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रविवार, 17 मई 2020

संकट में है पत्रकारिता की पवित्रता


-प्रो.संजय द्विवेदी

भारतीय मीडिया अपने पारंपरिक अधिष्ठान में भले ही राष्ट्रभक्ति,जनसेवा और लोकमंगल के मूल्यों से अनुप्राणित होती रही हो, किंतु ताजा समय में उस पर सवालिया निशान बहुत हैं। एजेंडा आधारित पत्रकारिता के चलते समूची मीडिया की नैतिकता और समझदारी कसौटी पर है। सही मायने में पत्रकारिता में अब गैरपत्रकारीय शक्तियां ज्यादा प्रभावी होती हुयी दिखती हैं। जो कहने को तो मीडिया में उपस्थित हैं, किंतु मीडिया की नैतिक शक्ति और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करना उनका स्वभाव बन गया है। इस कठिन समय में टीवी मीडिया के शोर और कोलाहल ने जहां उसे न्यूज चैनल के बजाए व्यूज चैनल बना दिया है। वहीं सोशल मीडिया में आ रही अधकचरी और तथ्यहीन सूचनाओं की बाढ़ ने नए तरह के संकट खड़े कर दिए हैं।

     
जर्नलिस्ट या एक्टिविस्ट-
पत्रकार और एक्टिविस्ट का बहुत दूर का फासला है। किंतु हम देख रहे हैं कि हमारे बीच पत्रकार अब सूचना देने वाले कम, एक्टिविस्ट की तरह ज्यादा व्यवहार कर रहे हैं। एक्टिविस्ट के मायने साफ हैं, वह किसी उद्देश्य या मिशन से अपने विचार के साथ आंदोलनकारी भूमिका में खड़ा होता है। किंतु एक पत्रकार के लिए यह आजादी नहीं है कि वह सूचना देने की शक्ति का अतिक्रमण करे और उसके पक्ष में वातावरण भी बनाए। इसमें कोई दो राय नहीं कि कोई भी व्यक्ति विचारधारा या राजनैतिक सोच से मुक्त नहीं हो सकता। हर व्यक्ति का अपना राजनीतिक चिंतन है, जिसके आधार पर वह दुनिया की बेहतरी के सपने देखता है। यहां हमारे समय के महान संपादक स्व. श्री प्रभाष जोशी हमें रास्ता दिखाते हैं। वे कहते थे पत्रकार की पोलिटिकल लाइन तो हो, किंतु उसकी पार्टी लाइन नहीं होनी चाहिए। यह एक ऐसा सूत्र वाक्य है, जिसे लेकर हम हमारी पत्रकारीय जिम्मेदारियों का पूरी निष्ठा से निर्वहन कर सकते हैं।
      मीडिया में प्रकट पक्षधरता का ऐसा चलन उसकी विश्वसनीयता और प्रामणिकता के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। हमारे संपादकों, मीडिया समूहों के मालिकों और शेष पत्रकारों को इस पर विचार करना होगा कि वे मीडिया के पवित्र मंच का इस्तेमाल भावनाओं को भड़काने, राजनीतिक दुरभिसंधियों, एजेंडा सेटिंग अथवा नैरेटिव बनाने के लिए न होने दें। हम विचार करें तो पाएंगें कि बहुत कम प्रतिशत पत्रकार इस रोग से ग्रस्त हैं। किंतु इतने लोग ही समूची मीडिया को पक्षधर मीडिया बनाने और लांछित करने के लिए काफी हैं। हम जानते हैं कि औसत पत्रकार अपनी सेवाओं को बहुत ईमानदारी से कर रहा है। पूरी नैतिकता के साथ, सत्य के साथ खड़े होकर अपनी खबरों से मीडिया को समृद्ध कर रहा है। देश में आज लोकतंत्र की जीवंतता का सबसे बड़ा कारण मीडियाकर्मियों की सक्रियता ही है। मीडिया ने हर स्तर पर नागरिकों को जागरूक किया है तो राजनेता और नौकरशाहों को चौकन्ना भी किया है। इसी कारण समाज आज भी मीडिया की ओर बहुत उम्मीदों से देखता है। किंतु कुछ मुठ्ठी भर लोग जो मीडिया में किन्हीं अन्य कारणों से हैं और वे इस मंच का राजनीतिक कारणों और नरेटिव सेट के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें पहचानना जरुरी है। क्योंकि ये थोड़े से ही लोग लाखों-लाख ईमानदार पत्रकारों की तपस्या पर भारी पड़ रहे हैं। बेहतर हो कि एक्टिविस्ट का मन रखनेवाले पत्रकार इस दुनिया को नमस्कार कह दें ताकि मीडिया का क्षेत्र पवित्र बना रहे। हमें यह मानना होगा कि मीडिया का काम सत्यान्वेषण है, नरेटिव सेट करना,एजेंडा तय करना उसका काम नहीं है। पत्रकारिता को एक टूल की तरह इस्तेमाल करने वाले लोग अपना और मीडिया दोनों का भला नहीं कर रहे हैं। क्योंकि उनकी पत्रकारिता स्वार्थों के लिए है, इसलिए वे तथ्यों की मनमानी व्याख्या कर समाज में तनाव और वैमनस्य फैलाते हैं।
तकनीक से पैदा हुए संकट-
सूचना प्रौद्योगिकी ने पत्रकारिता के पूरे स्वरूप को बदल दिया है।अब सूचनाएं सिर्फ संवाददाताओं की चीज नहीं रहीं। विचार अब संपादकों के बंधक नहीं रहे। सूचनाएं अब उड़ रही हैं इंटरनेट के पंखों पर। सोशल मीडिया और वेब मीडिया ने हर व्यक्ति को पत्रकार तो नहीं पर संचारक या कम्युनिकेटर तो बना ही दिया है। वह फोटोग्राफर भी है। उसके पास विचारों, सूचनाओं और चित्रों की जैसी भी पूंजी है, वह उसे शेयर कर रहा है। इस होड़ में संपादन के मायने बेमानी हैं, तथ्यों की पड़ताल बेमतलब है, जिम्मेदारी का भाव तो कहीं है ही नहीं। सूचना की इस लोकतांत्रिकता ने आम आदमी को आवाज दी है, शक्ति भी दी है। किंतु नए तरह के संकट खड़े कर दिए हैं।
    सूचना देना अब जिम्मेदारी और सावधानी का काम नहीं रहा। स्मार्ट होते मोबाइल ने सूचनाओं को लाइव देना संभव किया है। समाज के तमाम रूप इससे सामने आ रहे हैं। इसके अच्छे और बुरे दोनों तरह के प्रयोग सामने आने लगे हैं। सरकारें आज साइबर ला के बारे में काम रही हैं। साइबर के माध्यम से आर्थिक अपराध तो बढ़े ही हैं, सूचना और संवाद की दुनिया में भी कम अपराध नहीं हो रहे। संवाद और सूचना से लोंगो को भ्रमित करना, उन्हें भड़काना आसान हुआ है। कंटेट को सृजित करनेवाले प्रशिक्षित लोग नहीं है, इसलिए दुर्घटना स्वाभाविक है। ऐसे में तथ्यहीन, अप्रामणिक, आधारहीन सामग्री की भरमार है, जिसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं है। यहां साधारण बात को बड़ा बनाने की छोड़ दें, बिना बात के भी बात बनाने की भी होड़ है। फेक न्यूज का पूरा उद्योग यहां पल रहा है। यह भी ठीक है कि परंपरागत मीडिया के दौर में भी फेक न्यूज होती थी, किंतु इसकी इतनी विपुलता कभी नहीं देखी गई। वाट्सअप यूनिर्वसिटी जैसे शब्द बताते हैं कि सूचनाएं किस स्तर पर संदिग्ध हो गयी हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में सच कहीं सहमा सा खड़ा है। इसलिए सोशल मीडिया अपनी अपार लोकप्रियता के बाद भी भरोसा हासिल करने में विफल है।
सबसे ताकतवर हैं फेसबुक और यूट्यूब-
आज बड़े से बड़े मीडिया हाउस से ताकतवर फेसबुक और यू-ट्यूब हैं, जो कोई कंटेट निर्माण नहीं करते। आपकी खबरों, आपके फोटो और आपकी सांस्कृतिक, कलात्मक अभिरुचियों को प्लेटफार्म प्रदान कर ये सर्वाधिक पैसे कमा रहे हैं। गूगल, फेसबुक, यू-ट्यूब, ट्विटर जैसे संगठन आज किसी भी मीडिया हाउस के लिए चुनौती की तरह हैं। बिना कोई कंटेट क्रियेट किए भी ये प्लेटफार्म आपकी सूचनाओं और आपके कंटेट के दम पर बाजार में छाए हुए हैं और बड़ी कमाई कर रहे हैं। बड़े से बड़े मीडिया हाउस को इन प्लेटफार्म पर आकर अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए जतन करने पड़ रहे हैं। यह एक अद्भुत समय है। जब भरोसा, प्रामणिकता, विश्वसनीयता जैसे शब्द बेमानी लगने लगे हैं। माध्यम बड़ा हो गया है,विचार और सूचनाएं उसके सामने सहमी हुयी हैं। सूचनाओं को इतना बेबस कभी नहीं देखा गया, सूचना तो शक्ति थी। किंतु सूचना के साथ हो रहे प्रयोगों और मिलावट ने सूचनाओं की पवित्रता पर भी ग्रहण लगा दिए हैं। व्यक्ति की रूचि रही है कि वह सर्वश्रेष्ठ को ही प्राप्त करे। उसे सूचनाओं में मिलावट नहीं चाहिए। वह भ्रमित है कि कौन सा माध्यम उसे सही रूप में सूचनाओं को प्रदान करेगा। बिना मिलावट और बिना एजेंडा सेंटिग के।
विकल्पों पर भी हो बात-
ऐसे कठिन समय में अपने माध्यमों को बेलगाम छोड़ देना ठीक नहीं है। नागरिक पत्रकारिता के उन्नयन के लिए हमें इसे शक्ति देने की जरुरत है। एजेंडा के आधार पर चलने वाली पत्रकारिता के बजाए सत्य पर आधारित पत्रकारिता समय की मांग है। पत्रकारिता का एक ऐसा माडल सामने आना चाहिए जहां सत्य अपने वास्तविक स्वरूप में स्थान पा सके। मूल्य आधारित पत्रकारिता या मूल्यानुगत पत्रकारिता ही किसी भी समाज का लक्ष्य है। पत्रकारिता का एक ऐसा माडल भी प्रतीक्षित है, जहां सूचनाओं के लिए समाज स्वयं खर्च वहन करे। समाज पर आधारित होने से मीडिया ज्यादा स्वतंत्र और ज्यादा लोकतांत्रिक हो सकेगा। अफसोस है कि ऐसे अनेक माडल हमारे बीच आए किंतु वे जनता के साथ न होकर एजेंडा पत्रकारिता में लग गए, इससे वो लोगों का भरोसा तो नहीं जीत सके। साथ ही वैकल्पिक माध्यमों से भी लोगों का भरोसा जाता रहा। इस भरोसे को जोड़ने की जिम्मेदारी भी मीडिया के प्रबंधकों और संपादकों की है। क्योंकि कोई भी मीडिया प्रामणिकता और विश्वसनीयता के आधार पर ही लोकप्रिय बनता है। प्रामणिकता उसकी पहली शर्त है। आज संकट यह है कि अखबारों के स्तंभों में छपे हुए नामों और उनके लेखकों के चित्रों से ही पता चल जाता है कि इन साहब ने आज क्या लिखा होगा। बहसों(डिबेट) के बीच टीवी न्यूज चैनलों की आवाज को बंद कर दें और चेहरे देखकर आप बता सकते हैं कि यह व्यक्ति क्या बोल रहा होगा। ऐसे समय में मीडिया को अपनी छवि पर विचार करने की जरुरत है। सब पर सवाल उठाने वाले माध्यम ही जब सवालों के घेरे में हों तो हमें सोचना होगा कि रास्ता सरल नहीं है। इन सवालों पर सोचना, इनके ठोस और वाजिब हल निकालना पत्रकारिता से प्यार करने वाले हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। हमारी, आपकी, सबकी।


शनिवार, 24 सितंबर 2016

नेटिजन या सिटिजन क्या बनेंगे आप ?

-संजय द्विवेदी

  उपराष्ट्रपति डा.हामिद अंसारी की नई किताब सिटिजन एंड सोसाइटी के विमोचन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि प्रौद्योगिकी के कारण लोग नेट पर आश्रित हो गए हैं, और पारंपरिक सीमाएं विलोपित हो रही हैं। बावजूद इसके परिवार देश की सबसे बड़ी ताकत है। निश्चय ही प्रधानमंत्री हमारे समय के एक बड़े सामाजिक प्रश्न पर संवाद कर रहे थे।
    आज यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि हम पहले सिटिजन(नागरिक) हैं या नेटिजन(इंटरनेट पर आश्रित व्यक्ति)। नेटिजन होना जरूरत है, आदत है या स्टेटस सिंबल? ऐसे में क्या नागरिक धर्म, पारिवारिक दायित्वबोध पीछे छूट गए हैं? देशभक्ति ,राजनीति से लेकर समाजसेवा सब नेट पर ही संभव हो गयी है तो लोगों से क्यों प्रत्यक्ष मिलना? क्यों समाज में जाना और संवाद करना? नेटिजन होना दरअसल एकांत में होना भी है। क्योंकि नेट आपको आपके परिवेश से काटता भी और एकांत भी मांगता है। यह संभव नहीं कि आप नेट पर चैट भी करते रहें और सामने बैठे मनुष्य से संवाद भी। यह भी गजब है कि भरे-पूरे परिवार और महफिलों में भी हमारी उंगलियां स्मार्ट फोन पर होती हैं और संवाद वहां निरंतर है, किंतु हमारे अपने उपेक्षित हैं। महफिलों, सभाओं, विधानसभाओं, कक्षाओं, अंतिम संस्कार स्थल से लेकर भोजन की मेजों पर भी मोबाइल में लगे लोग दिख जाएंगे। मनुष्य ने अपना एकांत रच लिया है, और इस एकांत में भी वह अधीर है। पल-पल स्टेटस चेक करता है कि क्या-कहां से आ गया होगा। यह गजब समय है, जहां एकांत भी कोलाहल से भरे हैं। स्क्रीन चमकीली चीजों और रोशनियों से भरा पड़ा है। इसके चलते हमारे आसपास का सौंदर्य और प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता बेईमानी हो चली है। हमारे अपने प्रतीक्षा में हैं कि हम कुछ कहें, बोलें, बतियाएं पर हमें चैटिंग से फुरसत नहीं है। हम आभासी दुनिया के चमकते चेहरों पर निहाल हैं, कोई इस प्रतीक्षा में है, हम उसे भी निहारेगें। यह अजब सी दुनिया है, नेटिजन होने की सनक से भरी दुनिया, जिसने हमारे लिए अंधेरे रचे हैं और परिवेश से हमें काट दिया है। प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करना और प्रौद्योगिकी के लिए इस्तेमाल होना दोनों दो चीजें हैं, पर हम इसका अंतर करने में विफल हैं।
 हालात यह हैं कि भरे-पूरे परिवार में संवाद की कहीं जगह बची ही नहीं है। माता-पिता और संतति सब नेटिजन बन चुके हैं। उनमें संवाद बंद है, सब के पास चमकती हुयी स्क्रीन है और उससे उपजी व्यस्तताएं। शिक्षा मंदिरों का हाल और बुरा है। कक्षा में उपस्थित शिक्षक अपने विद्यार्थियों तक नहीं पहुंच पा रहा है, मोबाइल यहां भी बाधा बना है। शिक्षक की भरी-पूरी तैयारी के बाद भी उसके विद्यार्थी ज्ञान गूगल गुरू से ही लेना चाहते हैं। शिक्षक भौंचक है। उसके विद्यार्थियों में एकाग्रता का संकट सामने है। वे कंधे उचकाकर फिर स्क्रीन पर चेक करते हैं, नए नोटिफिकेशन से बाक्स भर गया है। बहुत से चित्र, संवाद और बहुत सी अन्य चीजें उनकी प्रतीक्षा में हैं। एकाग्रता, तन्मयता, दत्तचित्तता जैसे शब्द इस विद्यार्थी के लिए अप्रासंगिक हैं। वह किताबों से भाग रहा है, वे भारी हैं और भटका रही हैं। उसे फोकस्ड और पिन पाइंट ज्ञान चाहिए। गूगल तैयार है। गुरू गूगल ने ज्यादातर अध्यापक को अप्रासंगिक कर दिया है। ज्ञान की तलाश किसे है, पहले हम सूचनाओं से तो पार पा लें। आज डिजीटल इंडिया के शिल्पकार प्रधानमंत्री अगर यह कह रहे हैं कि परिवार हमारी सबसे बड़ी ताकत है, तो हमें रूककर सोचना होगा कि प्रौद्योगिकी की जिंदगी में क्या सीमा होनी चाहिए। क्या प्रौद्योगिकी का हम प्रयोग करेंगे या वह हमारा इस्तेमाल करेगी। नेटिजन और सिटिजन क्या समन्वय बनाकर एक साथ चल सकते हैं, इस पर भी सोचना जरूरी है।

    भारत जैसे विविधता और बहुलता से भरे देश में डिजीटल इंडिया के प्रयोग एक डिजीटल डिवाइड भी पैदा कर रहे हैं। एक बड़ा समाज इन चमकीली सूचनाओं से दूर है और उस तक चीजें पहुंचने में वक्त लगेगा। सूचनाएं और संवाद किसी भी समाज की शक्ति होती हैं। वह उसकी ताकत को बढ़ाती हैं। लेकिन नाहक, प्रायोजित और संपादित सूचनाएं कई तरह के खतरे भी पैदा करती हैं। क्या हमें हमारे देश की वास्तविक सूचनाएं देने के जतन हो रहे हैं? क्या हम इस देश को उस तरह से चीन्हते हैं जैसा यह है? 128 करोड़ आबादी, 122 भाषाएं और 1800 बोलियों वाले 33 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले देश की आकांक्षाएं, उसके सपने, उसके दुख-सुख-आर्तनाद क्या हमें पता हैं? क्या हमें पता है कि एक वनवासी कैसे बस्तर या अबूझमाड़ के जंगलों में हमारे लोकतंत्र की प्रतीक्षा में सात दशक गवां चुका है? गांव, गरीब, किसान की बातें करते-करते थक चुकी हमारी सरकारें और संवेदनहीन प्रशासनिक तंत्र क्या इस चमकीले डिजीटल इंडिया के सहारे भी हाशिए पर पड़े लोगों के लिए कोई स्पेस ढूंढ पाएगा। समर्थों की चाकरी में जुटी सारी नौकरशाही क्या लोकसेवक होने के वास्तविक अहसास से भर पाएगा। कहते हैं लोकतंत्र सौ साल में साकार होता है। सत्तर साल पूरे कर चुके इस देश में 70 प्रतिशत तो लोकतंत्र आ जाना चाहिए था, किंतु देश के बड़े बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा 2016 में भी हमारे लोकतंत्र को 50-50 बता रहे हैं। ऐसे में नागरिक बोध और नागरिक चेतना से लैस मनुष्यों के निर्माण में हमारी चूक साफ नजर आ रही है।  लोकतंत्र कुछ समर्थ लोगों और प्रभु वर्गों की ताबेदारी बनकर सहमा हुआ सा नजर आता है। परिवार हमारी शक्ति है और समाज हमारी सामूहिक शक्ति। व्यवस्था के काले हाथ परिवार और समाज दोनों की सामूहिक शक्ति को नष्ट करने पर आमादा हैं। समाज की शक्ति को तोड़कर, उन्हें गुटों में बांटकर राजनीति अपने लक्ष्य संधान तो कर रही है पर देश हार रहा है। समाज को सामाजिक दंड शक्ति के रूप में करना था किंतु वह राजनीतिक के हाथों तोड़ा जा रहा है, रोज और सुबह-शाम। आज समाज नहीं राजनीति पंच बन बैठी है, वह हमें हमारा होना और जीना सिखा रही है। राजरंग और भोग में डूबा हुआ समाज बनाती व्यवस्था को सवाल रास कहां आते हैं। इसलिए सवाल उठाता सोशल मीडिया भी नागवार गुजरता है। सवाल उठाते नौजवान भी आंख में चुभते हैं। सवाल उठाता मीडिया भी रास नहीं आता। सवाल उठाने वाले बेमौत मारे जाते हैं, ताकि समाज सहम जाए, चुप हो जाए। नेटिजन से पहले सिटिजन और उससे पहले मनुष्य बनना, खुद की और समाज की मुक्ति के लिए संघर्ष किसी भी जीवित इंसान की पहली शर्त है। लोग नेट पर आश्रित भले हो गए हों, किंतु उन्हें लौटना उसी परिवार के पास है जहां संवेदना है, आंसू हैं, भरोसा है, धड़कता दिल है और ढेर सारा प्यार है।

शनिवार, 7 जून 2014

सोशल मीडिया जिसका है नाम !


सामाजिक परिवर्तन और बदलाव की संभावनाओं का प्रेरक है यह माध्यम
-संजय द्विवेदी
   भारतीय समाज में किसी नए प्रयोग को लेकर इतनी स्वीकार्यता कभी नहीं थी, जितनी कम समय में सोशल मीडिया ने अर्जित की है। जब इसे सोशल मीडिया कहा गया तो कई विद्वानों ने पूछा अरे भाई क्या बाकी मीडिया अनसोशल है? अगर वे भी सामाजिक हैं,तो यह सामाजिक मीडिया कैसे? किंतु समय ने साबित किया कि यह वास्तव में सोशल मीडिया है।
   पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है। दृश्य, विचार, कमेंट् और निजी सृजनात्मकता के अनुभव जब यहां तैरने शुरू हुए तो लोकतंत्र के पहरूओं और सरकारों का भी इसका अहसास हुआ। आज वे सब भी अपनी सामाजिकता के विस्तार के लिए सोशल मीडिया पर आ चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं भी कहा कि सोशल मीडिया नहीं होता तो हिंदुस्तान की क्रियेटिविटी का पता ही नहीं चलता। सोशल मीडिया अपने स्वभाव में ही बेहद लोकतांत्रिक है। जाति, धर्म, भाषा, लिंग और रंग की सीमाएं तोड़कर इसने न सिर्फ पारंपरिक मीडिया को चुनौती दी है वरन् यह सही मायने में आम आदमी का माध्यम बन गया है। इसने संवाद को निंरतर, समय से पार और लगातार बना दिया है। इसने न सिर्फ आपकी निजता को स्थापित किया है वरन एकांत को भी भर दिया है।
   सूचनाएं आज मुक्त हैं और वे इंटरनेट के पंखों पर उड़ रही हैं। सूचना 21 वीं सदी की सबसे बड़ी ताकत बनी तो सोशल मीडिया, सभी उपलब्ध मीडिया माध्यमों में सबसे लोकप्रिय माध्यम बन गया। सूचनाएं अब ताकतवर देशों, बड़ी कंपनियों और धनपतियों द्वारा चलाए जा रहे प्रचार माध्यमों की मोहताज नहीं रहीं। वे कभी भी वायरल हो सकती हैं और कहीं से भी वैश्विक हो सकती हैं। स्नोडेन और जूलियन असांजे को याद कीजिए। सूचनाओं ने अपना अलग गणतंत्र रच लिया है। निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही है। वार्तालाप अब वैश्विक हो रहे हैं। इस वचुर्अल दुनिया में आपका होना ही आपको पहचान दिला रहा है। ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय कहने वाले देश में अब एक वाक्य का विचार क्रांति बन रहा है। यही विचार की ताकत है कि वह किताबों और विद्वानों के इंतजार में नहीं है।
   सोशल साइट्स का समाजशास्त्र अलग है। यहां ट्वीट फैशन भी है और सामाजिक काम भी। फेसबुक और ट्विटर नए गणराज्य हैं। इस खूबसूरत दुनिया में आपकी मौजूदगी को दर्ज करते हुए गणतंत्र। एक नया भूगोल और नया प्रतिपल नया इतिहास रचते हुए गणतंत्र। निजी जिंदगी से लेकर जनांदोलन और चुनावों तक अपनी गंभीर मौजूदगी को दर्ज करवा रहा ये माध्यम, सबको आवाज और सबकी वाणी देने के संकल्प से लबरेज है। कंप्यूटर से आगे अब स्मार्ट होते मोबाइल इसे गति दे रहे हैं। इंटरनेट की प्रकृति ही ऐसी है कि वह डिजीटल गैप को समाप्त करने की संभावनाओं से भरा –पूरा है। यहां मनुष्य न तो सत्ता का मोहताज है, न ही व्यापार का। कोई भी मनुष्यता सहअस्तित्व से ही सार्थक और जीवंत बनती है। यहां यह संभव होता हुआ दिख रहा है।
  अपने तमाम नकारात्मक प्रभावों के बावजूद इसके उपयोग के प्रति बढ़ती ललक बताती है कि सोशल मीडिया का यह असर अभी और बढ़ने वाला है। 2014 के अंत तक मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले साढे सात करोड़ हो जाएंगें। यह विस्तार इस माध्यम को शक्ति देने वाला है। इसे टाइम किलिंग मशीन और धोखे का बाजार कहने वाले भी कम नहीं हैं। अपसंस्कृति के विस्तार का भी इसे दोषी माना जाने लगा है। व्यक्ति का हाइपरऐक्टिव होना, उसकी एकाग्रता में कमी,अवसाद और एबिलिटी में कमी जैसे दोष भी इस माध्यम को दिए जाने लगे हैं। इसके स्वास्थ्यगत प्रभावों, मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर बातचीत तेज हो रही है। ऐसे में यह मान लेने में हिचक नहीं करनी चाहिए कि यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी। झूठ, बेईमानी, अपराध और बेवफाई के किस्से हैं तो दूसरी तरफ निभ रही दोस्तियों की लंबी कहानियां हैं। हो चुकी और चल रही शादियों की लंबी श्रृंखला है। आज जबकि अस्सी प्रतिशत युवा सोशल नेटवर्क पर हैं, तो शोध यह भी बताते हैं कि दिन में इन माध्यमों के अभ्यासी 111 (एक सौ ग्यारह) बार मोबाइल चेक करते हैं। जाहिर तौर पर यह सच है तो एकाग्रता में कमी आना संभव है। आज देश के लगभग 22 करोड़ लोग इंटरनेट पर हैं। आप देखें तो कभी किसी भी माध्यम के प्रति इतना स्वागत भाव नहीं था। फिल्में आई तो अच्छे घरों के लोग न इसमें काम करते थे, ना ही वे फिल्में देखने जाते थे। मां-पिता से छिपकर युवा सिनेमा देखने जाते थे। टीवी आया तो उसे भी इडियट बाक्स कहा गया। टीवी को लगातार देखते हुए भी हिंदुस्तान उसके प्रति आलोचना के भाव से भरा रहा और आज भी है। किंतु सोशल मीडिया के प्रति आरंभ से ही स्वागत भाव है। इसके प्रति समाज में अस्वीकृति नहीं दिखती क्योंकि यह कहीं न कहीं संबंधों का विस्तार कर रहा है। संवाद की गुंजाइश बना रहा है। रहिए कनेक्ट के नारे को साकार कर रहा है। इसके सही और सार्थक इस्तेमाल से छवियां गढ़ी जा रही हैं, चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं। समाज में पारदर्शिता का विस्तार हो रहा है। लोग कहने लगे हैं। प्रतिक्रिया करने लगे हैं।
  इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा किसी भी माध्यम का गलत इस्तेमाल हमें संकट में ही डालता है। यह समय इंफारमेशन वारफेयर का भी है और साइको वारफेयर का भी। इस दौर में सूचनाएं मुक्त हैं और प्रभावित कर रही हैं। यहां संपादक अनुपस्थित है और रिर्पोटर भी प्रामाणिक नहीं हैं। इसलिए सूचनाओं की वास्तविकता भी जांची जानी चाहिए। कई बार जो संकट खड़े हो रहे हैं, वह वास्तविकता से दूर होते हैं। सोशल मीडिया की पहुंच और प्रभाव को देखते हुए यहां दी जा रही सूचनाओं के सावधान इस्तेमाल की जरूरत भी महसूस की जाती है। इसे अफवाहें, तनाव और वैमनस्य फैलाने का माध्यम बनाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। हमारे साईबर कानूनों में भी अपेक्षित गंभीरता का अभाव है और समझ की भी कमी है। इसके चलते तमाम स्थानों पर निर्दोष लोग प्रताड़ित भी रहे हैं। पुणे में एक इंजीनियर की हत्या सभ्य समाज पर एक तमाचा ही है। ऐसे में हमें एक ऐसा समाज रचने की जरूरत है जहां संवाद कड़वाहटों से मुक्त और निरंतर हो। जहां समाज के सवालों के हल खोजे जाएं न कि नए विवाद और वितंडावाद को जन्म दिया जाए। सोशल मीडिया में समरस और मानवीय समाज की रचना की शक्ति छिपी है। किंतु उसकी यह संभावना उसके इस्तेमाल करने वालों में छिपी हुयी है। इसका सही इस्तेमाल ही हमें इसके वास्तविक लाभ दिला सकता है। सामाजिक सवालों पर जागरूकता और जनचेतना के जागरण में भी यह माध्यम सहायक सिद्ध हो सकता है। आम चुनावों में राजनीतिक दलों ने इस माध्यम की ताकत को इस्तेमाल किया और समझा है। आज युवा शक्ति के इस माध्यम में बड़ी उपस्थित के चलते इसे सामाजिक बदलाव और परिवर्तन का वाहक भी माना जा रहा है। सकात्मकता से भरे-पूरे युवा और सामाजिक सोच से लैस लोग इस माध्यम से उपजी शक्ति को भारत के निर्माण में लगा सकते हैं। ऐसे समय में जब सोशल मीडिया की शक्ति का प्रगटीकरण साफ है, हमें इसके सावधान, सर्तक और समाज के लिए उपयोगी प्रयोगों की तरफ बढ़ने की जरूरत है। यदि ऐसा संभव हो सका तो सोशल मीडिया की शक्ति हमारे लोकतंत्र के लिए वरदान साबित हो सकती है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)