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गुरुवार, 24 सितंबर 2026

खबरों की दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चुनौती

 

यहां आंखों देखा और कानों सुना भी झूठ हो सकता है!

-प्रो.संजय द्विवेदी



       मीडिया की दुनिया के लिए यह सबसे कठिन समय है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने सब कुछ हिलाकर रख दिया है। अगले पांच वर्षों में न्यूज रुम का चेहरा बदलने के संकल्प के साथ इस नए ज्ञान क्षेत्र ने जितने कम समय में अपनी उपयोगिता बनाई है, वह चकित करने वाली है। जिस दौर में समूचा मीडिया विश्वसनीयता और प्रामणिकता के संकट से जूझ रहा है, ऐसे समय में एआई के लिए मीडिया समूहों का उत्साह और उसकी स्वीकार्यता वास्तव में आश्चर्य में डालने वाली है।

       सही मायनों में यह वह समय है जब आंखों देखी तथा कानों सुनी बातें भी छलावा और धोखा साबित हो रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक ने सूचनाओं का ऐसा धुंधला समंदर रच दिया है, जहाँ कुछ क्षणों में फर्जी खबरें सच का लिबास पहनकर तैरने लगती हैं। ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि खबर कितनी तेजी से आप तक पहुँच रही है, बल्कि असली चुनौती यह है कि उस पर भरोसा कितना किया जाए। मशीनी एल्गोरिदम शब्दों को सजा सकता है, आंकड़े जोड़ सकता है, लेकिन सच को तलाशने की नैतिक हिम्मत और मानवीय संवेदना केवल एक निष्पक्ष पत्रकार के पास ही होती है।

डीपफेक से मुकाबला-

         युद्ध और राजनीतिक भाषणों के फर्जी वीडियो और आडियो वायरल हो जाना अब नई बात नहीं रही। पिछले चुनाव में भी कई दिवंगत नेताओं के वीडियो चले जिसमें वे अपनी पार्टी के वोट की अपीलें कर रहे हैं। जनमत को प्रभावित करने के लिए ऐसे प्रयास चरम पर हैं, जिनकी विश्वसनीयता शून्य है। 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम' की एक रिर्पोट में एआई जनित गलत सूचनाओं को दुनिया के बड़े खतरों में बताया गया है। आज दुनिया और देश के अनेक बड़े मीडिया हाउस आधिकारिक तौर पर एआई का उपयोग डेटा विश्लेषण और अनुवाद के लिए कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि कई हजार पेज के डेटा का आंकलन -विश्लेषण सामान्य मनुष्य के लिए कई महीनों का काम है जिसे एआई के टूल्स मिनटों में संभव कर रहे हैं। बावजूद इसके अनेक मीडिया आउटलेट्स एआई से खबरें या विश्लेषण लिखवाकर हंसी के पात्र बन रहे हैं। ऐसे में संशोधन, सुधार और मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त सामग्री से कचरा तो बढ़ ही रहा है, विश्वनीयता के नए संकट सामने हैं। बड़े भाषा माडल (एलएलएम) कभी पूरी तरह से काल्पनिक आंकड़े, अदालत के फैसला और ऐतिहासिक घटनाएं गढ़ते हुए दिखते हैं। जिसे सामान्य पाठक सच समझ बैठता है। तकनीकी विशेषज्ञ इसे हैलुसिनेशन कह रहे हैं। जिसका सीधा आशय यह है कि जिन चीजों के सटीक जवाब एआई के पास नहीं होते वह उनके मनगढंत उत्तर प्रस्तुत कर देता है। सजग संपादक और संपादकीय दृष्टि के अभाव में यह सामग्री कई तरह से संकट पैदा कर सकती है।

खबरों में सच की तलाश-

       सच और झूठ का फासला बहुत कम हो गया है। खबरों का सत्यापन पत्रकारिता की पहली शर्त है। लेकिन होड़ और दौड़ में वह धूमिल हो रही है। सामान्य से लगते कामों में एआई का उपयोग तो किया जा रहा है किया भी जाना चाहिए। किंतु किसी खोजी रिपोर्ट के लिए जमीनी स्तर पर जाकर काम करना, कागजात की जांच करना पत्रकारों की ही जिम्मेदारी है। तकनीक पर अति निर्भरता के समय में हमें उसके गंभीर खतरों का भी भान होना चाहिए। मैदानी पत्रकारिता में मिट्टी की जो खुशबू है वह मैदान में उतरे बिना प्रामणिक और भरोसेमंद नहीं हो सकती। मानवीय संस्पर्श और संवेदना किसी खबर का वितान बड़ा कर सकती है। जाहिर तौर पर पत्रकारिता की निर्भरता पूरी तरह एआई टूल्स पर संभव नहीं है। पत्रकारिता जहां निष्पक्षता, समाज के हित-सद्भाव, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर चिंतन को प्राथमिकता देती है, वहीं एल्गोरिदम का पूर्वाग्रह संभव है। अतः इसे समझने की जरुरत है। एआई माडल उसी डेटा से सीखते हैं जो उपलब्ध है। ऐसे में उपलब्ध डेटा अगर किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त है तो एआई भी उसी प्रकार के परिणाम देगा। कई शोध बताते हैं कि पश्चिमी मानकों पर ट्रेंड एआई माडल अक्सर विकासशील देशों के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर गलत संदर्भ प्रस्तुत करते हैं।

आसानी से अर्जित नहीं होता भरोसा-

        भरोसा या विश्वास वह शब्द है जिसे प्राप्त करना आसान नहीं है। आप भले एआई का उपयोग करें किंतु जैसे ही आप यह लिखते हैं कि –“खबर एआई द्वारा बनी है और इसे मानव संपादक के द्वारा देख लिया गया है।” पाठक का भरोसा एआई जनित खबर पर तुरंत कम हो जाता है। पाठक वास्तविक पत्रकारों और लेखकों द्वारा लिखी गई सामग्री को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। कोई भी अखबार या मीडिया हाउस सालों-साल में यह प्रतिष्ठा अर्जित करता है। उसे एआई के नए माध्यम तुरंत समाप्त कर सकते हैं। दूसरी ओर कापीराइट और बौद्धिक संपदा से जुड़े संकट भी सामने खड़े हैं। कई प्रमुख मीडिया संगठन इस बात पर आपत्ति कर रहे हैं तो कई ने बिना अनुमति और बिना भुगतान उनकी सामग्री के उपयोग के लिए एआई कंपनियों पर मुकदमे भी किए थे। ऐसे में तमाम ऐसे विवाद अभी भी एआई के साथ जुड़े हुए हैं। बताया जाता है कि इंटरनेट पर हजारों की संख्या में ऐसी वेबसाइट्स तैर रही हैं जो केवल विज्ञापन से पैसे कमाने के लिए झूठ का व्यापार कर रही हैं। वे हर पल एआई से झूठी खबरें गढ़ते हुए पोस्ट करती रहती हैं। मीडिया वाचडाग न्यूज गार्ड ने ऐसे तमाम अविश्वसनीय वेबसाइटों की पहचान की है। ऐसे में सच और झूठ के बीच मीडिया के सत्यान्वेषण का धर्म सहम कर रह जाता है। हम सब मानते हैं संपादकीय विवेक का कभी कोई विकल्प नहीं हो सकता। इस दौर में भी यह एक सच्चाई है। नैतिक विवेक और समाज की गहरी समझ के बिना किया गया कोई भी संवाद या संचार संकट ही खड़ा करेगा।

मुख्यधारा के मीडिया की ओर लौटना होगा-

       सारी तकनीकी क्रांति के बाद भी मुख्यधारा के मीडिया का वजूद बचा रहेगा क्योंकि एआई जनित भ्रमों, फर्जी खबरों की बाढ़ के बीच हमें सत्यापित जानकारी की ओर लौटना ही है। ऐसे में ‘प्रिंट इज डेड’ जैसी अवधारणाओं के बीच भी मुख्यधारा का मीडिया अपनी विशेषताओं के कारण, संपादकीय गुणवत्ता के कारण बना और बचा रहेगा। सत्य आसानी से नहीं मिलता, इसे समाज भी स्वीकारेगा। इसके साथ ही प्रामणिक और भरोसेमंद मंचों की ओर लौटना ही होगा। क्योंकि यहां प्रामणिक मंच केवल खबरों का व्यापार नहीं कर रहे होगें बल्कि वे अपनी खबरों के सच होने के गारंटी भी देगें। जाहिर है पारंपरिक मीडिया के लिए वह दिन बहुत खास होगा। डीपफेक और एल्गोरिदम के समय में अब चुनौती ही असली और सही खबर पाना है। क्या वो आपके पास है?

विदेश नीति के भी महारथी हैं मोदी!

 

पांच देशों की यात्रा से बने हैं रिश्ते और सरोकार




        भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर यह कहा जाता है कि वे विदेश यात्राएं खूब करते हैं। एक जमाने में उन्हें लेकर मजाक भी चला कि कुछ दिन तो गुजारिए हिंदुस्तान में। किंतु उनकी विदेश यात्राओं ने भारत के साथ दुनिया के साथ रिश्तों को सहज किया है। खासकर अरब देशों के साथ भारत के रिश्ते अपने उच्चतम स्तर पर हैं। संवाद की सहजता और गतिशीलता ने भारतीय विदेश नीति को एक नए मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां औपचारिक संवाद से आगे व्यक्तिगत रिश्तों की बात भी होने लगी है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप हों, चीनी राष्ट्रपति हों या रूस के पुतिन। सबके सब मोदी का नाम लेते हैं और भारत को नजरंदाज नहीं कर सकते। इटली दौरे पर पीएम मोदी ने जियोर्जिया मेलोनी को पारले कंपनी की 'मेलोडी' टॉफी का पैकेट गिफ्ट किया, यह पल इंटरनेट पर बहुत वायरल हुआ और मेलोनी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इसका वीडियो शेयर करके पीएम मोदी को धन्यवाद दिया। जाहिर है ऐसे दृश्यों के बीच नरेंद्र मोदी ने रिश्तों का जो पुल बनाया है। उसकी चर्चा समूची दुनिया में है।

      वैश्विक तनाव के बीच भारत-यूरोप संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली सहित कई यूरोपीय देशों का दौरा किया। यह यात्रा एक ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया में जंग के हालात हैं। इन तनावपूर्ण हालात में प्रधानमंत्री का उद्देश्य सिर्फ रिश्ते बनाना नहीं हैं बल्कि भारत की जरूरतों के लिए भी है। यह तो तय है प्रधानमंत्री कोई भी काम अकारण नहीं करते। कई बार उनकी दूरदृष्टि देखी गयी है। जबकि आज की राजनीति तुरंत परिणाम देने वाले संकेतों को ही समझती है। जबकि विदेशनीति में आज रोपे गए बीज कल वृक्ष बनकर परिणाम देते हैं। संवाद और सातत्य ही इसका एकमात्र हल है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री की यह यात्रा भी अनेक लक्ष्यों को साधती है। बताते है कि उनकी यह यात्रा तो काफी पहले से ही नियोजित थी जिसमें भारत-नार्डिक शिखर सम्मेलन भी शामिल था। किंतु 2025 में हुए पहलगाम हमले से सारा कुछ ठहर गया। यह यात्रा उन भारत-यूरोप संबंधों पर नए तरह से रिश्तों को पारिभाषित करना चाहती थी, क्योंकि इन दिनों वैश्विक राजनीति में विश्व शक्तियों का आचरण और व्यवहार काफी कुछ बदला हुआ है।

युद्ध में दुनिया और भारत की भूमिका-

यूक्रेन युद्ध से प्रारंभ हुआ वैश्विक तनाव अब इजराइल-अमरीका और ईरान युद्ध तक जा पहुंचा है। युद्धकामी शक्तियां पीछे हटने को तैयार नहीं है। भारत जैसा देश जो अपनी ऊर्जा सहित तमाम जरूरतों के लिए दुनिया के तमाम देशों पर निर्भर है, वह बैठा नहीं रह सकता। साथ ही अमरीका की टैरिफ से जुड़ी मनमानियां और चीन का अड़ियल रवैया भारत को शांति से बैठने नहीं दे रहा। ऐसे में भारत के राष्ट्रध्यक्ष की चुनौतियां बहुत बढ़ जाती हैं। उन्हें न सिर्फ देश के अंतर की व्यवस्था के सामान्य रखना है बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत के हितों का ख्याल रखना है। क्योंकि दोंनो एक दूसरे से संयुक्त हैं। हम देखते हैं कि पिछले साल लागू हुआ भारत-ईएफटीए व्यापार समझौता और इस साल के आखिर में संपुष्ट/हस्ताक्षरित होने वाला भारत-ईयू एफटीए सप्लाई चेनों और बाजारों में विविधता लाने की साझा इच्छा को दिखाते हैं। खास तौर पर उन नॉर्डिक देशों के साथ, जहां भारत के संग होने वाला द्विपक्षीय व्यापार 20 अरब डॉलर के नीचे बना हुआ है। ऐसे में भारत को इन देशों के साथ ज्यादा बेहतर रिश्ते बनाने की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता।

   आज के समय में भारत की प्राथमिकता एक ऐसी दुनिया को स्थापित करने पर जिसमें विदेशी मुद्रा और ऊर्जा संरक्षण दोनों की बचत हो सके। इन लक्ष्यों को साधे बिना किसी भी विकासशील देश के सामने गहरे संकट घिर जाएंगें। संयुक्त अरब अमीरात में दीर्घकालिक रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्वों पर और नॉर्डिक-भारत शिखर सम्मेलन में हरित रणनीतिक साझेदारियों पर हुई चर्चाओं का लक्ष्य ऊर्जा सुरक्षा पर सहयोग को आगे ले जाना था। मोदी इन सामूहिक लक्ष्यों के साथ युद्धविहीन दुनिया का सपना देखते हैं। वे साफ कहते हैं कि यह युद्ध का समय नहीं है। आंतकवाद और युद्ध विहीन दुनिया उनका ही हर भारतवासी का सामूहिक स्वप्न है। क्योंकि भारत का उद्देश्य ही विश्वमंगल है और उसका ध्येय मंत्र वसुधैव कुटुम्बकम् है। प्रधानमंत्री इसी भारत भाव को दुनिया के हर मंच पर स्थापित करते हुए दिखते हैं। मोदी की समूची यात्रा में यूक्रेन और ईरान संघर्षों पर स्वस्थ चर्चा, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बातचीत शामिल रही। एआई गवर्नेंस और क्रिटिकल मिनरल संबंधी पहलों पर भी फोकस था। नॉर्डिक देशों ने जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुए आर्कटिक में वैज्ञानिक सहयोग और समुद्री (मैरिटाइम) सहकार पर फोकस किया। इन दौरों से कुछ खास ठोस नतीजे या वास्तविक व्यापार समझौते हासिल नहीं हुए, लेकिन दोस्ताना माहौल और मोदी को दिये गये पुरस्कारों ने ज्यादा गहरे भारत-यूरोप सहयोग की उम्मीदों का संकेत दिया। यह जुड़ाव और मजबूत होगा जब वह जून में जी-7 आउटरीच समिट के लिए फ्रांस की यात्रा करेंगे और स्लोवाकिया का द्विपक्षीय दौरा करेंगे, और इसी साल के आखिर में ब्रुसेल्स में भारत-ईयू एफटीए पर दस्तखत करेंगे।

रिश्तों पर खास जोर-

 यह यात्रा साफ बताती है कि प्रधानमंत्री यूरोपीय देशों से अपने रिश्ते बेहतर करना चाहते हैं। एक शानदार लोकतंत्र भारत के लोग यूरोप के देशों से जुड़ना चाहते हैं। उनका विचार है यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यूक्रेन में रुस की आक्रामता, अमरीकी-इजराइल और ईरान के संघर्ष के बीच चीन का आर्थिक दबाव तीन ऐसे कारण हैं जो हमें साथ होने के प्रेरित करते हैं। इसका साफ उद्देश्य है कि अंतराष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था बने और चले भी। ताकि किसी देश की तानाशाही के आधार पर चीजों को बिगाड़ा न जा सके। भारत ईएफटीए व्यापार समझौते और आगामी भारत ईयूएफटीए पर केंद्रित है। इसके साथ ही मोदी का जोर आपूर्ति श्रृखंलाओं और बाजारों के विविधीकरण पर है। ताकि हमारा व्यापार विशेष रुप से नार्डिक देशों के साथ बढ़ सके, जो अभी मात्र 20 अरब डालर से कम है। जाहिर तौर यह क्षेत्र संभावनाओं से भरा है, जहां भारत दांव लगा रहा है।

ऊर्जा जरुरतों के लिए बढ़ती साझेदारी-

 भारत की ऊर्जा जरूरतें इस समय एक बड़ी चुनौती हैं। संयुक्त अरब अमीरात में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को लेकर चर्चा हुई। भारत और यूएई ने पेट्रोलियम भंडार, दीर्घकालिक एलपीजी आपूर्ति और रक्षा सहयोग से संबंधित कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। ये समझौते पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच अबू धाबी में उच्च स्तरीय वार्ता के बाद हुए। यूएई ने भारत में 5 अरब अमरीकी डॉलर के निवेश का भी वादा किया है। इन समझौतों में इंडियन स्‍ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्वस लिमिटेड और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए हस्ताक्षरित रणनीतिक सहयोग समझौता शामिल हैं। इसमें पेट्रोलियम भंडार में सहयोग और तरल प्राकृतिक गैस और एलपीजी भंडारण सुविधाओं पर सहयोग शामिल है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस समझौते से भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में यूएई की हिस्सेदारी बढ़कर 3 करोड़ बैरल हो जाएगी और भारत में रणनीतिक गैस भंडार स्थापित किए जाएंगे। दोनों पक्षों ने एलपीजी पर एक अलग रणनीतिक सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर किए, जिससे भारत में व्यापक रूप से ईंधन की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित होने की उम्मीद है।भारत और संयुक्त अरब अमीरात ने एक रणनीतिक रक्षा साझेदारी के ढांचे पर भी हस्ताक्षर किए, जो रक्षा औद्योगिक सहयोग, प्रौद्योगिकी साझाकरण, नवाचार और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग पर केंद्रित है।

संवाद से संकटों के हल तलाशने की तैयारी-

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलग रहते हुए भी संकटों के हल के लिए चल रहे प्रयासों से खुद को अलग नहीं किया। वे संवाद के स्तर रूस और यूक्रेन दोनों देशों से संवाद बनाए हुए हैं। इसी तरह ईरान, इजराइल और अमरीका से भारत का संवाद निरंतर है। इन यात्राओं में प्रधानमंत्री ने एआई गर्वनेंस पर चर्चा की और खनिज पहलों पर भी संवाद किया। ओस्लो में, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, डेनमार्क की कार्यवाहक प्रधानमंत्री सुश्री मेटे फ्रेडरिक्सन, नॉर्वे के प्रधानमंत्री श्री जोनास गहर स्टोरे, फिनलैंड के प्रधानमंत्री श्री पेटेरी ओर्पो, आइसलैंड की प्रधानमंत्री सुश्री क्रिस्ट्रुन म्योल फ्रॉस्टडॉटिर और स्वीडन के प्रधानमंत्री श्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया। यह शिखर सम्मेलन 2022 में कोपेनहेगन और 2018 में स्टॉकहोम में आयोजित पिछले दो शिखर सम्मेलनों पर आधारित है। प्रधानमंत्रियों ने इस बात पर ध्यान दिया कि वे वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल और तीव्र आर्थिक एवं तकनीकी परिवर्तन के दौर में मिल रहे हैं और साझा हितों और मूल्यों पर आधारित पारस्परिक लाभ के लिए भारत और नॉर्डिक देशों के बीच साझेदारी को गहरा करने और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सहयोग करने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की। इस संदर्भ में, उन्होंने भारत-नॉर्डिक संबंधों को एक विश्वसनीय हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाने का निर्णय लिया। प्रधानमंत्रियों ने तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में हुई चर्चाओं पर संतोष व्यक्त किया और भारत-नॉर्डिक सहयोग को और अधिक विस्तारित एवं गहरा करने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की। नेताओं ने निर्णय लिया कि चौथे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी फिनलैंड करेगा।

सम्मान से जीवंत रिश्तों का प्रारंभ-

    नार्वे में उन्हें ‘द रॉयल नॉर्वे ऑर्डर ऑफ मेरिट के ग्रैंड क्रॉस’से सम्मानित किया गया तो वहीं स्वीडन के प्रतिष्ठित “रॉयल ऑर्डर ऑफ़ पोलर स्टार, कमांडर ग्रैंड क्रॉस” से भी वे अलंकृत किए गए। यह सम्मान भारत और स्वीडन के बीच मजबूत होते कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों का प्रतीक माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों में व्यापार, हरित ऊर्जा, तकनीक और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में साझेदारी लगातार बढ़ी है। ये सूचनाएं बताती हैं कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में दुनिया के मंचों पर भारत की बात सुनी जा रही है और उसे गंभीरता से लिया जा रहा है। पांच देशों की उनकी यात्रा से तत्काल भले कुछ हासिल होता हुआ न दिखे, किंतु रिश्तों की महक, खुशबू और आने वाले समय के लिए कुछ तार तो जुड़े ही हैं। विदेश नीति को इस सहजता और सौजन्य से लेना ही मोदी की विरासत है।


 

 

 

 

 

डिग्रियों की बाढ़ और कौशल का सूखा!

 

स्नातकों की घटती ‘रोजगार क्षमता’ बड़ी चुनौती

-प्रो.संजय द्विवेदी



      पढ़ तो रहे हैं पर आप सीखते क्या हैं?  यह सवाल हमारी शिक्षा व्यवस्था के सामने यक्ष प्रश्न की तरह खड़ा है। इसे ऐसे ही समझिए कि भाषा के विद्यार्थी के पास ‘सही भाषा’ नहीं है, उसके उपयोग का कौशल नहीं है। ऐसे में कौशल विकास की नारेबाजियों के बीच हम क्या कर रहे हैं यह एक बड़ा सवाल है। आंकड़े बताते हैं कि देश में उच्च शिक्षा के व्यापक विस्तार से अब शोध करने वालों की संख्या भी बढ़ी है। यानि उच्च शिक्षा में बहार के दिन हैं। स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले बढ़े हैं। हर वर्ग, समुदाय की शिक्षा के प्रति ललक बढ़ी है, किंतु स्नातकों की रोजगार-क्षमता (इंप्लायबिलिटी) अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। डिग्री और जॉब मार्केट के बीच की इन खाइयों को पाटने पर चिंतन जरुरी हो जाता है।

डिग्रियां बांटने का कारखाना बने हैं परिसर-

      आखिरकार हमारे नौजवान क्या और कैसे पढ़ रहे हैं कि वे रोजगार के मोर्चे पर आवश्यक योग्यताएं नहीं रखते। सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों, कालेजों की पहुंच बढ़ी है। शिक्षा के लिए सरकार के इंतजाम तो हैं ही शिक्षा में सक्रिय बाजार के खिलाड़ी भी उत्साहित हैं। देश में उच्च शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सकल नामांकन अनुपात में ऐतिहासिक वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी तरफ युवाओं और स्नातकों के बीच बेरोजगारी व कौशल अंतराल (स्किल गैप) एक गंभीर विमर्श का विषय बन गया है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (2023-24) की रिपोर्ट और श्रम बाजार पर आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि हालात अच्छे नहीं हैं। ऐसे में क्या हमारी उच्च शिक्षा केवल 'डिग्रियां बांटने का कारखाना' बनकर रह गई है या यह युवाओं को वास्तविक अर्थों में सक्षम बना रही है? डिग्रियां लेकर समाज में खड़े नौजवान आखिर क्या करेगें, क्या वे डिग्रीधारी बेरोजगार बनकर रह जाएंगें। ऐसे में बेरोजगारी को समाप्त करने के लिए रास्ता क्या है। नई शिक्षा नीति कौशल विकास पर खासा जोर देती है किंतु हमारे पास अधोसंरचना का टोटा है और अध्यापकों का अभाव जिसके चलते हर अच्छा सपना दम तोड़ देता है। देश के सामाजिक, भौगोलिक और आर्थिक हालात में समान शिक्षा की बात बेमानी है। निजी विश्वविद्यालयों में बहुत फीस देकर भी बहुत कुछ अर्जित नहीं हो रहा है। विद्यार्थियों के साथ क्लाइंट्स सरीखा व्यवहार हो रहा है और कई जगह सिर्फ डिग्रियां बंट रही हैं। कुछ विद्यार्थी भी ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ नाम के लिए डिग्री चाहिए, ऐसे लोग वातावरण को बिगाड़ने का ही काम करते हैं।

परिसरों में हैं पर कुछ सीखते नहीं-

      देश में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात बढ़कर 30% तक पहुँच गया है। कुल नामांकन बढ़कर 4.50 करोड़ हो गया है, जिसमें महिलाओं की हिस्सेदारी 31.2 और कुल नामांकन 2.24 करोड़ में उल्लेखनीय और निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की भागीदारी में ऐतिहासिक उछाल आया है, जो सामाजिक समावेशन का बड़ा संकेत है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित पाठ्यक्रमों में भी विद्यार्थियों की संख्या बढ़कर 1.02 करोड़ हो गई है। विभिन्न श्रम एवं आजीविका अध्ययनों (जैसे ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया’ और ‘इंडिया स्किल्स रिपोर्ट’) के अनुसार, 25 वर्ष से कम आयु के स्नातकों में बेरोजगारी दर लगभग 40% के करीब है, जबकि 25-29 वर्ष आयु वर्ग के स्नातकों में यह करीब 20% है। राष्ट्रीय स्तर पर समग्र रोजगार-क्षमता सीमित बनी हुई है, जो दर्शाती है कि डिग्री धारकों के पास आधुनिक उद्योगों की माँग के अनुकूल व्यावहारिक कौशल की कमी है। उच्च डिग्रियां (जैसे इंजीनियरिंग या स्नातकोत्तर) हासिल करने के बाद भी युवाओं का पारंपरिक या बेहद कम कौशल वाले अस्थाई कार्यों पर निर्भर होना। यह चिंता की बात है बहुत बड़ी डिग्रियां लेकर भी नौजवानों को उनकी शिक्षा के अनुरुप कार्य नहीं मिलता। इसका कारण सिर्फ बेरोजगारी नहीं है बल्कि उनका कौशल युक्त न होना भी है। निजी क्षेत्र में रोजगार पाने के लिए बेहद सक्रिय व्यक्तित्व और हुनर के आधार पर ही होता है। अनेक नियोक्ताओं से चर्चा होती है तो वे बेहतर का

     उच्च शिक्षा संस्थानों में आज भी सैद्धांतिक और पारंपरिक शिक्षा पर अधिक जोर है, जबकि उद्योग जगत की मांग तकनीकी व विश्लेषणात्मक दक्षता की है। भारी संख्या में संस्थानों के खुलने के बावजूद छात्र-शिक्षक अनुपात और बुनियादी शोध निवेश के मामले में हम वैश्विक मानकों से पीछे हैं। स्कूली शिक्षा के स्तर से ही (विशेषकर छठी कक्षा से) व्यावसायिक और कौशलपरक शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल करने की आवश्यकता पर नीति आयोग ने बल दिया है। नई शिक्षा नीति भी इसी ओर ध्यान दिलाती है किंतु हमारे परिसर इसके लिए तैयार हैं? पाठ्यक्रम ऐसे हों जो बाजार की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर सकें। डिग्री कार्यक्रमों के साथ 'कमाने के साथ और अप्रेंटिसशिप मॉडल’ को बढ़ावा देना चाहिए । देश को जनसांख्यिकी लाभांश का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है जब हम मात्रात्मक विस्तार से आगे बढ़कर गुणात्मक उत्कृष्टता और रोजगार-उन्मुख सुधारों की ओर तेजी से कदम बढ़ाएं। भारत जैसे देश में जहां उसका आकार-प्रकार एक समस्या है। दूसरी ओर गांवों की ओर हालात काफी खराब हैं। शासकीय विद्यालयों में भी शिक्षकों का अभाव है। लोग ग्रामीण, गिरिवासी और वनवासी क्षेत्रों में जाना नहीं चाहते और शहर के आसपास ही नौकरियां करना चाहते है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। निजी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के संजाल से शिक्षा का हाल भी बदहाल हो रहा है। आज सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों मिलकर भी इस देश की आवश्यक्ता की पूर्ति नहीं कर सकते। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चुनौती तो अलग है ही। इसके चलते देश में कई स्तरों की शिक्षा चल रही है। समान शिक्षा और समान अवसर ऐसे समय में स्वप्न ही बनकर रह गया है।

(लेखक भारतीय जन संचार संस्थान-आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक हैं। संप्रति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

 

 

उत्तर प्रदेश का सांस्कृतिक परिदृश्य और युवाओं की भूमिका

 

          -   संजय द्विवेदी


    भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो मृत्युंजय है। विश्व के अनेक विद्वानों, रहस्यदर्शियों, वैज्ञानिकों और प्रतिभावान शोधार्थियों ने भारत की अमरता को सिद्ध किया है। किसी ने इसे ज्ञान की भूमि कहा तो किसी ने मोक्ष की, किसी ने इसे सभ्यताओं का मूल कहा तो किसी ने इसे भाषाओं की जननी कहा। किसी ने यहां आत्मिक पिपासा बुझाई तो कोई यहां के वैभव से चमत्कृत हुआ। कोई इसे मानवता का पालना मानता है तो किसी ने इसे संस्कृतियों का संगीत कहा। ऐसी महान संस्कृति का आंगन भारत है, जिसकी हर सांस में ही पूरी वसुधा को एक कुटुम्ब मानने की आकांक्षा है। अपनी इसी आकांक्षा के नाते यह देश कह पाया कि- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। दरअसल इसीलिए भारत मृत्युंजय है। वह वसुधा पर ऐसी संस्कृति का संवाहक है जो प्रेम, करूणा, संवेदना के भावों से भरी है और समूची मानवता के कल्याण के बात करती है। इसी तरह उत्तर प्रदेश हमारी सांस्कृतिक परंपरा का सबसे जीवंत उत्तराधिकारी है। राम,कृष्ण शिव से जुड़े स्थान उसे अलग ही गरिमा प्रदान करते हैं। उत्तर प्रदेश में सांस्कृतिक नगरियों के रूप में अयोध्या, मथुरा और काशी की उपस्थिति इसके इतिहास वैभव को दर्शाती हैं। पुण्यसलिला गंगा के किनारे बसे तमाम नगर और गांव भारत की असली कहानी कहते हैं। यह गौतम बुद्ध की घरती है। जहां कुशीनगर और सारनाथ जैसे स्थान युवाओं को प्रेरित करते हैं।

      ऐसी महान संस्कृति हमारे लिए प्रेरणा का कारण बनना चाहिए। किंतु गुलामी के लंबे कालखंड और विदेशी विचारों ने हमारे अपने गौरव ग्रंथों, मानबिंदुओं, पुण्यस्थलों  पर गर्द की चादर डाल दी। इस पूरे दृश्य को इतना धुंधला दिया गया कि हमें अपने गौरव का, अपने मान का, अपने ज्ञान का आदर ही न रहा। यह हर क्षेत्र में हुआ। हर क्षेत्र को विदेशी नजरों से देखा जाने लगा। हमारे अपने पैमाने और मानक भोथरे बना दिए गए। स्वामी विवेकानंद को याद करें वे उसी स्वाभिमान को जगाने की बात करते हैं। महात्मा गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण ने हमें उसी स्वत्व की याद दिलायी। सोते हुए भारत को जगाने और झकझोरने का काम किया। ऐसे समय में जब एक बार फिर हमें अपने स्वत्व के पुर्नस्मरण की जरूरत है तो पत्रकारिता इसमें एक बड़ा साधन बन सकती है। हम देश में अपने नायकों की तलाश कर रहे हैं। वे हमारी जमीन के नायक हैं,इस देश के इतिहास के नायक हैं। उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार ने अनेक नायकों को स्मरण करते हुए उनके महत्व से आने वाली पीढ़ी को अवगत कराना आरंभ किया है।

साहित्यिक नायकों की भूमि-

    साहित्य और पत्रकारिता के अनेक नायक भी उत्तर प्रदेश की भूमि से उपजे हैं। पत्रकारिता की अपनी एक संस्कृति है। खासकर भारत के संदर्भ में पत्रकारिता लोकजागरण का ही अनुष्ठान है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ही देश में तेजी से पत्रकारिता का विकास हुआ और इसके चलते देशभक्ति, जनजागरण और समाज सुधार के भाव इसकी जड़ों में हैं। आजादी के बाद इसमें कुछ बदलाव आए और आज बाजारवादी शक्तियों का प्रभाव इस माध्यम पर काफी देखा जा रहा है। साहित्य हो या मीडिया दोनों का काम है, लोकमंगल के लिए काम करना। राजनीति का भी यही काम है। लोकमंगल हम सबका ध्येय है। लोकतंत्र का भी यही उद्देश्य है। संकट तब खड़ा होता है जब लोक हमारी नजरों से ओझल हो जाता है। लोक हमारे संस्कारों का प्रवक्ता है वह हमें बताता है कि क्या करने योग्य है और क्या करने योग्य नहीं है। इसलिए लोकमानस की मान्यताएं ही हमें संस्कारों से जोड़ती हैं और इसी से हमारी संस्कृति पुष्ट होती है।

      भारतीय संस्कृति में सामाजिक संवाद की अनेक धाराएं है। संवाद की परंपराएं हैं। शास्त्रार्थ हमारे लोकजीवन का हिस्सा है। समाज में विविध समाजों और रिश्तों के बीच संवाद की परंपराएं हैं। हमें उनपर ध्यान देने की जरूरत है। सुसंवाद से ही सुंदर समाज की रचना संभव है। मीडिया इसी संवाद का केंद्र है। वह हमें भाषा भी सिखाता है और जीवन शैली को भी प्रभावित करता है। आज खासकर दृश्य मीडिया पर जैसी भाषा बोली और कही जा रही है उससे सुसंवाद कायम नहीं होता, बल्कि समाज में तनाव बढ़ता है। इसका भारतीयकरण करने की जरूरत है। हमारे जनमाध्यम ही इस जिम्मेदारी को निभा सकते हैं। वे समाज में मची होड़ और हड़बड़ी को एक सहज संवाद में बदल सकते हैं।

उत्तर प्रदेश की धरती पर देसराग-

     कोई भी समाज सिर्फ आधुनिकताबोध के साथ नहीं जीता, उसकी सांसें तो ‘लोक’ में ही होती हैं। भारतीय जीवन की मूल चेतना तो लोकचेतना ही है। नागर जीवन के समानांतर लोक जीवन का भी विपुल विस्तार है। खासकर हिंदी का मन तो लोकविहीन हो ही नहीं सकता। यह भाग्य ही है उत्तर प्रदेश कवि तुलसीदास, कबीर, रसखान, सूरदास की भूमि है। बाद में मैथिलीशरण गुप्त से लेकर अज्ञेय तक उप्र की भूमि से संपर्क रखते थे। नागरबोध आज भी हिंदी जगत की उस तरह से पहचान नहीं बन सका है। भारत गांवों में बसने वाला देश होने के साथ-साथ एक प्रखर लोकचेतना का वाहक देश भी है। किंतु लोकजीवन के तमाम किस्से, गीत-संगीत और प्रदर्शन कलाएं, शिल्प एक नई पैकेजिंग में सामने आ रहे हैं। इनमें बाजार की ताकतों ने घालमेल कर इनका मार्केट बनाना प्रारंभ किया है। इससे इनकी जीवंतता और मौलिकता को भी खतरा उत्पन्न हो रहा है। जैसे आदिवासी शिल्प को आज एक बड़ा बाजार हासिल है किंतु उसका कलाकार आज भी फांके की स्थिति में है। जाहिर तौर पर हमें अपने लोक को बचाने के लिए उसे उसकी मौलिकता में ही स्वीकारना होगा। हजारों-हजार गीत, कविताएं, साहित्य, शिल्प और तमाम कलाएं नष्ट होने के कगार पर हैं। किंतु उनके गुणग्राहक कहां हैं।

    उत्तर प्रदेश जैसे एक विशाल भू-भाग में बोली जाने वाली अनेक बोलियां, उनका साहित्य-जो वाचिक भी है और लिखित भी। उसकी कलाचेतना, प्रदर्शन कलाएं सारा कुछ मिलकर एक ऐसा लोक रचती है जिस तक पहुंचने के लिए अभी काफी समय लगेगा। लोकचेतना तो वेदों से भी पुरानी है। क्योंकि हमारी परंपरा में ही ज्ञान बसा हुआ है। ज्ञान, नीति-नियम, औषधियां, गीत, कथाएं, पहेलियां सब कुछ इसी ‘लोक’ का हिस्सा हैं। हिंदी अकेली भाषा है जिसका चिकित्सक भी ‘कविराय’ कहा जाता था। बाजार आज सारे मूल्य तय कर रहा है और यह ‘लोक’ को नष्ट करने का षडयंत्र है। यह सही मायने में बिखरी और कमजोर आवाजों को दबाने का षडयंत्र भी है। इसका सबसे बड़ा शिकार हमारी बोलियां बन रही हैं, जिनकी मौत का खतरा मंडरा रहा है। 

    मुख्यधारा मीडिया के मीडिया के पास इस संदर्भों पर काम करने का अवकाश नहीं है। किंतु समाज के प्रतिबद्ध पत्रकारों, साहित्यकारों को आगे आकर इस चुनौती को स्वीकार करने की जरूरत है क्योंकि ‘लोक’ की उपेक्षा और बोलियों को नष्ट कर हम अपनी प्रदर्शन कलाओं, गीतों, शिल्पों और विरासतों को गंवा रहे हैं। जबकि इसके संरक्षण की जरूरत है। संस्कृति अलग से कोई चीज नहीं होती, वह हमारे समाज के सालों से अर्जित पुण्य का फल है। इसे बचाने के लिए, संरक्षित करने के लिए और इसके विकास के लिए समाज और मीडिया दोनों को साथ आना होगा। तभी हमारे गांव बचेगें, लोक बचेगा और लोक बच गया तो संस्कृति बचेगी।

    यह बहुत खुशी की बात है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा युवाओं के समग्र विकास के लिए तैयार की जा रही 'एकीकृत युवा नीति' में शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के साथ-साथ राज्य की समृद्ध संस्कृति और विरासत के संरक्षण को भी प्रमुखता से शामिल किया गया है, ताकि युवा अपनी जड़ों से जुड़े रहें। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की 'कला संस्कृति विकास योजना' और युवा कलाकारों के लिए छात्रवृत्ति योजना। उत्तर प्रदेश के युवा कलाकार शास्त्रीय संगीत, लोक नृत्य और पारंपरिक थिएटर (जैसे नौटंकी और ख्याल) को जीवित रखने के लिए इन राष्ट्रीय छात्रवृत्ति और गुरु-शिष्य परंपरा का लाभ उठा रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की 'एक जिला, एक उत्पाद' (ODOP) और 'मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना'। प्रदेश के युवा इन योजनाओं के वित्तीय समर्थन से भदोही के कालीन, लखनऊ की चिकनकारी और वाराणसी की सिल्क साड़ियों जैसे पारंपरिक उद्योगों को आधुनिक ई-कॉमर्स से जोड़कर वैश्विक स्तर पर पहुँचा रहे हैं।

युवा संभालें जिम्मेदारी-

     देश के सबसे युवा राज्यों में शामिल होने के नाते, यूपी के पास कार्यबल की बड़ी ताकत है, जो राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संपदा को आर्थिक विकास का मुख्य आधार बना सकती है।अयोध्या (श्री राम जन्मभूमि), काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, मथुरा-वृंदावन और प्रयागराज कुंभ का वैश्विक स्वरूप। इन सांस्कृतिक-धार्मिक केंद्रों पर पर्यटकों की रिकॉर्ड वृद्धि के कारण स्थानीय युवाओं के लिए टूर गाइड, होटल मैनेजमेंट, और इवेंट प्लानिंग के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं। संविधान के तहत राज्य के युवाओं का यह नैतिक और संवैधानिक दायित्व है कि वे हमारी सामासिक संस्कृति  की गौरवशाली परंपरा का परीक्षण करें और ऐतिहासिक स्मारकों की रक्षा करें। राज्य के युवा तकनीकी नवाचार का उपयोग करके 'आर्ट-टेक' स्टार्टअप्स की शुरुआत कर रहे हैं, जिसके जरिए प्राचीन पांडुलिपियों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक धरोहरों को डिजिटल आर्काइव में बदला जा रहा है। कजरी, चैती, रसिया और बिहावा जैसे लोकगीतों को आधुनिक संगीत शैली के साथ प्रस्तुत करके प्रदेश के युवा नई पीढ़ी के बीच अपनी सांस्कृतिक विरासत को लोकप्रिय बना रहे हैं। इसके तहत युवाओं को हस्तशिल्प डिजाइनिंग, ट्रेडिशनल पेंटिंग और हेरिटेज प्रिजर्वेशन जैसी विधाओं में प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिससे पारंपरिक कलाओं का व्यावसायिक क्षरण रुक सके। आधुनिकीकरण के प्रभाव के बीच यूपी के युवाओं के समक्ष पश्चिमी संस्कृति और अपनी समृद्ध पारंपरिक पहचान के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है, जिसे वे अपनी रचनात्मकता से सार्थक कर रहे हैं।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

सूचनाओं के संजाल और भरोसे का संकट!

 

सोशल मीडिया ने बदल दी है जनसंचार की दुनिया

-प्रो.संजय द्विवेदी



     भारतीय समाज में किसी नए प्रयोग को लेकर इतनी स्वीकार्यता कभी नहीं थी, जितनी कम समय में सोशल मीडिया ने अर्जित की है। जब इसे सोशल मीडिया कहा गया तो कई विद्वानों ने पूछा “अरे भाई क्या बाकी मीडिया अनसोशल है? अगर वे भी सामाजिक हैं,तो यह सामाजिक मीडिया कैसे?” किंतु समय ने साबित किया कि यह वास्तव में सोशल मीडिया है। अब उससे आगे डीफफेक ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। जनरेटिव एआई और डीपफेक टूल्स की मदद से अब किसी भी व्यक्ति का फर्जी वीडियो या ऑडियो बनाना बेहद आसान और सस्ता हो गया है। कुछ ही सेकंड के ऑडियो या वीडियो सैंपल से तैयार यह तकनीक आम आदमी से लेकर दिग्गजों तक की पहचान के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है।

सृजनात्मकता का विस्फोट-

   पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है। दृश्य, विचार, कमेंट् और निजी सृजनात्मकता के अनुभव जब यहां तैरने शुरू हुए तो लोकतंत्र के पहरूओं और सरकारों का भी इसका अहसास हुआ। आज वे सब भी अपनी सामाजिकता के विस्तार के लिए सोशल मीडिया पर आ चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं भी कहा कि “सोशल मीडिया नहीं होता तो हिंदुस्तान की क्रियेटिविटी का पता ही नहीं चलता।” सोशल मीडिया अपने स्वभाव में ही बेहद लोकतांत्रिक है। जाति, धर्म, भाषा, लिंग और रंग की सीमाएं तोड़कर इसने न सिर्फ पारंपरिक मीडिया को चुनौती दी है वरन् यह सही मायने में आम आदमी का माध्यम बन गया है। इसने संवाद को निंरतर, समय से पार और लगातार बना दिया है। इसने न सिर्फ आपकी निजता को स्थापित किया है वरन एकांत को भी भर दिया है।

निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही-

   सूचनाएं आज मुक्त हैं और वे इंटरनेट के पंखों पर उड़ रही हैं। सूचना 21 वीं सदी की सबसे बड़ी ताकत बनी तो सोशल मीडिया, सभी उपलब्ध मीडिया माध्यमों में सबसे लोकप्रिय माध्यम बन गया। सूचनाएं अब ताकतवर देशों, बड़ी कंपनियों और धनपतियों द्वारा चलाए जा रहे प्रचार माध्यमों की मोहताज नहीं रहीं। वे कभी भी वायरल हो सकती हैं और कहीं से भी वैश्विक हो सकती हैं। स्नोडेन और जूलियन असांजे को याद कीजिए। सूचनाओं ने अपना अलग गणतंत्र रच लिया है। निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही है। वार्तालाप अब वैश्विक हो रहे हैं। इस आभासी दुनिया में आपका होना ही आपको पहचान दिला रहा है। “ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय” कहने वाले देश में अब एक वाक्य का विचार क्रांति बन रहा है। यही विचार की ताकत है कि वह किताबों और विद्वानों के इंतजार में नहीं है।

   सोशल साइट्स का समाजशास्त्र अलग है। यहां ट्वीट फैशन भी है और सामाजिक काम भी। फेसबुक और ट्विटर नए गणराज्य हैं। निजी जिंदगी से लेकर जनांदोलन और चुनावों तक अपनी गंभीर मौजूदगी को दर्ज करवा रहा ये माध्यम, सबको आवाज और सबकी वाणी देने के संकल्प से लबरेज है। कंप्यूटर से आगे अब स्मार्ट होते मोबाइल इसे गति दे रहे हैं। यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी-

      अपने तमाम नकारात्मक प्रभावों के बावजूद इसके उपयोग के प्रति बढ़ती ललक बताती है कि सोशल मीडिया का यह असर अभी और बढ़ने वाला है। यह मान लेने में हिचक नहीं करनी चाहिए कि यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी। झूठ, बेईमानी, अपराध और बेवफाई के किस्से हैं तो दूसरी तरफ निभ रही दोस्तियों की लंबी कहानियां हैं। हो चुकी और चल रही शादियों की लंबी श्रृंखला है। कभी किसी भी माध्यम के प्रति इतना स्वागत भाव नहीं था। फिल्में आई तो अच्छे घरों के लोग न इसमें काम करते थे, ना ही वे फिल्में देखने जाते थे। मां-पिता से छिपकर युवा सिनेमा देखने जाते थे। टीवी आया तो उसे भी इडियट बाक्स कहा गया। टीवी को लगातार देखते हुए भी हिंदुस्तान उसके प्रति आलोचना के भाव से भरा रहा और आज भी है। किंतु सोशल मीडिया के प्रति आरंभ से ही स्वागत भाव है। इसके प्रति समाज में अस्वीकृति नहीं दिखती क्योंकि यह कहीं न कहीं संबंधों का विस्तार कर रहा है। संवाद की गुंजाइश बना रहा है। रहिए कनेक्ट के नारे को साकार कर रहा है। इसके सही और सार्थक इस्तेमाल से छवियां गढ़ी जा रही हैं, चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं।

     इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा किसी भी माध्यम का गलत इस्तेमाल हमें संकट में ही डालता है। यह समय इंफारमेशन वारफेयर का भी है और साइको वारफेयर का भी। इस दौर में सूचनाएं मुक्त हैं और प्रभावित कर रही हैं। यहां संपादक अनुपस्थित है और रिर्पोटर भी प्रामाणिक नहीं हैं। इसलिए सूचनाओं की वास्तविकता भी जांची जानी चाहिए। कई बार जो संकट खड़े हो रहे हैं, वह वास्तविकता से दूर होते हैं। सोशल मीडिया की पहुंच और प्रभाव को देखते हुए यहां दी जा रही सूचनाओं के सावधान इस्तेमाल की जरूरत भी महसूस की जाती है। इसे अफवाहें, तनाव और वैमनस्य फैलाने का माध्यम बनाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। चुनावों या संवेदनशील राजनीतिक मौकों पर राजनेताओं के फर्जी भाषणों या बयानों वाले डीपफेक वीडियो का प्रसार मतदाताओं को भ्रमित कर सकता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्पक्षता और जनमत को गलत दिशा में मोड़ने का एक खतरनाक हथियार बनता जा रहा है। वॉयस क्लोनिंग (आवाज की नकल) और वीडियो डीपफेक का उपयोग करके अब कॉरपोरेट घरानों, बैंकों और आम नागरिकों को चूना लगाने के मामले तेजी से बढ़े हैं। ठग फेक आइडेंटिटी के जरिए बड़ी आर्थिक धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे हैं। हालांकि डीपफेक और भ्रामक कृत्रिम सामग्री (SGI) पर लगाम कसने के लिए अब कानूनों को सख्त किया गया है। इसके तहत एआई-जनित फोटो, वीडियो या ऑडियो पर स्पष्ट 'डिजिटल स्टैम्प' या लेबल लगाना अनिवार्य किया गया है ताकि उपयोगकर्ता पहली नजर में पहचान सकें।

शक्ति का हो सार्थक इस्तेमाल-

    सोशल मीडिया में समरस और मानवीय समाज की रचना की शक्ति छिपी है। किंतु उसकी यह संभावना उसके इस्तेमाल करने वालों में छिपी हुयी है। इसका सही इस्तेमाल ही हमें इसके वास्तविक लाभ दिला सकता है। सामाजिक सवालों पर जागरूकता और जनचेतना के जागरण में भी यह माध्यम सहायक सिद्ध हो सकता है। आम चुनावों में राजनीतिक दलों ने इस माध्यम की ताकत को इस्तेमाल किया और समझा है। आज युवा शक्ति के इस माध्यम में बड़ी उपस्थित के चलते इसे सामाजिक बदलाव और परिवर्तन का वाहक भी माना जा रहा है। सकात्मकता से भरे-पूरे युवा और सामाजिक सोच से लैस लोग इस माध्यम से उपजी शक्ति को भारत के निर्माण में लगा सकते हैं। ऐसे समय में जब सोशल मीडिया की शक्ति का प्रगटीकरण साफ है, हमें इसके सावधान, सतर्क और समाज के लिए उपयोगी प्रयोगों की तरफ बढ़ने की जरूरत है। यदि ऐसा संभव हो सका तो सोशल मीडिया की शक्ति हमारे लोकतंत्र के लिए वरदान साबित हो सकती है। डीपफेक का सबसे बुरा शिकार अक्सर महिलाएं और प्रसिद्ध हस्तियां हो रही हैं, जिनकी तस्वीरें या वीडियो का गलत इस्तेमाल करके उनकी मानहानि या ऑनलाइन उत्पीड़न किया जाता है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा पर सीधा हमला है।

एंगेजमेंट की भूख से बढ़ता खतरा-

      सोशल मीडिया के एल्गोरिदम 'एंगेजमेंट' (व्यूज और लाइक्स) के भूखे होते हैं। झूठी और सनसनीखेज खबरें सच की तुलना में तेजी से फैलती हैं, जिससे सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का कारोबार फल-फूल रहा है। यह केवल सरकारों या टेक कंपनियों की लड़ाई नहीं है। मुख्यधारा के मीडिया और जागरूक नागरिकों को आगे आकर फेक नैरेटिव्स का खंडन करना होगा और तकनीक के सकारात्मक इस्तेमाल को बढ़ावा देते हुए एक सुरक्षित डिजिटल स्पेस का निर्माण करना होगा। पारंपरिक कहावत "आंखों देखी पर विश्वास करो" अब डिजिटल युग में दम तोड़ रही है। जब वीडियो और तस्वीरों पर से लोगों का भरोसा उठ जाता है, तो समाज में हर प्रामाणिक और सच्ची घटना पर भी शक का माहौल पैदा होने लगता है। सोशल मीडिया ने अपनी लोकप्रियता के साथ भरोसे का संकट भी खड़ा किया है, इसमें दो राय नहीं है।


सोमवार, 27 जुलाई 2026

शब्दों का सामर्थ्य और विचारों की धरोहर है 'संजय उवाच'

 

समीक्षक - डॉ. प्रदीप डहेरिया


पुस्तकः संजय उवाच (प्रो.संजय द्विवेदी के व्याख्यान)

प्रकाशक: शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, शाहदरा, दिल्ली

मूल्य- 495/- रुपए

 


      कोई भी व्याख्यान समय की रेत पर मिट जाने वाली आवाज़ हो सकते हैं, लेकिन जब वे लिपिबद्ध होकर पुस्तक का आकार लेते हैं, तो वे इतिहास के अमर दस्तावेज़ बन जाते हैं। किसी भी समाज, राष्ट्र या संगठन को सही दिशा देने में उसके नेतृत्वकर्ता के विचारों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब उन सशक्त विचारों को केवल सुना ही नहीं, बल्कि 'भाषण संग्रह' के रूप में सहेजकर एक पुस्तक का रूप दे दिया जाता है, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शिका बन जाती है। हाल ही में प्रकाशित 'संजय उवाच' नामक यह पुस्तक, जो विशिष्ट, चुनिंदा एवं प्रभावी भाषणों का संकलन है। वह वैचारिक जगत में एक अनमोल उपहार की तरह ही है। पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार, संपादक, चिंतक और मीडिया अध्यापन की दुनिया में चर्चित व्यक्तित्व प्रोफेसर संजय द्विवेदी कृत है।

      प्रो. संजय द्विवेदी मूलतः प्रिंट माध्यमों के विशेषज्ञ हैं। अपने अधिकांश मीडिया जीवन में उन्होंने मुद्रित माध्यमों में महत्वपूर्ण और सघन लेखन किया है। उनकी इस शब्द साधना का ही प्रताप है कि वे प्राकृतिक तौर पर धाराप्रवाह तमाम विषयों पर बोलते हैं। संजय जी का टेलीविजन और डिजिटल मीडिया में भी बहुत लंबा अनुभव रहा है। वे कई राष्ट्रीय चैनलों का प्रमुख चेहरा रहे हैं। इसके अलावा शैक्षणिक जीवन का भी विस्तृत और नेतृत्वकारी अनुभव उनके वक्तव्यों में प्रस्तुत होता है। उनकी इस संचित शब्द निधि से संपन्न यह पुस्तक एक अद्वितीय कृति बन जाती है। डा. संजय की जी लेखन यात्रा में कई पुस्तकें शामिल हैं। लेकिन ‘संजय उवाच’ इस मामले में अलग है कि उनके व्याख्यानों का सार इस पुस्तक में पढ़ने को मिलता है। यह उनके लिए एक उपहार है जिन लोगों ने संजय जी की मंत्रमुग्ध कर देने वाली संवाद शैली का स्वाद नहीं चखा है। उनकी बातचीत का साक्षात करने वाले अनायास ही देश, समाज, राजनीति, युवा और मीडिया आदि विषयों पर ऐसी बातें, सूचनाएं और संस्मरण पा जाते हैं जो कहीं और नहीं मिलते। और एक बात यह भी कि संजय जी जिस तरह आत्मसात करने वाली शैली में संवाद करते हैं, वह श्रोताओं को आनंदित करती है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही चुंबकीय शक्तियों से लबरेज हैं।

         'संजय उवाच, केवल कागज़ पर छपे हुए शब्द नहीं हैं, बल्कि यह उस गहरे अनुभव, संवेदनशीलता और दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण है जो डा. संजय द्विवेदी ने अपने सार्वजनिक जीवन में अर्जित किये हैं। किसी भी प्रकार के व्याख्यान की सबसे बड़ी खूबी उसका सीधा दिल तक पहुँचना होता है। इस पुस्तक में संकलित व्याख्यानों की भाषा इतनी सरल, सहज और सजीव है कि पाठक को पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो वह स्वयं सामने बैठकर वक्ता को सुन रहा हो। शब्दों का चयन और वाक्यों का प्रवाह हर वर्ग के पाठक को बांधे रखता है। इस दृष्टि से 'संजय उवाच' पुस्तक बिल्कुल फिट है। इस पुस्तक कि सबसे बड़ी ताकत इसकी विषय-वस्तु है। इसमें केवल एक ढर्रे पर बात नहीं की गई है, बल्कि सामाजिक सरोकार, राष्ट्र निर्माण, युवा प्रेरणा, संस्कृति, और वैश्विक चुनौतियों जैसे गंभीर विषयों पर बेहद व्यावहारिक और दूरदर्शी विचार प्रस्तुत किए गए हैं। प्रत्येक व्याख्यान पाठक को सोचने पर मजबूर करता है और एक नई दृष्टि देता है। आज के दौर में जहाँ चारों ओर सूचनाओं का अंबार है, वहाँ यह पुस्तक वैचारिक स्पष्टता लाती है। निराश मन में उत्साह फूंकना और युवाओं को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना इस पुस्तक का मूल स्वर है। संजय जी देश के नामी-गिरामी संवाद कार्यक्रमों में शिरकत करते रहते हैं। उनकी वाक कला के लोग कायल हैं। उनकी इस पुस्तक का हर शब्द पाठकों से सजीव संवाद करता लगता है। यह अवश्य पठनीय पुस्तक है।इसके पन्नों को पलटते हुए पाठक के भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार निश्चित ही होगा।

      प्रो. संजय द्विवेदी सरल और सहज व्यक्तित्व के स्वामी हैं। उनका अध्ययन और विषयों पर पकड़ आश्चर्यजनक है। वे पिछले लगभग तीन दशकों से निरंतर लेखन करते रहे हैं। उनके खाते में कई शानदार पुस्तकों का रिकार्ड दर्ज है। इसी तरह उनके संवाद कार्यक्रम भी देश के कोने-कोने में होते रहते हैं। ‘संजय उवाच’ को पढ़ने के बाद उनके आगामी संवाद में श्रोताओं की तादाद और बढ़ने वाली है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद हर पाठक निश्चित तौर पर उनके भाषणों को सजीव सुनने के लिए उत्सुक होने वाला है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि 'संजय उवाच' पुस्तक शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और जनसंचार के छात्रों के लिए एक बेहतरीन संदर्भ ग्रंथ एवं व्यावहारिक गाइड साबित होगी।  मैं प्रो. संजय द्विवेदी को इस पुस्तक प्रकाशन के लिए तहेदिल से बधाई देता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि वे आगे भी अपने लेख एवं भाषणों के माध्यम से समाज को दिशा देते रहेंगे।

 


 

वर्चुअल दुनिया में 'लाइक' और असली जिंदगी में सन्नाटा!

 

'हाइपर कनेक्टिविटी' के दौर में युवाओं पर गहराता अकेलापन

-प्रो. संजय द्विवेदी



    सही मायनों में मानव सभ्यता के इतिहास में दुनिया इतनी कनेक्टेड कभी नहीं थी। एक क्लिक, एक संदेश और कुछ ही सेकेंड्स में सात समंदर पार बातचीत हो जाना किसी जादुई अहसास जैसा है। मोबाइल की चौबीस घंटे चमकती स्क्रीन ने इस जादुई दुनिया को हमारी हकीकत बना दिया है। लेकिन इस तकनीकी छलांग का दूसरा पहलू बेहद डरावना है। इतिहास के इस दौर में हम 'हाइपर कनेक्टेड' तो हैं, लेकिन शायद सबसे ज्यादा अकेले भी। सोशल मीडिया के आभासी मंचों पर हमारे दोस्तों और चाहने वालों की कतार बेहद लंबी है, मगर संकट के क्षणों में सिर रखने के लिए एक वास्तविक कंधा भी मयस्सर नहीं होता। हम निरंतर 'बातचीत' की भूलभुलैया में तो उलझे हैं, किंतु आंतरिक 'संवाद' के लिए तरस रहे हैं। सिर झुकाए और स्क्रीन के कोलाहल में डूबे समाज की बेचैनियां निरंतर बढ़ रही हैं। आधुनिक विमर्श में लाखों की भीड़ के बीच अकेले होने की त्रासदी इसी को कहते हैं।

    अकेलापन इस समय की सबसे बड़ी और चिंताजनक सामाजिक परिघटना बन चुका है। एक विचारक ने ठीक ही कहा है, "दोस्तों का न होना कोई अपराध नहीं है, लेकिन खुद में अकेला हो जाना एक त्रासदी है।"  सोशल मीडिया के इस दौर ने हमें अपनी ही बनाई भीड़ ने एकाकी कर दिया है। हालात इस हद तक बदल चुके हैं कि अब वास्तविक इंसानी रिश्तों की जगह 'एआई फ्रेंड्स' (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मित्र) ले रहे हैं। मशीनें हमारी सहायक, मार्गदर्शक और दोस्त बन रही हैं। मेरे जैसे मीडिया शिक्षक के लिए यह तथ्य रेखांकित करना बेहद पीड़ादायक है कि क्लासरूम में स्मार्टफोन की स्क्रीन पर चमकती युवा आँखें, फोन जेब में जाते ही एक अजीब से सन्नाटे और सामाजिक संकोच से घिर जाती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी पहचान और व्यक्तित्व का निर्माण अब वास्तविक समाज नहीं, बल्कि यह पाँच इंच की स्क्रीन कर रही है। सच तो यह है कि आज के युवाओं का एकांत भी शांत नहीं है, वह आभासी कोलाहल से भरा हुआ है।

       नए समय की माँग के अनुसार सोशल मीडिया पर उपस्थिति को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। तकनीक ने इस माध्यम को मोबाइल के जरिए हर हाथ और हर जेब तक पहुँचाया है। सोशल मीडिया पर मिलने वाले 'लाइक' और 'कमेंट्स' हमारे मस्तिष्क में तात्कालिक खुशी का संचार करते हैं। डिजिटल मंचों पर विचरते लोग इस आभासी प्रशंसा के आदी हो चुके हैं। यह क्षणिक खुशी एक नशे की तरह काम करती है। दिनभर लगातार पोस्ट करते, रील्स देखते और प्रतिक्रियाएं देते लोग अनजाने में ही इस माध्यम के गहरे चंगुल में फंस जाते हैं। 'डोपामाइन' का यह मायाजाल आज हमारे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है।

     डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अमूमन चमकती हुई चीजें ही परोसी जाती हैं। लोग अपनी सुनहरी यादों, सफलताओं और सबसे खूबसूरत पलों को ही यहाँ साझा करते हैं। सोशल मीडिया पर परोसी जा रही इस 'चमकीली जिंदगी' (रील्स, वेकेशन, महँगी पार्टियां) को देखकर सामान्य पृष्ठभूमि का युवा अपनी साधारण वास्तविक जिंदगी की तुलना उनकी 'रील्ड लाइफ' से करने लगता है। यह तुलना अंततः उसे हीनभावना की ओर धकेल देती है, जिससे 'तुलना का अवसाद' पैदा होता है। पूर्ववर्ती दौर में युवा फिल्मों से सीखते थे, लेकिन तब महीनों में कोई एक फिल्म आती थी जिसका प्रभाव लंबे समय तक रहता था। अब रील्स के दौर में यह मानसिक बमबारी हर सेकंड जारी है।

     हमें 'बातचीत' और 'संवाद' के बुनियादी अंतर को समझना होगा। आँखों में आँखें डालकर की जाने वाली आत्मीय बातचीत के बजाय लोग अब केवल मोबाइल स्कॉलिंग में उलझे हैं। यात्राओं, सार्वजनिक स्थानों, पार्कों और यहाँ तक कि कॉलेजों के कैम्पस में भी लोग आपस में बतियाने के बजाय सिर झुकाए स्क्रीन निहारते दिखते हैं। मोबाइल द्वारा दिए गए इस एकाकीपन ने हमारी संवादात्मक क्षमता को गंभीर रूप से पंगु बना दिया है। जिन भावनाओं को शब्दों में बयां किया जाना चाहिए था, उन्हें अब 'इमोजी', 'शॉर्ट्स' और 'टेक्स्ट' के छोटे टुकड़ों में समेटा जा रहा है। इसके कारण युवा पीढ़ी में वास्तविक सामाजिक कौशल तेजी से लुप्त हो रहे हैं। संवादहीनता के कारण मन की वास्तविक आकांक्षाएं अधूरी रह जाती हैं और हम एक ऐसे उदासीन समाज में तब्दील हो रहे हैं, जिसे स्क्रीन पर गुस्सा जाहिर करना तो आता है, लेकिन वास्तविक जीवन में प्रेम और करुणा व्यक्त करना नहीं।

     अकेलापन अब सिर्फ किसी व्यक्ति का निजी मामला या भावनात्मक उदासी नहीं रह गया है; यह एक गंभीर वैश्विक संकट का रूप ले चुका है। यह संकट इतना गहरा है कि इससे मानसिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी घातक चुनौतियाँ मिल रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा गठित 'सोशल कनेक्शन कमीशन' की महत्वपूर्ण रिपोर्ट इस बात पर विशेष प्रकाश डालती है कि सामाजिक अलगाव और अकेलापन दुनिया भर में एक मूक महामारी की तरह फैल रहे हैं, जिनका समाज पर गहरा लेकिन अनदेखा प्रभाव पड़ रहा है। नवीनतम वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर यह रिपोर्ट तत्काल वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देती है। आयोग के निष्कर्ष बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर हर छह में से एक युवा इस समय गंभीर अकेलेपन का अनुभव कर रहा है।

     विभिन्न शोध रिपोर्ट्स के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय युवा प्रतिदिन औसतन 4 से 5 घंटे स्मार्टफोन की स्क्रीन को दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय रहने वाले हर पाँच में से दो युवा (लगभग 40 प्रतिशत) किसी न किसी स्तर पर अकेलेपन या एंग्जायटी (घबराहट) का सामना कर रहे हैं। स्क्रीन-टाइम के इस अनियंत्रित फैलाव के कारण युवाओं में अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और 'नोमोफोबिया' (मोबाइल से दूर होने का डर) में करीब 30 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आए दिन ऐसी खबरें सामने आती हैं जहाँ माता-पिता द्वारा फोन छीन लिए जाने पर बच्चों ने आत्मघाती कदम उठा लिए या घर छोड़ दिया।

       यह समस्या केवल सामान्य पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं है; देश के सबसे तेज और तकनीकी रूप से उन्नत दिमाग वाले छात्र भी इस डिजिटल अकेलेपन और 'परफॉर्मेंस प्रेशर' के चक्रव्यूह में फंसे हैं। 'आईआईटी बॉम्बे' के 'स्टूडेंट वेलनेस सेंटर' (काउंसिलिंग सेल) ने छात्रों में सोशल मीडिया जनित अवसाद के गंभीर लक्षण दर्ज किए हैं। हालांकि, इसके सकारात्मक समाधान के रूप में छात्रों ने खुद परिसरों में 'डिजिटल डिटॉक्स' और 'नो गैजेट नाइट्स' जैसे जमीनी अभियानों की शुरुआत की है। इन अभियानों के तहत छात्र सप्ताह में एक शाम अपना फोन कमरों में छोड़कर केवल आपस में बातचीत करने, खेलने और कलात्मक गतिविधियों के लिए मैदानों में इकट्ठा होते हैं। यह अनूठी पहल साबित करती है कि तकनीक का कोई भी एल्गोरिदम कभी भी जीवंत इंसानी जुड़ाव का विकल्प नहीं बन सकता।

      इस चुनौतीपूर्ण समय में हम तकनीक या सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की वकालत नहीं कर सकते, क्योंकि मोबाइल विहीन आधुनिक जीवन की कल्पना अब असंभव है। समाधान पूरी तरह से तकनीक को छोड़ना नहीं, बल्कि 'डिजिटल हाइजीन' को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना है। हमें सजगता से अपने स्क्रीन टाइम को घटाकर 'ग्रीन टाइम' (प्रकृति, परिवार और वास्तविक मित्रों के साथ बिताया जाने वाला समय) को बढ़ाना होगा।

        अगली बार जब हम किसी कैफ़े, मेट्रो या ड्राइंग रूम में बैठें, तो इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में खोने के बजाय, अपने सामने उपस्थित व्यक्ति की बात को पूरी आत्मीयता से सुनें। समाज, संस्कृति और मनुष्यता को जिंदा रखने के लिए हमें इंसानों की संवेदनशीलता की ज़रूरत है, मशीनी एल्गोरिदम की नहीं। मनुष्य का जीवन अनमोल है, किंतु हमारी मनुष्यता उससे भी बड़ी है। मानव और अन्य जीवों के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि हमने भाषाएं विकसित कीं, बातचीत से संवाद की यात्रा तय की और कलाओं के माध्यम से संचार का मानवीय दायरा बढ़ाया। तकनीक को हमारा सहयोगी होना चाहिए था, संचालक नहीं। समय आ गया है कि हम अपनी वास्तविक खुशियों और आंतरिक आनंद को बचाए रखने के लिए तकनीक को वापस सहायक की भूमिका में लाएं, न कि उसे अपनी चेतना का नियंता बनने दें।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)