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शुक्रवार, 29 मई 2020

अजीत जोगी-बहुत कठिन है उन-सा होना


-प्रो.संजय द्विवेदी

  जिद, जिजीविषा, जीवटता और जीवंतता एक साथ किसी एक आदमी में देखनी हो तो आपको अजीत जोगी के बारे में जरूर जानना चाहिए। छत्तीसगढ़ के पूर्व और प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी यानि एक ऐसा नायक जिसने बेहद खुरदरी जमीन से जिंदगी की शुरुआत की और आसमान की उन ऊंचाइयों तक पहुंचे, जहां पहुंचना किसी के लिए सपने से कम नहीं है। अजीत जोगी किसी की कृपा से नहीं बनते। वे खुद बने और अनेक को बनाया। उनकी सबसे बड़ी देन यही है कि उन्होंने हर अभावग्रस्त व्यक्ति को यह पाठ पढ़ाया कि आपकी परिस्थितियां आपको बड़ा बनने से रोक नहीं सकतीं, अगर आपमें हौसला है।
    वे बिलासपुर जिले के छोटे से कस्बे पेंड्रा के पास जनजातियों के एक गांव जोगीसार में पैदा हुए और लेकिन इस अध्यापक पुत्र के सपने बहुत बड़े थे। भोपाल से इंजीनियरिंग, आईपीएस, आईएएस बनने के बाद कलेक्टर और फिर बरास्ते राज्यसभा उनके मुख्यमंत्री बनने का सफर एक जादुई कहानी सरीखा है। साधारण परिस्थितियों को घता बताकर असाधारण सफलताएं प्राप्त करने की कहानी हैं अजीत जोगी । बावजूद इसके उनकी जिंदगी में चैन कहां है। इस पूरी जिंदगी में सिर्फ एक चीज है, जो लगातार उपस्थित है, वह है संघर्ष। संघर्ष और उससे उपजी सफलताएं। मुख्यमंत्री रहते उनके तेज और ताप की कहानियां, उनकी दुर्घटना के बाद उनका ह्वील चेयर पर आ जाना और बिना थके, बिना रूके अहर्निश संघर्ष आपको कंपा देगा। किंतु अजीत जोगी शरीर से नहीं दिमाग से राजनीति करते थे। शरीर थका, लाचार हुआ पर उनका दिमाग चलता रहा। वे चुनौती देते रहे। जूझते रहे। अपनी शर्तों पर जीते रहे। आखिरी सांस तक वे छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय नेताओं में एक बने रहे। उन्हें सुनने के लिए व्यग्र लोगों को मैंने अपनी आंखों से देखा है। उनसे मिलने का दीवानापन देखा है। ठेठ छत्तीसगढ़ी में धाराप्रवाह और लालित्यपूर्ण भाषण से लोगों को बांध लेना उन्हें आता था। यह दीवानगी आखिरी दिन तक बनी रही।
    छत्तीसगढ़ में होते हुए पत्रकारीय कर्म के नाते उनसे अनेक बार मिलना हुआ। वे मेरे आयोजनों में भी आए। कुछ किताबों के विमोचन में भी। अपनी असहमतियों को अलग रखकर दूसरे विचारों को सम्मान देना उन्हें आता था। राजनीति में वे कुछ छोड़ते नहीं थे किंतु साहित्य और संस्कृति की दुनिया में वे थोड़ा स्पेश दूसरों को भी देते थे। उन्हें पसंद था कि उन्हें लोग लेखक, कवि और कहानीकार के रूप में जानें। वे दरअसल पढ़ने-लिखने वाले इंसान थे। बहुपठित और बहुविज्ञ। किंतु वे शक्ति चाहते थे जो साहित्य और संस्कृति की दुनिया उन्हें नहीं दे सकती थी। इसलिए शक्ति जिन-जिन रास्तों से आती थी, वह उन सब पर चले। वे आईपीएस बने, आईएएस बने, राजनीति में गए और सीएम बने। पावर का यह चस्का उन्हें प्रारंभ से था। वे कलेक्टर थे तो जननेता की तरह व्यवहार करते थे, जब मुख्यमंत्री बने तो कलेक्टर सरीखे दिखे। उनकी एक छवि में अनेक छवियां थीं। एक जिंदगी में वे कई जिंदगियां जीना चाहते थे। उन्हें याद करना जरूरी है और उनसे सीखना भी जरूरी है। वे अपनी ही रची कहानी के एक ऐसे नायक थे जिसे चलना तो पता था, किंतु पड़ाव और विश्राम के सूत्र उन्होंने सीखे नहीं थे। वे बहुतों के अनुभवों  में बेहद उदार नायक हैं, तो कई के लिए खलनायक। ऐसी मिश्रित छवियों का यह नायक हमें सिखाता बहुत है। अपनी जिंदगी से उन्होंने हमें अनेक पाठ पढ़ाए हैं। एक तो किसी भी सामाजिक, आर्थिक स्थिति और परिवेश को चुनौती देकर आप पहली पंक्ति में अपनी जगह बना सकते हैं। दूसरा शारीरिक व्याधियों के बाद भी आप जो चाहे कर सकते हैं। अपने जीवन के आखिरी दिनों में एक पार्टी का गठन और उसे एक सशक्त विकल्प में पेश कर देना साधारण नहीं था जो उन्होंने कर दिखाया। अजीत जोगी से बात करते हुए, उन्हें सुनते हुए आपको जो अनुभव हुए होगें वे विलक्षण थे। उनकी रेंज बहुत बड़ी थी। बहुत बड़ी। वे राजनीति में आकर उन्होंने खुद की दुनिया बहुत तंग कर ली। राजनीति उन्होंने जिस शैली में की उसने भी बहुत निराश किया। किंतु उन्हें जो करना होता था, उसे करते थे। उनके दोस्त हों, समर्थक हों  या आलाकमान, जोगी के साथ जिसे चलना हो चले, वरना वे अपना रास्ता खुद तय करते थे। जिंदगी के आखिरी दिनों में उनके लिए गए फैसलों को आत्मघाती जरूर कह सकते हैं, किंतु इस जिजीविषा का नाम अजीत जोगी है। आज जब वे इस दुनिया को छोड़कर जा चुके हैं तो यही कहना है कि उन-सा होना कठिन है। बहुत कठिन। मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि।   

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

पं.श्यामलाल चतुर्वेदीः उन्हें भुलाना है मुश्किल



साधारण शब्दों से असाधारण संवाद की कला थी उनके पास
-प्रो. संजय द्विवेदी

चित्र परिचयः पद्मश्री से अलंकृत किए जाने के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से भेंट


   पद्मश्री से अलंकृत पं. श्यामलाल चतुर्वेदी की पावन स्मृति को भूल पाना कठिन है। वे हमारे समय के ऐसे नायक हैं जिसने पत्रकारिता, साहित्य और समाज तीनों क्षेत्रों में अपनी विरल पहचान बनाई। वे छत्तीसगढ़ के असली इंसान थे। जिन अर्थों में सबले बढ़िया छत्तीसगढ़िया का नारा दिया गया होगा, उसके मायने शायद यही रहे होंगे कि अच्छा मनुष्य होना। छत्तीसगढ़ उनकी वाणी,कर्म, देहभाषा से मुखरित होता था। बालसुलभ स्वभाव, सच कहने का साहस और सलीका, अपनी शर्तों पर जिंदगी जीना- यह सारा कुछ एक साथ श्यामलाल जी ने अकेले संभव बनाया।
    श्यामलाल जी अपनी जमीन को, माटी को, महतारी को प्यार करने वाले व्यक्ति थे। सत्ता के साथ उनके निरंतर और व्यापक संपर्क थे। वे राजपुरुषों के साथ-साथ आम आदमी से भी समान रूप से संवाद कर सकते थे। वे अक्सर अपने वक्तव्यों में कहते थे- आपको मेरी बात बुरी लग जाए तो आप मेरा क्या कर लेगें? वैसै ही मैं भी बुरा मान जाऊं तो आपका क्या कर लूंगा?” उन्होंने कभी भी इसलिए कोई बात नहीं कि वह राजपुरुषों को अच्छी या बुरी लगे। उन्हें जो कहना था वे कहते थे। दिल से कहते थे। शायद इसीलिए उनकी तमाम बातें लोंगो को प्रभावित करती थीं।
अप्रतिम वक्ताः श्यामलाल जी अप्रतिम वक्ता थे। मां सरस्वती उनकी वाणी पर विराजती थीं। हिंदी और छत्तीसगढ़ी दोनों भाषाओं में वे सहज थे। दिल की बात दिलों तक पहुंचाने का हुनर उनके पास था। वे बोलते तो हम मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते। रायपुर, बिलासपुर के अनेक आयोजनों में उनको सुनना हमेशा सुख देता था। अपनी साफगोई, सादगी और सरलता से वे बड़ी से बड़ी बात कह जाते थे। उनकी बहुत कड़ी बात भी कभी किसी को बुरी नहीं लगती थी, क्योंकि उसमें उनका प्रेम और व्यंग्य की धार छुपी रहती थी। उनसे शायद ही कोई नाराज हो सकता था। मैंने उन्हें सुनते हुए पाया कि वे दिल से दिल की बात कहते थे। ऐसा संवाद हमेशा प्रभावित करता है। उनके वक्तव्यों में आलंकारिक शब्दावली के बजाए लोक के शब्द होते। साधारण शब्दों से असाधारण संवाद करने की कला उनसे सीखी जा सकती थी। उनकी देहभाषा (बाडी लैंग्वेज) उनके वक्तव्य को प्रभावी बनाती थी। हम यह मानकर चलते थे कि वे कह रहे हैं , तो बात ठीक ही होगी। वे किसी पर नाराज हों, मैंने सुना नहीं। मलाल या गुस्सा करना उन्हें आता नहीं था। हमेशा हंसते हुए अपनी बात कहना और अपना वात्सल्य नई पीढ़ी पर लुटाना उनसे सीखना चाहिए। आज जबकि हमारे बुर्जुग बेहद अकेले और तन्हा जिंदगी जी रहे हैं। भरे-पूरे घरों और समाज में वे अकेले हैं। उन्हें श्यामलाल जी की जिंदगी से सीखना चाहिए। समाज में समरस होकर कैसे एक व्यक्ति अपनी अंतिम सांस तक प्रासंगिक बना रह सकता है, यह उन्होंने हमें सिखाया।
सक्रिय जीवनःवे सक्रिय पत्रकारिता, लेखन कब का छोड़ चुके थे। लेकिन आप रायपुर से बिलासपुर तक उनकी सक्रियता और उपस्थिति को रेखांकित कर सकते थे। निजी आयोजनों से लेकर सार्वजनिक समारोहों तक में वे बिना किसी खास प्रोटोकाल की अपेक्षा के आते थे। अपना प्यार लुटाते, आशीष देते और लौट जाते। उनके परिवार को भी इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहिए कि कैसे उनके बड़े सुपुत्र श्री शशिकांत जी ने उनकी हर इच्छा का मान रखा। वे खराब स्वास्थ्य के बाद भी जहां जाना चाहते थे, शशिकांत जी उन्हें लेकर जाते थे। श्यामलाल जी के तीन ही मंत्र थे- संपर्क,संवाद और संबंध। वे संपर्क करते थे, संवाद करते और बाद में उनकी जिंदगी में इन दो मंत्रों से करीब आए लोगों से उनके संबंध बन जाते थे। वे बिना किसी अपेक्षा के रिश्तों को जीते थे। उनका इस तरह एक महापरिवार बन गया था। जिसमें उनकी बेरोक-टोक आवाजाही थी। अपने अंतिम दिनों में वे छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष बने। किंतु पूरी जिंदगी उनके पास कोई लाभ का पद नहीं था। ऐसे समय में भी वे लोगों के लिए उतने ही सुलभ और आकर्षण का केंद्र थे। मुझे आश्चर्य होता था कि दिल्ली के शिखर संपादक श्री प्रभाष जोशी, मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा,दिग्विजय सिंह हों या बनारस के संगीतज्ञ छन्नूलाल मिश्र अथवा छत्तीसगढ़ के दोनों पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी या डा. रमन सिंह। श्यामलाल जी के जीवन में सब थे। तमाम संपादक, पत्रकार, सांसद, मंत्री, विधायक उन्हें आदर देते थे। समाज से मिलने वाल इतना आदर भी उनमें लेशमात्र भी अहंकार की वृद्धि नहीं कर पाता था।
छत्तीसगढ़ी अस्मिता के प्रतीकः छत्तीसगढ़ देश का अकेला प्रदेश है, जिसकी समृद्ध भाव संपदा और लोकसंपदा है। उसके लिए छत्तीसगढ़ महतारी शब्द का उपयोग भी होता है। अपनी जमीन, भूमि के लिए मां शब्द उदात्त भावनाओं से ही उपजता है। भारत मां के बाद किसी राज्य के लिए संभवतः ऐसा शब्द प्रयोग छत्तीसगढ़ में ही होता है। वैसे भी यह मां महामाया रतनपुर,मां बमलेश्वरी,मां दंतेश्वरी की धरती है, जहां लोकजीवन में ही मातृशक्ति के प्रति अपार आदर है। छत्तीसगढ़ महतारी भी लोकजीवन की ऐसी ही मान्यताओं से संयुक्त है। अपनी माटी से मां की तरह प्यार करना और उसका सम्मान करना यही भाव इससे शब्द से जुड़े हैं। श्यामलाल जी का परिवेश भी लोकजीवन से शक्ति पाता है। इसलिए शहर आकर भी वे अपने गांव को नहीं भूलते, अपने लोकजीवन को नहीं भूलते। उसकी भाषा और भाव को नहीं भूलते। वे शहर में बसे लोकचिंतक थे,  लोकसाधक थे। यह अकारण नहीं था वे प्रो. पी.डी खेड़ा जैसे नायकों के अभिन्न मित्र थे, क्योंकि दोनों के सपने एक थे- एक सुखी, समृद्ध छत्तीसगढ़। आज जबकि प्रो. खेड़ा और श्यामलाल जी दोनों हमारे बीच नहीं हैं, पर वे हम पर कठिन उत्तराधिकार छोड़कर गए हैं। श्यामलाल जी अपने लोगों को न्याय दिलाना चाहते थे,वे चाहते थे कि छत्तीसगढ़ का सर्वांगीण विकास हो, यहां के लोकजीवन को उजाड़े बगैर इसकी प्रगति हो। इसलिए वे सत्ता का ध्यानाकर्षण अपने लेखन और वक्तव्यों के माध्यम से करते रहे। सही मायने में वे छत्तीसगढ़ी अस्मिता के प्रतीक और लोकजीवन में रचे-बसे नायक थे। उनका शब्द-शब्द इसी माटी से उपजा और इसी को समर्पित रहा।                                                      
      जिस समाज की स्मृतियां जितनी सघन होतीं हैं, वह उतना ही चैतन्य समाज होता है। हम हमारे नायकों को समय के साथ भूलते जाते हैं। छत्तीसगढ़ की जमीन पर भी अनेक ऐसे नायक हैं जिन्हें याद किया जाना चाहिए।  मुझे लगता है कि श्यामलाल जी जैसे नायकों की याद ही हमारे समाज को जीवंत, प्राणवान, संवेदनशील और मानवीय बनाने की प्रक्रिया को और तेज करेगी। 

बुधवार, 18 मई 2016

एक चादर उजली सीः पं. श्यामलाल चतुर्वेदी

-संजय द्विवेदी

   आप छत्तीसगढ़ की पावन घरती पर आएं और पं.श्यामलाल चतुर्वेदी से परिचित न हो सकें, यह संभव नहीं है। वे सही मायनों में छत्तीसगढ़ की अस्मिता, उसके स्वाभिमान, भाषा और लोकजीवन के सच्चे प्रतिनिधि हैं। उन्हें सुनकर जिस अपनेपन, भोलेपन और सच्चाई का भान होता है, वह आज के समय में बहुत दुर्लभ है।
   श्यामलाल जी से मेरी पहली मुलाकात सन् 2001 में उस समय हुयी जब मैं दैनिक भास्कर, बिलासपुर में कार्यरत था। मैं मुंबई से बिलासपुर नया-नया आया था और शहर के मिजाज को समझने की कोशिश कर रहा था। हालांकि इसके पहले मैं एक साल रायपुर में स्वदेश का संपादक रह चुका था और बिलासपुर में मेरी उपस्थिति नई ही थी। बिलासपुर के समाज जीवन, यहां के लोगों, राजनेताओं, व्यापारियों, समाज के प्रबुद्ध वर्गों के बीच आना-जाना प्रारंभ कर चुका था। दैनिक भास्कर को री-लांच करने की तैयारी मे बहुत से लोगों से मिलना हो रहा था। इसी बीच एक दिन हमारे कार्यालय में पं. श्यामलाल जी पधारे। उनसे यह मुलाकात जल्दी ही ऐसे रिश्ते में बदल गयी, जिसके बिना मैं स्वयं को पूर्ण नहीं कह सकता। अब शायद ही कोई ऐसा बिलासपुर प्रवास हो, जिसमें उनसे सप्रयास मिलने की कोशिश न की हो। अब जबकि वे काफी अस्वस्थ रहते हैं, उनसे मिलना हमेशा एक शक्ति देता है। उनसे मिला प्रेम, हमारी पूंजी है। छत्तीसगढ़ में मीडिया विमर्श के हर आयोजन में वे एक अनिवार्य उपस्थिति तो हैं ही। उनके स्नेह-आशीष की पूंजी लिए मैं भोपाल आ गया किंतु रिश्तों में वही तरलता मौजूद है। मेरे समूचे परिवार पर उनकी कृपा और आशीष हमेशा बरसते रहे हैं। मेरे पूज्य दादा जी की स्मृति में होने वाले पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति साहित्यिक पत्रकारिता समारोह में भी वे आए और अपना आर्शीवाद हमें दिया।
अप्रतिम वक्ताः
पं. श्यामलाल जी की सबसे बड़ी पहचान उनकी भाषण-कला है। वे बिना तैयारी के डायरेक्ट दिल से बोलते हैं। हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं का सौंदर्य, उनकी वाणी से मुखरित होता है। उन्हें सुनना एक विलक्षण अनुभव है। हमारे पूज्य गुरूदेव स्वामी शारदानंद जी उन्हें बहुत सम्मान देते हैं और अपने आयोजनों में आग्रह पूर्वक श्यामलाल जी को सुनते हैं। श्यामलाल जी अपनी इस विलक्षण प्रतिभा के चलते पूरे छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय हैं। वे किसी बड़े अखबार के संपादक नहीं रहे, बड़े शासकीय पदों पर नहीं रहे किंतु उन्हें पूरा छत्तीसगढ़ पहचानता है। सम्मान देता है। चाहता है। उनके प्रेम में बंधे लोग उनकी वाणी को सुनने के लिए आतुर रहते हैं। उनका बोलना शायद इसलिए प्रभावकारी है क्योंकि वे वही बोलते हैं जिसे वे जीते हैं। उनकी वाणी और कृति मिलकर संवाद को प्रभावी बना देते हैं।
महा परिवार के मुखियाः
 श्यामलाल जी को एक परिवार तो विरासत में मिला है। एक महापरिवार उन्होंने अपनी सामाजिक सक्रियता से बनाया है। देश भर में उन्हें चाहने और मानने वाले लोग हैं। देश की हर क्षेत्र की विभूतियों से उनके निजी संपर्क हैं। पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया में छत्तीसगढ़ की वे एक बड़ी पहचान हैं। अपने निरंतर लेखन, व्याख्यानों, प्रवासों से उन्होंने हमें रोज समृद्ध किया है। इस अर्थ में वे एक यायावर भी हैं, जिन्हें कहीं जाने से परहेज नहीं रहा। वे एक राष्ट्रवादी चिंतक हैं। किंतु विचारधारा का आग्रह उनके लिए बाड़ नहीं है। वे हर विचार और राजनीतिक दल के कार्यकर्ता के बीच समान रूप से सम्मानित हैं। मध्यप्रदेश के अनेक मुख्यमंत्रियों से उनके निकट संपर्क रहे हैं। मंत्रियों की मित्रता सूची में उनकी अनिर्वाय उपस्थिति है। किंतु खरी-खरी कहने की शैली ने सत्ता के निकट रहते हुए भी उनकी चादर मैली नहीं होने दी। सही मायनों में वे रिश्तों को जीने वाले व्यक्ति हैं, जो किसी भी हालात में अपनों के साथ होते हैं।    
छत्तीसगढ़ी संस्कृति के चितेरेः
  छत्तीसगढ़ उनकी सांसों में बसता है। उनकी वाणी से मुखरित होता है। उनके सपनों में आता है। उनके शब्दों में व्यक्त होता है। वे सच में छत्तीसगढ़ के लोकजीवन के चितेरे और सजग व्याख्याकार हैं। उनकी पुस्तकें, उनकी कविताएं, उनका जीवन, उनके शब्द सब छत्तीसगढ़ में रचे-बसे हैं। आप यूं कह लें उनकी दुनिया ही यह छत्तीसगढ़ है। जशपुर से राजनांदगांव, जगदलपुर से अंबिकापुर की हर छवि उनके लोक को रचती है और उन्हें महामानव बनाती है। अपनी माटी और अपने लोगों से इतना प्रेम उन्हें इस राज्य की अस्मिता और उसकी भावभूमि से जोड़ता है। श्यामलाल जी उन लोगों में हैं जिन्होंने अपनी किशोरावस्था में एक समृद्ध छत्तीसगढ़ का स्वप्न देखा और अपनी आंखों के सामने उसे राज्य बनते हुए और प्रगति के कई सोपान तय करते हुए देखा। आज भी इस माटी की पीड़ा, माटीपुत्रों के दर्द पर वे विहवल हो उठते हैं। जब वे अपनी माटी के दर्द का बखान करते हैं तो उनकी आंखें पनीली हो जाती हैं, गला रूंध जाता है और इस भावलोक में सभी श्रोता शामिल हो जाते हैं। अपनी कविताओं के माध्यम से इसी लोकजीवन की छवियां बार-बार पाठकों को प्रक्षेपित करते हैं। उनका समूचा लेखन इसी लोक मन और लोकजीवन को व्यक्त करता है। उनकी पत्रकारिता भी इसी लोक जीवन से शक्ति पाती है। युगधर्म और नई दुनिया के संवाददाता के रूप में उनकी लंबी सेवाएं आज भी छत्तीसगढ़ की एक बहुत उजली विरासत है।
सच कहने का साहस और सलीकाः   
पं. श्यामलाल जी में सच कहने का साहस और सलीका दोनों मौजूद है। वे कहते हैं तो बात समझ में आती है। कड़ी से कड़ी बात वे व्यंग्य में कह जाते हैं। सत्ता का खौफ उनमें कभी नहीं रहा। इस जमीन पर आने वाले हर नायक ने उनकी बात को ध्यान से सुना और उन्हें सम्मान भी दिया। सत्ता के साथ रहकर भी नीर-क्षीर-विवेक से स्थितियों की व्याख्या उनका गुण है। वे किसी भी हालात में संवाद बंद नहीं करते। व्यंग्य की उनकी शक्ति अप्रतिम है। वे किसी को भी सुना सकते हैं और चुप कर सकते हैं। उनके इस अप्रतिम साहस के मैने कई बार दर्शन किए हैं। उनके साथ होना सच के साथ होना है, साहस के साथ होना है। रिश्तों को बचाकर भी सच कह जाने की कला उन्होंने न जाने कहां से पाई है। इस आयु में भी उनकी वाणी में जो खनक और ताजगी है वह हमें विस्मित करती है। उनकी याददाश्त बिलकुल तरोताजा है। स्मृति के संसार में वे हमें बहुत मोहक अंदाज में ले जाते हैं। उनकी वर्णनकला गजब है। वे कहते हैं तो दृश्य सामने होता है। सत्य को सुंदरता से व्यक्त करना उनसे सीखा जा सकता है। वे अप्रिय सत्य न बोलने की कला जानते हैं।

   आज जबकि वे आयु के शीर्ष पर हैं, उनका समूचा जीवन, लेखन, पत्रकारीय धर्म को निर्वहन करने की कला हमें प्रेरित करते हैं। नई पीढ़ी से उनका संवाद निरंतर है। आयु के इस मोड़ पर भी वे न थके हैं, न रूके हैं। उनकी इस अप्रतिम ऊर्जा, सतत सक्रियता हमारी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का विषय है। वे शतायु हों। मंगलकामनाएं।

गुरुवार, 12 जून 2014

कापी के मास्टर

                             


                          -         संजय द्विवेदी

हिंदी पत्रकारिता में अंग्रेजी पत्रकारिता की तरह कापी संपादन का बहुत रिवाज नहीं है। अपने लेखन और उसकी भाषा के सौंदर्य पर मुग्ध साहित्यकारों के अतिप्रभाव के चलते हिंदी पत्रकारिता का संकोच इस संदर्भ में लंबे समय तक कायम रहा। जनसत्ता और इंडिया टुडे (हिंदी) के दो सुविचारित प्रयोगों को छोड़कर ये बात आज भी कमोबेश कम ही नजर आ रही है। वैसे भी जब आज की हिंदी पत्रकारिता भाषाई अराजकता और हिंग्लिश की दीवानी हो रही है ऐसे समय में हिंदी की प्रांजलता और पठनीयता को स्थापित करने वाले संपादकों को जब भी याद किया जाएगा, जगदीश उपासने उनमें से एक हैं। वे कापी संपादन के मास्टर हैं। भाषा को लेकर उनका अनुराग इसलिए और भी महत्व का हो जाता है कि मूलतः मराठीभाषी होने के नाते भी उन्होंने हिंदी की सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका इंडिया टुडे को स्थापित करने में अपना योगदान दिया। 
   जनसत्ता, युगधर्म, हिंदुस्तान समाचार जैसे अखबारों में पत्रकारिता करने के बाद जब वे इंडिया टुडे पहुंचे तो इस पत्रिका का दावा देश की भाषा में देश की धड़कन बनने का था। समय ने साबित किया कि इसे इस पत्रिका ने सच कर दिखाया। छत्तीसगढ़ के बालोद और रायपुर शहर से अपनी पढ़ाई करते हुए छात्र आंदोलनों और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े जगदीश उपासने ने विधि की परीक्षा में गोल्ड मैडल भी हासिल किया। अखिलभारतीय विद्यार्थी परिषद, मप्र के वे प्रमुख कार्यकर्ताओं में एक थे। आपातकाल के दौरान वे तीन माह फरार रहे तो मीसा बंदी के रूप में 16 महीने की जेल भी काटी ।उनके पिता और माता का छत्तीसगढ़ के सार्वजनिक जीवन में खासा हस्तक्षेप था। मां रजनीताई उपासने 1977 में रायपुर शहर से विधायक भी चुनी गयी। उनके छोटे भाई सच्चिदानंद उपासने आज भी छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। राजनीतिक परिवार और एक खास विचारधारा से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने पत्रकारिता में अपेक्षित संतुलन बनाए रखा। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को एक ऐसी भाषा दी जिसमें हिंदी का वास्तविक सौंदर्य व्यक्त होता है।
  उन्होंने कई पुस्तकों का संपादन किया है जिनमें दस खंडों में प्रकाशित सावरकर समग्र काफी महत्वपूर्ण है। टीवी चैनलों में राजनीतिक परिचर्चाओं का आप एक जरूरी चेहरा बन चुके हैं। गंभीर अध्ययन, यात्राएं, लेखन और व्याख्यान उनके शौक हैं। आज जबकि वे मीडिया में एक लंबी और सार्थक पारी खेल कर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नोयडा परिसर के प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं तो भी वे रायपुर के अपने एक वरिष्ठ संपादक दिगंबर सिंह ठाकुर को याद करते हैं, जिन्होंने पहली बार उनसे एक कापी तीस बार लिखवायी थी। वे प्रभाष जोशी, प्रभु चावला और बबन प्रसाद मिश्र जैसे वरिष्ठों को अपने कैरियर में दिए गए योगदान के लिए याद करते हैं, जिन्होंने हमेशा उन्हें कुछ अलग करने को प्रेरित किया।


गुरुवार, 30 मई 2013

अब क्या होगा छत्तीसगढ़ कांग्रेस का ?






क्या चरणदास महंत को मिलेगी चुनावी अभियान की कमान
-संजय द्विवेदी
   माओवादी आतंकवाद के निशाने पर आई छत्तीसगढ़ कांग्रेस के तीन दिग्गज नेताओं महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल और उदय मुदलियार की मौत ने पार्टी के आत्मविश्वास व संगठन को हिलाकर रख दिया है। एक प्रखर राजनीतिक अभियान पर यह पहली सबसे मर्मांतक चोट है, जिसे कई सालों तक भुलाया नहीं जा सकेगा। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर इन हालात में पार्टी किस नेता पर दांव लगाएगी जो उसे इस संकट से उबारकर आगामी चुनाव में सत्ता तक पहुंचा सके।
आदिवासी क्षेत्रों में कड़ी चुनौतीः बस्तर में महेंद्र कर्मा कांग्रेस के एकमात्र ऐसे नेता थे जिनकी अखिलभारतीय पहचान थी और माओवाद के खिलाफ उनका संघर्ष उन्हें चर्चाओं में बनाए रखता है। सही मायने में पिछले लंबे समय तक कांग्रेस में महेंद्र कर्मा और भारतीय जनता पार्टी के सांसद रहे बलिराम कश्यप ही इस क्षेत्र की राजनीति के दो केंद्र बिंदु बने रहे। यह दुर्भाग्य ही है कि जब बस्तर अपने इतिहास और वर्तमान के सबसे बड़े संकट के सामने है तो ये नेता हमारे बीच नहीं हैं। भाजपा ने पिछले दो विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करते हुए इस इलाके में अपनी पैठ साबित की है किंतु कांग्रेस के लिए संकट काफी गहरा है। एक तो बस्तर की 12 में से 11 विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है साथ ही कांग्रेस के सामने नेतृत्व का भी संकट खड़ा हुआ है।
   बस्तर इलाके में पिछले विधानसभा चुनावों में अकेले कवासी लखमा कोंटा क्षेत्र से चुनाव जीत सके थे। स्वयं महेंद्र कर्मा को दंतेवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से पराजय मिली थी। ऐसे में कांग्रेस के सामने यह संकट है कि वह इस इलाके में अपनी खोयी हुयी हैसियत फिर से कैसे प्राप्त करे। श्री नंदकुमार पटेल के अध्यक्ष बनने के बाद बस्तर और प्रदेश के अन्य आदिवासी इलाकों में कांग्रेस ने अपनी गतिविधियां प्रारंभ कीं। लगातार कार्यकर्ता सम्मेलनों के बहाने इस इलाके में कांग्रेस को झकझोरकर जगाने के काम में पटेल लगे थे। उनकी दुखद हत्या भी ऐसे ही एक राजनीतिक अभियान में हो गयी। अब सवाल यह उठता है कि कांग्रेस जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई करने और उठकर संभलने में उसे कितना वक्त लगेगा। माओवादियों के निशाने पर शायद इसलिए नंदकुमार पटेल थे क्योंकि वे एक ऐसे इलाके में राजनीतिक शून्य को भरने की कोशिश कर रहे थे, जहां नक्सलियों की समानांतर सरकार चल रही थी। जाहिर तौर पर किसी सियासी या सरकारी गतिविधि को चलता देखकर माओवादी विचलित हो उठते हैं। वह चाहे विकास के काम हों, सरकारी तंत्र की सक्रियता हो या राजनीतिक दलों की सक्रियता और उनके आंदोलन। माओवादी नहीं चाहते कि उनके रचे इस स्वर्ग या नरक में कोई बाहरी शक्ति आए और उनके समर्थन आधार पर किसी तरह का फर्क पड़े। ऐसे में कांग्रेस के लिए संकट यह है कि वह इन इलाकों किसके भरोसे वापस जनता का भरोसा पा सकती है।
दिग्गजों के बिनाः हमले में शहीद हुए नेता महेंद्र कर्मा जहां बस्तर इलाके में एक खास पहचान रखते थे, वहीं रायगढ़ क्षेत्र में नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में पिछड़ा वर्ग और अधरिया समाज के बीच नंदकुमार पटेल एक महत्वपूर्ण नाम बन चुके थे। लंबे समय तक मप्र और छत्तीसगढ़ में गृहमंत्री रहने के नाते वे समाज के अन्य वर्गों में भी लोकप्रिय थे। मेहनती और निरंतर दौरा करने वाले नेता के नाते वे कम समय में कार्यकर्ताओं के बीच खासे लोकप्रिय हो चुके थे। यह साधारण नहीं है उनके प्रयत्नों से ही राज्य में पस्त पड़ी कांग्रेस राज्य में सत्ता के स्वप्न देखने लगी थी। इसके साथ ही इस हौलनाक हमले में शहीद हुए उदय मुदलियार कांग्रेस संगठन के एक महत्वपूर्ण नाम थे। वे मुख्यमंत्री रमन सिंह से पिछला चुनाव राजनांदगांव से हार गए थे। यह उनकी हार कम मुख्यमंत्री की जीत ज्यादा थी। इसके साथ ही जीवन और मृत्यु से जूझ रहे छत्तीसगढ़ कांग्रेस के सबसे आदरणीय अनुभवी और बुर्जुग नेता विद्याचरण शुक्ल जो 84 साल की आयु में भी अपनी सक्रियता में नौजवानों से होड़ लेते थे, मेंदांता अस्पताल में भरती हैं। कुल मिलाकर राज्य के इन दिग्गजों की चुनाव अभियान में अनुपस्थिति से कांग्रेस अपने आपको कैसे उबारेगी इसे देखना होगा।
आलाकमान का तुरूप कौनः ले-देकर उम्मीद की किरणें उठती हैं केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री चरणदास महंत पर। वे राज्य से अकेले लोकसभा सदस्य होने के साथ-साथ मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह के निकट भी हैं। राहुल गांधी जब से कांग्रेस में निर्णायक बने हैं वे अपनी एक नई टीम हर राज्य में खडी करने की कोशिशें कर रहे हैं। मप्र में कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष राहुल सिंह को इसी नजरिए से देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ में नेता प्रतिपक्ष के रूप में रवींद्ग चौबे और प्रदेश अध्यक्ष के नाते नंदकुमार पटेल की नियुक्ति एक पीढ़ीगत बदलाव ही थी। जबकि सदन में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी विधायक के नाते मौजूद थे। राजनीतिक क्षेत्रों में यह चर्चा है कि कांग्रेस ताजा संकट से उबरने के लिए चरणदास महंत को राज्य की जिम्मेदारी दे सकती है। चरणदास महंत कांग्रेस के कद्दावर नेता स्व.बिसाहूदास महंत के सुपुत्र हैं। श्री बिसाहूदास महंत को कांग्रेस की राजनीति में खासा सम्मान प्राप्त था। वे समूचे मप्र में पिछड़ा वर्ग के बडे नेताओं में जाने जाते थे। श्री अर्जुन सिंह से उनकी निकटता किसी से छिपी नहीं थी।
   एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवार की विरासत महंत का एक बड़ा संबल है। इसके साथ ही वे मप्र सरकार में मंत्री रहे हैं। विधानसभा और लोकसभा दोनों के चुनावों का अनुभव और लंबा समय उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में बिताया है। यह संयोग भी होगा कि प्रदेश की कमान फिर बिलासपुर संभाग के ही हाथ होगी। नंदकुमार पटेल भी इसी इलाके के खरसिया क्षेत्र से विधायक थे। महंत का कार्यक्षेत्र और चुनाव क्षेत्र कोरबा—जांजगीर भी इसी क्षेत्र में हैं। बावजूद इसके बस्तर और सरगुजा जैसे इलाकों में कांग्रेस को अपना खोया जनाधार पाने की चुनौती शेष रहेगी। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अपने जनाधार के बावजूद कांग्रेस के सभी गुटों और नेताओं में अपनी स्वीकार्यता नहीं बना पा रहे हैं। उनकी भूमिका चुनावों में क्या होती है यह भी एक बड़ा सवाल है। अपने तीन दिग्गजों को खोकर कांग्रेस एक बड़े संकट के सामने है। अब वह अपनी दूसरी पंक्ति के नेताओं रवींद्र चौबे, सत्यनारायण शर्मा, धनेंद्र साहू, भूपेश बधेल के सहारे है, जिसमें चौबे को छोड़कर पिछले विधानसभा चुनावों में तीनों नेता अपनी सीट भी नहीं बचा पाए हैं। देखना है कि कांग्रेस आलाकमान किस नेता पर भरोसा करते हुए राज्य की कमान सौंपता है। क्योंकि आने वाले समय में कांग्रेस को एक ऐसा नायक चाहिए जो राज्य के बिखरे कांग्रेसियों को एक करते हुए नंदकुमार पटेल के अधूरे काम को पूरा कर सके। पार्टी में एकता और आत्मविश्वास फूंक सकने वाला नेतृत्व ही राज्य भाजपा की मजबूत सांगठनिक ताकत व सरकार की शक्ति का मुकाबला कर पाएगा। देखना है कांग्रेस किस राजनेता पर अपना दांव लगाकर उसे छत्तीसगढ़ के मैदान में उतरती है।
(लेखक राजनीतिक विश्वेषक हैं)

रविवार, 26 मई 2013

तर्क और बहानों से आगे बढ़ने का समय



इन शहादतों पर आंसू मत बहाइए,संकल्प लीजिए
-संजय द्विवेदी

  माओवादी आतंकवाद के विकृत स्वरूप पर बौद्धिक विमर्शों का समय अब निकल गया है। आईएसआई, कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठनों, नेपाल के माओवादियों और बंग्लादेश के रास्ते जाली करेंसी, अवैध हथियार लेने वाले इन नरभक्षियों के दिखावटी जनयुद्ध की बकवास पर चोंचें लड़ाने के बजाए इस आतंकी अभियान से निर्णायक जंग लड़ने का समय अब आ गया है। बस्तर के सुकमा जिले की दरभा घाटी में शनिवार की शाम माओवादियों ने जो कुछ किया अब उसके बाद हमारे राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र को समझ लेना चाहिए कि भ्रष्ट राजनीति और निकम्मी नौकरशाही की सीमाएं क्या हैं। लोकतंत्र को बचाने के लिए हमें क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है उसकी यह एक मिसाल है।
   नीचता और मनोविकारी विचारधारा के पोषक माओवादियों ने जिस अंदाज में समर्पण करने के बाद पूर्व सांसद महेंद्र कर्मा और छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल व उनके बेटे की हत्या की, वह उनके वहशीपन को उजागर करने के लिए काफी है। ऐसे लोगों के लिए टीवी चैनलों पर कुछ भगवाधारी और कथित बुद्धिजीवी कैसे तर्क दे रहे हैं कि उन्हें सुनना भी पाप है। नक्सली तो यही चाहते हैं कि सरकारी और सियासी तंत्र उनके इलाकों से दूर रहे और वे मनचाहा जंगल राज चलाते रहें।
नासूर बना माओवादः
  आज जबकि माओवाद एक नासूर के रूप में देश की रगों में फैल रहा है, देश के 17 राज्य और 200 जिले इसकी चपेट में हैं, हमें यह सोचना चाहिए कि आखिर इस जंग में कौन जीतेगा? क्या भारतीय राज्य ने इन नरभक्षियों के आगे समर्पण कर दिया है? अगर कर दिया है तो किस मुंह से हम सुपरपावर होने के नारे दे रहे हैं? यही समय है कि हम इस संकट को इसके सही अर्थ में पहचानें और उसके त्रिस्तरीय समाधान के लिए एक राष्ट्रीय कार्ययोजना बनाएं। इस समस्या से सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक और कानून-व्यवस्था तीनों मोर्चों पर लड़ना होगा। हमें उन लोगों की भी पहचान करनी होगी जो माओवादियों को विचारधारात्मक आधार पर मदद कर रहे हैं। शहरों में उनके टुकड़ों पर पल रहे कुछ बुद्धिजीवी,पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं का बाना ओढ़कर इस देश के लोकतंत्र को कमजोर करने में लगी ताकतों को भी हमें बेनकाब करना होगा।
कैसे जीत रहे हैं भरोसाः
 यह घोर चिंता का विषय है कि माओवादी किस तरह आम आदिवासियों के बीच अपनी घुसपैठ बना चुके हैं। वे चाहते हैं कि विकास की रोशनी उन तक न पहुंचे। सरकारी तंत्र और राजनीतिक कार्यकर्ता उनके इलाकों तक न जाएं। सुकमा में हुआ हमला इसकी एक नजीर है कि माओवादी चाहते हैं कि कोई राजनीतिक पहल उनके इलाकों में न हो। नंदकुमार पटेल शायद इसलिए उनके एक नए शत्रु बनकर उभरे क्योंकि वे बस्तर इलाके में निरंतर प्रवास करते हुए एक राजनीतिक पहलकदमी को जन्म दे रहे थे। महेंद्र कर्मा से उनकी अदावत तो समझी ही जा सकती है। माओवादी अपने प्रभाव वाले इलाकों को सरकारी और सियासी हस्तक्षेप तथा विकास की गतिविधियों से काटकर आदिवासियों के रहनुमा बनना चाहते हैं। यह साधारण नहीं है कि जब कोई ऐसी पहल होती है जिसमें लोग आदिवासियों से संवाद की कोशिशें करते हैं तो माओवादियों में घबराहट फैल जाती है। सलवा जूडूम से लेकर कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के खिलाफ माओवादियों का गुस्सा इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। सलवा जूडूम के कथित अत्याचारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट से लेकर दुनिया भर में हाय-तौबा मचाने वाले मानवाधिकारवादी, उनके वकील और बुद्धिजीवी इस समय कहां हैं। वे माओवादी हिंसा, हिंसा न भवति के सूत्र पर काम करते हैं। वे राज्य की हिंसा पर आसमान उठा लेने वाले माओवादियों की रक्त क्रांति की रूमानियत पर मुग्ध हैं। किंतु अफसोस लड़ने और मारने वालों में उनका कोई परिजन नहीं होता, वरना शायद उनका रोमांटिज्म कुछ टूटता। भय का व्यापार कर रहे माओवादी एक संगठित,सुविचारित, रणनीतिक शैली में काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने लक्ष्य कभी छिपाए नहीं। वे साफ कहते हैं कि वे 2050 में भारतीय राजसत्ता पर बंदूकों के बल पर कब्जा कर लेगें। उनके तौर-तरीके गुरिल्ला वार के हैं और अमानवीय हैं। किंतु कुछ लोग किस आधार पर इन नरभक्षियों के मानवाधिकारों की बात करते हैं इसे समझना कठिन ही नहीं, असंभव है। यह मानना होगा कि सामान्य परिस्थियों में जो मानवाधिकार संरक्षित किए जाते हैं, वही युद्ध की परिस्थितियों में नहीं रह जाते। माओवादी इलाके एक असामान्य परिस्थितियों से घिरे हैं। हम जिनके मानवाधिकारों की बात कर रहे हैं क्या वे मानव रह गए हैं? या हम राक्षसों और नरभक्षियों के लिए मानवाधिकार मांग रहे हैं?
   सच तो यह है कि हम माओवाद को एक राष्ट्रीय समस्या मानकर इसके समाधान के लिए निर्णायक प्रयास प्रारंभ करने के बजाए तू-तू-मैं-मैं में लगे हैं। राजनैतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करने के बजाए ऐसी घटनाओं के भी छुद्र राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिशें करते हैं।
क्या करें राजनीतिक दलः
  राजनीतिक दलों के बारे में देशवासियों की राय अच्छी नहीं है तो इसके लिए वे स्वयं भी जिम्मेदार हैं। इस बात की चर्चाएं आम हैं चुनाव जीतने के अनेक राजनेता माओवादियों की मदद लेते हैं। उनको धन उपलब्ध कराते हैं। अगर यह सच है तो डूब मरने की बात है। किंतु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आजतक किसी राजनीतिक दल ने उनकी आतंकी गतिविधियों का समर्थन नहीं किया। यानि हिंसा के खिलाफ सभी प्रमुख राजनीतिक दल एक हैं। यह एक आधार है जहां हमें साथ आना चाहिए। एक लोकतंत्र में रहते हुए हम किसी तरह के अतिवादी, आतंकवादी स्वरूप को समाज में स्थापित नहीं होने देंगें। इसे एक वैचारिक संघर्ष मानकर हमें आगे बढ़ना होगा। राजनीतिक दलों को इस आरोप को झुठलाना होगा कि वे माओवादियों का राजनैतिक इस्तेमाल करते आए हैं। आंतरिक सुरक्षा के जानकारों के साथ बैठकर राजनीतिक दलों को एक राष्ट्रीय प्लान बनाना होगा। इस योजना पर लंबी और दीर्धकालिक रणनीति बनाकर अमल करना होगा। किंतु अफसोस यह है कि दिल्ली की यूपीए सरकार अपने ही अंतर्विरोधों से घिरी है, उसमें एक दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव भी दिखता है। ऐसे में चुनाव बाद आने वाली किसी भी सरकार के सामने यह संकल्प स्पष्ट होना चाहिए कि माओवाद को समाप्त करने के लिए वह एक निर्णायक जंग छेंड़ें। क्योंकि उस सरकार के पास समय भी होगा और आत्मविश्वास भी। हमें यह मान लेना चाहिए कि यह समस्या राज्यों के बस की नहीं है। केंद्र और राज्यों का समन्वय बनाकर एक साझा रणनीति ही इसका समाधान है।
राजनीति नहीं समझदारी की जरूरतः
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा इस मुद्दे पर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप से बातें बनने के बजाए बिगड़ेंगीं। छत्तीसगढ़ में घटी इस घटना के बाद भी इस तरह की राजनीति शुरू की गयी और माहौल का राजनीतिक लाभ उठाने,वातावरण को बिगाड़ने के जत्न शुरू किए गए। किंतु कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व और राहुल गांधी को इस बात के लिए बधाई देनी चाहिए कि उन्होंने पूरे मामले को बिगड़ने से बचा लिया। यह भी एक बड़ी बात थी श्री राहुल गांधी शनिवार की रात को ही रायपुर पहुंचे उससे कार्यकर्ताओं को उत्तेजित करने के प्रयासों में लगे कुछ लोगों को निराशा ही हाथ लगी। रविवार सुबह रायपुर पहुंचकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और श्रीमती सोनिया गांधी ने जिस तरह विषय को संभाला उसके लिए कांग्रेस नेतृत्व को बधाई दी जानी चाहिए। दरअसल राष्ट्रीय संकट के समय हमारा यही चरित्र ही हमारी ताकत है। अब राजनीतिक दलों को यह तय करना पड़ेगा कि माओवाद के खात्मे के बिना आप इन इलाकों में विकास नहीं कर सकते। यह घटना एक अवसर भी है हम उस दिशा में बढ़ सकें, क्योंकि हर संकट एक अवसर लेकर भी आता है। राजनीतिक दल अगर इसे पहचान कर इस संकट से उठे प्रश्नों का समाधान ढूंढ सकें तो बड़ी बात होगी।

कैसे होगा विकासः
  यह विडंबना ही है कि 11 पंचवर्षीय योजनाएं चलाकर भी हिंदुस्तान के एक बड़े हिस्से की जिंदगी में हम उजाला नहीं ला सके। गरीबी आज भी बनी हुयी है। नई आर्थिक नीतियों ने आदिवासियों और निर्बल लोगों के हिस्से और अँधेरा परोसा है। हमें सोचना होगा कि जनजातियों में इतना आक्रोश क्यों है? क्योंकि यह आक्रोश अकारण भी नहीं है। आज जनजातियों को यह लगता है कि पटवारी से लेकर कलेक्टर तक सब उसके जल, जंगल और जमीन को हड़पने के लिए आमादा हैं। इस भावना को कैसे तिरोहित किया जा सकता है, इस पर विमर्श की जरूरत है। यह तंत्र जिसको भ्रष्टाचार का दीमक लगातार चाट रहा है कैसे यह भरोसा दिला पाएगा कि वह जनजातियों और कमजोर लोगों के साथ है? विकास के प्रकल्पों और उद्योग-धंधों के नाम पर देश में 6 करोड़ लोग विस्थापित हो चुके हैं। इन जमीन से उखड़े हुए लोगों के लिए हमारे पास क्या समाधान है? जाहिर तौर पर व्यवस्था के प्रति नाराजगी काफी गहरी है और ये स्थितियां आतंकी माओवादियों के जड़ें जमाने में मददगार हैं। आज हालात यह हैं कि सरकारी तंत्र चाहे भी तो माओवादी आतंक के चलते इन इलाकों में विकास के काम नहीं कर सकता। इसलिए जरूरी है कि हम इलाकों को पहले माओवादियों से खाली कराएं, उन पर भारतीय राज्य का कब्जा हो और तब विकास व सृजन की बात हो पाएगी। सही मायने में यह समस्या एक विचार से जुड़े लोगों की सोची- समझी साजिश तो है ही, साथ ही कुशासन और भ्रष्टाचार इसे बढाने का काम कर रहे हैं। यह हमारी आंतरिक समस्या है जो हमारे कुशासन, निकम्मेपन, लालचों, रक्त में घुस चुके भ्रष्टाचार के चलते ही गहरी हुयी है। नक्सली भी इसी भ्रष्टाचार के सहारे फल-फूल रहे हैं। वरन क्या कारण है कि उन तक विदेशी हथियार, अत्याधुनिक तकनीक और खान-पान का सामान आसानी से पहुंच रहा है। हमारे ही नेताओं, अधिकारियों, पूंजीपतियों की मदद से वे अपना कथित जनयुद्ध चला रहे हैं। अकेले छत्तीसगढ़ में वे 600 करोड़ की लेवी सालाना वसूल रहे हैं और इस पैसे से भारतीय नागरिकों की ही बलि ले रहे हैं। यह कहने में संकोच नहीं है कि माओवादी लेवी वसूली, अपहरण, महिलाओं का शोषण, आदिवासियों के विकास के विरोधी, भारतीय राज्य के शत्रु, अवैध हथियारों के तस्कर और अत्याचार का दूसरा नाम हैं। ऐसे लोगों के प्रति सहानुभूति के बोल रहे लोग क्या देश के शत्रु नहीं हैं? जिनकी इस लोकतंत्र में सांसें घुट रही हैं वे क्या कथित माओवादी राज में चैन ले सकेंगें? सच तो यह है कि माओवादी राज किसी भी बुरे से बुरे लोकतंत्र से बुरा होगा। लाखों चीनियों की हत्याओं पर खड़ा माओवाद, स्टालिनवाद का चेहरा तो अमानवीय नहीं, वीभत्स भी है। चीन ही नहीं पूरी दुनिया इस विचार से पल्ला झाड़ चुकी है। ऐसे हिंसक और अमानवीय विचारों के लिए भारतीय जमीन पर कोई जगह नहीं है, यह माओवादी समर्थकों को मान लेना चाहिए। नई दुनिया में लोकतंत्र सबसे लोकप्रिय विचार है और इसके दोषों को दूर करते हुए हमें एक नया भारत बनाने की ओर बढ़ना होगा।
आतंकवाद और माओवाद को अलग करेः
  यह कहा जा रहा है कि आतंकवाद और माओवाद दोनों एक हैं। इसे अलग करके देखने की जरूरत है। वैश्विक आतंकवाद के मुहाने पर तो हम हैं किंतु माओवाद एक आंतरिक समस्या है, जिससे जरा सी सावधानी से निपटा जा सकता है। माओवाद से आप सुशासन और भ्रष्टाचार पर थोड़ी लगाम लगाकर निपट सकते हैं किंतु वैश्विक आतंकवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं और उनके इरादे अलग हैं। हमें यह मानना ही होगा अब समय आ गया है कि हम माओवादी के खूनी पंजे से अलग नहीं हुए तो यह हमारे लोकतंत्र को खा जाएगा। रेड कारीडोर बनाकर खून की होली खेल रहे माओवादियों के खिलाफ हमने यह निर्णायक जंग आज प्रारंभ न की तो कल बहुत देर हो जाएगी।

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

अब सिर्फ गेंदा फूल भर नहीं है रायपुर


राज्योत्सव के प्रसंग पर विशेष

-संजय द्विवेदी

अभिषेक बच्चन की पिछले दिनों आई फिल्म दिल्ली-6 के गाने-सास गारी देवे, देवर जी समझा लेवे, ससुराल गेंदा फूल.... में रायपुर का भी जिक्र आता है। इस गाने के बोल छत्तीसगढ़ी भाषा में हैं, जिसे पहली बार रायपुर की ही प्रसिद्ध जोशी बहनों ने गाया है। हालांकि अब जोशी बहनों को दुख है कि इस गीत के लिए फिल्मकार ने छत्तीसगढ़ को क्रेडिट नहीं दिया है। वे दर्द से कहती हैं हमें रूपया नहीं चाहिए बस इतना तो हो कि हमारे शहर या राज्य छत्तीसगढ़ का उल्लेख हो जाए। जोशी बहनें ठीक ही कह रहीं हैं, लेकिन रायपुर अब किसी सिनेमा के गाने में नाम आने से कहीं अधिक बड़ा है। यह भारतीय गणराज्य के तीन सबसे नए राज्यों में एक की राजधानी भी बन चुका है। जाहिर है, उसकी अपनी साख कायम हो चुकी है। राजधानी ने उसे मंत्रालय का शक्ति केंद्र दिया है, जहां छत्तीसगढ़ के दो करोड़, दस लाख लोगों के भाग्य का फैसला करने वाली सरकार बैठती है। अब इस शहर को नई राजधानी का भी इंतजार है, जिससे यह शहर अचानक बढ़ आयी भीड़ का इलाज पा सके। कोई शहर जब राजधानी बनता है तो वह किस तरह खुद को रूपांतरित करता है यह देखना बहुत रोचक है।

राजधानी बनता एक शहरः रायपुर शहर का छत्तीसगढ़ प्रदेश की राजधानी बन जाना एक ऐसी घटना है जिसने एक बड़े गांव को महानगर बनने का रास्ता दे दिया है। तेलीबांधा से आगे महासमुंद रोड की ओर बढ़िए तो आपको माल नज़र आएगा जहां से रायपुर पहली बार मॉल संस्कृति से परिचित होता दिखता है। आईनाक्स में सिनेमा देखने का एक सुख है जो रायपुर के सिनेमाघरों से अलग है। अब इसी रोड पर एक और मॉल बन गया है तो पंडरी में भी एक और मॉल की धूम है। एडलैब्स का सिनेमाघर भी समता कालोनी में आ गया है। लालगंगा शापिंग मॉल से लेकर बिग बाजार, सालासर ही नहीं हर तरह के ब्रांड के शोरूम यहां की फिजां में रंग भर रहे हैं। लगभग हर बैंक ने अपनी शाखाएं राजधानी बनने के बाद यहां खोली हैं जिनमें तमाम ऐसे भी बैंक हैं जो सामान्य शहरों में नजर नहीं आते। रायपुर वैसे भी एक व्यापारिक शहर रहा है। पड़ोसी राज्यों मप्र, उड़ीसा, महाराष्ट्र से लगे जिले, इसके व्यापारिक वृत को विस्तार देते नज़र आते हैं। भिलाई के पास होने के नाते रायपुर ने औद्योगिक क्षेत्र में नई उड़ान ली है। बिलासपुर से आते समय आप देख सकते हैं किस तरह सड़क के दोनों किनारों पर धुंआ उगलती चिमनियां दिखती हैं। ये तमाम स्पंज आयरन और अन्यान्य उद्योगों के चलते आसमान तो काला हो ही रही है, किसानों की भी शिकायत है कि यह प्रदूषण अब उनकी धान की फसल को काला कर रहा है। रायपुर शहर वैसे भी धूल की समस्या से ग्रस्त है और तीन साल पहले उसे सर्वाधिक प्रदूषित शहर का दर्जा भी मिल चुका है।


राजपथ पर चलने के सुखः जीई रोड का मुख्यमार्ग अब राजपथ में बदल गया है जिसे सरकार ने गौरव पथ का नाम दिया है। चौड़ी होती सड़कें, सड़कों के किनारे आदिवासी शिल्प और संस्कृति से जुड़ते दिखने की सरकारी कोशिशें साफ नजर आती हैं। कलेक्ट्रेट से रेलवे स्टेशन जाने वाली सड़क भी अब काफी चौड़ी सी लगती है। इसी सड़क पर वह बहुचर्चित जेल भी है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ता डा विनायक सेन लंबे समय तक कैद रहे । उन पर कथित तौर पर नक्सलियों से रिश्ते रखने का आरोप है। यहां कलेक्टर रहे आरपी मंडल ने जब शहर का कायाकल्प करना शुरू किया तो पहले कलेक्ट्रेट की बुढ़िया बिल्डिंग को चमकाया और उससे लगे पार्क को भी। यह ऐसा कि बाहर से तो कलेक्ट्रेट का परिसर और प्रांगण मंत्रालय से बेहतर नजर आता है। तोड़फोड़ और विस्तार का क्रम लगातार जारी है। मोतीबाग जहां प्रेस क्लब है के आसपास की दुकानें अब नजर नहीं आतीं। सब कुछ तोड़ू दस्ते की भेंट चढ़ चुका है। शहर के मुख्य चौराहे अब भी भीड़ की भांय-भांय से आक्रांत हैं। ट्रैफिक की व्यवस्था आम हिदुस्तानी शहरों की तरह ही बेहाल है। ऐसे में एक शहर में कई शहरों के सांस लेने जैसा ही प्रतीत होता है।

जिन गलियों में धड़कता है रायपुरः रायपुर दरअसल रिक्शों का भी शहर है, यहां उड़ीसा से काम की तलाश आए ज्यादतर लोग इसी पर अपनी जिंदगी बसर करते हैं। अब रिक्शा तो नहीं लेकिन अन्य छोटे-मोटे कामकाज की तलाश में बिहार, उत्तरप्रदेश के लोग भी रायपुर में पांव पसारने लगे हैं, जिन्हें गली मोहल्लों में सब्जी-भाजी बेचते पहचाना जा सकता है। कहने को तो यहां दो साल से लम्बी काया वाली सिटी बस भी चलने लगी है किंतु उसे चलते हुए कहना ठीक नहीं, अपितु रेंगती है। रायपुर की सड़कों पर प्रायः काम के सुबह-शाम स्पीड आठ किलोमीटर प्रति घंटा भी हो जाती है। रामसागरपारा, सदर बाजार, पुरानी बस्ती, ब्राम्हणपारा, मौदहापारा जैसी बस्तियां दरअसल पुराने रायपुर की घड़कनों की असल गवाह हैं। इनकी गलियों में ही असल रायपुर धड़कता है। रायपुर को महसूस करने के लिए दरअसल आपको इन्हीं तंग गलियों से गुजरना होगा। राज्य के पारंपरिक व्यंजन, तीज-त्योहार भी इन्हीं गलियों में दिखते हैं। अब राजभाषा का दर्जा पा चुकी छत्तीसगढ़ी की महक और खनक भी रायपुर के पुराने मुहल्लों में सुनाई देती है। छ्त्तीसगढ़ी भाषा का पहला अखबार निकालने वाले जागेश्वर प्रसाद राहत महसूस कर सकते हैं। उनका अखबार बंद भले हो गया पर भाषा पर सरकारी मोहर लग चुकी है। जागेश्वर की अपनी एक पार्टी भी जिसका नाम है छत्तीसगढ विकास पार्टी है।

इतिहास को समेटे एक शहरः रायपुर के बूढ़ापारा में मप्र के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल का आवास आज भी एक इतिहास को समेटे हुए दिखता है। इस परिवार से निकले पंडित शुक्ल के बेटों पंडित श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल के उल्लेख के बिना रायपुर ही नहीं संयुक्त मध्यप्रदेश का इतिहास भी अधूरा रह जाएगा। अब इस परिवार की तीसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में अमितेश शुक्ल राजिम से विधायक के रूप में दुबारा चुने गए हैं। वे छत्तीसगढ़ की पहली सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। रायपुर की राजनीतिक चेतना को यहां के दिग्गज नेताओं ने लगातार प्रखर बनाया है। शुक्ल परिवार के अलावा संत पवन दीवान का एक चेहरा ऐसा है जिसने लगातार छत्तीसगढ़ और उसकी अस्मिता से जुड़े सवालों को उठाया है। हालांकि बार- बार पार्टियां बदलकर दीवान अपनी राजनैतिक आभा तो खो चुके हैं किंतु एक संत के नाते उनके सादगीपूर्ण जीवन से लोगों में आज भी उनके प्रति आस्था शेष है।

भाजपा का रायपुरः आज के रायपुर में भाजपा की एक खास जगह बन चुकी है जिसकी खास वजह रमेश बैस, बृजमोहन अग्रवाल जैसे नई पीढ़ी के नेताओं को माना जा सकता है, जिन्होंने अपने दल के लिए निरंतर काम करते हुए यहां के समाज जीवन में एक खास जगह बना ली है। रायपुर से सांसद रमेश बैस एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने विद्याचरण और श्यामाचरण शुक्ल दोनों को चुनाव मैदान में पराजित किया। रायपुर से दो बार सांसद रहे केयूर भूषण भी आज की राजनीति के एक उदाहरण हो सकते हैं जो आज भी अपनी आयु के सात दशक पूरे करने के बावजूद साइकिल से ही चलते हैं। रायपुर जैसे व्यापारिक शहर का दो बार सांसद रहे इस गांधीवादी नायक की सादगी प्रेरणा का विषय है। आज जबकि रायपुर राजधानी बन चुका है सो राजपुत्रों से इसका दैनिक वास्ता है बावजूद इसके कि चंद्रशेखर साहू, सत्यनारायण शर्मा, धनेंद्र साहू राजेश मूणत, राजकमल सिंहानिया जैसे नेता रायपुर ही नहीं पूरे प्रदेश में अपना प्रभाव रखते हैं। मूणत और साहू तो इस समय रमन मंत्रिमंडल के प्रभावी मंत्री भी हैं।

साहित्य में भी खास जगहः साहित्य के क्षेत्र में रायपुर आज भी खास लेखकों की मौजूदगी से गौरवांवित है। नौकर की कमीज जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास के लेखक विनोद कुमार शुक्ल इसी शहर के शैलेन्द्र नगर मुहल्ले में रहते हुए आज भी रचनाशील हैं। गजानन माधव मुक्तिबोध की यादों के साथ उनके बेटे इसी शहर में रहते हैं। परितोष चक्रवर्ती, जया जादवानी, गिरीश पंकज, जयप्रकाश मानस, आनंद हर्षुल, कनक तिवारी, पुष्पा तिवारी, डा चित्तरंजन कर जैसे तमाम लेखक आज भी यहां रचनाओं का सृजन कर हैं। जयप्रकाश मानस का अतिरिक्त उल्लेख यहां इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि उन्होंने एक नई विधा में सार्थक काम करके अपनी जगह बनाई है। वे सृजनगाथा डाट काम नाम से एक मासिक साहित्यिक वेबसाइट चला रहे हैं और राज्य में वेब पत्रकारिता की शुरुआत भी इसी से मानी जाती है। इसके अलावा उन्होंने राज्य के कई लेखकों की कृतियों को आनलाइन करने का भी महत्वपूर्ण काम किया। सुधीर शर्मा ने वैभव प्रकाशन नाम से राज्य के रचनाकारों की लगभग चार सौ किताबें प्रकाशित करने का काम किया है जिससे स्थानीय रचनाकार सामने आ रहे हैं। यहां ऐसे लेखक भी हैं जो क्षेत्रीय स्तर पर भी सक्रिय हैं और जो कल के साहित्य जगत में एक बड़ा हस्तक्षेप कर सकते हैं। रायपुर राजधानी होने के पहले ही इस समूचे छ्तीसगढ़ क्षेत्र का एक केंद्र रहा है सो यहां साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता और कला के क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप होते रहे हैं। यह शहर राजनारायण मिश्र, विष्णु सिंन्हा, रमेश नैयर, बसंतकुमार तिवारी, गोविंदलाल वोरा, बबन प्रसाद मिश्र, ललित सुरजन, सुनील कुमार जैसे पत्रकारों की उपस्थिति से भी जनमुद्दों पर संवाद की गुंजाइश तलाश ही लेता है।


हाशिए पर संस्कृतिः बालीबुड की तर्ज पर छालीवुड का सिनेमा भी अपनी जगह बनाने की जुगत में है। हालांकि भोजपुरी फिल्मों जैसा इस सिनेमा का बाजार तो नहीं दिखता किंतु एकमात्र सफल फिल्म मोर छइयां-भुइयां ने एक उम्मीद तो जगाई ही थी। हां, एलबम का कारोबार जरूर चरम पर है, जिससे छत्तीसगढ़ की संस्कृति तो नहीं दिखती पर वे बालीवुड की भोंड़ी नकल जरूर साबित हो रहे हैं। सांस्कृतिक क्षेत्र में मुक्तिबोध नाट्य समारोह ने अपनी पहचान बनाई है। बावजूद इसके, रायपुर आज भी छ्त्तीसगढ़ की साझी सांस्कृतिक या सामाजिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। इसे इस रूप से देखा जा सकता है कि राज्योत्सव के अलावा कोई बड़ा सांस्कृतिक हस्तक्षेप पूरे साल भर सुनाई नहीं पड़ता, उसमें भी मेले का माहौल ज्यादा रहता है, जबकि रायगढ़ के चक्रधर समारोह ने अपनी एक राष्ट्रीय पहचान कायम कर ली है। रायगढ़ घराने की सांस्कृतिक भावभूमि और राजनांदगांव जिले में पड़ने वाले खैरागढ़ में संगीत विश्वविद्यालय की मौजूदगी के बावजूद राजधानी में उसके प्रभाव नहीं दिखते। राज्य के तमाम कलाकार जिनकी देश-दुनिया में एक बड़ी जगह है, राजपुत्रों के दिलों में जगह नहीं बना पाते। कई पद्मपुस्कार प्राप्त कलाकार आज भी समाज के ध्यानार्षण की प्रतीक्षा में हैं। छत्तीसगढ़ के मायने सिर्फ रायपुर नहीं, उसे बृहत्तर परिपेक्ष्य में देखना होगा, क्योंकि राज्य के तमाम शिल्पकार, कलाकार, संस्कृति कर्मी रायपुर में ही नहीं रहते। इस मामले में छत्तीसगढ़ की सरकार मप्र के अनुभवों से प्रेरणा ले सकती है और छ्त्तीसगढ़ में अपने कलाकारों के मान- सम्मान की नई परंपराएं गढ़ सकती है। रायपुर के ही शेखर सेन ने अपनी विवेकानंद और कबीर की नाटिकाओं के माध्यम से एक खास जगह बना ली है तो भारती बंधु कबीर गायन में एक नामवर हस्ती हैं। ऐसे में राष्ट्रीय फलक पर रायपुर का हस्तक्षेप धीरे-धीरे मुखर, प्रखर और प्रभावी हो रहा है।

( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)