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सोमवार, 19 अगस्त 2019

सचमुच एक असंभव संभावना हैं गांधी!


महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती वर्ष प्रसंग

-    प्रो. संजय द्विवेदी


     इतिहासकार सुधीर चंद्र की किताब गांधी एक असंभव संभावना को पढ़ते हुए इस किताब के शीर्षक ने सर्वाधिक प्रभावित किया। यह शीर्षक कई अर्थ लिए हुए है, जिसे इस किताब को पढ़कर ही समझा जा सकता है। 184 पृष्ठों की यह किताब गांधी के बेहद लाचार, बेचारे, विवश हो जाने और उस विवशता में भी अपने सत्य के लिए जूझते रहने की कहानी है।
     जाहिर तौर पर यह किताब गांधी की जिंदगी के आखिरी दिनों की कहानी बयां करती है। इसमें असंभव संभावना शब्द कई तरह के अर्थ खोलता है। गांधी तो उनमें प्रथम हैं ही, तो भारत-पाकिस्तान के रिश्ते भी उसके साथ संयुक्त हैं। ऐसे में यह मान लेने का मन करता है कि भारत-पाक रिश्ते भी एक असंभव संभावना हैं? सामान्य मनुष्य इसे मान भी ले किंतु अगर गांधी भी मान लेते तो वे गांधी क्यों होते? प्रत्येक विपरीत स्थिति और झंझावातों में भी अपने सच के साथ रहने और खड़े होने का नाम ही तो गांधीहै।
     आजादी के मिलने के कुछ समय पहले गांधी के निरंतर कमजोर और अकेले होते जाने की कहानी को जिस खूबसूरती से यह किताब बयां करती है, उसकी दूसरी नजीर नहीं है। अपने प्रार्थना प्रवचनों में गांधी ने खुद को खोलकर रख दिया है। वे सत्य को फिर से पारिभाषित नहीं करते, उसे यथारूप ही रखते हैं। इस पूरी किताब में गांधी के मन और देश में चल रही हलचलों का बयान दिखता है। हिंदू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान, कांग्रेस-मुस्लिम लीग की सत्ता राजनीति के बीच अकेले और तन्हा गांधी। गांधी पूरी जिंदगी सामूहिकता को साधते रहे और उनका भरोसा अपने समाज पर बना रहा। किंतु आजादी को निकट आता देख यह समाज जिस तरह बंटा उसे देखकर वे हैरत में थे। सही मायने में यह समाज अब भीड़ या अपने-अपने पंथों की जकड़बंदियों में कैद हो चुका था। गांधी इसलिए कई बार बहुत कातर दिखते हैं, कमजोर दिखते हैं। किंतु सत्य और इंसानियत में उनकी आस्था अविचल है। अपने उपवास और रोजों से वे सोते तथा भटके हुए समाज को फिर से उसी राह पर लाना चाहते हैं, जहां इंसानियत और भाईचारा सबसे अहम है। कई लोग मानते हैं कि गांधी ने बंटवारा स्वीकार कर लिया था, सच्चाई यह है कि बंटवारे को उन्होंने कभी मन से नहीं स्वीकारा। स्वीकारा इसलिए कि कम से कम रिश्ते तो बचे रहें। अफसोस समय के साथ अब जब हम देखते हैं तो भारत-पाक रिश्ते भी अब एक अंसभव संभावना ही दिखने लगे हैं। बल्कि घृणा की राजनीति ही लंबे समय से दोनों देशों की राजनीति का मूल स्वर रही है। पाकिस्तान और हिंदुस्तान में चुनाव भी इन्हीं नफरतों की हवाओं पर सवार होकर जीते जाते रहे हैं। कई युद्ध लड़कर और निरंतर अपरोक्ष युद्ध लड़कर पाकिस्तान ने इस जहर को और पुख्ता किया है। 7मई,1947 को जब कांग्रेस लगभग बंटवारे का फैसला कर चुकी थी तब गांधी ने शाम को कहा- जिन्ना साहब पाकिस्तान चाहते हैं। कांग्रेस ने भी तय कर लिया है कि पाकिस्तान की मांग पूरी की जाए... लेकिन मैं तो पाकिस्तान किसी भी तरह मंजूर नहीं कर सकता। देश के टुकड़े होने की बात बर्दाश्त ही नहीं होती।  ऐसी बहुत सी बातें होती रहती हैं जिन्हें मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता, फिर भी वे रूकती नहीं, होती ही हैं। पर यहां बर्दाश्त नहीं हो सकने का मतलब यह है कि मैं उसमें शरीक नहीं होना चाहता, यानी मैं इस बात में उनके बस में आने वाला नहीं हूं।... मैं किसी एक पक्ष का प्रतिनिधि बनकर बात नहीं कर सकता। मैं सबका प्रतिनिधि हूं।.. मैं पाकिस्तान बनने में हाथ नहीं बंटा सकता। गांधी का मनोगत बहुत स्पष्ट है किंतु हालात ने उन्हें विवश कर दिया था। वे न तो बंटवारा रोक पाते हैं न ही आजादी के जश्न के पहले जगह-जगह हो रही सांप्रदायिक हिंसा। नोवाखली के दंगों के बाद कोलकाता, बिहार और फिर पंजाब। सांप्रदायिक हिंसा के विरूद्ध सबसे प्रखर आवाज के पास अब उपवास के सिवा क्या था?
    दूसरा संकट यह था कि गांधी नोवाखली में हिंदुओं के नरसंहार से दुखी होकर जब वहां पहुंचते तो मुसलमानों को बुरा लगता कि वे कोलकाता में मुसलमानों के लिए क्यों नहीं पहुंचते? जब वे कोलकाता में मुसलमानों की मदद में उतरते तो हिंदू उन्हें कोसते। ऐसे में गांधी चौतरफा आलोचना के शिकार थे। उनके साथी रहे कांग्रेस जन और राजनेता भी उनके इन देश व्यापी प्रवासों और उपवासों में कोई शांति-संभावनादेखने के बजाए संकट ही देखते थे। ऐसे कठिन समय में गांधी को समझना और कठिन हो गया था। गांधी की बेचारगी यही है कि उन्हें आज तक सही अर्थों में समझा नहीं गया। वे अपने प्रति बनी गहरी नामसझी को लेकर ही विदा हुए। उन्हें लोग देवता का दर्जा तो दे बैठे थे किंतु उनके देवत्व से एक सचेतन दूरी बनाए रखना चाहते थे। शायद इसलिए कि तत्कालीन राजनीति की भाषा से गांधी कदमताल करने के तैयार नहीं थे।वे इसीलिए सत्ता का आरोहण नहीं करते, राजपथ नहीं चुनते क्योंकि उनका समाज पर भरोसा था। वे समाज की शक्ति को जगाना चाहते थे, जिसने उन्हें महात्मा बनाया था। किंतु इस दौर में वह समाज भी कहां बचा था, एक गहरा बंटवारा जो सिर्फ भूगोल का नहीं था, मन का भी था। गांधी की रूहानी शक्ति इस दुनियावी रोग के सामने बेबस थी। यह वही समय था जब गांधी को मंत्रमुग्ध सुनने वाला देश और समाज उनसे सवाल करने लगा था। लोग उनके मुंह पर कहने लगे थे कि आप मर क्यों नहीं जाते? उनसे पूछा जाने लगा किः आपने चार-पांच दिन इतनी लंबी-लंबी बातें बनाई कि हम एक इंच भी पाकिस्तान मजबूरी से देना नहीं चाहते, बुद्धि से ह्दय को जाग्रत करके भले ही जो चाहें सो लें, लेकिन वह तो बन गया। अब आप इसके खिलाफ अनशन क्यों नहीं करते?”  उनसे यह भी पूछा गया- आप कांग्रेस के बागी क्यों नहीं बनते और उसके गुलाम क्यों बने हैं? आप उसके खादिम कैसे रह सकते हैं ?अब आप अनशन करके मर क्यों नहीं जाते?” महात्मा जी ने ये सारी बातें खुद 5 जून,1947 को अपने प्रार्थना प्रवचन में बतायीं। खुद पर बरसते सवालों से वे अविचल थे। अपनी आलोचना और निंदा को वे खुद अपने प्रवचनों में वे बताते और अपने उत्तर भी देते। किंतु उस समय गांधी को सुनने, समझने का धीरज तत्कालीन राजनीति और समाज दोनों खो चुके थे। अपने समय को पहचानने की जो अद्भुत क्षमता गांधी में थी उसी के चलते वे कह पाएः बंटवारे से तो हम आज बच नहीं सकते चाहे वह हमें कितना ही नापंसद हो।सच कहें तो गांधी का सबसे बड़ा दर्द यही है कि उन्हें समझा नहीं गया और आज भी उनकी रेंज को समझने वाला मन हमारे पास कहां है? एक राष्ट्रपिता की इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है जो समाज और राजनीति उनके पीछे चली, उनके इशारों पर चली वही आज उन्हें अप्रासंगिक तथा अनुपयोगी मान रही थी। गांधी अपने आखिरी दिनों में इतने कातर इसलिए भी थे, उनके अपने भी उनका साथ छोड़ चुके थे, या उन्हें अनसुना कर रहे थे। वे इस बात को समझ गए थे। इसीलिए अनेक मौकों पर आजमाए जा चुके अपने अमोध अस्त्र आमरण अनशन का इस्तेमाल भी वे नहीं करते। उनका मानना था इससे बंटवारा रूक भी गया तो मनों में पाकिस्तान बन जाएगा जो ज्यादा खतरनाक होगा। इसलिए भूगोल बंटने के बाद भी रिश्ते बने रहें, मन मिले रहें उसकी कोशिश वे आखिरी सांस तक करते रहे।  वे बहुत साफ कहते हैःजब मैंने कहा था कि हिंदुस्तान के दो भाग नहीं करने चाहिए तो उस वक्त मुझे विश्वास था कि आम जनता की राय मेरे पक्ष में है; लेकिन जब आम राय मेरे साथ न हो तो क्या मुझे अपनी राय जबरदस्ती लोगों के  गले मढ़नी चाहिए?”
      देश के बंटवारे के बाद गांधी चाहते तो एक निष्क्रिय बुजुर्ग की आदर्श भूमिका निभाते हुए चैन से रह सकते थे। उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य आजादी हासिल हो चुका था। किंतु वे स्वराज के लिए सक्रिय थे। शायद वे देश और उसकी सरकार के कार्य संचालन में कुछ बेहद जमीनी सुधार के सुझाव दे पाते किंतु आजादी मिलते ही उनके सामने हिंदु-मुस्लिम सद्भाव का प्रश्न बहुत विकराल बनकर खड़ा हो गया। दंगे, मारपीट, आगजनी, स्त्रियों से दुर्व्यवहार की खबरों से उनका मन रोज रो पड़ता। वे अकेले और विवश होने के बाद भी इस कठिन समय में अपने हस्तक्षेप से शांति और सद्भाव का संचार करते हैं। सांप्रदायिक तत्वों को विवश करते हैं कि वे राष्ट्र की मुख्यधारा में साथ आएं और अपनी जहरीली राजनीति से बाज आएं। तत्कालीन सरकार को पाकिस्तान के बचे 55 करोड़ रूपए देने के लिए मजबूर कर देते हैं। उनका नैतिक बल अक्सर भारी पड़ता है। किंतु अब उनकी जिद और हठ से उनके अपने लोग भी उनसे बचने लगे थे। गांधी की जिद क्या थी- सद्भावना, एकता, सौहार्द्र, भाईचारा, अहिंसा। शायद वे इसीलिए कहते हैः मैं जानता हूं न तो पाकिस्तान नरक है न ही हिंदुस्तान नरक है। हम चाहें तो उन्हें स्वर्ग बना सकते हैं और अपने कामों से नरक भी बना सकते हैं और जब दोनों नरक जैसे बन गए तो उसमें फिर आजाद इनसान तो रह ही नहीं सकता। पीछे हमारे नसीब में गुलामी ही लिखी है। यह चीज मुझको खा जाती है। मेरा ह्दय कांप उठता है कि इस हालत में किस हिंदू को समझाऊंगा,किस सिख को समझाऊंगा, किस मुसलमान को समझाऊंगा।
   गांधी इस पीड़ा को लिए ही विदा हुए। आप देखें तो इस बात के सात दशक पूरे हो चुके हैं। बंटवारा और गहरा हुआ है। सिर्फ गांधी ही नहीं, भारत-पाक रिश्ते भी अब एक असंभव संभावना दिखने लगे हैं। गांधी की त्रासदी यह है कि वे 32 वर्षों तक जिस हिंदुस्तान के लिए अंग्रेजों से लड़ते रहे, उस आजाद देश में वे मात्र पांच महीने(169 दिन) जिंदा रह सके। गांधी को भूलने का, गांधी को न समझने का, भारत को न समझने का यही फल है। एक न समझे जाने वाले नायक गांधी- जिनकी हमने असंख्य मूर्तियां बनाईं, उनके नाम पर संस्थाएं बनाईं, गांधी रोड बनाए, नगर बनाए, नोटों पर उन्हें छापा,विश्वविद्यालय बनाए किंतु यह सब कुछ हमारी गहरी नासमझी के चलते बेमतलब है। अपनी हत्या से कुछ दिन पहले गांधी ने कहाः मैं तो आज कल का ही मेहमान हूं। कुछ दिनों में यहां से चला जाऊंगा। पीछे आप याद किया करोगे कि बूढ़ा जो कहता था वह सही बात है।


पुस्तक संदर्भः गांधी एक अंसभव संभावनाः सुधीर चंद्र,
मूल्यः199, पृष्ठः184
राजकमल पेपरबैक्स,1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
दरियागंज, नई दिल्ली-110002

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग में प्रोफेसर हैं।)
संपर्कः प्रो. संजय द्विवेदी,
जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय,
बी-38, विकास भवन, प्रेस कांप्लेक्स, महाराणा प्रताप नगर, भोपाल-462011 (मप्र)
मोबाइलः 9893598888, ई-मेलः 123dwivedi@gmail.com

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

क्या आप इस नरेंद्र मोदी को जानते थे !

-संजय द्विवेदी

  एक हफ्ते में मीडिया और एनडीए सांसदों से संवाद करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस प्रचार की भी हवा निकालने की कोशिश की है कि वे संवाद नहीं करते या बातचीत से भागना चाहते हैं। एक अधिनायकवादी फ्रेम में उन्हें जकड़ने की कोशिशें उनके विरोधी करते रहे हैं और नरेंद्र मोदी हर बार उन्हें गलत साबित करते रहे हैं। लक्ष्य को लेकर उनका समर्पण, काम को लेकर दीवानगी उन्हें एक वर्कोहलिक मनुष्य के नाते स्थापित करती है। काम करने वाला ही उनके आसपास ठहर सकता है। एक वातावरण जो ठहराव का था, आराम से काम करने की सरकारी शैली का था, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तोड़ने की कोशिश की है। सरकार भी आराम की नहीं, काम की चीज हो सकती है, यह वे स्थापित करना चाहते हैं।
  वे जानते हैं कि नए समय की चुनौतियों विकराल हैं। ऐसे में लिजलिजेपन,अकर्मण्यता या सिर्फ नारों और हुंकारों से काम नहीं चल सकता। वे भारत की जनाकांक्षाओं को समझने की निरंतर कोशिश कर रहे हैं और यही आग अपने मंत्रियों और सांसदों में फूंकना चाहते हैं। इसलिए बड़े लक्ष्यों के साथ, छोटे लक्ष्य भी रख रहे हैं। जैसे सांसदों से उन्होंने एक गांव गोद लेने का आग्रह किया है। समाज के हर वर्ग से सफाई अभियान में जुटने का वादा मांगा है। ये बातें बताती हैं कि वे सरकार के भरोसे बैठने के बजाए लोकतंत्र को जनभागीदारी से सार्थक करना चाहते हैं। नरेंद्र मोदी को पता है कि जनता ने उन्हें यूं ही बहुमत देकर राजसत्ता नहीं दी है। यह सत्ता का स्थानांतरण मात्र नहीं है। यह राजनीतिक शैली, व्यवस्था और परंपरा का भी स्थानांतरण है। एक खास शैली की राजनीति से उबी हुयी जनता की यह प्रतिक्रिया थी, जिसने मोदी को कांटों का ताज पहनाया है। इसलिए वे न आराम कर रहे हैं, न करने दे रहे हैं। उन्हें पता है कि आराम के मायने क्या होते हैं। आखिर दस साल की नेतृत्वहीनता के बाद वे अगर सक्रियता, सौजन्यता और सहभाग की बातें कर पा रहे  हैं तो यह जनादेश उनके साथ संयुक्त है। उन्हें जनादेश शासन करने भर के लिए नहीं, बदलाव लाने के लिए भी मिला है। इसलिए वे ठहरे हुए पानी को मथ रहे हैं। इसे आप समुद्र मंथन भी कह सकते हैं। इसमें अमृत और विष दोनों निकल रहे हैं। इस अमृत पर अधिकार कर्मठ लोगों, सजग देशवासियों को मिले यह उनकी चिंता के केंद्र में है। एक साधारण परिवेश से असाधारण परिस्थितियों को पार करते हुए उनका सात-रेसकोर्स रोड तक पहुंच जाना बहुत आसान बात नहीं है। नियति और भाग्य को मानने वाले भी मानेंगें कि उन्हें किसी खास कारण ने वहां तक पहुंचाया है। यानि उनका दिल्ली आना एक असाधारण घटना है। मनमोहन सिंह की दूसरी पारी की सरकार का हर मोर्चे पर विफल होना, देश में निराशा का एक घना अंधकार भर जाना, ऐसे में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों से पूरे देश में एक आलोड़न और बदलाव की आग का फैल जाना, तब मोदी का अवतरण और जनता का उनके साथ आना यह घटनाएं बताती हैं कि कैसे चीजें बदलती और आकार लेती हैं। राजनीति की साधारण समझ रखने वाले भी इन घटनाओं और प्रसंगों को जोड़कर एक कोलाज बना सकते हैं। यानि वे उम्मीदों का चेहरा हैं, आशाओं का चेहरा हैं और समस्याओं का समाधान करने वाले नायक सरीखे दिखते हैं। नरेंद्र मोदी में इतिहास के इस मोड़ पर महानायक बन जाने की संभावना भी छिपी हुयी है। आप देखें चुनावों के बाद वे किस तरह एक देश के नेता के नाते व्यवहार कर रहे हैं। चुनावों तक वे गुजरात और उसकी कहानियों में उलझे थे। अब वे एक नई लकीर खींच रहे हैं। गुजरात तक की उनकी यात्रा में सरदार पटेल की छवि साथ थी, अब वे महात्मा गांधी, पंडित नेहरू और इंदिराजी की याद ही नहीं कर रहे हैं। उनकी सरकार तो गजल गायिका बेगम अख्तर की जन्मशताब्दी मनाने भी जा रही है।  एक देश के नेता की देहभाषा, उसका संस्कार, वाणी,  सारा कुछ मोदी ने अंगीकार किया है।

   अपनी छवि के विपरीत अब वे लोगों को साधारण बातों का श्रेय दे रहे हैं। जैसे देश के विकास के लिए वे सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों को श्रेय देते हैं, स्वच्छता अभियान के उनके प्रयासों में शामिल मीडिया के लोगों, लेखकों से लेकर कांग्रेस सांसद शशि थरूर को श्रेय देना वे नहीं भूलते। वे अपने सांसदों और अपनी सरकार को अपने सपनों से जोड़ना चाहते हैं। आखिर इसमें गलत क्या है? सरकार कैसे चल रही है, इसे जानने का हक देश की जनता और सांसदों दोनों को है। दीवाली मिलन के बहाने इसलिए प्रमुख मंत्री, राजग के सांसदों को सामने प्रस्तुति देते हैं। यह घटनाएं नई भले हों पर संकेतक हैं कि प्रधानमंत्री चाहते क्या हैं। दीपावली मिलन पर मीडिया से संवाद से वे भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में करते हैं, इसका भी एक संदेश है। वे चाहते तो मीडिया को सात रेसकोर्स भी बुला सकते थे। किंतु वे बताना चाहते हैं कि संगठन क्या है और उसकी जरूरतें अभी और कभी भी उन्हें पड़ेगी। अमित शाह के रूप में दल को एक ऐसा अध्यक्ष मिला है जो न सिर्फ सपने देखना जानता है बल्कि उन्हें उसमें रंग भरना भी आता है। उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र और हरियाणा की कहानियां बताती हैं कि वे कैसे रणनीति को जमीन पर उतारना जानते हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह  का लंबा साथ रहा है। सत्ता और संगठन की यह जुगलबंदी सफलता की अनेक कथाएं रचने को उत्सुक हैं। भाजपा का पीढ़ीगत परिवर्तन का कार्यक्रम न सिर्फ सफल रहा बल्कि समय पर परिणाम देता हुआ भी दिख रहा है। देखना है कि सत्ता के मोर्चे पर प्रारंभ में उम्मीदों का नया क्षितिज बना रहे मोदी आने वाले समय में देश को परिणामों के रूप में क्या दे पाते हैं? देश की जनता उन्हें जहां उम्मीदों से देख रही है, वहीं उनके विरोधी चौकस तरीके से उनके प्रत्येक कदम पर नजर रखे हुए हैं। दरअसल यही लोकतंत्र का सौंदर्य है और उसकी ताकत भी। सच तो यह है कि आज देश में नरेंद्र मोदी के कट्टर आलोचक रहे लोग भी भौचक होकर उनकी तरफ देख रहे हैं। उनकी कार्यशैली और अंदाज की आलोचना के लिए उनको मुद्दे नहीं मिल रहे हैं। लोकसभा चुनावों के पूर्व हो रहे विश्लेषणों, अखबारों में छप रहे लेखों को याद कीजिए। क्या उसमें मोदी का आज का अक्स दिखता था। उनकी आलोचना के सारे तीर आज व्यर्थ साबित हो रहे हैं। उन्हें जो-जो कहा गया वो वैसे कहां दिख रहे हैं। गुजरात के चश्मे से मोदी को देखने वालों को एक नए चश्मे से उन्हें देखना होगा। यह नया मोदी है जो श्रीनगर जाने के लिए दिल्ली से निकलता है तो सियाचिन में सैनिकों के बीच दिखता है। यह वो प्रधानमंत्री है जो दीवाली का त्यौहार दिल्ली या अहमदाबाद में नहीं, श्रीनगर में बाढ़ पीड़ितों के बीच मनाता है। मोदी की इस चौंकाऊ राजनीतिक शैली पर आप क्या कह सकते हैं। वे सही मायने में देश में राष्ट्रवाद को पुर्नपरिभाषित कर रहे हैं। वे ही हैं जो लोगों के दिल में उतर कर उनकी ही बात कर रहे हैं। देश ने पिछले 12 सालों में मीडिया के माध्यम जिस नरेंद्र मोदी को जाना और समझा अब वही देश एक नए नरेंद्र मोदी को देखकर मुग्ध है। दरअसल मोदी वही हैं नजरिया और जगहें बदल गयी हैं। उनकी राजनीतिक सफलताओं ने सारे गणित बदल दिए हैं।  राजनीतिक विरोधियों की इस बेबसी पर आप मुस्करा सकते हैं। भारतीय राजनीति सही मायने में एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, इसके फलितार्थ क्या होंगें कह पाना कठिन है किंतु देश तेजी से दो ध्रुवीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है इसमें दो राय नहीं है। संकट यह है कि कांग्रेस राजनीति का दूसरा ध्रुव बनने की महात्वाकांक्षा से आज भी खाली है।

सोमवार, 5 मई 2014

उन्हें भरोसा नहीं है मतदाताओं के विवेक पर

-संजय द्विवेदी


     भारतीय लोकतंत्र इस बार एक ऐसे चुनाव से मुकाबिल है, जिसकी मिसाल खोजे नहीं मिलेगी। भाषा और वाणी के स्तर पर गिरावट सिर्फ राजनेताओं में होती तो चल जाता। इस बार लेखक समुदाय, पत्रकारों और स्तंभ लेखकों की वाणी भी जरूरत से ज्यादा बहकी हुयी है। निष्पक्ष विश्वेषण क्या होता है, इसे खोजना दुर्लभ है। पहली बार ऐसा हो रहा है, जब मतदाता के विवेक पर भी सवाल उठाया जा रहा है। लोग नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने पर देश छोड़ने को तैयार बैठै हैं। कांग्रेस के पिछले दस साल के कुशासन और भ्रष्टाचार ही नहीं वरन् आपातकाल के बुरे दिनों में भी जिन्होंने देश नहीं छोड़ा, वे अब देश छोड़ने की धमकियों से साथ जनमत को प्रभावित करना चाहते हैं।
 काशी के एक बड़े लेखक ने एक साक्षात्कार में कहा कि मोदी जीते तो काशी हार जाएगी। तमाम लेखकों को बहुत गंभीरता से इन दिनों पढ़ता रहा, वे सब एक व्यक्ति के खिलाफ यूं डटे हैं जैसे उन्होंने सुपारी ले रखी हो। लेखों में तर्क-गंभीर विश्लेषण के बजाए ऐसे तथ्य हैं, जिसका सत्य से वास्ता नहीं है। आखिर देश के लेखक, विचारक और बुद्धिजीवी अगर इस तरह जनता की आंखों में धूल झोंकने पर आमादा हों तो सत्य कहां बचेगा। मुद्दों पर चयनित दृष्टिकोण और अपने तयशुदा निष्कर्षों के आधार पर लेखन क्या कलम की गरिमा को कम नहीं करता? आज लालूप्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव के सारे पाप कम हो गए और वर्तमान प्रधानमंत्री की कहीं चर्चा ही नहीं हो रही है।गुजरात माडल निशाने पर है किंतु तीन दशक के वाममोर्चा के बंगाल माडल पर चर्चा नहीं हो रही है। साथ ही कांग्रेस के 10 सालों के शासनकाल पर चर्चा के बजाए उस गुजरात पर बातचीत हो रही है, जहां पांचवीं बार लगातार भाजपा की सरकार बनी है। यही घटना जब पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा के लिए घटती थी तो जनादेश कही जाती थी और भाजपा या मोदी के पक्ष में जनता खड़ी हो गयी तो वह सांप्रदायिक है।
   सांप्रदायिक दंगे आजाद भारत के इतिहास की बुरी और कड़वी सच्चाईयां हैं। बल्कि महात्मा गांधी, पं. नेहरू,सरदार पटेल जैसी विभूतियों की उपस्थिति के बावजूद हम हिंसा को रोक नहीं पाए। लाखों लोगों की लाशों पर देश का बंटवारा हुआ। सेकुलर निजाम के झंडाबरदारों को हिंदुओं से खाली हुयी कश्मीर घाटी नहीं दिखी और हाल के दौर में उप्र में लगातार हुए दंगें हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं। गुजरात में पिछले 12 सालों से दंगे न होना कोई उदाहरण नहीं है, बल्कि असम में हुयी हिंसा के लिए भी गुजरात के मुख्यमंत्री को दोषी ठहराया जा रहा है। अपने राज्यों में कानून-व्यवस्था और शांति स्थापित करने में विफल राजनैतिक दल क्या अब गलत तथ्यों के आधार पर लोगों को गुमराह करेंगे। असम में जो आग सुलग रही है उसके लिए हमारी नीतियां, घुसपैठ, जनसांख्यकीय असंतुलन और स्थानीय कारकों के बजाए गुजरात के मुख्यमंत्री को दोषी बताना कहां का न्याय है? आखिर वे कौन लोग हैं जो दलों को वोट देने के आधार पर आपके सच्चे मुसलमान होने या न होने की बात कर रहे हैं? सांप्रदायिक राजनीति, दंगे और तोड़ने वाली भाषा किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है। किंतु जोड़ने की बात करने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। जहरीली भाषा से जहर कम नहीं होगा और बढ़ेगा। कसाई, जल्लाद, हत्यारा जैसी भाषा बोलकर हम अपने लोकतंत्र का अपमान ही कर रहे हैं। असहमति से लोकतंत्र का सौंदर्य ही बढ़ता है किंतु भाषा का क्षरण रोकना भी हमारी बड़ी जिम्मेदारी है। देश के बुद्धिजीवी वर्गों को भी देश के नागरिकों का सही दिशाबोध करना चाहिए किंतु वे भी इस राजनीति में एक पक्ष सरीखा व्यवहार कर रहे हैं। नागरिकों को दिशाबोध करने के बजाए वे स्वयं भड़काऊ भाषा में लेखन करते हुए ऐसा व्यवहार कर रहे हैं, जैसै नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री हो जाने से आसमान फट जाएगा। आज हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि जहां पहले लोग भरोसा करते थे कि जनता सही फैसला करेगी और जनता ही जर्नादन है। वहां हम देख रहे हैं अब जनता को कोसने का क्रम जारी है। अपने लेखों, भाषणों के माध्यम से जनता को मार्गदर्शन करने के बजाए उस पर शक और अविश्वास किया जा रहा है। ऐसा लगता है, जैसै जनता का अपना कोई विवेक न हो और वह अपना अच्छा- बुरा न समझती हो। हमें भरोसा रखना चाहिए कि जनता अंततः समाज की सामूहिक शक्ति को तोड़ने और उसका भरोसा तोड़ने वालों के खिलाफ निर्णय लेना जानती है।
     यह जनता का विवेक ही था कि उसने कई राज्यों में भाजपा को विधानसभा में प्रचंड बहुमत देने के बावजूद केंद्रीय चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया और कांग्रेस को सीटें दीं। आज केंद्रीय सत्ता के लिए एक कद्दावर नेता के मैदान में उतरने के बाद अगर जनता को लगता है कि राजग या भाजपा एक विकल्प बना है तो वह उसके साथ खड़ी दिख रही है तो इसमें आपत्ति क्या है? सच तो यह है कि कांग्रेस सरकार के कुशासन के खिलाफ विकल्प देने के बजाए सभी राजनीतिक दल सिर्फ मोदी विरोध की राजनीति करते रहे और यही कारण है कि वे आज हाशिए पर हैं। बिहार से मोदी विरोध का जो बिगुल नीतिश कुमार ने बजाया जो सही मायने में शुद्ध अवसरवाद था और बाद में यह लहर उड़ीसा होती हुयी पश्चिम बंगाल तक पहुंची।

   इस पूरी कवायद में तीसरे मोर्चे की नारेबाजियां तो खूब हुयीं पर एक सक्षम विकल्प देने के बजाए सबके निशाने पर नरेंद्र मोदी रहे। नरेंद्र मोदी को कोस-कोस कर नेता बनाने वाले दरअसल यही उनके विरोधी हैं। सच्चाई तो यह है कि विरोध की राजनीति से कभी सृजन नहीं हो सकता। सही मायने में तीसरे मोर्चे के दलों ने अपने आपको वैकल्पिक राजनीति का प्रतीक बनाने में असफलता पायी और इसके चलते भाजपा का उभार हुआ। इसका एक बड़ा कारण भाजपा और संघ परिवार की सधी हुयी रणनीति थी। साथ ही एक सक्षम नेतृत्व समय पर देकर वे इस मैदान में एक समर्थ विकल्प की तरह उपस्थित हो गए। बाकी दल यहीं चूक गए और भाजपा ने कांग्रेस गठबंधन के खिलाफ खुद को स्थापित कर लिया। इसमें सबसे दयनीय वामदलों की स्थिति रही जो कहीं के नहीं रहे, उनके कुछ विचारक और नेता आप में संभावनाएं तलाशते हुए एक नए विकल्प की कामनाएं करते रहे किंतु उस जोश को भी हम ठंडा होता हुआ देख रहे हैं। ऐसे में समय पर विकल्प न खड़े कर पाने और भारतीय राजनीति में अप्रासंगिक हो जाने की पीड़ा से उपजी बौखलाहट हमें वामपंथी विचारकों,लेखकों और काडर में साफ दिखती है। यह कड़वाहट अब उनके बयानों से आगे उनके लेखन और विश्लेषणों में भी दिखने लगी है। क्या ही अच्छा होता कि वे किसी व्यक्ति को निशाना बनाने के बजाए वे मुद्दों के आधार पर अपना जनाधार खड़ा करते और लोगों के बीच जाते। किंतु तीसरे मोर्चे की मैनेजरी का उनका सपना उन्हें मैदान में जाने से भी रोकता है और तमाम दलों के खिलाफ असहज सवाल उठाने से भी रोकता है। मुद्दों पर उनका चयनित दृष्टिकोण उन्हें जनता की नजरों में संदिग्ध भी बनाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या ऐसी राजनीति किसी भी तरह से  देश का भविष्य का वाहक बन सकती है जहां मुद्दों के बजाए व्यक्ति पर हमला और वह भी सुपारी की शक्ल में किया जा रहा हो। अपनी वैचारिक जड़ों को मजबूत करने और जनसंघर्षों में लगने के बजाए आरोपों और गालियों की राजनीति से देश का वातावरण कलुषित हो रहा है।इस पूरे मंजर को देश की जनता भौंचक होकर देख  रही है। बावजूद इसके वह उम्मीद से खाली नहीं है, स्थान-स्थान पर उसने अपने नायक चुन लिए हैं। वह उन पर भरोसा करती है और उनके साथ खड़ी है। राज्यों में बड़ी संख्या में क्षेत्रीय दलों की बनती हुयी सरकारें बताती हैं जनता उनमें भरोसा जता रही है। 2009 के लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश, गुजरात जैसे भाजपा शासित राज्यों से भी कांग्रेस को बेहतर लोकसभा सीटें मिली थीं, क्योंकि राज्य के लोग केंद्र में उस समय भाजपा को एक सक्षम विकल्प नहीं मान रहे थे। उन्होंने यूपीए-2 को मौका दिया। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य से कांग्रेस को 22 सांसद दिए। इतिहास की इस घड़ी में जनता राज्य की विधानसभाओं में भले ही किसी को भी वोट दे चुकी हो किंतु केंद्र में वह एक सक्षम विकल्प के संकल्प से भरी दिखती है। भरोसा न हो तो देख लीजिएगा। 

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

अंगड़ाई लेता तीसरा मोर्चा

-संजय द्विवेदी


    तीसरा मोर्चा भारतीय राजनीति का एक अजूबा है किंतु वह है और हर चुनाव के पहले अपनी अहमियत जताने के लिए प्रकट हो ही जाता है। तीसरे मोर्चे के अलग-अलग शिल्पकार हर बार उसे खड़ा कर ही देते हैं और मंच पर उसके दिग्गजों की एकता बताती है कि सारा कुछ बदलने ही वाला है। इस बार इस एकता के सूत्रधार हैं माकपा नेता प्रकाश कारात। अब तक इस मोर्चे में लगभग 11 पार्टियां शामिल हो चुकी हैं जिनमें वाममोर्चा( सीपीआई, सीपीएम, आरएसपी, फारवर्ड ब्लाक), जेडी(एस), जेडी(यू), सपा, बीजेडी, झारखंड विकास मोर्चा और अन्नाद्रमुक शामिल हैं।
   जाहिर तौर पर ऐन चुनाव के वक्त इस कवायद के मायने बहुत स्पष्ट हैं। कांग्रेस की पलती हालत और भाजपा को सत्ता से रोकने की चाह में एकत्र ये दल एक सपने के तहत एकजुट हैं। किंतु संकट यह है कि इस मोर्चॆ में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी कई हैं। वहीं एक व्यापक मोर्चा बनने में भी इसमें खासी बाधाएं हैं। जैसे की मुलायम सिंह यादव के नाते मायावती इस मोर्चे के साथ नहीं आ सकतीं तो वहीं वाममोर्चा के नाते ममता बनर्जी भी इससे दूर हैं। ऐसे में तीसरे मोर्चे के दलों में व्यापक आम सहमति के आसार नजर नहीं आते हैं। हां उनकी उम्मीदें इस बात पर जरूर हैं कि अगर कांग्रेस सत्ता की दौड़ से बाहर होती है और 100 से 150 सीटों पर  सिमटती है ,तो तीसरे मोर्चे को समर्थन देकर वह भाजपा और मोदी का रथ रोक सकती है। यह एक ऐसी कल्पना है जिसके आधार पर ही यह एकजुटता व्यापक होती हुयी दिखती है। यह एकता दलअसल मुद्दों के आधार पर नहीं एक संभावित अवसर के नाम पर हैं।
  तीसरे मोर्चे में शामिल पार्टियों में सबसे बड़ी उम्मीद तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता हैं। उन्हें नरेंद्र मोदी के खेमे में माना जा रहा था। यह लगभग तय था कि वे राजग की सरकार बनने पर मोदी का समर्थन करेंगीं। किंतु प्रकाश करात की यह बड़ी सफलता है कि वे जयललिता को राजग की ओर जाने से खींच लाए। अब हालात यह हैं कि जयललिता की आंखों में प्रधानमंत्री का सपना तैरने लगा है। अपने खासे जनाधार और द्रमुक नेता करूणानिधि के परिवार में पड़ी फूट ने उनको एक अवसर दिया है कि वे इस तरह के सपने देख सकें। तमिलनाडु की 65 वर्षीय इस मुख्यमंत्री की पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में 9 सीटें जीती थीं। अब माहौल के मद्देनजर वे राज्य की चालीस लोकसभा सीटों में ज्यादातर पर जीत के सपने देख रही हैं। तीसरे मोर्चे में शामिल सभी दलों में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने पर जयललिता अपने सपनों को हकीकत में बदलता देख सकती हैं। आज हालात यह हैं कि पूरे तमिलनाडु में जयललिता की पार्टी उनको प्रधानमंत्री बनाने का अभियान चला रही है। पार्टी का एक ही नारा है तमिलनाडु और पांडिचेरी का सारी सीटें जीतकर लोकसभा में अपनी नेता को स्थापित करना।
  इसी तरह मोर्चे में शामिल मुलायम सिंह यादव के समर्थक भी उत्तर प्रदेश में भारी जीत दर्ज कराकर दिल्ली के सपने देख रहे हैं। 74 साल के हो चुके मुलायम सिंह यादव के लिए यह एक तरह से आखिरी पारी भी है। उप्र के मुख्यमंत्री और देश के रक्षामंत्री रह चुके मुलायम सिंह के लिए अब सिर्फ प्रधानमंत्री का पद ही बचा है। पिछले लोकसभा चुनावों में उनके दल को उप्र में 23 लोकसभा सीटें मिली थी। अब नेता जी चाहते हैं कि उप्र से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतें ताकि तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री के लिए वे सबसे आगे हों। बावजूद इसके उप्र में उनके बेटे अखिलेश यादव की सरकार की असफलताएं और दंगों के दाग शायद बड़ी जीत दिला पाएं। किंतु उनकी हर सभा में नेता जी को प्रधानमंत्री बनाने के गीत गाए जा रहे हैं। 80 लोकसभा सीटों वाले इस प्रदेश में मायावती के बाद अब भाजपा भी जोर बांध रही है। मोदी की लहर वहां एक भाजपा के लिए एक बड़ा अवसर बन सकती है।
 क्षेत्रीय दलों की बढ़ती हसरतें इसलिए भी उफान पर हैं क्योंकि लोगों को लग रहा है कि कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन बड़ी सफलताएं पाते हुए नहीं दिख रहे हैं। कांग्रेस जहां डूबता हुआ जहाज दिख रहा है वहीं भाजपा की बढ़त भी सीमित दिख रही है। फिर भाजपा देश के तमाम इलाकों से अभी भी अनुपस्थित है। ऐसे में तीसरे मोर्चे का उत्साह चरम पर है। वामपंथी नेताओं की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ मोदी के रथ को रोकने की है किंतु संकट यह है कि वाममोर्चा तो अपने गढ़ पश्चिम बंगाल में ही बेहाल है। ममता बनर्जी के तेवरों के चलते वाममोर्चा को लोकसभा चुनावों में भी बहुत बड़ी सफलता मिलने की उम्मीद नहीं दिखती। दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों इस संभावना से भरे- पूरे हैं कि वे अवसर आने पर राजग की राह पकड़ सकते हैं। शायद इसके चलते प्रकाश कारात अभी से उनको गठबंधनों के साथ बांधना चाहते हैं। इस बंधन से शायद नरेंद्र मोदी को समर्थन देने को लेकर दलों में हिचक पैदा हो। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अटलबिहारी वाजपेयी प्रयोग की सफलता से भी राजग को लेकर क्षेत्रीय दलों में एक स्वाभाविक आकर्षण है किंतु तीसरे मोर्चे के आगाज से तमाम दल अब अलग राह पकड़ रहे हैं। तीसरे मोर्चे की शक्ति ही उसकी सीमा है। एक तो यह मोर्चा किसी राजनैतिक प्रतिबद्धता के कारण नहीं कांग्रेस-भाजपा विरोध के बीच एक तीसरी तान छेड़ने का वाहक है। दूसरा इसके नेताओं का आपसी समन्वय भी गायब है।
 प्रधानमंत्री पद को लेकर भी राजनेताओं की महत्वाकांक्षाएं आपस में टकरा सकती हैं। एक समय में स्व. हरिकिशन सिंह सुरजीत तीसरे मोर्चे के नायक बने थे और तमाम क्षेत्रीय आकांक्षाओं का साधने का काम उन्होंने किया था। आने वाले समय में प्रकाश करात इस भूमिका में कितने प्रभावशाली साबित होते हैं कह पाना कठिन है। नेताओं के आपसी द्वंद, उनकी क्षेत्रीय अपील, राज्यों के मुद्दे और केंद्रीय राजनीति में एक प्रभावशाली हस्तक्षेप जैसे सवाल इससे जुड़े हैं। तीसरे मोर्चे की सरकारों को देखें तो वे प्रायः किसी राष्ट्रीय नेता के आभामंडल के इर्द-गिर्द बनती नजर आयी हैं। वीपी सिंह, चंद्रशेखर, इंद्रकुमार गुजराल ऐसे ही राजनेता थे। इनमें अकेले देवगौड़ा ऐसे थे जिन्हें क्षेत्रीय नेता कहा जा सकता है। दूसरी ओर इन दलों का संकट यह है कि वे भाजपा के खिलाफ सब एकजुट नहीं होगें। क्योंकि उनमें आपसी मतभेद बहुत गहरे हैं। उप्र में मुलायम और मायावती, प.बंगाल में वाममोर्चा और ममता बनर्जी, बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतिश कुमार के मतभेद बेहद गहरे हैं। ऐसे में वाममोर्चा नेताओं की कोशिशों के बावजूद तीसरा मोर्चा बहुत व्यापक आकार नहीं ले सकता।

   सत्ता कैसे विचारों को बदलती है उसे देखना हो तो वाजपेयी सरकार की याद कीजिए। सेकुलरिज्म और भाजपा विरोध के नारों की असलियत भी उस समय खुल गई जब भाजपा की गठबंधन की सरकार को उमर अब्दुल्ला से लेकर रामविलास पासवान, नीतिश कुमार, जार्ज फर्नांडीस, जलललिता, ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू की पार्टियां समर्थन देती नजर आईं। ऐसे में तीसरा मोर्चा एक सपना है जिसके सच चुनाव परिणामों के बाद ही सामने आएंगें। तीसरे मोर्चे की सारी कोशिश मोदी की रफ्तार और गति को थामने की है। राजग की ओर दलों को जाने से रोकने के लिए प्रकाश करात ने यह सारा कुछ रचा है, जिसके परिणाम अभी बहुत जाहिर नहीं हैं। अब जबकि चुनावी महाभारत का शंखनाद हो चुका है। सारे सेनानी मैदान में उतर चुके हैं तो यह देखना रोचक होगा कि कांग्रेस, भाजपा, आप के बीच एक चौथा कोण कौन सी लहरें पैदा करता है। अपने दिग्गज नायकों की मैदानी सफलताओं से भी तीसरे मोर्चे का भविष्य लिखा जाएगा, लेकिन क्या भरोसा कब कौन नेता अपनी फौज के साथ तीसरे मोर्चे को छोड़कर किसी दूसरे मोर्चे में खड़ा दिखा। यही एक बात तीसरे मोर्चे की विश्वसनीयता पर सबसे बड़ा सवाल है। डा. राममनोहर लोहिया कहा करते थे जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करती। शायद इसीलिए दिल्ली में बनी तीसरे मोर्चे की कोई सरकार पांच साल नहीं चली। प्रकाश करात की कोशिशों को सलाम कीजिए कि उन्होंने फिर से तीसरे मोर्चे को जिंदा कर दिया है और भारतीय राजनीति फिर एक रोचक मोड़ पर खड़ी हो गयी है।

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

केजरीवालः पलायन या नई मंजिल की तलाश ?


-संजय द्विवेदी
    दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह का वातावरण बनाकर अपनी सरकार को शहीद किया, ऐसे दृश्य भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नहीं देखे गए। सच कहें तो वे एक ऐसे नायक की तरह सामने आए जो अपनी ही सरकार से मुक्ति चाहता था। ऐसा करके अरविंद को क्या हासिल होगा, अभी इसका आकलन होना शेष है किंतु यह तो तय है कि यदि वे चाहते तो सरकार बनी रह सकती थी। कांग्रेस के जिन नेताओं ने इस सरकार को समर्थन दिया था उनको भी कल्पना नहीं रही होगी यह सरकार इतनी जल्दी गिर जाएगी।
   दो महीने से भी कम समय में अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह से काम किया उसने कोई उम्मीद नहीं जगाई पर इतना तो साबित कर ही दिया कि उन पर अराजकतावादी होने का आरोप बहुत नाजायज नहीं है। सत्ता में होकर जिस अपेक्षित धैर्य, गंभीरता और सबको साथ लेकर चलने के औदार्य की जरूरत है, वह अरविंद और उनके साथियों में पहले दिन से नदारद है। देश सेवा के अहंकार से भरी देहभाषा और न जाने किस भ्रष्टाचार से जूझने की कसमें खाते अरविंद की विदाई ने सही मायने में देश को निराश किया है। जिस दौर में गठबंधन एक राजनीतिक मजबूरी हो चुके हों उसमें यह जिद कि पूरा बहुमत मिलने पर ही सरकार चलाएंगें एक तरह का बाल हठ ही है और राजनीतिक नासमझी भी है। 1990 के बाद देश की राजनीति और उसका विमर्श पूरी तरह बदल गया है। खासकर विचारधारा के स्तर पर विविध विरोधी विचारधाराओं के दल भी साथ आकर सरकार चला रहे हैं। आप देखें तो पहले  गठबंधन को लेकर कांग्रेस रवैया खासा अलग रहा है। एक अखिलभारतीय पार्टी होने के नाते वह गठबंधन की सरकारों को समर्थन तो देती रही पर खुद गठबंधनों का नेतृत्व करने से केंद्रीय स्तर पर परहेज करती रही। किंतु राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के रूप में अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के प्रयोग के बाद कांग्रेस की हिचक दूर हुयी और वह सत्ता में पिछले दस सालों से बनी हुयी है। यानि कि विरोधी विचारों के दलों के साथ मिलकर सरकार चलाने की मजबूरी को दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस भी समझते हैं। किंतु दिल्ली की सरकार के नायक केजरीवाल इस बात को नहीं समझ सके। अगर पूर्ण बहुमत मिलने पर ही सरकार बनाना था तो उसी समय आप को सत्ता से दूर हो जाना था जब वह जनता के पास जाकर सत्ता में जाने की अनुमति मांग रहे थे। पर यह कितना विरोधाभास है कि जो पार्टी सत्ता को लेकर संकोच से इतनी भरी हो कि वह दिल्ली की जनता के बीच जाकर रायशुमारी करती रही। वही सत्ता छोड़ने के वक्त अपने नेता की सनक पर सत्ता से बाहर हो जाती है और दिल्ली के लोगों की राय उसके लिए बेमानी हो जाती है। यानि यह अरविंद और उनके साथियों की मरजी है कि वे कब किस सवाल पर जनता से राय पूछें और कब न पूछें।
       तमाम अप्रिय प्रसंगों के बीच अरविंद और उनके साथी अब सत्ता मुक्त हैं। यानि अब वे अपनी करने के लिए स्वतंत्र और स्वच्छंद भी हैं। लेकिन दिल्ली के बहुत कम दिनों के सत्ता प्रसंग ने उनके द्वंद्वों को उजागर ही किया है। सत्ता ने उनके विचारों और व्यवहारों को दूरी को तो उजागर किया ही है, अहंकार और अहमन्यता से भरी देहभाषा ने उनकी सनकों का भी लोकव्यापीकरण किया है। खुद को उजली परंपरा का उत्तराधिकारी मानना और दूसरों को कीचड़ में लिपटा हुआ कहने की उनको आजादी है किंतु आंदोलनों की उजास और संषर्घ की आंच को उन सबने धीमा किया है ,इसमें दो राय नहीं है। उनका सत्ता छोड़कर भागना बताता है कि वे सत्ता तो चाहते हैं पर अपनी शर्तों पर चाहते हैं। वे यह मानने को तैयार नही हैं कि दिल्ली विधानसभा की 70 में वे सिर्फ 28 सीटें वे जीते हैं और शेष दिल्ली ने जनादेश दूसरे दलों को दिया है। ऐसे में शेष जनादेश प्राप्त दलों को हाशिए पर रखकर, उनकी आवाज न सुनकर वे एक अधिनायकत्व से भरी पारी खेलना चाहते हैं। जाहिर है लोकतंत्र में इस तरह के हठों के लिए जगह कहां है। समन्वय,संवाद और लोकतांत्रिक विमर्श में उनका यकीन ही नहीं दिखता। वे संवाद को सिर्फ सौदा समझते हैं। जबकि संवाद, लोकतंत्र की बुनियाद बनाता है। अगर संवाद न होगा तो लोकतंत्र के मायने क्या रह जाएंगें? आरोप- आरोप और आरोप की राजनीति इस देश को कहीं नहीं ले जाएगी, हमें यह समझने की जरूरत है।
    एक मुख्यमंत्री के नाते वे जनता का बहुत भला कर सकते थे। लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के दर्द को कम कर सकते थे। किंतु वे भाग गए, इस पलायन में भी वे अवसर ढूंढ सकते हैं। किंतु इसे कहा तो पलायन ही जाएगा। एक ऐसी चीज के लिए जिद जो हो नहीं सकती ,वह बताती है कि अरविंद किस कदर सरकार गिराने पर आमादा थे और सरकार की शहादत के नाम पर आगामी लोकसभा चुनाव में अपने दल का विस्तार चाहते थे। उनकी घबराहट और पलायन दोनों के संदेश साफ हैं कि वे सत्ता के साथ सहज नहीं थे। उन पर पड़ने वाले दबावों को वे झेल सकने की स्थिति में नहीं थे। उनका राजनीतिक डीएनए एक विद्गोही का है, सो सत्ता में रहते हुए वे उस तरह के आचरण करने पर आलोचना की जद में आ रहे थे (याद कीजिए उनका दिल्ली के सीएम के रूप में दिया गया घरना)। आप देखें तो पूरी राजनीतिक प्रक्रिया और तंत्र को लांछित करते अरविंद और उनके साथी मीडिया के द्वारा जरा सी आलोचना पर किस कदर बौखला पड़ते हैं। भाषा और उसके संयम का तो खैर जाने ही दीजिए। अरविंद और उनके साथियों ने सही मायने में देश की जनता और दिल्ली के लोगों से छल किया है। उन्होंने उन लोगों की उम्मीदों के साथ छल किया है, जो उनकी तरफ बहुत आशा से देख रहे थे। दिल्ली की सरकार को पूरी तनदेही और जवाबदेही से चलाते हुए वे एक जनपक्षधर राजनेता की तरह उभर सकते थे।

   अब सवाल यह है कि जिनसे एक छोटा सा राज्य दिल्ली और दो दलों का गठबंधन नहीं संभलता वे केंद्रीय राजनीति में आकर क्या करना चाहते हैं? यहां उन्हें कैसे और कब पूर्ण बहुमत मिलेगा और कब वे सत्ता के लिए तैयार होंगें, कहा नहीं जा सकता। अरविंद अपनी अपनी तमाम खूबियों के बावजूद अंततः एक आंदोलनकारी हैं। यही उनकी शक्ति और सीमा दोनों है। जबकि देश को एक मजबूत, कद्दावर प्रशासक का इंतजार है। जो देश को उसकी तमाम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, व क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ साध सके। दिल्ली में गठबंधन की ही सही, पर एक मजबूत सरकार दे सके। जो देश के सवालों से टकरा सके न कि उनका सामना होते ही पलायन कर जाए। आम आदमी पार्टी ने देश के लोगों की तमाम सदिच्छाओं के बावजूद जिस तरह निराश किया है, उसमें यही लगता है यह दल भी कुछ विद्रोही युवाओं का संगठन बनकर रह जाएगा। भारत जैसे महादेश के प्रश्नों और उसके मर्म तक पहुंचकर उसके प्रश्नों से जूझने की शक्ति तो फिलहाल आप में नहीं दिखती। उसके साथ जुड़े तमाम बुद्धिजीवी, रचनाकारों और पत्रकारों को चाहिए वे एक लंबी और सुदीर्ध तैयारी के साथ लोगों के बीच प्रकट हों, तभी यह देश आप जैसे प्रयोगों पर भरोसा कर पाएगा। लोगों की भावनाओं से खेलने ,उन्हें उद्वेलित करने और उनका इस्तेमाल करने से इस तरह के तमाम भावी प्रयोग और आंदोलन भी शक के घेरे में आएंगें कृपया ऐसा मत कीजिए। उम्मीद है कि कि आम आदमी पार्टी अपने भावी कदमों में अपेक्षित परिपक्वता का परिचय देगी और देश की जनाकांक्षाओं को सही संदर्भ में समझकर आचरण करेगी।

सोमवार, 20 जनवरी 2014

आप को कौन दे रहा है श्राप ?


-संजय द्विवेदी
   अरसे के बाद देश की राजनीति में आदर्शवाद, नैतिकता और सादगी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है। ये अचानक नहीं हुआ है। ये हुआ है आम आदमी पार्टी के उदय के चलते। आम आदमी पार्टी के राजनीतिक विमर्श में जो चीजें प्रकट हुयीं वह मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के लिए स्वीकार्य नहीं हैं। आप देखें तो आम आदमी पार्टी के चाल-चरित्र में जरा सा विचलन देखकर ही मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का उत्साह चरम पर पहुंच जाता है। आप के नेताओं की अनुभवहीनता, उनके बयानों और बिन्नी जैसे विधायकों की असहमति किस तरह राजनीतिक दलों में उत्साह भर रही है। यह बात बताती है आप के चलते ये दल किस तरह घबराए हुए हैं। साथ ही यह बात भी प्रकट होती है कि एक नई तरह की राजनीतिक संस्कृति किस तरह हमारे मुख्यधारा के राजनीतिक दलों में अस्वीकार्य है।
   यह साधारण नहीं है कि हमारे मुख्यधारा के सभी राजनीतिक दल किसी भी अपनी जैसे चरित्र वाली पार्टी से नहीं घबराते हैं, वे घबराते हैं राजनीति के नए चरित्र से, नई शैली से। जिनको सपा,बसपा, अन्नादुमुक और इस जैसी तमाम पार्टियों ने नहीं डराया वे आखिरकार आप से क्यों डर रहे हैं ? जिस देश में 1300 से अधिक पार्टियां हैं वहां एक और दल का आना क्या बुरी बात है? किंतु आप को लेकर स्वागत भाव क्यों नहीं है? आप नष्ट हो जाए, बिखर जाए या उन जैसी ही बन जाए यह कामना लगातार क्या दिखा रही है? यह बात बताती है कि आप के द्वारा उठाए गए मुद्दों से घबराहट है। संसद में लोकपाल पास करने में जो तेजी राजनीतिक दलों ने दिखाई वह इस बात को साबित करती है। सत्ता की राजनीति को ठीक से समझने वाली कांग्रेस ने जिस तेजी से दौड़कर दिल्ली में आप की सरकार बनवाई वह बताती है कि घबराहट का स्तर क्या है। भाजपा जरूर इसके चलते एक अनोखे अवसर से चूक गयी। क्या शानदार राजनीतिक फैसला होता अगर भाजपा ने स्वयं आगे बढ़कर आप की सरकार को समर्थन दिया होता। इस फैसले से कांग्रेसमुक्त भारत बनाने में लगे नरेंद्र मोदी को फायदा मिलता और कांग्रेस राजनीतिक विमर्श से ही गायब हो जाती। दिल्ली में केजरीवाल और देश में मोदी जैसी लहर भाजपा को फायदा पहुंचा सकती थी। राजनीतिक तौर पर कांग्रेस विरोधी लहर एक आंधी में बदल सकती थी। किंतु आप को कांग्रेस ने समर्थन देकर इस अभियान और इसकी तेजी में कुछ सिथिलता जरूर डाल दी है।
   यहां सवाल यह है कि हमारे मुख्यधारा के राजनीतिक दल किसी से कुछ अच्छा सीखने को तैयार क्यों नहीं है? ठीक है, राजनीति में समझौते होते हैं, जीतने वाले उम्मीदवारों पर आत्मविश्वास से हीन पार्टियां दांव लगाती हैं, किंतु अगर परिवेश में कुछ बदल रहा है तो उस अवसर का लाभ लेना चाहिए। इस बदलाव के चलते दलों को कुछ बेहतर कर पाना, अच्छा उम्मीदवार उतार कर उसे चुनाव जीता पाना संभव होता दिख रहा है तो उसका लाभ लेना चाहिए। किंतु जो दल सपा, बसपा,राजद, द्रमुक, शिवसेना, अकाली दल जैसे दलों से भी कभी समस्या महसूस नहीं करते, उन्हें आप से ही समस्या क्यों है। अगर आप उनकी तरह की पार्टी बन जाए या बनने की कोशिश करे तो भी शायद उन्हें उससे कोई समस्या नहीं हो। समस्या तभी है जब आप अपने तरह की राजनीति को हमारे समाज जीवन के विमर्श का हिस्सा बना रही है। अब आप देखिए कि आप के उठाए सवालों महंगाई, भ्रष्टाचार,सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, सादगी, तामझाम से मुक्त जीवन को अपनाने और इस अवसर का लाभ उठाकर अपने राजनीतिक तंत्र में शुचिता लाने में तेजी लाने के बजाए सारा जोर इस बात पर है कि आप की दिल्ली की सरकार जल्दी से जल्दी एक्सपोज हो जाए और उन्हीं राजनीतिक बुराईयों की शिकार हो जाए जिसमें हमारे दल डूबे हुए हैं। यानि कि इतिहास की इस घड़ी में हमारी दलीय प्रार्थनाएं आम आदमी पार्टी द्वारा उठाए गए सवालों की सफलता के लिए नहीं हैं। सार्वजनिक जीवन में सुधार के प्रति नहीं है, सारी कामना यही है कि आम आदमी पार्टी का यह प्रयोग फ्लाप हो जाए और मुख्यधारा के राजनीतिक दल यह कह सकें कि राजनीति सबके बस की बात नहीं। अपने राजनीतिक अहंकारों से भरी ये जमातें कुछ अच्छा सीखने और स्वयं में परिवर्तन के बजाए आप के ही बदल जाने की दुआएं या उनकी सरकार की विफलता की कामना कर रही हैं। यह देखते हुए भी जनता आप के प्रयोग को किस तरह सराह रही है। अगर राजनीतिक दल अपने में इस तरह के कास्मेटिक सुधार भी करें तो भी जनता उनके पास आ सकती है, एक नई तरह की राजनीतिक धारा की सुधार के लिए देश अवसर दे रहा है। जनता इस प्रतीक्षा में खड़ी है कि हमारी राजनीति भी ज्यादा जनधर्मी, ज्यादा सरोकारी,ज्यादा संवेदनशील और ज्यादा मानवीय बने।

     इतिहास की इस घड़ी में आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। आम आदमी पार्टी को इस समय में प्रशांत भूषण जैसी बेसुरी आवाजों से बचकर देश के विश्वास की रक्षा करनी होगी। क्योंकि आम आदमी पार्टी एक ऐसे आंदोलन से उपजी पार्टी है, जिसके पिंड में एक जागृत राष्ट्रवाद है, एक नैतिक चेतना है, एक भरोसा और विश्वास है। जो उसके सफेद टोपी, उसके वंदेमातरम, भारत माता की जय और इन्कलाब जिंदाबाद जैसे नारों से प्रकट होता है। उसके साथ बड़ी संख्या में जुटे युवा इसी राष्ट्रवादी चेतना के प्रतिनिधि हैं। उनके सामने एक नरेंद्र मोदी जैसा महानायक भी खड़ा है। उम्मीदों को पाने और एक नया भारत बनाने की आकांक्षा से भरा नौजवान आज किसी राहुल गांधी, मुलायम सिंह या तीसरे मोर्चे के प्रतिनिधियों के इंतजार में नहीं खड़ा है। नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल जैसे नई राजनीति के वाहक उसकी आकांक्षाओं के सही प्रतिनिधि हैं। इसीलिए इस विमर्श में माणिक सरकार, मनोहर पारीकर, रंगास्वामी जैसे नायकों के नाम भी लिए जाने लगे हैं। दिल्ली में विजय गोयल की जगह हर्षवर्धन का चेहरा इसी बदलती राजनीति का प्रतीक ही था। यह बदलता हुआ भारत और उसकी आकांक्षाएं बहुत अलग हैं। आप को कांग्रेस की कुटिल राजनीति से बचते हुए दिल्ली की सरकार चलानी तो है ही साथ ही अपने वाचाल नेताओं को थोड़ा खामोश भी करते हुए जनहित के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखानी है। जिस तरह मोदी देश की आकांक्षाओं का चेहरा बनकर उभरे हैं केजरीवाल उसी सूची का दूसरा नाम हैं। किंतु मोदी ने लंबा काम करके यह गौरव हासिल किया है। केजरीवाल ने आंदोलनों और मीडिया के इस्तेमाल से यह अवसर पाया है। किंतु केजरीवाल को यह ध्यान रखना होगा कि यह देश बार-बार छला गया है। उसने लंबे समय के बाद एक नौजवान पर उसके किसी बहुत उजले अतीत के अभाव में भी भरोसा किया है। अन्ना से जुड़े होने के नाते अरविंद की राजनीति न सिर्फ परवान चढ़ी है वरन उसे व्यापक जनाधार व विश्वास भी प्राप्त हुआ है।आपातकाल विरोधी आंदोलन, वीपी सिंह के आंदोलन और असम आंदोलन की परिणतियां हमारे सामने हैं। देश बार-बार छला गया है। एक और छल के लिए देश तैयार नहीं है। अरविंद आम जनता की उम्मीदों और आकांक्षाओं का चेहरा है। देश की सभी राजनीतिक पार्टियां उनकी विफलता की राह देख रही हैं किंतु आम जनता उनकी सफलता की दुआएं कर रही है। किंतु इस सफलता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी आम आदमी पार्टी के नायकों पर है। देश के पास कई मोदी, कई केजरीवाल, कई मनोहर पारीकर, कई माणिक सरकार,कई हर्षवर्धन, कई ममता बनर्जी होंगें तो जन आकांक्षाएं न सिर्फ पूरी होंगी, वरन व्यक्ति के अधिनायकवाद का खतरा भी कम होगा। सार्वजनिक जीवन में सादगी और शुचिता की लहर बनेगी और एक नया परिर्वतन आएगा। ऐसे संक्रमण काल में हमारी दुआ है कि आम आदमी पार्टी खुद भी बचे और अपने तीखे तेवरों से हमारे राजनीतिक परिवेश में सकारात्मक परिर्वतनों की वाहक बने, एक कठिन समय में देश की जनता उसे शुभकामनाओं के सिवा क्या दे सकती है।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

क्यों सिकुड़ रहा है राष्ट्रीय दलों का जनाधार?

क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत से अखिलभारतीयता को मिलती चुनौती
                                                       -संजय द्विवेदी


  अरसा हुआ देश ने केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं देखी। स्वप्न सरीखा लगता है जब राजीव गांधी ने 1984 के चुनाव में 415 लोकसभा सीटें जीतकर दिल्ली में सरकार बनायी थी। इतिहास ऐसे अवसर किसी किसी को ही देता है। राजीव गांधी को यह अवसर मिला, यह अलग बात है अपनी राजनीतिक अनुभवहीनता, अनाड़ी दोस्तों की सोहबत और कई गलत फैसलों से उनकी सरकार जल्दी विवादित हो गयी और बोफोर्स के धुंए में सब तार-तार हो गया। तबसे लेकर आजतक दिल्ली को एक ऐसी सरकार का इंतजार है जो फैसलों को लेकर सहयोगियों के दबावों से मुक्त होकर काम कर सके। जो अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को दृढ़ता के साथ लागू कर सके। भारतीय संविधान ने अनेक संवैधानिक व्यवस्थाएं करके केंद्रीय शासन को समर्थ बनाया है किंतु इन सालों में हमने प्रधानमंत्री को ही सबसे कमजोर पाया है। सत्ता के अन्य केंद्र, दबाव समूह, सत्ता के साझेदार कई बार ज्यादा ताकतवर नजर आते हैं। वीपी सिंह, देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह सरकार सबकी एक कहानी है।
   इसका सबसे कारण है हमारे राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की विफलता और उफान मारती क्षेत्रीय आकांक्षाएं। आखिर क्या हुआ कि हमारे राष्ट्रीय राजनीतिक दल सिमटने लगे और क्षेत्रीय दलों का अभूतपूर्व विस्तार हुआ। राष्ट्रीय दल होने के नाते कांग्रेस का पराभव हुआ, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ताकत घटी और भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस की छोड़ी हुयी जगहों को तेजी से भर नहीं पायी। जाहिर तौर पर अखिलभारतीयता के विचार और भाव भी हाशिए लग रहे थे। राष्ट्रीय राजनीतिक दल वैसे भी भारत में बहुत ज्यादा नहीं थे। सही मायने में तो कांग्रेस,जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टियां ही अखिलभारतीयता के चरित्र का सही मायने में प्रतिनिधित्व करती थीं किंतु हालात यहां तक आ पहुंचे कि राजीव गांधी को जिस सदन ने 415 का बहुमत दिया, उसी सदन में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी तेलगू देशम थी- यानि कि एक क्षेत्रीय दल भारत का प्रमुख विपक्षी दल बन गया। यह समय ही भारत में राष्ट्रीय दलों के क्षरण का प्रारंभकाल है। तबसे आज तक क्षेत्रीय दलों की शक्ति और क्षमता को हम लगातार बढ़ता हुआ देख रहे हैं। समाजवादी आंदोलन के बिखराव ने सोशलिस्ट पार्टी को खत्म कर दिया या वे कई क्षेत्रीय दलों में बंटकर क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रतिनिधि पार्टिंयां बन गयीं और बचे हुए समाजवादी कांग्रेस- भाजपा-बसपा जहां भी मौका मिला उस दल की गोद में जा बैठे। यह आश्चर्यजनक नहीं है नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह से लेकर भाजपा के आरिफ बेग तक एक समय तक समाजवादी ही थे। किंतु समय बदलता गया और राष्ट्रीय दलों का प्रभामंडल कम होता गया। आज हालात यह हैं कि बिना गठबंधन दिल्ली में कोई दल सरकार बनाने का स्वप्न भी नहीं देखता। जबकि राजनेता तो सपनों के सौदागर ही होते हैं। किंतु वास्तविकता यह है आने वाले आम चुनावों में जनता किस गठबंधन के साथ जाएगी, उसके लिए अपना कुनबा बढ़ाने पर जोर है। नरेंद्र मोदी जैसे समर्थ नेतृत्व की उपस्थिति के बावजूद भाजपा परिवार में चिंता है तो इसी बात की चुनाव के बाद हमें किन-किन दलों का समर्थन मिल सकता है। यह भी सही है कि इस दौर ने विचारधारा के आग्रहों को भी शिथिल किया है। वरना क्या यह साधारण बात थी कि एनडीए की अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में उमर अब्दुला, नीतिश कुमार, रामविलास पासवान, ममता बनर्जी, अरूणाचल के पूर्व मुख्यमंत्री गेगांग अपांग के बेटे तक मंत्री पद पर देखे गए। वहीं जयललिता से लेकर चंद्रबाबू नायडू वाजपेयी सरकार को समर्थन देते रहे। आज कांग्रेस के साथ भी बहुत से दल शामिल हैं। वे भी हैं जो कल तक एनडीए के साथ थे। ऐसे में यह कहना बहुत कठिन है कि राजनीति में अखिलभारतीयता के चरित्र को कैसे स्थापित किया जा सकता है। अखिलभारतीयता एक सोच है,संवेदना है और फैसले लेने में प्रकट होने वाली राष्ट्रीय भावना है। क्षेत्रीय दल उस संवेदना से युक्त नहीं हो सकते, जैसा राष्ट्रीय राजनीतिक दल होते हैं। क्योंकि क्षेत्रीय दलों को अपने स्थानीय सरोकार कई बार राष्ट्रीय हितों से ज्यादा महत्वपूर्ण दिखते हैं। उमर अब्दुला या महबूबा मुफ्ती को क्या फर्क पड़ता है यदि शेष देश को उनके किसी कदम से दर्द होता हो। इसी तरह नवीन पटनायक या जयललिता के लिए उनका अपना राज्य और वोट आधार जिस बात से पुष्ट होता है, वे वैसा ही आचरण करेंगें। लिट्टे के मामले में तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों के रवैये का अध्ययन इसे समझने में मदद कर सकता है। क्षेत्रीय राजनीति किस तरह अपना आधार बनाती है उसे देखना हो तो राज ठाकरे परिघटना भी हमारी सहायक हो सकती है। कैसे अपने ही देशवासियों के खिलाफ बोलकर एक दल क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति करते हुए राज्य में एक शक्ति बन जाता है। निश्चित ही ऐसी राजनीति का विस्तार न सिर्फ घातक है बल्कि देश को कमजोर करने वाला है। इस तरह के विस्तार से सिर्फ केंद्र की सरकार ही कमजोर नहीं होती बल्कि देश भी कमजोर होता है। इसके लिए हमें इन कारणों की तह में जाना होगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि देश आज क्षेत्रीय दलों की आवाज ज्यादा सुनता है। देश के तमाम राज्यों जैसे जम्मू-कश्मीर, पंजाब, तमिलनाडु, उप्र, बिहार, उड़ीसा, प.बंगाल, झारखंड में जहां क्षेत्रीय दल सत्ता में काबिज हैं तो वहीं अनेक राज्यों में वे सत्ता के प्रबल दावेदार या मुख्य विपक्षी दल हैं। ऐसे में यह कहना बहुत कठिन है कि राजनीति में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के दिल जल्दी बहुरने वाले हैं। क्षेत्रीय दलों के फैसले भावनात्मक और क्षेत्रीय आधार पर ही होते हैं। देश की सामूहिक आकांक्षाएं उनके लिए बहुत मतलब नहीं रखतीं। अपने स्थानीय दृष्टिकोण से बंधे होने के कारण उनकी प्रतिक्रियाएं क्या रूप ले सकती हैं, इसे हम और आप तेलंगाना की आग में जलते हुए आंध्र प्रदेश को देखकर समझ सकते हैं।
    दरअसल अखिलभारतीयता एक चरित्र है। भाजपा जब उसका विस्तार बहुत सीमित था तब भी वह एक अखिलभारतीय चरित्र की पार्टी थी। आज तो वह एक राष्ट्रीय दल है ही। इसी तरह कम्युनिस्ट पार्टियां भले आज बहुत सिकुड़ गयी हैं, उनकी धार कुंद हो गयी हो किंतु वे अपने चरित्र में ही अखिलभारतीय सोच का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी तरह डा. राममनोहर लोहिया के जीवन तक समाजवादी पार्टी भी अखिलभारतीय चरित्र की प्रतिनिधि बनी रही। चौधरी चरण सिंह ने भले ही उप्र, राजस्थान और हरियाणा की पिछड़ा वर्ग, जाट पट्टी में अपना खासा आधार खड़ा किया किंतु उनकी लोकदल एक अखिलभारतीय चरित्र की पार्टी बनी रही। इसका कारण सिर्फ यह था कि ये दल कोई भी फैसला लेते समय देश के मिजाज और शेष भारत पर उसके संभावित असर का विचार करते हैं। पूरे देश में अपने दल की संगठनात्मक उपस्थिति के नाते वे अपने काडर-कार्यकर्ताओं-नेताओं पर पड़ने वाले प्रभावों और फीडबैक से जुड़े होते हैं।
   बावजूद इसके अखिलभारतीयता में आ रही कमी और राष्ट्रीय दलों के सिकुड़ते आधार के लिए इन दलों की कमियों को भी समझना होगा। क्योंकि आजादी के समय कांग्रेस ही सबसे बड़ा दल था जिससे देश की जनता की भावनाएं जुड़ी हुयी थीं। ऐसा क्या हुआ कि राष्ट्रीय दलों से लोग दूर होते गए और क्षेत्रीय दल शक्ति पाते गए। निश्चय ही इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे राष्ट्रीय राजनीतिक दल क्षेत्रीय आकांक्षाओं, भावनाओं, उनके सपनों को संबोधित नहीं कर पाए। बड़े राजनीतिक दल यह समझ पाने में असफल रहे कि कोई भी राष्ट्रीयता, स्थानीयता के संयोग से ही बनती है। स्थानीयता सह राष्ट्रीयता के मूलमंत्र को भूलकर तमाम क्षेत्रों,वर्गों की तरफ उपेक्षित निगाहें रखी गयीं, उसी का परिणाम है कि आज क्षेत्रीय और जातीय अस्मिताएं दलों के रूप में एक ताकत बनकर सामने आई हैं। वे अपनी संगठित शक्ति से अब न सिर्फ प्रांतीय-स्थानीय सत्ता में प्रभावी हुयी हैं वरन् वे केंद्रीय सत्ता में भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं। ऐसे में राजनीति की अखिलभारतीयता की भावना को खरोंचें लगें तो लगें इससे प्रांतीय, क्षेत्रीय और जातीय अस्मिता की राजनीति करने वालों को बहुत वास्ता नहीं है। वे केंद्रीय सत्ता को सहयोग देकर बहुत कुछ हासिल ही नहीं कर रही हैं, वरन कई बार-बार दिल्ली की सत्ता पर कब्जे का स्वप्न भी देखती हैं। देवगौड़ा को याद कीजिए, मायावती-मुलायम-नीतिश कुमार के सपनों पर गौर कीजिए। मिली-जुली सरकारों के दौर में हर असंभव को संभव होते हुए देखने का यह समय है। यह तो भला हो कि इन क्षेत्रीय क्षत्रपों की आपसी स्पर्धा और महत्वाकांक्षांओं का कि वे एक मंच पर साथ आने को तैयार नहीं हैं और छोटे स्वार्थों में बिखर जाते हैं, वरना क्षेत्रीय दलों के अधिपति ही दिल्ली पति लंबे समय से बने रहते। इसके चलते ही कांग्रेस या भाजपा के पाले में खड़े होना उनकी मजबूरी दिखती है। बावजूद इसके यह सच है कि क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति से इस राष्ट्र का मंगल संभव नहीं है। राष्ट्रीय दलों को अपनी भूमिका को बढ़ाते हुए अपने आत्मविश्वास का प्रदर्शन करना होगा और अपने दम पर केंद्रीय सत्ता में आने के स्वप्न पालने होगें। क्योंकि मजबूत केंद्र के बिना हम अपनी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, देश की आकांक्षाओं, सपनों और ज्वलंत प्रश्नों को हल नहीं कर सकते। एक समन्वित रणनीति बनाकर अखिलभारतीय दलों को देश के ज्वलंत प्रश्नों पर एक राय बनानी होगी। कुछ सवालों को राजनीति से अलग रखते हुए देश में एक राष्ट्रीयता की चेतना जगानी होगी। कम्युनिस्ट पार्टियां तो देश की राजनीति में अप्रासंगिक हो गई हैं। समाजवादी आंदोलन भी बिखराव का शिकार है और अंततःजातीय-क्षेत्रीय अस्मिता की नारेबाजियों में फंसकर रह गया है। कांग्रेस, भाजपा की इस दिशा में एक बड़ी जिम्मेदारी है कि वे अपने अखिलभारतीय चरित्र से देश को जोड़ने का काम करें। देश की राजनीति की अखिलभारतीयता का वाहक होने के नाते वे इस चुनौती से भाग भी नहीं सकते।

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

मोदी का साथ और राहुल का हाथ



-संजय द्विवेदी
      देश को लोकसभा चुनावों के लिए अभी गर्मियों का इंतजार करना है किंतु चुनावी पारा अभी से गर्म हो चुका है। नरेंद्र मोदी की सभाओं में उमड़ती भीड़, सोशल नेटवर्क में उनके समर्थन-विरोध की आंधी के बीच एक आम हिंदुस्तानी इस पूरे तमाशे को भौंचक होकर देख रहा है। पिछले दो लोकसभा चुनाव हार चुकी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए मोदी एक ऐसी नाव हैं, जिससे इस चुनाव की वैतरणी पार की जा सकती है तो वहीं देश की सेकुलर राजनीति के चैंपियन बनने में लगे दलों को मोदी से खासा खतरा महसूस हो रहा है। यह खतरा यहां तक है कि उन्हें रामरथ के सारथी और अयोध्या आंदोलन के नायक लालकृष्ण आडवानी भी अब सेकुलर लगने लगे हैं। जाहिर तौर पर इस समय की राजनीति का केंद्र बिंदु चाहे-अनचाहे मोदी बन चुके हैं। अपनी भाषणकला और गर्जन-तर्जन के अंदाजे बयां से उन्होंने जो वातावरण बनाया है वह पब्लिक डिस्कोर्स में खासी जगह पा रहा है।
साइबर युद्ध में तटस्थता के लिए जगह नहीः
      माहौल यह है कि आप या तो मोदी के पक्ष में हैं या उनके खिलाफ। तटस्थ होने की आजादी भी इस साइबर युद्ध में संभव नहीं है। सवाल यह है कि क्या देश की राजनीति का इस तरह व्यक्ति केंद्रित हो जाना- वास्तविक मुद्दों से हमारा ध्यान नहीं हटा रहा है। क्योंकि कोई भी लोकतंत्र सामूहिकता से ही शक्ति पाता है। वैयक्तिकता लोकतंत्र के लिए अवगुण ही है। यह आश्चर्य ही है भाजपा जैसी काडर बेस पार्टी भी इस अवगुण का शिकार होती दिख रही है। उसका सामूहिक नेतृत्व का नारा हाशिए पर है। वैयक्तिकता के अवगुण किसी से छिपे नहीं हैं। एक समय में देश की राजनीति में देवकांत बरूआ जैसे लोगों ने जब इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया” जैसी फूहड़ राजनीति शैली से लोकतंत्र को चोटिल करने का काम किया था, तो इसकी खासी आलोचना हुयी थी। यह अलग बात है पं.जवाहरलाल नेहरू जैसा लोकतांत्रिक व्यवहार बाद के दिनों में उनकी पुत्री के प्रभावी होते ही कांग्रेसी राजनीति में दुर्लभ हो गया। हालात यह बन गए राय देने को आलोचना समझा जाने लगा और आलोचना षडयंत्र की श्रेणी में आ गयी। जो बाद में इंदिरा गांधी के अधिनायकत्व के रूप में आपातकाल में प्रकट भी हुयी। हम देखें तो लोकतंत्र के साढ़े छः दशकों के अनुभव के बाद भी भारत की राजनीति में क्षरण ही दिखता है। खासकर राजनीतिक और प्रजातांत्रिक मूल्यों के स्तर पर भी और संसद-विधानसभाओं के भीतर व्यवहार के तल पर भी।
गिरा बहस का स्तरः
      लोकसभा के आसन्न चुनावों के मद्देनजर जिस तरह की बहसें और अभियान चलाए जा रहे हैं वह उचित नहीं कहे जा सकते। इसमें राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी की तुलना करने का अभियान भी शामिल है। दोनों तरफ से जिस तरह की अभद्रताएं व्यक्त की जा रही हैं वह विस्मय में डालती हैं। मोदी को लेकर उनके आलोचक जहां अतिवादी रवैया अपना रहे हैं, वहीं मोदी स्वयं अपने से आयु व अनुभव में बहुत छोटे राहुल गांधी को शाहजादे कहकर चटखारे ले रहे हैं। इस तरह की चटखारेबाजी प्रधानमंत्री पद के एक उम्मीदवार को कुछ टीवी फुटेज तो दिला सकती है पर शोभनीय नहीं कही जा सकती। यह बड़प्पन तो कतई नहीं है। राहुल-मोदी एक ऐसी तुलना है जो न सिर्फ गलत है बल्कि यह वैसी ही जैसी कभी मनमोहन-आडवानी की रही होगी। भारतीय गणतंत्र दरअसल दो व्यक्तित्वों का संघर्ष नहीं है। यह विविध दलों और विविध विचारों के चुनावी संघर्ष से फलीभूत होता है। हमारे गणतंत्र में बहुमत प्राप्त दल का नेता ही देश का नायक होता है, वह अमरीकी राष्ट्रपति की तरह सीधे नहीं चुना जाता। इसलिए हमारे गणतंत्र की शक्ति ही सामूहिकता है, सामूहिक नेतृत्व है। यहां अधिनायकत्व के लिए, नायक पूजा के लिए जगह कहां है। इसलिए लोकसभा चुनाव जैसे अवसर को दो व्यक्तियों की जंग बनाकर हम अपने गणतंत्र को कमजोर ही करेगें।
व्यक्तिपरक न हो राजनीतिः
   हमारी राजनीति और सार्वजनिक संवाद को हमें व्यक्तिपरक नहीं समूहपरक बनाना होगा क्योंकि इसी में इस पिछड़े देश के सवालों के हल छिपे हैं। कोई मोदी या राहुल इस देश के सवालों को, गणतंत्र के प्रश्नों को हल नहीं कर सकता अगर देश के बहुसंख्यक जनों का इस जनतंत्र में सहभाग न हो। क्योंकि जनतंत्र तो लोगों की सहभागिता से ही सार्थक होता है। इसलिए हमारी राजनीतिक कोशिशें ऐसी हों कि लोकतंत्र व्यक्ति के बजाए समूह के आधार पर खड़ा हो। श्रीमती इंदिरा गांधी मार्का राजनीति से जैसा क्षरण हुआ है, उससे बचने की जरूरत है।
  नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दो बेहद अलग-अलग मैदान में खेल रहे हैं। किंतु हमें यह मानना होगा कि मोदी द्वारा उठाए जा रहे राष्ट्रवाद के सवालों से देश की असहमति कहां हैं। किंतु कोई भी राष्ट्रवाद कट्टरता के आधार पर व्यापक नहीं हो सकता। उसे व्यापक बनाने के लिए हमें भारतीय संस्कृति, उसके मूल्यों का आश्रय लेना पड़ेगा। एक समावेशी विकास की परिकल्पना को आधार देना होगा। जिसमें महात्मा गांधी, दीनदयाल उपाध्याय  और डा. राममनोहर लोहिया की समन्वित विचारधारा के बिंदु हमें रास्ता दिखा सकते हैं। विकास समावेशी नहीं होगा तो इस चमकीली प्रगति के मायने क्या हैं जिसके वाहक आज मनमोहन-मोंटेक सिंह और पी.चिदंबरम हैं। कल इसी आर्थिक धारा के नायक नरेंद्र मोदी- यशवंत सिन्हा-जसवंत सिंह और अरूण जेतली हो जाएं तो देश तो ठगा ही जाएगा।
विचारधारा के उलट आचरण करती सरकारें-
  राहुल गांधी जो कुछ कह रहे हैं उनकी सरकार उसके उलट आचरण करती है। वे गरीब-आम आदमी सर्मथक नीतियों की बात करते हैं केंद्र का आचरण उल्टा है। क्या बड़ी बात है कि कल नरेंद्र मोदी सत्ता में हों और यही सारा कुछ दोहराया जाए। क्योंकि ऐसा होते हुए लोगों ने एनडीए की वाजपेयी सरकार में देखा है। जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिग्गज स्व. दत्तोपंत ठेंगड़ी ने एनडीए सरकार के वित्त मंत्री को अनर्थ मंत्री की संज्ञा दी थी। ऐसे में आचरण के द्वंद सामने आते हैं। भारतीय राजनीति का अजूबा यह कि मजदूरों-मजलूमों की नारे बाजी करने वाली वामपंथी सरकारें भी पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम रच देती हैं। ऐसे में जनता के सामने विमर्श के तमाम प्रश्न हैं, वह देख रही है कि मंच के भाषण और आपके सत्ता में आने के बाद के आचरण में खासा अंतर है। इसने ही देश के जनमन को छलने और अविश्वास से भरने का काम किया है। इसलिए मोदी को देश के सामने खड़े सुरक्षा के सवालों के साथ आर्थिक सवालों पर भी अपना रवैया स्पष्ट करना होगा क्योंकि उनके स्वागत में जिस तरह कारपोरेट घराने लोटपोट होकर उन पर बलिहारी जा रहे हैं, वह कई तरह की दुश्चिताएं भी जगा रहे हैं।
पूंजीवाद को विकसित कीजिए न कि पूंजीवादियों कोः

   आने वाली सरकार के नायकों राहुल गाँधी और नरेंद्र मोदी को यह साफ करना होगा कि वे न सिर्फ समावेशी विकास की अवधारणा के साथ खड़े होंगें बल्कि आमजन उनकी राजनीति के केंद्र में होंगें। उनको यह भी तय करना होगा कि वे आर्थिक पूंजीवाद और विश्व बाजार की सवारी तो करेंगें किंतु वे पूंजीवाद को विकसित करेंगें न कि पूंजीवादियों को। वे देश को प्रेरित करेंगें ताकि यहां उद्यमिता का विकास हो। लोग उद्यमी बनें और उजली आर्थिक संभावनाओं की ओर बढ़ें। एक ऐसा वातावरण बनाना अपेक्षित है, जिसमें युवा संभावनाओं के लिए आगे बढ़ने के अवसर हों और सरकार उनके सपनों के साथ खड़ी दिखे। राहुल गांधी के लिए भी यह सोचने का अवसर है कि आज कांग्रेस के सामने जो सवाल खड़ें हैं उसके लिए उनका दल स्वयं जिम्मेदार है। कांग्रेस की मौकापरस्ती और तमाम ज्वलंत सवालों पर चयनित दृष्टिकोण अपनाकर पार्टी ने अपनी विश्वसनीयता लगभग समाप्त कर ली है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी की सरकारों और कांग्रेस की सरकारों में चरित्रगत अंतर समाप्त होने के कारण जनता के सामने अब दोनों दल सहोदर की तरह नजर आने लगे हैं न कि एक-दूसरे के विकल्प की तरह। नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के लिए आने वाले लोकसभा चुनाव एक अवसर की तरह हैं देखना है कि दोनों अपने आचरण, संवाद तथा प्रस्तुति से किस तरह देश की जनता और दिल्ली का दिल जीतते हैं।