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बुधवार, 19 मई 2021

विचार को समर्पित बौद्धिक योद्धा

                                

कलम आज उनकी जय बोल

देश के चुनिंदा 11 पत्रकारों की कहानी, जिनके लिए पत्रकारिता का मतलब था भारतबोध का संचार, मूल्यनिष्ठा और समाज के लिए समर्पण

-प्रो. संजय द्विवेदी

  देश में पत्रकारिता के विस्तार और उसके एक उद्योग की तरह बदलने के बाद भी मिशनरी पत्रकारिता का भाव अभी भी जिंदा है। अनेक पत्रकारों ने अपने विचार और सिद्धांतों को जीवन की सुख-सुविधाओं से बड़ा माना। उसी के लिए जिए, संघर्ष में जीवन काटा पर न तो झुके, न टूटे, न समझौते किए। उनकी कलम न तो अटकी, न ही भटकी। ऐसे तपःपूतों ने विचारधारा के लोकव्यापीकरण में अनथक परिश्रम किया है। ऐसे अनाम योद्धाओं को याद करना जरूरी है, जो किसी बड़े मीडिया हाउस में बाजार के साथ चलते हुए बड़ा नाम और बड़ी सुविधाएं पा सकते थे। किंतु इन वैचारिक योद्धाओं ने अपनी विचार निष्ठा, ध्येय निष्ठा, राष्ट्रनिष्ठा को सर्वोपरि माना। यह विचार यज्ञ आज भी जारी है। नई पीढ़ी शायद इन कलमवीरों को उस तरह न जानती हो, किंतु उन्हें जानना अपनी आग तेज करने के लिए जरूरी है।

     इस कड़ी में सर्वाधिक खास योगदान है पांचजन्य का, जिसने राष्ट्रीय भावधारा की पत्रकारिता की अलख जगाई। उसके यशस्वी संपादकों की श्रृखंला में सर्वश्री अटलबिहारी वाजपेयी, राजीव लोचन अग्निहोत्री, ज्ञानेन्द्र सक्सेना, गिरीश चन्द्र मिश्र, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, तिलक सिंह परमार, यादव राव देशमुख, वचनेश त्रिपाठी, केवल रतन मलकानी, देवेन्द्र स्वरुप, दीनानाथ मिश्र, भानुप्रताप शुक्ल, रामशंकर अग्निहोत्री, प्रबाल मैत्र, तरूण विजय, बलदेवभाई शर्मा, जगदीश उपासने, हितेश शंकर जैसे नाम आते हैं। राष्ट्रधर्म,स्वदेश, तरूण भारत, साधना, हिंदुस्तान समाचार के संपादकों की गौरवशाली परंपरा भी राष्ट्रीय चेतना को विस्तारित करती रही है। नारद जयंती के मौके पर कुछ ऐसे साधक पत्रकारों को याद करना जरूरी है, जिनके द्वारा स्थापित परंपराओं और मूल्यनिष्ठा के आदर्श से वर्तमान पत्रकारिता को भी संबल मिल सकता है। साथ ही नई पीढ़ी को मूल्याधारित पत्रकारिता का सबक भी।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी दादा साहब आप्टे


दादा साहब आप्टे

   दादा साहब आप्टे उपाख्य शिवराम शंकर आप्टे ने परमपूज्य गुरू जी की भावनानुसार हिंदुस्तान समाचार जैसी बहुभाषी समाचार एजेंसी की स्थापना की। यह एक सहकारी समिति थी। 19 मई,1905 को गुजरात के बड़ोदरा में जन्में दादा साहब जब विधि की पढ़ाई करने मुंबई आए तो आपने भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ विद्वान के.एम.मुँशी का सानिध्य प्राप्त किया। इसके बाद वे लियो प्रेस से जुड़े। 1939 के आसपास आप संघ के संपर्क में आए और राष्ट्र ही उनके लिए सर्वोपरि हो गया। हिंदुस्तान समाचार की स्थापना और उसके विस्तार में  उन्होंने आपने अपने आपको झोंक दिया। इस प्रकल्प में संघ के अनेक प्रचारक जुड़े जिनमें बापूराव लेले, नारायण राव तर्टे, बालेश्वर अग्रवाल,अशोक पंडित के नाम प्रमुख हैं। आप्टे जी ने राष्ट्रीय स्तर पर इसके विस्तार और तटस्थता व गुणवत्तापूर्ण समाचारों के प्रेषण के लिए जो योजनाएं बनाई उसके यह समाचार एजेंसी मीडिया क्षेत्र की अनिवार्य आवश्यक्ता बन गयी। पत्रकारिता के क्षेत्र में किसी भी सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन की प्रेरणा से चलने वाली इस एजेंसी ने मूल्य आधारित और वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता की परंपरा को स्थापित किया। यह एजेंसी आज भी अपने स्थापित परंपरागत मूल्यों के साथ काम कर रही है। दादा साहब आप्टे एक अनाम योद्धा की तरह काम करते रहे। बाद में दिनों में उन्होंने विश्व हिंदू परिषद की संकल्पना और उसकी स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वे एक लेखक, पत्रकार, चित्रकार,यायावर, प्राचीन भारतीय वांग्मय के ज्ञाता होने के साथ अप्रतिम संगठनकर्ता भी थे। 10 अक्टूबर,1985 को इस महान प्रतिभा का निधन हो गया।

क्रांतिकथाओं के सर्जक वचनेश त्रिपाठी


वचनेश त्रिपाठी

     क्रांतिकारियों के इतिहास और उनके गौरव के व्याख्याकार रहे श्री वचनेश त्रिपाठी का जन्म 24 जनवरी,1914 को हरदोई(उप्र) के संडीला में हुआ था। सिर्फ 12 वीं तक औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी वचनेश जी बहुत प्रतिभावान और स्वाध्यायी थे।1935 में मात्र 15 वर्ष की आयु में मैनपुरी केस के फरार क्रांतिकारी देवनारायण भारतीय से उनका संपर्क हुआ और वे राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े। बालामऊ जंक्शन पुलिस चौकी लूटने के आरोप में उन्हें जेल भेजा गया। पं. रामप्रसाद बिस्मिल के दल में काम करते हुए साथियों के साथ मिलकर 1942 में भूमिगत पत्र ‘चिनगारी’ निकाला, उसका संपादन भी किया। श्री अटलबिहारी वाजपेयी जब संडीला में संघ के विस्तारक होकर आए तो वचनेश जी के घर पर ही रहते थे। दोंनों में प्रगाढ़ मैत्री हो गयी। लखनऊ से राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और स्वदेश का प्रकाशन का कार्य अटलजी के जिम्मे आया, उन्होंने वचनेश जी को पत्रकारिता से जोड़ दिया। 1960 में वचनेश जी तरूण भारत के संपादक बने। 1967 से 1973 तथा 1975 से 1984 तक वे राष्ट्रधर्म के संपादक रहे। 1973 से 75 तक वे पांचजन्य के संपादक रूप में दायित्व निर्वहन करते रहे। वचनेश जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। साहित्य की हर विधा में उन्होंने काम किया और विपुल लेखन किया। बावजूद इसके क्रांतिकारियों की वीरगाथाओं में उनकी विशेष रूचि थी, अनेक क्रांतिकारियों से उनका संपर्क भी था। 2001 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया। बड़ा बाजार कुमार सभा पुस्तकालय, कोलकाता ने उन्हें हेडगेवार प्रज्ञा सम्मान से सम्मानित किया। 30 नवंबर,2006 को लखनऊ में उनका देहांत हो गया।

प्रसिद्धि परांगमुखता के विरल उदाहरण मामाजी

माणिकचंद्र वाजपेयी

   मामाजी के नाम से प्रख्यात श्री माणिकचंद्र वाजपेयी त्याग, अप्रतिम सादगी, समर्पण और प्रतिबद्धता के विरल उदाहरण हैं। उन सा होना कठिन है। 7 अक्टूबर,1919 को आगरा जिले के  बटेश्वर गांव में जन्में मामा जी ने लगभग चार दशक तक पत्रकारिता की। भिंड के एक अखबार देशमित्र से प्रारंभ उनकी पत्रकारिता को राष्ट्रीय पहचान स्वदेश, इंदौर के प्रकाशन के साथ मिली। 1966 में स्वदेश का प्रकाशन इंदौर से प्रारंभ हुआ तो मामा जी उसके संपादक बने। इसके बाद 1971 में ग्वालियर स्वदेश और स्वदेश के अन्य संस्करणों के प्रधान संपादक होने का श्रेय उन्हें प्राप्त है। आपातकाल में वे इंदौर जेल में 19 महीने बंद रहे किंतु उनकी कलम रूकी नहीं, वे जेल से ही संपादकीय लिखकर भेजते रहे।उन्होंने ज्योति जला निज प्राण की, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली अग्निपरीक्षा, आपात् कालीन संघर्ष गाथा,कश्मीर का कड़वा सच, पोप का कसता शिकंजा,भारतीय नारी स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में, ज्योतिपथ, स्वामी विवेकानंद जीवन और विचार, मध्यभारत की संघ गाथा जैसी पुस्तकें लिखीं। आप इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष भी रहे। 2002 में जब माननीय अटलजी प्रधानमंत्री थे, तब स्वदेश (इंदौर) की योजना से दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर मामाजी का अभिनंदन समारोह ‘अमृत महोत्सव’ का आयोजन किया गया। उस दिन भार-विभोर होकर छल-छलाती आँखों से भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भरी सभा में मामाजी के चरणस्पर्श करने की अनुमति माँगी, तब वहाँ स्पंदित कर देने वाला वातावरण बन गया। भारत की राजसत्ता त्याग, समर्पण और निष्ठा के पर्याय साधु स्वभाव के मामाजी के सामने नतमस्तक थी। दिल्ली में आयोजित मामा जी जन्मशती वर्ष के समापन कार्यक्रम में पूज्य सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने कहा, किसी ने पूछा कि मामा जी कौन हैं? फिर भागवत जी ने कहा -माणिक चंद्र वाजपेयी कौन हैं? यही उनका सबसे बड़ा सर्टिफिकेट है। उनके इसी समर्पण के कारण आज हम उनके बारे में बातचीत कर रहे हैं। बीज मिट्टी में मिलकर वृक्ष खड़ा कर देता है। ऐसे ही थे मामाजी। वे जानते थे कि विश्व को अपना बनाना है तो पहले भारत को अपना बनाना होगा। इसके लिए भारतीयों को खड़ा करना होगा होगा।”

साधक महापुरुष माधव गोविंद वैद्य

माधव गोविंद वैद्य

    श्री मा.गो.वैद्य हमारे समय के साधक महापुरुष थे, जिन्होंने अपनी युवावस्था में जिस विचार को स्वीकारा अपनी सारी  गुणसंपदा उसे ही समर्पित कर दी। श्री वैद्य उन लोंगों मे थे, जिन्होंने पहले संघ को समझा और बाद में उसे गढ़ने में अपनी जिंदगी लगा दी।श्री वैद्य संपादक और लेखक के रुप में बहुत प्रखर थे। उनकी लेखनी और संपादन प्रखरता का आलम यह था कि तरूण भारत मराठी भाषा का एक लोकप्रिय दैनिक बना। उन्होंने अपने कुशल नेतृत्व  में अनेक पत्रकारों का निर्माण किया और पत्रकारों की एक पूरी मलिका खड़ी की। जीवन के अंतिम दिनों तक वे लिखते-पढ़ते रहे, उनकी स्मृति विलक्षण थी।वे स्वभाव से शिक्षक थे, जीवन से स्वयंसेवक और वृत्ति(प्रोफेशन) से पत्रकार थे। लेकिन हर भूमिका में संपूर्ण। कहीं कोई अधूरापन और कच्चापन नहीं। सच कहने का साहस और सलीका दोनों उनके पास था। वे एक ऐसे संगठन के ‘प्रथम प्रवक्ता’ बने, जिसे बहुत ‘मीडिया फ्रेंडली’ नहीं माना जाता था। वे ही ऐसे थे जिन्होंने प्रथम सरसंघचालक से लेकर वर्तमान सरसंघचालक की कार्यविधि के अवलोकन का अवसर मिला। उनकी रगों में, उनकी सांसों में संघ था। अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रणयन कर श्री वैद्य ने राष्ट्रीय भावधारा को एक बौद्धिक आधार दिया। 11 मार्च,1923 को जन्में श्री वैद्य ने 97 साल की आयु में 19 दिसंबर,2020 को नागपुर में आखिरी सांसें लीं। वे बहुत मेधावी छात्र थे,बाद के दिनों  में वे ईसाई मिशनरी की संस्था हिस्लाप कालेज, नागपुर में ही प्राध्यापक भी रहे।

एक आत्मविलोपी व्यक्तित्व रामशंकर अग्निहोत्री


रामशंकर अग्रिहोत्री

    प्रखर चिंतक, पत्रकार और संपादक श्री रामशंकर अग्निहोत्री का जन्म  4 अप्रैल, 1926 को मप्र के सिवनी मालवा हुआ। आरंभ में संघ के प्रचारक रहे श्री अग्निहोत्री बाद के दिनों में पत्रकारिता क्षेत्र में गए। 1951-52 में युगधर्म, नागपुर से जुड़कर उन्होंने पत्रकारिता प्रारंभ की।  पांचजन्य, राष्ट्रधर्म, तरूण भारत, हिंदुस्थान समाचार, आकाशवाणी, युगवार्ता वे जहां भी रहे राष्ट्रवाद की अलख जगाते रहे। उनका खुद का कुछ नहीं था। देश और उसकी बेहतरी के विचार उनकी प्रेरणा थे। राजनीति के शिखर पुरूषों की निकटता के बावजूद वे कभी विचलित होते नहीं दिखे। संपर्कों के मामले में उनका कोई सानी न था। पांचजन्य के प्रबंध संपादक, राष्ट्रधर्म के संपादक, लगभग एक दशक नेपाल में समाचार एजेंसी के संवाददाता, हिंदुस्थान समाचार के प्रधान संपादक और अध्यक्ष जैसे पदों पर रहे। अनेक देशों की यात्राएं की, विपुल लेखन किया। मध्यप्रदेश की सरकार ने उन्हें अपने प्रतिष्ठित माणिकचंद्र वाजपेयी सम्मान से अलंकृत किया था और उस मौके पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में पूर्व सरसंघचालक पूज्य श्री के.सी.सुदर्शन जी ने स्वीकार किया कि वे श्री अग्निहोत्री के ही बनाए स्वयंसेवक हैं और उनके एक वाक्य – “संघ तुमसे सब करवा लेगा” ने मुझे प्रचारक निकलने की प्रेरणा दी। यह एक ऐसा स्वीकार था जो रामशंकर अग्निहोत्री की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता को जताने के लिए पर्याप्त था। उनके बारे में पूर्व सांसद एवं पत्रकार स्व. राजनाथ सिंह कहा करते थे- वे आत्मविलोपी व्यक्तित्व हैं। जिन्हें पीछे रहकर काम करना आता है। अपने जीवन के अंतिम समय में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़) में स्थापित शोधपीठ के अध्यक्ष रहे। 7 जुलाई,2010 को रायपुर में उनका निधन हो गया।

इतिहास के व्याख्याकार देंवेंद्र स्वरूप

देवेंद्र स्वरूप

 इतिहास, संस्कृति तथा भारतबोध के अप्रतिम व्याख्याकार और लेखक डा. देवेंद्र स्वरूप का जन्म 30 मार्च,1926 को मुरादाबाद(उप्र) के कांठ कस्बे में हुआ। 1947 से 1960 तक संघ के प्रचारक रहे श्री स्वरूप ने चेतना साप्ताहिक(वाराणसी) से पत्रकारिता प्रारंभ की। 1958 से सह-संपादक, संपादक और स्तंभ लेखक के नाते पांचजन्य से पूरी जिंदगी जुड़े रहे। 1960 से 1963 तक वे स्वतंत्र भारत (लखनऊ) में उपसंपादक भी रहे। दीनदयाल शोध संस्थान निदेशक व उपाध्यक्ष के रूप में आपने काम किया। संस्थान की शोध पत्रिका मंथन का संपादन लंबे समय तक संपादन किया। सन् 1964 से 1991 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कालेज में इतिहास का अध्यापन करते हुए आपने विपुल लेखन किया। अपने लंबे पत्रकारीय एवं अकादमिक जीवन में आपने दो दर्जन से अधिक पुस्तकें और पांच हजार से अधिक लेख लिखे। एक राष्ट्रऋषि और साधक की तरह उनका पूरा जीवन संघ विचार को समर्पित रहा। श्री यादवराव देशमुख ने उनके बारे में ठीक ही कहा था- देवेंद्र स्वरूप भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के गहन अध्येता हैं। यदि हम कहें कि वे राष्ट्रवादी पत्रकारिता पत्रकारिता के स्तंभ हैं तो इसमें अतिश्योक्ति नहीं होगी।  14 जनवरी,2019 को उनका दिल्ली में निधन हो गया। उनकी इच्छानुसार उनका देहदान सफदरजंग अस्पताल को किया गया।

यशस्वी संपादक,श्रेष्ठ शिक्षाविद् राधेश्याम शर्मा


श्री राधेश्याम शर्मा

राजस्थान के एक गांव जोनाइचकला में 01 मार्च,1934 को जन्में श्री राधेश्याम शर्मा अपने विद्यार्थी जीवन में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में पढ़ते हुए ही पत्रकारिता से जुड़ गए थे। वे वाराणसी से जनसत्ता के लिए समाचार भेजा करते थे। 1956  से उन्होंने पूरी तरह अपने आपको पत्रकारीय कर्म में समर्पित कर दिया। उसके बाद मध्यप्रदेश ,पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली की पत्रकारिता में उन्होंने अपने उजले पदचिन्ह छोड़े। युगधर्म के एक नगर प्रतिनिधि से काम प्रारंभ कर वे उसके विशेष संवाददाता और फिर संपादक बने। 6 साल युगधर्म(जबलपुर) के संपादक रहने के बाद में वे दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण अखबार के संपादक भी रहे। इतने बड़े अखबार के संपादक पद पर रहते हुए ही उन्होंने उसे छोड़कर मीडिया शिक्षा के लिए खुद को समर्पित कर दिया और 1990 में भोपाल में स्थापित हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पहले महानिदेशक (अब पदनाम कुलपति है)बने। इसके बाद वे हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक भी बने। अपनी पूरी जीवन यात्रा में उन्होंने कभी मूल्यों से समझौता नहीं किया। पत्रकारीय जीवन में उन्होंने विविध क्षेत्रों के लोगों से लंबे इंटरव्यू किए। मुलाकातें कीं। किंतु उन्हें दादा माखनलाल चतुर्वेदी के साथ उनकी भेंटवार्ता सबसे प्रेरक लगती थी। वे उसे बार-बार याद करते थे। इस भेंट में माखनलाल जी ने उनसे कहा था – “पत्रकार की कलम न अटकनी चाहिए, न भटकनी चाहिए, न रुकनी चाहिए, न झुकनी चाहिए।”  राधेश्याम जी ने इसे अपना जीवन मंत्र बना लिया। 28 दिसंबर,2019 को उनका पंचकूला में निधन हो गया।

अभिव्यक्ति के खतरे उठाते रहे हुसैन


मुजफ्फर हुसैन

 श्री मुजफ्फर हुसैन एक ऐसे पत्रकार थे, जिन्होंने बिना बड़े अखबारों के संपादक जैसी कुर्सियों के भी, सिर्फ कलम के दम पर अपनी बात कही और देश ने उन्हें बहुत ध्यान से सुना। 20 मार्च,1940 को नीमच में जन्में पद्मश्री से अलंकृत श्री मुजफ्फर हुसैन जैसा मसिजीवी होना कठिन था। सत्ता के शिखर पुरुषों से निकटता के बाद भी उनसे एक मर्यादित दूरी रखते हुए, उन्होंने सिर्फ कलम के दम पर अपनी जिंदगी चलाई। नौकरी बहुत कम की। बहुत कम समय देवगिरि समाचार, औरंगाबाद के संपादक रहे। एक स्वतंत्र लेखक, पत्रकार और वक्ता की तरह वे जिए और अपनी शर्तों पर जिंदगी काटी। वे चाहते तो क्या हो सकते थे, क्या पा सकते थे यह कहने की आवश्यक्ता नहीं है। लेकिन उन्हें पता था कि वे एक लेखक हैं, पत्रकार हैं और उनकी अपनी सीमाएं हैं। भारतीय मुस्लिम समाज को भारतीय नजर से देखने और व्याख्यायित करने वाले वे विरले पत्रकारों में थे। अरब देशों और वैश्विक मुस्लिम दुनिया को भारतीय नजरों से देखकर अपने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समाचार पत्रों में विश्लेषण प्रस्तुत करने वाले वे ही थे। वे भारतीय मुस्लिमों को राष्ट्रीय प्रवाह में शामिल करने के स्वप्न देखते थे। वे मुस्लिम समाज में भारतीयता का भाव भरने के लिए अभिव्यक्ति के खतरे भी उठाते रहे। उन पर हुए हमले, विरोधों ने उन्हें अपने विचारों के प्रति अडिग बनाया। वे वही कहते,लिखते और बोलते थे जो उनके अपने मुस्लिम समाज और राष्ट्र के हित में था। उनके द्वारा लिखित ‘इस्लाम और शाकाहार’, ‘मुस्लिम मानस शास्र’, ‘दंगों में झुलसी मुंबई’, ‘अल्पसंख्याक वाद – एक धोखा’, ‘इस्लाम धर्म में परिवार नियोजन’, ‘लादेन, दहशतवाद और अफगानिस्तान’, ‘समान नागरी कायदा’ आदि पुस्तकें चर्चा में रहीं। 13 फरवरी,2018 को मुंबई में उनका निधन हो गया।

संघ पर लगे तीनों प्रतिबंधों में जेल गए वाजपेयी


भगवतीधर वाजपेयी

राष्ट्रीय भावना से अनुप्राणित होकर पत्रकारिता में आए श्री भगवतीधर वाजपेयी ने मध्यप्रदेश और विदर्भ की पत्रकारिता में महत्वपूर्ण स्थान बनाया। उच्चशिक्षा प्राप्त करने के बाद वे लखनऊ में ' स्वदेश' से पत्रकारिता का पहला पाठ सीखते हैं, जिसमें उन्हें पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और नानाजी देशमुख जैसी महान विभूतियों के साथ काम करने का सौभाग्य मिला। आर्थिक संकटों से अखबार बंद होने के बाद वे अटल जी के साथ दिल्ली आकर 'दैनिक वीर अर्जुन' में काम करने लगे।  बाद के दिनों में अटल जी तो पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ हो गए और भगवतीधर जी ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता को अपने जीवन का मिशन बनाते हुए नागपुर से प्रकाशित 'दैनिक युगधर्म' के संपादकीय दायित्व को संभाला। युगधर्म (नागपुर-जबलपुर-रायपुर) के संपादक के रूप में उनकी पत्रकारिता ने राष्ट्रीय चेतना का विस्तार किया। 1957 में नागपुर में युगधर्म के संपादक के रूप में कार्यभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने 1990 तक सक्रिय पत्रकारिता करते हुए युवा पत्रकारों की एक पूरी पौध तैयार की। उनकी समूची पत्रकारिता में मूल्यनिष्ठा, भारतीयता, संस्कृति के प्रति अनुराग और देशवासियों को सामाजिक और आर्थिक न्याय दिलाने की भावना दिखती है। 2006 में उन्हें मध्यप्रदेश शासन द्वारा माणिकचन्द्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी एक विचार के लिए लगा दी और संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए भी घुटने नहीं टेके। आपातकाल में न सिर्फ उनके अखबार पर ताला डाल दिया गया, वरन उन्हें जेल भी भेजा गया। संघ पर लगे तीनों प्रतिबंधों (वर्ष 1948, 1975 और 1992) में कारागृह की यात्रा करने वाले वे बिरले लोगों में से थे। श्री वाजपेयी का पिछले दिनों 7 मई,2021 को जबलपुर में निधन हो गया।

पत्रकारिता के शिक्षक डा. नंद किशोर त्रिखा


डा. नंदकिशोर त्रिखा

   नवभारत टाइम्स, लखनऊ के संपादक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग के संस्थापक अध्यक्ष, एनयूजे के माध्यम से पत्रकारों के हित की लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ता, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता जैसी डा. नंदकिशोर त्रिखा की अनेक छवियां थीं। लेकिन वे हर छवि में संपूर्ण थे। पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में उनके छोटे से कार्यकाल की अनेक यादें भोपाल में बिखरी पड़ी हैं। समयबद्धता और कक्षा में अनुशासन को उनके विद्यार्थी आज भी याद करते हैं। ये विद्यार्थी मीडिया में शिखर पदों पर हैं लेकिन उन्हें उनके बेहद अनुशासनप्रिय प्राध्यापक डा. त्रिखा नहीं भूले हैं। प्रातः 8 बजे की क्लास में भी वे 7.55 पर पहुंच जाने का व्रत निभाते थे। वे  ही थे, जिन्हें अनुशासित जीवन पसंद था और वे विद्यार्थियों से भी यही उम्मीद रखते थे। वे संपादक के रूप में व्यस्त रहे, किंतु समय निकालकर विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तकें लिखते थे। उनकी किताबें हिंदी पत्रकारिता की आधारभूत प्रारंभिक किताबों  में से एक हैं। समाचार संकलन और प्रेस विधि पर लिखी गयी उनकी किताबें बहुमूल्य हैं। डॉ. त्रिखा छह वर्ष भारतीय प्रेस परिषद् के भी सदस्य और नैशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे । उन्होंने 1963 से देश के अग्रणी राष्ट्रीय दैनिक नवभारत टाइम्स में विशेष संवाददाता, वरिष्ठ सहायक-संपादक, राजनयिक प्रतिनिधि और स्थानीय संपादक के वरिष्ठ पदों पर कार्य किया । उससे पूर्व वे संवाद समिति हिन्दुस्थान समाचार के काठमांडू (नेपाल), उड़ीसा और दिल्ली में ब्यूरो प्रमुख और संपादक का दायित्व भी निभाया। 15 जनवरी,2018 को उनका दिल्ली में निधन हो गया।

आखिरी सांस तक लिखते रहे जयकृष्ण गौड़


जयकृष्ण गौड़

   जीवन की आखिरी सांस तक राष्ट्रभाव की पत्रकारिता करने वालों में एक प्रमुख नाम है श्री जयकृष्ण गौड़ का। 6 अगस्त,1944 को मप्र के राजगढ़ जिले सारंगपुर में जन्में श्री गौड़ इंदौर स्वदेश के संपादक, इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष,भाजपा-मप्र के मुखपत्र चैरेवेति के प्रधान संपादक रहे। स्वदेश(इंदौर) के नगर संवाददाता से लेकर वे उसके संपादक भी बने। 1977 में आपातकाल के दौरान वे मीसाबंदी भी रहे। बाल्यकाल से ही संघ की शाखा में उन्हें जो संस्कार मिले उसे उन्होंने पूरे जीवन निभाया। उच्च शिक्षा प्राप्त कर आपको शासकीय सेवा में काम करने का मौका मिला। यहां उनका मन रमा नहीं। शासकीय सेवा छोड़ वे स्वदेश से जुड़ गए। यहां श्री माणिकचंद्र वाजपेयी मामाजी के मार्गदर्शन में उन्होंने पत्रकारिता का ककहरा सीखा और खुद को स्वदेश के लिए समर्पित कर दिया। अनेक पुस्तकों का लेखन करते हुए राष्ट्रीय भाव के साहित्य को समृद्ध किया। बाद के दिनों में श्री गौड़ महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान के अध्यक्ष, मप्र संस्कृत बोर्ड के अध्यक्ष भी रहे। 2010 उन्हें मप्र सरकार के माणिकचंद्र वाजपेयी सम्मान से अलंकृत किया गया। 14 अक्टूबर,2019 को भोपाल में उनका निधन हो गया।

    राष्ट्रीय भावधारा के ऐसे अनेक लेखकों, पत्रकारों ने हिंदी ही नहीं सभी भारतीय भाषाओं में अपना यशस्वी योगदान दिया है। अपनी राष्ट्रनिष्ठा और भारतप्रेम से भरे ये पत्रकार बिना किसी यश, पद, पुरस्कार और अन्य कामनाओं से लगातार लिखते रहे हैं, जूझते रहे हैं। उनकी सृजनयात्रा और उसके लिए उनका संघर्ष आज भी रोमांचित करता है। ऐसे तमाम अनाम योद्धाओं के बारे में ही कवि श्री रामकृष्ण श्रीवास्तव ने बहुत सार्थक पंक्तियां लिखीं हैं-

जो कलम सरीखे टूट गए पर झुके नहीं

यह दुनिया उनके आगे शीश झुकाती है।

जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गयी

वह तो मशाल की तरह उठाई जाती है।

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गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

भारतीय सामाजिकता का नया समय


-प्रो. संजय द्विवेदी

   हमारे सामाजिक विमर्श में इन दिनों भारतीयता और उसकी पहचान को लेकर बहुत बातचीत हो रही है। वर्तमान समय भारतीय अस्मिता के जागरण का समय है। यह भारतीयता के पुर्नजागरण का भी समय है। हिंदु कहते ही उसे दूसरे पंथों के समकक्ष रख दिए जाने के खतरे के नाते, मैं हिंदु के स्थान पर भारतीय शब्दपद का उपयोग कर रहा हूं। इसका सच तब खुलकर सामने आ जाता है, जब हिंदुत्व विरोधी ताकतें ही कई अर्थों में भारतीयता विरोधी एजेंडा भी चलाते हुए दिखती हैं। वे हिंदुत्व को अलग-अलग नामों से लांछित करती हैं। कई बार साफ्ट हिंदुत्व तो कई बार हार्ड हिंदुत्व की बात की जाती है। किंतु डा. राधाकृष्णन की किताब द हिंदु व्यू आफ लाइफ कई अंधेरों को चीरकर हमें सच के करीब ले जाती है। इस दिशा में स्वातंत्र्य वीर सावरकर की हिंदुत्व भी महत्त्वपूर्ण बातें बताती है। 
  हिंदुत्व शब्द को लेकर समाज के कुछ बुद्धिजीवियों में जिस तरह के नकारात्मक भाव हैं कि उसके पार जाना कठिन है। हिंदुत्व की तरह ही हमारे बौद्धिक विमर्श में एक दूसरा सबसे लांछित शब्द है- राष्ट्रवाद। इसलिए राष्ट्रवाद के बजाए राष्ट्र, राष्ट्रीयता, भारतीयता और राष्ट्रत्व जैसे शब्दों का उपयोग किया जाना चाहिए। क्योंकि राष्ट्रवाद की पश्चिमी पहचान और उसके व्याख्यायित करने के पश्चिमी पैमानों ने इस शब्द को कहीं का नहीं छोड़ा है। इसलिए नेशनलिज्म या राष्ट्रवाद शब्द छोड़कर ही हम भारतीयता के वैचारिक अधिष्ठान की सही व्याख्या कर सकते हैं।
वर्णव्यवस्था और जाति के बाद-
भारतीय समाज को लांछित करने के लिए उस पर सबसे बड़ा आरोप वर्ण व्यवस्था का है। जबकि वर्ण व्यवस्था एक वृत्ति थी, टेंपरामेंट थी। आपके स्वभाव, मन और इच्छा के अनुसार आप उसमें स्थापित होते थे। व्यावसायिक वृत्ति का व्यक्ति वहां क्षत्रिय बना रहने को मजबूर नहीं था, न ही किसी को अंतिम वर्ण में रहने की मजबूरी थी। अब ये चीजें काल बाह्य हैं। वर्ण व्यवस्था समाप्त है। जाति भी आज रूढ़ि बन गयी किंतु एक समय तक यह हमारे व्यवसाय से संबंधित थी। हमारे परिवार से हमें जातिगत संस्कार मिलते थे-जिनसे हम विशेषज्ञता प्राप्त कर जाब गारंटी भी पाते थे। इसमें सामाजिक सुरक्षा थी और इसका सपोर्ट सिस्टम भी था।  बढ़ई, लुहार, सोनार, केवट, माली ये जातियां भर नहीं है। इनमें एक व्यावसायिक हुनर और दक्षता जुड़ी थी। गांवों की अर्थव्यवस्था इनके आधार पर चली और मजबूत रही। आज यह सारा कुछ उजड़ चुका है। हुनरमंद जातियां आज रोजगार कार्यालय में रोजगार के लिए पंजीयन करा रही हैं। जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था दोनों ही अब अपने मूल स्वरूप में काल बाह्य हो चुके हैं। अप्रासंगिक हो चुके हैं। ऐसे में जाति के गुण के बजाए, जाति की पहचान खास हो गयी है। इसमें भी कुछ गलत नहीं है। हर जाति का अपना इतिहास है, गौरव है और महापुरुष हैं। ऐसे में जाति भी ठीक है, जाति की पहचान भी ठीक है, पर जातिभेद ठीक नहीं है। जाति के आधार भेदभाव यह हमारी संस्कृति नहीं। यह मानवीय भी नहीं और सभ्य समाज के लिए जातिभेद कलंक ही है।
राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक अवधारणा से बना राष्ट्र-
 हमारा राष्ट्र राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक अवधारणा से बना है। सत्य,अहिंसा, परोपकार, क्षमा जैसे गुणों के साथ यह राष्ट्र ज्ञान में रत रहा है, इसलिए यह भा-रत है। डा. रामविलास शर्मा इस भारत की पहचान कराते हैं। इसके साथ ही इस भारत को पहचानने में महात्मा गांधी, धर्मपाल,अविनाश चंद्र दास, डा.राममनोहर लोहिया,वासुदेव शरण अग्रवाल, डा. विद्यानिवास मिश्र,निर्मल वर्मा हमारी मदद कर सकते हैं। डा. रामविलास  शर्मा की पुस्तक भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश हमारा दृष्टिदोष दूर कर सकती है। आर्य शब्द के मायने ही हैं श्रेष्ठ और राष्ट्र मतलब है समाज और लोग। शायद इसीलिए इस दौर में तारिक फतेह कह पाते हैं, मैं हिंदु हूं, मेरा जन्म पाकिस्तान में हुआ है।यानी भारतीयता या भारत राष्ट्र का पर्याय हिंदुत्व और हिंदु राष्ट्र भी है। क्योंकि यह भौगोलिक संज्ञा है, कोई पांथिक संज्ञा नहीं है। इन अर्थों में हिंदु और भारतीय तथा हिंदुत्व और भारतीयता पर्याय ही हैं। हालांकि इस दौर में इसे स्वीकारना कठिन ही नहीं, असंभव भी है।
विविधता ही विशेषता-
भारतीयता भाववाचक शब्द है। यह हर उस आदमी की जमीन है जो इसे अपनी मातृभूमि और पुण्यभूमि मानता है, जो इसके इतिहास से अपना रिश्ता जोड़ता है, जो इसके सुख-दुख और आशा-निराशा को अपने साथ जोड़ता है, जो इसकी जय में खुश और पराजय में दुखी होता है। समान संवेदना और समान अनुभूति से जुड़ने वाला हर भारतवासी अपने को भारतीय कहने का हक स्वतः पा जाता है। भारत किसी के विरुद्ध नहीं है। विविधता में एकता इस देश की प्रकृति है, यही प्रकृति इसकी विशेषता भी है। भारत एक साथ नया और पुराना दोनों है। विविध सभ्यताओं के साथ संवाद, अवगाहन ,समभाव और सर्वभाव इसकी मूलवृत्ति है। समय के साथ हर समाज में कुछ विकृतियां आती हैं। भारतीय समाज भी उन विकृतियों से मुक्त नहीं है। लेकिन प्रायः ये संकट उसकी लंबी गुलामी से उपजे हैं। स्त्रियों, दलितों के साथ हमारा व्यवहार भारतीय स्वभाव और उसके दर्शन के अनुकूल नहीं है। किंतु गुलामी के कालखंड में समाज में आई विकृतियों को त्यागकर आगे बढ़ना हमारी जिम्मेदारी है और हम बढ़े भी हैं।
सुख का मूल है धर्म-
भारतीय दर्शन संपूर्ण जीव सृष्टि का विचार करने वाला दर्शन है। संपूर्ण समष्टि का ऐसा शाश्वत् चिंतन किसी भूमि में नहीं है। यहां आनंद ही हमारा मूल है। परिवार की उत्पादकीय संपत्ति ही पूंजी थी। चाणक्य खुद कहते हैं, मनुष्यानां वृत्ति अर्थं इसलिए भारतीय दर्शन योगक्षेम की बात करता है। योग का मतलब है- अप्राप्ति की प्राप्ति और क्षेम का मतलब है-प्राप्त की सुरक्षा। इसलिए चाणक्य कह पाए, ‘सुखस्य मूलं धर्मः/धर्मस्य मूलं अर्थः/अर्थस्य मूलं राज्यं।
वर्तमान चुनौतियां और समाधान-
  प्रख्यात विचारक ग्राम्सी कहते हैं, “गुलामी आर्थिक नहीं सांस्कृतिक होती है। भारतीय समाज भी लंबे समय से सांस्कृतिक गुलामी से घिरा हुआ है। जिसके कारण हमारे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को कहना पड़ा, हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी, आओ विचारें मिलकर, यह समस्याएं सभी। किंतु दुखद यह है कि आजादी के बाद भी हमारा बौद्धिक, राजनीतिक और प्रभु वर्ग समाज में वह चेतना नहीं जागृत कर सका, जिसके आधार पर भारतीय समाज का खोया हुआ आत्मविश्वास वापस आता। क्योंकि वह अभी अंग्रेजों द्वारा कराए गए हीनताबोध से मुक्त नहीं हुआ है। भारतीय ज्ञान परंपरा को अंग्रेजों ने तुच्छ बताकर खारिज किया ताकि वे भारतीयों की चेतना को मार सकें और उन्हें गुलाम बनाए रख सकें। गुलामी की लंबी छाया इतनी गहरी है कि उसका अंधेरा आज भी हमारे बौद्धिक जगत को पश्चिमी विचारों की गुलामी के लिए मजबूर करता है। भारत को समझने की आंखें और दिल दोनों हमारे पास नहीं थे। स्वामी दयानंद, महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, बाबा साहब आंबेडकर द्वारा दी गयी दृष्टि से भारत को समझने के बजाए हम विदेशी विचारकों द्वारा आरोपित दृष्टियों से भारत को देख रहे थे। भारत को नवसाम्यवादी विचारकों द्वारा आरोपित किए जा रहे मुद्दों को समझना जरूरी है। माओवाद, खालिस्तान,रोहिंग्या को संरक्षण देने की मांग, जनजातियों और विविध जातियों की कृत्रिम अस्मिता के नित नए संघर्ष खड़े करने में लगे ये लोग भारत को कमजोर करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। इसमें उनका सहयोग अनेक उदार वाममार्गी बौद्धिक और दिशाहीन बौद्धिक भी कर रहे हैं। आर्थिक तौर पर मजबूत ये ताकतें एक भारत-श्रेष्ठ भारत के विचार के सामने चुनौती की तरह हैं। हमारे समाज की कमजोरियों को लक्ष्य कर अपने हित साधने में लगी ये ताकतें भारत में तरह-तरह की बैचेनियों का कारक और कारण भी हैं।
    भारत के सामने अपनी एकता को बचाने का एक ही मंत्र है,सबसे पहले भारत। इसके साथ ही हमें अपने समाज में जोड़ने के सूत्र खोजने होगें। भारत विरोधी ताकतें तोड़ने के सूत्र खोज रही हैं, हमें जोड़ने के सूत्र खोजने होगें। किन कारणों से हमें साथ रहना है, वे क्या ऐतिहासिक और सामाजिक कारण हैं जिनके कारण भारत का होना जरूरी है। इन सवालों पर सोचना जरूरी है। अगर वे हमारे समाज को तोड़ने, विखंडित करने और जाति, पंथ के नाम पर लड़ाने के लिए सचेतन कोशिशें चला सकते हैं, तो हमें भी इस साजिश को समझकर सामने आना होगा। भारत का भला और बुरा भारत के लोग ही करेगें। इसका भला वे लोग ही करेंगें जिनकी मातृभूमि और पुण्यभूमि भारत है। वैचारिक गुलामी से मुक्त होकर, नई आंखों से दुनिया को देखना। अपने संकटों के हल तलाशना और विश्व मानवता को सुख के सूत्र देना हमारी जिम्मेदारी है । स्वामी विवेकानंद हमें इस कठिन दायित्वबोध की याद दिलाते हैं। वे हमें बताते हैं कि हमारा दायित्व क्या है। विश्व के लिए, मानवता के लिए, सुख और शांति के लिए भारत और उसके दर्शन की विशेषताएं हमें सामने रखनी होगीं। कोई भी समाज श्रेष्ठतम का ही चयन करता है। विश्व भी श्रेष्ठतम का ही चयन करेगा। हमारे पास एक ऐसी वैश्विक पूंजी है जो समावेशी है,सुख और आनंद का सृजन करने वाली है। अपने को पहचानकर भारत अगर इस ओर आगे आ रहा है तो उसे आने दीजिए। भारत का भारत से परिचय हो जाने दीजिए।
( लेखक मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

शनिवार, 3 मार्च 2018

आरएसएस की अविराम एवं भाव यात्रा का 'ध्येय पथ'


ध्येय पथ : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक
- लोकेन्द्र सिंह


     जनसंचार माध्यमों में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में भ्रामक जानकारी आती है, तब सामान्य व्यक्ति चकित हो उठते हैं, क्योंकि उनके जीवन में संघ किसी और रूप में उपस्थित रहता है, जबकि आरएसएस विरोधी ताकतों द्वारा मीडिया में संघ की छवि किसी और रूप में प्रस्तुत की जाती है। संघ ने लंबे समय तक इस प्रकार के दुष्प्रचार का खण्डन नहीं किया। अब भी बहुत आवश्यकता होने पर ही संघ अपना पक्ष रखता है। दरअसल, इसके पीछे संघ का यह विचार रहा- 'कथनी नहीं, व्यवहार से स्वयं को समाज के समक्ष प्रस्तुत करो।' विजयदशमी, 1925 से अब तक संघ के स्वयंसेवकों ने यही किया। परिणामस्वरूप सुनियोजित विरोध, कुप्रचार और षड्यंत्रों के बाद भी संघ अपने ध्येय पथ पर बढ़ता रहा। इसी संदर्भ में यह भी देखना होगा कि जब भी संघ को जानने या समझने का प्रश्न आता है, तब वरिष्ठ प्रचारक यही कहते हैं- 'संघ को समझना है, तो शाखा में आना होगा।' अर्थात् शाखा आए बिना संघ को नहीं समझा जा सकता। संभवत: प्रारंभिक वर्षों में संघ के संबंध में द्वितीयक स्रोत उपलब्ध नहीं रहे होंगे, यथा- प्रामाणिक पुस्तकें। जो साहित्य लिखा भी गया था, वह संघ के विरोध में तथाकथित प्रगतिशील खेमे द्वारा लिखा गया। संघ स्वयं भी संगठन के कार्य में निष्ठा के साथ जुड़ा रहा। 'प्रसिद्धिपरांगमुखता' की नीति के कारण प्रचार से दूर रहा। किंतु, आज संघ के संबंध में सब प्रकार का साहित्य लिखा जा रहा है/उपलब्ध है। यह साहित्य हमें संघ का प्राथमिक और सैद्धांतिक परिचय तो दे ही देता है। इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण पुस्तक है- 'ध्येय पथ : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक'। पुस्तक का संपादन लेखक एवं पत्रकारिता के आचार्य प्रो. संजय द्विवेदी ने किया है। यह पुस्तक संघ पर उपलब्ध अन्य पुस्तकों से भिन्न है। दरअसल, पुस्तक में संघ के किसी एक पक्ष को रेखांकित नहीं किया गया है और न ही एक प्रकार की दृष्टिकोण से संघ को देखा गया है। पुस्तक में संघ के विराट स्वरूप को दिखाने का एक प्रयास संपादक ने किया है। सामग्री की विविधता एवं विभिन्न दृष्टिकोण/विचार 'ध्येय पथ' को शेष पुस्तकों से अलग दिखाते हैं।
            संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने संघ की दशक की यात्रा का निकट से अनुभव किया है, इसलिए उनके संपादन में इस यात्रा के लगभग सभी पड़ाव शामिल हो पाए हैं। चूँकि संघ का स्वरूप इतना विराट है कि उसको एक पुस्तक में प्रस्तुत कर देना संभव नहीं है। इसके बाद भी यह कठिन कार्य करने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक भ्रम के उन जालों को भी हटाने का महत्वपूर्ण कार्य करती है, जो हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबल्स की संतानों ने फैलाए हैं। इस संबंध में संपादक प्रो. द्विवेदी की संपादकीय के शुरुआती पैराग्राफ से होकर गुजरना चाहिए। उन्होंने लिखा है- ''राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ऐसा क्या है कि वह देश के तमाम बुद्धिजीवियों की आलोचना के केंद्र में रहता है? ऐसा क्या है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी उसे संदेह की नजर से देखता है? बिना यह जाने की उसका मूल विचार क्या है? आरएसएस को न जानने वाले और जानकर भी उसकी गलत व्याख्या करने वालों की तादाद इतनी है कि पूरा सच सामने नहीं आ पाता। आरएसएस के बारे में बहुत से भ्रम हैं। कुछ तो विरोधियों द्वारा प्रचारित हैं तो कुछ ऐसे हैं जिनकी गलत व्याख्या कर विज्ञापित किया गया है। आरएसएस की काम करने की प्रक्रिया ऐसी है कि वह काम तो करता है, प्रचार नहीं करता। इसलिए वह कही बातों का खंडन करने भी आगे नहीं आता है। ऐसा संगठन जो प्रचार में भरोसा नहीं करता और उसके कैडर को सतत प्रसिद्धि से दूर रहने का पाठ ही पढ़ाया गया है, वह अपनी अच्छाइयों को बताने के लिए आगे नहीं आता, न ही गलत छप रही बातों का खंडन करने का अभ्यासी है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आरएसएस के बारे में जो कहा जा ता है, वह कितना सच है? ''
            'ध्येय पथ' ऐसे ही अनेक प्रश्नों के उत्तर हमारे सामने प्रस्तुत करती है। संघ की वास्तविक तस्वीर को हमारे सामने प्रस्तुत करती है। संघ को बदनाम करने में संलग्न विरोधी ताकतों के झूठ उजागर करने का महत्वपूर्ण कार्य इस पुस्तक ने किया है। आजकल बड़े जोर से एक झूठ बोला जा रहा है, बल्कि उस झूठ के सहारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उसके कार्यकर्ताओं की देशभक्ति को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है- 'देश के स्वतंत्रता आंदोलन में संघ ने हिस्सा नहीं लिया, अपितु उसके पदाधिकारियों ने अपने कार्यकर्ताओं को आंदोलन का हिस्सा बनने से रोकने के प्रयास किए। देश की स्वतंत्रता में संघ का कोई योगदान नहीं है।' संघ एक राष्ट्रनिष्ठ संगठन है। संघ के स्वयंसेवक देश के गौरव के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा सकते हैं। समाज में संघ की ऐसी छवि बन गई है। सशक्त छवि। संघ और उसके स्वयंसेवक देशभक्ति के पर्याय हो गए हैं। ऐसे में संघ विरोधी ताकतों ने स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित उक्त झूठ को अपना हथियार बना लिया है। यह ताकतें बार-बार संघ को इस हथियार से क्षत-विक्षत करने का प्रयास कर रही हैं। 'ध्येय पथ' ने अपने शुरुआती अध्याय में ही संघ विरोधी ताकतों के इस हथियार को कुंद करने का बंदोबस्त कर दिया है। 'स्वतंत्रता संग्राम एवं संघ' अध्याय में वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष बल्देवभाई शर्मा, डॉ. मनोज चतुर्वेदी और राजेन्द्र नाथ तिवारी के आलेखों में प्रमाण और संदर्भ सहित यह सिद्ध किया गया है कि संघ और उसके स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता आंदोलन में न केवल हिस्सा लिया, अपितु अपने स्तर पर भी ब्रिटिश सरकार का विरोध किया। संघ की देशभक्ति ने ब्रिटिश सरकार के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी थीं।
            'इतिहास विकास एवं भावयात्रा' अध्याय में कुछ ग्यारह आलेख शामिल हैं, जिनमें प्रख्यात बुद्धिजीवी केएन गोविन्दाचार्य का लेख भी शामिल है। गोविन्दाचार्य संघ की यात्रा के सहयात्री भी रहे हैं। इसलिए जब वह लिखते हैं कि संघ की यह यात्रा 'रचना और सृजन की अविराम यात्रा' है, तो शब्द कहीं अधिक जीवंत होकर उनके कथन के साक्षी बनते हैं। गोविन्दाचार्य का यह लेख और इस अध्याय में शामिल अन्य लेख संघ के इतिहास, उसके उद्देश्य, कार्यप्रणाली और उसके स्वरूप से परिचित कराने का कार्य करते हैं। इसके आगे के अध्याय में आरएसएस के 'सामाजिक योगदान' की चर्चा की गई है। यह ज्ञात तथ्य है कि नित्य समाजसेवा करने वाला दुनिया का एकमात्र संगठन संघ ही है। देशभर में संघ की प्रेरणा से डेढ़ लाख से अधिक सेवा कार्य संचालित किए जा रहे हैं। संघ के सेवा विभाग की वेबसाइट 'सेवागाथा डॉट ओआरजी' पर उपलब्ध आंकड़े के अनुसार सेवाकार्यों की संख्या लगभग एक लाख सत्तर हजार है। संघ का मानना है कि वास्तविक एवं स्थायी परिवर्तन समाज जागरण से ही संभव है। इसलिए वह 'व्यक्ति निर्माण' के कार्य को ही अपना मुख्य कार्य मानता है। समाज को जागृत करने, समाज में समरसता बढ़ाने, समाज का सशक्त एवं स्वावलंबी बनाने में संघ की भूमिका का सम्मान स्वयं महात्मा गांधी ने भी किया है। एक लेखक वर्ग ने संघ के प्रति अपने राजनीतिक दुराग्रह एवं पूर्वाग्रहों के कारण समाज में उसके योगदान को कभी रेखांकित नहीं किया। राजनीतिक असर इस कदर था कि तटस्थ लेखकों का ध्यान भी संघकार्यों के प्रति नहीं गया। प्रख्यात साहित्यकार एवं कवि डॉ. देवेन्द्र दीपक ने अपने आलेख 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदी' में इस ओर संकेत किया है। उन्होंने लिखा है कि राज्यसभा सदस्य पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में छपे अपने लेख में विभिन्न संस्थानों की हिंदी सेवा की विस्तार से चर्चा की। इस लेख को पढ़कर जब डॉ. दीपक ने उनको पत्र लिख कर यह जानना चाहा कि उन्होंने हिंदी के विस्तार में संघ के योगदान का उल्लेख क्यों नहीं किया? तब पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने इसे अपनी चूक मानते हुए अपने उत्तर में लिखा था- 'राजनीतिक कारणों से ध्यान उधर नहीं जाता।' इसी प्रकार का एक और उदाहरण आता है, जब डॉ. दीपक ने हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित स्मारिका में 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदी' विषय पर लेख लिखने का प्रस्ताव दिया। इस संबंध में उन्हें जो उत्तर प्राप्त हुआ, वह संघ के प्रति राजनीतिक दबाव को भी प्रकट करता है- 'सर, क्षमा करें। हमारी ग्रांट बंद हो जाएगी।' बहरहाल, हिंदी के विस्तार में संघ का जो योगदान है, वह अनुकरणीय है। संघ की जब शुरुआत हुई तो उसमें मराठी भाषा कार्यकर्ता अधिक थे, तब भी संघ का समूचा कार्य हिंदी में ही होता था। तृतीय वर्ष के संघ शिक्षावर्ग में देश के लगभग सभी प्रांतों से स्वयंसेवक प्रशिक्षण हेतु आते हैं। सबका प्रशिक्षण हिंदी भाषा में होता है। संघ ने प्रारंभ से ही बिना किसी आंदोलन और प्रचार के हिंदी का विस्तार किया है। उल्लेखनीय है कि संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने दो मार्च, 1950 को रोहतक में हरियाणा प्रांतीय हिंदी सम्मेलन में हिंदी को विश्वभाषा बनाने का आह्वान किया था। यहाँ यह भी समझना आवश्यक होगा कि संघ हिंदी को राष्ट्रभाषा एवं विश्वभाषा बनाने का आग्रही है, किंतु भारतीय भाषाओं की मजबूती का भी पक्षधर है। संघ मातृभाषाओं में शिक्षा एवं संवाद का हिमायती है। यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा कि मेरे गुरुजी सुरेश चित्रांशी अकसर मुझे बताते हैं कि जब देश में आपातकाल थोपा गया था, तब संघ के कार्यकर्ताओं को खोज-खोज कर जेल में डाला जा रहा था। उन्हें प्रताडि़त किया जा रहा था। यातनाएं दी जा रही थीं। पुलिस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह रहता था कि संघ के स्वयंसेवक की पहचान कैसे हो, संघ के कार्यकर्ता पर कोई पहचान-पत्र तो होता नहीं और न ही संघ में उनका पंजीयन होता है। ऐसे में कई कार्यकर्ता अपने हिंदी उच्चारण के कारण में पकड़े गए। यानी भाषा से उनकी पहचान की गई।
'संगठनात्मक योगदान' अध्याय में संघ के प्रचारक मुकुल कानिटकर का महत्वपूर्ण लेख शामिल है, जिसमें उन्होंने भारतीय शिक्षण मंडल का विस्तृत परिचय दिया है। यह मात्र एक संगठन का परिचय नहीं है, बल्कि एक झलक है कि संघ की प्रेरणा से विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे अनेक संगठन कार्य कर रहे हैं। कुछेक संगठनों का अत्यंत संक्षिप्त परिचय इस समीक्षा/लेख के अकिंचन लेखक ने भी आलेख 'संघ : बीज से वटवृक्ष' में देने का प्रयास किया है। अकसर आरएसएस का उल्लेख भारतीय जनता पार्टी के साथ ही किया जाता है। दरअसल, संघ की सांस्कृतिक पहचान पर राजनीतिक लेबल चस्पा करने का यह तुच्छ प्रयास है। विरोधी प्रयास करते हैं कि संघ को राजनीतिक संगठन साबित कर, समाज में उसके विस्तार एवं स्वीकार्यता को सीमित किया जाए। किंतु, वह सफल नहीं हो पाते, क्योंकि संघ को समझते नहीं हैं। 'संघ और राजनीति' अध्याय में इसी लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि संघ के लिए 'प्राथमिकता में नहीं है राजनीति'
            'ध्येय पथ' में  संपादक प्रो. द्विवेदी ने 'स्त्री शक्ति और संघ' अध्याय को शामिल कर उचित ही जवाब उन मूढ़ों को दिया है, जो बिना जाने यह आरोप लगाते हैं कि संघ में महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। डॉ. प्रेरणा चतुर्वेदी और संगीता सचदेव ने अपने आलेखों में इस बात पर विस्तार से प्रकाश डाला है कि संघ किस विधि स्त्री शक्ति के मध्य कार्य कर रहा है। संघ न केवल महिलाओं के मध्य कार्य कर रहा है, बल्कि समाज में स्त्री शक्ति की भूमिका को सशक्त कर रहा है। राष्ट्रसेविका समिति एवं दुर्गा वाहिनी जैसे संगठन मातृशक्ति में आत्मविश्वास भर रहे हैं। इसके अलावा अन्य संगठनों के माध्यम से भी मातृशक्ति अपना योगदान दे रही है। इसके साथ ही एक अध्याय में यह भी बताया गया है कि संघ अब भी अपनी नीति 'प्रसिद्धिपरांगमुखता' में भरोसा करता है, किंतु अब उसने जनसंचार माध्यमों से मित्रता करना प्रारंभ कर दिया है। जनसंचार माध्यमों से यह मित्रता 'संघ के प्रचार' के लिए नहीं है, संघ को आज तो कतई प्रचार की आवश्यकता नहीं है, यह मित्रता तो समाज में चल रहे 'सकारात्मक एवं रचनात्मक कार्यों' के प्रचार-प्रसार के लिए है। इसके अलावा समाज से संवाद बढ़ाना भी एक उद्देश्य है, ताकि संघ विरोधियों द्वारा फैलाए भ्रमों का समुचित प्रत्युत्तर दिया जा सके। इसके साथ ही और भी महत्वपूर्ण आलेख इस पुस्तक में शामिल हैं, जो संघ के प्रति हमारी समझ को बढ़ाते हैं। पुस्तक के आखिर में 'संघ : एक परिचय, दृष्टि और दर्शन' अध्याय को शामिल किया गया है। यह अध्याय हमें संघ की बुनियादी रचना और जानकारी देता है, यथा- आरएसएस क्या है, उसका उद्देश्य, शाखा क्या है, शाखा में क्या होता है, स्वयंसेवक की परिभाषा क्या है? इसके साथ ही ऐसे और भी प्रश्नों के माध्यम से जानकारी देने का प्रयास किया गया है, जो अमूमन पूछे जाते हैं।
            बारह अध्यायों में 36 आलेखों को समेटे 'ध्येय पथ' वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत को समर्पित है। पुस्तक में कुछ 262 पृष्ठ हैं। मुखपृष्ठ आकर्षक बन पड़ा है, जो बरबस ही पाठकों को आकर्षित करता है। पुस्तक का प्रकाशन दिल्ली के 'यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स' ने किया है। प्रकाशक ने जनवरी, 2018 में दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में पुस्तक को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया था, जिसे पाठकों ने हाथों-हाथ लिया। अपनी समृद्ध एवं विविध सामग्री के कारण पुस्तक ने संघ संबंधी साहित्य में शीघ्र ही अपना स्थान बना लिया है। संघ को जानने और समझने का प्रयास करने वाले सभी प्रकार के लोगों को यह पुस्तक पढऩी चाहिए। इस 'पुस्तक-चर्चा आलेख' को मैं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी के संपादकीय के अंतिम हिस्से के साथ पूर्ण करना चाहूँगा- 'एक संगठन जब अपनी सौ साल की आयु पूरी करने की तरफ बढ़ रहा है तो उसके बारे में उठे सवालों, जिज्ञासाओं, उसके अवदान, उसकी भविष्य की तैयारियों पर बातचीत होनी ही चाहिए। आशा है कि यह पुस्तक इस सिलसिले में एक अग्रगामी भूमिका निभाएगी तथा विमर्श और चिंतन के नये द्वार खोलेगी।'
पुस्तक  : ध्येय पथ : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक
संपादक  : प्रो. संजय द्विवेदी
मूल्य  :  250 रुपये (पेपरबैक), 650 रूपए (सजिल्द)
पृष्ठ : 262
प्रकाशक  :  यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स
                  1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा,
                  दिल्ली-110032

(समीक्षक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक हैं और विश्व संवाद केंद्र, भोपाल के कार्यकारी निदेशक हैं।)