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शनिवार, 15 जून 2024

अबू धाबी के विद्यार्थियों से बोले प्रो. द्विवेदी - यह क्रियेटिविटी और आईडियाज का समय

 

-भारतीय विद्या भवन , अबू धाबी का आयोजन

-कम्युनिकेशन से ही होगा दुनिया के संकटों का समाधान




भोपाल। किसी भी इंसान को छोटी-छोटी समस्याओं पर नजर रखनी चाहिए। उनका हल सोचना चाहिए। बड़े और सफल आइडियाज इन्हीं से निकलते हैं।" यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी)के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने अबू धाबी के भारतीय विद्या भवन द्वारा संचालित इंटरनेशनल स्कूल में आयोजित आनलाईन संवाद कार्यक्रम में व्यक्त किए। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि यह समय क्रियेटिविटी और आईडियाज का है। दुनिया का हर संकट संवाद और संचार से हल किया जा सकता है। उन्होंने कहा संचार और संवाद की दुनिया में वही लोग स्थापित हो सकते हैं, जिनके पास नए विचार, नई भाषा और कहानी कहने की कला है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राइवेट इंटरनेशनल स्कूल, आबूधाबी की प्राचार्या वनिता वाल्टर ने की। इस अवसर पर प्रधानाचार्य सुरेश बालकृष्णन, उप-प्रधानाचार्या श्रीमती मिनी रमेश, हिंदी विभाग प्रमुख रवि शुक्ल भी उपस्थित रहे।

    विद्याथियों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए उन्होंने जहां मीडिया की दुनिया में अवसरों के बारे में  बताया, वहीं जीवन में भाषा की महत्ता पर भी बात की। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि अकसर कुछ नया देखते ही हम उसके उपभोग के बारे में सोचने लगते हैं, लेकिन उसे बेहतर बनाने की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। हर प्रोडक्ट या सर्विस अलग-अलग जगहों पर सफल नहीं हो सकती, लेकिन तुलना करने पर हम हर जगह के बारे में बेहतर जान सकते हैं। फिर पहले से मौजूद आइडिया में जरूरी बदलाव कर कुछ नया सोच सकते हैं। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि अपनी रुचि की चीजों के बारे में खूब पढ़िए। कुछ नया सीखने को मिले, तो इसके बारे में लोगों से बातें कीजिए। वे क्या सोचते हैं, यह जानने की कोशिश कीजिए। मन में जो भी विचार आते हैं, उन्हें अमलीजामा पहनाने की कोशिश कीजिए। इनके नतीजे अच्छे न निकलें, तो घबराइए मत, क्योंकि इसके बाद ही अच्छे आइडिया भी आएंगे। बस आपको अपनी क्रिएटिव सोच बनाए रखनी है। 

कार्यक्रम का संचालन विद्यालय की छात्राओं सुश्री अक्षया अनिल कुमार, नंदिनी त्रिवेदी ने किया। कार्यक्रम में 

सहभागी विद्यार्थी में कीर्तना नायर, प्रज्वल राव, अफ़शीन शेक, आकाश, साईं सिद्धार्थ प्रमुख रहे। कार्यक्रम में 

विद्यालय के भिन्न कक्षाओं  विद्यार्थियों ने सहभाग किया।

रविवार, 16 अगस्त 2020

गौरवशाली इतिहास को समेटे एक परिसर

                    आईआईएमसी के 56 वें स्थापना दिवस(17 अगस्त) पर विशेष

-प्रो. संजय द्विवेदी



   भारतीय जनसंचार संस्थान(आईआईएमसी) ने अपने गौरवशाली इतिहास के 56 वर्ष पूरे कर लिए हैं। किसी भी संस्था के लिए यह गर्व का क्षण भी है और विहंगावलोकन का भी। ऐसे में अपने अतीत को देखना और भविष्य के लिए लक्ष्य तय करना बहुत महत्वपूर्ण है। 17 अगस्त,1965 को देश की तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस संस्थान का शुभारंभ किया और तब से लेकर आजतक इस परिसर ने प्रगति और विकास के अनेक चरण देखे हैं।

     प्रारंभ में आईआईएमसी का आकार बहुत छोटा था, उन दिनों यूनेस्को के दो सलाहकारों के साथ मुख्यतः केंद्रीय सूचना सेवा के अधिकारियों के लिए पाठ्यक्रम आयोजित किए गए। साथ ही छोटे स्तर पर कुछ शोध कार्यों की शुरुआत भी हुई। यह एक आगाज था, किंतु यह यात्रा यहीं नहीं रुकी। 1969 में अफ्रीकी-एशियाई देशों के मध्यम स्तर के पत्रकारों लिए विकासशील देशों के लिए पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम का एक अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किया गया, जिसे अपार सफलता मिली और संस्थान को अपनी वैश्विक उपस्थिति जताने का मौका भी मिला। इसके साथ ही आईआईएमसी की एक खास उपलब्धि केंद्र और राज्य सरकारों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों के जनसंपर्क, संचार कर्मियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी रही। इन पाठ्यक्रमों के माध्यम से देश के तमाम संगठनों के संचार प्रोफेशनल्स की प्रशिक्षण संबंधी जरुरतों का पूर्ति भी हुई और कुशल मानवसंसाधन के विकास में योगदान रहा।

   बाद के दिनों में आईआईएमसी ने स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की शुरुआत की। जिसमें आज दिल्ली परिसर सहित  उसके अन्य पांच परिसरों कई पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। दिल्ली परिसर में जहां रेडियो और टीवी पत्रकारिता,अंग्रेजी पत्रकारिता, हिंदी पत्रकारिता, उर्दू पत्रकारिता, विज्ञापन और जनसंपर्क के पांच पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। वहीं उड़ीसा स्थित ढेंकानाल परिसर में उड़िया पत्रकारिता और अंग्रेजी पत्रकारिता के दो पाठ्यक्रम हैं। आइजोल(मिजोरम) परिसर अंग्रेजी पत्रकारिता में एक डिप्लोमा पाठ्यक्रम का संचालन करता है।  अमरावती(महाराष्ट्र) परिसर में अंग्रेजी और मराठी पत्रकारिता में पाठ्यक्रम चलते हैं। जम्मू (जम्मू एवं कश्मीर)परिसर में अंग्रेजी पत्रकारिता और कोयट्टम(केरल) परिसर में अंग्रेजी और मलयालम पत्रकारिता के पाठ्यक्रम संचालित किए  जाते हैं। इस तरह देश के विविध हिस्सों में अपनी उपस्थिति से आईआईएमसी भाषाई पत्रकारिता के विकास में एक खास योगदान दिया  है। हिंदी, मलयालम, उर्दू, उड़िया और मराठी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम इसके उदाहरण हैं। भविष्य में अन्य भारतीय भाषाओं में पाठ्यक्रमों के साथ उस भाषा में पाठ्य सामग्री की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होगी।

विजन है खासः

भारतीय जनसंचार संस्थान के विजन(दृष्टि) को देखें तो वह बहुत महत्वाकांक्षी है। ज्ञान आधारित सूचना समाज के निर्माण, मानव विकास , सशक्तिकरण एवं सहभागिता आधारित जनतंत्र में योगदान देने की बातें कही गयी हैं। इसमें साफ कहा गया है कि इन आदर्शों में अनेकत्व, सार्वभौमिक मूल्य और नैतिकता होगी। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हुए मीडिया शिक्षा शोध, विस्तार एवं प्रशिक्षण के कार्यक्रम चलाए जाएंगें। इस दृष्टि को  अपने पाठ्यक्रमों, प्रशिक्षण, शोध और संविमर्शों में शामिल करते हुए आईआईएमसी ने एक लंबी यात्रा तय की है। अपने प्रकाशनों के माध्यम से जनसंचार की विविध विधाओं पर विशेषज्ञतापूर्ण सामग्री तैयार की है। कम्युनिकेटर(अंग्रेजी) और संचार  माध्यम(हिंदी) दो शोध पत्रिकाओं के माध्यम से शोध और अनुसंधान का वातावरण बनाने का काम भी संस्थान ने किया है। आज जबकि सूचना एक शक्ति के रुप में उभर रही है। ज्ञान आधारित समाज बनाने में ऐसे उपक्रम और संविमर्श सहायक हो सकते हैं। जनसंचार को एक ज्ञान-विज्ञान के अनुशासन के रूप में स्थापित करने और उसमें बेहतर मानवसंसाधन के विकास के लिए तमाम यत्न किए जाने की जरुरत है।इन चुनौतियों के बीच भारतीय जनसंचार संस्थान शिक्षण, प्रशिक्षण और शोध के क्षेत्र में एक बड़ी जगह बनाई है। संस्थान की विशेषता है कि इसका संचालन और प्रबंध एक स्वशासी निकाय भारतीय जनसंचार संस्थान समिति करती है। इसके अध्यक्ष सूचना और प्रसारण मंत्रालय  के सचिव श्री अमित खरे हैं। इस सोसायटी में देश भर के सूचना,संचार वृत्तिज्ञों(प्रोफेशनल्स) के अलावा देश के शिक्षा, संस्कृति और कला क्षेत्र के गणमान्य लोग भी शामिल होते हैं। मीडिया क्षेत्र की जरुरतों के मद्देनजर पाठ्यक्रमों को निरंतर अपडेट किया जाता है और संचार विशेषज्ञों के सुझाव इसमें शामिल किए जाते हैं। इसके अलावा कार्यकारी परिषद प्रबंध के कार्य  देखती है।

नेतृत्वकारी भूमिका में हैं पूर्व छात्र-


 आईआईएमसी के पूर्व छात्र आज देश के ही नहीं, विदेशों के भी तमाम मीडिया, सूचना और संचार संगठनों में नेतृत्वकारी भूमिका में हैं। उनकी उपलब्धियां असाधारण हैं और हमें गौरवान्वित करती हैं। आईआईएमसी के पूर्व छात्रों का संगठन इतना प्रभावशाली और सरोकारी है, वह सबको जोड़कर सौजन्य व सहभाग के तमाम कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। पूर्व विद्यार्थियों का सामाजिक सरोकार और आयोजनों के माध्यम से उनकी सक्रियता रेखांकित करने योग्य है। कोई भी संस्थान अपने ऐसे प्रतिभावान,संवेदनशील पूर्व छात्रों पर गर्व का अनुभव करेगा।

  आईआईएमसी का परिसर अपने प्राकृतिक सौंदर्य और स्वच्छता के लिए भी जाना जाता है। इस मनोरम परिसर में प्रकृति के साथ हमारा साहचर्य और संवाद संभव है। परिसर में विद्यार्थियों के लिए छात्रावास, समृद्ध पुस्तकालय, अपना रेडियो नाम से एक सामुदायिक रेडियो भी संचालित  है। इसके अलावा भारतीय सूचना सेवा के अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए विशेष सुविधाएं और उनके लिए आफीसर्स हास्टल भी संचालित  है। अपने दूरदर्शी  पूर्व अध्यक्षों, महानिदेशकों, निदेशकों, अधिकारियों, सम्मानित प्राध्यापकों और विद्यार्थियों के कारण यह परिसर स्वयं अपने इतिहास पर गौरवान्वित अनुभव करता है। आने वाले समय की चुनौतियों के मद्देनजर अभी और आगे  जाना  है। अपने सपनों में रंग भरना है। उम्मीद की जानी चाहिए कि संस्थान अपने अतीत से प्रेरणा लेकर बेहतर भविष्य  के लिए कुछ बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करेगा, साथ ही जनसंचार शिक्षा में वैश्विक स्तर पर स्वयं को स्थापित करने में सफल रहेगा।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान,नई दिल्ली के महानिदेशक हैं।)

रविवार, 26 अप्रैल 2020

करोना संकट को अवसर बनाकर आगे बढ़ने का समय


डा. मोहन भागवत ने अपने संबोधन में दिखाई नई राहें


-प्रो.संजय द्विवेदी



  करोना संकट से विश्व मानवता के सामने उपस्थित गंभीर चुनौतियों को लेकर दुनिया भर के विचारक जहां अपनी राय रख रहे हैं, वहीं दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत के संवाद ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है। कहने को तो डा. भागवत अपने संगठन के स्वयंसेवकों से संवाद कर रहे थे लेकिन इस संवाद के निहितार्थ बहुत विलक्षण हैं। उनके संवाद में देशभक्ति, मानवता और भारतवासियों के प्रति प्रेम के साथ वैश्विक आह्वान भी था कि अब विश्व मानवता के लिए भारत अपने वैकल्पिक दर्शन के साथ खड़ा हो। उन्होंने साफ कहा कि हमें संकटों को अवसर में बदलने की कला सीखनी होगी।
एक राष्ट्र-एक जन-
   सेवा के कामों में जुटे अपने स्वयंसेवकों से उन्होंने साफ कहा कि उनके लिए कोई पराया नहीं है। एक अरब तीस करोड़ भारतवासी उनका परिवार हैं। भाई-बंधु हैं। इसलिए सेवा की जरूरत जिन्हें सबसे ज्यादा उन तक मदद किसी भेदभाव के बिना सबसे पहले पहुंचनी चाहिए। उनकी इस राय के खास मायने हैं। उनका साफ कहना था भय और क्रोध से अतिवाद पैदा होता है। हमें हर तरह के अतिवाद से बचना है और भारत की सामूहिक शक्ति को प्रकट करना है। उनके संवाद में देश के सामने उपस्थित चुनौतियों का सामना करने और उससे आगे निकलने की सीख नजर आई। उनके समूचे भाषण में भय और क्रोध शब्द का उन्होंने कई बार इस्तेमाल किया और इन दो शब्दों के आधार होने वाली प्रतिक्रिया से सर्तक रहने को कहा। उनका कहना था कि समाज के अग्रणी जनों को ऐसे अवसरों पर अपने लोगों को संभालना चाहिए ताकि प्रतिक्रिया के अतिवादी रूप सामने न आएं।  
नर सेवा-नारायण सेवा-
सेवा संघ के मुख्य कामों में एक है। देश के हर संकट, दैवी आपदाओं और दुर्घटनाओं में संघ के स्वयंसेवक बिना प्रचार की आस किए सेवा के लिए आगे आते हैं। उसके सेवा भारती, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठन प्रत्यक्ष सेवा के काम से जुड़े हैं। इसके अलावा संघ के प्रत्येक आनुषांगिक संगठन के अपने-अपने सेवा के काम हैं। उन्होंने सेवा के काम में प्रत्यक्ष लगे कार्यकर्ताओं के लिए कहा कि वे सावधानी के साथ अपना काम करें ताकि काम के लिए वे बचे रहें। कोई छूट न जाए और  अपनत्व की भावना का प्रसार हो। उन्होंने कहा कि हम उपकार नहीं सेवा कर रहे हैं इसलिए इसे गुणवत्तापूर्ण ही होना होगा। प्रेम,स्नेह, श्रेष्ठता और अपनत्व की भावना से ही सेवा स्वीकार होती है। हमें अच्छाई का प्रसार करना है और भारतीयता के मूल्यों को स्थापित करना है। समाज के संरक्षण और उसकी सतत उन्नति ही हमारे लक्ष्य हैं।
स्वावलंबी भारत-सशक्त भारत-
अपने संबोधन में डा. भागवत ने स्वदेशी और स्वालंबन की आज फिर बात की। उनका कहना था कि जो कुछ हमारे पास उसे अन्य से लेने की आवश्यक्ता क्या है। इसके लिए हमें स्वदेशी का आचरण करते हुए स्वदेशी उत्पादों की गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। जिसके बिना हमारा काम चल सकता है उसे विदेशों से लेने की आवश्यक्ता क्या है। विदेशों पर निर्भरता को कम करने और समाज का स्वालंबन बढ़ाने पर उनका खासा जोर था। वे यहीं रुके उन्होंने रासायनिक खेती के खतरों की तरफ इशारा करते हुए जैविक खेती और गो-पालन पर भी जोर दिया। संघ लंबे समय से स्वदेशी की बात करता आ रहा है किंतु सत्ता की राजनीति मजबूरियों और राजनीति के खेल में उसकी आवाज अनसुनी की जाती रही है। कभी नीतियों के स्तर पर तो कभी विश्व बाजार के दबावों में। करोना संकट के बहाने एक बार फिर संघचालक ने स्वदेशी के आह्वान को मुखर किया है तो इसके विशेष अर्थ हैं।
संतों की हत्या पर जताया दुख-
अपने संवाद में डा. भागवत पालघर में दो संतों की हत्या पर दुखी नजर आए। उन्होंने कहा कि हमें ऐसी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य को समझकर इसकी पुनरावृत्ति रोकनी चाहिए। क्योंकि संत तो सब कुछ छोड़कर समाज के लिए निकले थे उनकी हत्या का कोई कारण नहीं है। नागरिक अनुशासन ही देशभक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक है। राजनीति को स्वार्थ से अलग कर उसे समाज केंद्रित बनाने पर जोर देते हुए उनका कहना था कि आज हमें पर्यावरण, जीवन और मानवता तीनों के बारे में सोचने की जरूरत है। डा. भागवत के व्याख्यान की मुख्य बातें सही मायने में एक जीवंत समाज बनाने की भावना से भरी-पूरी हैं। उनकी सोच का भारत ही अरविंद, विवेकानंद और महात्मा गांधी के सपनों का भारत है।
        कोरोना संकट में हुए इस व्याख्यान के बहाने डा. भागवत ने संघ की सामाजिक, सांस्कृतिक भूमिका का खाका खींच दिया है। स्वयंसेवकों के सामाजिक उत्तरदायित्व और देश तोड़क शक्तियों के मंसूबों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने भय  और क्रोध के आधार पर सृजित होने वाले अतिवाद को बड़ी चिंता से प्रकट किया। उनके संबोधन से साफ है कि संघ समाज में अपनी भूमिका को ज्यादा व्यापक करते हुए अपने सरोकारों को समाज के साथ जोड़ना चाहता। इस बार गर्मियों में संघ के प्रशिक्षण शिविर भी स्थगित हैं इसलिए स्वयंसेवकों के सामने इस संदेश पाथेय से करने के लिए काफी कुछ होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि संघ अपने विविध संगठनों के माध्यम से सेवा और देश के सशक्तिकरण के प्रयासों को व्यापक बनाने में सफल रहेगा। साथ ही उसके संकल्पों और कार्यों को सही संदर्भों में समझा जाएगा।


गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

आशा-निराशा के झूलों में झूलता रहा पूरा साल



जा रहे साल-2019 के नाम



-प्रो. संजय द्विवेदी
     किसी भी जाते हुए साल, बीते हुए समय को लोग याद कहां करते हैं। कई बार बीते दिन सुखद ही लगते हैं। फिर भी यह दिन नहीं है, साल है। वह भी 2019 जैसा। जिसने भारत की राजनीति, समाज, संस्कृति और उसके बौद्धिक विमर्शों को पूरा का पूरा बदल दिया है। जाते हुए साल ने नागरिकता संशोधन कानून(सीएए) के नाम पर सड़कों पर जो आक्रोश देखा है,यह संकेत है कि आने वाले दिन भी बहुत आसान नहीं हैं। कड़वाहटों, नफरतों और संवादहीनता से हमारी राजनीतिक जमातों ने जैसा भारत बनाया है, वह आश्वस्त नहीं करता। डराता है। राष्ट्र की समूची राजनीति के सामने आज यह प्रश्न है वह इस देश को कैसा बनाना चाहती है। यह देश एक साथ रहेगा, एकात्म विचार करेगा या खंड-खंड चिंतन करता हुआ,वर्षों से चली आ रही सुविधाजनक राजनीति का अनुगामी बनेगा। वह सवालों से टकराकर उनके ठोस और वाजिब हल तलाशेगा या शुतुरर्मुग की तरह बालू में सिर डालकर अपने सुरक्षित होने की आभासी प्रसन्नता में मस्त रहेगा।
पुलवामा हमले से हिला देशः
     साल के आरंभिक दिनों में हुए पुलवामा हमले ने जहां हमारी आंतरिक सुरक्षा पर गहरे सवाल खड़े किए, वहीं साल के आखिरी दिनों में मची हिंसा बताती है कि हमारा सभ्य होना अभी शेष है। लोकतांत्रिक प्रतिरोध का माद्दा अर्जित करने और गांधीवादी शैली को जीवन में उतारने के लिए अभी और जतन करने होगें। हम आजाद तो हुए हैं पर देशवासियों में अभी नागरिक चेतना विकसित करने में विफल रहे हैं। यह साधारण नहीं है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और अपने ही लोगों को ही प्रताड़ित करने में हमारे हाथ नहीं कांप रहे हैं। पुलवामा में 40 सैनिकों की शहादत देने के बाद भी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर हमारी नागरिक चेतना में कोई चैतन्य नहीं है।राजनीतिक लाभ के लिए भारतीय संसद में बनाए गए कानूनों को रोकने की हमारी कोशिशें बताती हैं कि विवेकसम्मत और विचारवान नागरिक अभी हमारे समाज में अल्पमत में हैं। यह ठीक है कि सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे अपने नागरिकों में विश्वास की बहाली करें और उनसे संवाद करें। किंतु यहां यह भी देखना होगा कि विरोध के लिए उतरे लोग क्या इतने मासूम हैं और संवाद के लिए तैयार हैं? अथवा वे ललकारों और हुंकारों के बीच ही अपने राजनीतिक पुर्नजीवन की आस लगाए बैठे हैं। ऐसे समय में हमारे राजनीतिक नेतृत्व से जिस नैतिकता और समझदारी की उम्मीद की जाती है, क्या वह उसके लिए तैयार भी हैं?
मोदी हैं सबसे बड़ी खबरः
      इस साल की सबसे बड़ी खबर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही हिस्से रही। लगातार दूसरी बार एक गैरकांग्रेसी सरकार का सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ आना भारतीय राजनीतिक इतिहास की एक बड़ी घटना है। मोदी का जादू फिर सिर चढ़कर बोला और भाजपा 303 सीटें जीतकर सत्ता में वापस आई। 2014 में भाजपा को 282 सीटें मिली थीं।  इसी के साथ मोदी ऐसे प्रधानमंत्री भी बन गए जिन्होंने पं. जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के बाद तीसरे ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने, दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस साल अपना पद छोड़ दिया और काफी मान-मनौव्वल के बाद भी नहीं माने। अंततः श्रीमती सोनिया गांधी को यह पद स्वीकार करना पड़ा।
       साल के आखिरी महीने की कड़वाहटों को छोड़ दें तो जाता हुआ साल 2019 कई मामलों में बहुत उम्मीदें जगाने वाला साल भी है। कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति और राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला दो ऐसी बातें हैं जो इस साल के नाम लिखी जा चुकी हैं। इस मायने में यह साल हमेशा के लिए इतिहास के खास लम्हों में दर्ज हो गया है। भारतीय राजनीति में चीजों को टालने का एक लंबा अभ्यास रहा है। समस्याओं से टकराने और दो-दो हाथ करने और हल निकालने के बजाए, हमारा सोच संकटों से मुंह फेरने का रहा है। श्रीमती इंदिरा गांधी के बाद अरसे से एक ऐसे नायक का इंतजार होता रहा, जो निर्णायक पहल कर सके और फैसले ले सके। धारा 370 सही मायने में केंद्र सरकार का एक अप्रतिम दुस्साहस ही कहा जाएगा। किंतु हमने देखा कि इसे देश ने स्वीकारा और कांग्रेस पार्टी सहित अनेक राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस फैसले की सराहना की।
मंदिर पर सुप्रीम फैसलाः
    राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम फैसला भी इसी कड़ी में एक बहुत महत्वपूर्ण तारीख है। जिसने सदियों से चले आ रहे भूमि विवाद का निपटारा करके भारतीय इतिहास के सबसे खास मुकदमे का पटाक्षेप किया। तीन तलाक का मुद्दा एक ऐसा ही विषय था जिसने भारतीय मुस्लिम स्त्रियों की जिंदगी में छाए अंधेरों को काटकर एक नई शुरुआत की। यह एक ऐसा विषय था जिसे आस्था और संविधान की बहस में उलझाया गया। लेकिन मानवीय और संवैधानिक दृष्टि से यह बहुत बड़ा मुद्दा था। हालांकि स्त्री सुरक्षा के लिए यह साल भी बहुत उम्मीदें जगाकर नहीं गया। साल के प्रारंभ में उन्नाव दुष्कर्म कांड से लेकर साल के अंत में हैदराबाद की वेटनरी डाक्टर की निर्मम हत्या और दुराचार की घटनाओं ने बताया कि हमारे समाज में अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। हैदराबाद दुष्कर्म मामले के आरोपियों को पुलिस ने तत्काल मार गिराया किंतु निर्भया मामले के अपराधियों को आज तक फांसी के फंदों पर नहीं लटकाया जा सका। कानून की बेचारगी इस सबके बीच चर्चा का विषय बनी।
सामान्य वर्ग को आरक्षण की राहतः     
    जनवरी महीने में सामान्य वर्ग को दस प्रतिशत आरक्षण देने का बिल संसद ने पास किया। गुजरात इसे लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना। इस कानून ने आरक्षण पर मचे बवाल पर सामान्य वर्गों को राहत देने की भावभूमि बनाई। इस साल के एक महत्वपूर्ण उत्सव के रूप में प्रयागराज में कुंभ को भी याद किया जाएगा। इस कुंभ में 15 करोड़ लोगों ने स्नान किया और दुनिया के 190 देशों को आमंत्रण भेजे गए। कुंभ की व्यवस्थाओं को लेकर उप्र सरकार की काफी सराहना भी हुयी।
        इस साल ने हमें आशा, निराशा, उम्मीदों और सपनों के साथ चलने के सूत्र भी दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार युवाओं पर भारी उम्मीदें जता रहे थे। हम देखें तो भारत का स्टार्टअप तंत्र  जिस तरह से युवा शक्ति के नाते प्रभावी हुआ है, वह हमारी एक बड़ी उम्मीद है। सन 2019 में ही कुल 1300 स्टार्टअप प्रारंभ हुए। कुल 27 कंपनियों के साथ भारत में पहले ही चीन और अमरीका के बाद तीसरे सबसे ज्यादा यूनिकार्न (एक अरब से ज्यादा के स्टार्टअप) मौजूद हैं। भारत की यह प्रतिभा सर्वथा नई और स्वागतयोग्य है। वहीं दूसरी ओर मंदी की खबरों से इस साल बाजार थर्राते रहे। निजी क्षेत्रों में काफी लोगों की नौकरियां  गईं और नए रोजगार सृजन की उम्मीदें भी दम तोड़ती दिखीं। बहुत कम ऐसा होता है महंगाई और मंदी दोनों साथ-साथ कदमताल करें। पर ऐसा हो रहा है और भारतीय इसे झेलने के लिए मजबूर हैं। नीतियों का असंतुलन, सरकारों का अनावश्यक हस्तक्षेप बाजार की स्वाभाविक गति में बाधक हैं। भारत जैसे महादेश में इस साल की दूसरी तिमाही में विकास दर 4.5 फीसद रह गयी थी, अगले छह माह में यह क्या रूप लेगी कहा नहीं जा सकता। इस साल पांच फीसदी की विकास दर भी नामुमकिन लग रही है। सच तो यह है कि मोदी सरकार ने अपने प्रारंभिक दो सालों में जो भी बेहतर प्रदर्शन किया, नोटबंदी और जीएसटी ने बाद के दिनों में उसके कसबल ढीले कर दिए। बिजनेस टुडे के पूर्व संपादक प्रोसेनजीत दत्ता मानते हैं कि-यदि सहस्त्राब्दी का पहला दशक मुक्त बाजार सिद्धांत की अपार संभावनाओं वाला था तो यह दशक बेतरतीब सरकारी हस्तक्षेप वाला रहा। ऐसे में आने वाला साल किस तरह की करवट लेगा इसके सूत्रों को जानने के लिए मार्च,2020 तक नए बजट के बाद की संभावनाओं का इंतजार करना होगा। इसमें दो राय नहीं कि वैश्विक स्तर पर भारत की विदेश नीति में प्रधानमंत्री ने अपनी सक्रियता से एक नर्ई ऊर्जा भरी, किंतु भारत की स्थानीय समस्याओं, लालफीताशाही, शहरों में बढ़ता प्रदूषण, कानून-व्यवस्था के हालात ऐसे ही रहे तो उन संभावनाओं का दोहन मुश्किल होगा।
नवसंकल्पों और नवाचारों का समयः
    उदारीकरण की इस व्यवस्था के बीज इस अकेले साल के माथे नहीं डाले जा सकते। 1991 से लागू इस भूमंडलीकरण और उदारीकरण ने हमारे गांवों, किसानों और सामान्य जनों को बेहद अकेला छोड़ दिया है। किसानों की आत्महत्याएं, उनकी फसल का सही मूल्य, जनजातियों के जीवन और सुरक्षा जैसे सवाल आज नक्कारखाने में तूती की तरह ही हैं। मुख्यधारा की राजनीति के मुद्दे बहुत अलग हैं। उन्हें देश के वास्तविक प्रश्नों पर लाना कठिन ही नहीं असंभव ही है। जाता हुआ साल भी हमारे सामने विकराल जनसंख्या, शरणार्थी समस्या, घुसपैठ, कृषि संकट, महंगाई, बेरोजगारी जैसे तमाम प्रश्न छोड़कर जा रहा है। सन 2020 में इन मुद्दों की समाप्ति हो जाएगी, सोचना बेमानी है। बावजूद इसके हमारे बौद्धिक विमर्श में असंभव प्रश्नों पर भी बातचीत होने लगी है, यह बड़ी बात है। हमें अपने देश के सवालों पर, संकटों पर, बात करनी होगी। भले वे सवाल कितने भी असुविधाजनक क्यों न हों। 2019 का साल जाते-जाते कुछ बड़े मुद्दों का हल देकर जा रहा है। नए साल-2020 का स्वागत करते हुए हमें कुछ नवसंकल्प लेने होंगें, नवाचार करने होंगे और अपने समय के संकटों के हल भी तलाशने होगें। अलविदा- 2019!




शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

सांस्कृतिक संवेदनहीनता के समय में लोकजीवन और मीडिया


-प्रो. संजय द्विवेदी

      मोबाइल समय के दौर में जब हर व्यक्ति कम्युनिकेटर, कैमरामैन और फिल्ममेकर होने की संभावना से युक्त हो, तब असल खबरें गायब क्यों हैं? सोशल मीडिया के आगमन के बाद से मीडिया और संचार की दुनिया के बेहद लोकतांत्रिक हो जाने के ढोल पीटे गए और पीटे जा रहे हैं। लेकिन वे हाशिए आवाजें कहां हैं? जन-जन तक पसर चुके मीडिया में हमारा लोक और उसका जीवन कहां है?
    सांस्कृतिक निरक्षरता और संवेदनहीनता का ऐसा कठिन समय शायद ही इतिहास में रहा हो। इन दिनों सबके अपने-अपने लोक हैं,सबकी अपनी-अपनी नजर है। इस लोक का कोई इतिहास नहीं है, विचार नहीं है। लोक को लोकप्रिय बनाने और कुल मिलाकर कौतुक बना देने के जतन किए जा रहे हैं। ऐसे में मीडिया माध्यमों पर लोकसंस्कृति का कोई व्यवस्थित विमर्श असंभव ही है। हमारी कलाएं भी तटस्थ और यथास्थितिवादी हो गई लगती हैं। लोक समूह की शक्ति का प्रकटीकरण है जबकि बाजार और तकनीक हमें अकेला करती है। लोकसंस्कृति का संरक्षण व रूपांतरण जरूरी है। संत विनोबा भावे ने हमें एक शब्द दिया था- लोकनीतिसाहित्यालोचना में एक शब्द प्रयुक्त होता है- लोकमंगल। हमारी सारी व्यवस्था इस दोनों शब्दों के विरुद्ध ही चल रही है।  लोक को जाने बिना जो तंत्र हमने आजादी के इन सालों में विकसित किया है वह लोकमंगल और लोकनीति दोनों शब्दों के मायने नहीं समझता। इससे जड़ नौकरशाही विकसित होती है, जिसके लक्ष्यपथ अलग हैं। इसके चलते मूक सामूहिक चेतना या मानवता के मूल्यों पर आधारित समाज रचना का लक्ष्य पीछे छूट जाता है।
    राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे हमारा जनसमूह निरक्षर है, मूर्ख नहीं। लोकमानस के पास भाषा भले न हो किंतु उसके पास प्रबल भाव होते हैं। मीडिया समय में जो जोर से कही जाए वही आवाज सही मानी और सुनी जाती है। जो भाषा देते हैं वे नायक बन जाते हैं। जो योजना देते हैं वे नायक बनते हैं। हमारे मीडिया के पास लोक के स्पंदन और उसके भावों को सुनने-समझने और गुनने का अवकाश कहां हैं। उसे तो तेज आवाजों के पास होना है।
  लोक की मूलवृत्ति ही है आनंद।  आनंद पनपता है शांति में, शांति होती है स्थिरता में। शांत आनंदमय जीवन सदियों से भारतीय लोक की परम आकांक्षा रही है। इसलिए हमने लोकमंगल शब्द को अपनाया और उसके अनुरूप जीवन शैली विकसित की। आज इस लोक को खतरा है। उसकी अपनी भाषाएं और बोलियां, हजारों-हजार शब्दों पर संकट है। इस नए विश्वग्राम में लोकसंस्कृति कहां है?मीडिया में उसका बिंब ही अनुपस्थित है तो प्रतिबिंब कहां से बनेगा? हम अपने पुराने को समय का विहंगालोकन करते हैं तो पाते हैं कि हमारा हर बड़ा कवि लोक से आता है। तुलसी, नानक, मीरा, रैदास, कबीर, रहीम, सूर,रसखान सभी, कितने नाम गिनाएं। हमारा वैद्य भी कविराय कहा जाता है। लोक इसी साहचर्य, संवाद, आत्मीय संपर्क, समान संवेदना,समानुभूति से शक्ति पाता है। इसीलिए कई लेखक मानते हैं कि लोक का संगीत आत्मा का संगीत है।
       मीडिया और लोक के यह रिश्ते 1991 के बाद और दूर हो गए। उदारीकरण, भूंडलीकरण और मुक्त अर्थव्यवस्था के मूल्य अलग हैं। यह परिर्वतनों का समय भी था और मीडिया क्रांति का भी। इस दौर में मीडिया में पूंजी बढ़ी, चैनलों की बाढ़ आ गयी, अखबारों को सारे पन्ने रंगीन हो गए, निजी एफएम पर गाने गूंजने लगे, वेबसाइटों से एक नया सूचना प्रवाह सामने था इसके बाद आए सोशल मीडिया ने सारे तटबंध तोड़ दिए। अब सूचनाएं नए तरीके परोसी और पोसी जा रहीं थीं। जहां रंगीन मीडिया का ध्यान रंगीनियों पर था। वहीं वे क्लास के लिए मीडिया को तैयार कर रहे थे। मीडिया से उजड़ते गांवों और लोगों की कहानियां गायब थीं। गांव,गरीब, किसान की छोड़िए- शहर में आकर संघर्ष कर रहे लोग भी इस मीडिया से दूर थे। यह आभिजात्य नागर जीवन की कहानियां सुना रहा था, लोकजीवन उसके लिए एक कालातीत चीज है। खाली गांव, ठूंठ होते पेड़. उदास चिड़िया, पालीथीन के ग्रास खाती गाय, फार्म हाउस में बदलते खेत, आत्महत्या करते किसान एक नई कहानी कह रहे थे। बाजारों में चमकती चीजें भर गयी थीं और नित नए माल बन रहे थे। पूरी दुनिया को एक रंग में रंगने के लिए बाजार के जादूगर निकले हुए थे और यह सारी जंग ही लोक के विरुद्ध थी। यह समय शब्द की हिंसा का भी समय था। जब चीख-चिल्लाहटें बहुत थीं। लोकजीवन की कहानियां थीं, वहीं वे संवेदना के साथ नहीं कौतुक की तरह परोसी जा रही थीं। यह एक नया विश्वग्राम था, जिसके पास वसुधैव कुटुम्बकम् की संवेदना नहीं थी। भारतीय मीडिया के सामने यह नया समय था। जिसमें उसके पारंपरिक उत्तरदायित्व का बोध नहीं था। चाहिए यह था कि भारत से भारत का परिचय हो, मीडिया में हमारे लोकजीवन की छवि दिखे। इसके लिए हमारे मीडिया और कुशल प्रबंधकों को गांवों की ओर देखना होगा। खेतों की मेड़ों पर बैठना होगा। नदियों के किनारे जाना होगा। भारत मां यहीं दिखेगी। एक जीता-जागता राष्ट्रपुरुष यहीं दिखेगा। वैचारिक साम्राज्यवाद के षड़यंत्रों को समझते हुए हमें अपनी विविधता-बहुलता को बचाना होगा।अपनी मीडिया दुनिया को सार्थक बनाना है। जनसरोकारों से जुड़ा मीडिया ही सार्थक होगा। मीडिया अन्य व्यवसायों की तरह नहीं है अतः उसे सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।  आज भी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सच्ची कहानियों को सामने लेकर आ रहा है। पूरी संवेदना के साथ भारत की माटी के सवालों को उठा रहा है। इस प्रवाह को और आगे ले जाने की जरूरत है। सरोकार ही हमारे मीडिया को सशक्त बनाएंगे, इसमें नागर जीवन की छवि भी होगी तो लोक जीवन की संवेदना भी।

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

पं.श्यामलाल चतुर्वेदीः उन्हें भुलाना है मुश्किल



साधारण शब्दों से असाधारण संवाद की कला थी उनके पास
-प्रो. संजय द्विवेदी

चित्र परिचयः पद्मश्री से अलंकृत किए जाने के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से भेंट


   पद्मश्री से अलंकृत पं. श्यामलाल चतुर्वेदी की पावन स्मृति को भूल पाना कठिन है। वे हमारे समय के ऐसे नायक हैं जिसने पत्रकारिता, साहित्य और समाज तीनों क्षेत्रों में अपनी विरल पहचान बनाई। वे छत्तीसगढ़ के असली इंसान थे। जिन अर्थों में सबले बढ़िया छत्तीसगढ़िया का नारा दिया गया होगा, उसके मायने शायद यही रहे होंगे कि अच्छा मनुष्य होना। छत्तीसगढ़ उनकी वाणी,कर्म, देहभाषा से मुखरित होता था। बालसुलभ स्वभाव, सच कहने का साहस और सलीका, अपनी शर्तों पर जिंदगी जीना- यह सारा कुछ एक साथ श्यामलाल जी ने अकेले संभव बनाया।
    श्यामलाल जी अपनी जमीन को, माटी को, महतारी को प्यार करने वाले व्यक्ति थे। सत्ता के साथ उनके निरंतर और व्यापक संपर्क थे। वे राजपुरुषों के साथ-साथ आम आदमी से भी समान रूप से संवाद कर सकते थे। वे अक्सर अपने वक्तव्यों में कहते थे- आपको मेरी बात बुरी लग जाए तो आप मेरा क्या कर लेगें? वैसै ही मैं भी बुरा मान जाऊं तो आपका क्या कर लूंगा?” उन्होंने कभी भी इसलिए कोई बात नहीं कि वह राजपुरुषों को अच्छी या बुरी लगे। उन्हें जो कहना था वे कहते थे। दिल से कहते थे। शायद इसीलिए उनकी तमाम बातें लोंगो को प्रभावित करती थीं।
अप्रतिम वक्ताः श्यामलाल जी अप्रतिम वक्ता थे। मां सरस्वती उनकी वाणी पर विराजती थीं। हिंदी और छत्तीसगढ़ी दोनों भाषाओं में वे सहज थे। दिल की बात दिलों तक पहुंचाने का हुनर उनके पास था। वे बोलते तो हम मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते। रायपुर, बिलासपुर के अनेक आयोजनों में उनको सुनना हमेशा सुख देता था। अपनी साफगोई, सादगी और सरलता से वे बड़ी से बड़ी बात कह जाते थे। उनकी बहुत कड़ी बात भी कभी किसी को बुरी नहीं लगती थी, क्योंकि उसमें उनका प्रेम और व्यंग्य की धार छुपी रहती थी। उनसे शायद ही कोई नाराज हो सकता था। मैंने उन्हें सुनते हुए पाया कि वे दिल से दिल की बात कहते थे। ऐसा संवाद हमेशा प्रभावित करता है। उनके वक्तव्यों में आलंकारिक शब्दावली के बजाए लोक के शब्द होते। साधारण शब्दों से असाधारण संवाद करने की कला उनसे सीखी जा सकती थी। उनकी देहभाषा (बाडी लैंग्वेज) उनके वक्तव्य को प्रभावी बनाती थी। हम यह मानकर चलते थे कि वे कह रहे हैं , तो बात ठीक ही होगी। वे किसी पर नाराज हों, मैंने सुना नहीं। मलाल या गुस्सा करना उन्हें आता नहीं था। हमेशा हंसते हुए अपनी बात कहना और अपना वात्सल्य नई पीढ़ी पर लुटाना उनसे सीखना चाहिए। आज जबकि हमारे बुर्जुग बेहद अकेले और तन्हा जिंदगी जी रहे हैं। भरे-पूरे घरों और समाज में वे अकेले हैं। उन्हें श्यामलाल जी की जिंदगी से सीखना चाहिए। समाज में समरस होकर कैसे एक व्यक्ति अपनी अंतिम सांस तक प्रासंगिक बना रह सकता है, यह उन्होंने हमें सिखाया।
सक्रिय जीवनःवे सक्रिय पत्रकारिता, लेखन कब का छोड़ चुके थे। लेकिन आप रायपुर से बिलासपुर तक उनकी सक्रियता और उपस्थिति को रेखांकित कर सकते थे। निजी आयोजनों से लेकर सार्वजनिक समारोहों तक में वे बिना किसी खास प्रोटोकाल की अपेक्षा के आते थे। अपना प्यार लुटाते, आशीष देते और लौट जाते। उनके परिवार को भी इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहिए कि कैसे उनके बड़े सुपुत्र श्री शशिकांत जी ने उनकी हर इच्छा का मान रखा। वे खराब स्वास्थ्य के बाद भी जहां जाना चाहते थे, शशिकांत जी उन्हें लेकर जाते थे। श्यामलाल जी के तीन ही मंत्र थे- संपर्क,संवाद और संबंध। वे संपर्क करते थे, संवाद करते और बाद में उनकी जिंदगी में इन दो मंत्रों से करीब आए लोगों से उनके संबंध बन जाते थे। वे बिना किसी अपेक्षा के रिश्तों को जीते थे। उनका इस तरह एक महापरिवार बन गया था। जिसमें उनकी बेरोक-टोक आवाजाही थी। अपने अंतिम दिनों में वे छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष बने। किंतु पूरी जिंदगी उनके पास कोई लाभ का पद नहीं था। ऐसे समय में भी वे लोगों के लिए उतने ही सुलभ और आकर्षण का केंद्र थे। मुझे आश्चर्य होता था कि दिल्ली के शिखर संपादक श्री प्रभाष जोशी, मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा,दिग्विजय सिंह हों या बनारस के संगीतज्ञ छन्नूलाल मिश्र अथवा छत्तीसगढ़ के दोनों पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी या डा. रमन सिंह। श्यामलाल जी के जीवन में सब थे। तमाम संपादक, पत्रकार, सांसद, मंत्री, विधायक उन्हें आदर देते थे। समाज से मिलने वाल इतना आदर भी उनमें लेशमात्र भी अहंकार की वृद्धि नहीं कर पाता था।
छत्तीसगढ़ी अस्मिता के प्रतीकः छत्तीसगढ़ देश का अकेला प्रदेश है, जिसकी समृद्ध भाव संपदा और लोकसंपदा है। उसके लिए छत्तीसगढ़ महतारी शब्द का उपयोग भी होता है। अपनी जमीन, भूमि के लिए मां शब्द उदात्त भावनाओं से ही उपजता है। भारत मां के बाद किसी राज्य के लिए संभवतः ऐसा शब्द प्रयोग छत्तीसगढ़ में ही होता है। वैसे भी यह मां महामाया रतनपुर,मां बमलेश्वरी,मां दंतेश्वरी की धरती है, जहां लोकजीवन में ही मातृशक्ति के प्रति अपार आदर है। छत्तीसगढ़ महतारी भी लोकजीवन की ऐसी ही मान्यताओं से संयुक्त है। अपनी माटी से मां की तरह प्यार करना और उसका सम्मान करना यही भाव इससे शब्द से जुड़े हैं। श्यामलाल जी का परिवेश भी लोकजीवन से शक्ति पाता है। इसलिए शहर आकर भी वे अपने गांव को नहीं भूलते, अपने लोकजीवन को नहीं भूलते। उसकी भाषा और भाव को नहीं भूलते। वे शहर में बसे लोकचिंतक थे,  लोकसाधक थे। यह अकारण नहीं था वे प्रो. पी.डी खेड़ा जैसे नायकों के अभिन्न मित्र थे, क्योंकि दोनों के सपने एक थे- एक सुखी, समृद्ध छत्तीसगढ़। आज जबकि प्रो. खेड़ा और श्यामलाल जी दोनों हमारे बीच नहीं हैं, पर वे हम पर कठिन उत्तराधिकार छोड़कर गए हैं। श्यामलाल जी अपने लोगों को न्याय दिलाना चाहते थे,वे चाहते थे कि छत्तीसगढ़ का सर्वांगीण विकास हो, यहां के लोकजीवन को उजाड़े बगैर इसकी प्रगति हो। इसलिए वे सत्ता का ध्यानाकर्षण अपने लेखन और वक्तव्यों के माध्यम से करते रहे। सही मायने में वे छत्तीसगढ़ी अस्मिता के प्रतीक और लोकजीवन में रचे-बसे नायक थे। उनका शब्द-शब्द इसी माटी से उपजा और इसी को समर्पित रहा।                                                      
      जिस समाज की स्मृतियां जितनी सघन होतीं हैं, वह उतना ही चैतन्य समाज होता है। हम हमारे नायकों को समय के साथ भूलते जाते हैं। छत्तीसगढ़ की जमीन पर भी अनेक ऐसे नायक हैं जिन्हें याद किया जाना चाहिए।  मुझे लगता है कि श्यामलाल जी जैसे नायकों की याद ही हमारे समाज को जीवंत, प्राणवान, संवेदनशील और मानवीय बनाने की प्रक्रिया को और तेज करेगी। 

सोमवार, 19 अगस्त 2019

सचमुच एक असंभव संभावना हैं गांधी!


महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती वर्ष प्रसंग

-    प्रो. संजय द्विवेदी


     इतिहासकार सुधीर चंद्र की किताब गांधी एक असंभव संभावना को पढ़ते हुए इस किताब के शीर्षक ने सर्वाधिक प्रभावित किया। यह शीर्षक कई अर्थ लिए हुए है, जिसे इस किताब को पढ़कर ही समझा जा सकता है। 184 पृष्ठों की यह किताब गांधी के बेहद लाचार, बेचारे, विवश हो जाने और उस विवशता में भी अपने सत्य के लिए जूझते रहने की कहानी है।
     जाहिर तौर पर यह किताब गांधी की जिंदगी के आखिरी दिनों की कहानी बयां करती है। इसमें असंभव संभावना शब्द कई तरह के अर्थ खोलता है। गांधी तो उनमें प्रथम हैं ही, तो भारत-पाकिस्तान के रिश्ते भी उसके साथ संयुक्त हैं। ऐसे में यह मान लेने का मन करता है कि भारत-पाक रिश्ते भी एक असंभव संभावना हैं? सामान्य मनुष्य इसे मान भी ले किंतु अगर गांधी भी मान लेते तो वे गांधी क्यों होते? प्रत्येक विपरीत स्थिति और झंझावातों में भी अपने सच के साथ रहने और खड़े होने का नाम ही तो गांधीहै।
     आजादी के मिलने के कुछ समय पहले गांधी के निरंतर कमजोर और अकेले होते जाने की कहानी को जिस खूबसूरती से यह किताब बयां करती है, उसकी दूसरी नजीर नहीं है। अपने प्रार्थना प्रवचनों में गांधी ने खुद को खोलकर रख दिया है। वे सत्य को फिर से पारिभाषित नहीं करते, उसे यथारूप ही रखते हैं। इस पूरी किताब में गांधी के मन और देश में चल रही हलचलों का बयान दिखता है। हिंदू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान, कांग्रेस-मुस्लिम लीग की सत्ता राजनीति के बीच अकेले और तन्हा गांधी। गांधी पूरी जिंदगी सामूहिकता को साधते रहे और उनका भरोसा अपने समाज पर बना रहा। किंतु आजादी को निकट आता देख यह समाज जिस तरह बंटा उसे देखकर वे हैरत में थे। सही मायने में यह समाज अब भीड़ या अपने-अपने पंथों की जकड़बंदियों में कैद हो चुका था। गांधी इसलिए कई बार बहुत कातर दिखते हैं, कमजोर दिखते हैं। किंतु सत्य और इंसानियत में उनकी आस्था अविचल है। अपने उपवास और रोजों से वे सोते तथा भटके हुए समाज को फिर से उसी राह पर लाना चाहते हैं, जहां इंसानियत और भाईचारा सबसे अहम है। कई लोग मानते हैं कि गांधी ने बंटवारा स्वीकार कर लिया था, सच्चाई यह है कि बंटवारे को उन्होंने कभी मन से नहीं स्वीकारा। स्वीकारा इसलिए कि कम से कम रिश्ते तो बचे रहें। अफसोस समय के साथ अब जब हम देखते हैं तो भारत-पाक रिश्ते भी अब एक अंसभव संभावना ही दिखने लगे हैं। बल्कि घृणा की राजनीति ही लंबे समय से दोनों देशों की राजनीति का मूल स्वर रही है। पाकिस्तान और हिंदुस्तान में चुनाव भी इन्हीं नफरतों की हवाओं पर सवार होकर जीते जाते रहे हैं। कई युद्ध लड़कर और निरंतर अपरोक्ष युद्ध लड़कर पाकिस्तान ने इस जहर को और पुख्ता किया है। 7मई,1947 को जब कांग्रेस लगभग बंटवारे का फैसला कर चुकी थी तब गांधी ने शाम को कहा- जिन्ना साहब पाकिस्तान चाहते हैं। कांग्रेस ने भी तय कर लिया है कि पाकिस्तान की मांग पूरी की जाए... लेकिन मैं तो पाकिस्तान किसी भी तरह मंजूर नहीं कर सकता। देश के टुकड़े होने की बात बर्दाश्त ही नहीं होती।  ऐसी बहुत सी बातें होती रहती हैं जिन्हें मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता, फिर भी वे रूकती नहीं, होती ही हैं। पर यहां बर्दाश्त नहीं हो सकने का मतलब यह है कि मैं उसमें शरीक नहीं होना चाहता, यानी मैं इस बात में उनके बस में आने वाला नहीं हूं।... मैं किसी एक पक्ष का प्रतिनिधि बनकर बात नहीं कर सकता। मैं सबका प्रतिनिधि हूं।.. मैं पाकिस्तान बनने में हाथ नहीं बंटा सकता। गांधी का मनोगत बहुत स्पष्ट है किंतु हालात ने उन्हें विवश कर दिया था। वे न तो बंटवारा रोक पाते हैं न ही आजादी के जश्न के पहले जगह-जगह हो रही सांप्रदायिक हिंसा। नोवाखली के दंगों के बाद कोलकाता, बिहार और फिर पंजाब। सांप्रदायिक हिंसा के विरूद्ध सबसे प्रखर आवाज के पास अब उपवास के सिवा क्या था?
    दूसरा संकट यह था कि गांधी नोवाखली में हिंदुओं के नरसंहार से दुखी होकर जब वहां पहुंचते तो मुसलमानों को बुरा लगता कि वे कोलकाता में मुसलमानों के लिए क्यों नहीं पहुंचते? जब वे कोलकाता में मुसलमानों की मदद में उतरते तो हिंदू उन्हें कोसते। ऐसे में गांधी चौतरफा आलोचना के शिकार थे। उनके साथी रहे कांग्रेस जन और राजनेता भी उनके इन देश व्यापी प्रवासों और उपवासों में कोई शांति-संभावनादेखने के बजाए संकट ही देखते थे। ऐसे कठिन समय में गांधी को समझना और कठिन हो गया था। गांधी की बेचारगी यही है कि उन्हें आज तक सही अर्थों में समझा नहीं गया। वे अपने प्रति बनी गहरी नामसझी को लेकर ही विदा हुए। उन्हें लोग देवता का दर्जा तो दे बैठे थे किंतु उनके देवत्व से एक सचेतन दूरी बनाए रखना चाहते थे। शायद इसलिए कि तत्कालीन राजनीति की भाषा से गांधी कदमताल करने के तैयार नहीं थे।वे इसीलिए सत्ता का आरोहण नहीं करते, राजपथ नहीं चुनते क्योंकि उनका समाज पर भरोसा था। वे समाज की शक्ति को जगाना चाहते थे, जिसने उन्हें महात्मा बनाया था। किंतु इस दौर में वह समाज भी कहां बचा था, एक गहरा बंटवारा जो सिर्फ भूगोल का नहीं था, मन का भी था। गांधी की रूहानी शक्ति इस दुनियावी रोग के सामने बेबस थी। यह वही समय था जब गांधी को मंत्रमुग्ध सुनने वाला देश और समाज उनसे सवाल करने लगा था। लोग उनके मुंह पर कहने लगे थे कि आप मर क्यों नहीं जाते? उनसे पूछा जाने लगा किः आपने चार-पांच दिन इतनी लंबी-लंबी बातें बनाई कि हम एक इंच भी पाकिस्तान मजबूरी से देना नहीं चाहते, बुद्धि से ह्दय को जाग्रत करके भले ही जो चाहें सो लें, लेकिन वह तो बन गया। अब आप इसके खिलाफ अनशन क्यों नहीं करते?”  उनसे यह भी पूछा गया- आप कांग्रेस के बागी क्यों नहीं बनते और उसके गुलाम क्यों बने हैं? आप उसके खादिम कैसे रह सकते हैं ?अब आप अनशन करके मर क्यों नहीं जाते?” महात्मा जी ने ये सारी बातें खुद 5 जून,1947 को अपने प्रार्थना प्रवचन में बतायीं। खुद पर बरसते सवालों से वे अविचल थे। अपनी आलोचना और निंदा को वे खुद अपने प्रवचनों में वे बताते और अपने उत्तर भी देते। किंतु उस समय गांधी को सुनने, समझने का धीरज तत्कालीन राजनीति और समाज दोनों खो चुके थे। अपने समय को पहचानने की जो अद्भुत क्षमता गांधी में थी उसी के चलते वे कह पाएः बंटवारे से तो हम आज बच नहीं सकते चाहे वह हमें कितना ही नापंसद हो।सच कहें तो गांधी का सबसे बड़ा दर्द यही है कि उन्हें समझा नहीं गया और आज भी उनकी रेंज को समझने वाला मन हमारे पास कहां है? एक राष्ट्रपिता की इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है जो समाज और राजनीति उनके पीछे चली, उनके इशारों पर चली वही आज उन्हें अप्रासंगिक तथा अनुपयोगी मान रही थी। गांधी अपने आखिरी दिनों में इतने कातर इसलिए भी थे, उनके अपने भी उनका साथ छोड़ चुके थे, या उन्हें अनसुना कर रहे थे। वे इस बात को समझ गए थे। इसीलिए अनेक मौकों पर आजमाए जा चुके अपने अमोध अस्त्र आमरण अनशन का इस्तेमाल भी वे नहीं करते। उनका मानना था इससे बंटवारा रूक भी गया तो मनों में पाकिस्तान बन जाएगा जो ज्यादा खतरनाक होगा। इसलिए भूगोल बंटने के बाद भी रिश्ते बने रहें, मन मिले रहें उसकी कोशिश वे आखिरी सांस तक करते रहे।  वे बहुत साफ कहते हैःजब मैंने कहा था कि हिंदुस्तान के दो भाग नहीं करने चाहिए तो उस वक्त मुझे विश्वास था कि आम जनता की राय मेरे पक्ष में है; लेकिन जब आम राय मेरे साथ न हो तो क्या मुझे अपनी राय जबरदस्ती लोगों के  गले मढ़नी चाहिए?”
      देश के बंटवारे के बाद गांधी चाहते तो एक निष्क्रिय बुजुर्ग की आदर्श भूमिका निभाते हुए चैन से रह सकते थे। उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य आजादी हासिल हो चुका था। किंतु वे स्वराज के लिए सक्रिय थे। शायद वे देश और उसकी सरकार के कार्य संचालन में कुछ बेहद जमीनी सुधार के सुझाव दे पाते किंतु आजादी मिलते ही उनके सामने हिंदु-मुस्लिम सद्भाव का प्रश्न बहुत विकराल बनकर खड़ा हो गया। दंगे, मारपीट, आगजनी, स्त्रियों से दुर्व्यवहार की खबरों से उनका मन रोज रो पड़ता। वे अकेले और विवश होने के बाद भी इस कठिन समय में अपने हस्तक्षेप से शांति और सद्भाव का संचार करते हैं। सांप्रदायिक तत्वों को विवश करते हैं कि वे राष्ट्र की मुख्यधारा में साथ आएं और अपनी जहरीली राजनीति से बाज आएं। तत्कालीन सरकार को पाकिस्तान के बचे 55 करोड़ रूपए देने के लिए मजबूर कर देते हैं। उनका नैतिक बल अक्सर भारी पड़ता है। किंतु अब उनकी जिद और हठ से उनके अपने लोग भी उनसे बचने लगे थे। गांधी की जिद क्या थी- सद्भावना, एकता, सौहार्द्र, भाईचारा, अहिंसा। शायद वे इसीलिए कहते हैः मैं जानता हूं न तो पाकिस्तान नरक है न ही हिंदुस्तान नरक है। हम चाहें तो उन्हें स्वर्ग बना सकते हैं और अपने कामों से नरक भी बना सकते हैं और जब दोनों नरक जैसे बन गए तो उसमें फिर आजाद इनसान तो रह ही नहीं सकता। पीछे हमारे नसीब में गुलामी ही लिखी है। यह चीज मुझको खा जाती है। मेरा ह्दय कांप उठता है कि इस हालत में किस हिंदू को समझाऊंगा,किस सिख को समझाऊंगा, किस मुसलमान को समझाऊंगा।
   गांधी इस पीड़ा को लिए ही विदा हुए। आप देखें तो इस बात के सात दशक पूरे हो चुके हैं। बंटवारा और गहरा हुआ है। सिर्फ गांधी ही नहीं, भारत-पाक रिश्ते भी अब एक असंभव संभावना दिखने लगे हैं। गांधी की त्रासदी यह है कि वे 32 वर्षों तक जिस हिंदुस्तान के लिए अंग्रेजों से लड़ते रहे, उस आजाद देश में वे मात्र पांच महीने(169 दिन) जिंदा रह सके। गांधी को भूलने का, गांधी को न समझने का, भारत को न समझने का यही फल है। एक न समझे जाने वाले नायक गांधी- जिनकी हमने असंख्य मूर्तियां बनाईं, उनके नाम पर संस्थाएं बनाईं, गांधी रोड बनाए, नगर बनाए, नोटों पर उन्हें छापा,विश्वविद्यालय बनाए किंतु यह सब कुछ हमारी गहरी नासमझी के चलते बेमतलब है। अपनी हत्या से कुछ दिन पहले गांधी ने कहाः मैं तो आज कल का ही मेहमान हूं। कुछ दिनों में यहां से चला जाऊंगा। पीछे आप याद किया करोगे कि बूढ़ा जो कहता था वह सही बात है।


पुस्तक संदर्भः गांधी एक अंसभव संभावनाः सुधीर चंद्र,
मूल्यः199, पृष्ठः184
राजकमल पेपरबैक्स,1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
दरियागंज, नई दिल्ली-110002

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग में प्रोफेसर हैं।)
संपर्कः प्रो. संजय द्विवेदी,
जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय,
बी-38, विकास भवन, प्रेस कांप्लेक्स, महाराणा प्रताप नगर, भोपाल-462011 (मप्र)
मोबाइलः 9893598888, ई-मेलः 123dwivedi@gmail.com

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

समीक्षाः बजटः जुमलों को जमीन पर उतारने की कवायद


-संजय द्विवेदी

   वित्तमंत्री के नाते पहला बजट पेश करते हुए निर्मला सीतारमण ने अपने भाषण में दरअसल उन्हीं सपनों, आकांक्षाओं और नारों को जगह दी है, जिसके लिए मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल में कुछ कदम उठा चुकी थी। दरअसल यह बजट नवउदारवादी नीतियों के साथ-साथ आम लोगों के लिए जनकल्याण की तमाम योजनाओं को साधते हुए बहुत सावधानी से बनाया गया है। पेट्रोल और डीजल पर एक रूपए की एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने के अलावा कुछ ऐसा साफ तौर पर नहीं दिखता, जिससे जनता में सीधे तौर पर नाराजगी नजर आए। किंतु संसाधनों को जुटाने की जरूरत भी साफ नजर आती है, जिसके चलते बड़े लोगों की कमाई पर टैक्स दरें बढ़ाई गयी हैं। जिसमें 2 से तीन करोड़ कमानेवाले पर 3 प्रतिशत और 5 से 7 करोड़ आमदनी पर अब 7 प्रतिशत ज्यादा टैक्स देना होगा। मध्यवर्गीय ईमानदार करदाताओं की अपने भाषण में वित्तमंत्री ने प्रशंसा तो की पर उन्हें थोड़ी राहत देना भूल गयीं। वहीं दूसरी तरफ शेयर बाजार ने भी इस बजट पर कोई उत्साह नहीं दिखाया और बजट भाषण के बाद बाजार में बड़ी गिरावट दर्ज की गयी।
    इस बजट को पहली नजर में एक पारंपरिक बजट ही कहा जा सकता है। जिस राह को अरूण जेटली छोड़कर गए थे,यह बजट भी उसी दिशा में आगे बढ़ता नजर आता है। अमीरों पर बोझ, गरीबों को राहत का फार्मूला यहां भी इस बजट की हेडलाइंस बनाने में मदद करेगा। बीमार हो चुके सरकारी बैंकों को 70 हजार करोड़ रूपए का पैकेज अपने आप में एक बड़ी खबर है। तो वहीं 2 अक्टूबर तक देश को खुले में शौच से मुक्त करने का नारा कुछ ज्यादा ही महत्वाकांक्षी है। क्योंकि खुले में शौच का मामला सिर्फ शौचालय निर्माण की समस्या नहीं है, व्यवहार परिर्वतन से भी जुड़ा है। इस दिशा में सरकार के प्रयास सराहनीय है, किंतु आदतों में बदलाव के लिए एक लंबी यात्रा की जरूरत होती है।
    बजट का वास्तविक आकलन तो अर्थशास्त्री ही करेंगें किंतु प्रथम दृष्ट्या यह बजट कृषि, अधोसंरचना, शिक्षा और सामाजिक विकास की योजनाओं पर ही केंद्रित है। सरकार भी यह मान बैठी है कि अब सरकारी क्षेत्र में रोजगार सृजन संभव नहीं है और बड़ी योजनाओं से पैदा होने वाला रोजगार ही युवाओं का सहारा है। हालांकि स्किल डेवलेपमेंट और मुद्रा योजना जैसे प्रयास भी साथ-साथ जारी हैं। किंतु बेरोजगारी की विकराल होती समस्या से जूझने का कोई रोडमैप और संकल्प सरकार के पास नहीं दिखता। प्रधानमंत्री शहरी और ग्रामीण आवास, स्वच्छ भारत, खेलो इंडिया स्कीम, कृषि आधारित ग्रामीण उद्योगों, आयुष्मान योजना, प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना, अटल पेंशन योजना, जल सुरक्षा और संरक्षण पर सरकार का खास फोकस है। हर घर जल, जल जीवन मिशन जैसे कार्यक्रम तथा जल के लिए जलशक्ति मंत्रालय का गठन सरकार की प्राथमिकता को दर्शाता है। निश्चय ही पानी का सवाल हमारे तमाम गांवों और शहरों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। ऐसे में सरकार को पानी के मुद्दे को प्राथमिकता में लेना जरूरी ही था। सरकार का मानना है कि डिजीटल साक्षरता बढ़ाने और डिजीटल डिवाइड खत्म करने के सरकारी प्रयासों के माध्यम से ही पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार की समस्या भी कुछ हद तक हल होगी।
    महात्मा गांधी 150 वीं जयंती वर्ष के मौके पर वित्तमंत्री ने कई बार गांधी जी को याद करते हुए अनेक योजनाओं को उनकी पावन स्मृति को समर्पित बताया। इसमें स्वच्छता और ग्रामीण भारत के विकास से जुड़े अनेक प्रकल्प शामिल हैं। रेलवे को विकास और आधुनिकीकरण का जिक्र भी वित्तमंत्री ने किया। महिलाओं के विकास से जुड़ी योजनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने नारी टू नारायण नामक जुमला प्रस्तुत किया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के मुद्दे को उन्होंने उठाया और कहा कि इस चुनाव में ज्यादा मतदान करने और 78 महिला सांसदों के  जीतकर संसद पहुंचने से महिलाओं के विकास की राह आसान होगी।
     समग्रता में यह बजट नरेंद्र मोदी सरकार के सपनों की मार्केटिंग जैसा ही है। पहले कार्यकाल में प्रारंभ किए गए कामों को आगे बढ़ाने की मंशा भी इसमें साफ दिखती है। समय सीमा में योजनाओं को पूर्ण करने की मंशा जताते हुए सरकार आगे बढ़ी है। वित्तमंत्री ने भी अपने बजट भाषण में इस बात का कई बार जिक्र किया। अपने दो घंटे के बजट भाषण में वित्तमंत्री के वक्तव्यों पर जिस तरह प्रधानमंत्री मेज पर थाप दे रहे थे, उससे पता चलता है कि इस बजट से सरकार ने बहुत उम्मीदें बांध रखी हैं। बाद में प्रधानमंत्री ने अपनी प्रतिक्रिया में इस बजट को आशा, विश्वास और आकांक्षाओं का बजट बताते हुए इसे ग्रीन बजट भी कहा। यानि ग्रामीण भारत में छिपी हुई संभावनाओं का दोहन करने के लिए एक नई शुरूआत भी इसमें दिखती है। वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 लाख करोड़ डालर की ऊंचाई तक ले जाने का जो स्वप्न देख रहे हैं, उसके लिए समावेशी, समेकित और निरंतर प्रयासों की जरूरत है। उम्मीद का जानी चाहिए कि सरकार का तंत्र और समाज पूरी संवेदना के साथ जनकल्याण की इन योजनाओं की निगहबानी भी करेगा।

सोमवार, 10 जून 2019

बिलखती बेटियां, स्तब्ध समाज


-प्रो. संजय द्विवेदी

   छोटी बच्चियों के साथ निरंतर हो रही आपराधिक घटनाएं हमारे समाज के माथे पर कलंक ही हैं। यह दुनिया बेटियों के लिए लगातार असुरक्षित होती जा रही है और हमारे हाथ बंधे हुए से लगते हैं। कोई समाज अगर अपनी संततियों की सुरक्षा भी नहीं कर सकता, उनके बचपन को सुरक्षित और संरक्षित नहीं रख सकता तो यह मान लेना चाहिए सडांध बहुत गहरी है। ऐसे समाज का या तो दार्शनिक आधार दरक चुका है या वह सिर्फ एक पाखंडपूर्ण समाज बनकर रह गया है जो बातें तो बड़ी-बड़ी करता है, किंतु उसका आचरण बहुत घटिया है।
   स्त्रियों की तरफ देखने का हमारा नजरिया, उनके साथ बरताव करने का रवैया बताता है कि हालात अच्छे नहीं हैं। किंतु चिंता तब और बढ़ जाती है, जब निशाने पर मासूम हों। जिन्होंने अभी-अभी होश संभाला है, दुनिया को देख रहे हैं। परख रहे हैं। समझ रहे हैं। उनके अपने परिचितों, दोस्तों, परिजनों के हाथों किए जा रहे ये हादसे बता रहे हैं कि हम कितने सड़े हुए समाज में रह रहे हैं। हमारी सारी चमकीली प्रगति के मोल क्या हैं, अगर हम अपने बच्चों के खेल के मैदानों में, पास-पड़ोस में जाने से भी सहमने लगें। किंतु ऐसा हो रहा है और हम सहमे हुए हैं। बेटियां जिनकी मौजूदगी से यह दुनिया इतनी सुंदर है, वहशी दरिंदों के निशाने पर हैं।
कानूनों से क्या होगाः बच्चों और स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर कानूनों की कमी नहीं है। किंतु उन्हें लागू करने, एक न्यायपूर्ण समाज बनाने की प्रक्रिया में हम विफल जरूर हुए हैं।इन घटनाओं के चलते पुलिस, सरकार और समाज सबका विवेक तथा संवेदनशीलता कसौटी पर है। निर्भया कांड के बाद समाज की आई जागरूकता और सरकार पर बने दबावों का भी हम सही दोहन नहीं कर सके। कम समय में न्याय, संवेदनशील पुलिसिंग और समाज में व्यापक जागरूकता के बिना इन सवालों से जूझा नहीं जा सकता। हमारी परिवारनाम की संस्था जो पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों की स्थापना का मूल स्थान था, पूरी तरह दरक चुकी है। पैसा इस वक्त की सबसे बड़ी ताकत है और जायज-नाजायज पैसे का अंतर खत्म हो चुका है। माता-पिता की व्यस्तताएं, उनकी परिवार चलाने और संसाधन जुटाने की जद्दोजहद में सबसे उपेक्षित तो बच्चा ही हो रहा है। सोशल मीडिया ने इस संवादहीनता के नरक को और चौड़ा किया है। संयुक्त परिवारों की टूटन तो एक सवाल है ही। ऐसे कठिन समय में हमारे बच्चे क्या करें और कहां जाएं? अवसरों से भरी पूरी दुनिया में जब वे पैदा हुए हैं, तो उनका सुरक्षित रहना एक दूसरी चुनौती बन गया है। भारतीय परिवार व्यवस्था पूरी दुनिया में विस्मय और उदाहरण का विषय रही है, किंतु इसके बिखराव और एकल परिवारों ने बच्चों को बेहद अकेला छोड़ दिया है।
स्कूल निभाएं जिम्मेदारीः ऐसे समय में जब परिवार बिखर चुके हैं, समाज की शक्तियां अपने वास्तविक स्वरूप में निष्क्रिय हैं, हमारे विद्यालयों, स्वयंसेवी संगठनों को आगे आना होगा। एक आर्थिक रूप से निर्भर समाज बनाने के साथ-साथ हमें एक नैतिक, संवेदनशील और परदुखकातर समाज भी बनाना होगा। संवेदना का विस्तार परिवार से लेकर समाज तक फैलेगा तो समाज के तमाम कष्ट कम होगें। शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता इस काम में बड़ा योगदान दे सकते हैं। सही मायने में हमें कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है, जिसमें परिवारों और स्कूलों दोनों पर फोकस करना होगा।
      परिवार और स्कूलों में नई पीढ़ी को संस्कार, सहअस्तित्व, परस्पर सम्मान और शुचिता के संस्कार देने होगें। स्त्री-पुरुष में कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई खास और कोई कमतर नहीं यह भावनाएं बचपन से बिठानी होगीं। पशुता और मनोविकार के लक्षण हमारी परवरिश, पढ़ाई- लिखाई और समाज में चल रहीं हलचलों से ही उपजते हैं। मोबाइल और मीडिया के तमाम माध्यमों पर उपलब्ध अश्लील और पोर्न सामग्री इसमें उत्प्रेरक की भूमिका निभा रहे हैं। इसके साथ ही समाज में बंटवारे की भावनाएं इतनी गहरी हो रही हैं कि हम स्त्री के विरूद्ध अपराध को पंथों को हिसाब से देख रहे हैं। निर्मम हत्याएं, दुराचार की घटनाएं मानवता के विरुद्ध हैं। पूरे समाज के लिए कलंक हैं। इन घटनाओं पर भी हम अपनी घटिया राजनीति और पंथिक मानसिकता से ग्रस्त होकर टिप्पणी कर रहे हैं। दुनिया के हर हिस्से में हो रहे हमलों, युध्दों, दंगों और आपसी पारिवारिक लड़ाई में भी स्त्री को ही कमजोर मानकर निशाना बनाया जाता है। यह बीमार सोच और मनोरोगी समाज के  लक्षण हैं।
पाखंडपूर्ण समाज और शुतुरमुर्गी सोचः समाज की पाखंडपूर्ण प्रवृत्ति और शुतुरमुर्गी रवैया ऐसे सामाजिक संकटों में साफ दिखता है। साल में दो नवरात्रि पर कन्यापूजन कर बालिकाओं का आशीष लेने वाला समाज, उसी कन्या के लिए जीने लायक हालात नहीं रहने दे रहा है। संकटों से जूझने, दो-दो हाथ करने और समाधान निकालने की हमारी मानसिकता और तैयारी दोनों नहीं है। अलीगढ़, भोपाल से लेकर उज्जैन तक जो कुछ हुआ है, वह बताता है कि हमारा समाज किस गर्त में जा रहा है। हमारी परिवार व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, समाज व्यवस्था, धर्म सत्ता सब सवालों के घेरे में है। हमारा नैतिक पक्ष,दार्शनिक पक्ष चकनाचूर हो चुका है। हम एक स्वार्थी, व्यक्तिवादी समाज बना रहे हैं, जिसमें पति-पत्नी और बच्चों के अलावा कोई नहीं है। विश्वास का यह संकट दिनों दिन गहरा होता जा रहा है। शायद इसीलिए हमें परिजनों और पड़ोसियों से ज्यादा हिडेन कैमरों और सर्विलेंस के साधनों पर भरोसा ज्यादा है। भरोसे के दरकने का यह संकट दरअसल संवेदना के छीज जाने का भी संकट है।
कैसे बचेंगी बेटियाः बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा जब हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने दिया होगा, तब शायद वे कोख में मारी जानी वाली बेटियों की चिंता कर रहे थे। हमारे समय के एक बड़े संकट भ्रूण हत्या पर उनका संकेत था। लेकिन अब इस नारे के अर्थ बदलने से लगे हैं। लगता है कि अब दुनिया में आ चुकी बेटियों को बचाने के लिए हमें नए नारे देने होगें। एक बेहतर दुनिया किसी भी सभ्य समाज का सपना है। हमारी संस्कृति और परंपरा ने हमें स्त्री के पूजन का पाठ सिखाया है। हम कहते रहे हैं- यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता (जहां नारियों की पूजा होता है, वहां देवता वास करते हैं)। हमारी बुद्धि, शक्ति और धन की अधिष्ठात्री भी सरस्वती, दुर्गा-काली और लक्ष्मी जैसी देवियां हैं। बावजूद इसके उन्हें पूजने वाली धरती पर बालिकाओं का जीवन इतना कठिन क्यों हो गया है? यह सवाल हमारे समाने है, हम सबके सामने, पूरे समाज के सामने। हादसे की शिकार बेटियों की चीख हमने आज नहीं सुनी तो मानवता के सामने हम सब अपराधी होगें, यकीन मानिए।