ सामाजिक आधार बढ़ाया बल्कि देश के एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र को भी संबोधित कर रहे हैं। पुस्तक के चारों खंड आजादी के बाद हिंदी पट्टी में चली पत्रकारिता का विहंगावलोकन प्रस्तुत करते हैं। इन्हें पढ़ते हुए हमें न सिर्फ एक पूरी यात्रा समझ में आती है बल्कि हिंदी पत्रकारिता का आत्मसंघर्ष, संपादकों और प्रकाशकों की जिजीविषा भी दिखती है। इनमें ज्यादातर प्रकाशन बहुत सामान्य स्थितियों से प्रारंभ होकर बहुत बड़े प्रकाशन बने। टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स समूहों के अखबारों और पत्रिकाओं की बात छोड़ दें तो ज्यादातर प्रकाशन सामान्य मध्यवर्गीय पत्रकारों या परिवारों द्वारा प्रारंभ किये गए, जिनके पास बहुत पूंजी लगाने को नहीं थी। वावजूद इसके उनका विस्तार हमें प्रेरित करता है। राजस्थान पत्रिका के संपादक- प्रकाशक कुलिश जी तो एक पत्रकार हैं और आज यह समूह देश का गौरव है  और अहिंदीभाषी इलाकों से भी अपने संस्करण प्रकाशित कर हिंदी सेवा में लगा है।

   हिंदी के प्रमुख समाचारपत्र और पत्रिकाएं का संपादन कर श्री अच्युतानंद मिश्र ने इतिहास के संरक्षण का काम तो किया ही है, वे इस बहाने हिंदी भाषी समाज में गौरवबोध भी भरते नजर आते हैं। अखबारों और पत्रिकाओं का चयन भी उन्होंने इस तरह से किया है जिससे समूची हिंदी पट्टी का पत्रकारीय स्वर और व्यक्तित्व सामने आता है। चारों खंडों का पाठ हमें हमारी जातीय स्मृति का बोध तो कराता ही है, भाषा के विकास में पत्रकारिता के योगदान को भी रेखांकित करता है। एक ओर जहां ऐसे पत्र हैं जिन्होंने विचार को आगे रखकर अपनी यात्रा की तो वहीं ऐसे पत्र भी हैं जिन्होंने आक्रामण विपणन और मार्केटिंग रणनीतियों से हिंदी का बाजार व्यापक किया। हिंदी की संभावनाओं को बहुज्ञात कराया।  हिंदी सिर्फ विचार, साहित्य, सूचना के बजाए बाजार में भी इसके चलते स्थापित होती नजर आई। पाठकीय रूचियों और पाठकों के मन का अखबार बनाने के तौर तरीके भी इस अध्ययन से सामने आते हैं। इनमें दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान,पत्रिका ऐसे पत्र हैं जो आज  देश के प्रथम दस अखबारों की सूची में जगह बनाते हैं। जाहिर तौर पर यह अध्ययन हिंदी के आत्मविश्वास, हिंदी के आत्मसंघर्ष और उससे उपजी सफलताओं का दस्तावेज है। इसके लिए संपादक की विलक्षण दृष्टि, संतुलित चयन और अध्ययनकर्ता लेखकों का श्रम स्तुत्य है।

पुस्तक- हिंदी के प्रमुख समाचारपत्र और पत्रिकाएं(चार खंड)

संपादक- अच्युतानंद मिश्र

प्रकाशक-सामयिक प्रकाशन,दिल्ली-110002

मूल्यः 2000 रूपए(चार खंड)

 


मंगलवार, 30 जुलाई 2024

प्रभात झा: लोकसंग्रह और संघर्ष से बनी शख्सियत

                                                                     -प्रो.संजय द्विवेदी 


   यह नवें दशक के बेहद चमकीले दिन थे। उदारीकरण और भूमंडलीकरण जिंदगी में प्रवेश कर रहे थे। दुनिया और राजनीति तेजी से बदल रहे थी। उन्हीं दिनों मैं छात्र आंदोलनों से होते हुए दुनिया बदलने की तलब से भोपाल में पत्रकारिता की पढ़ाई करने आया था। एक दिन श्री प्रभात झा जी अचानक सामने थे, बताया गया कि वे पत्रकार रहे हैं और भाजपा का मीडिया देखते हैं। इस तरह एक शानदार इंसान, दोस्तबाज,तेज हंसी हंसने वाले, बेहद खुले दिलवाले झा साहब हमारी जिंदगी में आ गए। मेरे जैसे नये-नवेले पत्रकार के लिए यह बड़ी बात थी कि जब उन्होंने कहा कि" तुम स्वदेश में हो, मैं भी स्वदेश में रह चुका हूं।" सच एक पत्रकार और संवाददाता के रूप में ग्वालियर में उन्होंने जो पारी खेली वह आज भी लोगों के जेहन में हैं। एक संवाददाता कैसे जनप्रिय हो सकता है, वे इसके उदाहरण हैं। रचना,सृजन, संघर्ष और लोकसंग्रह से उन्होंने जो महापरिवार बनाया मैं भी उसका एक सदस्य था।

      उत्साह, ऊर्जा और युवा पत्रकारों को प्रोत्साहित कर दुनिया के सामने ला खड़े करने वाला प्रभात जी का स्वभाव उन्हें खास बनाता था। अब उनका पर्याय नहीं है। वे अपने ढंग के अकेले राजनेता थे,जिनका पत्रकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों से लेकर पार्टी के साधारण कार्यकर्ताओं तक आत्मीय संपर्क था। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। फिर उसकी विचारधारा से जुड़े अखबार में रहे और बाद में भाजपा को समर्पित हो गये। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक उनकी यात्रा उनका एकांगी परिचय है। वे विलक्षण संगठनकर्ता, अप्रतिम वक्ता और इन सबसे बढ़कर बेहद उदार व्यक्ति थे। उनके जीवन में कहीं जड़ता और कट्टरता नहीं थी। वे समावेशी उदार हिंदू मन का ही प्रतीक थे। उनका न होना मेरी व्यक्तिगत क्षति है। वे मेरे संरक्षक, मार्गदर्शक और सलाहकार बने रहे। उनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन ने मेरे जैसे न जाने कितने युवाओं को प्रेरित किया।

  उनके निधन से समाज जीवन में जो रिक्तता बनी है, उसे भर पाना कठिन है। छात्र जीवन से ही उनका मेरे कंधे पर जो हाथ था,वह कभी हटा नहीं। भोपाल, रायपुर, बिलासपुर, मुंबई मेरी पत्रकारीय यात्रा के पड़ाव रहे,प्रभात जी हर जगह मेरे साथ रहे। वे आते और उससे पहले उनका फोन आता। उनमें दुर्लभ गुरूत्वाकर्षण था। उनके पास बैठना और उन्हें सुनने का सुख भी विरल था। किस्सों की वे खान थे। भाजपा की राजनीति और उसकी भावधारा को मैं जितना समझ पाया उसमें श्री प्रभात झा और स्व.लखीराम अग्रवाल का बड़ा योगदान है। भाजपा की अंर्तकथाएं सुनाते फिर हिदायत भी देते, ये छापने के लिए नहीं, तुम्हारी जानकारी और समझ के लिए है।

   मुझे नहीं पता कि प्रभात जी पत्रकारिता में ही रहते तो क्या होते। किंतु भाजपा में रहकर उन्होंने 'विचार' के लिए जगह बनाकर प्रकाशन, लेखन और मीडिया के पक्ष को बहुत मजबूत किया। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की जमीन पर भाजपा के विचार को मीडिया और बौद्धिक वर्ग में उन्होंने लोकस्वीकृति दिलाई। वे 'कमल संदेश' जैसे भाजपा के राष्ट्रीय मुखपत्र के वर्षों संपादक रहे। राज्यों में भाजपा की पत्रिकाएं और प्रकाशन ठीक निकलें , ये उनकी चिंता के मुख्य विषय थे। आमतौर पर राजनेता जिन बौद्धिक विषयों को अलक्षित रखते थे, प्रभात जी उन विषयों पर सजग रहते। वे उन कुछ लोगों में थे जिनका हर दल और विचारधारा से जुड़े लोगों से संवाद था। एक बार उन्होंने मुझसे कहा था "अपने कार्यक्रमों में सभी को बुलाएं, तभी आनंद आता है। एक ही विचार के वक्ताओं के बीच एकालाप ही होता है, संवाद संभव नहीं।" उन्होंने मेरी किताब 'मीडिया नया दौर नयी चुनौतियां' का लोकार्पण एक भव्य समारोह में किया। जिसमें माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो.बीके कुठियाला, टीवी पत्रकार और संपादक रविकांत मित्तल भी उपस्थित थे। दिल्ली के अनेक मंचों पर मुझे उनका सान्निध्य मिला। उनका साथ एक ऐसी छाया रहा, जिससे वंचित होकर उसका अहसास अब बहुत गहरा हो गया है। वे हमारे जैसे तमाम युवाओं की जिंदगी में सपने जगाने वाले नायक थे। हम छोटे शहरों, गांवों से आए लोगों को वे बड़ा आसमान दिखाकर उड़ान के लिए छोड़ देते थे। 

उन्होंने तमाम ऐसी प्रतिभाओं को खोजा, उन्हें संगठन में प्रवक्ता, संपादक , मंत्री, सांसद, विधायक और तमाम सांगठनिक पदों तक पहुंचने में मदद की। एक समय भाजपा के राष्ट्रीय सचिव के नाते वे बहुत ताकतवर थे। अध्यक्ष राजनाथ सिंह (अब रक्षा मंत्री) उन पर बहुत भरोसा करते थे। प्रभात जी ने इस समय का उपयोग युवाओं को जोड़ने में किया। मैं नाम गिनाकर न लेख को बोझिल बनाना चाहता हूं, न उन व्यक्तियों को धर्म संकट में डालना चाहता हूं, जो आज बहुत बड़े हो चुके हैं। भाजपा का आज स्वर्ण युग है, संसाधन, कार्यकर्ता आधार बहुत विस्तृत हो गया है। किंतु प्रभात जी बीजेपी के 'ओल्ड स्कूल' में ही बने रहे। जहां पार्टी परिवार की तरह चलती थी और व्यक्ति से व्यक्तिगत संपर्क को महत्व दिया जाता था। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के अनेक राज्यों के कार्यकर्ता, पत्रकार,समाज के विविध क्षेत्रों में सक्रिय लोग उनसे बेहिचक मिलते थे। इस सबके बीच उन्होंने अपने स्वास्थ्य का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा। मैंने उन्हें दीनदयाल परिसर के एक छोटे कक्ष में रहते देखा है। परिवार ग्वालियर में ,खुद भोपाल में एकाकी जीवन जीते हुए। यहां भी दरवाजे सबके लिए हर समय खुले थे, जब अध्यक्ष बने तब भी। दिनचर्या पर उनका नियंत्रण नहीं था, क्योंकि पत्रकारिता में भी कोई दिनचर्या नहीं होती। मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने जिस तरह तूफानी प्रवास किया, उसने कार्यकर्ताओं को भले खुश किया। राजपुत्रों को उनकी सक्रियता अच्छी नहीं लगी। वे षड्यंत्र के शिकार तो हुए ही, अपना स्वास्थ्य और बिगाड़ बैठे। उनका पिंड 'पत्रकार' का था, किंतु वे 'जननेता' दिखना चाहते थे। इससे उन्होंने खुद का तो नुकसान किया ही, दल में भी विरोधी खड़े किये। बावजूद इसके वे मैदान छोड़कर भागने वालों में नहीं थे। डटे रहे और अखबारों में अपनी टिप्पणियों से रौशनी बिखेरते रहे। आज जब परिवार जैसी पार्टी को कंपनी की तरह चलाने की कोशिशें हो रही हैं, तब प्रभात झा जैसे व्यक्ति की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है।

 उनकी पावन स्मृति को शत्-शत् नमन। भावभीनी श्रद्धांजलि।



गुरुवार, 4 जुलाई 2024

नफरतों, कड़वाहटों और संवादहीनता का समय!


-सार्थक संवाद की दृष्टि से निराशाजनक रहा लोकसभा का पहला सत्र 

-प्रो.संजय द्विवेदी 



   भारतीय संसद अपनी गौरवशाली परंपराओं, विमर्शों और संवाद के लिए जानी जाती है। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लोकतांत्रिक बहसों को प्रोत्साहित किया और अपने प्रतिपक्ष के नेताओं डा.राममनोहर लोहिया, श्यामा प्रसाद मुखर्जी,अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर पीलू मोदी तक को मुग्ध भाव से सुना। राष्ट्र प्रेम ऐसा कि चीन युद्ध के बाद गणतंत्र दिवस की परेड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों को आमंत्रित कर उनकी राष्ट्रभक्ति को सराहा। किंतु लोकसभा के प्रथम सत्र में जो कुछ हुआ,वह संवाद की धारा को रोकने वाला है। इससे संसद विमर्श और संवाद का केंद्र नहीं अखाड़ा बन गयी। 

  राष्ट्रपति के भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में जब नेता सदन और प्रधानमंत्री बोल रहे थे, उनके लगभग दो घंटे के भाषण में विपक्षी सदस्यों ने आसमान सिर पर उठा रखा था। लगातार नारेबाजी से उनका भाषण सुनना मुश्किल था। इसके विपरीत जब पहले दिन नेता प्रतिपक्ष बोल रहे थे,तो उनके भाषण में सत्तारूढ़ दल के प्रधानमंत्री सहित तीन मंत्रियों ने हस्तक्षेप किया। नेता प्रतिपक्ष को बताया गया कि वे सदन के पटल पर गलत तथ्य न रखें। यह दोनों स्थितियां भारतीय राजनीति में बढ़ते अतिवाद को स्पष्ट करती हैं, जहां संवाद संभव नहीं है। लोकसभा अध्यक्ष पर नेता प्रतिपक्ष द्वारा की गई अनावश्यक टीका-टिप्पणी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

  नेता प्रतिपक्ष की गलत बयानी के लिए बाद में सत्तारूढ़ दल के वक्ता अपने भाषणों में उनके भाषण की चीरफाड़ कर सकते थे। किंतु शीर्ष स्तर से लगातार हस्तक्षेप ने नेता प्रतिपक्ष का मनोबल बढ़ा दिया। वे सत्ता पक्ष को उत्तेजित करने में सफल रहे और पहले दिन के मीडिया विमर्श में उन्हें 'सक्रिय नेता प्रतिपक्ष' घोषित कर दिया गया। सेकुलर मीडिया के सेनानियों ने उन्हें 'मैन आफ द मैच' घोषित कर दिया। ज़ाहिर है लंबे समय से गंभीर राजनेता की छवि बनाने के लिए आतुर राहुल गांधी के लिए यह अप्रतिम समय था। किंतु पहले दिन की वाहवाही अगले दिन ही धराशाई हो गई जब प्रधानमंत्री के भाषण में दो घंटे तक नारेबाजी चलती रही। देश की जनता दोनों तरह की अतियों के विरुद्ध है। सदन की गरिमा को बचाने के लिए राजनीतिक दलों को कुछ ज्यादा उदार होना चाहिए। 

  लोकसभा के प्रथम सत्र से निकली छवियां बता रही हैं कि आगे भी सब कुछ सामान्य नहीं रहने वाला है। किंतु संसद को अखाड़ा, चौराहे की चर्चा के स्तर पर ले जाने के लिए किसे जिम्मेदार माना जाए? यह ठीक बात है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है, किंतु सदन में सार्थक और प्रभावी विमर्श खड़ा करना विपक्षी दलों की भी जिम्मेदारी है। अब जबकि विपक्ष अपनी बढ़ी संख्या पर मुग्ध है तो क्या उसे संसदीय मर्यादाओं को छोड़कर अराजकता का आचरण करना चाहिए? सच तो यह है कि सदन के इस तरह चलने से सत्तारूढ़ दल का ही लाभ है।  बिना बहस और चर्चा के कानून इसीलिए पास होते हैं क्योंकि संसद का ज्यादातर समय हम विवादों में खर्च कर देते हैं। संसदीय परंपरा रही है कि हर नयी सरकार को प्रतिपक्ष कम से कम छः माह का समय देता है। उसके कार्यक्रम और योजनाएं का मूल्यांकन करता है। पहले दिन से ही सदन को अराजकता की ओर ढकेलना उचित नहीं कहा जा सकता। अपनी लंबी संसदीय प्रणाली में भारत ने अनेक संकटों का समाधान किया है। हमारे संसदीय परंपरा का मूलमंत्र है संवाद से संकटों और समस्याओं का समाधान खोजना। संसद इसी का सर्वोच्च मंच है। यह प्रक्रिया नीचे पंचायत तक जाती है। इससे सहभागिता सुनिश्चित होती है, सुशासन का मार्ग प्रशस्त होता है। संसद से नीचे के सदनों विधानसभा सभाओं,विधान परिषदों, नगरपालिका, नगर निगमों और पंचायतों को भी सांसदों का आचरण ही रास्ता दिखाता है। लोकसभा के पहले सत्र का लाइव प्रसारण देखते हुए हर संवेदनशील भारतीय जन को ये दृश्य अच्छे नहीं लगे हैं। संसदीय मर्यादाओं और परंपराओं की रक्षा हमारे सांसद गण नहीं करेंगे तो कौन करेगा? संसदीय राजनीति के शिखर पर बैठे दायित्ववान सांसदों की यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि वे अपने आचरण से इस महान संस्था का गौरव बढ़ाने में सहयोगी बनें। नफरतों, कड़वाहटों और संवादहीनता से 'राजनीति' तो संभव है पर 'राष्ट्रनीति' हम न कर पाएंगे।

शनिवार, 15 जून 2024

'इंडिया' की आंखों से भारत को मत देखिए!

-भारतीयता को नए संदर्भों  में व्याख्यायित करना जरूरी 

-प्रो. संजय द्विवेदी



    आजकल राष्ट्रीयता,भारतीयता, राष्ट्रत्व और राष्ट्रवाद जैसे शब्द चर्चा और बहस के केंद्र में है। ऐसे में यह जरूरी है कि हम भारतीयता पर एक नई दृष्टि से सोचें और जानें कि आखिर यह क्या है? ‘राष्ट्र’ सामान्य तौर पर सिर्फ भौगोलिक नहीं बल्कि ‘भूगोल-संस्कृति-लोग’ के तीन तत्वों से बनने वाली इकाई है। इन तीन तत्वों से बने राष्ट्र में आखिर सबसे महत्वपूर्ण तत्व कौन सा है? जाहिर तौर पर वह ‘लोग’ ही होगें। इसलिए लोगों की बेहतरी,भलाई, मानवता का स्पंदन ही किसी राष्ट्रीयता का सबसे प्रमुख तत्व होना चाहिए।

        जब हम लोगों की बात करते हैं तो भौगोलिक इकाईयां टूटती हैं। अध्यात्म के नजरिए से पूरी दुनिया के मनुष्य एक हैं। सभी संत, आध्यात्मिक नेता और मनोवैज्ञानिक भी यह मानने हैं कि पूरी दुनिया पर मनुष्यता एक खास भावबोध से बंधी हुयी है। यही वैश्विक अचेतन (कलेक्टिव अनकांशेसनेस) हम-सबके एक होने का कारण है। स्वामी विवेकानंद इसी बात को कहते थे कि इस अर्थ में भारत एक जड़ भौगोलिक इकाई नहीं है। बल्कि वह एक चेतन भौगोलिक इकाई है, जो सीमाओं और सैन्य बलों पर ही केंद्रित नहीं है। भारतीय राष्ट्रवाद मनुष्य के विस्तार व विकास पर केंद्रित है। जिसे भारत ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ कहकर संबोधित किया। यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ राजनीतिक सत्ता का उच्चार नहीं है। उपनिषद् का उच्चार है। सारी दुनिया के लोग एक परिवार, एक कुटुम्ब के हैं, इसे समझना ही दरअसल भारतबोध को समझना है। यह भाव ही मनुष्य की सांस्कृतिक एकता के विस्तार का प्रतीक है। हमारे सांस्कृतिक मूल्य, मानवतावादी सांस्कृतिक मूल्यों पर केंद्रित हैं। हमारी भारतीय अवधारणा में राज्य निर्मित भौगोलिक-प्रशासनिक इकाईयां प्रमुख स्थान नहीं रखतीं बल्कि हमारी चेतना, संस्कृति, मूल्य आधारित जीवन और परंपराएं ही यहां हमें राष्ट्र बनाती हैं। हमारे सांस्कृतिक इतिहास की ओर देखें तो आर्यावर्त की सीमाएं कहां से कहां तक विस्तृत हैं, जबकि सच यह है कि इस पूरे भूगोल पर राज्य बहुत से थे, राजा अनेक थे- किंतु हमारा सांस्कृतिक अवचेतन हमें एक राष्ट्र का अनुभव करता था। एक ऐतिहासिक सत्य यह  भी यह है  कि हमारा राष्ट्रीयता दरअसल राज्य संचालित नहीं था, वह समाज और बौद्धिक चेतना से संपन्न संतों, ऋषियों द्वारा संचालित थी। एक विद्वान कहते हैं राजा राज्य बनाते हैं, राष्ट्र ऋषि बनाते हैं। वही भारतबोध इस व्यापक भूगोल की चेतना में समाया हुआ था। यहां का ज्ञान विस्तार जिस तरह चारों दिशाओं में हुआ,वह बात हैरत में डालती है।

    आप देखें तो भगवान बुद्ध पूरी दुनिया में अपने संदेश को यूं ही नहीं फैला पाए, बल्कि उस ज्ञान में एक ऐसा नवाचार,नवचेतन था, जिसे दुनिया ने स्वतः आगे बढ़कर ग्रहण किया। भारत कई मायनों में अध्यात्म और चेतना की भूमि है। सच कहें तो दुनिया की तमाम स्थितियों से भारत एक अलग स्थिति इसलिए पाता है, क्योंकि यह भूमि संतों के लिए, ज्ञानियों के लिए उर्वर भूमि है। दुनिया के तमाम विचारों की सांस्कृतिक चेतना जड़वादी है, जबकि भारत की चेतना जैविक है। इसलिए भारत मरता नहीं है, क्योंकि वह जड़वादी और हठवादी नहीं है। यहां का मनुष्य सांस्कृतिक एकता के लिए तो खड़ा होता है पर विचारों में जड़ता आते ही उससे अलग हो जाता है। हमारा ईश्वर आंतरिक उन्नयन और पाप क्षय के लिए काम करता है। हमारे संत भी आध्यात्मिक उन्नयन और पापों के क्षय के लिए काम करते हैं। मनुष्य की चेतना का आत्मिक विस्तार ही हमारी राष्ट्रीयता का लक्ष्य है। इसलिए यह सिर्फ एक खास भूगोल, एक खास विचारधारा और पूजा पध्दति में बंधे लोगों के उद्धार के लिए नहीं, बल्कि समूची मानवता की मुक्ति के काम करने वाला विचार है। यहां मानव की मुक्ति ही उसका लक्ष्य है। यह राष्ट्रीयता सैन्यबल और व्यापार बल से चालित नहीं है, बल्कि यह चेतना के विस्तार, उसके व्यापक भावबोध और मनुष्य मात्र की मुक्ति के विचार से अनुप्राणित है।

   भारतीय संदर्भ में भारतबोध को समझना वास्तव में मानवतावाद के व्यापक परिप्रेक्ष्य को समझना है। यह विचार कहता है- “ संतों को सीकरी से क्या काम” और फिर कहता है ‘’कोई नृप होय हमें क्या हानि”। इस मायने में हम राज या राज्य पर निर्भर रहने वाले समाज नहीं थे। राजा या राज्य एक व्यवस्था थी, किंतु जीवन मुक्त था-मूल्यों पर आधारित था। पूरी सांस्कृतिक परंपरा में समाज ज्यादा ताकतवर था और स्वाभिमान के साथ उदार मानवतावाद और एकात्म मानवदर्शन पर आधारित जीवन जीता था। वह चीजों को खंड-खंड करके देखने का अभ्यासी नहीं था। इसलिए इस राष्ट्रीयता में जो समाज बना, वह राजा केंद्रित नहीं, संस्कृति केंद्रित समाज था। जिसे अपने होने-जीने की शर्तें पता थीं, उसे उसके कर्तव्य ज्ञात थे। उसे राज्य की सीमाएं भी पता थीं और अपनी मुक्ति के मार्ग भी पता थे। इस समाज में गुणता की स्पर्धा थी- इसलिए वह एक सुखी और संपन्न समाज था। इस समाज में भी बाजार था, किंतु समाज- बाजार के मूल्यों पर आधारित नहीं था। आनंद की सरिता पूरे समाज में बहती थी और आध्यात्मिकता के मूल्य जीवन में रसपगे थे। भारतीय समाज जीवन अपनी सहिष्णुता के नाते समरसता के मूल्यों का पोषक है। इसीलिए तमाम धाराएं,विचार,वाद और पंथ इस देश की हवा-मिट्टी में आए और अपना पुर्नअविष्कार किया, नया रूप लिया और एकमेक हो गए। भारतीयता हमारे राष्ट्र का अनिवार्य तत्व है। भारतीयता के माने ही है स्वीकार। दूसरों को स्वीकार करना और उन्हें अपनों सा प्यार देना। यह राष्ट्रवाद विविधता को साधने वाला, बहुलता को आदर देने वाला और समाज को सुख देने वाला है। इसी नाते भारत का विचार आक्रामकता का, आक्रमण का, हिंसा या अधिनायकवाद का विचार नहीं है। यह श्रेष्ठता को आदर देने वाली,विद्वानों और त्यागी जनों को पूजने वाली संस्कृति है। अपने लोक तत्वों को आदर देना ही यहां भारतबोध है। इसलिए यहां भूगोल का विस्तार नहीं, मनों और दिलों को जीतने की संस्कृति जगह पाती है।

   यहां शांति है, सुख है, आनंद है और वैभव है। यह देकर, छोड़कर और त्याग कर मुक्त होती है। समेटना यहां ज्ञान को है। संपत्ति, जमीन और वैभव को नहीं। इसलिए फकीरी यहां आदर पाती है और सत्ताएं लांछन पाती हैं। इसलिए यहां लोकसत्ता का भी मानवतावादी होना जरूरी है। यहां सत्ता विचारों से, कार्यों से और आचरण से लोकमानस का विचार करती है तो ही सम्मानित होती है। वैसे भी भारतीय समाज एक सत्ता निरपेक्ष समाज है। वह सत्ताओं की परवाह न करने वाला स्वाभिमानी समाज है। इसलिए उसने जीवन की एक अलग शैली विकसित की है, जो उसके भारतबोध ने उसे दी है। यही स्वाभिमान एक नागरिक का भी है और राष्ट्र का भी। इसलिए वह अपने अध्यात्म के पास जाता है, अपने लोक के पास जाता है और सत्ता या राज्य के चमकीले स्वप्न उसे रास नहीं आते। इसी राष्ट्र तत्व को खोजते हुए राजपुत्र सत्ता को छोड़कर वनों, जंगलों में जाते रहे हैं, ज्ञान की खोज में,सत्य की खोज में, लोक के साथ सातत्य और संवाद के लिए। राम हों, कृष्ण हों, शिव हों, बुद्ध हों, महावीर हों- सब राजपुत्र हैं, संप्रुभ हैं और सब राज के साथ समाज को भी साधते हैं और अपनी सार्थकता साबित करते हैं। इसलिए हमारी राष्ट्रीयता की अलग कथा है, उसे पश्चिमी पैमानों से नापना गलत होगा। आज इस वक्त जब भारतीयता की अनाप-शनाप व्याख्या हो रही है, हमें ठहरकर सोचना होगा कि क्या सच में हममें अपने राष्ट्र की थोड़ी भी समझ बची है? 'भारत' को 'इंडिया' की आंखों से देखने से हमें वही दिखाई देगा ,जो सत्य से बहुत दूर होगा। आइए हम भारत की आंखों से ही भारत को देखने का अभ्यास करें।  

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान,(IIMC) नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक हैं)

सोमवार, 10 जून 2024

निरंतरता, अनुभव और उत्साह का संगम है केंद्रीय मंत्रिमंडल

-डा.संजय द्विवेदी 


   केंद्र सरकार का नया मंत्रिमंडल निरंतरता की गवाही देता है। यह बात बताती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी टीम पर भरोसा कायम है। प्रमुख विभागों में अपनी आजमाई जा चुकी टीम को मौका देकर मोदी ने बहुत गंभीर संदेश दिए हैं। मंत्रिमंडल में अनुभव, उत्साह और नवाचारी विचारों के वाहक नायकों को जगह मिली है।

अनुभवी सरकार:

यह मंत्रिमंडल गहरी राजनीतिक सूझबूझ वाले नायकों से संयुक्त है। लंबे समय तक राज्य सरकारों को चलाने वाले 7 पूर्व मुख्यमंत्री इस सरकार में शामिल हैं। कैबिनेट में नरेंद्र मोदी सहित सात पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हैं। जिनमें मोदी खुद गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हैं। इसके अलावा राजनाथ सिंह (उप्र), शिवराज सिंह चौहान (मप्र), जीतनराम मांझी (बिहार), एचडी कुमारस्वामी (कर्नाटक), मनोहरलाल खट्टर(हरियाणा), सर्वानंद सोनोवाल (असम) मुख्यमंत्री रहे हैं। भारत सरकार के विदेश सचिव और पिछली सरकार में विदेश मंत्री रह चुके एस.जयशंकर अपने क्षेत्र के दिग्गज हैं। आईएएस अधिकारी रहे अश्विनी वैष्णव अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में उनके सचिव रहे,विविध अनुभव संपन्न वैष्णव सरकार में नवाचारों के वाहक हैं। पिछली सरकार उनके प्रदर्शन की गवाही है। इसी क्रम में नौकरशाह रहे हरदीप सिंह पुरी सरकार की शक्ति हैं।  नितिन गडकरी का महाराष्ट्र सरकार से लेकर अब केंद्र में 10 साल का कार्यकाल सबकी नजर में है। देश में हुई परिवहन और सड़क क्रांति के वे वाहक हैं। वे केंद्र में सबसे लंबे समय तक परिवहन मंत्री रहने का रिकार्ड बना चुके हैं।

   भाजपा के पास अनुभवी मंत्रियों की टीम सरकार के संकल्पों की वाहक बनेगी, इसमें दो राय नहीं। धर्मेंद्र प्रधान, पीयूष गोयल, प्रहलाद जोशी,किरण रिजिजू, भूपेंद्र यादव,जोएल ओराम, गजेंद्र सिंह शेखावत, डा.वीरेंद्र कुमार , ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावी हस्ताक्षर बन चुके हैं। सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के प्रभावी संचालन का रिकार्ड इनके नाम है। 

सरकार के संकटमोचक:

केंद्रीय मंत्रिमंडल में राजनाथ सिंह और अमित शाह इस सरकार के संकटमोचक हैं। राजनाथ सिंह के साथ जहां सहयोगी दलों का शानदार संवाद है, वहीं अमित शाह अपने कुशल राजनीतिक प्रबंधन के लिए जाने जाते हैं।  इस सरकार में सहयोगी दलों के 11 मंत्री हैं। जबकि 2014 में 5 और 2019 में सहयोगी दलों के 4 मंत्री शामिल थे। यह संख्या अभी और बढ़ सकती है। ऐसे में सरकार में कुशल प्रबंधन की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। आने वाले समय में महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के चुनाव भी होने हैं। यही इस सरकार का पहला सार्वजनिक टेस्ट भी है।

    मंत्रिमंडल में प्रतिबद्धता, निरंतरता और वरिष्ठता का ख्याल रखते हुए भी युवाओं को खास मौके दिए गए हैं। इसके साथ ही यह अखिल भारतीय चरित्र की सरकार भी है, केरल, तमिलनाडु से लेकर जम्मू कश्मीर तक का प्रतिनिधित्व इस सरकार में है। पांच अल्पसंख्यक समुदायों से भी सरकार में मंत्री बने हैं। साथ ही सामाजिक समरसता की दृष्टि से यह समावेशी सरकार कही जा सकती है। 

  अभी तक की स्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सुशासन को लेकर सरकार पर कोई दबाव नहीं है। लेकिन समान नागरिक संहिता, मुस्लिम आरक्षण, जातीय जनगणना, राज्यों को विशेष दर्जा जैसे मुद्दे मतभेद का कारण जरूर बनेंगे। प्रधानमंत्री के कद और उनकी छवि जरूर इन साधारण प्रश्नों से बड़ी है। सरकार के प्रबंधक इन मुद्दों से कैसे जूझते हैं,यह बड़ा सवाल है। सहयोगी दलों के साथ संतुलन और उनकी महत्ता बनाए रखते हुए चलना सरकार की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह अपने अभिभावकत्व और नेतृत्व से एनडीए को संभालते हुए काम प्रारंभ किया है। वे आसानी से साधारण विवादों का हल भी निकाल ही लेंगे। 



शुक्रवार, 31 मई 2024

एक आहत सभ्यता की सजल आँखें!

‘सबके राम, सबमें राम’ की भावना को स्थापित करने से बनेगा ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’

- प्रो. संजय द्विवेदी

    


अयोध्या में 22 जनवरी,2024 को रामलला विराजे और तमाम आँखें सजल हो उठीं। ये आँसू यूं ही नहीं आए थे। ये भारत की लगातार आहत होती सभ्यता को एक सुनहरे पल में प्रवेश करते देखकर भर आई आँखें थीं। अयोध्या को इस तरह देखना विरल है। यह शहर सालों से सन्नाटे में था, गहरी उदासी और गहरे अवसाद में डूबा, शांत और उत्साहहीन। जैसे इतिहास और समय एक जगह ठहर गया हो और उसने आगे न बढ़ने की ठान रखी हो। दूरस्थ स्थानों से अयोध्या आते लोग भी हनुमान गढ़ी और कनक भवन जैसे स्थानों को देखकर लौट जाते। चौदहकोसी परिक्रमा करते और चले जाते। राम के लिए आए लाखों लोगों में बहुत कम लोग त्रिपाल या टाट में बैठे रामलला के दर्शन करते। लेकिन 22 जनवरी का नजारा अलग था। हर राह राममंदिर की ओर जा रही थी। आँखों में आँसू, चेहरे पर मुस्कान और पैरों में तूफान था। आखिर हमारे राम को उनके अपने घर और शहर में सम्मान मिलते देखना अद्भुत अनुभव था। सदियां गुजर गईं लेकिन सत्य स्थिर था। इसी सत्य को देखने सारी दुनिया टीवी, मोबाइल स्क्रीन पर आँखें गड़ाए बैठी थी। विवाद का अंत हुआ और सत्यमेव जयते का उद्धोष सार्थक हुआ। यह समाधान सर्वजनहिताय तो था ही।

अयोध्या के दर्द को समझिए

   कभी त्रेता में वनवास गए राम कलयुग में भी एक दूसरी दुविधा के सामने थे। आजाद हिंदुस्तान में भी भारत के इस सबसे लायक बेटे के लिए मंदिर की प्रतीक्षा थी। बाबर के सेनापति द्वारा गिराए मंदिर के सामने पूजा-अर्चना करके आहत समाज यह सोचते हुए लौटता था कि कभी राम का भव्य मंदिर बनेगा। 2024 की यह 22 जनवरी करोड़ों आँखों के सपने सच करने के लिए आई थी। राम भारत के राष्ट्रनायक हैं, जिन्होंने अयोध्या से रामेश्वरम् को जोड़ा। वे दीन-दुखियों के, जीवन जीने के लिए संघर्ष करती आम जनता के पहले और अंतिम सहायक हैं। रामचरित मानस और हनुमान चालीसा की पंक्तियों को दोहराते हुए यह संघर्षरत समाज राम के सहारे ही अपनी जीवनयात्रा को सरल बनाता रहा है। बावजूद इसके आजादी के बाद भी सबको मुक्त करने वाले नायक को मुक्ति नहीं मिली। लंबे समय तक तो वो ताले में बंद रहे। अखंड कीर्तन चलता रहा। किंतु राहें आसान नहीं थीं। अयोध्या आंदोलन की यादें आपको सिहरा देंगीं। 1990 और 1992 की यादें एक गहरी कड़वाहट घोल जाती हैं। राजनीति किस तरह आसान मुद्दों को भी जटिल बनाती है। इसकी कहानी अयोध्या आज भी बताती है। अयोध्या अब अपने सदियों के दर्द से मुक्त मुस्करा रही है।

धैर्य, सहनशीलता और धर्म की जंग थी यह

दुनिया के किसी पंथ,संप्रदाय के महानायक के साथ यह होता तो क्या होता? सोचकर भी सिहरन होती है। किंतु भारत में यह हुआ और हिंदू समाज के अपार धैर्य, सहनशीलता की कथा फिर से दोहराई गयी। एक साधारण मंदिर नहीं अपने राष्ट्रपुरूष, राष्ट्रनायक की जन्मभूमि के लिए भी लंबा अहिंसक संघर्ष सड़क से लेकर अदालतों तक चलता रहा। सही मायने में 22 जनवरी का दिन हमारे राष्ट्रजीवन में 15 अगस्त,1947 से कम महत्त्पूर्ण नहीं है। क्योंकि 15 अगस्त के दिन हमें अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली थी तो 22 जनवरी को हम सांस्कृतिक, वैचारिक दासता और दीनता से मुक्त हो रहे हैं। यह भारत की चिति को प्रसन्न करने का क्षण है। यह आत्मदैन्य से मुक्ति का क्षण है। यह क्षण अप्रतिम है। वर्णनातीत है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर स्व. राजीव गांधी (अपनी अयोध्या यात्रा में) तक रामराज्य लाने की बात करते हैं। किंतु उस यात्रा की ओर पहला कदम आजादी के अमृतकाल में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बढ़ाया है। इसलिए सारा देश उनके साथ खड़ा है। कांग्रेस नेता श्री प्रमोद कृष्णन ने सत्य ही कहा है कि यदि श्री मोदी प्रधानमंत्री नहीं होते तो मंदिर निर्माण संभव नहीं होता। 

नए भारत के स्वप्नदृष्टा हैं मोदी

रामलला का 496 वर्षों बाद अपनी जन्मभूमि पर पुनःस्थापित होना सबको भावविह्वल कर गया। दुनिया भर में बसे 100 करोड़ से ज्यादा हिंदुओं और भारतवंशियों के लिए यह गौरव का क्षण था। इस मौके पर माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख डा. मोहन भागवत जी ने किसी तरह का राजनीतिक संवाद न करते हुए जो बातें कहीं वो भविष्य के भारत की आधारशिला बनेंगीं। संघ प्रमुख ने रामराज्य की अवधारणा को व्याख्यायित करते हुए भविष्य के कर्तव्य पथ की चर्चा की। उनका कहना था-“आज अयोध्या में रामलला के साथ भारत का स्व लौट आया है। संपूर्ण विश्व को त्रासदी से राहत देने वाला एक नया भारत खड़ा होकर रहेगा। उसका प्रतीक यह कार्यक्रम बन गया है।”  प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर साफ कहा कि-  “राम आग नहीं ऊर्जा हैं।राम विवाद नहीं समाधान हैं। राम विजय  नहीं विनय हैं। राम सिर्फ हमारे नहीं, सबके हैं।” यह बात बताती है कि माननीय प्रधानमंत्री एक नए भारत के स्वप्नदृष्टा हैं। नया भारत बनाने और उसमें एक जीवंत ऊर्जा का संचार करने के लिए प्रधानमंत्री ने न सिर्फ रामलला की मूर्ति स्थापना के लिए 11 दिनों का व्रत विधानपूर्वक बिना ठोस भोजन लिए पूर्ण किया, बल्कि उनकी विराट सोच ने इस आयोजन को और भी अधिक भव्य और सरोकारी बना दिया। देश के विविध क्षेत्रों की माननीय प्रतिभाओं को एक स्थान पर एकत्र कर राम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट ने इस आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। राजनीति से परे हटकर इस घटना का विश्लेषण करना ही इसे सही अर्थ में समझना होगा। तभी हम भारत और उसकी महान जनता के मन में रमे राम को समझ पाएंगें। ‘सबके राम-सबमें राम’की भावना स्थापित कर हम राममंदिर को राष्ट्रमंदिर में बदल सकते हैं। जिससे मिलने वाली ऊर्जा दिलों को जोड़ने, मनों को जोड़ने का काम करेगी। यह अवसर भारत का भारत से परिचय कराने का भी है। जनमानस में आई आध्यात्मिक और नैतिक चेतना को देखकर लगता है कि भारत की एक नई यात्रा प्रारंभ हुई है, जो चलती रहेगी बिना रूके, बिना थके।

डॉ. शिवओम अंबर ने लिखा है-

राम हमारा कर्म, हमारा धर्म, हमारी गति है।

राम हमारी शक्ति, हमारी भक्ति, हमारी मति है।

बिना राम के आदर्शों का चरमोत्कर्ष कहां है?

बिना राम के इस भारत में भारतवर्ष कहां है?

इसलिए जरूरी है संकठा जी जैसे स्कूल शिक्षक की याद !

संकठा सिंह : आदर्श शिक्षक,संवेदना से भरे मनुष्य 

-प्रो.संजय द्विवेदी

  

भरोसा नहीं होता कि मेरे पूज्य गुरुदेव श्री संकठा प्रसाद सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे। बस्ती (उप्र) के सरस्वती शिशु मंदिर, रामबाग के प्रधानाचार्य रहे संकठा जी में ऐसा क्या था, जो उन्हें खास बनाता है? क्या कारण है कि वे अपने विद्यार्थियों के लिए हमेशा प्रेरणा देने वाली शख्सियत बने रहे। बहुत बालपन में उनके संपर्क में आनेवाला शिशु अपनी प्रौढ़ावस्था तक उनकी यादों और शिक्षाओं को भूल नहीं पाता।   

      शिशु मंदिर व्यवस्था के इस पक्ष का अध्ययन किया जाना चाहिए कि  पारिवारिक और आत्मीय संवाद बनाकर यहां के आचार्य गण जो आत्मविश्वास नयी पीढ़ी को देते हैं,वह अन्यत्र दुर्लभ क्यों है? निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों से आए विद्यार्थियों में जो भरोसा और आत्मविश्वास संकठा जी जैसे अध्यापकों ने भरा, वह मोटी तनख्वाहें पाने वाले पांच सितारा स्कूलों के अध्यापक क्यों नहीं भर पा रहे हैं? हमने अपने सामान्य से दिखने वाले आचार्यों से जो पाया, उससे हम दुनिया में कहीं भी जाकर अपनी भूमिका शान से निभाते हैं, वहीं दूसरी ओर विद्यार्थी डिप्रेशन, अवसाद से घिरकर आत्महत्याएं भी कर रहे हैं। हमारी उंगलियां पकड़कर जमाने के सामने ला खड़े करने वाले संकठा जी जैसे अध्यापकों की समाज को बहुत जरुरत है। 

  गुरुवार 28 मार्च ,2024 को   अपने गृहग्राम वनभिषमपुर, पोस्ट-मुसाखाडं, चकिया,जिला -चंदौली (उप्र) में अपनी अंतिम सांसें लीं, तो उनकी बहुत सी स्मृतियां ताजा हो आईं। उनके मानवीय गुण, कर्मठता, अध्यापन और प्रबंधन शैली सब कुछ। कच्ची मिट्टी से शिशुओं में प्रखर राष्ट्रीय भाव, नेतृत्व क्षमता, सामाजिक संवेदनशीलता भरते हुए उन्हें योग्य नागरिक बनाना उनका मिशन था। वे ताजिंदगी इस काम में लगे रहे। बाद में शिशु मंदिर योजना के संभाग निरीक्षक गोरखपुर,काशी,प्रयाग संभाग का दायित्व भी उन्होंने देखा। सतत् प्रवास करते हुए मैंने उनके मन में कभी कड़वाहट और नकारात्मक भाव नहीं देखे। रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह छात्र जीवन में उनके सहपाठी रहे। वे दिल्ली जब भी आते माननीय रक्षा मंत्री जी से लेकर हम जैसे तमाम विद्यार्थियों से खोजकर मिलते। कोई चाह नहीं , बस हालचाल जानना और अपनी शुभकामनाएं देना। ऐसे अध्यापक का आपकी जिंदगी में होना भाग्य है। भोपाल में अपने पूज्य दादाजी की स्मृति में होने वाले पं.बृजलाल द्विवेदी स्मृति साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान समारोह में मैंने उन्हें अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया। मेरे तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर बृजकिशोर कुठियाला इस बात से बहुत खुश हुए कि मेरा अपने स्कूल जीवन के अध्यापक से अभी तक रिश्ता बना हुआ है। मैंने सर को बताया कि इसमें संकठा जी का नियमित संपर्क और स्नेहिल व्यवहार बहुत बड़ा कारण है। 


       माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के मेरे विद्यार्थियों को भी यह बात बहुत अच्छी लगी। अध्यापक और छात्र के इस जीवंत रिश्ते की ऐसी तमाम कथाएं संकठा जी के लिए सामान्य थीं। छात्र जीवन में हम कुछ दोस्त 'चाचा नेहरू अखिल भारतीय बाल मित्र सभा' नाम से एक संगठन चलाते थे। तब हम शिशु मंदिर से पढ़कर निकल चुके थे। चाचा नेहरू का नाम जुड़ा होने के कारण हमें लगता था, आचार्य जी इससे नहीं जुड़ेंगे, किंतु जब हम पूर्व विद्यार्थियों ने उन्हें इस संगठन का अध्यक्ष बनाया तो सहर्ष तैयार हो गए। उस समय बस्ती से इसी संगठन से एक बाल पत्रिका 'बालसुमन' नाम से हमने निकाली। इसके कुछ अंक हमने बस्ती से छापे। बाद थोड़ी अच्छी छपाई हो इसलिए संकठा जी ने इसके कुछ अंक वाराणसी से छपवाए। शिशु मंदिर से निकलकर मेरा प्रवेश मुस्लिम समुदाय द्वारा संचालित कालेज 'खैर कालेज, बस्ती ' में हो गया। वहां के मेरे सहपाठियों शाहीन परवेज, एहतेशाम अहमद खान आदि से भी संकठा जी काफी दोस्ती हो गयी। कारण था चाचा नेहरु अखिल भारतीय बाल मित्र सभा। इसकी गतिविधियां भी बढ़ीं। संकठा जी बस्ती से स्थानांतरित होकर गाजीपुर गये, तो हम वहां शाहीन परवेज के गांव में भोजन के लिए गए। रिश्ते को अटूट बना लेना और लोकसंग्रह उनकी वृत्ति थीं। यहीं गाजीपुर में उन्होंने मेरी मुलाकात श्री अजीत कुमार से करवाई, जो बाद वाराणसी में छात्र आंदोलन में में मेरे वरिष्ठ साथी रहे। आज वे नेशनल बुक ट्रस्ट के बोर्ड के सदस्य और सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। मैं याद करता हूं तो ढेर सी यादें घेरती हैं। मेरी शादी में वे सपरिवार आए। मां की मृत्यु पर, भाई की मृत्यु पर । हर सुख -दुख की घड़ी में उनका हाथ मेरे कंधे पर रहा। 

     दिल्ली में आखिरी मुलाकात  हुई ,तब मैं भारतीय जन संचार संस्थान में कार्यरत था। वे आए दो दिन साथ रहे। शरीर कमजोर था, पर आंखों की चमक और अपनी सींची पौध पर उनका भरोसा कायम था। ऐसे शिक्षक दुर्लभ ही हैं, जो आपको आपके सपनों, दोस्तों, परिवार के साथ स्वीकार करता हो। आप अपनी जिंदगी में व्यस्त और मस्त हैं और उन्हें फोन भी करने का वक्त नहीं निकाल पाते। किंतु संकठा जी फोन आता रहेगा, आपको आपकी जड़ों से जोड़ता रहेगा। उनका हर फोन यह अपराधबोध देकर जाता था कि क्या हमें अभी और मनुष्य बनना शेष है? इतनी उदारता, संवेदनशीलता और बड़प्पन लेकर वे आए थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पाठशाला ने संकठा जी जैसे तमाम अनाम योद्धाओं के माध्यम से यह दुनिया रची है। मैं शब्दों में नहीं कह सकता कि मैंने क्या खोया, पर अपने विद्यार्थियों के लिए उनका पचास प्रतिशत भी कर पाऊं तो स्वयं को उनका शिष्य कह पाऊंगा।‌ संकठा जी की कहानी विद्या भारती के महान अभियान की सिर्फ एक कहानी है। हमारे आसपास ऐसे अनेक हीरो हैं। जो अनाम रहकर पीढ़ियां गढ़ रहे हैं। उन सबका मंत्र है "एक समर्थ, आत्मविश्वास से भरा भारत!" संकठा जी एक व्यक्ति नहीं हैं, प्रवृत्ति हैं। जो समय के साथ दुर्लभ होती जा रही। जिनके लिए 'शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है।' भावभीनी श्रद्धांजलि!!



वेब पत्रकारों की सबसे बड़ी संस्था वेब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की स्वनियामक इकाई WJSA का पुनर्गठन...

-प्रोफेसर संजय द्विवेदी को बनाया गया चेयरमैन

लेखक रिटायर्ड आईपीएस ध्रुव नारायण गुप्त, रिटायर्ड आईएएस ओम प्रकाश यादव बने पूर्व उच्चाधिकारी मानद सदस्य

उदय चंद्र सिंह वरिष्ठ पत्रकार सदस्य तो पटना हाई कोर्ट के विधिवेत्ता किंकर कुमार बने मानद विधिक सदस्य



भोपाल (मई 2024) । देश की सबसे बड़े वेब पत्रकारों के संगठन वेब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इण्डिया की  भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय से निबंधित स्व नियामक इकाई वेब जर्नलिस्ट्स स्टैंडर्ड अथॉरिटी (डबल्यूजेएसए) का पुनर्गठन करते हुए प्रो. संजय द्विवेदी पूर्व महानिदेशक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली और पूर्व प्रभारी कुलपति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल को चेयरमैन मनोनीत किया है। बिहार के सेवानिवृत्त आईपीएस कथाकार, कवि एवं लेखक ध्रुव नारायण गुप्त को सेवानिवृत्त पुलिस उच्चाधिकारी मानद सदस्य और सेवानिवृत्त आईएएस ओम प्रकाश यादव को सेवानिवृत्त प्रशासनिक उच्चाधिकारी मानद सदस्य मनोनीत किया गया है। 

केंद्र सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा अपने न्यूज़ पोर्टल सदस्यों के साथ आईटी इंटरमेडिएरी गाईड लाईन्स व डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड 2021 की धारा 12 के तहत निबंधित सात सदस्यीय इस एसआरबी में देश के वरिष्ठ पत्रकार उदय चन्द्र सिंह को वरिष्ठ पत्रकार मानद सदस्य और पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता किंकर कुमार को मानद विधिक सदस्य की जिम्मेदारी दी गयी है। पूर्व की भांति संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार आनन्द कौशल और राष्ट्रीय महासचिव पत्रकार अधिवक्ता रंगकर्मी डॉ अमित रंजन को कार्यालयी सदस्य मनोनीत किया गया है। यह पुनर्गठन संगठन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी द्वारा किया गया है। 

पटना में स्व नियामक इकाई डबल्यूजेएसए की घोषणा करते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष आनन्द कौशल ने सभी महानुभावों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि देश की सबसे बड़ी नियामक इकाई डबल्यूजेएसए इन महानुभावों के साथ वेब पत्रकारिता में पत्रकारिता के उच्च आदर्शों को स्थापित करेगी बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की वेब पत्रकारिता को नये आयाम प्रदान करेगी। 

राष्ट्रीय महासचिव डॉ अमित रंजन ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर स्वत: सिद्ध पत्रकारिता के अध्यापक ही जब स्व नियामक इकाई के चेयरमैन हैं तब सामाजिक, प्रशासनिक, पुलिसिंग, पत्रकारिता और विधि से जुड़े महानुभावों से सज्जित यह इकाई देश विदेश में वेब पत्रकारिता को वैश्विक पहचान दिलाएगी। 

संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ माधो सिंह, डॉ लीना, संजीव आहूजा, राष्ट्रीय महासचिव अमिताभ ओझा, राष्ट्रीय सचिव मधूप मणि पिक्कू, चंदन कुमार, विवेक कुमार, सूरज कुमार, संयुक्त सचिव मिथिलेश मिश्रा, शैलेंद्र झा, नलिनी भारद्वाज, चंदन राज, कोषाध्यक्ष मंजेश कुमार, सह कोषाध्यक्ष मनोकामना सिंह, कार्यालय सचिव अकबर इमाम, सह कार्यालय सचिव राम बालक राय, सह सचिव संगठन अभिषेक कुमार सिंह, राष्ट्रीय प्रवक्ता मुरली मनोहर श्रीवास्तव, राष्ट्रीय कार्य समिति सदस्य, बिहार प्रदेश अध्यक्ष बाल कृष्ण, उपाध्यक्ष केशव सिंह, आलोक कुमार डब्ल्यू, महासचिव अनूप नारायण सिंह, दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष पंकज प्रसून सहित बिहार और दिल्ली चैप्टर के सभी पदधारक और संगठन के सभी सदस्यों ने नयी स्व नियामक इकाई को बधाई प्रेषित करते हुए स्वागत किया है।


इंदौर: ये शहर है अमन का, यहां की फिजां है निराली


- प्रो.संजय द्विवेदी 


                                                 नई दुनिया , इंदौर में 31 मई,2024 को प्रकाशित


मध्यप्रदेश का एक शहर इंदौर। यह राजधानी नहीं है, एक शहर है। अपनी तरह का अलग और खास। बहुत खास। अपने संस्कार, शिक्षा, व्यापार, पत्रकारिता, संस्कृति, राजनीति, खानपान सबके लिए खास। हिंदुस्तान की आजादी के बाद की पत्रकारिता में हिंदी मीडिया का सबसे खास स्कूल। नामवर संपादकों,लेखकों,स्तंभकारों, संगीतकारो, कलाकारों , खिलाड़ियों, व्यापारियों का शहर। बाबा साहब आंबेडकर की जन्मभूमि महू से लेकर एक समय में ही राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, माणिकचंद्र वाजपेयी, वेदप्रताप वैदिक जैसे नामों को अपने साथ समेटे। बहुत बड़ी सूची, बहुत बड़ा काम। अप्रतिम योगदान। ऐसे शहर जो सिर्फ बसे नहीं जहां जीवन भी है, इंदौर उनमें एक है। अपने खास अंदाज और मालवा की माटी की महक ने इसे बनाया है।

  स्वागतधर्मी और संस्कृतिधर्मी दोनों कह लीजिए। मुहब्बत ऐसी कि यहीं बस जाने का दिल करे। बहुत जिंदादिल और आत्मीय। महानगर होने के बाद भी गंवई दिल, देशज अंदाज और कनेक्टिविटी को बचाकर, बनाकर रखने वाला दिलदार शहर। यहां साहित्य,संस्कृति, कला और संगीत की दुनिया भी बेहद समृद्ध है।‘नई दुनिया’ के मीडिया स्कूल ने किस तरह हिंदी पत्रकारिता के नायकों को गढ़ा और उन सबने कैसे भारतीय पत्रकारिता और देश-विदेश के मीडिया संस्थाओं को समृद्ध किया, इसे जानना जरूरी है। राजबाड़ा से सराफे तक फैली रौनकें, जिंदादिली, पोहे और जलेबी के साथ पलता, साथ चलता 'विचार' इस शहर की खासियत है। 

ये देश का सबसे स्वच्छ शहर भी है। अपने मन की तरह पवित्र और साफ। इस शहर ने भारत रत्न लता मंगेशकर और मंगेशकर परिवार को भारत में संगीत साधना का पर्याय बनते देखा। कुमार गंधर्व, उस्ताद अमीर अली खां, किशोर कुमार, गोकुल उत्सव को सुनकर संगीत की ऊंचाई महसूस की है तो श्री राजेंद्र माथुर से एक अद्भुत गद्य शैली पाई है। इस शहर से श्री प्रभाष जोशी और श्री वेदप्रताप वैदिक की गहरी जनधर्मिता की यादें जुड़ी हैं। इसी के साथ राष्ट्रीय भावधारा की पत्रकारिता की मिसाल बन गए श्री माणिकचंद्र वाजपेयी और श्री जयकृष्ण गौड़ की स्मृतियां भी हैं।

इंदौर से ‘वीणा’ जैसी अत्यंत समृद्ध साहित्यिक पत्रिका निकली जो अब सौ साल पूरे करने की ओर है। ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा दिए जाने वाले पं.बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान के तहत ‘वीणा’ के दो संपादकों श्री श्यामसुंदर व्यास और श्री राकेश शर्मा को सम्मानित करने का सौभाग्य हमें मिला है। दोनों आयोजन इंदौर में हुए और हम इंदौर के साहित्य रसिकों का सान्निध्य पाकर धन्य हुए।  

 इंदौर में होना जिंदगी और जिंदादिली के साथ होना है। फिल्म संसार में लेखक, कलाकारों की भावभूमि यहां बनी। सलीम खान और उनके बेटे सलमान खान,जानी वाकर का ये शहर रहा है। क्रिकेट और हाकी की दुनिया में भी इंदौर ने नामवर लोग दिए। शंकर लक्ष्मण हाकी के सितारे बने तो क्रिकेट में कैप्टन मुश्ताक अली, कर्नल सीके नायडू, राहुल द्रविड़, नरेन्द्र हिरवानी कौन भूल सकता है। लेखकों में बहुत लंबी सूची हिंदी, उर्दू, मराठी में श्रेष्ठ लेखन से पहचान बनाने वालों का शहर। उर्दू में राहत इंदौरी तो हिंदी में ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत नरेश मेहता जैसे नाम। सिने लेखन में श्रीराम ताम्रकार और जयप्रकाश चौकसे जैसे दिग्गज। क्रिकेट कमेंट्री करने वाले पद्मश्री से अलंकृत सुशील दोषी की आवाज आज भी कानों में बसी हुई लगती है। फिल्मी दुनिया में अपने सुरीले गीतों से ख्यातिनाम हुए स्वानंद किरकिरे इस शहर के ही हैं। सामाजिक काम और व्यापार यहां साथ चले हैं। अपनी सामाजिक सोच से व्यापार क्षेत्र के लोगों ने भी इंदौर को चमकदार बनाया। जिसमें सर सेठ हुकुमचंद कासलीवाल, बाबूलाल पटौती, बाबूलाल बाहेती को भूलना नहीं चाहिए। शहर को साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश देने में संस्थाओं की बड़ी भूमिका रही है। मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति, अभ्यास मंडल,अभिनव कला समाज, सानंद न्यास जैसी अनेक संस्थाओं ने शहर को जीवंत बनाए रखा। इंदौर अपनी इन्हीं बहुरंगी छवियों से बना है। उसे कुछ लोग मिनी बांबे कहते हैं, किंतु इंदौर, इंदौर ही है। इंदौर और उसकी इंदौरियत का पर्याय संभव नहीं। यह अलग है और बहुत खास। यहां आइए और इसे महसूस भी कीजिए।

रविवार, 23 मई 2021

लोकमत समाचार, नागपुर में प्रकाशित लेख-4 मई,2021


 

सोमवार, 10 मई 2021

नए समय में मीडिया शिक्षा की चुनौतियां

 

डिजीटल ट्रांसफार्मेशन के लिए तैयार हों नए पत्रकार

- प्रो. संजय द्विवेदी


     एक समय था जब माना जाता है कि पत्रकार पैदा होते हैं और पत्रकारिता पढ़ा कर सिखाई नहीं जा सकती। अब वक्त बदल गया है। जनसंचार का क्षेत्र आज शिक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। वर्ष 2020 को लोग चाहे कोरोना महामारी की वजह से याद करेंगे, लेकिन एक मीडिया शिक्षक होने के नाते मेरे लिए ये बेहद महत्वपूर्ण है कि पिछले वर्ष भारत में मीडिया शिक्षा के 100 वर्ष पूरे हुए थे। वर्ष 1920 में थियोसोफिकल सोसायटी के तत्वावधान में मद्रास राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में डॉक्टर एनी बेसेंट ने पत्रकारिता का पहला पाठ्यक्रम शुरू किया था। लगभग एक दशक बाद वर्ष 1938 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को एक सर्टिफिकेट कोर्स के रूप में शुरू किया गया। इस क्रम में पंजाब विश्वविद्यालय, जो उस वक्त के लाहौर में हुआ करता था, पहला विश्वविद्यालय था, जिसने अपने यहां पत्रकारिता विभाग की स्थापना की। भारत में पत्रकारिता शिक्षा के संस्थापक  कहे जाने वाले प्रोफेसर पीपी सिंह ने वर्ष 1941 में इस विभाग की स्थापना की थी। अगर हम स्वतंत्र भारत की बात करें, तो सबसे पहले मद्रास विश्वविद्यालय ने वर्ष 1947 में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की स्थापना की। 

   इसके पश्चात कलकत्ता विश्वविद्यालय, मैसूर के महाराजा कॉलेज, उस्मानिया यूनिवर्सिटी एवं नागपुर यूनिवर्सिटी ने मीडिया शिक्षा से जुड़े कई कोर्स शुरू किए। 17 अगस्त, 1965 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय जन संचार संस्थान की स्थापना की, जो आज मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में पूरे एशिया में सबसे अग्रणी संस्थान है।  आज भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, रायपुर में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय एवं जयपुर में हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय पूर्ण रूप से मीडिया शिक्षण एवं प्रशिक्षण का कार्य कर रहे हैं। भारत में मीडिया शिक्षा का इतिहास 100 वर्ष जरूर पूर्ण कर चुका है, परंतु यह अभी तक इस उलझन से मुक्त नहीं हो पाया है कि यह तकनीकी है या वैचारिक। तकनीकी एवं वैचारिकी का द्वंद्व मीडिया शिक्षा की उपेक्षा के लिए जहां उत्तरदायी है, वहां सरकारी उपेक्षा और मीडिया संस्थानों का सक्रिय सहयोग न होना भी मीडिया शिक्षा के इतिहास की तस्वीर को धुंधली प्रस्तुत करने को विवश करता है।

    भारत में जब भी मीडिया शिक्षा की बात होती है, तो प्रोफेसर के. . ईपन का नाम हमेशा याद किया जाता है। प्रोफेसर ईपन भारत में पत्रकारिता शिक्षा के तंत्र में व्यावहारिक प्रशिक्षण के पक्षधर थे। प्रोफेसर ईपन का मानना था कि मीडिया के शिक्षकों के पास पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा के साथ साथ मीडिया में काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव भी होना चाहिए, तभी वे प्रभावी ढंग से बच्चों को पढ़ा पाएंगे। आज देश के अधिकांश पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षण संस्थान, मीडिया शिक्षक के तौर पर ऐसे लोगों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिन्हें अकादमिक के साथ साथ पत्रकारिता का भी अनुभव हो। ताकि ये शिक्षक ऐसा शैक्षणिक माहौल तैयार कर सकें, ऐसा शैक्षिक पाठ्यक्रम तैयार कर सकें, जिसका उपयोग विद्यार्थी आगे चलकर अपने कार्यक्षेत्र में भी कर पाएं।  पत्रकारिता के प्रशिक्षण के समर्थन में जो तर्क दिए जाते हैं, उनमें से एक दमदार तर्क यह है कि यदि डॉक्टरी करने के लिए कम से कम एम.बी.बी.एस. होना जरूरी है, वकालत की डिग्री लेने के बाद ही वकील बना जा सकता है तो पत्रकारिता जैसे महत्वपूर्ण पेशे को किसी के लिए भी खुला कैसे छोड़ा जा सकता है?

    दरअसल भारत में मीडिया शिक्षा मोटे तौर पर छह स्तरों पर होती है। सरकारी विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में, दूसरे, विश्वविद्यालयों से संबंद्ध संस्थानों में, तीसरे, भारत सरकार के स्वायत्तता प्राप्त संस्थानों में, चौथे, पूरी तरह से प्राइवेट संस्थान, पांचवे डीम्ड विश्वविद्यालय और छठे, किसी निजी चैनल या समाचार पत्र के खोले गए अपने मीडिया संस्थान। इस पूरी प्रक्रिया में हमारे सामने जो एक सबसे बड़ी समस्या है, वो है किताबें। हमारे देश में मीडिया के विद्यार्थी विदेशी पुस्तकों पर ज्यादा निर्भर हैं। लेकिन अगर हम देखें तो भारत और अमेरिका के मीडिया उद्योगों की संरचना और कामकाज के तरीके में बहुत अंतर है। इसलिए मीडिया के शिक्षकों की ये जिम्मेदारी है, कि वे भारत की परिस्थितियों के हिसाब से किताबें लिखें।

    मीडिया शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए आज मीडिया एजुकेशन काउंसिल की आवश्यकता है। इसकी मदद से न सिर्फ पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षा के पाठ्यक्रम में सुधार होगा, बल्कि मीडिया इंडस्ट्री की जरुरतों के अनुसार पत्रकार भी तैयार किये जा सकेंगे। आज मीडिया शिक्षण में एक स्पर्धा चल रही है। इसलिए मीडिया शिक्षकों को ये तय करना होगा कि उनका लक्ष्य स्पर्धा में शामिल होने का है, या फिर पत्रकारिता शिक्षण का बेहतर माहौल बनाने का है। आज के समय में पत्रकारिता बहुत बदल गई है, इसलिए पत्रकारिता शिक्षा में भी बदलाव आवश्यक है। आज लोग जैसे डॉक्टर से अपेक्षा करते हैं, वैसे पत्रकार से भी सही खबरों की अपेक्षा करते हैं। अब हमें मीडिया शिक्षण में ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करने होंगे, जिनमें विषयवस्तु के साथ साथ नई तकनीक का भी समावेश हो।

    न्यू मीडिया आज न्यू नॉर्मल है। हम सब जानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण लाखों नौकरियां गई हैं। इसलिए हमें मीडिया शिक्षा के अलग अलग पहलुओं पर ध्यान देना होगा और बाजार के हिसाब से प्रोफेशनल तैयार करने होंगे। नई शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान देने की बात कही गई है। जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें इस पर ध्यान देना होगा। मीडिया शिक्षण संस्थानों के लिए आज एक बड़ी आवश्यकता है क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार करना। भाषा वो ही जीवित रहती है, जिससे आप जीविकोपार्जन कर पाएं और भारत में एक सोची समझी साजिश के तहत अंग्रेजी को जीविकोपार्जन की भाषा बनाया जा रहा है। ये उस वक्त में हो रहा है, जब पत्रकारिता अंग्रेजी बोलने वाले बड़े शहरों से हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के शहरों और गांवों की ओर मुड़ रही है। आज अंग्रेजी के समाचार चैनल भी हिंदी में डिबेट करते हैं। सीबीएससी बोर्ड को देखिए जहां पाठ्यक्रम में मीडिया को एक विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है। क्या हम अन्य राज्यों के पाठ्यक्रमों में भी इस तरह की व्यवस्था कर सकते हैं, जिससे मीडिया शिक्षण को एक नई दिशा मिल सके।

    एक वक्त था जब पत्रकारिता का मतलब प्रिंट मीडिया होता था। अस्सी के दशक में रिलीज हुई अमेरिकी फिल्म Ghostbusters (घोस्टबस्टर्स) में सेक्रेटरी जब वैज्ञानिक से पूछती है किक्या वे पढ़ना पसंद करते हैं? तो वैज्ञानिक कहता हैप्रिंट इज डेड। इस पात्र का यह कहना उस समय हास्य का विषय था, परंतु वर्तमान परिदृश्य में प्रिंट मीडिया के भविष्य पर जिस तरह के सवाल खड़े किये जा रहे हैं, उसे देखकर ये लगता है कि ये सवाल आज की स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठता है। आज दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों से हमें ये सूचनाएं मिल रही हैं कि प्रिंट मीडिया पर संकट के बादल हैं। ये भी कहा जा रहा है कि बहुत जल्द अखबार खत्म हो जाएंगे। वर्ष 2008 में अमेरिकी लेखक जेफ गोमेज ने प्रिंट इज डेड पुस्तक लिखकर प्रिंट मीडिया के खत्म होने की अवधारणा को जन्म दिया था। उस वक्त इस किताब का रिव्यू करते हुए एंटोनी चिथम ने लिखा था कि, यह किताब उन सब लोगों के लिएवेकअप कॉलकी तरह है, जो प्रिंट मीडिया में हैं, किंतु उन्हें यह पता ही नहीं कि इंटरनेट के द्वारा डिजिटल दुनिया किस तरह की बन रही है। वहीं एक अन्य लेखक रोस डावसन ने तो समाचारपत्रों के विलुप्त होने का, समय के अनुसार एक चार्ट ही बना डाला। इस चार्ट में जो बात मुख्य रूप से कही गई थी, उसके अनुसार वर्ष 2040 तक विश्व से अखबारों के प्रिंट संस्करण खत्म हो जाएंगे।         मीडिया शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों में इस तरह के बदलाव करने चाहिए, कि वे न्यू मीडिया के लिए छात्रों को तैयार कर सकें। आज तकनीक किसी भी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मीडिया में दो तरह के प्रारूप होते हैं। एक है पारंपरिक मीडिया जैसे अखबार और पत्रिकाएं और और दूसरा है डिजिटल मीडिया। अगर हम वर्तमान संदर्भ में बात करें तो सबसे अच्छी बात ये है कि आज ये दोनों प्रारूप मिलकर चलते हैं। आज पारंपरिक मीडिया स्वयं को डिजिटल मीडिया में परिवर्तित कर रहा है। जरूरी है कि मीडिया शिक्षण संस्थान अपने छात्रों को 'डिजिटल ट्रांसफॉर्म' के लिए पहले से तैयार करें। देश में प्रादेशिक भाषा यानी भारतीय भाषाओं के बाजार का महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी भाषा के उपभोक्ताओं का डिजिटल की तरफ मुड़ना लगभग पूरा हो चुका है। ऐसा माना जा रहा है कि वर्ष 2030 तक भारतीय भाषाओं के बाजार में उपयोगकर्ताओं की संख्या 500 मिलियन तक पहुंच जाएगी और लोग इंटरनेट का इस्तेमाल स्थानीय भाषा में करेंगे। जनसंचार की शिक्षा देने वाले संस्थान अपने आपको इन चुनौतियों के मद्देनजर तैयार करें, यह एक बड़ी जिम्मेदारी है।



प्रो. संजय द्विवेदी, संप्रति भारतीय जनसंचार संस्थान(आईआईएमसी),नई दिल्ली के महानिदेशक हैं।