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शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

राष्ट्र के बौद्धिक विकास में भूमिका निभाए मीडिया


-संजय द्विवेदी

   राष्ट्र के बौद्धिक विकास में मीडिया एक खास भूमिका निभा सकता है। वह अपनी सकारात्मक भूमिका से राष्ट्र के सम्मुख उपस्थित अनेक चुनौतियों के समाधान खोजने की दिशा में वह एक अभियान चला सकता है। दुनिया के अनेक विकसित देशों में वहां के मीडिया ने सामुदायिक विकास में अपना खास योगदान दिया है। भारत का मीडिया तो इस गौरव से युक्त है कि उसने आजादी की लड़ाई में अपना विशेष योगदान दिया। आजादी के बाद भारत के नवनिर्माण में भी उसने भूमिका निभाई। सामाजिक भेदभाव-गैरबराबरी को दूर करने से लेकर अन्याय और शोषण के विरूद्ध पत्रकारिता का इस्तेमाल        
हमेशा एक लोकतंत्र में हथियार की तरह होता रहा है।
  आज दुनिया के तमाम देश प्रगति और विकास की ओर तेजी से बढ़ते भारत को एक नई उम्मीद से देख रहे हैं। भारत के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा की एक नई शुरूआत हुयी है। भारत की पहचान बदल रही है और वह एक समर्थ परंपरा का सांस्कृतिक उत्तराधिकारी मात्र नहीं बल्कि तेजी से सब क्षेत्रों में विकास करता हुआ राष्ट्र है। इसलिए वह उम्मीदें भी जगा रहा है। ऐसे समय में भारतीय मीडिया का आकार-प्रकार और शक्ति भी बढ़ी है। भारत में मीडिया का इस्तेमाल और उपयोग करने वाले लोग भी बढ़े हैं। तमाम संचार माध्यमों से विविध प्रकार की सूचनाएं समाज के सामने उपस्थित हो रही हैं। इसमें सूचनाओं की विविधता भी है और विकृति भी। अधिक सूचनाओं से संपन्न दुनिया बनाने के बजाए हमें सार्थक सूचनाओं की दुनिया बनानी होगी।
     भारत जैसे विविधता और बहुलता के वाहक देश में कोई एक माध्यम या कोई एक बाहरी विचार थोपा नहीं जा सकता। भारत के पास स्वयं का विचार ही इसे जोड़ने और शक्ति देने का काम कर सकता है। हमारे पास दुनिया को देने के लिए श्रेष्ठतम विचार हैं। श्रेष्ठतम जीवन पद्धति है। श्रेष्ठतम सांस्कृतिक धारा है। जिसमें दूसरों का भी स्वीकार है। दूसरों के लिए भी जगह है। भारतीय सांस्कृतिक धारा और उसके विविध पहलुओं पर संवाद के माध्यम से स्वीकृति बनाने का यह उपयुक्त समय है।
   मीडिया इस देश की विविधता और बहुलता को व्यक्त करते हुए इसमें एकत्व के सूत्र निकाल सकता है। गणतंत्र दिवस पर इस शक्ति का प्रगटीकरण हमने होते हुए देखा। भारत की सांस्कृतिक विविधता और शक्ति के दर्शन हमें पहली बार इतने प्रकट रूप में देखने को मिले क्योंकि मीडिया की शक्ति और उसकी उपस्थिति ने पूरे देश को दिल्ली के राजपथ से जोड़ दिया। इसके पूर्व ऐसे आयोजन कई सालों से एक औपचारिकता बनकर रह गए थे जिसे मीडिया भी बहुत महत्व नहीं देता था। इस बार के आयोजन में एक राष्ट्र की शक्ति और उसकी एकता महसूस की गयी। ऐसे अवसरों पर मीडिया की शक्ति प्रकट रूप में दिखती है।
  हमारे देश की ताकत यह है कि हम संकटों में शीघ्र ही एकजुट हो जाते हैं। किंतु संकट टलते ही वह भाव नहीं रहता। हमें इस बात को लोगों के मनों में स्थापित करना है कि वे हर स्थिति में साथ हैं और अच्छे दिनों में साथ मिलकर चल सकते हैं। यही एकात्म भाव है। यही जुड़ाव जिसे जगाने की जरूरत है। बौद्धिकता सिर्फ बुद्धिजीवियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, उसे आम-आदमी के विचार का हिस्सा बनना चाहिए। मीडिया अपने लोगों को प्रबोधन करने में भूमिका निभा सकता है। मीडिया का काम सिर्फ सूचनाएं देना नहीं है अपने पाठकों की रूचि परिष्कार तथा उन्हें बौद्धिक रूप से उन्नत करना भी है। हमें ऐसे मीडिया प्रोफेशनलों की पौध तैयार करनी होगी जो, अपने पाठकों की रूचियों का संसार विस्तृत तो करें हीं उनका परिष्कार भी करें। भौतिक विकास के साथ बुद्धि का स्तर भी बढ़ना जरूरी है। कोई भी लोकतंत्र ऐसे ही सहभाग से साकार होता है। सार्थक होता है। अतः जनता से जुड़े मुद्दे और देश के सवालों की गंभीर समझ पाठकों और दर्शकों में पैदा करना मीडिया की जिम्मेदारी है।

   भारत जैसे देश में मीडिया का प्रभाव पिछले दो दशकों में बहुत बढ़ा है। वह तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था के साथ कदमताल करता हुआ एक बड़े उद्योग में भी बदल गया है। बावजूद हमें यह मानना पड़ेगा कि मीडिया का व्यवसाय अन्य व्यवसायों या उद्योगों सरीखा नहीं है। इसके साथ सामाजिक दायित्वबोध गुंथे हुए हैं। सामाजिक उत्तरदायित्व से रहित मीडिया किसी काम का नहीं है। मीडिया के इसी चरित्र का विकास हमारा दायित्व है। मीडिया के नए बदलावों पर आज सवाल उठने लगे हैं। बाजार के दबावों ने मीडिया प्रबंधकों की रणनीति बदल दी है और बाजार के मूल्यों पर आधारित मीडिया का विकास भी तेजी से हो रहा है। जहां खबरों को बेचने पर जोर है। यहां मूल्य सकुचाए हुए दिखते हैं। समझौते और समर्पण के आधार पर बनने वाला मीडिया किसी भी तरह राष्ट्रीय संकल्पों का वाहक नहीं बन सकता। हमें अपने मीडिया की जड़ों को देखना होगा। वह परंपरा से ही व्यवस्था विरोधी और सामाजिक मूल्यों का संरक्षक और प्रेरक है। इसलिए हमें यह देखना होगा कि हम अपनी जड़ों से अलग न हों। पारंपरिक मूल्यों के आधार पर हम अपने मीडिया का विकास और विस्तार करें। आज मीडिया के प्रभाव के चलते इस क्षेत्र में तमाम तरह ऐसे लोग भी शामिल हुए हैं जिनके सामाजिक सरोकार शून्य हैं। वे विविध साधनों से धन कमाकर मीडिया में अचानक अवतरित हो गए हैं। उनका मुख्य उद्देश्य मीडिया की ताकत का इस्तेमाल करना है। इसके चलते मूल्यों में चौतरफा गिरावट देखने को मिल रही है। घने अंधेरे में रौशनी की चाह और प्रबल होती है। लगातार सच्चाई और अच्छाई की भूख बढ़ रही है। समाज तेजी से बदल रहा है। राजनीति, समाज हर जगह आज शुचिता और सच्चाई की भूख की इच्छा बढ़ रही है। यह इच्छा ही बदलाव की वाहक बनेगी। नए मीडियकर्मियों पर यह दायित्व है कि वे इस जनाकांक्षा को मूर्त रूप देने में सहायक बनें।

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

चुनाव जो मीडिया में ज्यादा और मैदान में कम लड़ा जा रहा

मीडिया की सर्वव्यापी उपस्थिति से जीवंत हो रहा है लोकतंत्र

-संजय द्विवेदी



बेहतर चुनाव कराने की चुनाव आयोग की लंबी कवायद, राजनीतिक दलों का अभूतपूर्व उत्साह,मीडिया सहभागिता और सोशल मीडिया की धमाकेदार उपस्थिति ने इस लोकसभा चुनाव को वास्तव में एक अभूतपूर्व चुनाव में बदल दिया है। चुनाव आयोग के कड़ाई भरे रवैये से अब दिखने में तो उस तरह का प्रचार नजर नहीं आता, जिससे पता चले कि चुनाव कोई उत्सव भी है, पर मीडिया की सर्वव्यापी और सर्वग्राही उपस्थित ने इस कमी को भी पाट दिया है। मोबाइल फोनों से लैस हिंदुस्तानी अपने कान से ही अपने नेता की वाणी सुन रहा है। वे वोट मांग रहे हैं। मतदाता का उत्साह देखिए वह कहता है मुझे रमन सिंह का फोन आया। तो अगला कहता है मेरे पास नरेंद्र मोदी का फोन आ चुका है। शायद कुछ को राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल का भी फोन आया हो। यानि यह चुनाव मीडिया के कंधों पर लड़ा जा रहा है। एक टीवी स्क्रीन पर जैसे ही नरेंद्र मोदी प्रकट होते हैं, तुरंत दूसरा चैनल राहुल गांधी का इंटरव्यू प्रसारित करने लगता है। इसके बाद सबके लिए सोशल मीडिया का मैदान खुलता है, जहां इन दोनों साक्षात्कारों की समीक्षा जारी है।
    वास्तव में इस चुनाव में मीडिया ने जैसी भूमिका निभाई है, उसे रेखांकित किया जाना चाहिए। टेलीविजन पर मुद्दों पर इतनी बहसों का आकाश कब इतना निरंतर और व्यापक था? टीवी माध्यम अपनी सीमाओं के बावजूद जनचर्चा को एक व्यापक विमर्श में बदल रहा है। आपने गलती की नहीं कि आसमान उठा लेने के लिए प्रसार माध्यम तैयार बैठै हैं। सोशल मीडिया की इतनी ताकतवर उपस्थिति कभी देखने को नहीं मिली। इसके प्रभावों का आकलन शेष है। किंतु एक आम हिंदुस्तानी की भावनाएं, उसका गुस्सा,उत्साह, सपने, आकांक्षाएं, तो कभी खीज और बेबसी भी यहां पसरी पड़ी है। वे कह रहे हैं ,सुन रहे हैं और प्रतिक्रिया कर रहे हैं। वे मीडिया की भी आलोचना कर रहे हैं। कभी केजरीवाल तो कभी मोदी के ओवरडोज से वे भन्नाते भी हैं। किंतु यह जारी है और यहां सृजनात्मकता का विस्फोट हो रहा है। इंडिया टीवी पर चला नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू कैसे इस दौर का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला इंटरव्यू बना इसे भी समझिए। अब किसी एक माध्यम की मोनोपोली नहीं रही। एक माध्यम दूसरे की सवारी कर रहा है। एक मीडिया दूसरे मीडिया को ताकत दे रहा है और सभी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए प्रतीत हो रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने शायद इसीलिए अपने साक्षात्कार में यह कहा कि सोशल मीडिया नहीं होता तो आम हिंदुस्तानी की क्रियेटिविटी का पता ही नहीं चलता। आप देखें तो यहां रचनात्मकता कैसे प्रकट होकर लोकव्यापी हो रही है। यहां लेखक, संपादक और रिर्पोटर नहीं हैं, किंतु सृजन जारी है। प्रतिक्रिया जारी है और इस बहाने एक विमर्श भी खड़ा हो रहा है, जिसे आप लोकविमर्श कह सकते हैं। सामाजिक बदलाव ने काफी हाउस, चाय की दूकानों, पटिए और ठीहों पर नजर गड़ा दी है, वे टूट रहे हैं या अपनी विमर्श की ताकत को खो रहे हैं। किंतु समानांतर माध्यमों ने इस कमी को काफी हद तक पूरा किया है। मोबाइल के स्मार्ट होते जाने ने इसे व्यापक और संभव बनाया है। अखबार भी अब सोशल साइट्स पर चल रहे एक लाइना विमर्शों, जोक्स  और संवादों को अपने पन्नों पर जगह दे रहे हैं। यह नया समय ही है, जिसने एक पंक्ति के विचार को महावाक्य में बदल दिया है। सूक्तियों में संवाद का समय लौट आया लगता है। एक पंक्ति का विचार किताबों पर भारी है। आपके लंबे और उबाउ वक्तव्यों पर टिप्पणी है- इतना लंबा कौन पढ़ेगा, फिर हिंदी भी तो नहीं आती। माध्यम आपको अपने लायक बनाना चाहता है। वह हिंग्लिश और रोमन में लिखने के लिए प्रेरित करता है। वह बता रहा है कि यहां विचरण करने वाली प्रजातियां अलग हैं और उनके व्यवहार का तरीका भी अलग है।
  मतदान इस दौर में चुनाव आयोग के अभियानों, मीडिया अभियानों और जनसंगठनों के अभियानों से एक प्रतिष्ठित काम बन गया है। वोट देकर आती सोशल मीडिया की अभ्यासी पीढ़ी अपनी उंगली दिखाती है। यानि वोट देना इस दौर में एक फैशन की तरह भी विस्तार पा रहा है। इस जागरूकता के लिए चुनाव आयोग के साथ सोशल मीडिया को भी सलाम भेजिए। कोऊ नृप होय हमें का हानि का मंत्रजाप करने वाले हमारे समाज में एक समय में ज्यादातर लोग वोट देकर कृपा ही कर रहे थे। बहाने भी गजब थे पर्ची नहीं मिली, धूप बहुत है, लाइन लंबी है, मेरे वोट देने से क्या होगा? पर इस समय की सूचनाएं अलग हैं, लोग विदेशों से अपनी सरकार बनाने आए हैं। दूल्हा मंडप में जाने से पहले मतदान को हाजिर है। जाहिर तौर पर ये उदाहरण एक समर्थ होते लोकतंत्र में अपनी उपस्थिति जताने और बताने की कवायद से कुछ ज्यादा हैं। वरना वोट निकलवाना तो राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं का ही काम हुआ करता था। वो ही अपने मतदाता को मतदान केंद्र तक ले जाने के लिए जिम्मेदार हुआ करते थे। लेकिन बदलते दौर में समाज में अपेक्षित चेतना का विस्तार हुआ है। मीडिया का इसमें एक अहम रोल है। देश में पिछले सालों में चले आंदोलनों ने समाज में एक अभूतपूर्व किस्म की संवेदना और चेतना का विस्तार भी किया है। बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, श्री श्री रविशंकर से लेकर अरविंद केजरीवाल के साथियों के योगदान को याद कीजिए। नरेंद्र मोदी जैसे जिन नेताओं ने काफी पहले इस माध्यम की शक्ति को पहचाना वो आज इसकी फसल काट रहे हैं। ये बदलते भारत का चेहरा है। उसकी आकांक्षाओं और सपनों को सच करने का विस्फोट है। मीडिया ने इसे संभव किया है। सोशल मीडिया के व्यापक प्रसार ने देश की एकता और अखंडता के सरोकारों को भी व्यापक किया है। हमें भले लगता हो कि सोशल मीडिया पर सिर्फ फुरसती लोग इकट्टे हैं, किंतु एक नाजायज टिप्पणी करके देखिए और हिंदुस्तानी मन की प्रतिक्रियाएं आप तक आ जाएंगीं। वास्तव में यह नया माध्यम युवाओं का ही माध्यम है किंतु इस पर हर आयु-वर्ग के लोग विचरण कर रहे हैं। कुछ संवाद, कुछ आखेट तो कुछ अन्यान्न कारणों से यहां मौजूद हैं। बावजूद लोकविमर्श के तत्व यहां मिलते हैं। मोती चुनने के लिए थोड़ा श्रम तो लगता ही है। अपने स्वभाव से ही बेहद लोकतांत्रिक होने के नाते इस मीडिया की शक्ति का अंदाजा लगाना मुश्किल है। यहां टीवी का ड्रामा भी है तो प्रिंट माध्यमों की गंभीरता भी है। यहां होना, कनेक्ट होना है। सोशलाइट होना है, देशभक्त होना है।  
   एक समय में हिंदुस्तान का नेता बुर्जुग होता था। आज नौजवान देश के नेता हैं। इस परिघटना को भी मीडिया के विस्तार ने ही संभव किया है। पुराने हिंदुस्तान में जब तक किसी राजनेता को पूरा देश जानता था, वह बूढ़ा हो जाता था। बशर्ते वह किसी राजवंश का हिस्सा न हो। आज मीडिया क्रांति रातोरात आपको हिंदुस्तान के दिल में उतार सकती है। नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल की परिघटना को ऐसे ही समझिए। आज देश मनोहर पारीकर और माणिक सरकार को भी जानता है, अन्ना हजारे को भी पहचानता है। उसने राहुल गांधी की पूरी युवा बिग्रेड के चेहरों को भी मीडिया के माध्यम से ही जाना है। यानि मीडिया ने हिंदुस्तानी राजनीति में किसी युवा का नेता होना भी संभव किया है। मीडिया का सही, रणनीतिक इस्तेमाल इस देश में भी, प्रदेश में भी ओबामा जैसी घटनाओं को संभव बना सकता है। अखिलेश यादव को आज पूरा हिंदुस्तान पहचानता है तो इसमें मुलायम पुत्र होने के साथ –साथ टीवी और सोशल मीडिया की देश व्यापी उपस्थिति का योगदान भी है। वे टीवी के स्क्रीन से लेकर मोबाइल स्क्रीन तक चमक रहे हैं। रंगीन हो चुके अखबार भी अब उनकी खूबसूरत तस्वीरों के साथ हाजिर हैं। काले-सफेद हर्फों में छपे काले अक्षर तब ज्यादा मायने रखते होंगें किंतु इस दौर में बढ़ी आंखों की चेतना को रंगीन चेहरे अधिक भाते हैं। माध्यम एक दूसरे से होड़ कर रहे हैं। टीवी में अखबार दिखने लगा है, अखबार थोड़ा टीवी होना चाहते हैं। सोशल मीडिया एक साथ सब कुछ होना चाहता है।माध्यमों ने राजनीति को भी सुंदर और सुदर्शन बनाया है। दलों के नेता और प्रवक्ता भी अब रंगीन कुर्तों में नजर आने लगे हैं। फैब इंडिया जैसे कुरतों के ब्रांड इसी मीडिया समय में लोकप्रिय हो सकते थे। राजनीति में सफेदी के साथ कपड़ों की सफेदी भी घटी है। चेहरा टीवी के लिए, नए माध्यमों के लिए तैयार हो रहा है। इसलिए वह अपडेट है और स्मार्ट भी। अब माध्यम नए-नए रूप धरकर हमें अपने साथ लेना चाहते हैं। वे जैसा हमें बना रहे हैं, हम वैसा ही बन रहे हैं। सही मायने में यह मीडियामय समय है जिसमें राजनीति, समाज और उसके संवाद के सारे एजेंडे यहीं तय हो रहे हैं। टीवी की बहसों से लेकर सोशल साइट्स पर व्यापक विमर्शों के बावजूद कहीं कुछ कमी है जिसे हमारे प्रखर होते लोकतंत्र में हमें सावधानी से खोजना है। इस बात पर बहस हो सकती है कि यह लोकसभा चुनाव जितना मीडिया पर लड़ा गया, उतना मैदान में नहीं।
(लेखक मीडिया विशेषज्ञ और राजनीतिक विश्वेषक हैं)
  

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

अंतिम व्यक्ति को न भूलना ही महानताः दिग्विजय सिंह

     



     वरिष्ठ पत्रकार और राजनेता बी.आर.यादव पर एकाग्र पुस्तक ‘कर्मपथ का लोकार्पण
बिलासपुर। 7 सितंबर। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और अखिलभारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि पद पर रहते हुए अंतिम व्यक्ति को न भूलना ही राजनीतिज्ञ की महानता होती है। वे यहां मप्र शासन में मंत्री रहे वरिष्ठ पत्रकार श्री बी.आर.यादव के लोक अभिनंदन और उन पर एकाग्र पुस्तक 'कर्मपथ'  का विमोचन समारोह को संबोधित कर रहे थे। पुस्तक का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया है।
   मीडिया विमर्श पत्रिका द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम के मुख्यअतिथि की आसंदी से संबोधित करते हुए श्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि श्री बीआर यादव से उनका संबंध 1977 से है पर उन्होंने भूल से भी किसी की कभी बुराई नहीं की। यादव एक नेता होने से ज्यादा समाजवादी हैं। पद पर रहते हुए भी उन्हें राज्य के अंतिम व्यक्ति की चिंता रहती थी। उनकी राजनीतिक सूझबूझ के सिर्फ वे ही नहीं, दूसरे नेता भी कायल रहे हैं। यही वजह कि मैं अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में हमेशा उनसे सलाह करके ही कोई कदम उठाता था।
  कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा कि श्री बी.आर. यादव का समूचा जीवन सादा जीवन और उच्च विचार का उदाहरण है। अपने कार्यकाल में वे एक अच्छे राजनीतिज्ञ रहे जो पक्ष-विपक्ष दोनों से तालमेल बिठाकर चलते थे। इसलिए वे सभी के चहेते हैं। उनका कोई विरोधी नहीं है। राजनीति के क्षेत्र में जो उचाईयां पहले थीं आज नहीं रह गयी हैं। किंतु श्री यादव जैसे नेताओं का अनुसरण करके आगे वह दौर वापस लाया जा सकता है।
  केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री डा. चरणदास महंत ने कहा कि बीआर यादव उन नेताओं में हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य के गठन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया के नारे को भी उन्होंने जीवंत बनाया।
अजातशत्रु हैं बी.आर.यादवः  
   छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल ने कहा कि यादवजी राजनीति के अजातशत्रु हैं। वे ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिनका न तो कोई पहले शत्रु था न आज है। राजनीति में उनका नाम ऐसे नेताओं में शामिल है, जिसकी प्रशंसा सभी करते हैं। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रवींद्र चौबे, विधायक धर्मजीत सिंह, समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर, पत्रकार पं.श्यामलाल चतुर्वेदी, गोविंदलाल वोरा, पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, मप्र लोकसेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष विनयशंकर दुबे ने भी आयोजन को संबोधित किया। इस अवसर पर नगर की अनेक संस्थाओं ने श्री बीआर यादव को शाल-श्रीफल देकर सम्मान किया।
संजय द्विवेदी का सम्मानः
 इस अवसर पर मुख्यअतिथि दिग्विजय सिंह ने कर्मपथ के संपादक संजय द्विवेदी को शाल-श्रीफल और प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया। उन्होंने कहा पुस्तक का संपादन कर संजय द्विवेदी ने एक ऐतिहासिक काम किया है। क्योंकि इससे राजनीतिक इतिहास का एक संदर्भ बनेगा जिससे आने वाली पीढियां इस दौर के नायक बीआर यादव को जान-समझ सकेंगीं।

क्या है पुस्तक मेः
    श्री बी.आर. यादव पर केंद्रित पुस्तक कर्मपथ में मप्र और छत्तीसगढ़ के अनेक प्रमुख राजनेताओं, पत्रकारों एवं साहित्यकारों के लेख हैं। इस किताब के बहाने 1970 के बाद और छत्तीसगढ़ गठन के पूर्व की राजनीति और सामाजिक स्थितियों का आकलन किया गया है। श्री बीआर यादव के बहाने यह किताब सही मायने में एक विशेष समय की पड़ताल भी है।  पुस्तक में सर्वश्री मोतीलाल वोरा,दिग्विजय सिंह,कमलनाथ, बाबूलाल गौर, डा. रमन सिंह, चरणदास महंत, बृजमोहन अग्रवाल, चंद्रशेखर साहू, सत्यनारायण शर्मा, अमर अग्रवाल, अजय सिंह राहुल, रधु ठाकुर, मूलचंद खंडेलवाल, पं. श्यामलाल चतुर्वेदी, स्व. नंदकुमार पटेल, पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, रमेश वल्यानी, गिरीश पंकज,अरूण पटेल, उमेश त्रिवेदी, बसंत कुमार तिवारी, रमेश नैयर, धरमलाल कौशिक, धीरेंद्र कुमार सिंह, प्रो. कमल दीक्षित, स्वराज पुरी, सतीश जायसवाल, आनंद मिश्रा, बजंरग केडिया, राधेश्याम शुक्ला, परितोष चक्रवर्ती, डा. सुशील त्रिवेदी, हरीश केडिया, बबन प्रसाद मिश्र, डा. सुधीर सक्सेना, डा. सच्चिदानंद जोशी, आर.एल.एस.यादव, चंद्रप्रकाश वाजपेयी, बल्लू दुबे, प्रवीण शुक्ला, रूद्र अवस्थी, बेनीप्रसाद गुप्ता, डा. कालीचरण यादव, डा. रमेश अनुपम, विनयशंकर दुबे, उमाशंकर शुक्ल, मनोज कुमार, डा.श्रीकांत सिंह, डा.सोमनाथ यादव, बुधराम यादव आदि के लेख शामिल हैं।


पुस्तक का नामः कर्मपथ 
मूल्यः 300 रूपए (सजिल्द), 150 रूपए( पेपरबैक)
प्रकाशकः मीडिया विमर्श,428-रोहित नगर, फेज-1, भोपाल-39

रविवार, 8 जनवरी 2012

मीडिया विमर्श के आयोजन में जुटे मीडिया दिग्गज और राजनेता





रायपुर। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं सांसद प्रकाश जावडेकर का कहना है कि प्रिट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के विस्तार के बाद आने वाला समय सिटीजन जर्नलिज्म का है। वे यहां जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श के पांच साल पूरे होने पर रायपुर में मीडिया और लोकतंत्र विषय पर एक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। वृंदावन हाल में आयोजित इस समारोह में मीडिया विमर्श के वार्षिकांक का विमोचन किया गया।

कार्यक्रम के मुख्यअतिथि की आसंदी से बोलते हुए जावडेकर रोचक शैली में कई गंभीर बातें कहीं। मसलन पहले वे चार अखबार चार घंटे में पढ़ पाते थे किंतु अब चालीस अखबार चालीस मिनट में पढ़ लेते हैं। उनका कहना था कि अब न्यूज और व्यूज में कोई अंतर नहीं दिखता। पहले लोग मिशन की खातिर काम करते थे और अब कमीशन के लिए। सबसे पहले खबर दिखाने की होड़ का हाल ऐसा कि कुछ उत्साही तो खबर घटने से पहले ही दिखा देते हैं। प्रिंट में अब मात्र प्रिंट लाइन ही वह स्थान बचा है जहां प्रकाशन संबंधी सूचना होती है। शेष पूरे स्थान पर पेड न्यूज का बोलबाला होता है। जावडेकर ने कहा कि इस संबंध में सिर्फ प्रेस ही दोषी नहीं है जो पैसे देकर खबरें छपवा रहे हैं वह भी दोषी हैं। सजा दोनों को मिलनी चाहिए। ट्विटर, फेसबुक जैसे माध्यमों की लोकप्रियता और उसके माध्यम से खबरों के एक नए संसार पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि यह एक सकारात्मक बदलाव है तथा आने वाले समय में यह सिटीजन जर्नलिज्म सामाजिक जीवन में एक बड़ी भूमिका अदा करेगा। सत्ता वर्ग देश-विदेश दोनों में इसके असर को देख चुका है।

मीडिया ही लोकतंत्र की आत्माः जावडेकर ने कहा कि मीडिया ही लोकतंत्र की आत्मा है। आज मीडिया जिस दिशा में जा रहा है, उसे उस पर सोचना और विचार करना अत्यंत आवश्यक है। मीडिया का परिदृश्य पहले की तुलना में काफी बदल गया है। प्रेस की आजादी का समर्थन करते हुए जावडेकर ने कहा कि मीडिया पर किसी तरह की पाबंदी नहीं होनी चाहिए। आपातकाल की याद दिलाते हुए उनका कहना था कि हमने प्रेस की आजादी की जंग लड़ी है और उसके लिए जेल भी गए हैं। लोकतंत्र का मतलब ही है भिन्न-भिन्न राय। यानि मैं आपकी राय से सहमत नहीं हूं फिर भी आपको आपकी बात कहने का पूरा हक है। जावडेकर ने कहा कि इस सबके बावजूद जिस तरह के खतरे उपस्थित हैं उसमें मीडिया के लिए यह जरूरी है कि वह अपना स्व-नियंत्रण करे और सरकार को बंदिशें लगाने के अवसर न दे।

सामाजिक संवाद जरूरीः कार्यक्रम के मुख्यवक्ता माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने पत्रकारिता की तुलना लेंस से की जो कभी किसी चीज को छोटा, कभी बड़ा तो कभी जला देता है। उनका कहना था कि लोकतंत्र में सामाजिक संवाद बहुत जरूरी है और नया मीडिया इसे संभव बनाता है। न्यू मीडिया अपने स्वभाव में ज्यादा लोकतांत्रिक है। कार्यक्रम में कृषि मंत्री चंद्रेशेखर साहू, लेखिका जया जादवानी, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति डा. सच्चिदानंद जोशी. पत्रिका के संपादक डा. श्रीकांत सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए। समारोह की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने की।

पत्रकार एवं लेखक हुए सम्मानितः इस मौके पर छत्तीसगढ़ के लेखक और पूर्व आईएएस अधिकारी डा. सुशील त्रिवेदी, जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ के रिपोर्टर विश्वेश ठाकरे, बस्तर के पत्रकार सुरेश रावल, सृजनगाथा डाट काम के संपादक जयप्रकाश मानस, मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए डा. गोपा बागची को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर, बसंतकुमार तिवारी, बबन प्रसाद मिश्र, हरिभूमि के प्रबंध संपादक हिमांशु द्विवेदी, नई दुनिया के महाप्रबंधक मनोज त्रिवेदी, छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल के अध्यक्ष सुभाष राव, वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र पाण्डेय,हज कमेटी के अध्यक्ष डा. सलीम राज, जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ के निदेशक दिनेश गोयल, सीईओ केके नायक, एच आर हेड निवेदिता कानूनगो, फाइनेंस हेड गिरिराज गर्ग, विवेक पारख, शताब्दी पाण्डेय, बस्तर के भाजपा नेता संजय पाण्डेय मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन डा. सुभद्रा राठौर ने तथा आभार प्रदर्शन प्रभात मिश्र ने किया। अंत में अतिथियों को प्रतीक चिन्ह कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने भेंट किए।

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

मीडिया विमर्श के वार्षिकांक का विमोचन 5 को


मीडिया और लोकतंत्र विषय पर संगोष्ठी, प्रकाश जावडेकर होंगें मुख्यअतिथि

रायपुर,1 जनवरी। जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श के पांच साल पूरे होने पर रायपुर में मीडिया और लोकतंत्र विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। इस अवसर मीडिया विमर्श के वार्षिकांक का विमोचन भी होगा तथा राज्य के कई वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित भी किया जाएगा। कार्यक्रम का आयोजन 5 जनवरी को सिविल लाइंस स्थित वृंदावन हाल में सांय चार बजे किया गया है। कार्यक्रम के मुख्यअतिथि सांसद और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर होंगें तथा मुख्यवक्ता माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला होंगें। यह जानकारी देते हुए पत्रिका के प्रबंध संपादक प्रभात मिश्र ने बताया कि आयोजन के विशिष्ट अतिथि के रूप में गृहमंत्री ननकीराम कंवर, कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति डा. सच्चिदानंद जोशी और हिंदी की प्रख्यात साहित्यकार श्रीमती जया जादवानी संगोष्ठी में लेंगें। आयोजन छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के अनेक साहित्यकार, पत्रकार, मीडिया शिक्षक और शोधार्थी हिस्सा लेगें।

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

मीडिया शिक्षा पर एक बेहतर किताब


भोपाल। भारत में मीडिया शिक्षा एक लंबी यात्रा पूरी कर चुकी है। इसका विस्तार निरंतर हो रहा है। इस विधा में हो रहे विस्तार और इसके सामने उपस्थित चुनौतियों पर प्रकाश डालती हुई एक किताब मीडिया शिक्षाःमुद्दे और अपेक्षाएं का प्रकाशन दिल्ली के यश पब्लिकेशन्स ने किया है।

पुस्तक के संपादक, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने बताया कि इस पुस्तक देश के जाने माने मीडिया शिक्षकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के लेख शामिल किए गए हैं। जिन्होंने मीडिया शिक्षा के विविध पक्षों पर अपनी बेबाक राय रखी है। उन्होंने कहा कि आज जबकि मीडिया शिक्षा एक विशिष्ठ अनुशासन के रूप में अपनी जगह बना रही है तब उसपर गंभीर विमर्श जरूरी है। आज जबकि सीबीएससी के पाठ्यक्रमों से लेकर मीडिया अध्ययन में पीएचडी तक के कोर्स देश के तमाम विश्वविद्यालय में उपलब्ध हैं, तब यह जरूरी है कि हम मीडिया शिक्षा के तमाम प्रकारों पर संवाद करें और उसकी सार्थकता के लिए रास्ते निकालें।

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता के पूर्व कुलपति और जनसत्ता के पूर्व संपादक श्री अच्युतानंद मिश्र को समर्पित की गयी इस पुस्तक में स्व. माखनलाल चतुर्वेदी, अच्युतानंद मिश्र, प्रो. बी.के. कुठियाला, विश्वनाथ सचदेव, डा.संजीव भानावत, सच्चिदानंद जोशी, प्रो.कमल दीक्षित, डा.मनोज दयाल, डा.श्रीकांत सिंह, डा. मानसिंह परमार, डा.मनीषा शर्मा, डा.वर्तिका नंदा, डा. शिप्रा माथुर, बृजेश राजपूत, प्रो. ओमप्रकाश सिंह, सचिन भागवत, प्रो.ओमप्रकाश सिंह, धनंजय चोपड़ा, डा.सुशील त्रिवेदी, प्रकाश दुबे, डा. देवब्रत सिंह,संजय कुमार, मोनिका गहलोत, संदीप कुमार श्रीवास्तव, माधवी श्री, मिथिलेश कुमार, मीतेंद्र नागेश, जया शर्मा, आशीष कुमार अंशू,मधु चौरसिया, सुमीत द्विवेदी आदि के लेख शामिल हैं। 159 पृष्ठ की इस पुस्तक का मूल्य 295 रूपए है। प्रकाशक का पता हैः यश पब्लिकेशंस, 1/10753, गली नंबर-3, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, नियर कीर्ति मंदिर, दिल्ली-110032

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

मीडिया विमर्श के नए अंक में एक बड़ी बहस ‘लोक’ ऊपर या ‘तंत्र’


भोपाल। जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित लोकप्रिय पत्रिका मीडिया विमर्श का नया अंक (सितंबर, 2011) एक बड़ी बहस छेड़ने में कामयाब रहा है। इस अंक में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों से उपजे हालात पर विमर्श किया गया है। इस अंक की आवरण कथा इन्हीं संदर्भों पर केंद्रित है। अन्ना ने किया दिल्ली दर्प दमन शीर्षक संपादकीय में पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने कहा है कि हमें अपने लोकतंत्र को वास्तविक जनतंत्र में बदलने की जरूरत है।

इसके साथ ही इस अंक में जनांदोलनों पर केंद्रित कई आलेख हैं, जिसमें प्रख्यात लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने यह सवाल खड़ा किया है कि आखिर जनांदोलनों में साहित्यकार और लेखक क्यों गायब दिखते हैं। इसके साथ ही डा. विजयबहादुर सिंह का एक लेख और एक कविता इन संदर्भों को सही तरीके से रेखांकित करती है। उदीयमान भारत की वैश्विक भूमिका पर केंद्रित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला का लेख एक नई दिशा देता है। धार्मिक चैनलों और मीडिया में धर्म की जरूरत पर डा. वर्तिका नंदा एक लंबा शोधपरक लेख चैनलों पर बाबा लाइव शीर्षक से प्रकाशित है। समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने मजीठिया वेज बोर्ड के बारे में एक विचारोत्तेजक लेख लिखकर पत्रकारों का शोषण रोकने की बात की है।

अंक में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित अमरकांत एवं प्रख्यात पत्रकार रामशरण जोशी के साक्षात्कार भी हैं। इसके साथ ही गिरीश पंकज के नए व्यंग्य उपन्यास ऊं मीडियाय नमः के कुछ अंश भी प्रकाशित किए गए हैं। पत्रिका के अंक के अन्य प्रमुख लेखकों में नवीन जिंदल, संजय कुमार, प्रीति सिंह, लीना, डा. सुशील त्रिवेदी, मधुमिता पाल के नाम उल्लेखनीय हैं।

अगला अंक सोशल नेटवर्किंग पर केंद्रितः मीडिया विमर्श का आगामी अंक सोशल नेटवर्किग पर केंद्रित है। भारत जैसे देश में भी खासकर युवाओं के बीच संवाद का माध्यम सोशल नेटवर्किंग बन चुकी है। इससे जुड़े विविध संदर्भों पर इस अंक में विचार होगा। सोशल नेटवर्किंग के सामाजिक प्रभावों के साथ-साथ संवाद की इस नई शैली के उपयोग तथा खतरों की तरफ भी पत्रिका प्रकाश डालेगी। इस अंक में जाने-माने पत्रकार, साहित्यकार और बुद्धिजीवियों के लेख शामिल किए जा रहे हैं। इस अंक में आप भी अपना योगदान दे सकते हैं। अपने लेख, विश्वेषण या अनुभव 10 नवंबर,2011 तक मेल कर दें तो हमें सुविधा होगी। लेख के साथ अपना एक चित्र एवं संक्षिप्त परिचय जरूर मेल करें। हमारा मेल पता है- mediavimarsh@gmail.com

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

सोशल नेटवर्किंगः नए समय का संवाद


-संजय द्विवेदी

तेजी से बदलती दुनिया, तेज होते शहरीकरण और जड़ों से उखडते लोगों व टूटते सामाजिक ताने बाने ने इंटरनेट को तेजी से लोकप्रिय किया है। कभी किताबें,अखबार और पत्रिकाएं दोस्त थीं आज का दोस्त इंटरनेट है क्योंकि यह दुतरफा संवाद का भी माध्यम है। सो पढ़े या लिखे हुए की तत्काल प्रतिक्रिया ने इसे लोकप्रिय बनाया है। आज का पाठक सब कुछ तुरंत चाहता है-इंस्टेंट। टीवी और इंटरनेट उसकी इस भूख को पूरा करते हैं। यह गजब है कि आरकुट, फेसबुक, ट्यूटर जैसी सोशल साइट्स का प्रभाव हमारे समाज में भी महसूस किया जाने लगा है। यह इंटरनेट पर गुजारा गया वक्त अपने पढ़ने के वक्त से लिया गया है। जाहिर तौर पर यह सामाजिकता के खिलाफ है और निजता को स्थापित करने वाला है।

निजता का माध्यमः सूचना और संचार के अभी तक प्रकट सभी माध्यम कहीं न कहीं सामूहिकता को साधते हैं। किंतु इंटरनेट व्यक्ति की निजता को स्थापित करता है। इसका समाज पर गहरा असर देखा जा रहा है। सूचनाएं अब मुक्त हैं। वे उड़ रही हैं इंटरनेट के पंखों। कई बार वे असंपादित भी हैं, पाठकों को आजादी है कि वे सूचनाएं लेकर उसका संपादित पाठ स्वयं पढ़ें। सूचना की यह ताकत अब महसूस होने लगी है। यह बात हमने आज स्वीकारी है, पर कनाडा के मीडिया विशेषज्ञ मार्शल मैकुलहान को इसका अहसास साठ के दशक में ही हो गया था। तभी शायद उन्होंने कहा था कि मीडियम इज द मैसेजयानी माध्यम ही संदेश है।मार्शल का यह कथन सूचना तंत्र की महत्ता का बयान करता है। आज का दौर इस तंत्र के निरंतर बलशाली होते जाने का समय है। संचार क्रांति ने इसे संभव बनाया है। नई सदी की चुनौतियां इस परिप्रेक्ष्य में बेहद विलक्षण हैं। इस सदी में यह सूचना तंत्र या सूचना प्रौद्योगिकी ही हर युद्ध की नियामक है, जाहिर है नई सदी में लड़ाई हथियारों से नहीं सूचना की ताकत से होगी। मंदीग्रस्त अर्थव्यवस्था से ग्रस्त पश्चिमी देशों को बाजार की तलाश तथा तीसरी दुनिया को देशों में खड़ा हो रहा, क्रयशक्ति से लबरेज उपभोक्ता वर्ग वह कारण हैं जो इस दृश्य को बहुत साफ-साफ समझने में मदद करते हैं । पश्चिमी देशों की यही व्यावसायिक मजबूरी संचार क्रांति का उत्प्रेरक तत्व बनी है। हम देखें तो अमरीका ने लैटिन देशों को आर्थिक, सांस्कृतिक रूप से कब्जा कर उन्हें अपने ऊपर निर्भर बना लिया। अब पूरी दुनिया पर इसी प्रयोग को दोहराने का प्रयास जारी है। निर्भरता के इस तंत्र में अंतर्राट्रीय संवाद एजेंसियां, विज्ञापन एजेसियां, जनमत संस्थाएं, व्यावसायिक संस्थाए मुद्रित एवं दृश्य-श्रवण सामग्री, अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार कंपनियां, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियां सहायक बनी रही हैं। लेकिन ध्यान दें कि सूचनाएं अब पश्चिम के ताकतवर देशों की बंधक नहीं रह सकती। उन्होंने अपना निजी गणतंत्र रच लिया है। विजय कुमार लिखते हैं- हम एक ऐसे समय में रह जी रहे हैं जब एक ओर आदमी के भीतर का अकेलापन लगातार बढ़ रहा है तब दूसरी ओर उसके भीतर नए-नए संबंधों को खोजने और पाने की ललक भी है। एक अधिक व्यापक सूचना से भरी हुयी अधिक उष्मा और अधिक मानवीय संबंधों वाली दुनिया की तलाश मनुष्य के भीतर सदा रही से रही है।1

एक वर्चुअल दुनिया इसी संचार क्रांति का एक प्रभावी हिस्सा है- सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जिन्होंने सही मायने में निजता के एकांत को एक सामूहिक संवाद में बदल दिया है। अब यह निजता, निजता न होकर एक सामूहिक संवाद है, वार्तालाप है, जहां सपने बिक रहे हैं, आंसू पोछे जा रहे हैं, प्यार पल रहा है, साथ ही झूठ व तिलिस्म का भी बोलबाला है। यह वर्चुअल दुनिया है जो हमने रची है, अपने हाथों से। इस अपने रचे स्वर्ग में हम विहार कर रहे है और देख रहे हैं फेसबुक,ट्विटर और आरकुट की नजर से एक नई दुनिया। इन तमाम सोशल साइट्स ने हमें नई आँखें दी हैं, नए दोस्त और नई समझ भी। यहां सवाल हैं, उन सवालों के हल हैं और कोलाहल भी है। युवा ही नहीं अब तो हर आयु के लोग यहां विचरते हैं कि ज्ञान और सूचना ना ही सही, रिश्तों के कुछ मोती चुनने के लिए। यह एक एक नया समाज है, यह नया संचार है, नया संवाद है, जिसे आप सूचना या ज्ञान की दुनिया भी नहीं कह सकते। यह एक वर्चुअल परिवार सरीखा है। जहां आपके सपने, आकांक्षाएं और स्फुट विचारों, सबका स्वागत है। दोस्त हैं जो वाह-वाह करने, आहें भरने और काट खाने के लिए तैयार बैठे हैं। यह सारा कुछ भी है तुरंत, इंस्टेंट। तुरंतवाद ने इस उत्साह को जोश में बदल दिया है। यानि आपकी लिखी एक पंक्ति पर तत्काल हल्लाबोल हो सकता है। शशि थरूर को याद कीजिए। केंद्रीय मंत्री का पद अपने इसी ट्विटर प्रेम के नाते छोड़ना पड़ा। एक वाक्य का विचार यहां क्रांति बन रहा है। विचार की ताकत तो देखिए। यह ट्वीट करना अब एक फैशन है। विचार किस तरह एक कीमती समाज बना रहा है, इसे देखिए। वहां लिखे एक वाक्य की कीमत तमाम पोथियों से बड़ी है। ट्विटर कम्युनिटी में होना एक बड़ी बात है। आप ट्विटर पर नहीं, फेसबुक पर नहीं, आरकुट पर भी नहीं- क्या आदमी हो यार। ये सोशल साइट्स हमें नई सामाजिकता का बोध दे रही हैं। ये बता रही हैं इनके बिना आप कुछ भी नहीं। यह सारा कुछ इतना लुभावना है कि काम के घंटों से वक्त चुराकर भी, आप वहां जाते हैं। ताजा खबर है कि हमारे केंद्रीय मंत्रियों की घोषणाएं भी अब ट्विटर पर होंगी। जेपीसी पर मचे धमाल पर डा. मुरली मनोहर जोशी की भूमिका पर सफाई भाजपा की ओर से नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने ट्विटर पर ही दी। सारे सितारों, खिलाड़ियों और सेलिब्रटीज की ट्वीट के लिए अब अखबारों में कालम शुरू हो चुके हैं। जाहिर तौर पर यह सोशल साइट्स को यह मीडिया और अधिकारिक क्षेत्रों की स्वीकृति सरीखा ही है। उसे मिलती मान्यता का प्रतीक है।

शादियों में बदलते रिश्तेः फेसबुक अब रिश्ते ही नहीं बना रहा है, वे रिश्ते शादियों में तब्दील हो रहे हैं। व्यक्ति की निजता के साथ ये साइट्स नए रिश्ते बना रही हैं। फेसबुक एक नया राज्य है जिसका नागरिक होना एक गर्व का विषय है। उसने सबको आवाज दी है। वाणी दी है। तमाम भाषाओं के हजारों-हजार शब्द लगातार वहां अपनी जगह बना रहे हैं। चित्रों, चलचित्रों को उसने जगह दी है। देश में दस करोड़ से ज्यादा कम्प्यूटर वाले हैं, इंटरनेट वाले हैं। अगर नहीं हैं तो बाकी तमाम मोबाइल वाले हैं। अब मोबाइल से भी यह खेल आसान हो चला है। मोबाइल के यंत्र खुद को अपडेट कर रहे हैं। वे भी फेसबुक के साथ होना चाहते हैं। यानी वह वर्चुअल दुनिया जो आपने रची है वह आपके साथ-साथ है। शायद अपने परिवेश के प्रति आपमें वह आग और जागरूकता न हो, किंतु आप साइबर के खिलाड़ी हैं, एक वर्चुअल दुनिया के सक्रिय नागरिक हैं। वरिष्ठ पत्रकार मधुसूदन आनंद इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते। वे मानते हैं कि जो लोग सैंकड़ों हजारों दोस्त होने का दावा करते हैं, वे सच्ची दोस्ती और जतन-संपर्क के बीच या तो भेद नहीं करना चाहते या जानबूझकर उसे नजरंदाज करते हैं। ये कामकाजी दोस्तियां होती हैं जिनका प्रदर्शन अपने विशाल प्रभामंडल के लिए किया जाता है। ये दोस्तियां आदमी की ताकत बताती हैं कि इस आदमी की पहुंच कहां-कहां है। इस तरह की दोस्तियां विरोधियों को डराने के काम भी आती हैं और समर्थकों का काम कराने में भी। इन दोस्तियों से आदमी का अहम तुष्ट होता है और उसमें सुरक्षा भाव बढ़ता है।2

हालांकि दुनिया के तमाम देशों में चल रहे जनांदोलनों में फेसबुक और सोशल नेटवर्किंग साइट्स का खासा असर देखा जा रहा है। भारत में भी अन्ना हजारे के आंदोलन में फेसबुक और टिवटर का खासा इस्तेमाल देखा गया। इसके चलते इस आंदोलन पर ये आरोप भी लगे कि यह देश के खाए-अधाए मध्यवर्ग का आंदोलन है। किंतु सही यह है कि यह आज नई पीढ़ी के बीच संवाद का माध्यम बन गया है। सोशल मीडिया पर राजनेता भी अपनी टिप्पणियां करते हैं और उसके महत्व को रेखांकित करते हुए पीयूष पांडेय लिखते हैं-अमेरिकी सोशल मीडिया की दुनिया में ताजा बहस यह है कि सोशल मीडिया पर लिखे जा रहे शब्दों को किस तरह लिया जाए? यह बहस अब आवश्यकता है। उमर के ट्वीट के संदर्भ में एक बात गौर करने लायक है कि यदि उन्होंने अपना बयान किसी अखबार या टेलीविजन चैनल को दिया होता तो शायद वे तोड़-मरोड़कर छापने या प्रसारित करने की बात भी कह सकते थे, लेकिन ट्विटर पर आपका खाता सिर्फ और सिर्फ आपका है। इसे संचालित करने की जिम्मेदारी आपकी है। अगर आपका ट्विटर या फेसबुक खाता हैक न हुआ हो तो आप इस पर लिखे शब्द से मुकर नहीं सकते।3

बहुत कुछ घट रहा है इस दुनिया में- अब विचार के अलावा भी बहुत कुछ इस दुनिया में घट रहा है। वह मनोरोगियों और मनोविकारियों के हाथ में भी ताकत दे रहा है तो तमाम को विकारी भी बना रहा है। इसके सामाजिक प्रभावों का अध्ययन होना प्रारंभ हुआ है। तमाम प्रकार के दिखते हुए लाभों के अलावा सामाजिक संकट भी खड़े होने लगे हैं। उसने तमाम युवक-युवतियों को वह वर्चुअल दुनिया दी है जो उन्हें अपने परिवेश से काटकर एक ऐसी जमीन पर ले जा रही है जहां अवसाद और मनोरोग साथ-साथ जकड़ते हैं। नकली प्रोफाइल बनाकर किए जाने वाले छल और भावनाओं के व्यापार यहां भी हैं। छली जा रही तमाम कहानियां सुनाई देने लगी हैं। यह सुनना दुखद है किंतु सारा कुछ घट रहा है।

जनांदोलनों में खास भूमिकाः नया मीडिया किस तरह से उपयोगी बना है और सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने अपनी उपयोगिता साबित की है वह एक अध्ययन का विषय है। खासकर जनांदोलनों में उसने एक कारगर भूमिका का निर्वहन किया है। अनेक खतरों के साथ उसके सामाजिक लाभों का मूल्यांकन होना अभी शेष है। कथादेश के मीडिया वार्षिकी में इसी ताकत को स्वीकार करते हुए इस अंक के संपादकीय में संपादक द्वय दिलीप मंडल और अविनाश लिखते हैं-“ 21वीं सदी के मौजूदा दौर में परंपरागत मीडिया जब उम्मीद की कोई रोशनी नहीं दिखा रहा है, तब वैकल्पिक मीडिया के कुछ नए रूप सामने आए हैं। इनमें इंटरनेट पर खासतौर नजर रखने की जरूरत है। मिश्र और दूसरे अरब देशों में विद्गोह के कई कारण हैं, लेकिन इंटरनेट ने विद्रोहियों को संगठित होने में मदद की। दुनिया ने देखा कि फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट ने खासकर मिस्र में किस तरह संगठनकर्ता की भूमिका निभाई।4

पीछे हुआ पारंपरिक मीडियाः किंतु पारंपरिक मीडिया अब चाहकर भी इसका मुकाबला नहीं कर सकता क्यों कि इसकी तेजी सब पर भारी है। सबसे बड़ी बात है इसकी गति और त्वरा। सिरिल गुप्ता की मानें तो- पारंपरिक मीडिया कितना भी तेज से अधिक तेज होने का दावा करता हो और चाहे खबर किसी भी कीमत पर लाता हो, नए मीडिया के सामने पानी मांगता है। लीबिया में पारंपरिक मीडिया पैठ न बना सका, लेकिन नए मीडिया साधनों जैसै ब्लाग,. ट्विटर, फेसबुक , यू-ट्यूब के जरिए पल-पल की खबर दुनिया देखती रही। नौबत यह आ गयी कि गद्दाफी सरकार ने पूरे देश में इंटरनेट की सुविधा बंद कर दी। फिर भी सैटलाइट कनेक्शन के जरिए लोगों को खबर मिलती रही। 5

पर सेहत तो बचा लीजिएः इसके सामाजिक प्रभावों के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी अब असर दिखाने लगीं हैं। तमाम प्रकार की बीमारियों के साथ अब कंप्यूटर सिड्रोम का खतरा आसन्न है। जिसने नई पीढ़ी ही नहीं, हर कंप्यूटर प्रेमी को जकड़ लिया है। अब यहां सिर्फ काम की बातें नहीं, बहुत से ऐसे काम हैं जो नहीं होने चाहिए, हो रहे हैं। एकांत अब आवश्यक्ता में बदल रहा है। समय मित्रों, परिजनों के साथ नहीं अब यहां बीत रहा है। ऐसे में परिवारों में भी संकट खड़े हो रहे हैं। यह खतरा टेलीविजन से बड़ा दिख रहा है, क्योंकि लाख के बावजूद टीवी ने परिवार की सामूहिकता पर हमला नहीं किया था। साइबर की दुनिया अकेले का संवाद रचती है, यह सामूहिक नहीं है इसलिए यह स्वप्नलोक सरीखी भी है। यहां सामने वाले की पहचान क्या है यह भी नहीं पता, उस नाम का कोई है या नहीं यह भी नहीं पता, किंतु कहानियां चल रही हैं, संवाद हो रहा है, प्यार घट रहा है, क्षोभ बढ़ रहा है। एक वाक्य के विचार किस तरह कमेंट्स में और पल की दोस्ती किस तरह प्यार में बदलती है- इसे घटित होता हम यहां देख सकते हैं। यानी खतरे आसमानी भी हैं और रूहानी भी।

संदर्भः

  1. कुमार विजयः कहां पहुंचा रहे हैं अतंरंगता के नए पुल, नवनीत हिंदी डायजेस्ट (मुंबई), फरवरी, 2011 पेज-18
  2. आनंद मधुसूदनः कितनी लंबी हो सकती है एक क्लिक की दूरी, नवनीत हिंदी डायजेस्ट (मुंबई) फरवरी, 2011, पेज-22
  3. पांडेय पीयूषः ट्विटर पर उमर वाणी, दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण, नई दिल्ली, 4 सितंबर, 2011
  4. मंडल दिलीप एवं अविनाश, संपादकीय, कथादेश,दिल्ली, अप्रैल-2011
  5. गुप्त सिरिलःपुराने मीडिया की विदाई के दिन, कथादेश, दिल्ली, अप्रैल-2011