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मंगलवार, 7 जनवरी 2014

"आप" की आंखों में कुछ बहके हुए से ख़्वाब हैं!

                           -संजय द्विवेदी


 अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने जिस तरह की उम्मीदें जगाई हैं वह बताती है राजनीति इस तरह से भी की जा सकती है। लालबत्तियों से मुक्ति, सुरक्षा न लेना और छोटे मकानों में रहना जैसै प्रतीकात्मक कदम भी आज के राजनीतिक परिवेश में कम नहीं हैं। इन पर चलना कठिन नहीं है, किंतु इनके लोभ से बचकर रह पाना बहुत कठिन है। निश्चय ही ऐसी कोशिशों का स्वागत होना चाहिए।
 यह भी नहीं है कि ऐसा करने वाले अरविंद केजरीवाल अकेले हैं। वर्तमान में मनोहर पारीकर(गोवा), ममता बनर्जी(प.बंगाल), माणिक सरकार(त्रिपुरा), एन. रंगास्वामी(पांडिचेरी) जैसे मुख्यमंत्री और एके एंटोनी, बुद्धदेव भट्टाचार्य, वी. अच्युतानंदन जैसे तमाम नेता इसी कोटि में आते हैं। गाँधीवादी, समाजवादी, वामपंथी, और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की धाराओं में भी ऐसे तमाम राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता मिलेंगें, जिनकी त्याग की भावना असंदिग्ध है। बावजूद इसके ऐसा क्या है जो अरविंद केजरीवाल को अधिक चर्चा और ज्यादा टीवी फुटेज दिलवा रहा है। इसे समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि अरविंद ने निजी जीवन में शुचिता के सवाल को जिस तरह अपनी राजनीति का केंद्रीय विषय बनाया है, वह उन्हें सबके बीच अलग खड़ा करता है। वे राजनीति की एक नई धारा के प्रतिनिधि हैं। वे उन लोगों की तरह से नहीं है जिनके लिए ईमानदारी एक व्यक्तिगत संकल्प है। वे इसे अपने दल की पहचान बनाना चाहते हैं। वे पारीकर और ममता से इस मामले में अलग हैं कि दोनों की ईमानदारी एक व्यक्तिगत विषय है। ममता के साथ रहकर आप बेईमान रह सकते हैं। साधनों का उपयोग कर सकते हैं। पारीकर भी निजी ईमानदारी का विज्ञापन नहीं करते और तंत्र या अपने दल को ईमानदार रहने के लिए मजबूर भी नहीं करते। वे अपने संकल्प पर अडिग हैं किंतु उनका आग्रह बेहद निजी है। केजरीवाल इस अर्थ में अलग हैं वे न सिर्फ इस ईमानदारी,सादगी का विज्ञापन कर रहे हैं बल्कि अपने दल के नेताओं को ये शर्तें मानने के लिए राजी कर रहे हैं। ऐसे में यह ईमानदारी एक अभियान में बदल जाती है। यह अपने दल को भी उसी रास्ते पर डालने जैसा मामला है। यह मामला ऐसा नहीं है कि ममता तो निजी जीवन को बेहद ईमानदारी से जिएं और बाकी सारी पार्टी और तंत्र आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा रहे। याद करें कि जब आप पार्टी के एक विधायक बिन्नी मंत्रिमंडल में जगह न मिलने से नाराज होते हैं तो उन्हें मनाने के बजाए अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि यह दल पद चाहने वालों के लिए नहीं है, क्रांतिकारियों के लिए है। हम देखते हैं कि बिन्नी मान जाते हैं और आप के मंत्रियों की शपथ में कोई व्यवधान नहीं होता। अरविंद की जिदें साधारण नहीं हैं। वे बंगला नहीं लेते, एक बड़ा फ्लैट लेने पर शोर मचता है तो उसे भी वापस कर देते हैं। लोक की इतनी चिंता साधारण नहीं है। आलोचना को सुनना और उस पर अमल करना साधारण नहीं है किंतु अरविंद ऐसा कर रहे हैं और करते हुए दिख भी रहे हैं।
  अरविंद में एक सात्विक क्रोध दिखता है, आप उसे सात्विक अहंकार भी कह सकते हैं। किंतु उनमें, उनकी देहभाषा में, उनकी आंखों में जो तड़प है वह बताती है वे अभी भी इस व्यवस्था में एक अलग रोशनी बिखेरने की ताकत रखते हैं। सही मायने में दिल्ली में होना अरविंद के लिए एक ज्यादा लाभ, ज्यादा चर्चा, ज्यादा मीडिया अटेंशन दिलाने वाला साबित हुआ है। किंतु इससे भी इनकार नहीं करना चाहिए कि अरविंद ने एक आम हिंदुस्तानी के मन, उसके आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम किया है। निराशा और अवसाद से घिरा आम हिंदुस्तानी आज एक नई रौशनी की ओर देख रहा है। भारत जैसे महादेश में जहां क्रांतियां प्रतीक्षारत ही रह जाती हैं, अरविंद ने उसे संभव बनाया है। यह साधारण नहीं है कि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के लिए अरविंद ने ठंड में पसीने ला दिए हैं। आप अरविंद के प्रशांत भूषण जैसे साथियों की कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की मांग की आलोचना कर सकते हैं किंतु अरविंद के नेतृत्व में जब नौजवान भारत मां की जय बोलते हैं, वंदेमातरम् का जयघोष करते हैं तो किस हिंदुस्तानी का मन नहीं प्रसन्न होता। लंबे समय के बाद भारतीय मध्यवर्ग को जो अपनी रोजी-रोटी और दैन्दिन संर्घषों से आगे की नहीं सोचता था, परिवर्तन और बदलाव की किसी प्रेरणा से खाली था, उम्मीदें नजर आने लगी हैं। जिस समय में छात्र, मजदूर और तमाम आंदोलन अपनी खामोश मौत मर रहे थे और कारपोरेट का शिकंजा आम आदमी के गले तक आ चुका है। ऐसे में केजरीवाल का उदय हमें हिम्मत देता है,ताकत देता है। केजरीवाल जैसे लोगों की सफलता-असफलता मायने नहीं रखती है। मायने इस बात के हैं कि वे किस तरह सत्ता के प्रतिस्पर्धी दलों का दंभ तोड़ते हैं और उन्हें जनमुद्दों के करीब लाते हैं। भारतीय राजनीति के इस समय में केजरीवाल 28 विधायकों की छोटी सी पार्टी के नेता और दिल्ली जैसे आधे-अधूरे राज्य के मुख्यमंत्री भले हों, वे उस हिंदुस्तानी जनता की उम्मीदों का चेहरा है, जिसने अपने सपने देखने बंद कर दिए थे। उदारीकरण की चकाचौंध में चकराई सरकारों और सत्ता प्रतिष्ठानों के सामने वे भारतीय जन के आत्मविश्वास और लोकचतना के सबसे बड़े प्रतीक बन चुके हैं। उनका मुकाबला आज किसी से नहीं है क्योंकि कोई भी सत्ता प्रतिष्ठान आम आदमी के साथ नहीं है। वे सत्ता और राजनीति को उसकी भटकी राहें याद दिला रहे हैं। गांधी टोपी की वापसी के बहाने वे एक ऐसी राजनीति को जन्म दे चुके हैं जहां जाति, पंथ के सवाल हवा हो चुके हैं। भगवान उन्हें इतना ही निष्पाप, जिद्दी और हठी बने रहने की शक्ति दे।

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

विश्व बाजार का सांस्कृतिक एजेंट न बने सिनेमा

-संजय द्विवेदी

  जब हर कोई बाजार का माल बनने पर आमादा है तो हिंदी सिनेमा से नैतिक अपेक्षाएं पालना शायद ठीक नहीं है। अपने खुलेपन के खोखलेपन से जूझता हिंदी सिनेमा दरअसल विश्व बाजार के बहुत बड़े साम्राज्यवादी दबावों से जूझ रहा है। जाहिर है कि यह वक्त नैतिक आख्यानों, संस्कृति और परंपरा की दुहाई देने का नहीं है। हिंदी सिनेमा अब आदर्शों के तनाव नहीं पालना चाहिता । वह अब सिर्फ विश्व बाजार का सांस्कृतिक एजेंट है। उसके ऊपर अब सिर्फ बाजार के नियम लागू होते हैं।मांग और आपूर्ति के इस सिद्धांत पर वह खरा उतरने को बेताब है।
कला सिनेमा को निगलने के बादः
 यह अकारण नहीं है कि कला सिनेमा की एक पूरी की पूरी धारा को यह बाजार निगल गया। कला या समानांतर सिनेमा से जुड़ा जागरुक तबका भी अब इसी बाजार की ताल से ताल मिलाकर मालबनाने में लगा है। ऐसे में सिनेमा के सामाजिक उत्तरदायित्व और उसके सरोकारों पर बातचीत बहुत जरूरी हो जाती है। ऐसे में समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले इस माध्यम का विचलन और उसके संदेशों को लेकर लंबी बहसें चलती रही हैं, लेकिन अब इसका दौर भी थम गया है। शायद इस सबने यह मान लिया है कि इस माध्यम से जन अपेक्षाएं पालना ही अनैतिक है। सिनेमा बनाने वाले भी यह कहकर हर प्रश्न का अंत कर देते हैं कि हम वहीं दिखते हैं जो समाज में घट रहा है।लेकिन यह बयान सत्य के कितना करीब है, सब जानते हैं। सच कहें तो आज का सिनेमा समाज में चल रही हलचलों का वास्तविक आईना कभी प्रस्तुत नहीं करता । वह उसे या तो अंतिरंजित करता है या चीजों को अतिसरलीकृत करके पेश करता है। 47 के पहले या 60 के दशक में दर्शक अपने नैतिक मूल्यों के लिए हीरो को लड़ते और बुरी ताकतों पर विजय प्राप्त करते हुए देखते थे। प्रेम और नैतिक आदर्श के लिए लड़ने वाला हीरो समाज में स्वीकारा जाता था। नेहरू युग के बाद लोगों की टूटती आस्था, आजादी के सपनों से छल की भावना बलवती हुई तो मुख्यधारा का सिनेमा अभिताभ बच्चन के रुप में एक में एक ऐसी व्यक्तिगत सत्ताके स्थापना का गवाह बना जो अपने बल और दुस्साहस सेल लोगों की लड़ाई लड़ता है।
कहां खो गया नायकः
    आज का सिनेमा जहां पहुंचा है, वहां नायक-खलनायक और जोकर का अंतर ही समाप्त हो गया है। इसके बीच में चले कला फिल्मों के आंदोलन को उनका सचऔर उनकीवस्तुनिष्ठ प्रस्तुतिही खा गई । यहां यह तथ्य उभरकर सामने आया कि बाजार में झूठ ही बिक सकता है, सच नहीं। इस एक सत्य की स्थापना ने हिंदी सिनेमा के मूल्य ही बदल दिए। दस्तक, अंकुर, मंथन, मोहन जोशी हाजिर हो, चक्र, अर्धसत्य, पार, आधारशिला, दामुल, अंकुश, धारावी जैसी फिल्में देने वाली धारा ही कहीं लुप्त हो गई। एक सामाजिक माध्यम के रूप में सिनेमा के इस्तेमाल की जिनमें समझ थी वे भी मुख्यधारा के साथ बहने लगे। यहां यह बात भी काबिले गौर है कि कला फिल्मों ने अपने सीमित दौर में भी अपनी सीमाओं के बावजूद व्यावसायिक सिनेमा की झूठी और मक्कार दुनिया की पोल खोल दी। यह सही बात है कि आज सिनेमा का माध्यम अपनी तकनीकगत श्रेष्ठताओं, प्रयोगों के चलते एक बेहद खर्चीला माध्यम बन गया है। ऐसे में सेक्स, हिंसा उनके अतिरिक्त हथियार बन गए हैं। पुराने जमाने में भी वी. शांताराम से लेकर गुरुदत्त, ख्वाजा अहमद अब्बास ने व्यावसायिक सिनेमा में सार्थक हस्तक्षेप किया, लेकिन आज का सिने-उद्योग सिर्फ मुनाफाखोरी तक ही सीमित नहीं है, उसके इरादे खतरनाक हैं। काले धन की माया, काले लोग इस बाजार को नियंत्रित कर रहे हैं। आज के मुख्यधारा का सिनेमा समाज के लिएनहीं बाजार के लिएहै। देशभक्ति, प्रेम, सामाजिक सरोकार सब कुछ यदि बेचने के काम आए तो ठीक वरना दरकिनार कर दिये जाते हैं। नकली इच्छाएं जगाने, मायालोक में घूमते इस सिनेमा का अपने आसपास के परिवेश से कोई लेना-देना नहीं है। इसीलिए आज उसके पास कोई नायकनहीं बचा है। पहले एकांत में नाचते नायक-नायिका इसलिए अब भीड़ में नाचते हैं । शोर का संगीत और शब्दों का अकाल इस सिनेमा की दयनीयता का बखान करते हैं । सच कहें तो भारतीय जीवन का अनिवार्य हिस्सा बने होने के बावजूद सिनेमा पर जनता का कोई बौद्धिक अंकुश नहीं रह गया है । परिणाम यह हुआ है कि हिंदी सिनेमा पागल हाथी की तरह व्यवहार कर रहा है।
मनोविकारी फिल्मों का समयः
   हिंदी सिनेमा तो वैसे ही हॉलीवुड की जूठन उठाने और खाने के लिए मशहूर है। इसीलिए प्रेम के कोमल और मोहक अंदाज की फिल्मों के साथ मनोविकारी प्रेम की फिल्में भी बालीवुड में खूब बनीं । एक दौर में शाहरूख खान ऐसी मनोविकारी प्रेम की फिल्मों के महानायक बन गए । सही अर्थों में मनोविकारों से ग्रस्त प्रेमी को पहली बार बालीवुड में शाहरूख खान ने ग्लैमराइज्डकिया । फिल्मबाजीगरसे प्रेम में हिंसा व उन्माद के जिस दौर की शुरूआत हुई, ‘डरऔरअंजाममें उसे और विस्तार मिला । फिल्म बाजीगरमें शिल्पा शेट्टी के प्रेम में दीवाना शाहरूख खान छत से धकेल कर उसकी हत्या कर देता है। डरमें जूही की दीवानगी में वह इस कदर पागल है कि वह जूही के पति सन्नी देओल की जान से पीछे पड़ जाता है। अंजाममें शाहरूख, शादीशुदा माधुरी दीक्षित की चाहत में उसके पति की हत्या कर डालता है। इस शाहरूख लहरकी सवारी नाना पाटेकर भी अग्निसाक्षीमें करते नजर आते हैं। इस फिल्म में नाना पाटेकर स्लीपिंग विद द एनमीके नायक सरीखा पति साबित होते हैं। पूरी फिल्म एक ऐसे सनकी इंसान की कथा है, जो यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उसकी पत्नी किसी और से बात भी करे । दीवानगी की इस हिंसक हद से आतंकित उसकी पत्नी कहती है वह मुझे इतना प्यार करता है कि मुझको छूकर गुजरने वाली हवा से भी नफरत करने लगा है। नाना इस फिल्म में मुहब्बत के तानाशाह के रूप में नजर आते हैं। इसके बावजूद ये फिल्में सफल रहीं। बदलते जीवन मूल्यों की बानगी पेश करती ये फिल्म एक नए विषय से साक्षात्कार कराती हैं। प्रेम की उदात्त भावनाओं के प्रति आस्था दिखाने वाला समाज एक हिंसक एवं क्रूर प्रेमी को सिर क्यों चढ़ाने लगा है, यह सवाल वस्तुतः एक बड़े समाज शास्त्रीय अध्ययन का विषय थोड़े अलग जरूर है, लेकिन वह भी प्रेम के विकृत रूप का ही परिचय कराती है।
प्रेम के चित्रण का इतिहासः
 आप हिंदी सिनेमा के 100 सालों का मूल्यांकन करें तो वह मूलतः प्रेम के चित्रण का इतिहास है। मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ दरअसल यौन सम्बन्धों की उन्मुक्ति एवं वर्जनाओं का भी रूप बदलता रहा है। सिनेमा की संपूर्ण यात्रा में प्रेम संबंधों की व्याख्या का दौर सबसे महत्वपूर्ण है। हिंदुस्तानी लोक चेतना में प्रेम के इस तत्व की जगह वैसे भी बहुत बड़ी है। दूसरे यौन संबंधों पर खुली बहस की कम गुंजाइश के कारण हम इसके अक्स एवं विकल्प परदे पर तलाशते रहे । दमित इच्छाओं एवं यौन कुंठाओं के इसी संदर्भ की समझ ने हिंदी सिनेमा व्यवसायियों को एक बेहतर मसाला दिया। गीत संगीत एवं प्रेम की इस चेतना का व्यवसाय फिल्म उद्योग की प्राथमिकता बन गई। इस सबके बावजूद हिंसा से लबरेज यह प्रेम, भारतीय दर्शकों के लिए बहुत अजनबी न था। हिंसाचार की शुरुआत और अंत अपने प्रेम को पाने या अनाचार से मुक्ति के लिए होती थी। पर प्रेम के आयातित संस्करण में अब अपनी मुहब्बत का ही गला घोंटने की तैयारियों पर जोर है। हिंसा प्रेमका यह दौर वास्तव में भारतीय सिने जगत की रेखांकित की जाने लायक परिघटना है, जो कहीं से भी प्रेम के परंपरागत चरित्र से मेंल नहीं खाती । हिंसा भारतीय सिनेमा की जानी पहचानी चीज है, पर नायक आम तौर पर खलनायक के अनाचार से मुक्ति के लिए हिंसा का सहारा लेता दिखता था। उसकी प्रमिका का ही उसके द्वारा उत्पीड़न, यह नया दौर है। जाहिर है समाज में ऐसी घटनाएं घट रही थीं और उनकी छाया रूपहले पर्दे पर भी दिखी। इस प्रकार की घटनाओं ने पर्दे पर भी हिंसक प्रेमकी थ्यौरीको जगह दी।
पलायनवादी नायकः
  शाहरूख खान की फिल्में इसी थ्यौरीका संदर्भ मानी जा सकती हैं। वह चुनौती को स्वीकारता नहीं, भागता है। मध्य वर्ग के नौजवान की चेतना एवं उसकी कुंठाओं का शाहरूख सच्चा प्रतिनिधि नजर आता है। वह प्यार करता है, किंतु स्वीकार का साहस उसमें नहीं हैं । उसे श्रम, रचनाशीलता एवं इंतजार नहीं है। सो वह पागलों सी हरकतें करता है, जिसमें प्रेमिका का उत्पीड़न भी शामिल है। इस प्रसंग पर मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी की राय गौरतलब है। वे लिखते है- वह हमेशा लड़ता भिड़ता नजर आता है। किसी लड़की से छेड़छाड़ से लेकर मारपीट तकहिंसकऔर देहके रिश्ते बनाना ही उसका लक्ष्य है। उसके गीतों में भी सौंदर्य व कमनीयता के प्रतीक तलाशे नहीं मिलते। वह इंस्टेटिज्म’ (तुरंतवाद) का शिकार है। उसे जो भी कुछ चाहिए तुरंत चाहिए। इंस्टेट। अपने प्रेम को न पा सकने की स्थिति में उसे समाप्त कर देने की आकांक्षा उसके इसी पागलपन से उपजी है। आप इसे पूरे चित्र को पढ़ने की कोशिश करें तो यह भारतीय काव्य के धीरोदात्त नायक की विदाई का दौर है। इसमें लडके और लड़की के बीच कहीं प्यार या सामाजिक संबंध नहीं।पचौरी आगे लिखते शुद्ध रुप में फिजिकलरिश्ते पल रहे हैं। इसे हम फिल्मों के डांस सिक्वेंससे देख समझ सकते हैं नौजवान का 2 कैरेट खरा फिजिकल रूप ।यहां नायक और नायिका सिर्फ शरीरहैं। एक ऐसा शरीर, जिसमें मन, आत्मा, भावना, सुख व दुख सारे भाव तिरोहित हो चुके हैं। वह सिर्फ शरीरबनकर रह गया है। उसे खोज भी प्रेम के प्रतीक नहीं मिलते। इसीलिए गीतों में भी वह प्रेम की प्रतीक नहीं खोज पाता। एक गीत में नायक कहता है खंभे जैसी खड़ी है,/ लड़की है या छड़ी है। जाहिर है कोमल अनूभूतियों को व्यक्त करने वाले शब्दों व प्रतीकों के भी लाले हैं।
समाज में घट रही घटनाएं प्रेम के प्रति हिंसाचार इस संवेदनहीनता पर मुहर भी लगाती हैं। सिर्फ शरीरही बचा है, जिसमें से मन, आत्मा, भावना, सुखदुख, हर्ष-विषाद आदि सारे भाव तिरोहित हो चुके हैं। अपने अहंकार पर चोट आज के युवा को आहत करती है। वह घर, परिवार, समाज की बनी बनाई लीक को एक झटके में तोड़ डालने पर आमादा है। साहिर लुधियानवी की कुछ पंक्तियां इस संदर्भ को समझने में सहायक हो सकती हैं तुम अगर मुझको न चाहो तो / कोई बात नहीं,/ तुम किसी और को चाहोगी/तो मुश्किल होगी। साहिर की ये पंक्तियां इस घातक चाहत का बयान करती हैं। जहां प्रेम की प्राप्ति न होने पर उसे नष्ट कर डालने का संदेश फिल्मों में दिखता है। उपभोक्तावाद के ताजा दौर में भोगवादी संस्कृति के थपेड़ों में हमारा दार्शनिक आधार चरमरा गया है। इसी के चलते फिल्मों ने ऐसे नकारात्मक मूल्यों को सिर चढ़ाया है। पैसे की सनक और नवधनाढ्यों के उभार के बीच ये फिल्मी कथाएं वस्तुतः हमारे समाज के सच की गवाही हैं। समाचार पत्रों में आए दिन प्रेमी द्वारा प्रेमिका की हत्या, पत्नी की हत्या या पति की हत्या जैसे समाचार छपते हैं। दुर्भाग्य से सिनेमा और दूरदर्शन इस नकारात्मक प्रवृत्ति को एक आधार प्रदान करते हैं। फिल्मों की कथाएं देखकर छोटे कस्बे गांवों के नौजवान उससे गलत प्रेरणा ग्रहण करते हैं। कई बार वे पर्दे पर दिखाई घटना को जीवन में दोहराने की कोशिश करते हैं। निश्चित रूप से ताजा बाजारवादी अवधारणाओं में हमारा सिनेमा पाश्चात्य प्रभावों से तेजी से ग्रस्त हो रहा है। पश्चिमी जीवन की ज्यों की त्यों स्वीकार्यता हमारे समाज में संकट का सबब बनेगी। प्रेम के एक क्रूर चेहरे को भारतीय मन पर आरोपित करने की कोशिशें तेज हैं। दुर्भाग्य है कि यह सारा कुछ प्रेम के नाम पर हो रहा है।
सिनेमा पर गैरहाजिर विमर्शः
   किसी भी समाज में बौद्धिक और सांस्कृतिक अंकुश रखने का काम लेखक और विचारक ही करते हैं, कोई सरकार नहीं। फिल्मों पर हिंदी पत्रकारिता और टी. वी. चेनलों पर भी चल रही चर्चाएं एवं उन पर आधारित कार्यक्रम भी सतही और बचकाने होते हैं । हिंदी सिनेमा ने सही अर्थों में भारतीय समाज एवं उसके संघर्षों, उसकी चेतना को अपनी ही जमीन से बदखल कर दिया है। उसकी ताकत लगातार बढ़ी है, वह हमारा लोकाक्षर और दैन्दिन का व्यवहार तय करने लगा है। इतनी सशक्त माध्यम पर समूचे हिंदी क्षेत्र में ठोस विचार की शुरुआत के बजाए गाशिप बाजीचल रही है।

    सिनेमा पर लगभग गैरहाजिर विमर्श को चर्चा के केंद्र में लाना और उस पर बौद्धिक-सामाजिक अंकुश लगाना समय की जरूरत है। 1939 में हिंदी के यशस्वी कथाकार-उपन्यासकार प्रेमचंद ने लिखा था मगर खेद है कि इसे कोरा व्यवसाय बनाकर हमने उसे कला के उच्च आसन से खींचकर ताड़ी की दूकान तक पहुंचा दिया है यह बात प्रेमचंद के दौर की है, जब देश के लोग आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे और आज तो हिंदी सिनेमा विकृतियों का सुपर बाजारबन गया है। ऐसे ही चित्रों पर हमारी नई पीढ़ी और बचपन झूम-झूम कर जवान हो रहा है। क्या हम समाज के इतने प्रभावकारी माध्यम को, यूं ही बेलगाम छोड़ दें ?

रविवार, 25 अगस्त 2013

इतनी बेरहम कैसे हो गयी ये मुंबई मेरी जान ?



          अगर मुंबई में भी महफूज नहीं तो कहां जाएं लड़कियां?
                           -संजय द्विवेदी
  मुंबई जो कभी मेरा शहर रहा है। इस शहर में जीवन के तीन बेहद खुशनुमा, बिंदास, दोस्ताना, बेधड़क और जिंदादिल साल मैंने गुजारे हैं।सपने देखे हैं, उनकी तरफ दौड़ लगाई है। अखबारों और वेबसाइट्स की नौकरियां करते हुए इन सालों में कभी नहीं लगा कि मुंबई किसी औरत के लिए इतनी खतरनाक हो सकती है। मुंबई की एक महिला पत्रकार के हुयी सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरे हिलाकर रख दिया है। ऐसा इसलिए क्योंकि मुंबई इस देश की सामूहिक आकांक्षाओं, सामूहिक सपनों का प्रतिनिधि शहर है।
    बीते दिनों की सोचता हूं तो देर रात अखबार के दफ्तर से लौटते वक्त, बहुत कम पर कई बार अलसुबह भी किसी खास काम से निकले तो भी देखा कि औरतों के लिए यह शहर हमेशा ही सुरक्षित और सम्मान देने वाला रहा है। औरतों के खिलाफ होने वाले अत्याचार निजी जीवन में होंगें पर इस तरह हिला देने वाली सामूहिक दुराचार की घटनाएं कम सुनी थीं। इस शहर में रहते हुए मुझे कभी नहीं लगा कि एक लड़की को यहां कोई खतरा हो सकता है। लड़कियां और महिलाएं पुरूषों की तरह ही कभी और किसी भी समय मुझे आती-जाती दिख जाती हैं। कई बार जब अन्य महानगरों की कार्य स्थितियों की तुलना होती है तो मुंबई तमाम मामलों में अन्य शहरों से बेहतर नजर आती है। बेतरह भीड़ के बावजूद एक अनुशासन, एक साथ रहना और अपने सपनों के लिए जीना- यह शहर आपको जरूर सिखाता है। इस शहर के किनारों पर विशाल जलराशि से भरे लहराते समुद्र हममें अपनी ही तरह विशाल होने का साहस भी भरते हैं। उनकी उठती- गिरती लहरें हमें जीवन के उतार-चढ़ाव का भान कराती हैं।
   लेकिन क्या समय बदल गया है या मुंबई भी अब शेष शहरों की तरह एक भीड़ भरी अराजक नगरी में बदल रही है? इसका कास्मो चरित्र कुछ ढीला पड़ रहा है? एक स्त्री के साथ ऐसी अमानवीय बर्बरता सभ्य समाज में कहीं से शोभा नहीं देतीं। दिल्ली-मुंबई जैसे शहर जो हमारे देश के बड़े शहर तो हैं ही हमारे देश का अंतरराष्ट्रीय चेहरा भी हैं। दिल्ली और मुंबई में ऐसी घटनाएं हमें बताती हैं कि कानून का राज ढीला पड़ा है और अपराधियों में अब भय नहीं रहा। मीडिया रिर्पोट्स ही बताती हैं कि मुंबई का आधा पुलिस बल वीआईपी ड्यूटी में लगा है। ऐसे में जनता को किसके हाल पर छोड़ दिया गया है।
   मुंबई शहर जो देश की भर की युवा प्रतिभाओं, लड़के-लड़कियों को इस लिए आकर्षित करता है कि यहां आकर आकर वे अपनी प्रतिभा आजमा सकते हैं और अपने सपनों में रंग भर सकते हैं। आखिर इस शहर को हुआ क्या है कि अपने कर्तव्य को अंजाम देती एक लड़की के रास्ते में वहशी दरिंदे आ जाते हैं। मैं जिस मुंबई को जानता हूं वह प्रतिभाओं को आदर देने वाली, आदमी की काबलियत और उसके हुनर की कद्र करने वाली है। ये देश का वो शहर है जहां आम आदमी के सपने सच होते हैं। भारत के छोटे शहरों-गावों में देखे गए सपने, आकांक्षाओं को आकाश देने वाले इस शहर का दिल आखिर इतना छोटा कैसे हो गया, उसका कलेजा इतना कड़ा कैसे हो गया कि एक लड़की की चीख और उसका आर्तनाद अब इसे विकल नहीं करता? यह वो शहर है जो जिंदगी, जोश और जज्बे को सलाम करता है। यह कभी न रूकने वाली, कभी न ठहरने वाली मुंबई अचानक इतनी संवेदनहीन कैसे हो सकती है? सही मायने में इस घटना ने एक बदलती हुयी मुंबई की तस्वीर पेश की है। जो बर्बर है, और हिंसक भी। वह हिंसा भी औरत के खिलाफ। एक महिला पत्रकार के खिलाफ हुयी यह घटना अब सबक बनना चाहिए कि यह कतई दुहराई न जाए। यह जिम्मेदारी हर मुंबईकर की है और समाज को चलाने वाले लोगों की भी है। आरोपियों को कड़ी सजा के साथ-साथ हमें औरत के प्रति, बच्चियों के प्रति सम्मान जगाने, उनकी सुरक्षा को पुख्ता करने के इंतजाम करने होंगें। हमें सोचना होगा कि मुंबई जैसे शहर में भी अगर लड़कियां सुरक्षित नहीं तो आखिरकार वे कहां जाएं। मुंबई का कास्मो चरित्र, यहां की पुलिस और शेष समाज मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाते हैं जहां औरत के लिए जगह भी है और सम्मान भी। किंतु क्या कुछ सिरफिरे और मनोविकारी लोग इस शहर का यह चरित्र हर लेंगें? इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। मुंबई की जीवन शैली और उसमें छलकता हुआ जीवन इसकी एक खास पहचान है। अगर इस शहर ने औरतों को असुरक्षित बनाने, उनकी आजादी और अवसर छीनने की कोशिशें कीं तो मुंबई, मुंबई नहीं रह जाएगी। इसलिए मुंबई के लोगों का यह दायित्व है कि वे जागरूक नागरिकता का परिचय देते हुए अपने शहर की इस खास पहचान को नष्ट न होने दें।
     मुंबई पुलिस, प्रशासन और शेष समाज की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे सपनों में रंग भरने वाले इस शहर का सिर नीचा न होने दें। मुंबई एक सभ्यता का नाम है, एक संस्कृति का नाम है, एक अवसर का नाम है, वह सपनों की एक ऐसी दुनिया है जिसमें हर कोई आकर अपने झंडे गाड़ना चाहता है, व्यापार, फिल्म, फैशन, शेयर, साहित्य, रंगमंच, कला, मीडिया, प्रदर्शन कलाओं से लेकर किसी विधा का भी आदमी आकर एक बार इस शहर पर छा जाना चाहता है। अगर यह मुंबई का नया बनता वहशी चेहरा हमने ठीक न किया तो यह तमाम कलाओं के साथ बड़ा अपराध होगा। औरतों से ही दुनिया संपूर्ण और खूबसूरत होती है। इन तमाम विधाओं में आ रही औरतों डरकर या शहर में असुरक्षाबोध के साथ काम करेगीं तो मुंबई अपनी पहचान खो देगी।
  इस घटना पर जिस तरह सभी समाजों, कलाकारों, राजनीतिक दलों ने अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए प्रतिक्रिया दी है उसे सराहा जाना चाहिए। मुंबई पुलिस ने भी अपनी तत्परता का परिचय दिया है। आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की तरफ हमें बढ़ना चाहिए और उससे जरूरी यह है कि हम अपनी मुंबई को दोबारा शर्मशार न होने दें, ऐसा संकल्प लें। तभी देशवासी गर्व से कह सकेंगें ये मुंबई है मेरी जान!’