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रविवार, 26 अप्रैल 2020

करोना संकट को अवसर बनाकर आगे बढ़ने का समय


डा. मोहन भागवत ने अपने संबोधन में दिखाई नई राहें


-प्रो.संजय द्विवेदी



  करोना संकट से विश्व मानवता के सामने उपस्थित गंभीर चुनौतियों को लेकर दुनिया भर के विचारक जहां अपनी राय रख रहे हैं, वहीं दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत के संवाद ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है। कहने को तो डा. भागवत अपने संगठन के स्वयंसेवकों से संवाद कर रहे थे लेकिन इस संवाद के निहितार्थ बहुत विलक्षण हैं। उनके संवाद में देशभक्ति, मानवता और भारतवासियों के प्रति प्रेम के साथ वैश्विक आह्वान भी था कि अब विश्व मानवता के लिए भारत अपने वैकल्पिक दर्शन के साथ खड़ा हो। उन्होंने साफ कहा कि हमें संकटों को अवसर में बदलने की कला सीखनी होगी।
एक राष्ट्र-एक जन-
   सेवा के कामों में जुटे अपने स्वयंसेवकों से उन्होंने साफ कहा कि उनके लिए कोई पराया नहीं है। एक अरब तीस करोड़ भारतवासी उनका परिवार हैं। भाई-बंधु हैं। इसलिए सेवा की जरूरत जिन्हें सबसे ज्यादा उन तक मदद किसी भेदभाव के बिना सबसे पहले पहुंचनी चाहिए। उनकी इस राय के खास मायने हैं। उनका साफ कहना था भय और क्रोध से अतिवाद पैदा होता है। हमें हर तरह के अतिवाद से बचना है और भारत की सामूहिक शक्ति को प्रकट करना है। उनके संवाद में देश के सामने उपस्थित चुनौतियों का सामना करने और उससे आगे निकलने की सीख नजर आई। उनके समूचे भाषण में भय और क्रोध शब्द का उन्होंने कई बार इस्तेमाल किया और इन दो शब्दों के आधार होने वाली प्रतिक्रिया से सर्तक रहने को कहा। उनका कहना था कि समाज के अग्रणी जनों को ऐसे अवसरों पर अपने लोगों को संभालना चाहिए ताकि प्रतिक्रिया के अतिवादी रूप सामने न आएं।  
नर सेवा-नारायण सेवा-
सेवा संघ के मुख्य कामों में एक है। देश के हर संकट, दैवी आपदाओं और दुर्घटनाओं में संघ के स्वयंसेवक बिना प्रचार की आस किए सेवा के लिए आगे आते हैं। उसके सेवा भारती, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठन प्रत्यक्ष सेवा के काम से जुड़े हैं। इसके अलावा संघ के प्रत्येक आनुषांगिक संगठन के अपने-अपने सेवा के काम हैं। उन्होंने सेवा के काम में प्रत्यक्ष लगे कार्यकर्ताओं के लिए कहा कि वे सावधानी के साथ अपना काम करें ताकि काम के लिए वे बचे रहें। कोई छूट न जाए और  अपनत्व की भावना का प्रसार हो। उन्होंने कहा कि हम उपकार नहीं सेवा कर रहे हैं इसलिए इसे गुणवत्तापूर्ण ही होना होगा। प्रेम,स्नेह, श्रेष्ठता और अपनत्व की भावना से ही सेवा स्वीकार होती है। हमें अच्छाई का प्रसार करना है और भारतीयता के मूल्यों को स्थापित करना है। समाज के संरक्षण और उसकी सतत उन्नति ही हमारे लक्ष्य हैं।
स्वावलंबी भारत-सशक्त भारत-
अपने संबोधन में डा. भागवत ने स्वदेशी और स्वालंबन की आज फिर बात की। उनका कहना था कि जो कुछ हमारे पास उसे अन्य से लेने की आवश्यक्ता क्या है। इसके लिए हमें स्वदेशी का आचरण करते हुए स्वदेशी उत्पादों की गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। जिसके बिना हमारा काम चल सकता है उसे विदेशों से लेने की आवश्यक्ता क्या है। विदेशों पर निर्भरता को कम करने और समाज का स्वालंबन बढ़ाने पर उनका खासा जोर था। वे यहीं रुके उन्होंने रासायनिक खेती के खतरों की तरफ इशारा करते हुए जैविक खेती और गो-पालन पर भी जोर दिया। संघ लंबे समय से स्वदेशी की बात करता आ रहा है किंतु सत्ता की राजनीति मजबूरियों और राजनीति के खेल में उसकी आवाज अनसुनी की जाती रही है। कभी नीतियों के स्तर पर तो कभी विश्व बाजार के दबावों में। करोना संकट के बहाने एक बार फिर संघचालक ने स्वदेशी के आह्वान को मुखर किया है तो इसके विशेष अर्थ हैं।
संतों की हत्या पर जताया दुख-
अपने संवाद में डा. भागवत पालघर में दो संतों की हत्या पर दुखी नजर आए। उन्होंने कहा कि हमें ऐसी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य को समझकर इसकी पुनरावृत्ति रोकनी चाहिए। क्योंकि संत तो सब कुछ छोड़कर समाज के लिए निकले थे उनकी हत्या का कोई कारण नहीं है। नागरिक अनुशासन ही देशभक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक है। राजनीति को स्वार्थ से अलग कर उसे समाज केंद्रित बनाने पर जोर देते हुए उनका कहना था कि आज हमें पर्यावरण, जीवन और मानवता तीनों के बारे में सोचने की जरूरत है। डा. भागवत के व्याख्यान की मुख्य बातें सही मायने में एक जीवंत समाज बनाने की भावना से भरी-पूरी हैं। उनकी सोच का भारत ही अरविंद, विवेकानंद और महात्मा गांधी के सपनों का भारत है।
        कोरोना संकट में हुए इस व्याख्यान के बहाने डा. भागवत ने संघ की सामाजिक, सांस्कृतिक भूमिका का खाका खींच दिया है। स्वयंसेवकों के सामाजिक उत्तरदायित्व और देश तोड़क शक्तियों के मंसूबों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने भय  और क्रोध के आधार पर सृजित होने वाले अतिवाद को बड़ी चिंता से प्रकट किया। उनके संबोधन से साफ है कि संघ समाज में अपनी भूमिका को ज्यादा व्यापक करते हुए अपने सरोकारों को समाज के साथ जोड़ना चाहता। इस बार गर्मियों में संघ के प्रशिक्षण शिविर भी स्थगित हैं इसलिए स्वयंसेवकों के सामने इस संदेश पाथेय से करने के लिए काफी कुछ होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि संघ अपने विविध संगठनों के माध्यम से सेवा और देश के सशक्तिकरण के प्रयासों को व्यापक बनाने में सफल रहेगा। साथ ही उसके संकल्पों और कार्यों को सही संदर्भों में समझा जाएगा।


शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

सेवा से दिल जीतने की कोशिश

-संजय द्विवेदी


     समाज में व्याप्त भेदभाव, छूआछूत, को मिटाने के लिए संत रविदास ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके आदर्शों और कर्मों से सामाजिक एकता की मिसाल हमें देखने को मिलती है लेकिन वर्तमान दौर में इस सामाजिक विषमता को मिटाने के सरकारी प्रयास असफल ही कहे जा सकते हैं। कहीं-कहीं आशा की किरण समाज क्षेत्र में कार्यरत सेवा भारती जैसे संस्थानों के प्रकल्पों में दृष्टिगोचर होती है।
   भारत गावों में बसता है, गांवों में आज भी सामाजिक कुरीतियां कम नहीं हुयी हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने छुआछूत को मिटाने का नारा दिया, उनका जीवन भी सामाजिक समरसता की मिसाल है। गांधी जी ने स्वाधीनता आंदोलन में जितने भी प्रकल्प तय किए, उनका ध्येय भारत की सामाजिक विषमता को पाटना था। वे चाहते थे कि समाज में ऊंच-नीच, भेदभाव, लिंग अनुपात और आर्थिक सम्पन्नता,विपन्नता की खांई खत्म हो और भारत एक लय, एक स्वर, एक समानता और एक अखंडता के साथ मंडलाकार प्रवृत्ति में विश्व का नेतृत्व करे। कुछ ऐसी ही परिकल्पना पं. दीनदयाल उपाध्याय ने भी की। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामाजिक एकता के इसी प्रकल्प को आगे बढ़ा रहे हैं।
  आजादी के लगभग सत्तर वर्षों के बाद भी भारत से गरीबी हटी नहीं है और सामाजिक विषमता दूर नहीं हो सकी है। इस विषमता से समाज में लड़ाई-झगड़े, वैमनस्यता और ऊंच-नीच की प्रवृत्ति बढ़ी है। इस समस्या को भारत में मिटाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ आगे आया और सेवा के अनेक प्रकल्प शुरू किए। उनके इन सेवा प्रकल्पों का उद्देश्य भेदभाव से मुक्त, स्वाभिमानी-समरस और आत्मनिर्भर समाज बनाना था। सेवा भारती, संघ का एक ऐसा ही संगठन है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक जागरण एवं कौशल विकास के लगभग हजारों केंद्रों के द्वारा प्रकल्प चला रहा है। सेवा भारती इस मुहिम में 25 वर्षों से जुटा हुआ है। वर्ष 2017 सेवा भारती का रजत जयंती वर्ष है। इस वर्ष में सेवा भारती अपने प्रकल्पों का आत्मावलोकन कर रहा है और नए प्रकल्पों पर विचार कर रहा है। रजत जयंती वर्ष पर सेवा भारती भोपाल के लाल परेड मैदान पर ऐसे हजारों श्रम साधकों का संगम करने जा रहा है। इस संगम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत स्वयं उपस्थित होगें। इस आयोजन में श्रमिकों और गरीब व पिछड़े वर्गों के लिए जीवन समर्पित करने वाले साधकों का सम्मान भी होगा।
  आरएसएस निरंतर समाज के पिछड़े वर्गों की ओर देखता रहा है और विविध प्रकल्पों के जरिए उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहा है। यह सच है कि संत रविदास एक ऐसे संत थे जिन्होंने जीवन भर श्रम की साधना की। श्रम को प्रतिष्ठा करने वाले इस महान संत के शिष्यों में काशी नरेश व भक्त मीराबाई भी रहीं। अपने धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास के कारण संत रविदास जी ने दिल्ली के शासक सिकंदर लोधी को भी कह दिया था कि मैं प्राण त्याग दूंगा पर अपना धर्म नहीं छोडूंगा। हमारे अनेक संतों की तरह संत रविदास जी ने भी जन्म के आधार पर ऊंच-नीच को नकार दिया था। श्रम साधक समागम उन्हीं संत रविदास जी की जयंती पर आयोजित किया जा रहा है। माना जा सकता है कि भोपाल के लाल परेड मैदान से  संत रविदास की दृष्टि समाज के अंतिम छोर तक पहुंचेगी और जाति, पंथ के आधार पर भेदभाव को मिटाने में कारगर हो सकेगी। यह साधारण नहीं है कि मध्यप्रदेश आरंभ से ही संघ की एक प्रयोगशाला रहा है, जहां उसने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रों में विविध प्रयोग किए हैं। बैतूल एक ऐसा जिला है, जहां पर 200 गांवों को केंद्र बनाकर ग्रामीण विकास का एक नया अध्याय लिखने की पहल हुयी है। संघ के सरसंचालक मोहन भागवत ने ग्रामीण विकास के इन प्रकल्पों को सराहा है। यह साधारण नहीं है कि संघचालक मोहन राव भागवत 7 से 13 फरवरी तक मध्यप्रदेश के इन क्षेत्रों में रहते हुए, खुद सामाजिक बदलाव के इन दृश्यों का जायजा लेगें। इसके तहत बैतूल जिले में नशामुक्ति, आर्थिक-सामाजिक विकास, पर्यावरण जैसे विषयों पर हो रहे ये काम निश्चय ही बदलते भारत की बानगी पेश करते हैं।

   मध्यप्रदेश एवं देश के तमाम राज्यों में सरकारी स्तर पर भी कई योजनाएं श्रमिक और निचले तबके के  उत्थान के लिए बनती रही हैं। उन योजनाओं से इन वर्गों में कोई आमूलचूल बदलाव हुआ हो ऐसा कम ही दिखाई देता है। आजादी के सत्तर वर्षों में यदि सरकारी योजनाएं आम आदमी तक पहुंच पाती तो संत रविदास,राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बाबा साहेब आंबेडकर और पं. दीनदयाल उपाध्याय के सपने सच हो जाते। किंतु अफसोस है कि बदलाव की यह गति उतनी तेज नहीं रही जितनी होनी चाहिए। सरकारें आज भी उन्हीं के लिए योजना बना रही हैं और हर बजट में अधिक वित्त का प्रावधान करती हैं किंतु धरातल पर सूरतेहाल नहीं बदलते। यही कारण है कि सामाजिक विषमता अमरबेल की तरह पनप रही है। इस वर्ग के जो व्यक्ति समाज का नेतृत्व करते हैं, वह भी आगे आ जाने पर पीछे मुड़कर नहीं देखते हैं। बाद में अपने लोग ही उन्हें बेगाने लगने लगते हैं। सरकारी स्तर पर इस सामाजिक विषमता को पाटना नामुमकिन लगता है। इसमें समाज और सामाजिक संगठनों की सहभागिता जरूरी है। इसी ध्येय को आत्मसात कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक विषमता को दूर करने का बीड़ा उठाया है और सेवा प्रकल्पों में श्रम साधकों के माध्यम से सामाजिक साधना का काम निरंतर किया जा रहा है। भोपाल के इस महती आयोजन में शामिल होने वाले लोग दरअसल वे हैं जो दैनिक रोजी-रोजी कमाने के लिए रोज अपना पसीना बहाते हैं। इन वर्गों से संवाद और उनकी एकजुटता के बहाने संघ एक बड़ी सामाजिक पहल कर रहा है, इसमें दो राय नहीं है।

रविवार, 24 अगस्त 2014

इस देश में कौन है हिंदू!



-संजय द्विवेदी
  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत पर इस समय देश की राजनीतिक पार्टियां खासी नाराज हैं। विवाद एक शब्द को लेकर है कि उन्होंने हिंदुस्तान में रहने वालों को हिंदू क्यों कहा। जाहिर तौर पर प्रथम दृष्ट्या यह विवाद सिर्फ शब्दों का मामला नहीं है, यह मामला राजनीति का है और इसकी राजनीतिक व्याख्या का भी है। किंतु हमें यह देखना होगा कि आखिर सरसंघचालक ने क्या कोई नई बात कही है। यह तो वही बात है जो संघ के नेता अपनी स्थापना के साल 1925 से ही कहते आ रहे हैं।
   संघ के लिए हिंदू एक धर्मवाचक प्रयोग नहीं है, वह इसके वृहत्तर सांस्कृतिक अर्थ का ही उपयोग लंबे समय से करता आ रहा है। द्वंद इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि आज संघ का एक पूर्व प्रचारक प्रधानमंत्री के पद पर आसीन है। इसलिए संघ की सामान्य व्यवहार की शब्दावली को भी विवादों में घसीटा जा रहा है। हर देश की एक सांस्कृतिक पहचान और उसके जीवन मूल्य होते हैं। पूजा पद्धति के बदलने से सांस्कृतिक पहचान, जीवन मूल्य और पूर्वज नहीं बदलते। जड़ता नहीं, निरंतर प्रवाह यह भारतीय संस्कृति का उत्स और मूल है। इस भूमि पर रहने वाला,यहां की हवा-पानी में सांस लेने वाला प्रत्येक नागरिक यहां का भूमिपुत्र है। इसे बहुत भावुक होकर ही भारतमाता कहा गया। संभव है कुछ लोगों को भारतमाता का विचार भी पसंद न आए। किंतु घरती और उसके पुत्र, यह एक सांस्कृतिक विचार है। जन्म देने वाली माता के साथ घरती माता और गौ माता यह विचार किसी को अस्वीकार्य हो सकता है,पर यह भारतीय विचार है। इसी तरह संघ की अपनी वैचारिक मान्यताएं हैं। सब इससे सहमत हों या जरूरी नहीं, हिंदू शब्द का इस्तेमाल एक सांस्कृतिक परंपरा, इतिहास के उत्तराधिकारियों के रूप में संघ करता है। इस अर्थ में यह धार्मिक नहीं, एक सांस्कृतिक पद है। तमाम लोगों को इससे आपत्ति भी नहीं रही है। किंतु कुछ को शब्दों के पीछे पड़ने और राजनीति सूंघने का आदत है, वे इसके शिकार भी हैं। मोहन भागवत जो बात कह रहे हैं वह उनके जैसे संघ के करोड़ों समर्थक वर्षों से कह रहे हैं। इस वक्त क्योंकि भाजपा सत्ता में है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं तो यह विचार एक धार्मिक आक्रमण सरीखा दिख रहा है। समस्या यह है कि एक राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी और एक सांस्कृतिक संगठन की सीमाओं को एक कर देखा जा रहा है। दोनों दो कामों के लिए बने और कार्यरत हैं। यहां यह भी समझना होगा भारत का हिंदू राष्ट्र कोई धर्मराज्य नहीं है। यहां सब पंथों को समान रूप से काम करने, अपनी पूजा-उपासना करने की आजादी है। इसलिए मिथ्या भय से वैचारिक आतंक पैदा करने की कोशिशें उचित नहीं कही जा सकती हैं।
  हमें देखना होगा कि क्या भारत जैसा उदार लोकतंत्र पूरी इस्लामिक पट्टी में कहीं मौजूद है। जो दूसरे पंथों से सद्भभाव के साथ रहता हुआ दिखता हो। ईराक के उदाहरण हमारे सामने हैं जहां एक पंथ के पोषित आतंकवाद से पूरा देश तबाह हो चुका है। हिंसा, आतंक के  आधार पर विस्तार करने वाले पंथ या विचार अलग ही होते हैं। उनका काम करने का तरीका दिखता है और आज वे पूरी मानवता के लिए चुनौती हैं। हिंदुत्व का विचार मैं ही के दर्शन को नहीं मानता उसकी सोच है मैं ही नहीं, तू भी । यह एक समन्वयवादी विचार है। जो सबको साथ लेकर चलने और समूची मानवता के कल्याण की बात करता है। सर्वे भवंतु सुखिनः जिसका घोषमंत्र है और वसुधैव कुटुम्बकम् जिसकी प्रेरणा है। जिसके धार्मिक कवि भी कहते हैं- परहित सरिस घरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई। ऐसे विचार को अतिवादी कहना और बताना अपराध है। मोहन भागवत इसी भारतीय औदार्य के प्रतिनिधि हैं। वे यह कहना चाह रहे हैं कि उनके लिए भारत की भूमि पर रहने वाला हर नागरिक भारत मां का पुत्र है, उसके अधिकार और कर्तव्य इस घरती के लिए समान हैं। उनकी इस भावना को हिंदू शब्द के आधार पर गलत तरीके से व्याख्यायित करना ठीक नहीं है। आलोचना का,विचार का,विमर्श का स्तर भी क्या है। आप उन्हें हिटलर कह रहे हैं। अपने प्रधानमंत्री को हिटलर कह रहे हैं। इस देश की जनता के अपमान का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है। मुस्लिम तुष्टीकरण का मंत्र फेल होने के बावजूद चीजें लौटकर वहीं आ जाती हैं। भागवत के आलोचकों से पूछना चाहिए कि वे उनकी आलोचना क्यों कर रहे हैं। अगर उनका वक्तव्य किसी प्रकार की ताकत नहीं रखता तो उसे नजरंदाज क्यों नहीं करते। किंतु उन्हें पता है भागवत और आरएसएस का भूत दिखाकर शायद वे दो-चार मुस्लिम वोट पा जाएं। आश्चर्य है कि अभी भी आंखों से परदा नहीं हटा है। देश एक नई यात्रा पर निकल पड़ा है और हमारी राजनीति अभी भी उन्हीं मानकों पर खडी राजनीति की रोटियां सेंकना चाहती है।
  क्या हम तटस्थ होकर विषयों का विश्लेषण नहीं कर सकते हैं? क्या हमें देश को जोड़ने के लिए प्रयत्न तेज नहीं करने चाहिए? आखिर हमारी राजनीति और मीडिया का जोर समाज को तोड़ने पर क्यों है? क्यों हम चीजों को संदर्भों से काटकर वातावरण बिगाड़ना चाहते हैं? हमें पता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक हिंदू संगठन है। हमें यह भी पता है कि उसने मुस्लिम समाज से संवाद बनाने के लिए राष्ट्रीय मुस्लिम मंच नामक एक संगठन की स्थापना की है। रिश्तों में जमी बर्फ अब पिधल रही है। मुस्लिम समाज भी अब अलग ढंग से सोच रहा है और बदलते भारत की आकांक्षाओं से साथ खुद को स्थापित कर रहा है। उसकी इन कोशिशों को बढ़ाने और उसका मनोबल बढ़ाने के बजाए राजनीति विभाजनों को गहरा करने के कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहती है। हिंदुस्तान की घरती पर रहने वाले लोगों ने एक साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लडी, लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आपातकाल के खिलाफ लड़ाई लड़ी। आरएसएस और जमाते इस्लामी के लोगों ने साथ में मिलकर देश को आपातकाल के काले दिनों से मुक्ति दिलाई। आज उसी आम हिंदुस्तानी ने दस साल के भ्रष्ट शासन से भी मुक्ति दिलाई है। इस बदलाव को गहरे महसूस करने और आम हिंदुस्तानी के सपनों को समझने की जरूरत है। वह एक समर्थ भारत देखना चाहता है। एक वैभवशाली राष्ट्र को देखना चाहता है। काश्मीर से कन्याकुमारी तक सारा हिंदुस्तान इस भूमि के प्रति एक सरीखा भाव रखता है। यह भूमि सबकी साझा है। सबकी मां है। इस विचार से नफरत करने वालों को भी यह भारत मां अपने आंचल में जगह देती है। क्योंकि बेटा बिगड़ जाए तो भी मां की भावनाएं तो बेटे के लिए संवेदना भरी ही होंगीं। मोहन भागवत के बोले एक शब्द पर मत जाईए, उनके भाषण के पूरे संदर्भ को सांस्कृतिक संदर्भ में पढिए तो समस्या दूर हो जाएगी। राजनीतिक और धार्मिक संदर्भ में पढ़िएगा तो समस्या बढ़ जाएगी। किंतु कुछ लोगों को संवाद, सार्थक संवाद और सुसंवाद में नहीं, समस्याओं को बढ़ाने और विवाद को वितंडावाद बनाने में मजा आता है। उन्हें भी इस लोकतंत्र में यह करने की आजादी है। कीजिए ,खूब कीजिए... पर यह मत समझिए कि लोग बहुत नादान हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)