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सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

अरसे बाद मुस्कराया देश

-संजय द्विवेदी
  उड़ी हमले के 11 दिन बाद पाक अधिकृत कश्मीर में भारतीय सेना की कार्रवाई सही मायने में हिंदुस्तानी आवाम के जख्मों पर राहत का मलहम सरीखी ही है। लगातार जख्मी किए जा रहे देश को अरसे बाद मुस्कराने का मौका मिला है। भारत एक युद्धकामी देश नहीं है। किंतु उसके पड़ोसी देश की हरकतों ने भारतीय मानस को इतना चोटिल किया है कि पाकिस्तान का नाम भी अब उसके नाम के सुंदर अर्थ के बजाए एक विपरीत अर्थ देता है। पाक के साथ नापाक शब्द अक्सर अखबारों की सुर्खियों में रहता है। कैसे एक देश अपने कुटिल कर्मों से अपने वास्तविक नाम का अर्थ भी खो बैठता है, पाकिस्तान इसका उदाहरण है।
   भारत-पाकिस्तान एक भूगोल, एक इतिहास, एक विरासत और अपनी आजादी के लिए एक साथ जंग लड़ने वाले देश हैं। लेकिन इतिहास किस तरह साझी विरासतों को भी बांटता है कि आज दोनों तरफ आग उगलते दरिया मौजूद हैं। नफरतें, कड़वाहटें और संवादहीनता हमारे समय का सच बन गयी हैं। भारत के लिए अच्छी राय रखना पाकिस्तान में मुश्किल है, तो पाकिस्तान के लिए अच्छे विचार हमारे देश में बुरी बात है। हमने अपनी साझी विरासतों के बजाए साझी नफरतों के सहारे ही ये बीते सात दशक काटे हैं। ये नफरतों के जंगल आज दोनों ओर लहलहा रहे हैं। इन्हें काटने वाले हाथ दिखते नहीं हैं।
एक मानसिक अवस्था है पाकिस्तानः
 पाकिस्तान दरअसल एक मुल्क नहीं, भारत विरोधी विचारों से लबरेज मनोदशा वाले लोगों का समूह है। भारत न हो, तो शायद पाकिस्तान को अपना वजूद बचाना मुश्किल हो जाए। भारत का भय और भारत का प्रेत उसकी राजनीति का प्राणवायु है। जेहादी आतंकवाद ने उसके इस भय को और गहरा किया है। पाकिस्तान एक ऐसा देश बन चुका है, जिसके हाथ अपने मासूम बच्चों को कंधा देते हुए नहीं कांपते। वह आत्मघाती युवाओं की फौज तैयार कर अपने नापाक सपनों को जिलाए रखना चाहता है। जाहिर तौर पर इस पाकिस्तान से जीता नहीं जा सकता। वह एक ऐसा पाकिस्तान बन गया है, जिसने खुद की बरबादी पर दुखी होना छोड़ दिया है, वह भारत के दुखों से खुश होता है। उसे अपने देश में लगी आग नहीं दिखती, वह इस बात पर प्रसन्न है कि कश्मीर भी जल रहा है। उसके अपने लोग कैसी जिंदगी जी रहे हैं, इसकी परवाह किए बिना आईएसआई भारत में आतंकी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर रही है। पाकिस्तान दरअसल एक प्रतिहिंसा में जलता हुआ मुल्क है, जिसे अपनी बेहतरी नहीं भारत की बर्बादी के सपने सुख देते हैं। इस मानसिक अवस्था से उसे निकालना संभव कहां है?
भारत के पास सीमित हैं विकल्पः
भारत के पास पाकिस्तान से लड़ने का विकल्प है पर यह विकल्प भी वह कई बार आजमा चुका है। युद्ध के बजाए पाक को हजार जगह से घाव देना ज्यादा उचित है। कभी यही वाक्य जिया उल हक ने भारत के लिए कहा था कि भारत को हजार जगह घाव दो। आज भारत के पास यही एक विकल्प है कि वह सठे साठ्यं समाचरेत् का पालन करे। दुष्ट के साथ सद् व्यवहार से आप कुछ हासिल नहीं कर सकते। पाकिस्तान का संकट दरअसल उसके निर्माण से जुड़ा हुआ है। वह एक लक्ष्यहीन और ध्येयहीन राष्ट्र है। उसका ध्येय सिर्फ भारत धृणा है। सिर्फ नफरत है। नफरतों के आधार पर देश बन तो जाते हैं, पर चलाए नहीं जा सकते। इसका उदाहरण बंगलादेश है, जिसने पाकिस्तान से मुक्ति ली और आज अपनी किस्मत खुद लिख रहा है। 1947 में भारत और पाकिस्तान ने एक साथ सफर प्रारंभ किया, दोनों देशों की यात्रा का आकलन हमें सत्य के करीब ले जाएगा। पाकिस्तान इतनी विदेशी मदद के बाद भी कहां है और भारत अपने विशाल आकार-प्रकार और भारी आबादी के बाद भी कहां पहुंचा है? भारत ने अपना अलग रास्ता चुना। लोकतंत्र को स्वीकारा और मन से लागू किया। पाकिस्तान आज भी एक नकली लोकतंत्र के तले जी रहा है, जहां फौज राजनैतिक नेतृत्व को नियंत्रित करती हुयी दिखती है।
कश्मीर का क्या करोगेः
   पाकिस्तान की दुखती रग है कश्मीर। क्योंकि कश्मीर द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को बेमानी साबित करता है। ज्यादा मुस्लिम आबादी का क्षेत्र होकर भी भारत के साथ उसका होना पाकिस्तान को सहन नहीं हो रहा है। जबकि सच तो यह है कि द्विराष्ट्रवाद का खोखलापन तो बांगलादेश के निर्माण के साथ ही साबित हो चुका है। भारत को जख्म देकर पाकिस्तान खुद भी पूरी दुनिया में बदनाम हो चुका है। आज समूची दुनिया पाकिस्तान के असली चेहरे को समझ चुकी है। अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी अगर भारत के पक्ष में है तो पाकिस्तान को यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि आंखों का भी पानी होता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिर्फ धर्म के आधार पर समर्थन नहीं बटोरा जा सकता है। जिहादी आतंकवाद से त्रस्त दुनिया सिर्फ हिंदुओं या ईसाईयों की नहीं है, बल्कि बड़ी संख्या में इस्लामी देश भी इसके शिकार है। एक तटस्थ विश्लेषक की तरह सोचे तो रोजाना किसका खून धरती पर गिर रहा है। सोचेगें तो सच सामने आएगा। इस आतंक की शिकार सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी ही है। जेहादी आतंकवाद मुसलमानों को ही निगल रहा है। पूरी दुनिया का इस्लाम के प्रति नजरिया बदल रहा है। लोग इस्लाम को आतंक से जुड़ा मानने लगे हैं। इस तस्वीर को बदलना दरअसल मुस्लिम समुदाय, मुस्लिम देशों और मुस्लिम विद्वानों की जिम्मेदारी है। हमारा मजहब शांति का मजहब है, यह कहकर नहीं बल्कि करके दिखाना होगा। आतंकवाद के किसी भी स्वरूप का खंडन करना, उसके विरूद्ध विश्व जनमत को खड़ा करना ही विकल्प है।
    पाकिस्तान का एक देश के नाते अनेक क्षेत्रीय अस्मिताओं और राष्ट्रीयताओं से मुकाबला है। बलूचिस्तान और सिंध उनमें से चर्चित हैं। धर्म भी पाक को जोड़ने वाली शक्ति साबित नहीं हो पा रहा है, क्योंकि क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति को पाकिस्तान ठीक से संबोधित नहीं कर पाया। पाक अधिकृत कश्मीर के हालात और भी खराब हैं। भारत के साथ कश्मीर का जो हिस्सा है, उससे तो पीओके की तुलना ही नहीं का जा सकती। पाकिस्तान से अपना मुल्क नहीं संभल रहा है और वह कश्मीर के सपने देख रहा है। जबकि सच तो यह है कि कश्मीर को पाकिस्तान कभी लड़कर हासिल नहीं कर सकता। इस जंग में पाकिस्तान की हार तय है। वह अपने हाथ जला सकता है। खुद की तबाही के इंतजाम कर सकता है। सिर्फ अपनी आंतरिक राजनीति को संभालने के लिए वह जरूर कश्मीर का इस्तेमाल कर सकता है।

    आज विश्व मानवता के सामने शांति और सुख से रहने के सवाल अहम हैं। देशों की जंग में आम आवाम ही हारता है। इसलिए भारतीय उपमहाद्वीप को युद्ध से रोकना हर जिम्मेदार पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी की जिम्मेदारी है। जंग से तबाही, मौतों और आर्तनाद के सिवा हमें क्या मिलेगा, यह हम भी जानते हैं। पाकिस्तान को एक रहना है, तो उसे अपने भस्मासुरों पर लगाम लगानी ही पड़ेगी अन्यथा अपने आंतरिक और बाह्य संकटों के चलते उसके टुकड़े-टुकड़े होने में अब ज्यादा देर नहीं है।

सोमवार, 19 सितंबर 2016

एक विफल देश का शोक गीत !

-संजय द्विवेदी

   पाकिस्तान प्रायोजित हमलों से तबाह भारत आज दुखी है, संतप्त है और क्षोभ से भरा हुआ है। उसकी जंग एक ऐसे देश से है जो असफल हो चुका है, नष्ट हो चुका है और जिसके पास खुद को संयुक्त रखने का एक ही उपाय है कि भारत के साथ युद्ध के हालात बने रहें। भारत का भय ही अब पाकिस्तान के एक रहने का गारंटी है।
   पाकिस्तान जैसा पड़ोसी पाकर कोई भी देश सिर्फ दुखी रह सकता है। क्योंकि पाकिस्तान में सरकार जैसी कोई चीज है नहीं, और है भी तो, सेना तथा आतंकी समूहों पर उसका कोई जोर नहीं है। ऐसे में भारत किसके साथ संवाद करना चाह रहा है, किससे रिश्ते सुधारना चाह रहा है? और इस उम्मीद में कि पड़ोसी सुधर जाएगा सात दशक बीत चुके हैं, कश्मीर से लेकर देश की आंतरिक सुरक्षा को बिगाड़ने के लिए पाकिस्तान ने कितने षडयंत्र किए यह किसी से छिपी बात नहीं है। किंतु यह सिलसिला जारी है और इसके रूकने की उम्मीद कम है। अच्छा आतंकवाद और बुरा आतंकवाद की थ्योरी पर काम कर रहे पाकिस्तान को पता है कि चीजें उसके हाथ से भी निकल चुकी हैं। वह अपने ही बनाए जाल में इस तरह फंस चुका है कि उसका सत्ता प्रतिष्ठान भी अब चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता। आतंकी संगठन और मौलाना वहां की सत्ता को इस तरह निर्देशित कर रहे हैं कि सत्ता अपने मायने खो बैठी है।
   कश्मीर की जंग को भी दरअसल जमीन पर लड़ते हुए पाकिस्तान थक चुका है। इसलिए उसने सीधी कार्रवाई के बजाए कश्मीर के युवाओं को आगे किया है। यह पत्थर फेंकने वाला गिरोह दरअसल पाकिस्तान प्रेरित गुमराह युवा हैं, जिन्हें पाकिस्तान रूपी जन्नत की हकीकत अभी पता नहीं हैं। वे आजादी के मायने में नहीं जानते वरना उन्हें पाक अधिकृत कश्मीर के हालात देखने चाहिए,जो उनसे ज्यादा दूर नहीं है। पाकिस्तान की इस आत्मघाती मानसिकता के निर्माण के पीछे दरअसल उसके जन्म की कथा को भी देखना चाहिए। वह एक ऐसा राष्ट्र है, जिसका कोई सपना नहीं है। वह हर तरह से भारत के विरोध से उपजा हुआ एक देश है। जिसने जिद करके एक भूगोल पाया है।
   पाकिस्तान की रगों में भारत-घृणा का खून है। वह एक बैचेन देश है, जिसने अपने सपने तो पूरे किए नहीं और न खुद की एकता कायम रख सका। अपने लोगों पर दमन-अत्याचार की कहानी उसने बंटवारे के बाद फिर दोहराई जिसका परिणाम बंगलादेश के रूप में सामने आया। आज भी वह बलूचिस्तान, गिलगित और पीओके में यही कर रहा है। जम्मू और कश्मीर में भी उसे शांति सहन नहीं होती। भारत में रहकर प्रगति कर रहे इलाके उसे रास नहीं आते। यहां हो रही चौतरफा समृद्धि से उसे डाह होती है। बाकी देशों की तुलना में पाकिस्तान की जलन और कुढ़न ज्यादा है, क्योंकि वह भारत से अलग होकर बना देश है। भारत विरोध उसके डीएनए में है। खुद को बनाने, विकसित करने और अपनी ज्यादातर आबादी की खुशी के बजाए उसका सारा ध्यान भारत को नष्ट करने, उसे तबाह करने में है।
    एक नष्ट हो चुका देश, अपने लोगों को न्याय दिलाने के बजाए बंदूकों और तोपों से बलूचिस्तान को रौंद रहा है। ऐसे देश से मानवीय पहल की उम्मीदें व्यर्थ हैं। उनसे यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि वे लोगों की मौतों और आर्तनाद पर कोई संवेदना भरी प्रतिक्रिया देगें। भारत जैसे देश ने पिछले सालों में आतंकवाद के नाम पर काफी कुछ सहा है, भोगा है। यह एक अंतहीन  पीड़ा है जिससे देश अब निजात चाहता है। अपने लोगों की मौत पर उन्हें कंधा देते-देते भारत का मन दुखी है। वह एक विफल देश द्वारा दिए जा रहे जख्मों को अब और नहीं सह सकता। पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान को यह सोचना होगा कि भारत से तीन युद्ध लड़कर उसे क्या मिला?  एक देश अलग हो गया- जिसका नाम बंगलादेश है। पाकिस्तान अब एक छद्म युद्ध लड़ रहा है और भारत को उलझाए रखना चाहता है। एक विफल देश इससे ज्यादा कर भी क्या सकता है। किंतु भारत के पास अब धीरज खो देने के अलावा क्या विकल्प हैं। निश्चित ही भारत अमरीका नहीं है। वह रूस भी नहीं है, लेकिन भारत एक स्वाभिमानी राष्ट्र जरूर है। उसे पता है अपने मुकुट मणि जम्मू-कश्मीर को दिए जा रहे धावों का कैसा जवाब पाकिस्तान को देना है।

   पाकिस्तानी दरअसल एक बदहवासी में डूबा देश बन चुका है। जहां तर्क गायब हैं। जहां बुद्धिजीवियों, पढ़े-लिखे तबकों की जुबानें बंद हैं। जहां भावना के आधार पर पंथिक तकरीरें करने वाले लोग वहां का मिजाज बना रहे हैं। पाकिस्तान ने एक देश के रूप में अपने आप पर भरोसा खो दिया है। वहां पर नान स्टेट एक्टर्स ज्यादा प्रभावी भूमिका में दिखते हैं। ऐसे में इस पाकिस्तान का कायम रहना मानवता के लिए एक बड़ा संकट है। समूची दुनिया इस खतरे को देख रही है, महसूस कर रही है। भारत के जख्म भी अब नासूर बन चुके हैं। आज पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान चाहकर भी विश्व समुदाय से कोई वादा करने की स्थिति में नहीं है। वह आतंकी समूहों के प्रति मौन रहने के लिए मजबूर है। जिन्ना का पाकिस्तान सच में बिखर चुका है। वह मानसिक,वैचारिक, सांगठनिक तीनों घरातल पर एक टूटा हुआ देश है। बहुत सी क्षेत्रीय अस्मिताएं वहां इस पाकिस्तान से मुक्ति के लिए चिंतित और प्रयासरत हैं। एक विफल देश के साथ हर कोई अपनी किस्मत नहीं जोड़ना चाहता। हर सुबह काम पर जाते पाकिस्तानी शाम को घर सुरक्षित आने की दुआएं करते हुए निकलते हैं। कराची से लेकर मुजफ्फराबाद तक यह आग फैली हुयी है। विश्व शांति के लिए खतरा बन चुके पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान से मुक्ति ही इस संकट का समाधान है। ताकि इस उपमहाद्वीप के लोग फिर से एक खूबसूरत-शांति प्रिय समाज और जमीन का सपना देख सकें। क्या एक विफल हो चुके देश से मुक्ति अब विश्व मानवता का सपना नहीं होना चाहिए? लोगों के सुख-चैन और एक बेहतर दुनिया के लिए आप कितना बर्दाश्त करेगें? भारत को तोड़ने का सपना देखने वाले अब इंतिहा कर चुके हैं। सब्र का प्याला भी भर चुका है। ऐसे समय में विश्व समुदाय को पाकिस्तान संकट का स्थार्ई हल निकालने के लिए तुरंत आगे आना चाहिए, ताकि एक सुंदर दुनिया का सपने देखने की चाहत रखने वाली आंखें थक न जाएं। 

शनिवार, 20 अगस्त 2016

हमारा कश्मीर, तुम्हारा बलूचिस्तान

-संजय द्विवेदी

     देर से ही सही भारत की सरकार ने एक ऐसे कड़वे सच पर हाथ रख दिया है जिससे पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान को मिर्ची लगनी ही थी। दूसरों के मामले में दखल देने और आतंकवाद को निर्यात करने की आदतन बीमारियां कैसे किसी देश को खुद की आग में जला डालती हैं, पाकिस्तान इसका उदाहरण है। बदले की आग में जलता पाकिस्तान कई लड़ाईयां हारकर भारत के खिलाफ एक छद्म युद्ध लड़ रहा है और कश्मीर के बहाने उसे जिलाए हुए है। पड़ोसी को छकाए-पकाए और आतंकित रखने की कोशिशों में उसने आतंकवाद को जिस तरह पाला-पोसा और राज्याश्रय दिया, आज वही लोग उसके लिए भस्मासुर बन गए हैं।
     दुनिया के देशों के बीच पाकिस्तानी वीजा एक लांछित और संदिग्ध वस्तु है। वहां के नागरिक जीवन में जिस तरह का भय और असुरक्षा व्याप्त है, उससे पाकिस्तान के जनजीवन के हालत का पता चलता है। सही मायने में वह अपनी ही लगाई आग में सुलगता हुआ देश है। जिसका खुद की ही कोई मुकाम और लक्ष्य नहीं है, वह भारत की तबाही में ही अपनी खुशी खोज रहा है। बावजूद इसके भारतीय उपमहाद्वीप के देश कहां से कहां जा पहुंचे हैं पर पाकिस्तान नीचे ही जा रहा है। अमरीकी और चीनी मदद और इमदाद पर वहां का सत्ता प्रतिष्ठान जिंदा है एवं लोग परेशान हाल हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस समय बलूचिस्तान, पीओके तथा गिलगित के सवाल उठाए हैं, यह वक्त ही इसके लिए सही समय है। यह समय पाकिस्तान को आईना दिखाने का भी है और कश्मीरी भाईयों को यह बताने का भी है कि पाकिस्तान के साथ होकर उनका हाल क्या हो सकता है। यहां सवाल नीयत का है। विश्व जानता है कि भारत ने कश्मीर की प्रगति और विकास के लिए क्या कुछ नहीं किया। आप पीओके से भारत के कश्मीर की तुलना करके प्रसन्न हो सकते हैं कि यहां पर भारत ने अपना सारा कुछ दांव पर लगाकर विकास के हर काम किए हैं।
    कश्मीर में लगातार बंद, हिंसा और आतंक की वजह से विकास की गति धीमी होने के बावजूद भी भारत सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, आवागमन और व्यापार हर नजरिए से कश्मीर को ताकत देन की कोशिशें की हैं। कश्मीर की वादियों में आतंक के बाद भी वहां विकास की गतिविधियां निरंतर हैं। अराजकता के बाद भी इरादे चट्टानी हैं। भारत की संसद ने हर बार उसे अपना अभिन्न अंग माना और नागरिकों को हो रहे कष्टों पर दुख जताया। यह नागरिकों को मिले दर्द से उपजी पीड़ा ही थी कि कश्मीरी नागरिकों को पैलेट गन से लगी चोटों पर संसद से लेकर न्यायपालिका तक चिंतित नजर आई। इस संवेदना को क्या बलूचिस्तान और पीओके में रह रहे लोग महसूस कर सकते हैं? क्या पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान और पाक सेना के द्वारा किए जा रहे अत्याचारों से दुनिया अनभिज्ञ है? बलूच नेताओं की वाणी से जो दर्द फूट रहा है, वह वहां के आवाम का दर्द है, उनकी पीड़ा है जो वे भोग रहे हैं। पाकिस्तान के अत्याचारों से कराहते ये इलाके उनकी सेना के बूटों से निकली हैवानियत की कहानी बयान करते हैं। बलूचिस्तान के भूमि पुत्र अपनी ही जमीन पर किस तरह लांछित हैं, यह एक काला अध्याय है। जबकि भारत का कश्मीर एक लोकतांत्रिक जमीन का हिस्सा है। भारत का दिल है, भारत का मुकुट है। हमारे कश्मीर में पाक प्रेरित आतंकियों ने बर्बर कार्रवाई कर कश्मीरी पंडितों पर भीषण अत्याचार किए, उन्हें कश्मीर घाटी छोड़ने के लिए विवश कर दिया, किंतु फिर भी हर हिंदुस्तानी कश्मीरी की माटी और वहां के लोगों से उतनी ही मुहब्बत करता है जितनी पहले करता था।
     हर भारतीय को पता है कश्मीर में जो कुछ चल रहा है वह आम कश्मीरी हिंदुस्तानी का स्वभाव नहीं है। उसके नौजवानों को बहला-फुसला कर जेहाद के बहाने जन्नत के ख्वाब दिखाए गए हैं। उन्हें बताया गया है कि पाकिस्तान के साथ जाकर वे एक नई दुनिया में रहेंगें जहां सुख ही होगा, विकास होगा और वे एक नयी जमीन तोड़ सकेंगे। पाकिस्तान प्रेरित आतंकी कभी धन से कभी, आतंकित कर कश्मीरियों का इस्तेमाल कर उनकी जिंदगी को जहन्नुम बना रहे हैं। जबकि उनके द्वारा कब्जा किए गए कश्मीर की हालत लोगों से छिपी नहीं है। बलूचियों का जिस तरह पाकिस्तान ने भरोसा तोड़ा और उनके मान-सम्मान और जीवन जीने के हक भी छीन लिए, वह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में भारत में रहकर पाकिस्तान का सपना देखने वालों की आंखें खुल जानी चाहिए, क्योंकि भारत में होना एक लोकतंत्र में होना है। जहां कोई भी नागरिक- ताकतवर से ताकतवर व्यक्ति, पुलिस या सेना के खिलाफ अपनी बात कर सकता है। उचित मंचों पर शिकायत भी कर सकता है। लेकिन पाकिस्तान में होना सेना और आतंकियों के द्वारा पोषित ऐसे खतरनाक लोगों के बीच रहना है जहां किसी की जान सलामत नहीं है। जो देश अपने नागरिकों में भी भेद रखता है, उनके ऊपर भी दमन चक्र चलाए रखता है। पाकिस्तान की जमीन इन्हीं पापों से लाल है और वहां असहमति के लिए कोई जगह नहीं है। भारत और पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के चरित्र का आकलन और विश्लेषण करने वाले जानते हैं कि भारत ने खुद को पिछले सत्तर सालों में एक लोकतांत्रिक चरित्र के साथ विकसित किया है। अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत और स्थिर किया है। जबकि पाकिस्तान का लोकतंत्र आज भी सेना के बूटों तले कभी भी रौंदा जा सकता है। वहां अल्पसंख्यकों के अधिकारों का क्या हाल है? इतना ही नहीं वहां के तमाम मुसलमान आज किस हाल में हैं। हत्याएं, आतंक और खून वहां का दैनिक चरित्र है।
     पूरी दुनिया के लिए खतरा बन चुके पाकिस्तान की सच्चाईयां सामने लाना जरूरी है। यह बताना जरूरी है कि कैसे सेना, मुल्ला और आतंकवादी मिलकर एक देश और वहां के आवाम को बंधक बना चुके हैं। कैसे वहां पर आतंकवाद को राज्याश्रय मिला हुआ है और सरकारें उनसे कांप रही हैं। पाकिस्तान का कंधा अपने मासूम बच्चों को कंधा देते हुए भी नहीं कांपा। वह आतंकवाद के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें करता है, पर सच यह है कि ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने पाकिस्तान की जमीन पर ही पाया। आज भी ओसामा की मानसिकता लिए अनेक आतंकी और अपराधी वहां खुले आम घूमकर दहशतगर्दों की भर्ती करते हुए पूरी दुनिया में आतंक का निर्यात कर रहे हैं। ऐसे खतरनाक देश का टूटकर बिखर जाना ही विश्व मानवता के हित में है।

( लेखक राजनीतिक विश्वेषक है)

शनिवार, 6 अगस्त 2016

इस गर्जन-तर्जन से क्या हासिल?

अपनी पाकिस्तान यात्रा से आखिर क्या हासिल कर पाए हमारे गृहमंत्री
-संजय द्विवेदी

  जब पूरा पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान कश्मीर में आग लगाने की कोशिशें में जुटा है तब हमारे गृहमंत्री राजनाथ सिंह पाकिस्तान क्यों गए, यह आज भी अबूझ पहेली है। वहां हुयी उपेक्षा, अपमान और भोजन छोड़कर स्वदेश आकर उनकी सिंह गर्जना से क्या हासिल हुआ है? क्या उनके इस प्रवास और आक्रामक वक्तव्य से पाकिस्तान कुछ भी सीख सका है? क्या उसकी सेहत पर इससे कोई फर्क पड़ा है? क्या उनके पाकिस्तान में दिए गए व्याख्यान से पाकिस्तान अब आतंकवादियों की शहादत पर अपना विलाप बंद कर देगा? क्या पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान भारत के प्रति सद्भाव से भर जाएगा और कश्मीर में आतंकवादियों को भेजना कर देगा? जाहिर तौर पर इसमें कुछ भी होने वाला नहीं है। इस यात्रा के बहाने पाकिस्तान के आतंकवादी जहां एक मंच पर आ गए वहीं पाकिस्तानी सरकार की उनके साथ संलग्नता साफ नजर आई। अपनी पीठ ठोंकने को गृहमंत्री और उनकी सरकार दोनों प्रसन्न हो सकते हैं, किंतु सही तो यह है कि संभावित अपमान से बचना ही बुद्धिमत्ता होती है।
   हमारे जाने का न कोई मान था, ना ही लौटकर आने से कोई इज्जत बढ़ी है। पाकिस्तान ने कश्मीर को एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने में सफलता हासिल कर ली है, जबकि हम पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान को लेकर अभी भी संकोच से भरे हैं। आखिर वह दिन कब आएगा जब पाकिस्तान को हम उसी के हथियारों से जवाब देना सीखेगें? हम क्यों पाकिस्तान से रिश्ते रखने, सुधारने और संवाद रखने के लिए मरे जा रहे हैं? क्या हम पाकिस्तान के द्वारा निरंतर किए जा रहे पापों को भूल चुके हैं? पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ कश्मीर के सवाल पर, आतंकियों की पर मौत पर अपना दुख जताकर, कश्मीर को भारत में मिल जाने की दुआ कर रहे हैं। ऐसे में हम कौन सा मुंह लेकर उनसे हाथ मिलाने के लिए आतुर हैं। यह न रणनीति है, न कूटनीति और न ही समझदारी। भारत की इस तरह की कोशिशों से कोई लाभ मिलेगा, इसमें भी संदेह है।
    हमारे गृहमंत्री वहां से जिस मुद्रा में लौटे और जो वक्तव्य संसद में दिया, उसके बाद पूरे देश ने एकमत से उनका साथ दिया। संसद में कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों में एक सुर से उनकी उपेक्षा पर पाकिस्तान को खरी-खोटी सुनाई। एक देश के नाते यह एकजुटता, राष्ट्रीय मुद्दों पर एक राय जरूरी भी है। किंतु क्या जरूरी है कि हम अपमान के अवसर स्वंय तलाशें।
   पाकिस्तान से आज हमारे रिश्ते जिस मोड़ पर हैं, वहां गाड़ी पटरी से उतर चुकी है। एक विफल राष्ट्र पाकिस्तान और सेना की कृपा पर आश्रित वहां की सरकार आखिर आतंकवाद के खिलाफ क्या खाकर लड़ेगी? नवाज शरीफ जैसे परजीवी राजनेता को अगर सत्ता में रहना है तो कश्मीर राग और भारत विरोधी सुर अलापना ही होगा। यह समझना मुश्किल है कि भाजपा सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि वह अपमान, आतंक और हत्याएं सहकर भी पाकिस्तान से बेहतर रिश्ते बनाना चाहती है? हम चाहें तो बंगलादेश जैसै छोटे मुल्क से भी कुछ सीख सकते हैं। श्रीलंका से सीख सकते हैं, जिसने लिट्टे के आतंक का शानदार मुकाबला किया और अपनी अस्मिता को आंच नहीं आने दी। आज हालात यह हैं कि युद्ध के लिए हमारी ही जमीन का इस्तेमाल हो रहा है, हमारे अपने लोग ही हलाक हो रहे हैं। भारतीयों के हाथ में बंदूकें और एके-47 देकर पाकिस्तान ने हमारे सीने छलनी कर रखे हैं। कश्मीर की जंग को हम बहुत साधारण तरीके से ले रहे हैं। क्या हमने तय कर रखा है कि हमें अनंतकाल तक लड़ते ही रहना है, या हम इस छद्म युद्ध की कीमत थोड़ा बढ़ाएंगें। पाकिस्तान के लिए इस लड़ाई की कीमत बढाना ही इसका उपाय है। एक विफल राष्ट्र हमें लगातार धोखा दे रहा है और धोखा खाने को अपनी शान समझ बैठे हैं। किसके दम पर? अपने सैनिकों और आम लोगों के दम पर?
       संसद से लेकर आपके सबसे सुरक्षित एयरबेस तक हमले कर वे हमें बता चुके हैं कि पाकिस्तान क्या कर सकता है। किंतु लगता है कि हम इस छद्म युद्ध के आदी हो चुके हैं। हमें इसके साथ रहने में मजा आने लगा है। एक जमाने में जनरल जिया उल हक ने कहा था भारत को एक हजार जगह धाव दो। गिनिए तो यह संख्या भी पूरी हो चुकी है। भारत का पूरा शरीर छलनी है। हमारे सैनिकों की विधवाएं हमारे सामने एक सवाल की तरह हैं। हिंदुस्तान के कुछ लीडरों ने हालात ऐसे कर दिए हैं कि आप बहस भी नहीं कर सकते। अपनी सुरक्षा चिंताओं पर संवाद करना कठिन होता जा रहा है। आप संवाद इसलिए नहीं करते कि मुसलमान नाराज हो जाएंगें। क्या भारत की सुरक्षा चिंता मुसलमानों और हिंदुओं की साझा चिंता नहीं है। क्या भारत के मुसलमान किसी हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसी और जैनी से कम भारतीय हैं? हम सब पहले हिंदुस्तानी हैं, बाद में कुछ और। इस भावना का विस्तार और लोकव्यापीकरण करना होगा। हमारा जीना-मरना इसी देश के लिए है। इसलिए अपने मानस में बदलाव लाते हुए, हर बात का राजनीतिकरण करने के बजाए, एक नए तरीके से सोचना होगा। ईरान जैसे देश ने सऊदी अरब से अपने राजनायिक संबंध तोड़ लिए , क्या मजबूरी है कि हम पाकिस्तान से रिश्ते बनाए हुए हैं। भारत सरकार पाक में पदस्थ राजनायिकों से कह रही है कि अपने बच्चों को पाकिस्तान के स्कूलों में न पढ़ाएं। क्या ही बड़ी बात होती, हम वहां अपने दूतावास बंद कर देते। आतंकी मानसिकता, धोखे व षडयंत्रों से बनी सोच से बने एक देश से हम दर्द के अलावा क्या पा सकते हैं? भारत की वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना मनुष्यों के लिए है, आतंकी सोच से भरी मानवता के दुश्मनों के लिए नहीं। दक्षेस के देशों को भी पता है कि पाकिस्तान की नीति और नीयत क्या है। खुद श्रीलंका ने लिट्टे के साथ क्या किया। हमें भी विश्व जनमत की बहुत परवाह किए बिना, अपने स्टैंड साफ करने होगें। एक व्यापारी देश की तरह मिमियाने के बजाए ताकत के साथ बात करनी होगी। हमारी जमीन आतंकवाद के लिए इस्तेमाल नहीं होगी, पाक को यह बहुत साफ बताना होगा। इसराइल, श्रीलंका और अमरीका हमारे सामने उदाहरण हैं। हमें भी अपनी शक्ति को पहचानना होगा। वाचिक गर्जन-तर्जन के बजाए, मैदान में उतरकर बताना होगा कि हमारे खिलाफ छद्म युद्ध कितना महंगा है। किंतु लगता है कि हम जबानी तलवारें भांजकर ही अपनी राष्ट्ररक्षा का दम भरते रहेगें और इस कायरता की कीमत सारा देश लंबे समय तक चुकाता रहेगा।

(लेखक राजनीतिक विश्वलेषक हैं)