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गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

राजेंद्र माथुर होने का मतलब

पुण्यतिथि ( 9 अप्रैल, 1991) पर विशेष

राजेंद्र माथुर यानी हिंदी पत्रकारिता का वह नाम जिसे छोड़कर हम पूरे नहीं हो सकते। उनकी बनाई राह आज उनकी अनुपस्थिति में ज्यादा व्यापक और स्वीकार्य होती जा रही है। वे सच्चे अर्थों में पत्रकार थे और उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को नए मुहावरे, शिल्प, अभिनव प्रयोगों से संवारा। वे इस सदी के एक ऐसे पत्रकार थे, जिसको एक साथ अखबार की स्वीकार्यता,विविधता और जिम्मेदारी का अहसास था। वे सिर्फ संपादक नहीं, विचारों के शिल्पी, कलाकार और इंजीनियर थे।

अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे श्री माथुर जब पत्रकारिता में आए तो उन्होंने विचार की पत्रकारिता की ही राह चुनी। वे खबरों के साथ- साथ विचार को भी महत्वपूर्ण मानते थे। वे घटनाओं के होने की प्रक्रिया के और उनके प्रभावों के सजग व्याख्याता थे। राष्ट्रीय स्तर के पत्र-प्रतिष्ठान से जुड़े होने के बावजूद संपादक पद का रौब-रूतबा उन्हें छू तक नहीं पाया था।

अंग्रेजी में साधिकार लिखने की क्षमता के बावजूद उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को अपना क्षेत्र बनाया। उनकी यह चिंता हमेशा बनी रही कि अखबार लोक से जुड़ें और लोकमंगल के लिए काम करें। वे हिंदी की पत्रकारिता को अंग्रेजी पत्रकारिता से हर दृष्टि से बेहतर देखना चाहते थे। उनकी नजर हमेशा इस बात पर लगी रही कि कैसे हिंदी के पाठकों को एक बेहतर अखबार दिया जा सकता है। उनका संपूर्ण अखबार कैसा होगा, यह वे काफी कुछ नई दुनिया व नवभारत टाइम्स के माध्यम से करते भी नजर आए। परंतु वे संतुष्ट होकर बैठने वाले लोगों में न थे। निरंतर बेहतर संभावनाओं की तलाश में जुटे रहे। वे बराबर इस बात पर जोर देते रहे कि जिला स्तर पर अच्छे अखबार निकलने चाहिए। वे यह भी मानते थे कि हर प्रदेश के दूर-दराज इलाकों तक पहुंचने पर ही कोई अखबार राष्ट्रीय हो सकता है।
अपनी इसी सोच को क्रियान्वित करने के लिए उन्होंने नवभारत टाइम्स के जयपुर, लखनऊ और पटना संस्करण प्रारंभ कराए। यह अलग बात है कि बाद में ये तीनों संस्करण तमाम कारणों से बंद हो गए। माथुर जी मानते थे कि राष्ट्रीय पत्रों के स्थानीय संस्करणों से प्रांतीय पत्रकारिता में निखार आएगा और राष्ट्रीय अखबारों से कुछ सीखने को मिलेगा। पर हुआ उल्टा। प्रांतीय पत्र तो आगे बढ़े और राष्ट्रीय पत्र ही फिसड्डी साबित हुए।

राजेंद्र माथुर व्यवसाय के शिल्प और कौशल से बड़ी गंभीरता से जुड़े थे। वे जब संपूर्ण पत्र की बात करते थे तो उनकी नजर में विचारों और समाचारों की मिश्रित संवेदना से जुड़ा अखबार होता था। ऐसा अखबार जिसके पाठक न सिर्फ सूचनाएं पाएं वरन विचारों की गहराइयों से भी जुड़ें। वे पत्र की विविधता, क्षेत्रीयता एवं भाषायी समझ पर अपनी निजी समझ रखते थे। दिल्ली में बैठकर भी वे मालवांचल के क्षेत्रीय शब्दों का इतना बेहतरीन इस्तेमाल करते थे कि वह सबकी समझ में आ जाता था।
वे सत्ता और पत्रकारिता की दोस्ती नहीं चाहते थे। उनकी यह धारणा हठ के स्तर पर विद्यमान थी। वे बेबाक लिखते थे। उन्हें न तो विवाद पैदा करने का शौक था न ही वे विवादों से डरते थे। अपनी बात को पूरी दृढ़ता से कहना और उसपर डटे रहना उनकी आदत में शुमार था। इसलिए पार्टी लाइन तो दूर उनके लेखन में पोलिटकल लाइन भी तलाशना मुश्किल है। अपनी गलतियों को स्वीकार करना और पूर्व लिखित को साहस के साथ गलत बताना उनके ही वश की बात थी। जहां वे गलत होते स्वीकार लेते थे। आप पूछें कि पहले तो आपने इस विषय पर यह कहा था तो वे कहते अब मेरा यह विचार है। इस सहज वृत्ति को आप अस्थिर सोच या विरोधाभास कह सकते हैं, पर माथुर जी के संदर्भ में यह कहने का साहस नहीं पालना चाहिए। अपने लेखन में बातचीत करते हुए पाठक को विचारों की भूमि पर ले जाते थे। वह उनके भाषायी सम्मोहन में बंधा चला भी जाता था। उनके लेखन से सवालों की कौंध पैदा होती थी।
राजनीति के प्रति संतुलित और संयमित दृष्टिकोण के नाते उन्हें किसी खूंटे में नहीं बांधा जा सकता। लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गुजरकर वे किसी भी पक्ष को समाज निर्माण की प्रक्रिया में सहभागी होते देखना चाहते थे। उनके लिए कोई भी अश्पृश्य नहीं था। वह चाहे हिंदूवादी हो या साम्यवादी। वे जातिभेद के, वर्गभेद के लगातार उठते नारों और हुंकारों की भयावहता से परिचित थे। वे बराबर यह समझने की प्रक्रिया में लगे रहे कि सामाजिक न्याय की लड़ाई का रूप ऐसा क्यों हो रहा है। इन अर्थों में वे समाज को बांटने वाली शक्तियों के खिलाफ थे। यही कशमकश उनके लेखन में कहीं उनसे आरक्षण का सर्मथन कराती है तो कहीं थोड़ा विरोध।

वे आम नागरिक की तरह पत्रकारों से भी अपेक्षित जिम्मेदारी निभाने की गारंटी चाहते थे। वे चाहते थे कि शब्द ताकत लोंगों में नहीं, सत्ता में भय पैदा करे। ताकि सत्ता शब्द की हिंसा न कर सके। अपनी पत्रकारिता को उन्होंने लोंगों के संत्रासों से जोड़ा। आज जबकि भाषाई पत्रकारिता कई तरह की चुनौतियों से जूझ रही है राजेंद्र माथुर जैसे संपादक की याद बहुत स्वाभाविक और मामिर्क हो उठती है।

बुधवार, 30 अप्रैल 2008

कलम हुए हाथ


गिरीश पंकज ने जब 1997 में एक बड़े दैनिक अख़बार की नौकरी से अलविदा कह कर अकेले चलने का फैसला किया तो उनके चाहने वालों ने भी इसे एक बेवकूफ़ी ही माना। 2007 में पहुंच कर हमें अगर आज उनका फैसला जायज लग रहा है तो इसके पीछे उनका संघर्ष ही है। गिरीश पंकज ने साबित किया कि दैनिक पत्रकारिता से हट कर भी कोई पत्रकार अपनी अर्थवत्ता बचाए और बनाए रख सकता है। कोई नौकरी न करते हुए सिर्फ मसिजीवी हो कर जीना हिन्दी में कितना कठिन है, इसे सब जानते हैं। पंकज ने इसे संभव कर दिखाया। वे हमारे बीच छत्तीसगढ़ के इकलौते पूर्णकालिक लेखक हैं।

दैनिक पत्रकारिता से अलग हो कर जैसे गिरीश पंकज के लिए सारा जहां एक घर हो गया। देश-देशांतर को नापते हुए पंकज, तेजी से किताबें लिखते हुए पंकज, छत्तीसगढ़ राज्य और देश की तमाम प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हुए पंकज, मंचों पर अपनी भुवनमोहिनी मुस्कान बिखेरते हुए पंकज, ऐसी न जाने कितनी छवियां आज उनके नाम से चिपकी हुई हैं। पंकज के हाथ कलम हो गए हैं, जिसे उन्होंने लिखने की मशीन में बदल दिया है। समय का जितना सार्थक और रचनात्मक उपयोग वे कर रहे हैं उसके चलते उनसे सिर्फ ईर्ष्या की जा सकती है। पर पंकज गजब हैं। वे टाटा के ट्रक में बदल गए हैं, जिनके पीछे लिखा हुआ है - 'जलो मत मुकाबला करो।

पंकज ने जो सबसे महत्वपूर्ण काम किया है वह 'सद्भावना दर्पण का प्रकाशन। इससे उनकी न सिर्फ देशव्यापी पहचान बनी वरन दस सालों से लगातार प्रकाशित हो रही इस पत्रिका ने देश-विदेश के तमाम महत्वपूर्ण साहित्य को अनूदित कर हिन्दी में उपलब्ध कराने का काम किया। सद्भावना की इस यात्रा ने गिरीश पंकज को एक ऐसे संपादक में बदल दिया जिसने एक नए परिवेश के साथ हिन्दी जगत को वह सामग्री उपलब्ध कराई जो दुर्लभ थी। सद्भावना के कई विशेषांक पंकज की इस खूबी को रेखांकित करते हैं।

पंकज मानते हैं कि वे गांधी से बहुत प्रभावित हैं। पर उनका पूरा लेखन उन्हें कबीर के आसपास खड़ा करता है। जिससे पंकज लोगों पर उंगली उठाते नजर आते हैं। मूलत: व्यंग्यकार होने के नाते यह उनकी मजबूरी भी है। यही पंकज की सीमा भी है, यही उनका सामर्थ्य भी। अपने दो व्यंग्य उपन्यासों 'मिठलबरा और 'माफिया के चलते वे चर्चा और विवादों के केन्द्र में भी आए। उनके पात्र पत्रकारिता और साहित्य के संदर्भों से ही उठाए गए हैं। जाहिर है पंकज को तारीफ के साथ ताने भी मिले। इसकी परवाह पंकज को नहीं है। अब वे 'बालीवुड की अप्सरा नामक एक महत्वपूर्ण उपन्यास लिख रहे हैं। इसमें छत्तीसगढ़ जैसे क्षेत्रीय अंचलों में सिनेमा के नाम पर क्या कुछ चल रहा है इसकी झलक मिलेगी। वहीं जब वे पत्रकारीय टिप्पणियां लिख रहे होते हैं तो उनका व्यंग्यकार उनके अखबारी लेखन को समृध्द करता है।

दो नावों की यह सवारी पंकज को कभी भारी नहीं पड़ी। इसका उन्हें फायदा ही मिला। एक पत्रकार होने के नाते जहां वे तत्कालीन संदर्भों में रचना की तलाश कर लेते हैं वहीं अपनी रचना में पत्रकारी गुणधर्म के नाते आम आदमी से संवाद बना लेते हैं। इन अर्थों में पंकज का कवरेज एरिया बहुत ज्यादा है। अपने व्यक्तिगत जीवन में पंकज जितने सहज, अत्मीय, सहृदय और भोले दिखते हैं, लेखन में वे इसके उलट आचरण करते हैं। वहीं वे अन्याय, अत्याचार, शोषण, पाखंड, विषमता, विसंगतियों के खिलाफ जूझते नजर आते हैं। वे नंगे सच को कहने में यकीन रखते हैं। प्रिय सत्य बोलना उन्हें नहीं आता। शायद इसीलिए उन्हें कबीर की परंपरा से जोड़ना ज्यादा उचित है। कबीर का सच कड़वा ही होता है। उसे सुनने के लिए कलेजा चाहिए पंकज को दया का पात्र दिखना पसंद नहीं है। शायद इसीलिए वे ज्यादातर मित्रों की ईर्ष्या के पात्र हैं। पंकज के लिए रिश्ते ही सब कुछ नहीं है। दोस्ती के नाम पर खुशी-खुशी बेवकूफ बनना उन्हें गवारा है। वे रिश्तों में ऐसे रच-बस जाते हैं कि कुछ सूझता ही नहीं। दोस्ती और संबंधों में वे जितने सकारात्मक हो सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा हैं। वे कभी-कभी बुरा लिख बोल तो सकते हैं, लेकिन बुरा कर नहीं सकते। उन्हें जानने वाले यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि पंकज का इस्तेमाल कितना आसान है। पंकज इसके लिए तत्पर भी रहते हैं। दोस्ती में फना हो जाना पंकज की आदत जो है।

पंकज ने लिखा और खूब लिखा है। खासकर बच्चों के लिए उन्होंने जो साहित्य रचा है, वह अद्भुत है। बंगला में हर बड़ा लेखक बच्चों के लिए जरूर लिखता है पर हिन्दी में यह परंपरा नहीं है। यहां बाल साहित्य लिखना दोयम दर्जे का काम है। पंकज ने इस दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है और एक अभाव की पूर्ति की है। उनका बालसुलभ स्वभाव उनकी अभिव्यक्ति को अधिक प्रवहमान बनाता है। उनकी बाल कविताएं एक ऐसे भविष्य का निर्माण करने की प्रेरणाभूमि बनती हैं, जिसे हम सब देखना चाहते हैं।

इसी तरह एक समर्थ व्यंग्यकार होने के नाते वे सामयिक संदर्भों पर चुटीली टिप्पणियां करने से भी नहीं चूकते। उनके तमाम व्यंग्य संग्रह एक समर्थ रचनाकार होने की गवाही देते हैं। पंकज ने मंचों पर भी कविताएं पढ़ी है। उनकी कविताओं में ओज भी है और लालित्य भी। लगातार विदेश यात्राओं ने उनके अनुभव संसार को अधिक समृध्द किया है और उनकी दृष्टि भी व्यापक हुई है। राजनैतिक संदर्भों पर उनकी टिप्पणियां समय-समय पर अखबारों में आती रहती है। जिसमें एक सजग नागरिक की चिंताएं दिखती हैं। अपनी अखबारी टिप्पणियों में पंकज एक गांभीर्य लिए हुए एक निश्चित संदेश देते हैं।

सलवा-जुडूम जैसे आंदोलनों पर उन्होंने शायद सबसे पहले सकारात्मक टिप्पणी की। समय के साथ संवाद की यह क्षमता उन्हें अपने समय का एक महत्वपूर्ण पत्रकार बनाती है। साहित्य के क्षेत्र में जा कर आम जनता के सवालों पर जिस संवेदनशीलता के साथ वे बातचीत करते हैं, वह उन्हें अलग दर्जा दिलाता है। मंचों पर उनकी टिप्पणियां आम लोगों का भी दिल जीत लेती है। क्योंकि वे सिर्फ और सिर्फ सच बोलना जाते हैं। बड़े से बड़ा आदमी अनुचित टिप्पणी कर बच नहीं सकता। बशर्ते पंकज को उसके बाद बोलना हो।

वे बड़े हो कर भी इतने सामान्य हैं कि उनकी साधारणता भी असाधारण बन गई है। भरोसा नहीं होता कि इतनी सहजता, सरलता और मृदुता से रसपगा यह व्यक्तित्व कभी-कभी अनुचित होता देख कर इतना उग्र क्यों हो जाता है। सच तो यह है कि पंकज सच की साधना करते हैं। सच और लोकाचार में उन्हें किसी एक का पक्ष लेना हो तो वे सत्य के पक्ष में खड़े होंगे। यह बात दावे से इसलिए कही जा सकती है क्योंकि पंकज किसी का लिखा झूठ भी बर्दाश्त नहीं कर सकते।

शनिवार, 26 अप्रैल 2008

पहचान बनाने की जद्दोजहद




वह एक ऐसा इंसान है जो जो पिछले 32 सालों से रायपुर शहर की गरीब बस्तियों में धर्मार्थ चिकित्सा सेवा कर रहा है। वह है जो राज्य की अस्मिता के लिए सतत निगरानी करते हुए एक लेखक और संवेदनशील इंसान के तौर पर खुद को साबित कर रहा है। संघर्ष पर भरोसा उठने लगे तो इस आदमी की तरफ देखिएगा। वह बहुत दूर का नहीं, बहुत बड़ा भी नहीं, एक साधारण सा आदमी है जिसके खाते में असाधारण उपलब्धियां दर्ज हैं। जी हां, बात डा. राजेन्द्र सोनी की हो रही है। वे जिद और जिजीविषा का दूसरा नाम हैं। आयुर्वेद के चिकित्सिक हैं लेकिन उन्हें साहित्य की हर पैथी में हाथ आजमाने का शौक है। वे साहित्यकार हैं, चित्रकार हैं,व्यंग्यकार हैं,समाजसेवी हैं और न जाने क्या-क्या हैं।


राजेन्द्र जी को देख उनके खास होने का अंदाज नहीं होता,कारण वे ठेठ छत्तीसगढी मानस हैं जिसे न तो आत्मप्रचार आता है न ही मार्केटिंग की कलाएं। फिर भी उपलब्धिों के नाम पर उनके पास एक बड़ा आकाश है। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के महत्वपूर्ण रचनाकार ही नहीं हैं बल्कि लघुकथा को देश में स्थापित करने वाले कलमकारों में एक हैं। दावे की पुष्टि हो जाए तो शायद वे राज्य के प्रथम लघुकथाकार एवं हाइकू लेखक भी साबित हो जाएं। वे ऐसे लेखक नहीं हैं जो लिखकर मुक्त हो जाता है, वे मैदान के सिपाही हैं। जो राज्य की अस्मिता के नायक हरि ठाकुर के साथ छत्तीसगढ राज्य के निर्माण के आंदोलन में भी कूद पड़ता है तो अंधश्रध्दा के निर्मूलन के लिए गांव-गांव घूमकर ट्रिक्स प्रदर्शन और कानूनी कार्रवाई तथा चेतना जगाने का काम भी कर सकता है।


राजनांदगांव के घुमका गांव में 9 अगस्त,1953 को जन्में डा. सोनी के पिता रामलाल सोनी जन्मजात कलाकार थे। वे कई मूक फिल्मों जैसे राजा हरिश्चंद्र तारामती,वीर अभिमन्यु आदि में अभिनय कर चुके थे। वे अभिनय के साथ-साथ उच्चकोटि के जेवर निर्माता भी थे। ऐसे कलाधर्मी रूङाानों वाले पिता का प्रभाव डा. सोनी के जीवन पर साफ दिखता है। रामलीला में रोल करने के साथ-साथ मूर्तिकला, फाइनआर्ट, पेंटिंग पर भी राजेन्द्र सोनी ने अपने को आजमाया। छठवीं कक्षा से ही कविताएं लिखने का शौक लगा, जो आज तक साथ है। छत्तीसगढ राज्य की लोक संस्कृति पर उनका काम विलक्षण है। उनके द्वारा लिखे गए लगभग 150 आलेख इस विधा में एक प्रामाणिक उपलब्धि हैं। उनकी पहली कविता छत्तीसगढी सेवक में छपी , जिसे राजभाषा के अनन्य सेवक श्री जागेश्वर प्रसाद निकालते थे। दुखद यह कि छत्तीसगढी भाषा का यह अखबार अब बंद हो गया है। देश की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लेखन से अपनी खास पहचान बनाने वाले डा. सोनी ने पहचान यात्रा नामक त्रैमासिक पत्रिका के प्रकाशन से राज्य में साहित्य की अलख जगाए रखी है। 1980 में उन्होंने साप्ताहिक के रूप में पहचान का प्रकाशन शुरू किया था। पहचान यात्रा का ऐतिहासिक प्रदेय यह है कि उसने राज्य के नामवर साहित्यकारों जैसे मुकुटधर पाण्डेय, नारायणलाल परमार,हरि ठाकुर जैसे लेखकों पर केंद्रित महत्वपूर्ण विशेषांक प्रकाशित किए।


लघुकथा पर लंबा और सतत काम करने वालों में राजेंद्र सोनी का प्रदेय रेखांकित करने योग्य है। वे लघुकथा के क्षेत्र में 1968 से कार्य कर रहे हैं। अपने पिता की स्मृति में देश में पहली बार लघुकथा लेखन को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने एक पुरस्कार की शुरूआत की । राष्ट्रीय स्तर पर लघुकथा आंदोलन को बल देने के लिए नवें दशक की लघुकथा नामक पुस्तक का संपादन प्रकाशन भी किया। इसके अलावा लगभग 50 लघुकथा संकलनों में संपादक रहे। सृजन सम्मान द्वारा आयोजित प्रथम अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन जो पिछले दिनों रायपुर में सम्पन्न हुआ का संयोजन आपने किया। डा. सोनी लंबे समय से पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। अखबारों में एक कंपोजिटर से लेकर अपने स्वंत्रत बुलेटिन और पत्रिका के संपादन-प्रकाशन तक का काम उन्होंने किया। उनकी एक पुस्तक खोरबाहरा तोला गांधी बनाबो पर आपातकाल में प्रतिबंध भी लगाया गया। इसके अलावा उनकी तीन अन्य किताबें भी राज्य की भाषा छत्तीसगढ़ी में होने के नाते काफी सराही गयीं।


प्रकाशन के क्षेत्र में राज्य के रचनाकारों को पहचान दिलाने के उद्देश्य से डा. सोनी ने पहचान प्रकाशन की शुरूआत की। जिससे 1982 से लेकर अब तक 60 साहित्यिक कृतियों का प्रकाशन किया जा चुका है। अपने लंबे और विविध आयामी कार्यों के लिए उन्हें 10,मई 1994 को राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा द्वारा चिकित्सा समन्वय शोध ग्रंथ हेतु सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें महाराष्ट्र दलित साहित्य अकादमी द्वारा प्रेमचंद सम्मान, लघु आघात सम्मान, अस्मिता सम्मान, ग्राम्य भारती सम्मान, साहित्य श्री सम्मान आदि से अलंकृत किया जा चुका है। अब जबकि राजेन्द्र सोनी अपनी एक सार्थक पारी खेल चुके हैं तो दूसरी पारी में भी उनसे कुछ गंभीर और महत्वपूर्ण कार्य की उम्मीद तो की ही जानी चाहिए। उनकी त्वरा और जिजीविषा देखकर यह भरोसा भी होता है कि वे निराश नहीं करेंगें।

इतिहास रचते मिश्र



डा. रमेंद्रनाथ मिश्र छत्तीसगढ़ के इतिहास के एक ऐसे अध्येता हैं, जिसने अपना पूरा जीवन इस क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहरों और महापुरूषों की परंपरा की तलाश में लगा दिया। वे एक ऐेसे यात्री हैं, जिसने एक ऐसा रास्ता पकड़ा है, जिसकी मंजिल वे जितना चलते हैं, उतनी ही दूर होती जाती है। इतिहास और पुरातत्व की वीथिकाओं में भटकता यह यात्री न जाने कितनी मंजिलें पा चुका है और कितनों की तलाश में है।
भरोसा नहीं होता कि डा. रमेंद्रनाथ मिश्र अब रिटायर हो गए हैं। उनका जोश, जज्बा और योजनाएं देखकर तो ऐसा लगता है कि वे अभी एक लंबी पारी खेलना चाहते हैं। 29 जून 1945 को एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार में जन्मे डा. मिश्र का पूरा जीवन रचना और संघर्ष की अविराम यात्रा है। वे छत्तीसगढ़ के इतिहास के एक ऐसे अध्येता हैं, जिसने अपना पूरा जीवन इस क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहरों और महापुरूषों की परंपरा की तलाश में लगा दिया। उनके मार्गदर्शन में लगभग 60 से अधिक विद्यार्थी पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं, तो लगभग 73 एमफिल के लघुशोध प्रबंध लिखे जा चुके हैं। वे एक ऐेसे यात्री हैं, जिसने एक ऐसा रास्ता पकड़ा है, जिसकी मंजिल वे जितना चलते हैं, उतनी ही दूर होती जाती है। इतिहास और पुरातत्व की वीथिकाओं में भटकता यह यात्री न जाने कितनी मंजिलें पा चुका है और कितनी की तलाश में है। वे रायपुर के समाज जीवन में एक ऐसा सक्रिय हस्तक्षेप हैं कि उनके बिना कोई भी महफिल पूरी नहीं होती। जुझारू इतने कि किसी से भी भिड़ जाएं और अपनी पूरी करवाकर ही वापस हों। एक प्राध्यापक के नाते जहां उनकी लंबी शिष्य परंपरा है, वहीं एक संवेदनशील इंसान होने के नाते उनका कवरेज एरिया बहुत व्यापक है। साहित्य, कला, संस्कृति और समाज जीवन के हर क्षेत्र में उनकी उपस्थिति बहुत गंभीरता से महसूस की जाती है। उनके पिता पं. रघुनाथ मिश्र और मां स्वर्गीय श्रीमती बेनबती देवी दोनों स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागी रहे। क्रांतिकारी तेवर श्री मिश्र को शायद इसीलिए विरासत में मिले। पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर में इतिहास विभागाध्यक्ष के रूप में उनकी सेवाएं बहुत महत्वपूर्ण रहीं। इस दौरान वे युवाओं से हुई लगभग सभी गतिविधियों के प्रेरक रहे। एनसीसी, प्रौढ़ शिक्षा, युवक रेडक्रास और तमाम आयोजन उनके नेतृत्व में होते रहे। उन्होंने अपनी अकादमिक गतिविधियों के माध्यम से विश्वविद्यालय को सदैव सकारात्मक नेतृत्व दिया।
डा. मिश्र के मार्गदर्शन में हुए शोधकार्यों में प्राय: ऐसे कार्य हुए, जिससे छत्तीसगढ़ का गौरवशाली अतीत झांकता है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के महापुरूषों संत गुरु घासीदास, वीर नारायण सिंह, ठा. प्यारेलाल सिंह, वामनराव लाखे, मुंशी अब्दुलरउफ खान, माधवराव सप्रे, सुंदरलाल शर्मा से लेकर बस्तर के आदिवासी विद्रोह तक पर बहुत महत्वपूर्ण शोध कार्य करवाए। इससे छत्तीसगढ़ के प्रति उनके अनुराग का पता चलता है। इसके अलावा उन्होंने स्वयं छत्तीसगढ़ के इतिहास का लेखन किया है, जो एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। उनकी पुस्तक ब्रिटिशकालीन छत्तीसगढ़ का प्रशासनिक इतिहास राज्य के लिए एक महत्पूर्ण दस्तावेज है। छत्तीसगढ़ का राजनैतिक इतिहास और राष्ट्रीय आंदोलन, छत्तीसगढ़ का राजनैतिक सांस्कृतिक इतिहास जैसी किताबें उनके योगदान को रेखांकित करने के लिए काफी हैं। काव्योपाध्याय हीरालाल द्वारा 1921 में रचित छत्तीसगढ़ी व्याकरण का अनुवाद और प्रस्तुति करके उन्होंने छत्तीसगढ़ी को स्थापित करने में अपना योगदान दिया। सन 1820 में मेजर पी. बांस.एग्न्यू द्वारा लिखित प्रतिवेदन 'छत्तीसगढ़ प्रांत या सूबा का अनुवाद कर उन्होंने एक महत्वपूर्ण कार्य तो किया ही साथ ही इस क्षेत्र के राज्य बनने की संभावनाओं पर भी अपनी मुहर लगा दी। इससे न सिर्फ छत्तीसगढ़ क्षेत्र की ऐतिहासिकता प्रमाणित हुई, वरन एक ईकाई के रूप में उसकी एक अलग उपस्थिति का भी अहसास होता है।
वे अध्यापक होने के साथ-साथ समाज जीवन में बहुत सक्रिय रहे हैं। शिक्षा जगत की समस्याओं को लेकर, शिक्षकों की समस्याओं के समाधान को लेकर वे निरंतर जूङाते रहे हैं। समाज के दलित और पिछड़े वर्गों के प्रति उनके मन में गहरा अनुराग है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के आदिवासी और सतनामी समाज के योगदान को ऐतिहासिक रूप से रेखांकित करने की हर प्रयास को स्वर दिया। 'राष्ट्रीय आंदोलन में सतनामी पंथ का योगदान विषय पर पीएचडी की उपाधि उनकी एक छात्रा शंपा चौबे को प्राप्त हुई। इसी तरह छत्तीसगढ़ के सामाजिक जीवन पर गुरु घासीदास का प्रभाव विषय पर पीएचडी की उपाधि सुश्री पद्मा डड़सेना को मिली। इस तरह एक मार्गदर्शक के रूप में उनका योगदान बहुत बड़ा है। वे पं. सुंदरलाल शर्मा शोध पीठ के प्रमुख भी रहे। वे छत्तीसगढ़ के इतिहास और पुरातत्व के एक ऐसे जीवंत प्रवक्ता हैं, जिन्हें आने वाली पीढ़ी को अपना उत्तराधिकार सौंपने में आनंद आता है। पुस्तकों और पत्रिकाओं के संपादन, लेखन और विविध पुस्तकों के सृजन में सहयोगी के रूप में उनकी भूमिका रेखांकित की जाएगी। उनके संपादन में शहीद वीर नारायण सिंह, गुरु घासीदास, पं. सुंदरलाल शर्मा पर केंद्रित महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन जनसंपर्क संचालनालय ने किया है। वे छत्तीसगढ़ में शिक्षा की एक ऐसी परंपरा के उन्नायक और मार्गदर्शक हैं, जिसने अपना पूरा जीवन शिक्षा क्षेत्र को समर्पित कर दिया। आज भी उनके पास ढेरों योजनाएं और करने को बहुत सारा काम है। वे छत्तीसगढ़ के इतिहास विकास में रमे हुए एक ऐसे साधक हैं, जिसने लगातार दिया ही दिया है। शायद उनकी योजनाओं को साकार होता देखने में अभी वक्त लगे लेकिन वे जितनी उर्जा से भरे हैं, वे अपने सपनों को सच करने का माद्दा जरूर रखते हैं। विश्वविद्यालय की लंबी सेवा से अवकाश प्राप्त करने के बाद उनके पास गंभीर चिंतन, मनन के लिए काफी समय है। संभव है कि वे समय का रचनात्मक इस्तेमाल कर छत्तीसगढ़ के लिए कुछ ऐसा महत्वपूर्ण रच जाएं कि आने वाली पीढ़ियां उनके दिखाए रास्ते पर चलकर राज्य के बेहतर भविष्य के सपनों में रंग भर पाएं। फिलहाल तो उन्हें चाहने वाले उनको शुभकामनाएं ही दे सकते हैं।