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गुरुवार, 2 जनवरी 2020

राधेश्याम शर्मा होने का मतलब


एक ध्येयनिष्ठ पत्रकार, संवेदनशील मनुष्य के रूप में याद किया जाएगा उन्हें
-प्रो. संजय द्विवेदी


     इस साल का दिसंबर महीना जाते-जाते एक ऐसा आघात दे गया है जिसे हमारे जैसे तमाम लोग अरसे तक भूल नहीं पाएंगे। यह 28 दिसंबर,2019 का दिन था, शनिवार का दिन, इसी दिन शाम को हमारे प्रिय पत्रकार-संपादक और अभिभावक श्री राधेश्याम शर्मा ने पंचकूला में आखिरी सांसें लीं। साल के आखिरी दिन 31 दिसंबर को भोपाल के माधवराव सप्रे संग्रहालय में नगर के बुद्धिजीवी पत्रकार और संपादक जुटे, उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देने। इस शोकसभा की खासियत यह थी कि यहां सभी धाराओं के बुद्धिजीवियों ने राधेश्याम शर्मा को जिस रूप में याद किया वह दुर्लभ है। इस महती सभा में रघु ठाकुर से लेकर विजयदत्त श्रीधर, कैलाशचंद्र पंत, महेश श्रीवास्तव, लज्जाशंकर हरदेनिया, राजेंद्र शर्मा, राकेश दीक्षित, दविंदर कौर उप्पल, गिरीश उपाध्याय, विजयमनोहर तिवारी और लाजपत आहूजा तक की मौजूदगी बताती है कि राधेश्याम जी का संपर्कों का संसार कितना व्यापक था। एक पत्रकार जिसकी अपनी वैचारिक आस्थाएं बहुत प्रकट हों। जिसने अपने विचाराधारात्मक आग्रहों को कभी छिपाया नहीं, किंतु उसकी राजनीति के सभी धाराओं के नायकों से भरोसे वाली दोस्ती हो यह संभव कहां है? आज की पत्रकारिता में वैचारिक आस्थाएं जिस तरह कट्टरता में बदली हैं और अखाड़ों में पहलवानों की तरह खम ठोंके जा रहे हों वहां राधेश्याम जी जैसे पत्रकार की मौजूदगी एक दीपस्तंभ की तरह थी। जहां विचारों के साथ मनुष्यता और संवेदना जगह पाती थी। उन्होंने अपनी वैचारिक और व्यावसायिक प्रतिबद्धता को हमेशा अलग रखा।
      अपने विद्यार्थी जीवन में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में पढ़ते हुए ही वे पत्रकारिता से जुड़ गए थे। 1956 में उन्होंने पूरी तरह अपने आपको पत्रकारीय कर्म में समर्पित कर दिया। तब से लेकर आजतक मध्यप्रदेश से लेकर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली की पत्रकारिता में उन्होंने अपने उजले पदचिन्ह छोड़े। एक नगर प्रतिनिधि से काम प्रारंभ कर वे विशेष संवाददाता और फिर दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण अखबार के संपादक बने। इतने बड़े अखबार के संपादक पद पर रहते हुए ही उन्होंने उसे छोड़कर मीडिया शिक्षा के लिए खुद को समर्पित कर दिया और 1990 में भोपाल में स्थापित हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पहले महानिदेशक (अब पदनाम कुलपति है)बने। इसके बाद वे हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक भी बने। अपनी पूरी जीवन यात्रा में उन्होंने कभी मूल्यों से समझौता नहीं किया।
सक्रिय पत्रकार, योग्य संपादकः
      भोपाल के तमाम लोग उनकी पत्रकारिता के गवाह हैं, जिन्होंने एक रिर्पोटर के रुप में उनकी सक्रियता भरे दिन देखे हैं। राजनेताओं से उनकी निकटता जगजाहिर थी। दैनिक युगधर्म के संवाददाता के रूप में वे भोपाल में पदस्थ थे। उनका अखबार जबलपुर से निकलता था, कुछ प्रतियां ही भोपाल आती थीं। किंतु उनका संपर्क और व्यवहार ऐसा था कि लोग उनपर भरोसा करते थे। कांग्रेस, भाजपा, सोशलिस्ट,कम्युनिस्ट सब उनके दोस्त थे। दोस्ती भी ऐसी कि राज की बातें उन्हें बताते, जिसकी गवाही सुबह उनका अखबार देता था। राजनीतिक गलियारों में उन दिनों भोपाल के वीटी जोशी, लज्जाशंकर हरदेनिया, सत्यनारायण श्रीवास्तव, दाऊलाल साखी, तरूण कुमार भादुड़ी जैसे पत्रकारों की तूती बोलती थी। किंतु राधेश्याम जी इन सबमें अपनी संपर्कशीलता, सरल स्वभाव और पारिवारिक रिश्तों के चलते एक अलग स्थान रखते थे। आज भी भोपाल के लोग उन्हें याद कर भावुक हो उठते हैं।
     बाद के दिनों में वे युगधर्म के संपादक होकर जबलपुर चले गए और उसके बाद वे चंडीगढ़ चले गए। इन सारे प्रवासों के बीच भी भोपाल उनका एक घर बना रहा। वे आते तो सबकी हाल लेते, सबसे मिलते और परिवारों में जाते। अपने साथियों और अधीनस्थों के परिजनों, बच्चों की स्थिति, प्रगति,पढ़ाई और विवाह सब पर उनकी नजर रहती थी। अपने लंबे पत्रकारीय जीवन में उन्होंने अनेक सर्वोच्च नेताओं, प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों और समकालीन विविध क्षेत्रों के लोगों से लंबे इंटरव्यू किए। मुलाकातें कीं। किंतु उन्हें दादा माखनलाल चतुर्वेदी के साथ उनकी भेंटवार्ता सबसे प्रेरक लगती थी। वे उसे बार-बार याद करते थे। इस भेंट में माखनलाल जी ने उनसे कहा था – पत्रकार की कलम न अटकनी चाहिए, न भटकनी चाहिए, न रुकनी चाहिए, न झुकनी चाहिए। राधेश्याम जी ने इसे अपना जीवन मंत्र बना लिया। अपने संवादों में वे अक्सर इस बात को रेखांकित करते थे। यह संयोग ही था कि वे बाद में दादा के नाम पर बने विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति भी बने। उनके मीडिया चिंतन पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल ने मीडियाः क्रांति या भ्रांति शीर्षक से पुस्तक का प्रकाशन भी 2015 में किया, जिसमें मीडिया को लेकर उनके विमर्शों से हम परिचित हो सकते हैं। सही मायनों में संपादकों की विलुप्त हो रही पीढ़ी में वे एक ऐसे नायक हैं, जिन-सा होना बहुत कठिन है। अपने पद के वैभव और प्रभाव के परे वे बेहद संवेदनशील इंसान थे, जिसने सबका भला चाहा और किया।
पत्रकारिता विश्वविद्यालय की बगिया के मालीः
   उनके हिस्से एक ऐतिहासिक उपलब्धि है- भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्थापना और उसका पहला महानिदेशक नियुक्त होना। एक-एक व्यक्ति को जोड़कर उन्होंने इस विश्वविद्यालय को खड़ा किया और उसकी प्रगति की हर सूचना पर हर्षित होते थे। वे जब भी मिलते तब कहते मैं तो इस बगिया का माली रहा। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे हर छोटे से छोटे व्यक्ति को यह अहसास कराते कि वह कितना महत्त्वपूर्ण है। उनकी इसी विशेषता को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने लिखा-वे केवल राजनेताओं के ही नहीं, अपितु भोपाल के श्रेष्ठ पत्रकारों को एक माला में पिरोने वाले व्यक्ति भी थे।पारिवारिकता उनका वैशिष्ठ्य थी।  पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पुराने छात्र जो आज मीडिया में शिखर पदों पर हैं, उन्हें एक पिता के रूप में याद करते हैं। उनका अभिभावकत्व इतना प्रखर था कि वे इसके अलावा किसी और संज्ञा से नवाजे भी नहीं जा सकते थे। आज जबकि यह विश्वविद्यालय देश में मीडिया शिक्षा का सबसे बड़ा और स्थापित केंद्र बन चुका है, राधेश्याम जी की स्मृति बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है। उनके महानिदेशक रहते हुए ही मैंने भी स्नातक के छात्र रूप में विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था। मैं लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करके आया था और कुलपति के पद की गरिमा को जानता था। किंतु राधेश्याम जी ने एक स्नातक के छात्र से न सिर्फ परिचय प्राप्त किया बल्कि अपने घर पर बुलाकर चाय-नाश्ता कराया और बेहद वात्सल्यमयी अपनी धर्मपत्नी से मिलाया। उनके उस दुलार को  सोचकर आज हैरत होती है कि पत्रकारिता के शिखरों पर रहे शर्मा सर इतनी आत्मीयता कहां से लाते हैं? वे बहुत बड़े थे, जीवन से, मन से और कृति से भी। इसका अहसास उनकी स्नेहछाया में बैठकर होता था।
      बाद के दिनों में वे चंड़ीगढ़ चले गए और मैं अखबारों में काम करते हुए रायपुर, बिलासपुर, मुंबई की परिक्रमा कर भोपाल वापस आ गया। इन दिनों में कोई ऐसा समय नहीं था, जब उन्होंने हमें याद न किया हो। मैं बिलासपुर गया तो बोले मेरे भाई वहां डाक्टर हैं, उनसे मिलो। रायपुर में भी उनके दोस्तों की एक पूरी दुनिया थी। वे बोलते मिलते-जुलते क्यों नहीं ? हमेशा कहते थे रोज अपने तीन पूर्व परिचितों से मिलो और एक नया संपर्क रोज बनाओ। पत्रकारिता में आ रहे लोगों के लिए एक पाठ है यह। हम अमल नहीं कर पाए पर मानते हैं कि कर पाते तो दुनिया ज्यादा बड़ी और बेहतर होती। मेरी शादी से लेकर जीवन के हर प्रसंग उन्होंने चिठ्ठियां भेजीं, फोन किए। आज भी जब तक वे बहुत अस्वस्थ नहीं हो गए, फोन करते हालचाल पूछते। हालचाल मेरा, विश्वविद्यालय का, परिवार का, अपने दोस्तों का। कई बार यह लगता है कि वे इतनी आत्मीयता क्यों देते थे, ऐसा क्या था जो उन्हें हम जैसों से जोड़ता था। वे क्यों हमारी यह खुशफहमियां बनाए रखना चाहते थे कि हम बहुत खास हैं। देश में ऐसे न जाने कितने लोग ऐसे थे जो मानते थे कि वे शर्मा जी के बहुत करीबी हैं। एक महापरिवार उन्होंने खुद बनाया था जिसके वे मुखिया थे। वे प्यार से बड़ी से बड़ी और कड़ी से कड़ी बात कहते जो हमेशा हमारे भले के लिए होती। मीडिया विमर्शपत्रिका का प्रकाशन जब 13 साल पहले रायपुर से प्रारंभ किया तब उन्होंने इसके स्तंभ मेरा समय के लिए अपनी पत्रकारीय यात्रा की पूरी कहानी लिखी। पत्रिका के बारे में बराबर पूछताछ करते और अच्छे सुझाव भी देते। उनके लिए हर व्यक्ति बहुत खास था या वे उसे इसका अहसास कराकर छोड़ते। बहुत गहरी आत्मीयता, वात्सल्य और संवेदना से उन्होंने जो दुनिया रची थी, हमें संतोष है कि हम भी उसके नागरिक थे और उनके साथ उंगलियां पकड़कर उस रास्ते पर थोड़ा चल सके, जिस पर वे पूरी जिंदगी चलते रहे। उस विचार पर भी, उस व्यवहार पर भी जो उन्होंने जिया और हमें जीने के लिए प्रेरित किया। उनका जाना एक सच्चाई है किंतु वे बने रहेंगे हमारी यादों में यह उससे बड़ी सच्चाई है। क्योंकि उन्हें भूलना खुद को भूलना होगा, अपनी जड़ों को भूलना होगा, आत्मीयता और औदार्य को भूलना होगा। रिश्तों की गरमाहट को भूलना होगा।

मंगलवार, 22 मई 2018

वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक श्री माधव गोविंद वैद्य आज डी.लिट् की मानद उपाधि से अलंकृत होगें

वरिष्ठ पत्रकार मा. गो. वैद्य को नागपुर जाकर डी.लिट. सौंपेंगे कुलपति
दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति श्री एम. वैंकैया नायडू ने की थी घोषणा

भोपाल, 23 मई। वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक श्री माधव गोविंद वैद्य को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति श्री जगदीश उपासने नागपुर स्थित उनके निवास पर जाकर 23 मई, बुधवार को विद्या वाचस्पति (डी. लिट.) की मानद उपाधि से सम्मानित करेंगे। इस अवसर पर आयोजित सम्मान समारोह में विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव श्री लाजपत आहूजा और कुलसचिव प्रो. संजय द्विवेदी सहित नागपुर के प्रमुख पत्रकार भी उपस्थित रहेंगे।
उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश विधानसभा के सभागृह में 16 मई को आयोजित दीक्षांत समारोह में भारत के उपराष्ट्रपति एवं विश्वविद्यालय के कुलाध्यक्ष श्री वैंकैया नायडू ने श्री वैद्य को मानद उपाधि दिए जाने की घोषणा की थी। स्वास्थ्यगत कारणों से श्री वैद्य दीक्षांत समारोह में उपस्थित नहीं हो सके थे। विश्वविद्यालय ने निर्णय लिया है कि 23 मई, बुधवार को कुलपति श्री जगदीश उपासने श्री वैद्य को नागपुर स्थित उनके निवास पर जाकर विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि से सम्मानित करेंगे। श्री माधव गोविंद वैद्य लंबे समय से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। उनका जन्म महाराष्ट्र में 11 मार्च, 1923 को हुआ था। प्रारंभ में श्री वैद्य नागपुर के महाविद्यालय में प्राध्यापक रहे। बाद में उन्होंने वर्ष 1966 से 1983 तक लोकप्रिय समाचार पत्र 'तरुण भारत' का संपादन किया। श्री वैद्य ने कई प्रमुख पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया है।
#MCU_Bhopal

गुरुवार, 22 मार्च 2018

एक विलक्षण संपादकः जगदीश उपासने


माखनलाल विश्वविद्यालय के नए कुलपति का है हिंदी पत्रकारिता में खास योगदान
-संजय द्विवेदी



    मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश के सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,भोपाल के कुलपति के रूप में जब ख्यातिनाम पत्रकार श्री जगदीश उपासने का चयन हो चुका है, तब यह जानना जरूरी है कि आखिर हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान क्या है? मध्यप्रदेश के इस महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय के कुलपति बनने से पूर्व उनकी यात्रा रेखांकित की जानी चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए कि वे इस संस्था को और भी गति से आगे ले जाने में कोई कसर नहीं रखेगें।
कापी के मास्टरः
    हिंदी पत्रकारिता में अंग्रेजी पत्रकारिता की तरह कापी संपादन का बहुत रिवाज नहीं है। अपने लेखन और उसकी भाषा के सौंदर्य पर मुग्ध साहित्यकारों के अतिप्रभाव के चलते हिंदी पत्रकारिता का संकोच इस संदर्भ में लंबे समय तक कायम रहा। जनसत्ता और इंडिया टुडे (हिंदी) के दो सुविचारित प्रयोगों को छोड़कर ये बात आज भी कमोबेश कम ही नजर आ रही है। ऐसे समय में जबकि हिंदी पत्रकारिता भाषाई अराजकता और हिंग्लिश की दीवानी हो रही है, तब हिंदी की प्रांजलता और पठनीयता को स्थापित करने वाले संपादकों को जब भी याद किया जाएगा, जगदीश उपासने उनमें से एक हैं। वे कापी संपादन के मास्टर हैं। हिंदी भाषा को लेकर उनका अनुराग इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वे मराठीभाषी हैं। उन्होंने हिंदी की सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका इंडिया टुडे को स्थापित करने में अपना योगदान दिया। इस तरह वे हिंदी के यशस्वी मराठीभाषी संपादकों सर्वश्री विष्णुराव पराड़कर, माधवराव सप्रे, राहुल बारपुते की परंपरा में अपना विनम्र योगदान जोड़ते नजर आते हैं। इंडिया टुडे के माध्यम से उन्होंने जिस हिंदी को प्रस्तुत किया वह प्रभावी, संप्रेषणीय और प्रांजल थी, वह न तो अनुवादी भाषा थी ना उसमें अंग्रेजी के नाहक शब्दों की घुसपैठ थी। यह एक ऐसी हिंदी थी, जिसके पहली बार दर्शन हो रहे थे- पठनीय, प्रवाहमान और सीधे दिल में उतरती हुयी। सही मायनों में उन्होंने पहली बार देश को हिंदी की सरलता और सहजता के साथ-साथ कठिन से कठिन विषयों को प्रस्तुत करने के सामर्थ्य के साथ प्रस्तुत किया।
शानदार पत्रकारीय पारीः
   जनसत्ता, युगधर्म, हिंदुस्तान समाचार जैसे अखबारों व समाचार एजेंसियों में पत्रकारिता करने के बाद जब वे ‘इंडिया टुडे’ पहुंचे तो इस पत्रिका का दावा देश की भाषा में देश की धड़कन बनने का था। समय ने इसे सच कर दिखाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य को टेबलाइट अखबार के बजाए पत्रिका के स्वरूप में निकालने का जब विचार हुआ तो जगदीश उपासने को इसका समूह संपादक बनाया गया। आज पांचजन्य और आर्गनाइजर दोनों प्रकाशन एक नए कलेवर में लोगों के बीच सराहे जा रहे हैं। जनसत्ता को प्रारंभ करने वाली टीम और इंडिया टुडे (हिंदी) की संस्थापक टीम के इस नायक को हमेशा भाषा और उसकी प्राजंलता के विस्तार के लिए जाना जाएगा।
आपातकाल में काटी जेलः
     छत्तीसगढ़ के बालोद कस्बे और रायपुर शहर से अपनी पढ़ाई करते हुए छात्र आंदोलनों और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े जगदीश उपासने ने विधि की परीक्षा में गोल्ड मैडल भी हासिल किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, मप्र के वे प्रमुख कार्यकर्ताओं में एक थे। आपातकाल के दौरान वे तीन माह फरार रहे तो मीसा बंदी के रूप में 16 महीने की जेल भी काटी । उनके माता-पिता का छत्तीसगढ़ के सार्वजनिक जीवन में खासा हस्तक्षेप था। मां रजनीताई उपासने 1977 में रायपुर शहर से विधायक भी चुनी गयीं। उपासने के पिता श्री दत्तात्रेय उपासने जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, प्रख्यात समाज सेवी थे। उपासने परिवार का राजनीति एवं समाज सेवा में काफी योगदान रहा है। परिवार के मुखिया के नाते श्री दत्तात्रेय उपासने ने आपात काल का वह दौर भी झेला था, जब उनके परिवार के अधिकतर सदस्य जेल में डाल दिए गए थे। संघ परिवार में भी उनका अभिभावक जैसा सम्मान था। जगदीश उपासने के अनुज सच्चिदानंद उपासने आज भी छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।
       एक राजनीतिक परिवार और खास विचारधारा से जुड़े होने के बावजूद जगदीश जी ने पत्रकारिता में अपेक्षित संतुलन बनाए रखा। इन अर्थों में वे राष्ट्र के समावेशी चरित्र और उदार लोकतांत्रिक व्यक्तित्व का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। वे अपनी विचारधारा पर गर्व तो करते हैं, किंतु कहीं से कट्टर और जड़वादी नहीं हैं। राष्ट्रबोध और राष्ट्र के लोगों के प्रति प्रेम उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ है। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को एक ऐसी भाषा दी, जिसमें हिंदी का वास्तविक सौंदर्य व्यक्त होता है।
      उन्होंने कई पुस्तकों का संपादन किया है, जिनमें दस खंडों में प्रकाशित सावरकर समग्र काफी महत्वपूर्ण है। टीवी चैनलों में राजनीतिक परिचर्चाओं का आप एक जरूरी चेहरा बन चुके हैं। गंभीर अध्ययन, यात्राएं, लेखन और व्याख्यान उनके शौक हैं। आज जबकि वे मीडिया में एक लंबी और सार्थक पारी खेल कर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार  विश्वविद्यालय के कुलपति बन चुके हैं, तो भी वे रायपुर के अपने एक वरिष्ठ संपादक स्व. दिगंबर सिंह ठाकुर को याद करना नहीं भूलते, जिन्होंने पहली बार उनसे एक कापी तीस बार लिखवायी थी। वे प्रभाष जोशी, प्रभु चावला और बबन प्रसाद मिश्र जैसे वरिष्ठों को अपने कैरियर में दिए गए योगदान के लिए याद करते हैं, जिन्होंने हमेशा उन्हें कुछ अलग करने को प्रेरित किया।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)