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गुरुवार, 19 मई 2016

अपनी भूमिका पर पुर्नविचार करें राष्ट्रीय दल

क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव से अखिलभारतीयता की भावना प्रभावित होगी
-संजय द्विवेदी

  अब जबकि आधा से ज्यादा भारत क्षेत्रीय दलों के हाथ में आ चुका है तो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे नए सिरे से अपनी भूमिका का विचार करें। भारत की सबसे पुरानी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, दोनों प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियां और भारतीय जनता पार्टी आम तौर पर पूरे भारत में कम या ज्यादा प्रभाव रखती हैं। उनकी विचारधारा उन्हें अखिलभारतीय बनाती है भले ही भौगोलिक दृष्टि से वे कहीं उपस्थित हों, या न हों। आज जबकि भारतीय जनता पार्टी ने असम के बहाने पूर्वोत्तर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा ली है और अरूणाचल की सत्ता में भागीदार बन चुकी है, तब भी तमिलनाडु, पांडिचेरी जैसे राज्य में उसका खाता भी न खुलना चिंता की बात है।
    केंद्र की सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ आई भारतीय जनता पार्टी असम में अपनी सफलता के साथ खुश हो सकती है, किंतु उसे यह विचार करना ही चाहिए कि आखिर क्षेत्रीय दलों का ऐसा क्या जादू है कि वे जहां हैं, वहां किसी राष्ट्रीय दल को महत्व नहीं मिल रहा है। भाजपा ने जिन प्रदेशों में सत्ता पाई है, कमोबेश वहां पर कांग्रेस की सरकारें रही हैं। क्षेत्रीय दलों की अपील, उनके स्थानीय सरोकारों, नेतृत्व का तोड़ अभी राष्ट्रीय दलों को खोजना है। भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, झारखंड में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई है। इनमें महाराष्ट्र और झारखंड को छोड़कर कहीं क्षेत्रीय दलों की प्रभावी मौजूदगी नहीं है। क्षेत्रीय क्षत्रपों की स्वीकृति और उनके जनाधार में सेंध लगा पाने में राष्ट्रीय राजनीतिक दल विफल रहे हैं। जयललिता, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू, नीतिश कुमार, अखिलेश और मुलायम सिंह यादव, महबूबा मुफ्ती के जनाधार को सेंध लगा पाने और चुनौती देने में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को पसीना आ रहा है। राष्ट्रीय दल या तो किसी क्षेत्रीय दल की बी टीम बनकर रहें या उस राज्य में खुद को समाप्त कर लें।  जैसे बिहार और पश्चिम बंगाल में राजनीतिक गठबंधनों में शामिल होने का लाभ कांग्रेस को मिला, वरना वह दोनों राज्यों से साफ हो सकती थी। इसी तरह भाजपा को भी पंजाब, कश्मीर और अरूणाचल में क्षेत्रीय दलों के साथ सरकार में शामिल होकर अपनी मौजूदगी जताने का अवसर मिला है। भाजपा ने तेजी से कांग्रेस की छोड़ी जमीन पर कब्जा जमाया है, किंतु क्षेत्रीय दलों के लिए वह कोई बड़ी चुनौती नहीं बन पा रही है। वामपंथी दल तो अब केरल, पं. बंगाल और त्रिपुरा तीन राज्यों तक सिमट कर रह गए हैं।
   क्षेत्रीय दलों का बढ़ता असर इस बात से दिखता है कि कश्मीर से लेकर नीचे तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों के ताकतवर मुख्यमंत्री नजर आते हैं। इन मुख्यमंत्रियों के प्रति उनके राज्य की जनता का सीधा जुड़ाव, स्थानीय सवालों पर इनकी संबद्धता, त्वरित फैसले और सुशासन की भावना ने उन्हें ताकतवर बनाया है। चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता इसी श्रेणी में आते हैं। ममता बनर्जी का अकेले दम पर दो बार सत्ता में वापस होना, यही कहानी बयान करता है। उड़िया में संवाद करने में आज भी संकोची नवीन पटनायक जैसे नेता राष्ट्रीय दलों के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
   ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्षेत्रीय दलों का बढ़ता असर क्या भारतीय राजनीति को प्रभावित करेगा और राष्ट्रीय दलों की हैसियत को कम करेगा। अथवा ताकतवर मुख्यमंत्रियों का यह कुनबा आगामी लोकसभा चुनाव में कोई चुनौती बन सकता है। शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने तो कहा ही है कि क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय राजनीति में अपनी बड़ी भूमिका के लिए तैयार हों। कल्पना करें कि नीतिश कुमार, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, जयललिता, चंद्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, अरविंद केजरीवाल जैसे नेता अगर किसी तीसरे मोर्चे या वैकल्पिक मोर्चे की ओर बढ़ते हैं, तो उसके क्या परिणाम आ सकते हैं। इसमें भाजपा का लाभ सिर्फ यह है कि वह केंद्र की सत्ता में है और राज्यों को केंद्र से मदद की हमेशा दरकार रहती है। ऐसे में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर भाजपा इन दलों को एकजुट होने देने में बाधक बन सकती है या फिर उन्हें एडीए के कुनबे में जोड़ते हुए केंद्र सरकार के साथ जोड़े रख सकती है। बहुत संभावना है कि आने वाले आम चुनावों तक हम ऐसा कुछ होता देख पाएं। इसके साथ ही यह भी संभावित है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने सलाहकारों से यह कहें कि वे एनडीए का कुनबा बढ़ाने पर जोर दें। किंतु यह सारा कुछ संभव होगा पंजाब और उत्तर प्रदेश के परिणामों से।
   पंजाब और उत्तर प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों का बहुत कुछ दांव पर नहीं है, किंतु इन दो राज्यों के चुनाव परिणाम ही भावी राजनीति की दिशा तय करेगें और 2019 के लोकसभा चुनाव की पूर्व पीठिका भी तैयार करेगें। नीतिश कुमार के संघमुक्त भारत के नारे की अंतिम परिणति भी उप्र और पंजाब के चुनाव के परिणामों के बाद पता चलेगी। देखना यह भी होगा कि इन दो राज्यों में भाजपा अपना वजूद किस तरह बनाती और बचाती है। उप्र के लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता के बाद वहां हुए सभी चुनावों और उपचुनावों में भाजपा को कोई बहुत बड़ी सफलता नहीं मिली है। उप्र का मैदान आज भी सपा और बसपा के बीच बंटा हुआ दिखता है। ऐसे में असम की जीत से उर्जा लेकर भाजपा संगठन एक बार फिर उप्र फतह के ख्वाब में है। इसके साथ पंजाब में अकाली दल-भाजपा गठबंधन के सामने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की चुनौती भी है। इस त्रिकोणीय संघर्ष में किसे सफलता होगी कहा नहीं जा सकता। कुल मिलाकर आने वाला समय राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ी चुनौती है। खासकर कांग्रेस के लिए यह समय गहरे संकट का है, जिसे स्थानीय नेतृत्व के बजाए आज भी गांधी परिवार पर ज्यादा भरोसा है।

   कांग्रेस जैसे बड़े राष्ट्रीय दल की सिकुड़न और कमजोरी हमारे लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है। क्योंकि राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का क्षरण दरअसल राजनीति में अखिलभारतीयता के प्रवाह को भी बाधित करता है। इसके चलते क्षेत्रीय राजनीति के स्थानीय सवाल राष्ट्रीय मुद्दों से ज्यादा प्रभावी हो जाते हैं। केंद्रीय सत्ता पर क्षेत्रीय दलों का अन्यान्न कारणों से दबाव बढ़ जाता है और फैसले लेने में मुश्किलें आती हैं। सब कुछ के बाद भी क्षेत्रीय राजनीतिक दल अपने स्थानीय नजरिए से उपर नहीं उठ पाते और ऐसे में राष्ट्रीय मुद्दों से समझौता भी करना पड़ता है। ध्यान दें, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 23 दलों की सम्मिलित उपस्थिति के नाते उसे कितने तरह के दबावों से जूझना पड़ा था और अच्छी नीयत के बाद भी उस सरकार का समग्र प्रभाव नकारात्मक ही रहा। यह अच्छी बात है कि वर्तमान सरकार को केंद्र में अपने दम पर बहुमत हासिल है किंतु आने वाले समय में यह स्थितियां बनी रहें, यह आवश्यक नहीं है। ऐसे में सभी राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों की राजनीति से सीखना होगा। स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा करते हुए, स्थानीय सवालों-मुद्दों और जनभावना के साथ स्वयं को रूपांतरित करना होगा। बिहार और दिल्ली की हार के बाद भाजपा ने असम में यह बात समझी और कर दिखाई है। यह समझ और स्थानीय सरोकार ही राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को खोयी हुयी जमीन दिला सकते हैं। इससे लोकतंत्र और राजनीति में अखिलभारतीयता की सोच दोनों को शक्ति मिलेगी।

सोमवार, 18 जनवरी 2016

सांप्रदायिकता से कौन लड़ना चाहता है?

        क्योंकि उनके पास तिरंगे से ज्यादा बड़े और ज्यादा गहरे रंगों वाले झंडे हैं
-संजय द्विवेदी


     देश भर के तमाम हिस्सों से सांप्रदायिक उफान, गुस्सा और हिंसक घटनाएं सुनने में आ रही हैं। वह भी उस समय जब हम अपनी सुरक्षा चुनौतियों से गंभीर रूप से जूझ रहे हैं। एक ओर पठानकोट के एयरबेस पर हुए हमले के चलते अभी देश विश्वमंच पर पाकिस्तान को घेरने की कोशिशों में हैं, और उसे अवसर देने की रणनीति पर काम कर रहा है। दूसरी ओर आईएस की वैश्विक चुनौती और उसकी इंटरनेट के माध्यम से विभिन्न देशों की युवा शक्ति को फांसने और अपने साथ लेने की कवायद,  जिसकी चिंता हमें भी है। मालदा से लेकर पूर्णिया तक यह गुस्सा दिखता है, और चिंता में डालता है। पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों के चलते इस गुस्से के गहराने की उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं।
कौन किसे दे रहा है ताकतः 
हम देखें तो सांप्रदायिकता और राजनीति के रिश्ते आपस में इस तरह जुड़े हैं, जिसमें यह कहना कठिन है कि कौन किससे ताकत पा रहा है? मालदा की घटना में तस्कर हों या नकली नोटों के माफिया। सच तो यह है कि राजनीति उन्हें इस्तेमाल करने के कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहती। सवाल सिर्फ हिंदू-मुसलमान का है या राजनीति का भी है। दंगे जब होते हैं या कराए जाते हैं तब इसका भी विश्लेषण होना चाहिए कि इसके पीछे कारण क्या हैं। पता चलेगा कि पंथ के बजाए कोई और मामला है, तथा हिंदू-मुसलमान का इस्तेमाल कर लिया जाता है। यह मानना बहुत कठिन है कि कोई भी समाज, जाति, परिवार या वर्ग अपने परिवार के साथ सुख-शांति से नहीं रहना चाहता। हिंसा किसे प्यारी है? आतंकवाद को कौन पालना चाहता है? लेकिन हिंसा होती है, और आतंकवाद बढ़ता है। यानि यह सामान्य मनुष्यों का काम नहीं है। कोई भी स्वस्थ मनुष्य न तो हिंसा करेगा, न ही वह किसी आतंकी कार्रवाई का समर्थन करेगा। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वे साधारण लोग नहीं हैं। वे दिमागी तौर पर अस्वस्थ, मनोविकारी, कुंठित और अपराधी मानसिकता के लोग हैं । लेकिन आश्चर्य यह कि शेष समाज का समर्थन पाने में वे सफल हो जाते हैं। कोई समय से, कोई पैसे से, कोई हथियारों से उन्हें समर्थन देता है। आखिर ये समर्थन देने वाले लोग कौन हैं? आप वैश्विक स्तर से स्थानीय हिंसक समूहों को देखें तो उन्हें मदद करने वाले हाथ साधारण नहीं है। आईएस के मनुष्यता-विरोधी अभियान को तमाम देशों से मदद के प्रमाण हैं। भारत में माओवादी आतंक को भी तमाम ताकतों का समर्थन मिलता है। इसी तरह सांप्रदायिकता के विषधरों को भी समाज के तमाम तबकों से अलग-अलग रूपों में समर्थन मिलता है।
देश के कानून पर कीजिए भरोसाः
 क्या कारण है हिंसक घटनाओं के पीछे हमारी राजनीतिक पार्टियों के तार जुड़े नजर आते हैं? मालदा की घटना की जैसी व्याख्या मीडिया में हो रही है, उसे समझने की जरूरत है। क्या पंथ पर हमला ही उन्हें उत्तेजित कर सका या उसके पीछे कहानी कुछ और थी। यह भी गजब है कि जिस मुस्लिम के नेता अपने समाज की गरीबी, अशिक्षा, बदहाली और पिछड़ेपन पर खामोश रहते हैं वे एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ सड़क पर एक माह बाद उतरते हैं, जब उसे जेल में डालकर उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की जा चुकी है। यह बात बताती है कि हम इस देश के कानून पर भी भरोसा करने को तैयार नहीं है। भारत के लोकतांत्रिक- जनतांत्रिक चरित्र पर विश्वास को तैयार नहीं।  किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई इस देश के कानून के हिसाब से होगी। फांसी मांगने से फांसी नहीं मिल सकती। यह भी गजब है कि आतंकवादियों को फांसी देने का विरोध करने वाली शक्तियां, किसी को एक बयान के आधार पर फांसी पर लटकाने की मांग करती हैं।
वोट बैंक की राजनीति से समस्याः
     भारत का संविधान और कानून सबके लिए बराबर है। संविधान के दायरे में आकर अपने अधिकारों की मांग करना तो ठीक है। किंतु थाना जलाना, गोलियां चलाना और दहशत पैदा करना कहां का तरीका है। समूची दुनिया में मुस्लिम समाज के सामने ये सवाल खड़े हैं। अपनी प्रतिक्रिया में संयम न रखना आज मुस्लिम समाज के समाज के सामने एक चुनौती है। अपने पंथ की ऐसी आक्रामक छवि बनता देखकर भी उसके नेताओं में चिंता नहीं दिखती। राजनीतिक दल अपने वोट बैंक के लिए उनका इस्तेमाल करते आए हैं करते रहेंगें। किंतु यह भी सोचना होगा कि आप कब तक इस्तेमाल होते रहेंगे। नकली नोटों के कारोबारी, हथियारों के सप्लायर, अवैध कारोबारों में लिप्त लोग अगर समाज का इस्तेमाल कर अपनी ताकत को बचाना चाहते हैं तो समाज को भी होशियार होना चाहिए। राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों, समाज के अगुआ लोगों को इस तरह की प्रवृत्ति के खिलाफ समाज को जागृत करना होगा। लोगों की भावनाओं से खेलने का काम बहुत हो चुका। अब लोगों में वैज्ञानिक सोच जगाने और मानवता को सबसे बड़ा दर्जा देने का विचार आगे बढ़ाना होगा। गलत करने वाले को सजा देने वाले हम कौन हैं? कानून को हाथ में लेकर, तोड़फोड़ और आगजनी कर क्या हम अपने पंथ, उसकी पवित्र शिक्षाओं का आदर कर रहे हैं?
युवाओं को बचाइएः
     हमारे युवा गुमराह होकर आतंकवाद की राह पकड़कर युवा अवस्था में ही मौत की भेंट चढ़ रहे हैं, इससे स्पष्ट है कि हमारे समाज के अगुआ, धर्मगुरू, शिक्षक, बुद्धिजीवी सब हार रहे हैं। भारत हार रहा है। एक लोकतंत्र में होते हुए भी अगर हमारी सांसें घुट रही हैं, हम विचारों को व्यक्त करने के बजाए दहशत पैदा कर, थाने जलाकर, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाकर अपनी कुठाएं निकाल रहे हैं, तो हमें सोचना होगा कि आखिर हमने कैसा भारत बनाया है। भारत जैसे देश में जहां सब पंथों, समाजों और वर्गों को सम्मान और आदर के साथ रहने के समान अवसर हैं, वहां हिंसा की राह पकड़ रहा कोई भी समूह भारत-प्रेमी नहीं कहा जा सकता। अपने रोष और गुस्से को निकालने के लिए तमाम संवैधानिक और सत्याग्रही तरीके हमारी परंपरा में हैं, हम उनका अनुसरण करें और न्याय प्राप्त करें। एक न्यायपूर्ण समाज बनाने के लिए जनता का जाग्रत होना भी जरूरी है।

    समाज को बांटकर शक्ति नहीं पायी जा सकती। सब साथ मिलकर विकास करें। सपनों में रंग भरें तभी भारत बचेगा और तभी हमारी शान दुनिया में बनेगी। लेकिन सवाल यह उठता है कि राजनीति में अगर पंथिक राजनीति हस्तक्षेप करेगी, सांप्रदायिक भावनाएं वोट-बैंक के निर्माण में मददगार होंगी। हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ हमारा दृष्टिकोण चयनित होगा, एक हिंसा पर खामोशी, दूसरी हिंसा पर बवेला होगा, तब सांप्रदायिकता से कैसे लड़ेगें। यह सवाल आज हम सबके सामने है, उनके सामने भी- जो दादरी पर चीखते हैं, पर मालदा पर खामोश हैं। उनके सामने भी जो प्रवीण तोगड़िया से दुखी हैं पर आजम खान से उन्हें परहेज नहीं है। काश राजनीति वाणी संयम और भारत-प्रेम की भावनाओं से लबरेज होती तो हम ऐसे सामाजिक संकटों का आसानी से मुकाबला कर पाते। लेकिन अफसोस राजनीतिक दलों के पास तिरंगे से ज्यादा बड़े और ज्यादा गहरे रंगों वाले झंडे हैं।