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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

सांस्कृतिक संवेदनहीनता के समय में लोकजीवन और मीडिया


-प्रो. संजय द्विवेदी

      मोबाइल समय के दौर में जब हर व्यक्ति कम्युनिकेटर, कैमरामैन और फिल्ममेकर होने की संभावना से युक्त हो, तब असल खबरें गायब क्यों हैं? सोशल मीडिया के आगमन के बाद से मीडिया और संचार की दुनिया के बेहद लोकतांत्रिक हो जाने के ढोल पीटे गए और पीटे जा रहे हैं। लेकिन वे हाशिए आवाजें कहां हैं? जन-जन तक पसर चुके मीडिया में हमारा लोक और उसका जीवन कहां है?
    सांस्कृतिक निरक्षरता और संवेदनहीनता का ऐसा कठिन समय शायद ही इतिहास में रहा हो। इन दिनों सबके अपने-अपने लोक हैं,सबकी अपनी-अपनी नजर है। इस लोक का कोई इतिहास नहीं है, विचार नहीं है। लोक को लोकप्रिय बनाने और कुल मिलाकर कौतुक बना देने के जतन किए जा रहे हैं। ऐसे में मीडिया माध्यमों पर लोकसंस्कृति का कोई व्यवस्थित विमर्श असंभव ही है। हमारी कलाएं भी तटस्थ और यथास्थितिवादी हो गई लगती हैं। लोक समूह की शक्ति का प्रकटीकरण है जबकि बाजार और तकनीक हमें अकेला करती है। लोकसंस्कृति का संरक्षण व रूपांतरण जरूरी है। संत विनोबा भावे ने हमें एक शब्द दिया था- लोकनीतिसाहित्यालोचना में एक शब्द प्रयुक्त होता है- लोकमंगल। हमारी सारी व्यवस्था इस दोनों शब्दों के विरुद्ध ही चल रही है।  लोक को जाने बिना जो तंत्र हमने आजादी के इन सालों में विकसित किया है वह लोकमंगल और लोकनीति दोनों शब्दों के मायने नहीं समझता। इससे जड़ नौकरशाही विकसित होती है, जिसके लक्ष्यपथ अलग हैं। इसके चलते मूक सामूहिक चेतना या मानवता के मूल्यों पर आधारित समाज रचना का लक्ष्य पीछे छूट जाता है।
    राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे हमारा जनसमूह निरक्षर है, मूर्ख नहीं। लोकमानस के पास भाषा भले न हो किंतु उसके पास प्रबल भाव होते हैं। मीडिया समय में जो जोर से कही जाए वही आवाज सही मानी और सुनी जाती है। जो भाषा देते हैं वे नायक बन जाते हैं। जो योजना देते हैं वे नायक बनते हैं। हमारे मीडिया के पास लोक के स्पंदन और उसके भावों को सुनने-समझने और गुनने का अवकाश कहां हैं। उसे तो तेज आवाजों के पास होना है।
  लोक की मूलवृत्ति ही है आनंद।  आनंद पनपता है शांति में, शांति होती है स्थिरता में। शांत आनंदमय जीवन सदियों से भारतीय लोक की परम आकांक्षा रही है। इसलिए हमने लोकमंगल शब्द को अपनाया और उसके अनुरूप जीवन शैली विकसित की। आज इस लोक को खतरा है। उसकी अपनी भाषाएं और बोलियां, हजारों-हजार शब्दों पर संकट है। इस नए विश्वग्राम में लोकसंस्कृति कहां है?मीडिया में उसका बिंब ही अनुपस्थित है तो प्रतिबिंब कहां से बनेगा? हम अपने पुराने को समय का विहंगालोकन करते हैं तो पाते हैं कि हमारा हर बड़ा कवि लोक से आता है। तुलसी, नानक, मीरा, रैदास, कबीर, रहीम, सूर,रसखान सभी, कितने नाम गिनाएं। हमारा वैद्य भी कविराय कहा जाता है। लोक इसी साहचर्य, संवाद, आत्मीय संपर्क, समान संवेदना,समानुभूति से शक्ति पाता है। इसीलिए कई लेखक मानते हैं कि लोक का संगीत आत्मा का संगीत है।
       मीडिया और लोक के यह रिश्ते 1991 के बाद और दूर हो गए। उदारीकरण, भूंडलीकरण और मुक्त अर्थव्यवस्था के मूल्य अलग हैं। यह परिर्वतनों का समय भी था और मीडिया क्रांति का भी। इस दौर में मीडिया में पूंजी बढ़ी, चैनलों की बाढ़ आ गयी, अखबारों को सारे पन्ने रंगीन हो गए, निजी एफएम पर गाने गूंजने लगे, वेबसाइटों से एक नया सूचना प्रवाह सामने था इसके बाद आए सोशल मीडिया ने सारे तटबंध तोड़ दिए। अब सूचनाएं नए तरीके परोसी और पोसी जा रहीं थीं। जहां रंगीन मीडिया का ध्यान रंगीनियों पर था। वहीं वे क्लास के लिए मीडिया को तैयार कर रहे थे। मीडिया से उजड़ते गांवों और लोगों की कहानियां गायब थीं। गांव,गरीब, किसान की छोड़िए- शहर में आकर संघर्ष कर रहे लोग भी इस मीडिया से दूर थे। यह आभिजात्य नागर जीवन की कहानियां सुना रहा था, लोकजीवन उसके लिए एक कालातीत चीज है। खाली गांव, ठूंठ होते पेड़. उदास चिड़िया, पालीथीन के ग्रास खाती गाय, फार्म हाउस में बदलते खेत, आत्महत्या करते किसान एक नई कहानी कह रहे थे। बाजारों में चमकती चीजें भर गयी थीं और नित नए माल बन रहे थे। पूरी दुनिया को एक रंग में रंगने के लिए बाजार के जादूगर निकले हुए थे और यह सारी जंग ही लोक के विरुद्ध थी। यह समय शब्द की हिंसा का भी समय था। जब चीख-चिल्लाहटें बहुत थीं। लोकजीवन की कहानियां थीं, वहीं वे संवेदना के साथ नहीं कौतुक की तरह परोसी जा रही थीं। यह एक नया विश्वग्राम था, जिसके पास वसुधैव कुटुम्बकम् की संवेदना नहीं थी। भारतीय मीडिया के सामने यह नया समय था। जिसमें उसके पारंपरिक उत्तरदायित्व का बोध नहीं था। चाहिए यह था कि भारत से भारत का परिचय हो, मीडिया में हमारे लोकजीवन की छवि दिखे। इसके लिए हमारे मीडिया और कुशल प्रबंधकों को गांवों की ओर देखना होगा। खेतों की मेड़ों पर बैठना होगा। नदियों के किनारे जाना होगा। भारत मां यहीं दिखेगी। एक जीता-जागता राष्ट्रपुरुष यहीं दिखेगा। वैचारिक साम्राज्यवाद के षड़यंत्रों को समझते हुए हमें अपनी विविधता-बहुलता को बचाना होगा।अपनी मीडिया दुनिया को सार्थक बनाना है। जनसरोकारों से जुड़ा मीडिया ही सार्थक होगा। मीडिया अन्य व्यवसायों की तरह नहीं है अतः उसे सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।  आज भी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सच्ची कहानियों को सामने लेकर आ रहा है। पूरी संवेदना के साथ भारत की माटी के सवालों को उठा रहा है। इस प्रवाह को और आगे ले जाने की जरूरत है। सरोकार ही हमारे मीडिया को सशक्त बनाएंगे, इसमें नागर जीवन की छवि भी होगी तो लोक जीवन की संवेदना भी।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

पं. बृजलाल द्विवेदी अभा साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत होंगें प्रेम जनमेजय


भोपाल,1 जनवरी। हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिलभारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष व्यंग्य यात्रा (दिल्ली) के संपादक डा.प्रेम जनमेजय  को दिया जाएगा। डा. प्रेम जनमेजय साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ देश के जाने-माने व्यंग्यकार एवं लेखक हैं। वे पिछले नौ वर्षों से व्यंग्य विधा पर केंद्रित महत्वपूर्ण पत्रिका व्यंग्य यात्रा का संपादन कर रहे हैं।

      पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव, रमेश नैयर, डा. सच्चिदानंद जोशी, डा.सुभद्रा राठौर और जयप्रकाश मानस शामिल हैं। इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज(गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश ( दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाज और सद्भावना दर्पण( रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज को दिया जा चुका है। त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिलभारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रूपए, शाल, श्रीफल, प्रतीकचिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है। सम्मान कार्यक्रम 7, फरवरी, 2014 को गांधी भवन, भोपाल में आयोजित किया गया है। मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्कार, बुद्धिजीवी और पत्रकार हिस्सा लेगें। इस अवसर मीडिया और लोकजीवन विषय पर व्याख्यान भी आयोजित किया जाएगा।

रविवार, 8 जनवरी 2012

मीडिया विमर्श के आयोजन में जुटे मीडिया दिग्गज और राजनेता





रायपुर। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं सांसद प्रकाश जावडेकर का कहना है कि प्रिट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के विस्तार के बाद आने वाला समय सिटीजन जर्नलिज्म का है। वे यहां जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श के पांच साल पूरे होने पर रायपुर में मीडिया और लोकतंत्र विषय पर एक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। वृंदावन हाल में आयोजित इस समारोह में मीडिया विमर्श के वार्षिकांक का विमोचन किया गया।

कार्यक्रम के मुख्यअतिथि की आसंदी से बोलते हुए जावडेकर रोचक शैली में कई गंभीर बातें कहीं। मसलन पहले वे चार अखबार चार घंटे में पढ़ पाते थे किंतु अब चालीस अखबार चालीस मिनट में पढ़ लेते हैं। उनका कहना था कि अब न्यूज और व्यूज में कोई अंतर नहीं दिखता। पहले लोग मिशन की खातिर काम करते थे और अब कमीशन के लिए। सबसे पहले खबर दिखाने की होड़ का हाल ऐसा कि कुछ उत्साही तो खबर घटने से पहले ही दिखा देते हैं। प्रिंट में अब मात्र प्रिंट लाइन ही वह स्थान बचा है जहां प्रकाशन संबंधी सूचना होती है। शेष पूरे स्थान पर पेड न्यूज का बोलबाला होता है। जावडेकर ने कहा कि इस संबंध में सिर्फ प्रेस ही दोषी नहीं है जो पैसे देकर खबरें छपवा रहे हैं वह भी दोषी हैं। सजा दोनों को मिलनी चाहिए। ट्विटर, फेसबुक जैसे माध्यमों की लोकप्रियता और उसके माध्यम से खबरों के एक नए संसार पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि यह एक सकारात्मक बदलाव है तथा आने वाले समय में यह सिटीजन जर्नलिज्म सामाजिक जीवन में एक बड़ी भूमिका अदा करेगा। सत्ता वर्ग देश-विदेश दोनों में इसके असर को देख चुका है।

मीडिया ही लोकतंत्र की आत्माः जावडेकर ने कहा कि मीडिया ही लोकतंत्र की आत्मा है। आज मीडिया जिस दिशा में जा रहा है, उसे उस पर सोचना और विचार करना अत्यंत आवश्यक है। मीडिया का परिदृश्य पहले की तुलना में काफी बदल गया है। प्रेस की आजादी का समर्थन करते हुए जावडेकर ने कहा कि मीडिया पर किसी तरह की पाबंदी नहीं होनी चाहिए। आपातकाल की याद दिलाते हुए उनका कहना था कि हमने प्रेस की आजादी की जंग लड़ी है और उसके लिए जेल भी गए हैं। लोकतंत्र का मतलब ही है भिन्न-भिन्न राय। यानि मैं आपकी राय से सहमत नहीं हूं फिर भी आपको आपकी बात कहने का पूरा हक है। जावडेकर ने कहा कि इस सबके बावजूद जिस तरह के खतरे उपस्थित हैं उसमें मीडिया के लिए यह जरूरी है कि वह अपना स्व-नियंत्रण करे और सरकार को बंदिशें लगाने के अवसर न दे।

सामाजिक संवाद जरूरीः कार्यक्रम के मुख्यवक्ता माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने पत्रकारिता की तुलना लेंस से की जो कभी किसी चीज को छोटा, कभी बड़ा तो कभी जला देता है। उनका कहना था कि लोकतंत्र में सामाजिक संवाद बहुत जरूरी है और नया मीडिया इसे संभव बनाता है। न्यू मीडिया अपने स्वभाव में ज्यादा लोकतांत्रिक है। कार्यक्रम में कृषि मंत्री चंद्रेशेखर साहू, लेखिका जया जादवानी, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति डा. सच्चिदानंद जोशी. पत्रिका के संपादक डा. श्रीकांत सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए। समारोह की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने की।

पत्रकार एवं लेखक हुए सम्मानितः इस मौके पर छत्तीसगढ़ के लेखक और पूर्व आईएएस अधिकारी डा. सुशील त्रिवेदी, जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ के रिपोर्टर विश्वेश ठाकरे, बस्तर के पत्रकार सुरेश रावल, सृजनगाथा डाट काम के संपादक जयप्रकाश मानस, मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए डा. गोपा बागची को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर, बसंतकुमार तिवारी, बबन प्रसाद मिश्र, हरिभूमि के प्रबंध संपादक हिमांशु द्विवेदी, नई दुनिया के महाप्रबंधक मनोज त्रिवेदी, छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल के अध्यक्ष सुभाष राव, वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र पाण्डेय,हज कमेटी के अध्यक्ष डा. सलीम राज, जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ के निदेशक दिनेश गोयल, सीईओ केके नायक, एच आर हेड निवेदिता कानूनगो, फाइनेंस हेड गिरिराज गर्ग, विवेक पारख, शताब्दी पाण्डेय, बस्तर के भाजपा नेता संजय पाण्डेय मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन डा. सुभद्रा राठौर ने तथा आभार प्रदर्शन प्रभात मिश्र ने किया। अंत में अतिथियों को प्रतीक चिन्ह कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने भेंट किए।

रविवार, 7 अगस्त 2011

लोकतांत्रिक चेतना का देश है भारतः विजयबहादुर सिंह


स्थानीय विविधताएं ही करेंगी पश्चिमी संस्कृति के हमलों का मुकाबला

भोपाल, 8 जुलाई 2011। हिंदी साहित्य के प्रख्यात आलोचक एवं विचारक डा.विजयबहादुर सिंह का कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक चेतना का देश है। इसकी स्थानीय विविधताएं ही बहुराष्ट्रीय निगमों और पश्चिमी संस्कृति के साझा हमलों का मुकाबला कर सकती हैं। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा भारत का सांस्कृतिक का अवचेतन विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि ज्ञान और संस्कृति अगर अलग-अलग चलेंगें तो यह मनुष्य के खिलाफ होगा। प्रख्यात विचारक धर्मपाल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनके द्वारा उठाया गया यह सवाल कि हम किसके संसार में रहने लगे हैं, आज बहुत प्रासंगिक हो उठा है। हिंदुस्तान के लोग आज दोहरे दिमाग से काम कर रहे हैं, यह एक बड़ी चिंता है। सभ्यता में हम पश्चिम की नकल कर रहे हैं और धर्म के पालन में हम अपने समाज में लौट आते हैं। डा. सिंह ने कहा कि 1947 के पहले स्वदेशी, सत्याग्रह और अहिंसा हमारे मूल्य थे किंतु आजादी के बाद हमने परदेशीपन, मिथ्याग्रह और हिंसा को अपना लिया है। यह दासता का दिमाग लेकर हम अपनी पंचवर्षीय योजनाएं बनाते रहे, संविधान रचते रहे और नौकरशाही भी उसी दिशा में काम करती रही। ऐसे में सोच वा आदर्श में फासले बहुत बढ़ गए हैं। हमारा पूरा तंत्र आम आदमी के नहीं ,सरकार के पक्ष में खड़ा दिखता है। हमारा सामाजिक जीवन और लोकजीवन दोनों अलग-अलग दिशा में चल रहे हैं। जबकि हिंदुस्तान समाजों का देश नहीं लोक है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुस्तक हिंद स्वराज का उल्लेख करते हुए विजय बहादुर सिंह ने कहा कि पश्चिम कभी भी हमारा आदर्श नहीं हो सकता, क्योंकि यह सभ्यता अपने को स्वामी और बाकी को दास समझती है। उनका कहना था कि कोई भी क्रांति तभी सार्थक है, जब उससे होने वाले परिवर्तन मनुष्यता के पक्ष में हों। आजादी के बाद जो भी बदलाव किए जा रहे हैं वे वास्तव में हमारी परंपरा और संस्कृति से मेल नहीं खाते। भारत की सांस्कृतिक चेतना त्याग में विश्वास करती है, क्योंकि वह एक आदमी को इंसान में रूपांतरित करती है। शायद इसीलिए गालिब ने लिखा कि आदमी को मयस्सर नहीं इंशा होना। भारत की संस्कृति इंसान बनाने वाली संस्कृति है पर हम अपना रास्ता भूलकर उस पश्चिम का अंधानुकरण कर रहे हैं, जिसे गांधी ने कभी शैतानी सभ्यता कहकर संबोधित किया था। इस अवसर पर डा. श्रीकांत सिंह, पुष्पेंद्रपाल सिंह, डा. संजीव गुप्ता, पूर्णेंदु शुक्ल, शलभ श्रीवास्तव, प्रशांत पाराशर और जनसंचार विभाग के विद्यार्थी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

लोकमंगल हो मीडिया का ध्येयः स्वामी शाश्वतानंद


भोपाल, 6 अगस्त,2011। महामंडलेश्वर डा.स्वामी शाश्वतानंद गिरि का कहना है कि लोकमंगल अगर पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं है तो वह व्यर्थ है। हमें हमारे सामाजिक संवाद और पत्रकारिता में लोकमंगल के तत्व को शामिल करना पड़ेगा। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा संवाद और पत्रकारिता का अध्यात्म विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अध्यात्म के बिना प्रेरणा संभव नहीं है। अध्यात्म ही किसी भी क्षेत्र में हमें लोकमंगल की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि अरविंद घोष, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी भी पत्रकार थे किंतु उनकी पत्रकारिता, उनकी आत्मा का स्पंदन थी, आज जबकि पूंजी का स्पंदन ही पत्रकारिता की प्रेरणा बन रहा है। उन्होंने युवा पत्रकारों से आग्रह किया कि वे अपनी पत्रकारिता में सकारात्मकता को शामिल करें तभी हम भारत के मीडिया का मान बढ़ा सकेंगें। शरीर के तल पर मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं, मूल्य ही हमें अलग करते हैं। हमारे लिए मनुष्यता बहुत महत्वपूर्ण है।

डा. गिरि ने कहा कि मन से लिखा और मन से बोला गया शब्द ही पढ़ा और सुना जाएगा। बुद्धि से लिखे और बोले हुए का कोई महत्व नहीं है, वह बुद्धि से ही पढ़ा और सुना जाएगा। हमारे लेखन में अगर हमारी आत्मा न होगी तो वह प्राणहीन हो जाएगा। प्रेमचंद और निराला जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ये इसलिए दिल से पढ़े गए, क्योंकि उन्होंने दिल से लिखा। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों ने डा. गिरि से प्रश्न भी पूछे।

कार्यक्रम के प्रारंभ में कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, रजिस्ट्रार डा. चंदर सोनाने, प्रो. आशीष जोशी, दीपक शर्मा, पवित्र श्रीवास्तव, पुष्पेंद्र पाल सिंह, डा. श्रीकांत सिंह, डा. पी. शशिकला, डा. आरती सारंग, वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा,पूर्व कुलसचिव पी. एन. साकल्ले आदि ने पुष्पहार से महामंडलेश्वर डा. गिरि का स्वागत किया। संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

बुधवार, 27 जुलाई 2011

देशभक्ति की भावना जगाने की जरूरतः विजयवर्गीय


कारगिल विजय दिवस का आयोजन

भोपाल 26 जुलाई। देशवासियों में राष्ट्र की सेवा के जज्बे की कमी नहीं है लेकिन मौजूदा माहौल में नकारात्मकता हावी हो गई है। इसने देशभक्ति की भावना को गौण कर दिया है। मीडिया ही इस माहौल को एक सकारत्मक दिशा दे सकता है। यह बात मप्र के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में आयोजित कारगिल विजय दिवस समारोह में कही। वे कार्यक्रम के मुख्य अतिथि की आसंदी से बोल रहे थे। इस अवसर पर श्री विजयवर्गीय ने देश भक्ति गीत के माध्यम से विद्यार्थियों से देश की रक्षा की अपील की

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार एवं सांसद तरूण विजय ने कहा कि दिल्ली में बैठी सरकार को कारगिल विजय दिवस मानने की फुर्सत ही नहीं है। वह सिर्फ पैसे के पीछे भागती है। कांग्रेस शासन की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि देश ने आजादी के बाद जो जमीन खोई है, उसके लिए तत्कालीन केंद्र सरकारें जिम्मेदार है। सैनिकों की उपेक्षा से व्यथित तरूण विजय ने कहा कि देश का युवा आऊटसोर्सिंग द्वारा लाया जा रहे दूसरे देशों का काम करना पसंद कर रहा है, पर वह सेना में नहीं जाना चाहता। लोग सैनिकों के काम को पुण्य मानते हैं किंतु सैनिकों का सम्मान न तो सरकार कर रही है और न ही समाज। उन्होंने कहा कि कारगिल दिवस को गौरव-गाथा के रूप में याद किया जाना चाहिए न कि सैनिक सुविधा की माँग करते हुए उनके अभिभावकों की बेचारगी के रूप में। उन्होंने विद्यार्थियों को सेना और सैनिकों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने के लिए प्रेरित किया।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि कर्नल आजाद कृष्ण चतुर्वेदी ने अपने सेना के अनुभव के माध्यम से कारगिल युद्ध की संवेदनशीलता को महसूस कराने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि मई के करीब कारगिल युद्ध को होना संयोग नहीं था, बल्कि यह पाकिस्तान की एक सोची-समझी रणनीति थी। लेकिन कारगिल युद्ध की हार के बाद पाकिस्तान यह समझ गया कि वह किसी भी हालात में भारत से नहीं जीत सकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि ऐसा महसूस हो रहा है कि देशवासियों की राष्ट्रप्रेम की भावना में कमी आई है। उन्होंने कहा कि देश के नागरिकों को देश की रक्षा को बोध स्वयं में होना चाहिए, रक्षा करने का काम केवल सैनिकों का ही नहीं समझना चाहिए, यह हर नागरिक का कर्तव्य है।

कार्यक्रम का आरम्भ दीप प्रज्जवलन के साथ हुआ । अतिथियों को पुष्प गुच्छ,प्रतीक चिन्ह एवं पुस्तकें देकर स्वागत किया गया। संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी एवं आभार प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष अमिताभ भटनागर ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा, विजयमनोहर तिवारी, रामभुवन सिंह कुशवाह, सुरेश शर्मा, अंजनी कुमार झा, पीएन साकल्ले, दीपक शर्मा, विकास बोंद्रिया, जीके छिब्बर, डा. श्रीकांत सिंह, डा. पवित्र श्रीवास्तव, पुष्पेंद्रपाल सिंह, पी.शशिकला, रजिस्ट्रार चंदर सोनाने , डा. अविनाश वाजपेयी, ,सौरभ मालवीय, डा. मोनिका वर्मा, लालबहादुर ओझा, डा. संजीव गुप्ता, डा. राखी तिवारी, अभिजीत वाजपेयी, मनीष माहेश्वरी सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे।

इस अवसर पर उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने विद्यार्थियों की मांग पर कर चले हम फिदा जानोतन साथियों...अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। गीत गाकर माहौल को भावुक बना दिया। उनकी सुर-लहरियों पर उनके सुर में सुर मिलाकर विद्यार्थी भी गीत के बोलों पर झूम उठे। इससे पूरा माहौल सरस हो गया।

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

‘लोक’ मीडिया के लिए डाउन मार्केट चीजः संजय द्विवेदी


लोकसाहित्य और मीडिया विषय पर व्याख्यान

मुलताई (बैतूल-मप्र)। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष एवं मीडिया विश्लेषक संजय द्विवेदी का कहना है कि लोक मीडिया के लिए डाउन मार्केट चीज है। लोक का बिंब जब हमारी आंखों में ही नहीं है तो उसका प्रतिबिंब क्या बनेगा। वे यहां मुलताई के शासकीय महाविद्यालय में लोकसाहित्य के विविध आयामविषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी के समापन सत्र में लोकसाहित्य और मीडिया विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि की आसंदी से उन्होंने कहा कि लोक को विद्वान कितना भी जटिल मानें, उत्तरआधुनिकतावादी उसे अश्पृश्य मानें, किंतु उसकी ताकत को नहीं नकारा जा सकता।

उन्होंने कहा कि सारी दुनिया को एक रंग में रंग देने की कोशिश खतरनाक है। जबकि राइट टू डिफरेंट एक मानवीय विचार है और इसे अपनाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि कोई भी समाज सिर्फ आधुनिकताबोध के साथ नहीं जीता, उसकी सांसें तो लोक में ही होती हैं। भारतीय जीवन की मूल चेतना तो लोकचेतना ही है। नागर जीवन के समानांतर लोक जीवन का भी विपुल विस्तार है। खासकर हिंदी का मन तो लोकविहीन हो ही नहीं सकता। हिंदी के सारे बड़े कवि तुलसीदास, कबीर, रसखान, मीराबाई, सूरदास लोक से ही आते हैं। नागरबोध आज भी हिंदी जगत की उस तरह से पहचान नहीं बन सका है।

श्री द्विवेदी ने कहा कि लोकचेतना तो वेदों से भी पुरानी है। क्योंकि हमारी परंपरा में ही ज्ञान बसा हुआ है। ज्ञान, नीति-नियम, औषधियां, गीत, कथाएं, पहेलियां सब कुछ इसी लोक का हिस्सा हैं। हिंदी अकेली भाषा है जिसका चिकित्सक भी कविराय कहा जाता था। उनका कहना था कि बाजार आज सारे मूल्य तय कर रहा है और यह लोक को नष्ट करने का षडयंत्र है। यह सही मायने में बिखरी और कमजोर आवाजों को दबाने का षडयंत्र भी है। इसका सबसे बड़ा शिकार हमारी बोलियां बन रही हैं, जिनकी मौत का खतरा मंडरा रहा है। अंडमान की बोनाम की भाषा खत्म होने के साथ इसका सिलसिला शुरू हो गया है। भारतीय भाषाओं और बोलियों के सामने यह सबसे खतरनाक समय है। उन्होंने आज के मुख्यधारा मीडिया के मीडिया के पास इस संदर्भों पर काम करने का अवकाश नहीं है। किंतु समाज के प्रतिबद्ध पत्रकारों, साहित्यकारों को आगे आकर इस चुनौती को स्वीकार करने की जरूरत है क्योंकि लोक की उपेक्षा और बोलियों को नष्ट कर हम अपनी प्रदर्शन कलाओं, गीतों, शिल्पों और विरासतों को गंवा रहे हैं। जबकि इसके संरक्षण की जरूरत है।

समापन समारोह की मुख्यअतिथि प्रख्यात साहित्यकार डा. विद्याविंदु सिंह (लखनऊ) ने कहा कि लोकचेतना को जागृत करके ही संवेदनाएं बचाई जा सकती हैं और संवेदना से ही कोई समाज शक्तिशाली होता है। इससे देश की एकता भी मजबूत होगी। उन्होंने नई पीढ़ी से अपील की वे गांवों में जाएं और लोकसाहित्य के संरक्षण के प्रयासों में लगें। उनका संग्रहण करें और अपनी इस विरासत को बचा लें। कार्यक्रम का संचालन छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर में प्रोफेसर डा.सुभद्रा राठौर ने किया। आभार प्रदर्शन प्राचार्य डा. वर्षा खुराना ने किया। समापन समारोह में महाविद्यालय की जनभागीदारी समिति के अध्यक्ष ऐनलाल जैन, मीता अग्रवाल(राजनांदगांव-छत्तीसगढ़), डा.गिरिजा अग्रवाल ,डा. छेदीलाल कांस्यकार (औरंगाबाद-बिहार), डा. सुरेश माहेश्वरी (अमलनेर-महाराष्ट्र) ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

सोमवार, 6 सितंबर 2010

सत्ता से आलोचनात्मक विमर्श का रिश्ता बनाएं लेखकःसंजय


पत्रकार रमण किरण के काव्य संग्रह का विमोचन समारोह

बिलासपुर(छत्तीसगढ़)। कवि, पत्रकार ,पेंटर और प्रेस फोटोग्राफर व्ही.व्ही. रमण किरण के कविता संग्रह “मर्म का अन्वेषणः 37 कविताएं ”का विमोचन समारोह बिलासपुर के होटल सेंट्रल पाइंट में सम्पन्न हुआ। आयोजन के मुख्यअतिथि गजलकार एवं टीवी पत्रकार आलोक श्रीवास्तव (दिल्ली) थे और अध्यक्षता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने की। इस अवसर पर रविवार डाटकाम के संपादक आलोक प्रकाश पुतुल, प्रख्यात कथाकार शशांक, साहित्यकार रामकुमार तिवारी भी विशेष रूप से मौजूद थे।कार्यक्रम में आलोक श्रीवास्तव ने अपनी गजलें सुनाकर श्रोताओं की काफी प्रशंसा पायी।
कार्यक्रम के अध्यक्ष की आसंदी से बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक संजय द्विवेदी ने कहा कि लेखकों को अपने लेखन के माध्यम से सत्ता के साथ आलोचनात्मक विमर्श का रिश्ता बनाना चाहिए। इससे ही वह अपने धर्म का निवर्हन कर सकेंगें। उन्होंने कहा कि विचारधाराओं की आड़ लेकर हमें हिंसा और आतंकी गतिविधियों के महिमामंडन या समर्थन से बचना चाहिए। क्योंकि भारत का लोकतंत्र बहुत मुश्किल से अर्जित हुआ है और इसे वास्तविक जनतंत्र में बदलने के लिए हमें लंबी लड़ाई लड़नी है। उन्होंने कहा कि पूरे देश में इस समय जिस तरह के कठिन सवाल खड़े हैं उनका उत्तर हमारी राजनीति के पास नहीं है क्योंकि वह स्वयं इन समस्याओं के गहराने के लिए जिम्मेदार है। साहित्यकारों और पत्रकारों को अपने धर्म का निवर्हन करते हुए समाज का मार्गदर्शन करना चाहिए। श्री द्विवेदी ने कहा कि इस कठिन समय मौजूद सवालों के ठोस और वाजिब हल लेखकों को ही तलाशने होंगें। इस मौके पर रमण किरण को शुभकामनाएं देते हुए संजय द्विवेदी ने कहा कि प्रेस फोटोग्राफर, पेंटर और कवि के रूप में उनका हस्तक्षेप स्वागत योग्य है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में रमण किरण ने संजय द्विवेदी और आलोक श्रीवास्तव को अपनी पेंटिंग भेंट की। आभार प्रदर्शन रोटरी क्लब, बिलासपुर के अध्यक्ष रणबीर सिंह मरहास ने किया एवं संचालन सुप्रिया भारतीयन ने किया। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष पं. श्यामलाल चतुर्वेदी, सतीश जायसवाल, कपूर वासनिक, डा. पालेश्वर शर्मा, डा.विनयकुमार पाठक, डा. गंगाधर पुष्कर, डा. सत्यभामा अवस्थी, प्रियनाथ तिवारी, पूर्व विधायक चंद्रप्रकाश वाजपेयी, कृष्णकुमार यादव राजू, डा. अजय पाठक, विश्वेष ठाकरे, प्रतीक वासनिक, यशवंत गोहिल, बृजेश सिंह, सुनील शर्मा सहित नगर के अनेक पत्रकार, साहित्यकार और बुद्धिजीवी मौजूद रहे।

संजय द्विवेदी को अपनी पेंटिग भेंट करते हुए रमण किरण


बिलासपुर(छत्तीसगढ़)5 सितंबर।
कवि,साहित्यकार,पेंटर और फोटोग्राफर व्ही.व्ही. रमण किरण के कविता संग्रह मर्म का अन्वेशणः 37 कविताएं का विमोचन समारोह बिलासपुर के होटल सेंट्रल पाइंट में सम्पन्न हुआ। आयोजन के मुख्यअतिथि गजलकार एवं टीवी पत्रकार आलोक श्रीवास्तव थे और अध्यक्षता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने की। इस अवसर पर रमन किरण ने अपनी बनाई पेंटिंग भी मुख्यअतिथि एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष को भेंट की।

रमन किरण के कविता संग्रह का विमोचन


बिलासपुर(छत्तीसगढ़)5 सितंबर
कवि,साहित्यकार,पेंटर और फोटोग्राफर व्ही.व्ही. रमण किरण के कविता संग्रह मर्म का अन्वेशणः 37 कविताएं का विमोचन समारोह बिलासपुर के होटल सेंट्रल पाइंट में सम्पन्न हुआ। आयोजन के मुख्यअतिथि गजलकार एवं टीवी पत्रकार आलोक श्रीवास्तव थे और अध्यक्षता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने की। इस अवसर पर रविवार डाटकाम के संपादक आलोक प्रकाश पुतुल, कथाकार शशांक, साहित्यकार रामकुमार तिवारी भी विशेष रूप से मौजूद थे।
कार्यक्रम में आलोक श्रीवास्तव ने अपनी गजलें सुनाकर श्रोताओं की काफी प्रशंसा पायी।

संजय द्विवेदी की नई किताबः मीडिया नया दौर-नई चुनौतियां


भारतीय मीडिया की सच्ची पड़ताल
पुस्तक का नामः मीडियाः नया दौर नई चुनौतियां
लेखकः संजय द्विवेदी
प्रकाशकः यश पब्लिकेशन्स, 1 / 10753 सुभाष पार्क, गली नंबर-3, नवीन शाहदरा, नीयर कीर्ति मंदिर, दिल्ली-110031, मूल्यः 150 रुपये मात्र

नए दौर में मीडिया दो भागों में बंटा हुआ है, एक प्रिंट मीडिया और दूसरा इलेक्ट्रानिक मीडिया। भाषा और तेवर भी दोनों के अलग–अलग हैं। खबरों के प्रसार की दृष्टि से इलेक्ट्रानिक मीडिया तेज और तात्कालिक बहस छेड़ने में काफी आगे निकल आया है। प्रभाव की दृष्टि से प्रिंट मीडिया आज भी जनमानस पर अपनी गहरी पैठ रखता है। फिर वे कौन से कारण हैं कि आज मीडिया की कार्यशैली और उसके व्यवहार को लेकर सबसे ज्यादा आलोचना का सामना मीडिया को ही करना पड़ रहा है। चौथे खंभे पर लगातार प्रहार हो रहे हैं। समाज का आईना कहे जाने वाले मीडिया को अब अपने ही आईने में शक्ल को पहचानना कठिन हो रहा है। पत्रकारिता के सरोकार समाज से नहीं बल्कि बाजार से अधिक निकट के हो गये हैं। नए दौर का मीडिया सत्ता की राजनीति और पैसे की खनक में अपनी विरासत के वैभव और त्याग का परिष्कार कर चुका है। यानी मीडिया का नया दौर तकनीक के विकास से जितना सक्षम और संसाधन संपन्न हो चुका है उससे कहीं ज्यादा उसका मूल्यबोध और नैतिक बल प्रायः पराभव की तरफ बढ़ चला है।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘मीडिया- नया दौर नई चुनौतियां’ इन सुलगते सवालों के बीच बहस खड़ी करने का नया हौसला है। संजय द्विवेदी अपनी लेखनी के जरिए ज्वलंत मुद्दों पर गंभीर विमर्श लगातार करते रहते हैं। लेखक और पत्रकार होने के नाते उनका चिन्तन अपने आसपास के वातावरण के प्रति काफी चौकन्ना रहता है, इसलिए जब वे कुछ लिखते हैं तो उनकी संवेदनाएं बरबस ही मुखर होकर सामने आती हैं। राजनीति उनका प्रिय विषय है लेकिन मीडिया उनका कर्मक्षेत्र है। संजय महाभारत के संजय की तरह नहीं हैं जो सिर्फ घटनाओं को दिखाने का काम करते हैं, लेखक संजय अपने देखे गये सच को उसकी जड़ में जाकर पड़ताल करते हैं और सम्यक चेतना के साथ उन विमर्शों को खड़ा करने का काम करते हैं जिसकी चिंता पूरे समाज और राष्ट्र को करना चाहिए।
यह महज वेदना नहीं है बल्कि गहरी चिंता का विषय भी है कि आजादी के पहले जिस पत्रकारिता का जन्म हुआ था इतने वर्षों बाद उसका चेहरा-मोहरा आखिर इतना क्यों बदल गया है कि मीडिया की अस्मिता ही खतरे में नजर आने लगी है। पत्रकार संजय लंबे समय से मीडिया पर उठ रहे सवालों का जवाब तलाशने की जद्दोजहद करते हैं। कुछ सवाल खुद भी खड़े करते हैं और उस पर बहस के लिये मंच भी प्रदान करते हैं। बाजारवादी मीडिया और मीडिया के आखिरी सिपाही स्व.प्रभाष जोशी के बीच की जंग तक के सफर को संजय काफी नजदीक से देखते हैं और सीपियों की तरह इकट्ठा करके लेखमालाओं के साथ प्रस्तुत करते हैं। संजय के परिश्रमी लेखन पर प्रख्यात कवि श्री अष्टभुजा शुक्ल कहते हैं – “संजय के लेखन में भारतीय साहित्य, संस्कृति और इसका प्रगतिशील इतिहास बार-बार झलक मारता है बल्कि इन्हीं की कच्ची मिट्टी से लेखों के ये शिल्प तैयार हुए हैं। अतः उनका लेखन तात्कालिक सतही टिप्पणियां न होकर, दीर्घजीवी और एक निर्भीक, संवेदनशील तथा जिन्दादिल पत्रकार के गवाह हैं। ऐसे ही शिल्प और हस्तक्षेप किसी भी समाज की संजीवनी है।”
यह सच है कि संजय के लेखों में साहित्य, संस्कृति और प्रगतिशील इतिहास का अदभुत संयोग नजर आता है। इससे भी अधिक यह है कि वे बेलाग और त्वरित टिप्पणी करने में आगे रहते हैं। वैचारिक पृष्ठभूमि में विस्तार से प्रकाश डालना संजय की लेखनी का खास गुण हैं, जिससे ज्यादातर लोग सहमत हो सकते हैं। पं.माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर कमल दीक्षित ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि “ श्री द्विवेदी प्रोफेशनल और अकादमिक अध्येता – दोनों ही हैं। वे पहले समाचार-पत्रों में संपादक तक की भूमिका का निर्वाह कर चुके हैं। न्यूज चैनल में रहते हुए उन्होंने इलेक्ट्रानिक मीडिया को देखा समझा है। अब वे अध्यापक हैं। ऐसा व्यक्ति जब कोई विमर्श अपने विषय से जुड़कर करता है तो वह अपने अनुभव तथा दृष्टि से संपन्न होता है, इस मायने में संजय द्विवेदी को पढ़ना अपने समय में उतरना है। ये अपने समय को ज्यादा सच्चाई से बताते हैं।” संजय के लेखन के बारे में दो विद्वानों की टिप्पणियां इतना समझने में पर्याप्त है कि उनकी पुस्तक का फलसफा क्या हो सकता है। अतः इस पुस्तक में संजय ने मीडिया की जिस गहराई में उतरकर मोती चुनने का साहस किया है वह प्रशंसनीय है। पुस्तक में कुल सत्ताइस लेखों को क्रमबद्ध किया गया हैं जिनमें उनका आत्मकथ्य भी शामिल है।
पहले क्रम में लेखक ने नई प्रौद्योगिकी, साहित्य और मीडिया के अंर्तसंबंधों को रेखांकित किया है। आतंकवाद, भारतीय लोकतंत्र और रिपोर्टिंग, कालिख पोत ली हमने अपने मुंह पर, मीडिया की हिन्दी, पानीदार समाज की जरुरत, खुद को तलाशता जनमाध्यम जैसे लेखों के माध्यम से लेखक ने नए सिरे से तफ्तीश करते हुए समस्याओं को अलग अन्दाज में रखने की कोशिश की है। बाजारवादी मीडिया के खतरों से आगाह करते हैं मीडिया को धंधेबाजों से बचाइए, दूसरी ओर मीडिया के बिगड़ते स्वरुप पर तीखा प्रहार करने से नहीं चूकते हैं। इन लेखों में एक्सक्लुजिव और ब्रेकिंग के बीच की खबरों के बीच कराहते मीडिया की तड़फ दिखाने का प्रयास भी संजय करते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रिंस की पहचान कराते हैं और मीडिया के नारी संवेदनाओं को लेकर गहरी चिंता भी करते हैं। मीडिया में देहराग, किस पर हम कुर्बान, बेगानी शादी में मीडिया दीवाना जैसे लेखों में वे मीडिया की बेचारगी और बेशर्मी पर अपना आक्रोश भी जाहिर करते हैं।
श्री संजय की पुस्तक में मीडिया शिक्षा को लेकर भी कई सवाल हैं। मीडिया के शिक्षण और प्रशिक्षण को लेकर देश भर कई संस्थानों ने अपने केन्द्र खोले है। कई संस्थान तो ऐसे हैं जहां मीडिया शिक्षण के नाम पर छद्म और छलावा का खेल चल रहा है। मीडिया में आने वाली नई पीढ़ी के पास तकनीकी ज्ञान तो है लेकिन उसके उद्देश्यों को लेकर सोच का अभाव है। अखबारों की बैचेनी के बीच उसके घटते प्रभाव को लेकर भी पुस्तक में गहरा विमर्श देखने को मिलता है। विज्ञापन की तर्ज पर जो बिकेगा, वही टिकेगा जैसा कटाक्ष भी लेखक संजय ने किया है। वहीं थोड़ी सी आशा भी मीडिया से रखते हैं कि जब तंत्र में भरोसा न रहे वहां हम मीडिया से ही उम्मीदें पाल सकते हैं।
संजय हिंदी की पत्रकारिता पर भी अपना ध्यान और ध्येय केन्द्रित करते हैं। उनका मानना है कि अब समय बदल रहा है इकोनामिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड और बिजनेस भास्कर का हिन्दी में प्रकाशन यह साबित करता है कि हिंदी क्षेत्र में आर्थिक पत्रकारिता का नया युग प्रारंभ हो रहा है। हिंदी क्षेत्र में एक स्वस्थ औद्योगिक वातावरण, व्यावसायिक विमर्श, प्रशासनिक सहकार और उपभोक्ता जागृति की संभावनाएं साफ नजर आ रही हैं। हालांकि वे हिन्दी बाजार में मीडिया वार की बात भी करते हैं। फिलवक्त उन्होंने अपनी पुस्तक में पत्रकारिता की संस्कारभूमि छत्तीसगढ़ के प्रभाव को काफी महत्वपूर्ण करार दिया है। अपने आत्मकथ्य ‘मुसाफिर हूं यारों’ के माध्यम से वे उन पलों को नहीं भूल पाते हैं जहां उनकी पत्रकारिता परवान चढ़ी है। वे अपने दोस्तों, प्रेरक महापुरुषों और मार्गदर्शक पत्रकारों की सराहना करने से नहीं चूकते हैं जिनके संग-संग छत्तीसगढ़ में उन्होंने अपनी कलम और अकादमिक गुणों को निखारने का काम किया है।
संजय द्विवेदी के आत्मकथ्य को पढना काफी सुकून देता है कि आज भी ऐसे युवा हैं जिनके दमखम पर मीडिया की नई चुनौतियां का सामना हम आसानी से कर सकते हैं। जरुरत है ज़ज्बे और ईमानदार हौसलों की और ये हौसला हम संजय द्विवेदी जैसे पत्रकार, अध्यापक और युवा मित्र में देख सकते हैं। संजय की यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधार्थियों और मीडिया से जुड़े प्रत्येक वर्ग के लिये महत्वपूर्ण दस्तावेज है। ज्ञान, सूचना और घटनाओं का समसामयिक अध्ययन पुस्तक में दिग्दर्शी होता है। भाषा की दृष्टि से पुस्तक पठनीयता के सभी गुण लिए हुए है। मुद्रण अत्यन्त सुंदर और आकर्षक है। कवर पृष्ठ देखकर ही पुस्तक पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ जाती है।
समीक्षकः डा. शाहिद अली, अध्यक्षः जनसंचार विभाग, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, कोटा स्टेडियम, रायपुर (छत्तीसगढ़)

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

हरिनारायण को बृजलाल द्विवेदी साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान




भोपाल। दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका कथादेश के संपादक हरिनारायण को पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान दिये जाने की घोषणा की गई है। वर्ष 2008 के सम्मान के लिए श्री हरिनारायण के नाम का चयन पांच सदस्यीय निर्णायक मंडल ने किया जिसमें नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव( मुंबई), सप्रे संग्रहालय, भोपाल के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर( भोपाल ), छत्तीसगढ़ हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संचालक रमेश नैयर, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति सच्चिदानंद जोशी, साहित्य अकादमी के सदस्य गिरीश पंकज (रायपुर) शामिल थे। पूर्व में यह सम्मान वीणा(इंदौर) के यशस्वी संपादक डा.श्यामसुंदर व्यास और दस्तावेज (गोरखपुर) के संपादक डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को दिया जा चुका है।

सम्मान समिति के सदस्य संजय द्विवेदी ने बताया कि हिन्दी की स्वस्थ साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित एवं रेखांकित करने के उद्देश्य से इस सम्मान की शुरूआत की गई है। इस सम्मान के तहत किसी साहित्यिक पत्रिका का श्रेष्ठ संपादन करने वाले संपादक को 11 हजार रूपये, शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह एवं सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया जाता है। मार्च 1948 में जन्में श्री हरिनारायण 1980 से कथादेश का संपादन कर रहे हैं। वे हंस, विकासशील भारत, रूप कंचन के संपादन से भी जुड़े रहे हैं। उनके संपादन में कथादेश ने देश की चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं में अपनी जगह बना ली है।

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

समान शिक्षा की गारंटी से ही बचेगा देश



भोपाल,3 अगस्त। प्रख्यात शिक्षाविद प्रो. अनिल सदगोपाल का कहना है कि संसद में पेश बच्चों को अनिवार्य शिक्षा विधेयक-2008 दरअसल शिक्षा के अधिकार को छीननेवाला विधेयक है। सोमवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा शिक्षा का अधिकार और भारत का भविष्य विषय पर आयोजित व्याख्यान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. सदगोपाल ने विधेयक की तमाम खामियों की तरफ इशारा किया। उन्होंने साफ कहा कि एक समान प्राथमिक शिक्षा की गारंटी से ही देश को बचाया जा सकता है।


उन्होंने कहा कि इस गैरसंवैधानिक, बालविरोधी और निजीकरण-बाजारीकरण के सर्मथक विधेयक से एक बार फिर प्राथमिक शिक्षा गर्त में चली जाएगी। उन्होंने साफ कहा कि समान शिक्षा प्रणाली के बिना इस देश के सवाल नहीं किए जा सकते और गैरबराबरी बढ़ती चली जाएगी। उन्होंने कहा कि यह सरकारी स्कूल शिक्षा को ध्वस्त करने और निजी स्कूलों को बढ़ावा देनी की साजिश है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विवि के इलेक्ट्रानिक मीडिया विभाग के अध्यक्ष डा. श्रीकांत सिंह ने कहा कि दोहरी शिक्षा प्रणाली के चलते देश में इंडिया और भारत का विभाजन बहुत साफ दिखने लगा है। इसके चलते समाज में अनेक समस्याएं पैदा हो रही हैं। कार्यक्रम का संचालन विभाग के छात्र अंशुतोष शर्मा ने किया और आभार प्रर्दशन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया। इस मौके पर जनसंपर्क विभाग की प्रवक्ता मीता उज्जैन, मोनिका वर्मा, शलभ श्रीवास्तव और विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

कारपोरेट कम्युनिकेशन संभावनाओं से भरी दुनिया



भोपाल, 4 अगस्त। कारपोरेट कम्युनिकेशन संभावनाओं से भरी दुनिया है जिसके लिए नए विचारों से भरे युवाओं की जरूरत है। ये विचार चीन में निकाई ग्रुप आफ कंपनीज के सीनियर मैनेजर डा. अभिषेक गर्ग ने व्यक्त किए। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग में आयोजित एक कार्यक्रम छात्रों से संवाद कर रहे थे।


श्री गर्ग ने कहा कारपोरेट के कामकाज के तरीकों की जानकारी देते हुए विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे बदलती दुनिया और बदलते कारपोरेट के मद्देनजर खुद को तैयार करें। उन्होंने चीन की बाजार व्यवस्था की तमाम विशेषताओं का जिक्र करते हुए कहा कि अब दुनिया की तमाम कंपनियां भारत और चीन जैसे देशों के बड़े बाजार की ओर आकर्षित हो रही हैं और वे इन देशों के ग्रामीण बाजार में अपनी संभावनाएं तलाश रही हैं। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल, बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में कारपोरेट कम्युनिकेशन का महत्व बहुत बढ़ जाता है कि क्योंकि इतने विविध स्तरीय समाज को एक साथ संबोधित करना आसान नहीं होता। ऐसे में भारतीय बाजार की संभावनाएं अभी पूरी तरह से प्रकट नहीं हुयी हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे में एडवरटाइजिंग, कम्युनिकेशन और पब्लिसिटी के तमाम नए तरीकों पर संवाद जरूरी है। नए लोग, नए विचारों के साथ आगे आते हैं और नए विचार ही नए ग्राहक को संबोधित कर सकते हैं।


कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जनसंपर्क विभाग के अध्यक्ष डा. पवित्र श्रीवास्तव ने कहा कि कम्युनिकेशन की किसी भी विधा में काम करने के लिए जरूरी यह है कि आप खुद को अपने परिवेश, दुनिया-जहान के संदर्भों पर अपडेट रखें, क्योंकि यही संदर्भ किसी भी कम्युनिकेटर को महत्वपूर्ण बनाते हैं। प्रारंभ में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने अतिथियों का स्वागत किया। आभार प्रदर्शन जनसंचार की व्याख्याता मोनिका वर्मा ने तथा संचालन छात्रा ऐनी अंकिता ने किया। इस मौके पर जनसंपर्क विभाग की प्रवक्ता मीता उज्जैन, जया सुरजानी, शलभ श्रीवास्तव और जनसंचार तथा जनसंपर्क विभाग के छात्र-छात्राएं मौजूद थे।

सोमवार, 22 जून 2009

मीडिया से छंट जायेंगे मंदी के बादल : रविकांत मित्तल


जनसंचार विभाग में आयोजित हुआ विभागाध्यक्ष दविंदर कौर उप्पल का विदाई समारोह
भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में विभाग की अध्यक्ष दविंदर कौर उप्पल का विदाई समारोह आयोजित किया गया। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में इंडिया टीवी के कार्यकारी संपादक रविकांत मित्तल उपस्थित थे। कार्यक्रम की शुरूआत विभाग के नवनियुक्त अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने अतिथियों के परिचय से की। इसके बाद विभाग के द्वितीय एवं चतुर्थ सेमेस्टर के विद्यार्थियों ने मैडम उप्पल के साथ बिताये गये पलों को अपने शब्दों में व्यक्त किया।

कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए श्री रविकांत मित्तल ने कहा कि मंदी के इस दौर में नौकरी पाने के लिए छात्रों को अधिक मेहनत की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आजकल युवा मीडिया में नौकरी पाने के लिए शार्टकट रास्ता अपनाना चाहते हैं, लेकिन मेहनत का कोई विकल्प नहीं है। श्री मित्तल ने मंदी के इस दौर के बारे छात्रों से बातचीत करते हुए कहा जिस तरह से मंदी को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं वो सब कुछ ही दिन में खत्म हो जाएंगी। उन्होंने छात्रों से मेहनत करने और लगन के साथ अपने कार्य में लगे रहने की अपील की। मीडिया का जिस तरह सर्वव्यापी विस्तार हो रहा है उसमें अपार संभावनाएं छिपी हुयी हैं।

कार्यक्रम में विभाग के द्वितीय सेमेस्टर के छात्र शिवेन्द्र ने मैडम उप्पल के लिए ‘‘विदा‘‘ नामक कविता का पाठ भी किया। मैडम उप्पल ने विभाग के छात्रों के उज्जवल भविष्य की कामना की और अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लगे रहने को कहा।

समारोह में दृश्य-श्रव्य अध्ययन केन्द्र के विभागाध्यक्ष MkW- श्रीकांत सिंह, जनसंपर्क विभाग के अध्यक्ष MkW- पवित्र श्रीवास्तव, पुस्तकालय प्रभारी आरती सारंग, MkW- अविनाश बाजपेयी, मोनिका वर्मा सहित विभाग के सभी विद्यार्थी उपस्थित थे।

सोमवार, 1 जून 2009

संजय द्विवेदी पत्रकारिता विवि में जनसंचार के विभागाध्यक्ष बने

भोपाल। संजय द्विवेदी ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष का पदभार संभाल लिया है। संजय की राजनीतिक विश्लेषक एवं मीडिया विशेषज्ञ के तौर पर खास पहचान है। वे दैनिक भास्कर- भोपाल एवं बिलासपुर, हरिभूमि-रायपुर, नवभारत-मुंबई, इंडिया इन्फो डाट काम-मुंबई, स्वदेश-रायपुर एवं भोपाल, न्यूज चैनल – जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ आदि संस्थाओं में स्थानीय संपादक, समाचार संपादक, एडीटर इनपुट एवं एंकर, कंटेट अस्सिटेंट, उप संपादक जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। संजय इससे पहले भी अध्यापन का कार्य रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में रीडर के रूप में कर चुके हैं। भोपाल, मुंबई, रायपुर, बिलासपुर उनका कार्यक्षेत्र रहा है। सतत लेखन करने वाले संजय विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों से जुडे हैं।
संजय ने काफी कुछ लिखा पढ़ा है जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है- शावक (बाल कविता संग्रह - 1989), यादें सुरेन्द्र प्रताप सिंह (संपादन - 1997), इस सूचना समर में (लेख संग्रह - 2003), मत पूछ हुआ क्या-क्या (लेख संग्रह - 2003), सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और उनकी पत्रकारिता (आलोचना - 2004), सुर्खियां (लेख संग्रह - 2007)। संजय कई तरह के पुरस्कारों से भी नवाजे जा चुके हैं, जो इस प्रकार हैं- म.गो.वैद्य स्मृति रजत पदक (माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा) भोपाल, मध्यप्रदेश- 1995, सृजन-सम्मान, रायपुर द्वारा आंचलिक पत्रकारिता के लिए धुन्नी दुबे सम्मान-2005, अंबिका प्रसाद दिव्य स्मृति रजत सम्मान, भोपाल, मध्यप्रदेश- 2005, पं.प्रतापनारायण मिश्र युवा साहित्यकार सम्मान (भाऊराव देवरस न्यास, लखनऊ द्वारा) - 2006। संजय की वेबसाइट है
www.sanjaydwivedi.com और उनका ब्लाग है www.sanjayubach.blogspot.com, उनसे ई-मेल - 123dwivedi@gmail.com या उनके मोबाइल – 098935-98888 पर संपर्क किया जा सकता है। उनका डाक का पता हैः अध्यक्षः जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, विकास भवन, प्रेस काम्पलेक्स, महाराणा प्रताप नगर, भोपाल (मध्यप्रदेश)