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सोमवार, 10 जून 2019

बिलखती बेटियां, स्तब्ध समाज


-प्रो. संजय द्विवेदी

   छोटी बच्चियों के साथ निरंतर हो रही आपराधिक घटनाएं हमारे समाज के माथे पर कलंक ही हैं। यह दुनिया बेटियों के लिए लगातार असुरक्षित होती जा रही है और हमारे हाथ बंधे हुए से लगते हैं। कोई समाज अगर अपनी संततियों की सुरक्षा भी नहीं कर सकता, उनके बचपन को सुरक्षित और संरक्षित नहीं रख सकता तो यह मान लेना चाहिए सडांध बहुत गहरी है। ऐसे समाज का या तो दार्शनिक आधार दरक चुका है या वह सिर्फ एक पाखंडपूर्ण समाज बनकर रह गया है जो बातें तो बड़ी-बड़ी करता है, किंतु उसका आचरण बहुत घटिया है।
   स्त्रियों की तरफ देखने का हमारा नजरिया, उनके साथ बरताव करने का रवैया बताता है कि हालात अच्छे नहीं हैं। किंतु चिंता तब और बढ़ जाती है, जब निशाने पर मासूम हों। जिन्होंने अभी-अभी होश संभाला है, दुनिया को देख रहे हैं। परख रहे हैं। समझ रहे हैं। उनके अपने परिचितों, दोस्तों, परिजनों के हाथों किए जा रहे ये हादसे बता रहे हैं कि हम कितने सड़े हुए समाज में रह रहे हैं। हमारी सारी चमकीली प्रगति के मोल क्या हैं, अगर हम अपने बच्चों के खेल के मैदानों में, पास-पड़ोस में जाने से भी सहमने लगें। किंतु ऐसा हो रहा है और हम सहमे हुए हैं। बेटियां जिनकी मौजूदगी से यह दुनिया इतनी सुंदर है, वहशी दरिंदों के निशाने पर हैं।
कानूनों से क्या होगाः बच्चों और स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर कानूनों की कमी नहीं है। किंतु उन्हें लागू करने, एक न्यायपूर्ण समाज बनाने की प्रक्रिया में हम विफल जरूर हुए हैं।इन घटनाओं के चलते पुलिस, सरकार और समाज सबका विवेक तथा संवेदनशीलता कसौटी पर है। निर्भया कांड के बाद समाज की आई जागरूकता और सरकार पर बने दबावों का भी हम सही दोहन नहीं कर सके। कम समय में न्याय, संवेदनशील पुलिसिंग और समाज में व्यापक जागरूकता के बिना इन सवालों से जूझा नहीं जा सकता। हमारी परिवारनाम की संस्था जो पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों की स्थापना का मूल स्थान था, पूरी तरह दरक चुकी है। पैसा इस वक्त की सबसे बड़ी ताकत है और जायज-नाजायज पैसे का अंतर खत्म हो चुका है। माता-पिता की व्यस्तताएं, उनकी परिवार चलाने और संसाधन जुटाने की जद्दोजहद में सबसे उपेक्षित तो बच्चा ही हो रहा है। सोशल मीडिया ने इस संवादहीनता के नरक को और चौड़ा किया है। संयुक्त परिवारों की टूटन तो एक सवाल है ही। ऐसे कठिन समय में हमारे बच्चे क्या करें और कहां जाएं? अवसरों से भरी पूरी दुनिया में जब वे पैदा हुए हैं, तो उनका सुरक्षित रहना एक दूसरी चुनौती बन गया है। भारतीय परिवार व्यवस्था पूरी दुनिया में विस्मय और उदाहरण का विषय रही है, किंतु इसके बिखराव और एकल परिवारों ने बच्चों को बेहद अकेला छोड़ दिया है।
स्कूल निभाएं जिम्मेदारीः ऐसे समय में जब परिवार बिखर चुके हैं, समाज की शक्तियां अपने वास्तविक स्वरूप में निष्क्रिय हैं, हमारे विद्यालयों, स्वयंसेवी संगठनों को आगे आना होगा। एक आर्थिक रूप से निर्भर समाज बनाने के साथ-साथ हमें एक नैतिक, संवेदनशील और परदुखकातर समाज भी बनाना होगा। संवेदना का विस्तार परिवार से लेकर समाज तक फैलेगा तो समाज के तमाम कष्ट कम होगें। शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता इस काम में बड़ा योगदान दे सकते हैं। सही मायने में हमें कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है, जिसमें परिवारों और स्कूलों दोनों पर फोकस करना होगा।
      परिवार और स्कूलों में नई पीढ़ी को संस्कार, सहअस्तित्व, परस्पर सम्मान और शुचिता के संस्कार देने होगें। स्त्री-पुरुष में कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई खास और कोई कमतर नहीं यह भावनाएं बचपन से बिठानी होगीं। पशुता और मनोविकार के लक्षण हमारी परवरिश, पढ़ाई- लिखाई और समाज में चल रहीं हलचलों से ही उपजते हैं। मोबाइल और मीडिया के तमाम माध्यमों पर उपलब्ध अश्लील और पोर्न सामग्री इसमें उत्प्रेरक की भूमिका निभा रहे हैं। इसके साथ ही समाज में बंटवारे की भावनाएं इतनी गहरी हो रही हैं कि हम स्त्री के विरूद्ध अपराध को पंथों को हिसाब से देख रहे हैं। निर्मम हत्याएं, दुराचार की घटनाएं मानवता के विरुद्ध हैं। पूरे समाज के लिए कलंक हैं। इन घटनाओं पर भी हम अपनी घटिया राजनीति और पंथिक मानसिकता से ग्रस्त होकर टिप्पणी कर रहे हैं। दुनिया के हर हिस्से में हो रहे हमलों, युध्दों, दंगों और आपसी पारिवारिक लड़ाई में भी स्त्री को ही कमजोर मानकर निशाना बनाया जाता है। यह बीमार सोच और मनोरोगी समाज के  लक्षण हैं।
पाखंडपूर्ण समाज और शुतुरमुर्गी सोचः समाज की पाखंडपूर्ण प्रवृत्ति और शुतुरमुर्गी रवैया ऐसे सामाजिक संकटों में साफ दिखता है। साल में दो नवरात्रि पर कन्यापूजन कर बालिकाओं का आशीष लेने वाला समाज, उसी कन्या के लिए जीने लायक हालात नहीं रहने दे रहा है। संकटों से जूझने, दो-दो हाथ करने और समाधान निकालने की हमारी मानसिकता और तैयारी दोनों नहीं है। अलीगढ़, भोपाल से लेकर उज्जैन तक जो कुछ हुआ है, वह बताता है कि हमारा समाज किस गर्त में जा रहा है। हमारी परिवार व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, समाज व्यवस्था, धर्म सत्ता सब सवालों के घेरे में है। हमारा नैतिक पक्ष,दार्शनिक पक्ष चकनाचूर हो चुका है। हम एक स्वार्थी, व्यक्तिवादी समाज बना रहे हैं, जिसमें पति-पत्नी और बच्चों के अलावा कोई नहीं है। विश्वास का यह संकट दिनों दिन गहरा होता जा रहा है। शायद इसीलिए हमें परिजनों और पड़ोसियों से ज्यादा हिडेन कैमरों और सर्विलेंस के साधनों पर भरोसा ज्यादा है। भरोसे के दरकने का यह संकट दरअसल संवेदना के छीज जाने का भी संकट है।
कैसे बचेंगी बेटियाः बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा जब हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने दिया होगा, तब शायद वे कोख में मारी जानी वाली बेटियों की चिंता कर रहे थे। हमारे समय के एक बड़े संकट भ्रूण हत्या पर उनका संकेत था। लेकिन अब इस नारे के अर्थ बदलने से लगे हैं। लगता है कि अब दुनिया में आ चुकी बेटियों को बचाने के लिए हमें नए नारे देने होगें। एक बेहतर दुनिया किसी भी सभ्य समाज का सपना है। हमारी संस्कृति और परंपरा ने हमें स्त्री के पूजन का पाठ सिखाया है। हम कहते रहे हैं- यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता (जहां नारियों की पूजा होता है, वहां देवता वास करते हैं)। हमारी बुद्धि, शक्ति और धन की अधिष्ठात्री भी सरस्वती, दुर्गा-काली और लक्ष्मी जैसी देवियां हैं। बावजूद इसके उन्हें पूजने वाली धरती पर बालिकाओं का जीवन इतना कठिन क्यों हो गया है? यह सवाल हमारे समाने है, हम सबके सामने, पूरे समाज के सामने। हादसे की शिकार बेटियों की चीख हमने आज नहीं सुनी तो मानवता के सामने हम सब अपराधी होगें, यकीन मानिए।


सोमवार, 21 जुलाई 2014

कहां जाएं औरतें



-संजय द्विवेदी
        आखिर औरतें कहां जाएं? इस बेरहम दुनिया में उनका जीना मुश्किल है। यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता (जहां नारियों की पूजा होती है देवता वहां निवास करते है)का मंत्रजाप  करने वाले देश में क्या औरतें इतनी असुरक्षित हो गयी हैं कि उनका चलना कठिन है। शहर-दर-शहर उन पर हो रहे हमले और शैतानी हरकतें बताती हैं कि हमारा अपनी जड़ों से नाता टूट गया है। अपने को साबित करने के लिए निकली औरत के खिलाफ शैतानी ताकतें लगी हैं। वे उन्हें फिर उन्हीं कठघरों में बंद कर देना चाहती हैं, जिन्हें सालों बाद तोड़कर वे निकली हैं।
     एक लोकतंत्र में होते हुए स्त्रियों के खिलाफ हो रहे जधन्य अपराधों की खबरें हमें शर्मिन्दा करती हैं। ये बताती हैं कि अभी हमें सभ्य होना सीखना है। घरों की चाहरदीवारी से बाहर निकली औरत सुरक्षित घर आ जाए ऐसा समाज हम कब बना पाएंगें? जाहिर तौर पर इसका विकास और उन्नति से कोई लेना-देना नहीं है। इस विषय पर घटिया राजनीति हो रही है पर यह राजनीति का विषय भी नहीं है। पुलिस और कानून का भी नहीं। यह विषय तो समाज का है। समाज के मन में चल रही व्यथा का है। हमने ऐसा समाज क्यों बनने दिया जिसमें कोई स्त्री,कोई बच्चा, कोई बच्ची सुरक्षित नहीं है? क्यों हमारे घरों से लेकर शहरों और गांवों तक उनकी व्यथा एक है? वे आज हमसे पूछ रही हैं कि आखिर वे कहां जाएं। स्त्री होना दुख है। यह समय इसे सच साबित कर रहा है। जबकि इस दौर में स्त्री ने अपनी सार्मथ्य के झंडे गाड़े हैं। अपनी बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक क्षमता से स्वयं को इस कठिन समय में स्थापित किया है। एक तरफ ये शक्तिमान स्त्रियों का समय है तो दूसरी ओर ये शोषित-पीड़ित स्त्रियों का भी समय है। इसमें औरत के खिलाफ हो रहे अपराध निरंतर और वीभत्स होते जा रहे हैं। इसमें समाज की भूमिका प्रतिरोध की है। वह कर भी रहा है, किंतु इसका असर गायब दिखता है। कानून हार मान चुके हैं और पुलिस का भय किसी को नहीं हैं। अपराधी अपनी कर रहे हैं और उन्हें नियंत्रित करने वाले हाथ खुद को अक्षम पा रहे हैं। कड़े कानून आखिर क्या कर सकते हैं, यह भी इससे पता चलता है। अपराधी बेखौफ हैं और अनियंत्रित भी। स्त्रियों के खिलाफ ये अपराध क्या अचानक बढ़े हैं या मीडिया कवरेज इन्हें कुछ ज्यादा मिल रहा है। इसमें मुलायम सिंह यादव की जनसंख्या जैसी चिंताओं को भी जोड़ लीजिए तो भी हमारा पूरा समाज कठघरे में खड़ा है। स्त्री को गुलाम और दास समझने की मानसिकता भी इसमें जुडी है। पुरूष, स्त्री को जीतना चाहता है। वह इसे अपने पक्ष में एक ट्राफी की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। यह मानसिकता कहां से आती है ?हमारे घर-परिवार, नाते-रिश्ते भी सुरक्षित नहीं रहे। छोटे बच्चों और शिशुओं के खिलाफ हो रहे अपराध और उनके खिलाफ होती हिंसा हमें यही बताती है। इसकी जड़ें हमें अपने परिवारों में तलाशनी होंगीं। अपने परिवारों से ही इसकी शुरूआत करनी होगी, जहां स्त्री को आदर देने का वातावरण बनाना होगा। परिवारों में ही बच्चों में शुरू से ऐसे संस्कार भरने होंगें जहां स्त्री की तरफ देखने का नजरिया बदलना होगा। बेटे-बेटी में भेद करती कहानियां आज भी हमारे समाज में गूंजती हैं। ये बातें साबित करती हैं और स्थापित करती हैं कि बेटा कुछ खास है। इससे एक नकारात्मक भावना का विकास होता है। इस सोच से समूचा भारतीय समाज ग्रस्त है ऐसा नहीं है, किंतु कुछ उदाहरण भी वातावरण बिगाड़ने का काम करते हैं। आज की औरत का सपना आगे बढ़ने और अपने सपनों को सच करने का है। वह पुरूष सत्ता को चुनौती देती हुयी दिखती है। किंतु सही मायने में वह पूरक बन रही है। समाज को अपना योगदान दे रही है। किंतु उसके इस योगदान ने उसे निशाने पर ले लिया है। उसकी शुचिता के अपहरण के प्रयास चौतरफा दिखते हैं। फिल्म, टीवी, विज्ञापन और मीडिया माध्यमों से जो स्त्री प्रक्षेपित की जा रही है, वह यह नहीं है। उसे बाजार लुभा रहा है। बाजार चाहता है कि औरत उसे चलाने वाली शक्ति बने, उसे गति देने वाली ताकत बने। इसलिए बाजार ने एक नई औरत बाजार में उतार दी है। जिसे देखकर समाज भौचक है। इस औरत ने फिल्मों,विज्ञापनों, मीडिया में जो और जैसी जगह घेरी है उसने समूचे भारतीय समाज को, उसकी बनी-बनाई सोच को हिलाकर रख दिया है। बावजूद इसके हमें रास्ता निकालना होगा।
  औरत को गरिमा और मान देने के लिए मानसिकता में परिवर्तन करने की जरूरत है। हमारी शिक्षा में, हमारे जीवन में, हमारी वाणी में, हमारे गान में स्त्री का सौंदर्य, उसकी ताकत मुखर हो। हमें उसे अश्लीलता तक ले जाने की जरूरत कहां है। भारत जैसे देश में नारी अपनी शक्ति, सौंदर्य और श्रद्धा से एक विशेष स्थान रखती है। हमारी संस्कृति में सभी प्रमुख विधाओं की अधिष्ठाता देवियां ही हैं। लक्ष्मी- धन की देवी, सरस्वती –विद्या की, अन्नपूर्णाः खाद्यान्न की, दुर्गा- शक्ति यानि रक्षा की। यह पौराणिक कथाएं भी हैं तो भी हमें सिखाती हैं। बताती हैं कि हमें देवियों के साथ क्या व्यवहार करना है। देवियों को पूजता समाज, उनके मंदिरों में श्रद्धा से झूमता समाज, त्यौहारों पर कन्याओं का पूजन करता समाज, इतना असहिष्णु कैसे हो सकता है, यह एक बड़ा सवाल है। पौराणिक पाठ हमें कुछ और बताते हैं, आधुनिकता का प्रवाह हमें कुछ और बताता है। हालात यहां तक बिगड़ गए हैं हम खून के रिश्तों को भी भूल रहे हैं। कोई भी समाज आधुनिकता के साथ अग्रणी होता है किंतु विकृतियों के साथ नहीं। हमें आधुनिकता को स्वीकारते हुए विकृतियों का त्याग करना होगा। ये विकृतियां मानसिक भी हैं और वैचारिक भी। हमें एक ऐसे समाज की रचना की ओर बढ़ना होगा,जहां हर बच्चा सहअस्तित्व की भावना के साथ विकसित हो। उसे अपने साथ वाले के प्रति संवेदना हो, उसके प्रति सम्मान हो और रिश्तों की गहरी समझ हो। सतत संवाद, अभ्यास और शिक्षण संस्थाओं में काम करने वाले लोगों की यह विशेष जिम्मेदारी है। समस्या यह है कि शिक्षक तो हार ही रहे हैं, माता-पिता भी संततियों के आगे समर्पण कर चुके हैं। वे सब मिलकर या तो सिखा नहीं पा रहे हैं या वह ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं है। जब उसका शिक्षक ही कक्षा में उपस्थित छात्र तक नहीं पहुंच पा रहा है तो संकट  और गहरा हो जाता है। हमारे आसपास के संकट यही बताते हैं कि शिक्षा और परिवार दोनों ने इस समय में अपनी उपादेयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्त्रियों के खिलाफ इतना निरंतर और व्यापक होता अपराध, उनका घटता सम्मान हमें कई तरह से प्रश्नांकित कर रहा है। यहां बात प्रदेश, जिले और गांव की नहीं है, यही आज भारत का चेहरा है। कर्नाटक से लेकर उत्तर प्रदेश से एक जैसी सूचनाएं व्यथित करती हैं। राजनेताओं के बोल दंश दे रहे हैं और हम भारतवासी सिर झुकाए सब सुनने और झेलने के लिए विवश हैं। अपने समाज और अपने लोगों पर कभी स्त्री को भरोसा था, वह भरोसा दरका नहीं है, टूट चुका है। किंतु वह कहां जाए किससे कहे। इस मीडिया समय में वह एक खबर से ज्यादा कहां है। एक खबर के बाद दूसरी खबर और उसके बाद तीसरी। इस सिलसिले को रोकने के लिए कौन आएगा, कहना कठिन है। किंतु एक जीवंत समाज अपने समाज के प्रश्नों के हल खुद खोजता है। वह टीवी बहसों से प्रभावित नहीं होता, जो हमेशा अंतहीन और प्रायः निष्कर्षहीन ही होती हैं। स्त्री की सुरक्षा के सवाल पर भी हमने आज ही सोचने और कुछ करने की शुरूआत नहीं की तो कल बहुत देर हो जाएगी।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

रविवार, 22 जून 2014

स्त्रियों के खिलाफ बुरी खबरों का समय



-संजय द्विवेदी

  यह शायद बेहद खराब समय है, जब औरतों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों की खबरें रोजाना हमें हैरान कर रही हैं। भारत में औरतों के खिलाफ हो रहे ये अत्याचार बताते हैं कि प्रगति और विकास के तमाम मानकों को छू रहे इस देश का मन अभी भी औरत को एक खास नजर से ही देखता है। स्त्री के प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता का विस्तार अभी न समाज में हुआ है, न पुलिस में, न ही परिवारों में। सोचने का विषय यह भी है कि नवरात्रि के साल में दो बार आने वाले पर्व में कन्या पूजन करने वाला समाज स्त्री के प्रति इतना असहिष्णु कैसे हो सकता है? इसके साथ ही घरेलू हिंसा का एक अलग संसार है, जहां परिजन और रक्त संबंधी ही स्त्री के खिलाफ अत्याचार करते हुए दिखते हैं।
   स्त्री के खिलाफ हो रही हिंसा में स्त्री की भी उपस्थिति चौंकाने वाली है। यानि स्त्री भी अपने ही वर्ग के खिलाफ हो रही हिंसा में उसी उत्साह से शामिल है जैसे पुरूष। यह देखना और सुनना दुखद है किंतु सच है कि स्त्री के खिलाफ हिंसा की जड़ें समाज में बहुत गहरी जम चुकी हैं। आर्थिक स्वालंबन और प्रतिकार कर रही स्त्री के इस अनाचार के विरूद्ध खड़े होने से ये मामले ज्यादा संख्या में सामने आने लगे हैं। प्रकृति प्रदत्त कोमलता और कमजोरियों के नाते स्त्री के खिलाफ समाज का इस तरह का रवैया ही था, जिसके नाते सरकार को घरेलू हिंसा रोकथाम के लिए 2006 में एक कानून लाना पड़ा। इसके बाद दिल्ली में हुए निर्भया कांड ने सारे देश को झकझोरकर रख दिया। इस बीच बदांयू और उप्र के अनेक स्थानों से बेहद शर्मनाक खबरें आईं। निर्ममता और वहशियत की ये कहानियां बताती है समाज आज भी उसी मानसिकता में जी रहा है जहां औरतें को इस्तेमाल की वस्तु समझा जाता है। हम देखें तो हमारे पूरे परिवेश में ही स्त्री को एक कमोडिटी की तरह स्थापित करने के प्रयास चल रहे हैं। मनोरंजन, फिल्मों और विज्ञापनों की दुनिया में ये सच्चाई और नंगे रूप में सामने आती है। जहां औरतें एक वस्तु की तरह उपस्थित हैं। उन्हें सेक्स आब्जेक्ट की तरह प्रस्तुत करने पर जोर है। वे विज्ञापनों में ऐसी वस्तुएं भी बेचती नजर आ रही हैं जिसका वे स्वयं इस्तेमाल नहीं करतीं। रूपहले स्क्रीन के बाजार में उतरी इस बोल्ड-बिंदास-लगभग निर्वसन स्त्री ने, समाज में रह रही स्त्री का जीना मुहाल कर दिया है।

   पल-पल सजे बाजार में उपस्थित स्त्री के सपने और उसकी दुनिया को इस समय ने बेहद सीमित कर दिया है। उसके लिए अवसर बढ़े हैं, किंतु सुरक्षा घट रही है। वह चमकते परदे पर बेहद शक्तिशाली दिखती है, किंतु उसके घर पहुंचने तक चिंतांएं उतनी ही गहरी हैं, जितनी पहले हुए करती थीं। द सेंकेंड सेक्स की लेखिका सिमोन लिखती हैं कि स्त्री बनती नहीं है, उसे बनाया जाता है। जाहिर है सिमोन के समय के अनुभव आज भी बदले नहीं हैं। बदलते समय ने स्त्री को अवसरों के तमाम द्वार खोले हैं, किंतु उसकी तरफ देखने का नजरिया अभी बदलना शेष है। आवश्यक्ता इस बात की है कि हम परिवार से ही इसकी शुरूआत करें। पितृसत्ता की निर्मम छवियों से मुक्त हमें एक ऐसा समाज बनाने की ओर बढ़ना है जहां स्त्री को समान अवसर और समान सम्मान हासिल हैं। तमाम परिवारों में नारकीय जीवन जी रही स्त्रियां हैं, वैसा ही सीखते युवा हैं। बदलती दुनिया में औरतें हर क्षेत्र में अपनी क्षमताएं साबित कर चुकी हैं। वे कठिन कामों को अंजाम दे रही हैं और कहीं भी पुरूषों से कमतर नहीं हैं। शैक्षणिक परिणामों से लेकर मैदानी कामों में उनका हस्तक्षेप कहीं भी अप्रभावी नहीं है। वे जिम्मेदार,कुशल, ज्यादा संवेदनाओं से युक्त और ज्यादा मानवीय हैं। परिवारों में आज स्थितियां बदल रही हैं। स्त्री की क्षमता और उसकी संवेदना को आदर मिल रहा है, वे अवसर पाकर आकाश नाप रही हैं। तमाम परिवारों में अकेली लड़की पैदा करके पुत्र न करने के फैसले भी लिए हैं। यह बदलती दुनिया का एक चेहरा है। किंतु हमें देखना होगा कि एक बहुत बड़ा समाज आज भी अंधेरे में हैं। वह अपनी बनी-बनी धारणाओं को तोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। जहां आज भी पुत्री के जन्म पर दुख के बादल छा जाते हैं। स्त्री को सम्मान नहीं हैं और उसे ही पहला शिकार बनाया जाता है। मध्ययुगीन बर्बरता के निशान आज भी हमारे मनो में हैं। इसलिए हम स्त्री को सबसे पहले और आसान निशाना बनाते हैं, क्योंकि वह कमजोर तो है ही, घर की इज्जत भी है। प्रतिष्ठा से जुड़े होने के नाते तमाम क्षेत्रों में आपसी रंजिशों में भी पहला शिकार औरत को बनाया जाता है। इसलिए लगता है कि एक मानवीय समाज बनाने और औरतों के प्रति संवेदना भरने में हम विफल ही रहे हैं। यहां अंतर गांव और शहर का नहीं समझ और मान्यताओं का भी है। गांवों में भी आपको ऐसे परिवार मिल जाएंगें जहां स्त्रियों को बेहद सम्मान से देखा जाता है और फैसलों में वे ही निर्णायक होती हैं। शहरों में भी ऐसे परिवार मिलेंगें जहां औरतें कोई मायने नहीं रखतीं हैं। हमें यह भी समझना होगा कि स्त्री का सशक्तिकरण पुरूष के विरूद्ध नहीं है। पुरूषों के सम्मान के विरूद्ध नहीं है, वरन वह समाज के पक्ष में है। परिवार और समाज को चलाने की एक धुरी स्त्री है तो दूसरा पुरुष है। दोनों के समन्वित सहभाग से ही एक सुंदर समाज की रचना हो सकती है। स्त्रियों ने इस समय में अपनी शक्ति को पहचान लिया है। वे बेहतर कर रही हैं और आगे आसमां छूने की कोशिशों में हैं। यहां भी पुरूष सत्ता चोटिल होती हुयी लगती है। उसके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के बजाए, किस्से बनाने और उसे कमतर साबित करने की कोशिशें हर स्तर हो रही हैं। तेज होते सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के इस दौर में सिर्फ कानून ही स्त्री के साथ खड़े हैं। कई जगह तो स्त्रियां भी, स्त्रियों के खिलाफ खड़ी हैं। यह एक संक्रमण काल है, स्त्री को अपने वजूद को साबित करते हुए निरंतर आगे बढ़ने का समय है। वह जीत रही है और आगे बढ़ रही है। अपने सपनों में रंग भर रही है। आसान शिकार होने के नाते कुछ शिकारी उसकी घात में हैं किंतु आज की औरत इससे डरती नहीं, घबराती नहीं, वह बने-बनाए कठघरों को तोड़कर आगे आ रही है। मीडिया, महिला आयोग, पुलिस और सरकार सहित तमाम स्वयंसेवी संगठन रात दिन इस काम में लगे हैं कि कैसे औरतें ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा अधिकार सम्पन्न हों। यह काम अगर इनके बस का होता तो हो गया होता, सबसे जरूरी है परिवारों में बच्चों को सही संस्कार। वे घर से औरतों का सम्मान करना सीखें। वे अपनी बहन-मां का आदर करना सीखें। वे यह देख पाएं कि उनके पिता और मां दोनों बराबरी के हैं, कोई किसी से कम नहीं हैं। वे परिवार की धुरी हैं। वे यह भी सीखें की कि हमारी संस्कृति में कन्या पूजन जैसे विधान क्यों रखे गए हैं? क्योंकि हमारी सभी विद्याओं की मालिका देवियां हैं? क्यों हम दुर्गा से शक्ति, सरस्वती से बुद्धि और लक्ष्मी से वैभव की मांग करते हैं? क्यों हमें यह पढ़ाया और बताया गया कि जहां स्त्रियां की पूजा होती है देवता वहीं निवास करते हैं। जाहिर तौर पर संस्कृति का हर पाठ स्त्री के सम्मान और उसकी शुचिता के पक्ष में है, किंतु जाने किन प्रभावों में हम अपनी ही सांस्कृतिक मान्यताओं और संदेशों के खिलाफ खड़े हैं। स्त्री को आदर देता समाज ही एक संवेदनशील और मानवीय समाज कहा जाएगा।अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो हमें अपनी महान संस्कृति पर गर्व करने का अभिनय और ढोंग बंद कर देना चाहिए।

गुरुवार, 15 मई 2014

मीडिया में दिख रहा है किस औरत का चेहरा ?

-संजय द्विवेदी
      मेरे सामने इंडिया टुडे का 18 दिसंबर,2013 का अंक है। जिसकी आवरण कथा एक सेक्स सर्वे पर आधारित है और उसका शीर्षक है- महिलाओं का मन मांगे मोर। एक मुख्यधारा की समाचार पत्रिका में प्रकाशित यह आवरण कथा बताती है कि आखिर स्त्री की तरफ देखने की मीडिया की दृष्टि क्या है। औरत की देह इस समय मीडिया का सबसे लोकप्रिय विमर्श है । सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है, उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चैनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। मीडिया ने उदारीकरण के बाद बाजार में एकदम नई औरत उतार दी है, जो आत्मविश्वास से भरी है और तमाम वर्जित क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए उत्सुक है। इस सबके बीच मीडिया की कुछ सकारात्मक भूमिका भी है जो रेखांकित की जानी चाहिए। औरत की एक नई पहचान बनाने और स्थापित करने में उसने एक बड़ी भूमिका निभाई है। सौंदर्य एवं आकर्षण से इतर एक महत्वाकांक्षी और कर्मठ छवि बनाने में मदद की है। महिला अधिकार और स्वतंत्रता के साथ-साथ परिवार के अंदर वह एक निर्णायक भूमिका में नजर आ रही है। महिला उद्ममिता के साथ-साथ समाज में महिलाओं के संघर्ष को भी मीडिया ने स्वर दिया है। किंतु कुछ सकारात्मक पक्षों के साथ उसका महिला को एक सेक्स आब्जेक्ट के रूप में पेश करने का रवैया सबसे खतरनाक है, जो उसके सभी पुण्यकर्मों पर पानी फेर देता है।
दैहिक विमर्शों का वाहकः
      प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए प्लेबायया डेबोनियरतक सीमित था अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही नहीं खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाग खासी जगह घेरा रहा है। वह पूरा हल्लाबोल 24 घंटे के चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। शायद इसीलिए इंटरनेट के माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 60 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है। मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति दी है। एक आंकड़े के मुताबिक मोबाइल पर अश्लीलता का कारोबार भी पांच सालों में 5अरब डॉलर तक जा पहुंचेगा ।  इस पूरे वातावरण को इलेक्ट्रानिक टीवी चैनलों ने आँधी में बदल दिया है। प्रिंट मीडिया अब इससे होड़ ले रहा है। इंटरनेट ने सही रूप में अपने व्यापक लाभों के बावजूद सबसे ज्यादा फायदा सेक्स कारोबार को पहुँचाया । पूंजी की ताकतें सेक्सुएलिटी को पारदर्शी बनाने में जुटी है। मीडिया इसमें उनका सहयोगी बना है, अश्लीलता और सेक्स के कारोबार को मीडिया किस तरह ग्लोबल बना रहा है इसका उदाहरण विश्व कप फुटबाल में देखने को मिला। मीडिया रिपोर्ट से ही हमें पता चला कि जर्मनी के तमाम वेश्यालय इसके लिए तैयार थे और दुनिया भर से वेश्याएं वहाँ पहुंचीं। कुछ विज्ञापन विश्व कप के इस पूरे उत्साह को इस तरह व्यक्त करते थे मैच के लिए नहीं, मौज के लिए आइए। जाहिर है मीडिया ने हर मामले को ग्लोबल बना दिया है।हमारे गोपन विमर्शोंकोओपनकरने में मीडिया का एक खास रोल है। शायद इसीलिए मीडिया के कंधों पर सवार यह सेक्स कारोबार तेजी से ग्लोबल हो रहा है।  महानगरों में लोगों की सेक्स हैबिट्स को लेकर भी मुद्रित माध्यमों में सर्वेक्षण छापने की होड़ है । वे छापते हैं 80 प्रतिशत महिलाएं शादी के पूर्व सेक्स के लिए सहमत हैं । दरअसल यह छापा गया सबसे बड़ा झूठ हैं । ये पत्र-पत्रिकाओं के व्यापार और पूंजी गांठने का एक नापाक गठजोड़ और तंत्र है ।
बाजार की बाधाएं हटा रहा है मीडियाः
    सेक्स को बार-बार कवर स्टोरी का विषय बनाकर ये उसे रोजमर्रा की चीज बना देना चाहते हैं । इस षड़यंत्र में शामिल मीडिया बाजार की बाधाएं हटा रहा है। फिल्मों की जो गंदगी कही जाती थी वह शायद उतना नुकसान न कर पाए जैसा धमाल इन दिनों मुद्रित माध्यम मचा रहे हैं । कामोत्तेजक वातावरण को बनाने और बेचने की यह होड़ कम होती नहीं दिखती । मीडिया का हर माध्यम एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में है। यह होड़ है नंगई की । उसका विमर्श है-देह जहर’ ‘मर्डर’ ‘कलियुग’ ‘गैगस्टर’ ‘ख्वाहिश’, ‘जिस्म, गोलियों की रासलीला जैसी तमाम फिल्मों ने बाज़ार में एक नई हिंदुस्तानी औरत उतार दी है । जिसे देखकर समाज चमत्कृत है। कपड़े उतारने पर आमादा इस स्त्री के दर्शन के दर्शन ने मीडिया प्रबंधकों के आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया है। एड्स की बीमारी ने पूंजी के ताकतों के लक्ष्य संधान को और आसान कर दिया है । अब सवाल रिश्तों की शुचिता का नहीं, विश्वास का नहीं, साथी से वफादारी का नहीं- कंडोम का डै । कंडोम ने असुरक्षित यौन के खतरे को एक ऐसे खतरनाक विमर्श में बदल दिया है, जहाँ व्यवसायिकता की हदें शुरू हो जाती है। वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि आज भी पत्रकारिता में महिलाओं का प्रतिशत भले बढ़ गया हो किंतु महिला मुद्दों के प्रति संवेदना की बहुत कमी है। अधिकांश महिलाएं पुरूष मानसिकता से भरी हुई हैं, और ऐसी महिलाओं के संवेदना का स्तर अधिक जागरूक नहीं है।”1
    अस्सी के दशक में दुपट्टे को परचम की तरह लहराती पीढ़ी आयी, फिर नब्बे का दशक बिकनी का आया और अब सारी हदें पार कर चुकी हमारी फिल्मों तथा मीडिया एक ऐसे देह राग में डूबे हैं जहां सेक्स एकतरफा विमर्श और विनिमय पर आमादा है। उसके केंद्र में भारतीय स्त्री है और उद्देश्य उसकी शुचिता का उपहरण । सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं । यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है-निशाना भारतीय औरतें हैं । भारतीय स्त्री के सौंदर्य पर विश्व का अचानक मुग्ध हो जाना, देश में मिस युनीवर्स, मिस वर्ल्ड की कतार लग जाना-खतरे का संकेतक ही था। हम उस षड़यंत्र को भांप नहीं पाए । अमरीकी बाजार का यह अश्वमेघ, दिग्विजय करता हुआ हमारी अस्मिता का अपहरण कर ले गया ।  एलफिन की संपादक रेखा तनवीर कहती हैं कि आज औरत का ग्लैमरस हिस्सा बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है।...औरत को असली रूप में प्रस्तुत करना अभी बाकी है जिससे उसकी पहचान बने।2   पत्रकार कुमकुम शर्मा भी इस बात से एक साक्षात्कार में सहमति दिखाती हैं- वे कहती हैं-मीडिया आज स्त्री की छवि को बहुत विकृत करके परोस रहा है। उनकी पहचान स्त्री देह के नाते बन रही है। औरतें लगातार समझौते कर रही हैं और अपने आप को पहचान नहीं पा रही हैं।”3
     इतिहास की इस घड़ी में हमारे पास साइबर कैफे हैं, जो इलेक्ट्रानिक चकलाघरों में बदल रहे हैं । हमारे बेटे-बेटियों के साइबर फ्रेंड से अश्लील चर्चाओं में मशगूल हैं । कंडोम के रास्ते गुजर कर आता हुआ प्रेम है । अब सुंदरता परिधानों में नहीं नहीं उन्हें उतारने में है। कुछ साल पहले स्त्री को सबके सामने छूते हाथ कांपते थे अब उसे चूमें बिना बात नहीं बनती । कैटवाक करते कपड़े गिरे हों, या कैमरों में दर्ज चुंबन क्रियाएं, ये कलंक पब्लिसिटी के काम आते हैं । लांछन अब इस दौर में उपलब्धियों में बदल रहे हैं । भोगो और मुक्त हो,’ यही इस युग का सत्य है। कैसे सुंदर दिखें और कैसे मर्दकी आंख का आकर्षण बनें यही पहिला पत्रकारिता का मूल विमर्श है । जीवन शैली अब लाइफ स्टाइलमें बदल गया है । बाजारवाद के मुख्य हथियार विज्ञापनअब नए-नए रूप धरकर हमें लुभा रहे हैं । नग्नता ही स्त्री स्वातंत्र्य का पर्याय बन गयी है। मेगा माल्स, ऊँची ऊँची इमारतें, डियाइनर कपड़ों के विशाल शोरूम, रातभर चलने वाली मादक पार्टियां और बल्लियों उछलता नशीला उत्साह । इस पूरे परिदृश्य को अपने नए सौंदर्यबोध से परोसता, उगलता मीडिया एक ऐसी दुनिया रच रहा है जहाँ बज रहा है सिर्फ देहराग, देहराग और देहराग । इस समूचे परिदृश्य को हम भौंचक होकर देख रहे हैं। लेखिका और उपन्यासकार जया जादवानी लिखती हैं-कौन सी औरत खड़ी है इस स्क्रीन पर –वह जो आइटम गर्ल है, छोटे कपड़े पहनती है, बड़े-बड़े पर्स, हाईहील के शू पहनती है। एक-एक लाख का माल शरीर पर...घर बनाती नहीं, तोड़ती है..। वैसै घरों का जो हाल है, टूट ही जाने चाहिए।...स्त्रियों की मीडिया में सोचनीय भूमिका के लिए सिर्फ मीडिया ही जिम्मेदार है क्या? खुद स्त्री? इस तमाम चेहरों में उसका असली चेहरा कौन सा है? कब आएगी वह मुखौटों के पीछे से अपने वास्तविक रूप में?”4
न हो औरत की शक्ति का बाजारीकरणः
    इन तमाम संकटों के बीच भी स्त्री आज के समय में वह घर और बाहर दोनों स्थानों अपेक्षित आदर प्राप्त कर रही है। वह समाज को नए नजरिये से देख रही है। उसका आकलन कर रही है और अपने लिए निरंतर नए क्षितिज खोल रही है।ऐसी सार्मथ्यशाली स्त्री को शिखर छूने के अवसर देने के बजाए हम उसे बाजार के जाल में फंसा रहे हैं। वह अपनी निजता और सौंदर्यबोध के साथ जीने की स्थितियां और आदर समाज जीवन में प्राप्त कर सके हमें इसका प्रयास करना चाहिए। हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति धारणा निरंतर बदल रही है। वह नए-नए सोपानों का स्पर्श कर रही है। माता-पिता की सोच भी बदल रही है वे अपनी बच्चियों के बेहतर विकास के लिए तमाम जतन कर रहे हैं। स्त्री सही मायने में इस दौर में ज्यादा शक्तिशाली होकर उभरी है। किंतु बाजार हर जगह शिकार तलाश ही लेता है। वह औरत की शक्ति का बाजारीकरण करना चाहता है। हमें देखना होगा कि भारतीय स्त्री पर मुग्ध बाजार उसकी शक्ति तो बने किंतु उसका शोषण न कर सके। आज में मीडियामय और विज्ञापनी बाजार में औरत के लिए हर कदम पर खतरे हैं। पल-पल पर उसके लिए बाजार सजे हैं। देह के भी, रूप के भी, प्रतिभा के भी, कलंक के भी। हद तो यह कि कलंक भी पब्लिसिटी के काम आ रहे हैं। क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से हमें रिझा रहा है और बोली लगा रहा है। हमें इस समय से बचते हुए इसके बेहतर प्रभावों को ग्रहण करना है। प्रख्यात आलोचक विजयबहादुर सिंह लिखते हैं कि-इसमें संदेह नहीं कि मीडिया ने स्त्री केलिए संभावनाओं के सैकड़ों गवाक्ष खोल दिए हैं। ये जितने रूपहले और चमकीले हैं, उतने ही आत्मस्मृतिमूलक(यानी कि अपने को पहचानने की सुविधा प्रदान करने वाले) और आत्मनिखार के मौके देने वाले भी। हम अगर उसे सिर्फ बाजार मान लें,तब भी एक यह गुंजाइश बची ही रहती है कि हम वहां एक प्रतिस्पर्धी उपस्थिति के लिए स्वाधीनता के साथ संघर्षरत रहें। गायन,नृत्य, अभिनय, कला-कौशल की अन्य भूमिकाओं में मीडिया ने स्त्री के लिए लगभग युगान्तर ही उपस्थित  कर दिया है।5
    मीडिया के इस उजले पक्ष की व्यापक उपस्थिति भी दिखती है। टीवी माध्यम के विस्तार ने युवतियों और महिलाओं को एक नई शक्ति दी है। न्यूज रूम जो प्रिंट मीडिया की शाहंशाही में पुरूषों से भरे थे, अब टीवी मीडिया दौर में न्यूज रूम औरतों की उपस्थिति से ही नई पहचान अर्जित कर रहे हैं। टीवी पर दिखने के अलावा उसके पीछे भी स्त्रियों की एक बड़ी शक्ति ही काम कर रही है। मनोरंजन जगत में एकता कपूर जैसे तमाम उदाहरण दिखते हैं तो न्यूज मीडिया में अनुराधा प्रसाद जैसी हस्तियां भी हैं, जो स्वयं कई चैनलों और रेडियो स्टेशनों की मालकिन हैं। बावजूद इसके मीडिया की तरफ देखने की दृष्टि क्या है इसका उल्लेख करते हुए विजयबहादुर सिंह लिखते हैं कि औसत निम्न मध्यवर्गीय और कभी-कभी मध्यवर्गीय दिमाग भी यह सोचा करता है कि मीडिया स्त्रियों के लिए एक संदिग्ध और खतरनाक क्षेत्र है। ऐसे मित्रों से यह कहना जरूरी है शिक्षा और नौकरशाही के क्षेत्र में ये अपवाद पहले से जारी है। फिर स्त्री अब खुद पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्रताप्रिय  और आत्मविश्वासी हुयी है। वहीं प्रख्यात लेखिका डा.कमल कुमार का कहना है कि –सेक्स की उन्मुक्त अभिव्यक्ति,स्त्री शरीर के नग्न प्रदर्शन की वृद्धि। इंटरनेट, डिजिटल टेक्नालाजी, मोबाइल,कैमरा, वीडियो पर पोर्नोग्राफी का समर्थन पर हिंसा नहीं तो क्या है ?....भोग विलास और सुख सुविधा को जीवन का लक्ष्य बना देना, सूचनाओं को सत्ता बना देना और बाजार को समाज बना लेने का काम मीडिया कर रहा है। 7
    इसमें दो राय नहीं की नई बाजारवादी व्यवस्था से प्रेरित मीडिया ने औरत की बोली लगानी शुरू की है, उसके भाव बढ़े हैं। सौंदर्य के बाजार कदम-कदम पर सज गए हैं, लेकिन बाजार का यह आमंत्रण, मीडिया के आमंत्रण जैसा नहीं है। दोनों जगहों पर उसकी चुनौतियां अलग हैं। सौंदर्य के बाजार में स्त्री विरोधी परंपराएं और नाजुकता रूप बदलकर बिक रही है, लेकिन मीडिया के मंच पर स्त्री का आमंत्रण उनके दायित्वबोध, नेतृत्वक्षमता और दक्षता का आमंत्रण भी है। जिस भी नीयत से हो, यह आमंत्रण सार्थक बदलाव की उम्मीद जगाता है। भारतीय स्त्री ने इस आमंत्रण को स्वीकारा है भारतीय मीडिया का चेहरा-मोहरा बदलकर रख दिया है। मीडिया में भी अब वे अपने खिलाफ हो रहे अत्याचार के विरूद्ध भी खड़ी हो रही हैं( प्रसंगःतरूण तेजपाल)।तब महामानव गौतम बुद्ध द्वारा ढाई हजार साल पहले कही गई यह उक्ति के स्त्री होना ही दुःख हैशायद अप्रासंगिक हो जाए और फिर शायद किसी पामेंला बोर्डिस को यह कहने की जरूरत न पड़े कि यह समाज अब भी मिट्टी-गारे की बनी झुग्गी में रहता है।  1990 के बाद आई भूमंडलीकरण और उदारीकरण की आंधी ने सही मायने में भारतीय समाज को सब क्षेत्रों में प्रभावित किया है। मीडिया में प्रवेश कर आई विदेशी पूंजी ने हमारे मीडिया को भी प्रभावित किया। जिसे हमारे समय के श्रेष्ठ संपादक प्रभाष जोशी कभी गुस्से या क्षोभ से आवारा पूंजी भी कहते रहे। भारतीय मीडिया के इस सर्वव्यापी और सर्वग्रासी प्रभाव की ओर समाज भौंचक होकर देख रहा है। इसके व्यापक उठा रहे भारतीय मीडिया में आत्मालोचन की प्रवृत्ति के बावजूद वह सही और सरोकारी विकल्पों की ओर देख नहीं पा रहा है। शायद इसीलिए मीडिया प्राध्यापक मीता उज्जैन को लगता है कि मीडिया में स्त्री की चेहरा है उसके मुद्दे नहीं। अपने लेख में वे लिखती हैं- 90 का दशक उदारीकरण और भूमंडलीकरण की आंधी के बीच एक नई चुनौती लेकर आया। जहां बाजार ने भारत और इंडिया की विभाजन रेखा को और गहरा कर दिया। वहीं दूसरी ओर महिलाओं को संभावनाओं का नया आकाश प्रदान किया। यह दौर था भारत से विश्वसुंदरियां निकलने का, जिसमें हर क्षेत्र में औरतें अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा रही थीं। इसमें उनका आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता दोनों बढ़ते दिख रहे थे।... उदारीकरण ने जहां महिलाओं के लिए नए अवसर दिए वहीं उनके शोषण के रास्ते भी खोल दिए।”8 उदारीकरण के असर ने जहां मीडिया में महिलाओं की भौतिक मौजूदगी को बढ़ा दिया वहीं देखें तो उनके शोषण के अनेक रास्ते भी खोल दिए। इस बात का अध्ययन किया जाना शेष है कि उदारीकरण की इस आंधी के बाद औरतों के खिलाफ जुल्म बढ़े हैं या कम हुए हैं। उनके प्रति अपराध शहरों भी पनप रहे हैं। मुंबई-दिल्ली जैसै शहर भी औरतों के खिलाफ जुल्म ढाते नजर आ रहे हैं। सामूहिक बलात्कार, स्त्री के प्रति हिंसा की खबरों से समाचार माध्यम पटे पड़े हैं। मीता लिखती हैं-इन सारी परिस्थितियों में एक नया प्रश्न खड़ा हुआ है कि महिला या उससे जुड़े मुद्दों की जगह मीडिया में कहां है, किस पेज पर है। मीडिया महिलाओं के चेहरों से सुशोभित है, मगर महिला मुद्दों से मुंह चुराता है।9
   समूचा परिदृश्य बताता है कि मुख्यधारा के मीडिया में स्त्री के सवाल उस तरह से स्थापित नहीं हो सके हैं जिस परिमाण में स्त्री शक्ति का प्रकटीकरण हुआ है। उसके पूरे चरित्र में आज भी एक असंतुलन है। यह एक मीडिया की नाकामी ही है, जिस पर उसे निरंतर आत्मालोचन की जरूरत है।1949 में सिमोन द बोवुआर ने अपनी किताब द सेकंड सेक्स में स्थापना दी थी कि औरत पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है। उनकी बात आज भी प्रासंगिक है क्योंकि हमारे तमाम भौतिक विकास के बावजूद हम मानसिक और सामाजिक स्तर पर स्त्री को वह जगह नहीं दे पाए हैं जिसकी वह हकदार है। मीडिया भी इससे मुक्त नहीं है क्योंकि वह भी इसी सामाजिक व्यवस्था से खाद-पानी पीकर बनता और प्रभावी होता है।
1.      शुक्ला सुधाः महिला पत्रकारिता,प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन, दिल्ली,पृष्ठ-217
2.      शुक्ला सुधाः महिला पत्रकारिता,प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन, दिल्ली,पृष्ठ-222
3.      शुक्ला सुधाः महिला पत्रकारिता,प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन, दिल्ली,पृष्ठ-240
4.      जादवानी जयाः कौन हो तुम पतित पावन पूज्या? मीडिया विमर्श(त्रैमासिक)अक्टूबर-दिसंबर,2009 भोपाल, पृष्ठः19
5.      सिंह विजयबहादुरः एक युगांतर है मीडिया स्त्री के लिएः मीडिया विमर्श(त्रैमासिक)अक्टूबर-दिसंबर,2009 भोपाल, पृष्ठः14
6.      वही
7.      कुमार कमलः स्त्री की बहुतेरी छवियाः मीडिया विमर्श(त्रैमासिक)अक्टूबर-दिसंबर,2009 भोपाल, पृष्ठः10
8.      उज्जैन मीताः यहां स्त्री का चेहरा है, उसके सवाल नहीः मीडिया विमर्श(त्रैमासिक),अप्रैल-जून,2012,पृष्ठः90
9.      वही



लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं तथा मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं।

रविवार, 25 अगस्त 2013

इतनी बेरहम कैसे हो गयी ये मुंबई मेरी जान ?



          अगर मुंबई में भी महफूज नहीं तो कहां जाएं लड़कियां?
                           -संजय द्विवेदी
  मुंबई जो कभी मेरा शहर रहा है। इस शहर में जीवन के तीन बेहद खुशनुमा, बिंदास, दोस्ताना, बेधड़क और जिंदादिल साल मैंने गुजारे हैं।सपने देखे हैं, उनकी तरफ दौड़ लगाई है। अखबारों और वेबसाइट्स की नौकरियां करते हुए इन सालों में कभी नहीं लगा कि मुंबई किसी औरत के लिए इतनी खतरनाक हो सकती है। मुंबई की एक महिला पत्रकार के हुयी सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरे हिलाकर रख दिया है। ऐसा इसलिए क्योंकि मुंबई इस देश की सामूहिक आकांक्षाओं, सामूहिक सपनों का प्रतिनिधि शहर है।
    बीते दिनों की सोचता हूं तो देर रात अखबार के दफ्तर से लौटते वक्त, बहुत कम पर कई बार अलसुबह भी किसी खास काम से निकले तो भी देखा कि औरतों के लिए यह शहर हमेशा ही सुरक्षित और सम्मान देने वाला रहा है। औरतों के खिलाफ होने वाले अत्याचार निजी जीवन में होंगें पर इस तरह हिला देने वाली सामूहिक दुराचार की घटनाएं कम सुनी थीं। इस शहर में रहते हुए मुझे कभी नहीं लगा कि एक लड़की को यहां कोई खतरा हो सकता है। लड़कियां और महिलाएं पुरूषों की तरह ही कभी और किसी भी समय मुझे आती-जाती दिख जाती हैं। कई बार जब अन्य महानगरों की कार्य स्थितियों की तुलना होती है तो मुंबई तमाम मामलों में अन्य शहरों से बेहतर नजर आती है। बेतरह भीड़ के बावजूद एक अनुशासन, एक साथ रहना और अपने सपनों के लिए जीना- यह शहर आपको जरूर सिखाता है। इस शहर के किनारों पर विशाल जलराशि से भरे लहराते समुद्र हममें अपनी ही तरह विशाल होने का साहस भी भरते हैं। उनकी उठती- गिरती लहरें हमें जीवन के उतार-चढ़ाव का भान कराती हैं।
   लेकिन क्या समय बदल गया है या मुंबई भी अब शेष शहरों की तरह एक भीड़ भरी अराजक नगरी में बदल रही है? इसका कास्मो चरित्र कुछ ढीला पड़ रहा है? एक स्त्री के साथ ऐसी अमानवीय बर्बरता सभ्य समाज में कहीं से शोभा नहीं देतीं। दिल्ली-मुंबई जैसे शहर जो हमारे देश के बड़े शहर तो हैं ही हमारे देश का अंतरराष्ट्रीय चेहरा भी हैं। दिल्ली और मुंबई में ऐसी घटनाएं हमें बताती हैं कि कानून का राज ढीला पड़ा है और अपराधियों में अब भय नहीं रहा। मीडिया रिर्पोट्स ही बताती हैं कि मुंबई का आधा पुलिस बल वीआईपी ड्यूटी में लगा है। ऐसे में जनता को किसके हाल पर छोड़ दिया गया है।
   मुंबई शहर जो देश की भर की युवा प्रतिभाओं, लड़के-लड़कियों को इस लिए आकर्षित करता है कि यहां आकर आकर वे अपनी प्रतिभा आजमा सकते हैं और अपने सपनों में रंग भर सकते हैं। आखिर इस शहर को हुआ क्या है कि अपने कर्तव्य को अंजाम देती एक लड़की के रास्ते में वहशी दरिंदे आ जाते हैं। मैं जिस मुंबई को जानता हूं वह प्रतिभाओं को आदर देने वाली, आदमी की काबलियत और उसके हुनर की कद्र करने वाली है। ये देश का वो शहर है जहां आम आदमी के सपने सच होते हैं। भारत के छोटे शहरों-गावों में देखे गए सपने, आकांक्षाओं को आकाश देने वाले इस शहर का दिल आखिर इतना छोटा कैसे हो गया, उसका कलेजा इतना कड़ा कैसे हो गया कि एक लड़की की चीख और उसका आर्तनाद अब इसे विकल नहीं करता? यह वो शहर है जो जिंदगी, जोश और जज्बे को सलाम करता है। यह कभी न रूकने वाली, कभी न ठहरने वाली मुंबई अचानक इतनी संवेदनहीन कैसे हो सकती है? सही मायने में इस घटना ने एक बदलती हुयी मुंबई की तस्वीर पेश की है। जो बर्बर है, और हिंसक भी। वह हिंसा भी औरत के खिलाफ। एक महिला पत्रकार के खिलाफ हुयी यह घटना अब सबक बनना चाहिए कि यह कतई दुहराई न जाए। यह जिम्मेदारी हर मुंबईकर की है और समाज को चलाने वाले लोगों की भी है। आरोपियों को कड़ी सजा के साथ-साथ हमें औरत के प्रति, बच्चियों के प्रति सम्मान जगाने, उनकी सुरक्षा को पुख्ता करने के इंतजाम करने होंगें। हमें सोचना होगा कि मुंबई जैसे शहर में भी अगर लड़कियां सुरक्षित नहीं तो आखिरकार वे कहां जाएं। मुंबई का कास्मो चरित्र, यहां की पुलिस और शेष समाज मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाते हैं जहां औरत के लिए जगह भी है और सम्मान भी। किंतु क्या कुछ सिरफिरे और मनोविकारी लोग इस शहर का यह चरित्र हर लेंगें? इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। मुंबई की जीवन शैली और उसमें छलकता हुआ जीवन इसकी एक खास पहचान है। अगर इस शहर ने औरतों को असुरक्षित बनाने, उनकी आजादी और अवसर छीनने की कोशिशें कीं तो मुंबई, मुंबई नहीं रह जाएगी। इसलिए मुंबई के लोगों का यह दायित्व है कि वे जागरूक नागरिकता का परिचय देते हुए अपने शहर की इस खास पहचान को नष्ट न होने दें।
     मुंबई पुलिस, प्रशासन और शेष समाज की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे सपनों में रंग भरने वाले इस शहर का सिर नीचा न होने दें। मुंबई एक सभ्यता का नाम है, एक संस्कृति का नाम है, एक अवसर का नाम है, वह सपनों की एक ऐसी दुनिया है जिसमें हर कोई आकर अपने झंडे गाड़ना चाहता है, व्यापार, फिल्म, फैशन, शेयर, साहित्य, रंगमंच, कला, मीडिया, प्रदर्शन कलाओं से लेकर किसी विधा का भी आदमी आकर एक बार इस शहर पर छा जाना चाहता है। अगर यह मुंबई का नया बनता वहशी चेहरा हमने ठीक न किया तो यह तमाम कलाओं के साथ बड़ा अपराध होगा। औरतों से ही दुनिया संपूर्ण और खूबसूरत होती है। इन तमाम विधाओं में आ रही औरतों डरकर या शहर में असुरक्षाबोध के साथ काम करेगीं तो मुंबई अपनी पहचान खो देगी।
  इस घटना पर जिस तरह सभी समाजों, कलाकारों, राजनीतिक दलों ने अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए प्रतिक्रिया दी है उसे सराहा जाना चाहिए। मुंबई पुलिस ने भी अपनी तत्परता का परिचय दिया है। आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की तरफ हमें बढ़ना चाहिए और उससे जरूरी यह है कि हम अपनी मुंबई को दोबारा शर्मशार न होने दें, ऐसा संकल्प लें। तभी देशवासी गर्व से कह सकेंगें ये मुंबई है मेरी जान!’

बुधवार, 27 जुलाई 2011

औरत खड़ी बाजार में

- संजय द्विवेदी

हिंदुस्तानी औरत इस समय बाजार के निशाने पर है। एक वह बाजार है जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है। औरत की देह इस समय मीडिया के चौबीसों घंटे चलने वाले माध्यमों का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। लेकिन परंपरा से चला आ रहा देह बाजार भी नए तरीके से अपने रास्ते बना रहा है। देह की बाधाएं हटा रहा है, गोपन को ओपन कर रहा है।

बहस हुई तेजः

समय-समय पर देहव्यापार को कानूनी अधिकार देने की बातें इस देश में भी उठती रहती हैं। हर मामले में दुनिया की नकल करने पर आमादा हमारे लोग वैसे ही बनने पर उतारू हैं। जाहिर तौर पर यह संकट बहुत बड़ा है। ऐसा अधिकार देकर हम देह के बाजार को न सिर्फ कानूनी बना रहे होंगें वरन मानवता के विरूद्ध एक अपराध भी कर रहे होगें। हम देखें तो सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद एक बार फिर वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने की बातचीत तेज हो गयी है। यह बहस हाल में ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में वकीलों के पैनल व विशेषज्ञों से राय उस राय के मांगने के बाद छिड़ी है जिसमें कोर्ट ने पूछा है कि क्या ऐसे लोगों को सम्मान से अपना पेशा चलाने का अधिकार दिया जा सकता है? उनके संरक्षण के लिए क्या शर्तें होनी चाहिए ? कुछ समय पहले कांग्रेस की सांसद प्रिया दत्त ने वेश्यावृत्ति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी थी, तब उन्होंने कहा था कि मेरा मानना है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता प्रदान कर देनी चाहिए ताकि यौन कर्मियों की आजीविका प्रभावित न हो।प्रिया के बयान के पहले भी इस तरह की मांगें उठती रही हैं। कई संगठन इसे लेकर बात करते रहे हैं। खासकर पतिता उद्धार सभा ने वेश्याओं को लेकर कई महत्वपूर्ण मांगें उठाई थीं। हमें देखना होगा कि आखिर हम वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाकर क्या हासिल करेंगें? क्या भारतीय समाज इसके लिए तैयार है कि वह इस तरह की प्रवृत्ति को सामाजिक रूप से मान्य कर सके। दूसरा विचार यह भी है कि इससे इस पूरे दबे-छिपे चल रहे व्यवसाय में शोषण कम होने के बजाए बढ़ जाएगा। आज भी यहां स्त्रियां कम प्रताड़ित नहीं हैं।

चौंकानेवाले आंकड़ेः

दुनिया भर की नजर इस समय औरत की देह को अनावृत करने में है। ये आंकड़े हमें चौंकाने वाले ही लगेगें कि 100 बिलियन डालर के आसपास का बाजार आज देह व्यापार उद्योग ने खड़ा कर रखा है। हमारे अपने देश में भी 1 करोड़ से ज्यादा लोग देहव्यापार से जुड़े हैं। जिनमें पांच लाख बच्चे भी शामिल हैं। सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चेनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए प्लेबायया डेबोनियरतक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाग खासी जगह घेर रहा है। वह पूरा हल्लाबोल 24 घंटे के चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। शायद इसीलिए इंटरनेट के माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 60 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है। मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति दी है। एक आंकड़े के मुताबिक मोबाइल पर अश्लीलता का कारोबार भी पांच सालों में 5अरब डॉलर तक जा पहुंचेगा।

बाजार के केंद्र में भारतीय स्त्रीः

बाजार के केंद्र में भारतीय स्त्री है और उद्देश्य उसकी शुचिता का उपहरण । सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं । यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है-निशाना भारतीय औरतें हैं। ऐसे बाजार में वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाने से जो खतरे सामने हैं, उससे यह एक उद्योग बन जाएगा। आज कोठेवालियां पैसे बना रही हैं तो कल बड़े उद्योगपति इस क्षेत्र में उतरेगें। युवा पीढ़ी पैसे की ललक में आज भी गलत कामों की ओर बढ़ रही है, कानूनी जामा होने से ये हवा एक आँधी में बदल जाएगी। इससे हर शहर में ऐसे खतरे आ पहुंचेंगें। जिन शहरों में ये काम चोरी-छिपे हो रहा है, वह सार्वजनिक रूप से होने लगेगा। ऐसी कालोनियां बस जाएंगी और ऐसे इलाके बन जाएंगें। संभव है कि इसमें विदेशी निवेश और माफिया का पैसा भी लगे। हम इतने खतरों को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। जाहिर तौर पर स्थितियां हतप्रभ कर देने वाली हैं। इनमें मजबूरियों से उपजी कहानियां हैं तो मौज- मजे के लिए इस दुनिया में उतरे किस्से भी हैं। भारत जैसे देश में लड़कियों को किस तरह इस व्यापार में उतारा जा रहा है ये किस्से आम हैं। आदिवासी इलाकों से निरंतर गायब हो रही लड़कियां और उनके शोषण के अंतहीन किस्से इस व्यथा को बयान करते हैं। खतरा यह है कि शोषण रोकने के नाम पर देहव्यापार को कानूनी मान्यता देने के बाद सेक्स रैकेट को एक कारोबार का दर्जा मिल जाएगा। इससे दबे छुपे चलने वाला काम एक बड़े बाजार में बदल जाएगा। इसमें फिर कंपनियां भी उतरेंगी जो लड़कियों का शोषण ही करेगीं। लड़कियों के उत्पीड़न, अपहरण की घटनाएं बढ़ जाएंगी। समाज का पूरी तरह से नैतिक पतन हो जाएगा।

पैदा होंगें कई सामाजिक संकटः

सबसे बड़ा खतरा हमारी सामाजिक व्यवस्था को पैदा होगा जहां देहव्यापार भी एक प्रोफेशन के रूप में मान्य हो जाएगा। आज चल रहे गुपचुप सेक्स रैकेट कानूनी दर्जा पाकर अंधेरगर्दी पर उतर आएंगें। परिवार नाम की संस्था को भी इससे गहरी चोट पहुंचेगी। हमें देखना कि क्या हमारा समाज इस तरह के बदलावों को स्वीकार करने की स्थिति में है। यह भी बड़ा सवाल है कि क्या औरत की देह को उसकी इच्छा के विरूद्ध बाजार में उतारना और उसकी बोली लगाना उचित है? क्या औरतें एक मनुष्य न होकर एक वस्तु में बदल जाएगीं? जिनकी बोली लगेगी और वे नीलाम की जाएंगीं। स्त्री की देह का मामला सिर्फ श्रम को बेचने का मामला नहीं है। देह और मन से मिलकर होने वाली क्रिया को हम क्यों बाजार के हवाले कर देने पर आमादा हैं, यह एक बड़ा मुद्दा है। औरत की देह पर सिर्फ और सिर्फ उसका हक है। उसे यह तय करने का हक है कि वह उसका कैसा इस्तेमाल करना चाहती है। इस तरह के कानून औरत की निजता को एक सामूहिक प्रोडक्ट में बदलने का वातावरण बनाते हैं। अपने मन और इच्छा के विरूद्ध औरत के जीने की स्थितियां बनाते हैं। यह अपराध कम से कम भारत की जमीन पर नहीं होना चाहिए। जहां नारी को एक उंचा स्थान प्राप्त है। वह परिवार को चलाने वाली धुरी है।

स्त्री के सामर्थ्य का आदर कीजिएः

स्त्री आज के समय में वह घर और बाहर दोनों स्थानों अपेक्षित आदर प्राप्त कर रही है। वह समाज को नए नजरिये से देख रही है। उसका आकलन कर रही है और अपने लिए निरंतर नए क्षितिज खोल रही है।ऐसी सार्मथ्यशाली स्त्री को शिखर छूने के अवसर देने के बजाए हम उसे बाजार के जाल में फंसा रहे हैं। वह अपनी निजता और सौंदर्यबोध के साथ जीने की स्थितियां और आदर समाज जीवन में प्राप्त कर सके हमें इसका प्रयास करना चाहिए। हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति धारणा निरंतर बदल रही है। वह नए-नए सोपानों का स्पर्श कर रही है। माता-पिता की सोच भी बदल रही है वे अपनी बच्चियों के बेहतर विकास के लिए तमाम जतन कर रहे हैं। स्त्री सही मायने में इस दौर में ज्यादा शक्तिशाली होकर उभरी है। किंतु बाजार हर जगह शिकार तलाश ही लेता है। वह औरत की शक्ति का बाजारीकरण करना चाहता है। हमें देखना होगा कि भारतीय स्त्री पर मुग्ध बाजार उसकी शक्ति तो बने किंतु उसका शोषण न कर सके। आज में मीडियामय और विज्ञापनी बाजार में औरत के लिए हर कदम पर खतरे हैं। पल-पल पर उसके लिए बाजार सजे हैं। देह के भी, रूप के भी, प्रतिभा के भी, कलंक के भी। हद तो यह कि कलंक भी पब्लिसिटी के काम आ रहे हैं। क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से हमें रिझा रहा है और बोली लगा रहा है। हमें इस समय से बचते हुए इसके बेहतर प्रभावों को ग्रहण करना है। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह ऐसे लोगों की मंशा को समझे जो औरत को बाजार की वस्तु बना देना चाहते है।