कश्मीर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कश्मीर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 1 मई 2017

कश्मीरः ये आग कब बुझेगी ?


-संजय द्विवेदी

 कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर नहीं लगता कि आग जल्दी बुझेगी। राजनीतिक नेतृत्व की नाकामियों के बीच, सेना के भरोसे बैठे देश से आखिर आप क्या उम्मीद पाल सकते हैं? भारत के साथ रहने की कीमत कश्मीर घाटी के नेताओं को चाहिए और मिल भी रही है, पर क्या वे पत्थर उठाए हाथों पर नैतिक नियंत्रण रखते हैं यह एक बड़ा सवाल है। भारतीय सुरक्षाबलों के बंदूक थामे हाथ सहमे से खड़े हैं और पत्थरबाज ज्यादा ताकतवर दिखने लगे हैं।
   यह वक्त ही है कि कश्मीर को ठीक कर देने और इतिहास की गलतियों के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराने वाले आज सत्ता में हैं। प्रदेश और देश में भाजपा की सरकार है, पर हालात बेकाबू हैं। समय का चक्र घूम चुका है। जहां हुए बलिदान मुखर्जी वह कश्मीर हमारा है का नारा लगाती भाजपा देश की केंद्रीय सत्ता में काबिज हो चुकी है। प्रदेश में भी वह लगभग बराबर की पार्टनर है। लेकिन कांग्रेस कहां हैइतिहास की इस करवट में कांग्रेस की प्रतिक्रियाएं भी नदारद हैं। फारूख अब्दुल्ला को ये पत्थरबाज देशभक्त दिख रहे हैं। आखिर इस देश की राजनीति इतनी बेबस और लाचार क्यों है। क्यों हम साफ्ट स्टेट का तमगा लगाए अपने सीने को छलनी होने दे रहे हैं। कश्मीर में भारत के विलय को ना मानने वाली ताकतें, भारतीय संविधान और देश की अस्मिता को निरंतर चुनौती दे रही हैं और हम इन घटनाओं को सामान्य घटनाएं मानकर चुप हैं। जम्मू, लद्दाख, लेह के लोगों की राष्ट्रनिष्ठा पर, घाटी के चंद पाकिस्तानपरस्तों की आवाज ऊंची और भारी है। भारतीय मीडिया भी उन्हीं की सुन रहा है, जिनके हाथों में पत्थर है। उसे लेह-लद्दाख और जम्मू के दर्द की खबर नहीं है। अपनी जिंदगी को जोखिम में डालकर देश के लिए पग-पग पर खड़े जवान ही पत्थरबाजों का निशाना हैं। ये पत्थरबाज तब कहां गायब हो जाते हैं, जब आपदाएं आती हैं, बाढ़ आती है। भारतीय सेना की उदारता और उसके धीरज को चुनौती देते ये युवा गुमराह हैं या एक बड़ी साजिश के उत्पाद, कहना कठिन है। दरअसल हम कश्मीर में सिर्फ आजादी के दीवानों से मुकाबिल नहीं हैं बल्कि हमारी जंग उस वैश्विक इस्लामी आतंकवाद से भी जिसकी शिकार आज पूरी दुनिया है। हमें कहते हुए दर्द होता है पर यह स्वीकारना पड़ेगा कि कश्मीर के इस्लामीकरण के चलते यह संकट गहरा हुआ है। यह जंग सिर्फ कश्मीर के युवाओं की बेरोजगारी, उनकी शिक्षा को लेकर नहीं है-यह लड़ाई उस भारतीय राज्य और उसकी हिंदू आबादी से भी है। अगर ऐसा नहीं होता कि कश्मीरी पंडित निशाने पर नहीं होते। उन्हें घाटी छोड़ने के लिए विवश करना किस कश्मीरियत की जंग थी? क्या वे किसी कश्मीरी मुसलमान से कश्मीरी थे? लेकिन उनकी पूजा-पद्धति अलग थी? वे कश्मीर को एक इस्लामी राज्य बनने के लिए बड़ी बाधा थे। इसलिए इलाके का पिछड़ापन, बेरोजगारी, शिक्षा जैसे सवालों से अलग भी एक बहस है जो निष्कर्ष पर पहुंचनी चाहिए। क्या संख्या में कम होने पर किसी अलग समाज को किसी खास इलाके में रहने का हक नहीं होना चाहिए? दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में मानवाधिकारों और बराबरी के हक की बात करने वाले इस्लाम मतावलंबियों को यह सोचना होगा कि उनके इस्लामी राज में किसी अन्य विचार के लिए कितनी जगह है? कश्मीर इस बात का उदाहरण है कि कैसे अन्य मतावलंबियों को वहां से साजिशन बाहर किया गया। यह देश की धर्मनिरपेक्षता, उसके सामाजिक ताने-बाने को तार-तार करने की साजिश है। कश्मीर का भारत के साथ होना दरअसल द्विराष्ट्रवाद की थ्यौरी को गलत साबित करता है। अगर हिंदुस्तान के मुसलमान पहले भारतीय हैं, तो उन्हें हर कीमत पर इस जंग में भारतीय पक्ष में दिखना होगा। हिंदुस्तानी मुसलमान इस बात को जानते हैं कि एक नयी और बेहतर दुनिया के सपने के साथ बना पाकिस्तान आज कहां खड़ा है। वहां के नागरिकों की जिंदगी किस तरह हिंदुस्तानियों से अलग है। जाहिर तौर पर हमें पाकिस्तान की विफलता से सीखना है। हमें एक ऐसा हिंदुस्तान बनाना है, जहां उसका संविधान सर्वोच्च और बाकी पहचानें उसके बाद होगीं। एक पांथिक राज्य में होना दरअसल मनुष्यता के तल से बहुत नीचे गिर जाना है।
   कश्मीर को एक पांथिक राज में बदलने में लगी ताकतों का संघर्ष दरअसल मानवता से भी है। यह जंग मानवता और पंथ-राज्य के बीच है। भारत के साथ होना दरअसल एक वैश्विक मानवीय परंपरा के साथ होना है। उस विचार के साथ होना है जो मनुष्य-मनुष्य में भेद नहीं करती, भले उसकी पूजा-पद्धति कुछ भी हो। कश्मीर का दर्द दरअसल मानवता का भी दर्द है, लाखों विस्थापितों का दर्द है, जलावतन कश्मीरी पंडितों का दर्द है। कश्मीर की घरती पर रोज गिरता खून आचार्य अभिनव गुप्त और शैव आचार्यों की माटी को रोज प्रश्नों से घेरता है। सूफी विद्वानों की यह माटी आज अपने दर्द से बेजार है। दुनिया को रास्ता दिखाने वाले विद्वानों की धरती पर मचा कत्लेआम दरअसल एक सवाल की तरह सामने है। आजादी के सत्तर साल बाद भी हम एक नादान पड़ोसी की हरकतों के चलते अपने नौजवानों को रोज खो रहे हैं। दर्द बड़ा और पुराना हो चुका है। इस दर्द की दवा भी वक्त करेगा। किंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना यह कब तक हो पाएगा, कहना कठिन है।

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

कश्मीर में सरकार आपकी पर ‘राज’ किसका?

-संजय द्विवेदी

  कश्मीर में सुरक्षा बलों की दुर्दशा और अपमान के जो चित्र वायरल हो रहे हैं, उससे हर हिंदुस्तानी का मन व्यथित है। एक जमाने में कश्मीर को लेकर हुंकारे भरने वाले समूह भी खामोश हैं। ऐसे में यह सवाल पूछने का मन हो रहा है कि कश्मीर में सरकार तो आपकी है पर राज किसका है ? कश्मीर एक ऐसी अंतहीन आग में जल रहा है जो हमारे प्रथम प्रधानमंत्री की नादानियों की वजह से एक नासूर बन चुका है। तब से लेकर आजतक सारा देश कश्मीर को कभी बेबसी और कभी लाचारी से देख रहा है।
  नीतियों में स्पष्टता न होने के कारण हम वहां एक सरकार बनाकर खुश हो लेते हैं, जबकि वहां पर राजलंबे अरसे से कुछ अराजक ताकतें ही कर रही हैं। कश्मीर घाटी के कुछ इलाकों में देशद्रोही जमातों की मिजाजपुर्सी में हमारी सरकारें लेह-लद्दाख, जम्मू की उपेक्षा तक करती आ रही हैं। सच्चाई तो यह है कि घाटी के चंद उपद्रवी तत्वों को भारत के साथ बने रहने की हम लंबी कीमत दे रहे हैं। जबकि देशभक्ति की भावना से भरा समाज यहां प्रताड़ित हो रहा है।
     देशद्रोही मानसिकता के लोगों को पालपोसकर हमने वहां राष्ट्रीय मन के समाज के निरंतर आहत किया है। जबकि जिनके हाथ कश्मीरी पंडितों के खून से रंगें हैं, उन्हें पालकर हम क्या हासिल कर हैं? अब जबकि घाटी लगभग हिंदू विहीन है तब वे किससे और क्यों लड़ रहे हैं ? हिंदुओं के वीरान पड़े घर, मंदिर और देवालय हमें बता रहे हैं कि इस जमीन कैसा खूरेंजी खेल गया है। आज उन्हीं दहशतगर्दों की हरकतें इतनी कि वे हमारे सुरक्षा बलों पर भी पत्थर बरसाने से लेकर लात मारने की कार्रवाई कर रहे हैं। शायद ही कोई देश हो जो ऐसे समय में अपने सुरक्षाबलों को संयम की सलाह दे। संयम और नियम आम जनता के लिए होते हैं या पेशेवर आतंकियों के लिए? यह हमें सोचना होगा। भारत का मान बचाने वाली सेना या केंद्रीय बलों के नौजवान अगर अपनी ही घरती पर अपमानित हो रहे हैं तो हम रहम क्यों कर रहे हैं? संयम की सलाह सेना और सुरक्षा बलों को ही क्यों दी जा रही है? भाड़े के टट्टू पाकिस्तान परस्ती पर अपनी ही सेना पर पत्थर बरसा रहे हैं, आतंकियों को भाग निकलने के लिए अवसर दे रहे हैं। कश्मीर पर खर्च हो रहे देश के करोड़ों रूपयों का मतलब क्या है? अगर वे खुद अपनी जिंदगी जहन्नुम बनाए रखना चाहते हैं तो सरकार क्या कर सकती है? लेकिन इतना तय है कि देश की सरकार को कश्मीर के लिए कोई निर्णायक कदम उठाना होगा। इसका पहला समाधान तो यही है कश्मीर में निरंतर हस्तक्षेप कर रहे पाकिस्तान को पूंछ को सीधा करने के लिए बलूचिस्तान, सिंध और पाकअधिकृत कश्मीर हो रहे मानवाधिकार के दमन को  लेकर दबाव बनाया जाए। बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा और मान्यता देने की पहल हो सकती है और अपेक्षित साहस दिखाते हुए बलूस्चितानी निर्वासित नेताओं को भारत में शरण देने की पहल भी की जा सकती है। संस्कृत में एक वाक्य है शठे शाठ्यं समाचरेत्। यानि दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए। हम पाकिस्तानी के प्रति कितने भी सदाशयी हो जाएं ,वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ सकता। कुलभूषण जाधव का प्रसंग इसका साफ उदाहरण है। बावजूद इसके हम फिल्में दिखाने, क्रिकेट खेलने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे मूर्खताओं से जेहादी आतंकवाद का सामना करने का सपना देख रहे हैं।
  आज जबकि कश्मीर घाटी में किराए के टट्टूओं ने पूरी कश्मीर के वातावरण को बिगाड़ रखा तब हमें सोचना होगा कि आखिर हमारी रणनीति में ऐसी क्या खामी है कि हम अपने ही घर में पिट रहे है। भारत को इस समय अपेक्षित आक्रामकता दिखानी ही होगी। खेल का मैदान बदलना होगा। हमारी जमीन पर रोज हो रही लीला बंद होनी चाहिए। अब जमीन और जंग का मैदान दोनों बदलने का समय है। हम हिंदुस्तानी मन लेकर पाकिस्तानी पापों का प्रतिरोध नहीं कर सकते। इसलिए ये घटनाएं सबक भी हैं और संकेत भी। इसके साथ ही वहां आतंक का प्रसार कर रहे तत्वों और गिलानी समर्थक समूहों की आर्थिक शक्ति को भी तबाह करने का समय है। क्योंकि ये तत्व पूरी घाटी के चेहरे बने हुए हैं। इनकी शक्ति को तोड़ने और इनके अर्थतंत्र को तबाह करने की जरूरत है। घाटी में लगातार बंद और हड़तालों से आगे अब इनके लोग स्कूलों पर हमले कर रहे हैं। स्कूलों को तबाह कर रहे हैं। यह बात बताती है कि इनके इरादे क्या हैं। हमें सोचना होगा कि कश्मीरी युवाओं को शिक्षा और रोजगार के मार्ग से भटका कर उन्हें किस स्वर्ग के सपने दिखाए जा रहे हैं? आखिर पाकिस्तान कश्मीर को पाकर कौन सा स्वर्ग वहां रचेगा, जबकि उसके कब्जे वाला कश्मीर किस तरह मुफलिसी और तबाही का शिकार है। जाहिर तौर पर पाकिस्तान की कोशिश कश्मीर को अशांत रखकर भारत की प्रगति और उसकी एकता को तोड़ने की है। अब यह मामला बहुत आगे बढ़ चुका है। सात दशकों की पीड़ा को समाप्त करने का समय अब आ गया है। केंद्र की सरकार को बहुत सधे हुए कदमों से आगे बढ़ना होगा ताकि कश्मीर का संकट हल हो सके। उसके शेष भागों लेह, लद्दाख और जम्मू का विकास हो सके। अकेली घाटी के कुछ इलाकों की अशांति के नाते समूचे जम्मू-कश्मीर राज्य की प्रगति को रोका नहीं जा सकता। धारा-370 को हटाने सहित अनेक प्रश्न जुड़े हैं, जिनसे हमें जूझना होगा।

   घाटी के गुमराह नौजवानों को भी यह समझाने की जरूरत है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। पाकिस्तान और आईएस के झंडे दिखा रही ताकतों को जानना होगा कि भारत के संयम को उसकी कमजोरी न समझा जाए। इतनी लंबी जंग लड़कर पाकिस्तान को हासिल क्या हुआ है, उसे भी सोचना चाहिए। दुनिया बदल रही है। लड़ाई बदल रही है। कश्मीर घाटी में लोकतंत्र की विरोधी शक्तियां भी पराभूत होगीं, इसमें दो राय नहीं। राजनीति के कारण नहीं, देश की जनता के कारण। केंद्र में कोई भी सरकार रही हो सबने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानकर, उसे अपना माना है। इसलिए देश को तोड़ने का यह दुःस्वप्न कभी फलीभूत नहीं होगा। कश्मीर घाटी के उपद्रवी और सीमा पार बैठे उनके दोस्त, इस सच को जितनी जल्दी समझ जाएं बेहतर होगा।

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

कश्मीरी पंडितों की वापसी से कौन डरता है ?

                                                           
-संजय द्विवेदी


   कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने को लेकर अलगाववादी संगठनों की जैसी प्रतिक्रियाएं हुयी हैं, वे बहुत स्वाभाविक हैं। यह बात साबित करती है कि कश्मीर घाटी में जो कुछ हुआ, उसमें इन अलगाववादियों की भूमिका और समर्थन रहा है। कश्मीर पंडितों की कालोनी बनाने की बात पर उन्हें यहूदी शब्द से संबोधित करना कितना खतरनाक है। यह वहां पल रही घातक मानसिकता और विचारधारा दोनों का प्रगटीकरण है। कश्मीरी पंडित एक पीड़ित पक्ष हैं, जबकि इजराइल के यहूदी एक ताकतवर समूह हैं। उनसे कश्मीरी पंडितों की तुलना अन्याय ही है। इतने अत्याचार और दमन के बावजूद पंडितों ने अब तक अपनी लड़ाई कानूनी और अहिंसक तरीके से ही लड़ी है। वे हथियार उठाने और कत्लेआम करने वाले लोग नहीं है। पाकप्रेरित अलगाववादी संगठन घाटी को हिंदुमुक्त करने के नापाक इरादे में कामयाब हुए तो उन्हें यह लगा कि कश्मीर अब अलग हो जाएगा। किंतु हिंदुस्तान के लोग, कश्मीर के लोग इस हिस्से को भारत का मुकुट मानते हैं। उनके सुख-दुख में साथ खड़े होते हैं, समान संवेदना का अनुभव करते हैं। कुछ मुट्ठी भर लोग इस सांझी विरासत से भरोसा उठाना चाहते हैं।उन्हें बार-बार विफलता हाथ लगी है और आगे भी लगेगी। क्या कश्मीरी अलगाववादी यह कहना चाहते हैं कि जहां मुसलमान बहुसंख्यक होंगे वहां दूसरे पंथ के लोग नहीं रह सकते?
पाकिस्तान के द्विराष्ट्रवाद पर तमाचाः
    कश्मीर दरअसल पाकिस्तान के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर एक तमाचा है। किसी राज्य में बहुसंख्यक मुस्लिम जनता और भारत का शासन यह पाकिस्तान से बर्दाश्त नहीं होता। हम साथ मिलकर रह रहे हैं, रह सकते हैं, यही पाकिस्तान की पीड़ा है। कश्मीर भारत का सांस्कृतिक परंपरा का अविछिन्न अंग है। हमारे तीर्थ, पर्व, मंदिर, देवस्थल सब यहां हैं। अमरनाथ और वैष्णो देवी से लेकर शंकराचार्य के मंदिर यही कथा कहते हैं। यह क्षेत्र ऋषियों-मुनियों की तपस्यास्थली रहा है। लेकिन अलगाववादियों के अपने तर्क हैं। उन्होंने बंदूकों, अपहरणों, दुराचारों, लूट और आतंक के आधार पर इस इलाके को नरक बनाने की कोशिशें कीं। किंतु हाथ क्या लगा? आज भी वहां एक चुनी हुयी सरकार है, जिसमें भारत का एक राष्ट्रवादी दल हिस्सेदार है। यह साधारण नहीं है कि घाटी में भाजपा को वोट नहीं मिले, यह गहरे विभाजन का संकेत है। यह बात बताती है कि एक खास इलाके में किस तरह से लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा से काटकर देश के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है। इस मानसिकता को पालने-पोसने और विकसित करने के जतन निरंतर हो रहे हैं। भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियां चलाने वालों को समर्थन देने वाले तत्व आज भी घाटी में मौजूद हैं। भारतीय सेना पर पत्थर फेंकना इसी मानसिकता का परिचायक है। ऐसे असुरक्षित वातावरण में जहां पुलिस और सेना के लोग पत्थर खा रहे हों, मार दिए जाते हैं वहां मुट्ठी भर कश्मीरी पंडित किस भरोसे और विश्वास पर बसेंगें ? निश्चय ही यह अलगाववादियों की पीड़ा है कि उन्होंने कितने जतन और षडयंत्रों से कश्मीरी पंडितों को यहां से भगाया और वे फिर यहां बस जाएंगें। ये वही लोग हैं जो भारत से आजादी चाहते हैं और पाकिस्तानी हुक्मरानों के तलवे चाटते हैं।
 अब शुरू कीजिए पाक अधिकृत कश्मीर की मांगः
  कश्मीर की आजादी का सवाल उठाने वाले लोग अब यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि उनकी हसरत पूरी नहीं हो सकती। भारत के लोग कभी यह होने नहीं देंगे। राजनीतिक पहलकदमी से परे हिंसक आंदोलन चलाने वाली ये ताकतें भारत के खिलाफ कश्मीरी मानस में जहर भरने का काम निरंतर कर रही हैं। भारत सरकार भी इनके प्रति नरम रवैया अख्तियार करती रही है। जाने किस कूटनीति के चलते भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर के बारे में बात करनी बंद कर रखी है। जबकि भारत की सरकार को प्रखरता से आजाद कश्मीर (पाक अधिकृत कश्मीर) के बारे में बात करनी चाहिए। कश्मीर घाटी ही नहीं हमें पूरा कश्मीर चाहिए यही इस संकट का वास्तविक समाधान है। राजा हरि सिंह के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर के बाद हुयी राजनीतिक गफलतों ने ही कश्मीर के हालात बिगाड़े हैं। घाटी की हिंदू-सिख आबादी के साथ जो कुछ हुआ उसके भी दोषियों को दंडित करने और उन पर मुकदमे चलाने की जरूरत है। कश्मीरी पंडितों पर जो अत्याचार हुआ, उसके दोषी आज भी मजे से घूम रहे हैं। 2012 के दंगों पर एक गुजरात की सरकार के पीछे पड़े लोग, क्या कश्मीरियों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ बोलेगें? गुजरात दंगों पर तो सैंकड़ों को जेल और सजा हो चुकी है। क्या कश्मीर घाटी के गुनहगारों पर भी हमारी सरकारों की नजर जाएगी? अपराध-अपराध है उसे चयनित आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। मलियाना के गुनहगारों के लिए सारे मीडिया में स्यापा है। लेकिन कश्मीर में जो हुआ उसे पूरी इंसानियत शर्मिंदा है। सरकार को चाहिए कि ऐसे मानवता विरोधी आतंकियों की पड़ताल कर उनके खिलाफ,उनके मददगारों के खिलाफ मामले खोले और नए सिरे से कार्रवाई प्रारंभ करे। जिन कश्मीरी पंडितों के घरों पर कब्जे करके लोग बैठे हैं, उनके कब्जे हटाए जाएं। भारत की आजादी के बाद शायद ये सबसे बड़ा विस्थापन था, जिसमें 65 हजार कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ना पड़ा। भारत औऱ राज्य की सरकार की यह जिम्मेदारी है वे गुनहगारों को कतई माफ न करें।
यहां सिर्फ सेना ही है भारत के साथः

        आज चारो तरफ से एक ही आवाज आती है कि घाटी से सेना से हटाओ। सवाल यह उठता है कि क्या सेना को हटाने से कश्मीर में आया अमन-चैन रह पाएगा? क्या इस हिस्से में पुनः आतंकी शक्तियां हावी नहीं हो जाएगीं? लोकतंत्र के मायने मनमानी नहीं होती। किंतु कश्मीरी अलगाववादियों ने इस राज्य को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अहमद शाह गिलानी की लंबी हड़तालों, प्रदर्शनों ने राज्य की अर्थव्यवस्था को तो चौपट किया ही है लोगों को जान-माल के खतरे भी दिए। ऐसे नेताओं से लोग अब ऊब चुके हैं। गिलानी भी अब बूढ़े हो चुके हैं और कश्मीर को भारत से अलग करने का उनका सपना अब तो पूरा होने से रहा। एक चुनी हुयी सरकार अब कश्मीर में है। जरूरत इस बात की है कश्मीर को विकास के मोर्चे पर आगे लाकर खड़ा किया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी निरंतर कश्मीर के सवाल को अपनी प्राथमिकता में रखा है। तमाम आलोचनाओं और राजनीतिक मजबूरियों के बावजूद इस राज्य में मुफ्ती सरकार के साथ गठजोड़ किया। यह संकेत बताते हैं कि भारत सरकार इस राज्य के विकास में रोड़े अटकाना नहीं चाहती। किंतु इस पूरे खेल में सिर्फ लेना ही नहीं चलेगा। यह संभव नहीं कि भारत की सरकार आपके हर दर्द में साथ खड़ी हो और आप पाकिस्तान के झंडे लहराएं। कश्मीर के अलगाववादी तत्वों के साफ संदेश देने की जरूरत है कि वे आतंक, हिंसा, खून-खराबे, पत्थर फेंकने जैसे सारे हथियार आजमा चुके हैं अब उन्हें चाहिए कि वे लोकतंत्र की खुली हवा में लोगों को सांस लेने दें। ऐसे हालात बनाएं कि सेना बैरकों में जा सके। इसके पहले उन्हें यह भरोसा देना होगा कि घाटी में सेना के अलावा अब तथाकथित अलगाववादी भी भारत के प्रति प्रेम रखते हैं। हालात यह हैं कि घाटी में आज भी भारत विरोधी और पाक समर्थक आवाजें गूंज रही हैं। ऐसे समय. में कश्मीरी पंडितों की वापसी का विरोध करके अलगाववादियों ने अपना असली चेहरा दिखा दिया है। हालांकि श्राइन बोर्ड के जमीन देने के सवाल पर ऐसे ही प्रपंची स्वर सामने आ चुके थे। यह समझना मुश्किल नहीं है कश्मीर का असल संकट घाटी के मुट्ठी पर अलगाववादी हैं, जो पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं के इशारे पर नाचते रहते हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ये अलगाववादी कश्मीर की आवाज नहीं हैं। कश्मीर की जनता ने फैसला कर दिया है, एक लोकप्रिय सरकार वहां बनी है, उसे काम करने दें। अगर शौक है तो अगले चुनाव में उतरकर अपनी हैसियत आजमा लें। लोकतंत्र में यही एकमात्र विकल्प है। बंदूकों के साए में आजादी-आजादी की रट लगाने से क्या हासिल है इसे वे अच्छी तरह जानते हैं।

गुरुवार, 5 मार्च 2015

कश्मीरः इतिहास में अटकी सूईयां

भाजपा-पीडीपी के सामने हालात को बदलने की चुनौती
-संजय द्विवेदी

  कश्मीर में भाजपा ने जिस तरह लंबे विमर्श के बाद पीडीपी के साथ गठबंधन की सरकार बनाई, उसकी आलोचना के लिए तमाम तर्क गढ़े जा सकते हैं। किसी भी अन्य राजनीतिक दल ने ऐसा किया होता तो उसकी आलोचना या निंदा का सवाल ही नहीं उठता, किंतु भाजपा ने ऐसा किया तो महापाप हो गया। यहां तक कि कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी लग रहा है कि भाजपा के इस कदम से डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आत्मा को ठेस लगी होगी।
   यह समझना बहुत मुश्किल है कि भाजपा जब एक जिम्मेदार राजनीतिक दल की तरह व्यवहार करते हुए विवादित सवालों से किनारा करते हुए काम करती है तब भी वह तथाकथित सेकुलर दलों की निंदा की पात्र बनती है। इसके साथ ही जब वह अपने एजेंडे पर काम कर रही होती है, तब भी उसकी निंदा होती है। यह गजब का द्वंद है, जो हमें देखने को मिलता है। अगर डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सम्मान और 370 की चिंता भाजपा को नहीं है तो उमर या फारूख क्या इस सम्मान की रक्षा के लिए आगे आएंगें? जाहिर तौर पर यह भाजपा को घेरने और उसकी आलोचना करने का कोई मौका न छोड़ने की अवसरवादी राजनीति है। क्यों बार-बार एक ऐसे राज्य में जहां भाजपा को अभी एक बड़े इलाके की स्वीकृति मिलना शेष है कि राजनीति में उससे यह अपेक्षा की जा रही है कि वह इतिहास को पल भर में बदल देगी।
साहसिक और ऐतिहासिक फैसलाः
    भाजपा का कश्मीर में पीडीपी के साथ जाना वास्तव में एक साहसिक और ऐतिहासिक फैसला है। यह संवाद के उस तल पर खड़े होना है, जहां से नई राहें बनाई जा सकती हैं। भाजपा के लिए कश्मीर सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, एक भावनात्मक विषय है। भाजपा के पहले अध्यक्ष(तब जनसंघ) ने वहां अपने संघर्ष और शहादत से जो कुछ किया वह इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है। भाजपा के लिए यह साधारण क्षण नहीं था, किंतु उसका फैसला असाधारण है। सरकार न बनाना कोई निर्णय नहीं होता। वह तो इतिहास के एक खास क्षण में अटकी सूइयों से ज्यादा कुछ नहीं है। किंतु साहस के साथ भाजपा ने जो निर्णय किया है, वह एक ऐतिहासिक अवसर में बदल सकता है। आखिर कश्मीर जैसे क्षेत्र के लिए कोई भी दल सिर्फ नारों और हुंकारों के सहारे नहीं रह सकता। इसीलिए संवाद बनाने के लिए एक कोशिश भाजपा ने चुनाव में की और अभूतपूर्व बाढ़ आपदा के समय भी की। यह सच है कि उसे घाटी में वोट नहीं मिले, किंतु जम्मू में उसे अभूतपूर्व समर्थन मिला। यह क्षण जब राज्य की राजनीति दो भागों में बंटी है, अगर भाजपा सत्ता से भागती तो वहां व्याप्त निराशा और बंटवारा और गहरा हो जाता। भाजपा ने अपने पूर्वाग्रहों से परे हटकर संवाद की खिड़कियां खोलीं हैं। अलगाववादी नेता स्व.अब्दुल गनी लोन के बेटे सज्जाद लोन को अपने कोटे से मंत्री बनवाया है। यह बात बताती है कि अलगाववादी नेता भी लोकतंत्र का हमसफर बनकर इस देश की सेवा कर सकते हैं।
यहां पराजित हुआ है पाक का द्विराष्ट्रवादः
  कश्मीर की स्थितियां असाधारण हैं। पाकिस्तान का द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत कश्मीर में ही पराजित होता हुआ दिखता है। हमने सावधानी नहीं बरती तो कश्मीर का संकट और गहरा होगा। आज सेना के सहारे देश ने बहुत मुश्किलों से घाटी में शांति पाई है। कश्मीर का इलाज आज भी हमारे पास नहीं है। देश के कई इलाके इस प्रकार की अशांति से जूझ रहे हैं किंतु सीमावर्ती कश्मीर में पाक समर्थकों की उपस्थिति और पाकिस्तान के समर्थन से हालात बिगड़े हुए हैं। कश्मीर के लोगों से भावनात्मक रूप से जुड़े बिना यहां कोई पहल सफल नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात को जानते हैं कि वहां के लोगों की स्वीकृति और समर्थन भारत सरकार के लिए कितनी जरूरी है। हमारे पहले प्रधानमंत्री की कुछ रणनीतिक चूकों की वजह से आज कश्मीर का संकट इस रूप में दिखता है। ऐसे में भाजपा का वहां सत्ता में होना कोई साधारण घटना और सूचना नहीं है। घाटी और जम्मू के बेहद विभाजित जनादेश के बाद दोनों दलों की यह नैतिक जिम्मेदारी थी कि वे अपने-अपने लोगों को न्याय दें। केंद्र की सत्ता में होने के नाते भाजपा की यह ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी थी।
उन्हें क्यों है 370 पर दर्दः
जिन लोगों को 370 दर्द सता रहा है वे दल क्या भाजपा के साथ 370 को हटाने के लिए संसद में साथ आएंगें, जाहिर तौर पर नहीं। फिर इस तरह की बातों को उठाने का फायदा क्या है। इतिहास की इस घड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ऐतिहासिक अवसर मिला है, जाहिर है वे इस अवसर का लाभ लेकर कश्मीर के संकट के वास्तविक समाधान की ओर बढ़ेंगें। संवाद से स्थितियां बदलें तो ठीक अन्यथा अन्य विकल्पों के लिए मार्ग हमेशा खुलें हैं। देश को एक बार कश्मीर के लोगों को यह अहसास तो कराना होगा कि श्रीनगर और दिल्ली में एक ऐसी सरकार है जो उनके दर्द को कम करना चाहती है। जिसके लिए सबका साथ-सबका विकास सिर्फ नारा नहीं एक संकल्प है। यह अहसास अगर गहरा होता है, घाटी में आतंक को समर्थन कम होता है, वहां अमन के हालात लौटते हैं और सामान्य जन का भरोसा हमारी सरकारें जीत पाती हैं तो स्थितियां बदल सकती हैं। आज कश्मीर के लोग भी भारत में होने और पाकिस्तान के साथ होने के अंतर को समझते हैं।

    कोई भी क्षेत्र अनंतकाल तक हिंसा की आग में जलता रहे तो उसकी चिंताएं अलग हो जाती हैं। भारत सरकार के पास कश्मीर को साथ रखना एकमात्र विकल्प है। इसलिए उसे समर्थ और खुशहाल भी बनाना उसकी ही जिम्मेदारी है। 370 से लेकर अन्य स्थानीय सवालों पर विमर्श खड़ा हो, उसके नाते होने वाले फायदों और नुकसान पर संवाद हो। फिर लोग जो चाहें वही फैसला हो, यही तो लोकतंत्र है। भाजपा अगर इस ओर बढ़ रही है तो यह रास्ता गलत कैसे है।