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बुधवार, 7 मार्च 2012

विकल्पहीनता से उपजा भरोसा


उप्र के परिपक्व फैसले से जगी बदलाव की उम्मीद

-संजय द्विवेदी

उत्तर प्रदेश के लोग कुछ भले न कर पा रहे हों, पिछले दो विधानसभा चुनावों में वे एक स्थिर सरकार जरूर दे रहे हैं। एक राज्य की जनता अपनी नाकारा और अविश्सनीय राजनीति के लिए इससे ज्यादा क्या कर सकती है?अरसे से तो त्रिशंकु और मिली-जुली सरकारों का दंश भोग रहे प्रदेश में पिछले दो चुनावों से जनता ने पूर्ण बहुमत की सरकारें देकर यह बता दिया है कि राजनीति व मीडिया कितने भी भ्रम में हों, जनता के पास ठोस फैसले हैं और उम्मीदें भी।

उत्तर प्रदेश के लोग राजनीतिक दलों और राजनीतिक तंत्र से खासे निराश हैं। ये फैसले उनके लिए कोई उजास जगाने वाले फैसले नहीं हैं बल्कि निराशा में ही लिए गए फैसले हैं। बावजूद इसके वे ठुकराए गए लोगों को फिर-फिर मौका देते हैं कि आओ और कुछ कर सको तो करो, पर यह मत कहना कि आपने त्रिशंकु विधानसभा दे दी क्या करें। सही मायने में 2007 और 2012 दोनों बहुत परिपक्व फैसले हैं जिसमें पहले बसपा और अब सपा को पूर्ण बहुमत की सरकारें देकर राज्य की जनता ने उन पर बड़ी जिम्मेदारियां डाली हैं। ये विकल्पहीनता के भी सबक हैं क्योंकि देश का उद्धार करने का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों कोई उत्तर प्रदेश में कोई वैकल्पिक राजनीतिक चेतना या दर्शन प्रस्तुत नहीं करतीं। उपर से यह आशंका अलग कि चुनाव के बाद त्रिशंकु विधानसभा आने पर सपा के साथ कांग्रेस और बसपा के साथ भाजपा चली जाएगी। जनता ने इस तरह की मिक्स पालिटिक्स को नकारा और अकेले दम पर सरकार चलाने की ताकत पार्टियों को दी।

यह फैसला साधारण नहीं है कि जिस मुलायम सिंह को 2007 में जनता ने नकारा, उनके ही दल को 2012 में फिर ताज दे दिया। कांग्रेस और भाजपा की उप्र में हुयी दुर्गति बताती है, उप्र के लोग उनके वादों पर भरोसा नहीं करते। वे नहीं मानते कि दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक दल अपने दम पर कोई विकल्प राज्य में प्रस्तुत कर रहे हैं। शायद इसीलिए दोनों को राज्य की जनता ने कोई महत्व नहीं दिया। त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में अपना बाजार भाव बढ़ाने के उत्सुक पीस पार्टी जैसे दल भी अब पूर्ण बहुमत की स्थिति में कोई भाव नहीं खा सकते। ऐसे में एक स्वस्थ राजनीतिक परिवेश सरकार गठन के पूर्व ही उपलब्ध है जो उत्तराखंड के नसीब में नहीं आ सका। ऐसे में यह महती जिम्मेदारी अब समाजवादी पार्टी की है कि वह अपने पुराने चेहरे, चाल, चरित्र तीनों में बदलाव लाए। मुलायम के बजाए अखिलेख सिंह यादव एक नया उम्मीदों भरा चेहरा हैं और अमर सिहं से लेकर डीपी यादव से बनी दूरियां सपा के लिए एक शुभ संकेत साबित हुयी हैं। इसे साधारण न मानिए कि सपा का डीपी यादव को इनकार और भाजपा का बाबू सिंह कुशवाहा का स्वीकार एक साधारण घटना है, इस घटना के प्रतीकात्मक महत्व ने ही यह बता दिया कि सपा बदलना चाहती है किंतु भाजपा अभी भी राजनीतिक के परंपरागत विकृत मानकों पर ही खड़ी है। वहीं कांग्रेस में राहुल गांधी भले उप्र के विकास की चिंता में बांहें चढ़ा रहा थे उनके सिपहसालार मुस्लिम वोटों के लिए बाटला हाउस और आरक्षण पर ही चहकते नजर आ रहे थे। यह सारी बातें बताती हैं कि राजनीति अब परंपरागत तरीकों से नहीं हो सकती। उसके लिए विश्वसनीय विकल्प सबसे बड़ी जरूरत है। अखिलेश सिंह यादव का निष्पाप चेहरा इसलिए उप्र जैसे दिग्गजों के अखाड़े में चल जाता है, जबकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष, युवा मोर्चा के अध्यक्ष, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष केशरीनाथ त्रिपाठी सभी खेत रह जाते हैं। नेता पुत्रों और माफियाओं की हार भी इस चुनाव का एक बड़ा सबक है। हमारी राजनीति को इससे सीखना होगा।

यह चुनाव भारी निराशा और विकल्पहीनता में भी उप्र के हिस्से एक नया संदेश लेकर आया है। यह एक नई राजनीति की शुरूआत भी हो सकती है। समाजवादी पार्टी के जिसके हिस्से इस बार सत्ता आयी है वह न तो डा. लोहिया- जयप्रकाश के आदर्शों वाली सपा है न ही वह मुलायम सिंह- अमर सिंह वाली समाजवादी पार्टी है। वह एक बदलती हुयी समाजवादी पार्टी है जिसके तार अब अभिषेक यादव के फैसलों से जुड़े हैं।

आप ध्यान दें, अखिलेश यादव के लिए यह चुनाव अगर इतना कुछ देकर जा रहा है तो इसके मूल में उनकी एक पराजय कथा भी है। अगर अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव, फिरोजाबाद में हुए लोकसभा उपचुनाव में जीत जातीं तो शायद अखिलेश को भी जमीनी हकीकतों का अहसास नहीं होता। किंतु उस चुनाव में राजबब्बर की जीत ने जहां कांग्रेस के अभिमान में वृद्धि की, वहीं अखिलेश को बता दिया कि मुलायम का बेटा होना ही उनका परिचय है, और इसके बाद पिता के नाम के साथ अब उन्हें भी कुछ करना होगा। यही वह क्षण है जिसने अखिलेश को बदला और उप्र का नया नायक बना दिया। सफलता के पीछे सभी भागते हैं किंतु अखिलेश की जमीनी तैयारियों और टिकट वितरण में उनके द्वारा उतारे गए नए चेहरों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। लखनऊ के अभिषेक मिश्र से लेकर अयोध्या की सीट जीतने वाले तेजनारायण उर्फ पवन पाण्डेय ऐसे ही नौजवान थे जो पहली बार मैदान में उतरे और बड़ी सफलताएं पायीं। यहां तक की राहुल गांधी के गढ़ अमेठी में वहां के राजा संजय सिंह की पत्नी अमिता सिंह भी सपा के प्रत्याशी से चुनाव हार गयीं। ये सफलताएं साधारण नहीं हैं।

उप्र में अपनी 300 सभाओं के माध्यम से अखिलेश ने एक वातावरण बनाने का काम किया। यह एक बदलती हुयी सपा थी, जिसके खराब अतीत के बावजूद के पास जनता पास यही चारा था कि वह अखिलेश के वादों पर भरोसा करे। क्योंकि देश के बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा उधार के कप्तानों राहुल गांधी और उमा भारती के भरोसे मैदान में थे। फिर मुद्दों पर उलझन और नेताओं की फौज ने दोनों दलों का कबाड़ा कर दिया। भाजपा के वरूण गांधी से लेकर आदित्यनाथ की भूमिका जहां संदेह से परे नहीं है वहीं कांग्रेस के राज्य से जीते सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों की कोई खास भूमिका नजर नहीं आई। हां अपने उलजलूल बयानों से वे हर दिन सुर्खियां जरूर बटोरते रहे किंतु यह कवायद कांग्रेस के पक्ष में नहीं गयी। ऐसे में यह चुनाव घने अंधेरे में लड़ा गया चुनाव ही था, जिसमें जनता के पास सही मायने में कोई विश्लसनीय विकल्प नहीं था। लड़ाइयां भी साधारण नहीं थी, चार कोण, पांच कोण के मुकाबले फैसलों को कठिन बना रहे थे। यह सारी उलझने चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और एक्जिट पोल में भी साफ दिखती रहीं। किंतु उत्तर प्रदेश के मतदाता ने विकल्पहीनता के बीच भी एक सशक्त विकल्प दिया है। अब समाजवादी पार्टी और उसके नए नेता अखिलेश यादव की यह जिम्मेदारी है कि वे इस दायित्व को स्वीकार करें और जनता से किए गए वायदों पर खरा उतरकर दिखाएं। उनकी विनयशीलता और शैली ने जनता में एक विश्वास पैदा किया है कि वह सपा की पुरानी सरकारों से अलग एक नई राजनीति को उत्तर प्रदेश में प्रारंभ करेंगे। पटरी से उतरे राज्य को एक नई दिशा देंगें।

पड़ोसी राज्य बिहार में विकास की राजनीति उनके लिए प्रेरक बन सकती है क्योंकि समाजवादी आंदोलन की गर्भनाल से निकली जनता दल यू अगर बिहार को नया चेहरा दे सकती है समाजवादी पार्टी उप्र में विकास की राजनीति की वाहक और अपराधीकरण की विरोधी क्यों नहीं बन सकती। राजनीति के आजमाए जा चुके शस्त्रों से अलग अखिलेश सिंह यादव एक नई राजनीति की आधारशिला रख सकते हैं। जिसमें डा.लोहिया की राजनीति के मंत्र हों और नए जमाने के हिसाब से कुछ नए विचार भी हों। किंतु हमें यह मानना होगा कि उनके पिता के राजनीतिक अनुभव जो भी हों किंतु समय बदल गया है। अब राजनीति पुराने मूल्यों पर तो होगी पर पुराने मानकों पर नहीं होगी। जहां जाति, गुंडागर्दी, धर्म. धन और क्षेत्र के सवाल बड़े हो जाते थे।

आज के उत्तर प्रदेश का नौजवान जिसने ज्यादा वोटिंग करते हुए सपा पर भरोसा जताया है, उसकी आशा को परिणाम में बदलने का समय अब आ गया है। सरकारें पांच-पांच सालों पर आएंगी-जाएंगी किंतु अखिलेश को इतिहास की इस घड़ी में मौका मिला है कि वे उत्तर प्रदेश को एक ऐसी दिशा दें, जहां गर्वनेंस और गर्वमेंट दोनों की वापसी होती हुयी दिखे। उत्तर प्रदेश लगभग दो दशकों से एक भागीरथ के इंतजार में है, अखिलेश अगर वह जगह ले पाते हैं तो यह विकल्पहीनता का फैसला भी एक उजले संकल्प में बदल जाएगा और उत्तर प्रदेश तो अपने सपनों में रंग भरने के लिए तैयार बैठा ही है बस उसे एक नायक का इंतजार है। अखिलेश यह जगह भर जाते हैं या अवसर गवां देते हैं,यह देखना दिलचस्प होगा।

बुधवार, 8 जून 2011

उमा भारती से कौन डरता है ?

क्या उनकी ऊर्जा का सार्थक इस्तेमाल कर पाएगी भाजपा
-संजय द्विवेदी

ना-ना करते आखिरकार उमा भारती की घर वापसी हो ही गयी। उमा भारती यानि भारतीय जनता पार्टी का वह चेहरा जिसने राममंदिर आंदोलन में एक आंच पैदा की और बाद के दिनों मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की 10 साल से चल रही सरकार को अपने तेवरों से न सिर्फ घेरा, वरन उनको सत्ता से बाहर कर भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिलाई। बावजूद इसके उमा भारती अगर भाजपा की देहरी पर एक लंबे समय से प्रतीक्षारत थीं, तो इसके मायने बहुत गंभीर हैं।

यह सिर्फ इतना ही नहीं था कि उन्होंने भाजपा के लौहपुरूष लालकृष्ण आडवानी को जिस मुद्रा में चुनौती दी थी, वह बात माफी के काबिल नहीं थी। आडवानी तो उन्हें कब का माफ कर चुके थे, किंतु भाजपा की दूसरी पीढ़ी के प्रायः सभी नेता उमा भारती के साथ खुद को असहज पाते हैं। उनके अपने गृहराज्य मध्यप्रदेश में भी राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। पहले शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र सिंह तोमर की जोड़ी और अब प्रभात झा के रूप में मध्यप्रदेश भाजपा को पूरी तरह से नया चेहरा मिल गया है। ऐसे में उमा भारती की पार्टी में वापसी के लिए सामाजिक न्याय की शक्तियों की लीलाभूमि बने उत्तर प्रदेश से रास्ता बनाया गया है। राजनीति और दबाव की लीला देखिए, यह नेत्री अपनी पार्टी से इस्तीफा देकर लंबे समय से भाजपा के द्वार पर खड़ी हैं। लालकृष्ण आडवानी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का आशीर्वाद पाने के बाद भी उनकी घर वापसी सहज नहीं रही। यह उमा भारती का कौशल ही है कि वे बिना दल और पार्टी के अपनी प्रासंगिकता बनाए रखती हैं। वे गंगा अभियान से देश का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं और बाबा रामदेव के आश्रम में भी हो आती हैं। यानि उनकी त्वरा और गति में, विपरीत हालात के बावजूद भी कोई कमी नहीं है। वे सही मायने में एक ऐसी नेत्री साबित हुयी हैं जो लौट-लौटकर अपने उसी प्रस्थान बिंदु की ओर आता है, जहां उसकी आत्मा है। वे भाजपा और संघ परिवार का प्रिय चेहरा हैं। कार्यकर्ताओं के बीच उनकी अपील है। शायद इसीलिए संघ के नेता चाहते थे कि भाजपा में उनकी वापसी हो। उत्तराखंड में अपने अनशन से जिस तरह उन्होंने देश का ध्यान खींचा। सोनिया गांधी ने भी उन्हें समर्थन देते हुए खत लिखा। यह उमा ही कर सकती हैं क्योंकि वे अकेले चलकर भी न घबराती हैं, न ऊबती हैं।

सामाजिक न्याय की शक्तियों की लीलाभूमि बने उत्तरप्रदेश में पार्टी ने उनको मुख्य प्रचारक के रूप में उतारना तय किया है। उप्र का राजनीतिक मैदान इस समय बसपा, सपा और कांग्रेस के बीच बंटा हुआ है। भाजपा यहां चौथे नंबर की खिलाडी है। उमा भारती राममंदिर आंदोलन का प्रिय चेहरा रही हैं और जाति से लोध हैं, जो पिछड़ा वर्ग की एक जाति है। उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह लोध जाति से आते हैं। वे भाजपा का उप्र में सबसे बड़ा चेहरा थे। अन्यान्य कारणों से वे दो बार भाजपा छोड़ चुके हैं। तीसरी बार उनके पार्टी में आने की उम्मीद अगर हो भी, तो वे अपनी आभा खो चुके हैं। पिछले चुनाव में वे मुलायम सिंह की पार्टी के साथ नजर आए और इससे मुलायम सिंह की भी फजीहत भी अपने दल में हुयी और कल्याण सिंह ने भी अपनी विश्वसनीयता खो दी। उप्र में पिछड़े वोट बैंक को आकर्षित करने के लिए भाजपा तमाम कोशिशें कर चुकी है। राममंदिर आंदोलन से जुडे रहे विनय कटियार, जो जाति से कुर्मी हैं को भी राज्य भाजपा की कमान दी गयी, किंतु पार्टी को खास फायदा नहीं हुआ। विनय कटियार पहले अयोध्या से फिर लखीमपुर से भी हारे। कुल मिलाकर भाजपा के सामने विकल्प न्यूनतम हैं। उसके अनेक दिग्गज नेता राजनाथ सिंह, डा.मुरलीमनोहर जोशी, मुख्तार अब्बास नकवी, विनय कटियार, कलराज मिश्र, लालजी टंडन, ओमप्रकाश सिंह, केशरीनाथ त्रिपाठी, मेनका गांधी इसी इलाके से आते हैं पर मास अपील के लिए कोई लोकप्रिय चेहरा पार्टी के पास नहीं है। ले देकर युवाओं में सांसद वरूण गांधी और योगी आदित्यनाथ थोड़ी भीड़ जरूर खींचते हैं परंतु भाजपा के संगठन तंत्र के हिसाब से उन्हें चला पाना कठिन है। योगी संत हैं, तो उनकी अपनी राजनीति है। वहीं गांधीहोने के नाते वरूण गांधी को नियंत्रित कर, चला पाना भी भाजपा के बस का नहीं दिखता। ऐसे में उमा भारती भाजपा का एक ऐसा चेहरा हैं जिनके पास राजनीतिक अभियान चलाने का अनुभव और मप्र में एक सरकार को उखाड़ फेंकने का स्वर्णिम इतिहास भी है। वे भगवाधारी होने के नाते उप्र के ओबीसी ही नहीं एक बड़े हिंदू जनमानस के बीच परिचित चेहरा हैं। ऐसे में उन्हें आगे कर भाजपा उस लोध और पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक को अपने साथ लाना चाहती है, जो उसका साथ छोड़ गए हैं। नए पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी बार-बार कह रहे हैं, दिल्ली का रास्ता उप्र से होकर जाता है। किंतु पार्टी यहां एक विश्वसनीय विपक्ष भी नहीं बची है। सपा और बसपा से बचा- खुचा वोट बैंक कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को लाभ पहुंचाता है। ऐसे में भाजपा की कोशिश है कि उप्र में सरकार भले न बने किंतु एक सशक्त विपक्ष के रूप में पार्टी विधानसभा में जरूर उभरे। किंतु संकट यह है कि क्या उमा भारती को भाजपा के नेता इस बार भी नियंत्रित कर पाएंगें? उप्र का संकट यह है कि यहां नेता ज्यादा हैं और कार्यकर्ता हताश। उमा भारती कार्यकर्ताओं में उत्साह तो जगा सकती हैं किंतु भाजपा के राज्य से जुड़े नेताओं का वे क्या करेंगीं, जिसमें हर नेता अपने हिसाब से ही पार्टी को चलाना चाहता है। अब भले उमा भारती चुनाव अभियान के कैंपेनर और गंगा अभियान के संयोजक के नाते भाजपा को उप्र में उबारने के प्रयासों में जुटें किंतु उन्हें स्थानीय नेतृत्व का साथ तो आवश्यक है ही। उमा के पास मप्र जैसे बहुत व्यवस्थित प्रदेश संगठन के साथ काम करने का अनुभव है। ऐसे में उमा भारती का जो परंपरागत टेंपरामेंट है, वह उप्र जैसी संगठनात्मक अव्यवस्थाओं को कितना झेल पाएगा, यह भी एक बड़ा सवाल है।

यह बात कही और बताई जा रही है कि वे मध्यप्रदेश भाजपा की राजनीति में ज्यादा रूचि नहीं लेंगीं लेकिन यह भी एक बहुत हवाई बात है। वे मप्र की मुख्यमंत्री रहीं हैं, उनकी सारी राजनीति का केंद्र मध्य प्रदेश रहा है, ऐसे में वे अपने गृहराज्य से निरपेक्ष होकर काम कर पाएंगी, यह संभव नहीं दिखता। किंतु मप्र में भाजपा के समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं और उप्र का मैदान बहुत कठिन है। उमा इस समय मप्र और उप्र दोनों राज्यों में एक असहज उपस्थिति हैं। उन्हें अपनी स्वीकार्यता बनाने और स्थापित करने के लिए फिर से एक लंबी यात्रा तय करनी होगी। उप्र का मैदान उनके लिए एक कठिन कुरूक्षेत्र हैं, जहां से सार्थक परिणाम लाना एक दूर की कौड़ी है। किंतु अपनी मेहनत, वक्रता और आक्रामक अभियान के अपने पिछले रिकार्ड के चलते वे पस्तहाल उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए एक बड़ी सौगात है। किंतु इसके लिए उमा भारती को अपेक्षित श्रम, रचनाशीलता का परिचय देते हुए धैर्य भी रखना होगा। अपने विवादित बयानों, पल-पल बदलते व्यवहार से उन्होंने खूब सुर्खियां बटोरी हैं, किंतु इस दौर में उन्होंने खुद का विश्लेषण जरूर किया होगा। वे अगर संभलकर अपनी दूसरी पारी की शुरूआत करती हैं तो कोई कारण नहीं कि उमा भारती फिर से भाजपा व संघ परिवार का सबसे प्रिय चेहरा बन सकती हैं।