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शनिवार, 2 जनवरी 2016

कौन चाहता है बन जाए राममंदिर?

-संजय द्विवेदी

  राममंदिर के लिए फिर से अयोध्या में पत्थरों की ढलाई का काम शुरू हो गया है। नेताओं की बयानबाजियां शुरू हो गयी हैं। उप्र पुलिस भी अर्लट हो गयी है। कहा जा रहा है कि पत्थरों की यह ढलाई राममंदिर की दूसरी मंजिल के लिए हो रही है।
   राममंदिर के लिए चले लंबे संघर्ष की कथाएं आज भी आखों के सामने तैर जाती हैं। खासकर नवें दशक में एक प्रखर आंदोलन खड़ा करने वाले राममंदिर आंदोलन की त्रिमूर्ति रामचंद्र परमहंस, महंत अवैद्यनाथ और अशोक सिंहल तीनों इस दुनिया से विदा हो चुके हैं। ऐतिहासिक अयोध्या आंदोलन के तमाम नायकों ने समय से समझौता कर अपनी-अपनी राह पकड़ ली है। तब के बजरंगी विनय कटियार वाया भाजपा कई चुनाव हारकर अब राज्यसभा में हैं, तो उमाश्री भारती अपने पड़ोसी राज्य उप्र से दो चुनाव जीतकर (एक विधानसभा एक लोकसभा) अब केंद्र में मंत्री हैं। साध्वी ऋतंभरा ने वात्सल्य आश्रम के माध्यम से सेवा की नई राह चुन ली है। इसके अलावा राजनीति में इस आंदोलन के शिखर पुरूष रहे श्री लालकृष्ण आडवानी भी अब राजनीतिक बियाबान में ही हैं। कुल मिलाकर मंदिर आंदोलन के सारे योद्धा या निस्तेज हो गए हैं तो कई दुनिया छोड़ गए हैं। राममंदिर आंदोलन ने जिस तरह का जनज्वार खड़ा किया था उससे अशोक सिंहल, विनय कटियार, श्रीषचंद्र दीक्षित, दाउदयाल खन्ना, जयभान सिंह पवैया जैसे तमाम चेहरे अचानक खास बन गए थे। लगता था कि सारा जमाना उनके पीछे चल रहा है। अपने अनोखे प्रयोगों जैसे रामशिला पूजन, रामज्योति आदि से यह आंदोलन लोगों तक ही नहीं उत्तर भारत के गांव-गांव तक फैला। यह साधारण नहीं है, अयोध्या में गोली से मरे दो भाई कोठारी बंधु भी पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे।
    आंदोलन को खड़ा करने की सांगठनिक शक्ति से वास्तव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनके संगठनों का कोई मुकाबला नहीं है। हिंदी पट्टी में जहां जाति ही सबसे बड़ी विचारधारा और संगठन है वहां हिंदू शक्ति को एकजुट कर खड़ा करना कठिन था, किंतु एक संगठन ने इसे कर दिखाया। इस समय ने अपने नायक चुने और समूचा हिंदू समाज राममंदिर के निर्माण की भावना के साथ खड़ा दिखाई दिया। इस आंदोलन से शक्ति लेकर ही भाजपा एक बड़ी पार्टी बनी और उसका भौगोलिक और सामाजिक विस्तार हुआ। अनेक जातियों में उसके नेता खड़े हुए। यह साधारण नहीं था कि राममंदिर आंदोलन के तमाम पोस्टर ब्वाय पिछड़े वर्ग से आते थे। जिसमें कल्याण सिंह, उमा भारती और विनय कटियार सबसे बड़े चेहरे थे। राजनीति की पाठशाला में तमाम नए नवेले चेहरे आए और राममंदिर आंदोलन के नाते बड़े नेता बन गए। उप्र में भाजपा को ऐतिहासिक विजय मिली, उसने अपने दम पर पहली बार पूर्ण बहुमत पाकर सरकार बनायी। यह घटना दिल्ली में भी दोहराई गयी और केंद्र में भी सरकार बनी। किंतु राममंदिर का क्या हुआ? तीन बार अटलजी की गठबंधन सरकार और एक बार नरेंद्र मोदी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी भाजपा बना चुकी है, लेकिन सरकार और संगठन का दृष्टिकोण हमेशा अलग-अलग रहा है। सत्ता में जाते ही नेताओं की जुबान बदल जाती है। वे सरकारी बोलने के अभ्यस्त हो जाते हैं। जबकि मंदिर विवाद अदालती से ज्यादा राजनीतिक समस्या है। किंतु यह अफसोसजनक है कि चंद्रशेखर के अलावा किसी भी प्रधानमंत्री ने इस विवाद को संवाद से हल कराने की गंभीर कोशिश नहीं की। चंद्रशेखर जी सिर्फ बहुत कम समय सत्ता में रहे, इसलिए विवाद के हल होने की संभावना भी खत्म हो गयी। आज भी सत्ता के शिखरों पर बैठे लोग इस मंदिर आंदोलन से शक्ति पाकर ही आगे बढ़े हैं किंतु समस्या के समाधान के लिए उनकी कोशिशें नहीं दिखतीं।
    राममंदिर को एक नारे की तरह इस्तेमाल करना और फिर चुप बैठ जाना बार-बार आजमाया गया फार्मूला है। होना तो यह चाहिए या तो अदालत या फिर संवाद दो में से किसी एक रास्ते का अनुसरण हो। हमारे राजनीतिक दलों और राजनेताओं में वह इकबाल नहीं कि वे समस्या के समाधान के लिए संवाद का धरातल बन सकें, वे हर चीज के लिए अदालतों पर निर्भर हैं। सो इस मामले में भी अदालत ही आखिरी फैसला करेगी। सरकारों के बस का तो यह है ही नहीं। इसलिए बेहतर होगा कि संघ परिवार और भाजपा अपने काडर को साफ तौर पर यह संदेश दे कि राममंदिर को लेकर बेवजह की बयानबाजियां रोकी जाएं। बार-बार हिंदू जनमानस से छल करने के ये प्रयास, उनकी हवा खराब कर रहे हैं। जितना बड़ा जनांदोलन 90 के दशक में खड़ा हुआ, अब हो नहीं सकता। इसलिए जनांदोलन की भाषा बोलने के बजाए, समाधान पर जोर दिया जाना चाहिए। अब जबकि यह साफ है कि राममंदिर के मुद्दे पर राजनीतिक दलों और राजनेताओं की सीमाएं स्पष्ट हो चुकी हैं तब इस मामले पर माहौल बिगाड़ने की कोशिशें रोकी जानी चाहिए। आज की तारीख में हमारे सामने अदालत से फैसला लाना ही एकमात्र विकल्प है। हाईकोर्ट इस विषय में फैसला दे चुकी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना शेष है। इसके बावजूद तमाम लोग जिनकी राजनीति राममंदिर के बिना पूरी नहीं होती, इस मुद्दे पर बयान देने से बाज नहीं आते। दोनों तरफ ऐसी राजनीतिक शक्तियां हैं जो इस मामले को जिंदा रखना चाहती हैं। छह दिसंबर को जिस तरह का वातावरण बनाने की कोशिशें होती हैं वह बताती हैं कि राममंदिर की फिक्र दरअसल किसी को नहीं हैं। यह गजब है कि अयोध्या में अपनी जन्मभूमि पर भी इस देश के राष्ट्रपुरूष भगवान श्रीराम का मंदिर बनाने पर विवाद है। जो आजादी के वक्त सोमनाथ में हो सकता है, वह अयोध्या में क्यों नहीं? क्या हम पहले से कम राष्ट्रीय हो गए हैं? अयोध्या में राममंदिर का विवाद दरअसल इस देश की हिंदू-मुस्लिम समस्या का एक जीवंत प्रमाण है। किस प्रकार एक आक्रांता ने एक हिंदू मंदिर को तोड़कर वहां एक ढांचा खड़ा कर दिया था। आज इतने समय बाद भी हम उन यादों को भुला कहां पाए हैं। इतिहास को विकृत करने वाली विरासतों से रिश्ता जोड़ना कहां से भाईचारे की बुनियाद को मजबूत कर सकता है? खुद इकबाल लिखते हैं-
है राम के वजूद पर हिंदोस्तां को नाज
अहले नजर समझते हैं उनको इमामे-हिंद।
  ऐसी सांझी विरासतों को जब मजबूत करने की जरूरत है तो भी राममंदिर न बनने देने के पक्ष में खड़ी ताकतों को भी यह लोकतंत्र अवसर देता है। आप इसे लोकतंत्र का सौंदर्य कह सकते हैं, किंतु यह एक राष्ट्रपुरूष, राष्ट्र की प्रज्ञा और राष्ट्र की अस्मिता का अपमान है। भगवान श्रीराम इस देश के 80 प्रतिशत नागरिकों के लिए राष्ट्रपुरूष और धीरोदात्त नायक हैं। वे जन-मन की आस्था के केंद्र हैं। भारत में बसने वाला शेष समाज प्रभु राम के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए इस स्थान को हिंदू समाज की भावनाओं के मद्देनजर सौंप देता तो कितनी सुंदर राष्ट्रीय भावना का संचार होता। राजनीति के खिलाड़ियों ने इस सद्भावना के बीज को पनपने ही नहीं दिया और अपने-अपने राजनीतिक खेल के लिए लोगों का इस्तेमाल किया। सही मायने में जब कांग्रेस नेता और उप्र सरकार में मंत्री रहे दाऊदयाल खन्ना ने आठवें दशक के अंत में राममंदिर का मामला उठाया था तब यह विषय एक स्थानीय सवाल था, आज यह मुद्दा अपने विशाल स्वरूप से फिर बहुत छोटे रूप में जिंदा है। इस आंदोलन के ज्यादातर नायक कालबाह्य हो चुके हैं। बावजूद इसके 1990 से आज 2015 के अंतिम समय में भी इसके समाधान के लिए शांतिप्रिय आवाजें आगे नहीं आईं। सबको पता है कि वहां अब कभी बाबरी ढांचा या कोई अन्य स्मारक नहीं बन सकता,लेकिन रामलला तिरपाल और टीनशेड में उत्तर प्रदेश की शीत लहर झेल रहे हैं। राममंदिर आंदोलन के समर्थक और विरोधी दोनों प्रकार के राजनीतिक दल जनता का इस्तेमाल कर सत्ता पा चुके हैं। राजभोग जारी है, इसलिए आ रहे साल 2016 की देहरी पर खड़े होकर यह पूछने का मन हो रहा है कि आखिर राममंदिर की चिंता किसे है?

रविवार, 25 अगस्त 2013

इतनी बेरहम कैसे हो गयी ये मुंबई मेरी जान ?



          अगर मुंबई में भी महफूज नहीं तो कहां जाएं लड़कियां?
                           -संजय द्विवेदी
  मुंबई जो कभी मेरा शहर रहा है। इस शहर में जीवन के तीन बेहद खुशनुमा, बिंदास, दोस्ताना, बेधड़क और जिंदादिल साल मैंने गुजारे हैं।सपने देखे हैं, उनकी तरफ दौड़ लगाई है। अखबारों और वेबसाइट्स की नौकरियां करते हुए इन सालों में कभी नहीं लगा कि मुंबई किसी औरत के लिए इतनी खतरनाक हो सकती है। मुंबई की एक महिला पत्रकार के हुयी सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरे हिलाकर रख दिया है। ऐसा इसलिए क्योंकि मुंबई इस देश की सामूहिक आकांक्षाओं, सामूहिक सपनों का प्रतिनिधि शहर है।
    बीते दिनों की सोचता हूं तो देर रात अखबार के दफ्तर से लौटते वक्त, बहुत कम पर कई बार अलसुबह भी किसी खास काम से निकले तो भी देखा कि औरतों के लिए यह शहर हमेशा ही सुरक्षित और सम्मान देने वाला रहा है। औरतों के खिलाफ होने वाले अत्याचार निजी जीवन में होंगें पर इस तरह हिला देने वाली सामूहिक दुराचार की घटनाएं कम सुनी थीं। इस शहर में रहते हुए मुझे कभी नहीं लगा कि एक लड़की को यहां कोई खतरा हो सकता है। लड़कियां और महिलाएं पुरूषों की तरह ही कभी और किसी भी समय मुझे आती-जाती दिख जाती हैं। कई बार जब अन्य महानगरों की कार्य स्थितियों की तुलना होती है तो मुंबई तमाम मामलों में अन्य शहरों से बेहतर नजर आती है। बेतरह भीड़ के बावजूद एक अनुशासन, एक साथ रहना और अपने सपनों के लिए जीना- यह शहर आपको जरूर सिखाता है। इस शहर के किनारों पर विशाल जलराशि से भरे लहराते समुद्र हममें अपनी ही तरह विशाल होने का साहस भी भरते हैं। उनकी उठती- गिरती लहरें हमें जीवन के उतार-चढ़ाव का भान कराती हैं।
   लेकिन क्या समय बदल गया है या मुंबई भी अब शेष शहरों की तरह एक भीड़ भरी अराजक नगरी में बदल रही है? इसका कास्मो चरित्र कुछ ढीला पड़ रहा है? एक स्त्री के साथ ऐसी अमानवीय बर्बरता सभ्य समाज में कहीं से शोभा नहीं देतीं। दिल्ली-मुंबई जैसे शहर जो हमारे देश के बड़े शहर तो हैं ही हमारे देश का अंतरराष्ट्रीय चेहरा भी हैं। दिल्ली और मुंबई में ऐसी घटनाएं हमें बताती हैं कि कानून का राज ढीला पड़ा है और अपराधियों में अब भय नहीं रहा। मीडिया रिर्पोट्स ही बताती हैं कि मुंबई का आधा पुलिस बल वीआईपी ड्यूटी में लगा है। ऐसे में जनता को किसके हाल पर छोड़ दिया गया है।
   मुंबई शहर जो देश की भर की युवा प्रतिभाओं, लड़के-लड़कियों को इस लिए आकर्षित करता है कि यहां आकर आकर वे अपनी प्रतिभा आजमा सकते हैं और अपने सपनों में रंग भर सकते हैं। आखिर इस शहर को हुआ क्या है कि अपने कर्तव्य को अंजाम देती एक लड़की के रास्ते में वहशी दरिंदे आ जाते हैं। मैं जिस मुंबई को जानता हूं वह प्रतिभाओं को आदर देने वाली, आदमी की काबलियत और उसके हुनर की कद्र करने वाली है। ये देश का वो शहर है जहां आम आदमी के सपने सच होते हैं। भारत के छोटे शहरों-गावों में देखे गए सपने, आकांक्षाओं को आकाश देने वाले इस शहर का दिल आखिर इतना छोटा कैसे हो गया, उसका कलेजा इतना कड़ा कैसे हो गया कि एक लड़की की चीख और उसका आर्तनाद अब इसे विकल नहीं करता? यह वो शहर है जो जिंदगी, जोश और जज्बे को सलाम करता है। यह कभी न रूकने वाली, कभी न ठहरने वाली मुंबई अचानक इतनी संवेदनहीन कैसे हो सकती है? सही मायने में इस घटना ने एक बदलती हुयी मुंबई की तस्वीर पेश की है। जो बर्बर है, और हिंसक भी। वह हिंसा भी औरत के खिलाफ। एक महिला पत्रकार के खिलाफ हुयी यह घटना अब सबक बनना चाहिए कि यह कतई दुहराई न जाए। यह जिम्मेदारी हर मुंबईकर की है और समाज को चलाने वाले लोगों की भी है। आरोपियों को कड़ी सजा के साथ-साथ हमें औरत के प्रति, बच्चियों के प्रति सम्मान जगाने, उनकी सुरक्षा को पुख्ता करने के इंतजाम करने होंगें। हमें सोचना होगा कि मुंबई जैसे शहर में भी अगर लड़कियां सुरक्षित नहीं तो आखिरकार वे कहां जाएं। मुंबई का कास्मो चरित्र, यहां की पुलिस और शेष समाज मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाते हैं जहां औरत के लिए जगह भी है और सम्मान भी। किंतु क्या कुछ सिरफिरे और मनोविकारी लोग इस शहर का यह चरित्र हर लेंगें? इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। मुंबई की जीवन शैली और उसमें छलकता हुआ जीवन इसकी एक खास पहचान है। अगर इस शहर ने औरतों को असुरक्षित बनाने, उनकी आजादी और अवसर छीनने की कोशिशें कीं तो मुंबई, मुंबई नहीं रह जाएगी। इसलिए मुंबई के लोगों का यह दायित्व है कि वे जागरूक नागरिकता का परिचय देते हुए अपने शहर की इस खास पहचान को नष्ट न होने दें।
     मुंबई पुलिस, प्रशासन और शेष समाज की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे सपनों में रंग भरने वाले इस शहर का सिर नीचा न होने दें। मुंबई एक सभ्यता का नाम है, एक संस्कृति का नाम है, एक अवसर का नाम है, वह सपनों की एक ऐसी दुनिया है जिसमें हर कोई आकर अपने झंडे गाड़ना चाहता है, व्यापार, फिल्म, फैशन, शेयर, साहित्य, रंगमंच, कला, मीडिया, प्रदर्शन कलाओं से लेकर किसी विधा का भी आदमी आकर एक बार इस शहर पर छा जाना चाहता है। अगर यह मुंबई का नया बनता वहशी चेहरा हमने ठीक न किया तो यह तमाम कलाओं के साथ बड़ा अपराध होगा। औरतों से ही दुनिया संपूर्ण और खूबसूरत होती है। इन तमाम विधाओं में आ रही औरतों डरकर या शहर में असुरक्षाबोध के साथ काम करेगीं तो मुंबई अपनी पहचान खो देगी।
  इस घटना पर जिस तरह सभी समाजों, कलाकारों, राजनीतिक दलों ने अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए प्रतिक्रिया दी है उसे सराहा जाना चाहिए। मुंबई पुलिस ने भी अपनी तत्परता का परिचय दिया है। आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की तरफ हमें बढ़ना चाहिए और उससे जरूरी यह है कि हम अपनी मुंबई को दोबारा शर्मशार न होने दें, ऐसा संकल्प लें। तभी देशवासी गर्व से कह सकेंगें ये मुंबई है मेरी जान!’

मंगलवार, 23 जून 2009

आइए बनाएं एक पानीदार समाज


मीडिया भी सोचे पानी के सवाल पर
मीडिया का काम है लोकमंगल के लिए सतत सक्रिय रहना। पानी का सवाल भी एक ऐसा मुद्दा बना गया है जिस पर समाज, सरकार और मीडिया तीनों की सामूहिक सक्रियता जरूरी है। कहा गया है-
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष,चून।


प्रकृति के साथ निरंतर छेड़छाड़ ने मनुष्यता को कई गंभीर खतरों के सामने खड़ा कर दिया है। देश की नदियां, ताल-तलैये, कुंए सब हमसे सवाल पूछ रहे हैं। हमारे ठूंठ होते गांव और जंगल हमारे सामने एक प्रश्न बनकर खड़े हैं। पर्यावरण के विनाश में लगी व्यवस्था और उद्योग हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं। इस भयानक शोषण के फलित भी सामने आने लगे हैं। मानवता एक ऐसे गंभीर संकट को महसूस कर रही है और कहा जाने लगा है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। बारह से पंद्रह रूपए में पानी खरीद रहे हम क्या कभी अपने आप से ये सवाल पूछते हैं कि आखिर हमारा पानी इतना महंगा क्यों है। जब हमारे शहर का नगर निगम जलकर में थोड़ी बढ़त करता है तो हम आंदोलित हो जाते हैं, राजनीतिक दल सड़क पर आ जाते हैं। लेकिन पंद्रह रूपए में एक लीटर पानी की खरीदी हमारे मन में कोई सवाल खड़ा नहीं करती। उदाहरण के लिए दिल्ली जननिगम की बात करें तो वह एक हजार लीटर पानी के लिए साढ़े तीन रूपए लेता है। यानि की तीन लीटर पानी के लिए एक पैसे से कुछ अधिक। यही पानी मिनरल वाटर की शकल में हमें तकरीबन बयालीस सौ गुना से भी ज्यादा पैसे का पड़ता है। आखिर हम कैसा भारत बना रहे हैं। इसके खामोशी के चलते दुनिया में बोतलबंद पानी का कारोबार तेजी से उठ रहा है और 2004 में ही इसकी खपत दुनिया में 154 बिलियन लीटर तक पहुंच चुकी थी। इसमें भारत जैसे हिस्सा भी 5.1 बिलियन लीटर का है। यह कारोबार चालीस प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रहा है। आज भारत बोतलबंद पानी की खपत के मामले में दुनिया के दस शीर्ष देशों में शामिल है। लेकिन ये पानी क्या हमारी आम जनता की पहुंच में है। यह दुर्भाग्य है कि हमारे गांवों में मल्टीनेशनल कंपनियों के पेय पदार्थ पहुंच गए किंतु आजतक हम आम लोंगों को पीने का पानी सुलभ नहीं करा पाए। उस आदमी की स्थिति का अंदाजा लगाइए जो इन महंगी बोलतों में बंद पानी तक नहीं पहुंच सकता।पानी का विचार करते हुए हमें केंद्र में उन देश के कोई चौरासी करोड़ लोगों को रखना होगा जिनकी आय प्रतिदिन छः से बीस रूपए के बीच है। इस बीस रूपए रोज कमानेवाले आदमी की चिंता हमने आज नहीं की तो कल बहुत देर हो जाएगी। पानी का संघर्ष एक ऐसी शक्ल ले रहा है जहां लोग एक-दूसरे की जान लेने को आमादा हैं। भोपाल में ही पानी को लेकर इसी साल शहर में हत्याएं हो चुकी हैं।


पानी की चिंता आज सब प्रकार से मानवता की सेवा सबसे बड़ा काम है। आंकड़े चौंकानेवाले हैं कितु ये खतरे की गंभीरता का अहसास भी कराते हैं। भारत में सालाना 7 लाख, 83 हजार लोंगों की मौत खराब पानी पीने और साफ- सफाई न होने से हो जाती है। दूषित जल के चलते हर साल देश की अर्थव्यवस्था को करीब पांच अरब रूपए का नुकसान हो रहा है। देश के कई राज्यों के लोग आज भी दूषित जल पीने को मजबूर हैं क्योंकि यह उनकी मजबूरी भी है।


पानी को लेकर सरकार, समाज और मीडिया तीनों को सक्रिय होने की जरूरत है। आजादी के इतने सालों के बाद पानी का सवाल यदि आज और गंभीर होकर हमारे है तो हमें सोचना होगा कि आखिर हम किस दिशा की ओर जा रहे हैं। पानी की सीमित उपलब्धता को लेकर हमें सोचना होगा कि आखिर हम अपने समाज के सामने इस चुनौती का क्या समाधान रखने जा रहे हैं।


मीडिया की जिम्मेदारीः
मीडिया का जैसा विस्तार हुआ है उसे देखते हुए उसके सर्वव्यापी प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। मीडिया सरकार, प्रशासन और जनता सबके बीच एक ऐसा प्रभावी माध्यम है जो ऐसे मुद्दों पर अपनी खास दृष्टि को संप्रेषित कर सकता है। कुछ मीडिया समूहों ने पानी के सवाल पर जनता को जगाने का काम किया है। वह चेतना के स्तर पर भी है और कार्य के स्तर पर भी। ये पत्र समूह अब जनता को जगाने के साथ उनके घरों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने तक में मदद कर रहे हैं। इसी तरह भोपाल की सूखती झील की चिंता को जिस तरह भोपाल के अखबारों ने मुद्दा बनाया और लोगों को अभियान शामिल किया उसकी सराहना की जानी चाहिए। इसी तरह हाल मे नर्मदा को लेकर अमृतलाल वेगड़ से लेकर अनिल दवे तक के प्रयासों को इसी नजर से देखा जाना चाहिए। अपनी नदियों, तालाबों झीलों के प्रति जनता के मन में सम्मान की स्थापना एक बड़ा काम है जो बिना मीडिया के सहयोग से नहीं हो सकता।


उत्तर भारत की गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों को भी समाज और उद्योग की बेरुखी ने काफी हद तक नुकसान पहुंचाया है। दिल्ली में यमुना जैसी नदी किस तरह एक गंदे नाले में बदल गयी तो लखनऊ की गोमती का क्या हाल है किसी से छिपा नहीं है।देश की नदियों का जल और उसकी चिंता हमें ही करनी होगी। मीडिया ने इस बड़ी चुनौती को समय रहते समझा है, यह बड़ी बात है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस सवाल को मीडिया के नियंता अपनी प्राथमिक चिंताओं में शामिल करेंगें। ये कुछ बिंदु हैं जिनपर मीडिया निरंतर अभियान चलाकर पानी को बचाने में मददगार हो सकता है-


1.पानी का राष्ट्रीयकरण किया जाए और इसके लिए एक अभियान चलाया जाए।
2.छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी को एक पूंजीपति को बेचकर जो शुरूआत हुयी उसे दृष्टिगत रखते हुए नदी बेचने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जाए।
3. उद्योगों के द्वारा निकला कचरा हमारी नदियों को नष्ट कर रहा, पर्यावरण को भी। उद्योग प्रायः प्रदूषणरोधी संयत्रों की स्थापना तो करते हैं पर बिजली के बिल के नाते उसका संचालन नहीं करते। उद्योगों की हैसियत के मुताबिक प्रत्येक उद्योग का प्रदूषणरोधी संयत्र का मीटर अलग हो और उसका न्यूनतम बिल तय किया जाए। इससे इसे चलाना उद्योगों की मजबूरी बन जाएगा।
4. केंद्र सरकार द्वारा नदियों को जोड़ने की योजना को तेज किया जाना चाहिए।
5. बोलतबंद पानी के उद्योग को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
6. सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था को दुरुस्त करने के सचेतन और निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए।
7. गांवों में स्वजलधारा जैसी योजनाओं को तेजी से प्रचारित करना चाहिए।
8. परंपरागत जल श्रोतों की रक्षा की जानी चाहिए।
9. आम जनता में जल के संयमित उपयोग को लेकर लगातार जागरूकता के अभियान चलाए जाने चाहिए।
10. सार्वजनिक नलों से पानी के दुरूपयोग को रोकने के लिए मोहल्ला समितियां बनाई जा सकती हैं। जिनकी सकारात्मक पहल को मीडिया रेखांकित कर सकता है।
11.बचपन से पानी के महत्व और उसके संयमित उपयोग की शिक्षा नई पीढ़ी को देने के लिए मीडिया बच्चों के निकाले जा रहे अपने साप्ताहिक परिशिष्टों में इन मुद्दों पर बात कर सकता है। साथ स्कूलों में पानी के सवाल पर आयोजन करके नई पीढ़ी में संस्कार डाले जा सकते हैं।
12. वाटर हार्वेस्टिंग को नगरीय क्षेत्रों में अनिवार्य बनाया जाए, ताकि वर्षा के जल का सही उपयोग हो सके।
13.जनप्रबंधन की सरकारी योजनाओं की कड़ी निगरानी की जाए साथ ही बड़े बांधों के उपयोगों की समीक्षा भी की जाए।
15.गांवों में वर्षा के जल का सही प्रबंधन करने के लिए इस तरह के प्रयोग कर चुके विशेषज्ञों की मदद से इसका लोकव्यापीकरण किया जाए।
16. हर लगने वाले कृषि और किसान मेलों में जलप्रबंधन का मुद्दा भी शामिल किया जाए, ताकि फसलों और खाद के साथ पानी को लेकर हो रहे प्रयोगों से भी अवगत हो सकें, ताकि वे सही जल प्रबंधन भी कर सकें।
17. विभिन्न धर्मगुरूओं और प्रवचनकारों से निवेदन किया जा सकता है कि वे अपने सार्वजनिक समारोहों और प्रवचनों में जलप्रबंधन को लेकर अपील जरूर करें। हर धर्म में पानी को लेकर सार्थक बातें कही गयी हैं उनका सहारा लेकर धर्मप्राण जनता में पानी का महत्व बताया जा सकता है।
18. केंद्र और राज्य सरकारें पानी को लेकर लघु फिल्में बना सकते हैं जिन्हें सिनेमाहालों में फिल्म के प्रसारम से पहले या मध्यांतर में दिखाया जा सकता है।
19. पारंपरिक मीडिया के प्रयोग से गांव-कस्बों तक यह संदेश पहुंचाया जा सकता है।
20. पत्रिकाओं के पानी को लेकर अंक निकाले जा सकते हैं जिनमें दुनिया भर पानी को लेकर हो रहे प्रयोगों की जानकारी दी जा सकती है।
21.राज्यों के जनसंपर्क विभाग अपने नियमित विज्ञापनों में गर्मी और बारिश के दिनों में पानी के संदेश दे सकते हैं।


ऐसे अनेक विषय हो सकते हैं जिसके द्वारा हम जल के सवाल को एक बड़ा मुद्दा बनाते हुए समाज में जनचेतना फैला सकते हैं। यही रास्ता हमें बचाएगा और हमारे समाज को एक पानीदार समाज बनाएगा। पानीदार होना कोई साधारण बात नहीं है, क्या हम और आप इसके लिए तैयार हैं।

मंगलवार, 16 जून 2009

आरएसएस के मुस्लिम प्रेम से उपजे कुछ सवाल


यह प्यार अचानक उमड़ा क्यूं

हां, सात जून को मैं रायपुर में ही था। एक चौंकानेवाली खबर अखबारों में थी। खबर थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रमुख सुदर्शन शहर में हैं और वे मुस्लिम राष्ट्रीय मंच नामक किसी संगठन के तीन दिवसीय आयोजन में भाग लेने के लिए आए हैं। खबर में बताया गया था कि रायपुर शहर के मुस्लिम बुद्धिजीवियों की बैठक 4 जून को हो चुकी है और अब एक प्रशिक्षण शिविर चल रहा है जिसमें देशभर के लगभग 215 लोग भाग ले रहे हैं जो लगभग 22 राज्यों से आए हुए थे। इस आयोजन के समापन के दिन राज्य की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह, आरएसएस की ओर से इस काम को देखने वाले इंद्रेश कुमार भी सुदर्शन के साथ मंच पर थे।
हालांकि आरएसएस के बारे में जैसा सुना और बताया जाता है कि वह एक हिंदू संगठन है और मुसलमानों से दूरी बनाए रखने में ही उसे मजा आता है। यह भी माना जाता है कि संघ मुस्लिम विरोधी भी है। किंतु इस प्रकार की छवि रखनेवाले संगठन की ऐसी कोशिश की तो मीडिया में जोरदार चर्चा होनी चाहिए लेकिन ऐसा कुछ नहीं दिखा। इस आयोजन की राष्ट्रीय मीडिया में किसी तरह की भी चर्चा नहीं हुयी। जबकि लोगों को यह जानने का हक है कि जब सुर्दशन जैसे कट्टर हिंदू नेता मुस्लिम समाज के साथ होते हैं तो उनके संवाद की भाषा क्या होती है, उनकी देहभाषा क्या होती है। आरएसएस के लिए ऐसा क्या जरूरी है कि वह मुसलमानों के बीच जाए और उनकी सुने या अपनी सुनाए। यह सवाल इसलिए भी बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है और हिंदू राष्ट्र के विचार में उसकी आस्था अविचल है। एक आरएसएस नेता कहते हैं हमने इसलिए खुद को हिंदू स्वंयसेवक संघ नहीं कहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहा। जब इस आयोजन के संयोजक डा. सलीम राज से इस अचानक पैदा हुयी मुहब्बत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि यह सच है कि आरएसएस के विरोधियों ने हमारी छवि मुस्लिम विरोधी बना दी है जबकि वास्तविकता यह नहीं है। सलीम राज मानते हैं कि उनसे देर तो हुयी है पर बहुत देर नहीं हुयी है।
मुस्लिम समाज और उसकी राजनीति के संकट पर बातचीत करते समय या तो हम इतनी संवेदनशीलता और संकोच से भर जाते हैं कि ‘सत्य’ दूर रह जाता है या फिर उपदेशक की भूमिका अख्तियार कर लेते हैं। हम इन विमर्शों में प्रायः मुस्लिम राजनीति को दिशाहीन, अवसरवादी, कौम की मूल समस्याओं को न समझने वाली आदि-आदि करार दे देते हैं। दरअसल यह प्रवृत्ति किसी भी संकट को अतिसरलीकृत करके देखने से उपजती है।मुस्लिम राजनीति के संकट वस्तुतः भारतीय राजनीति और समाज के ही संकट हैं। उनकी चुनौतियां कम या ज्यादा गंभीर हो सकती हैं, पर वे शेष भारतीय समाज के संकटों से जरा भी अलग नहीं है। सही अर्थों में पूरी भारतीय राजनीति का चरित्र ही कमोबेश भावनात्मक एवं तात्कालिक महत्व के मुद्दों के इर्द-गर्द नचाता रहा है। आम जनता का दर्द, उनकी आकांक्षाएं और बेहतरी कभी भारतीय राजनीति के विमर्श के केंद्र में नहीं रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति का यह सामूहिक चरित्र है, अतएव इसे हिंदू, मुस्लिम या दलित राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखने को कोई अर्थ नहीं है और शायद इसलिए ‘जनता का एजेंडा’ किसी की राजनीति का एजेंडा नहीं है। यह अकारण नहीं है कि मंडल और मंदिर के भावनात्मक सवालों पर आंदोलित हो उठने वाला हमारा राजनीतिक समाज बेरोजगारी के भयावह प्रश्न पर एक देशव्यापी आंदोलन चलाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। इसलिए मुस्लिम नेताओं पर यह आरोप तो आसानी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कौम को आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़ा बनाए रखा, लेकिन क्या यही बात अन्य वर्गों की राजनीति कर रहे लोगों तथा मुख्यधारा की राजनीति करने वालों पर लागू नहीं होती ? बेरोजगारी, अशिक्षा, अंधविश्वास, गंदगी, पेयजल ये समूचे भारतीय समाज के संकट हैं और यह भी सही है कि हमारी राजनीति के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक परिवेश में आश्चर्यजनक ही है। देश की मुस्लिम राजनीति का एजेंडा भी हमारी मुख्यधारा की राजनीति से ही परिचालित होता है।
सही अर्थों में भारतीय मुसलमान अभी भी बंटवारे के भावनात्मक प्रभावों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। पड़ोसी देश की हरकतें बराबर उनमें भय और असुरक्षाबोध का भाव भरती रहती हैं। लेकिन आजादी के अर्द्धशती भीत जाने के बाद अब उनमें यह भरोसा जगने लगा है। कि भारत में रुकने का उनका फैसला जायज था। इसके बावजूद भी कहीं अन्तर्मन में बंटवारे की भयावह त्रासदी के चित्र अंकित हैं। भारत में गैर मुस्लिमों के साथ उनके संबंधों की जो ‘जिन्नावादी असहजता’ है, उस पर उन्हें लगातार ‘भारतवादी’ होने का मुलम्मा चढ़ाए रखना होता है। दूसरी ओर पाकिस्तान और पाकिस्तानी मुसलमानों से अपने रिश्तों के प्रति लगातार असहजता प्रकट करनी पड़ती है। मुस्लिम समाज का यह वैचारिक द्वंद्व बहुत त्रासद है। आप देखें तो हिंदुस्तान के हर मुसलमान नेता को एक ढोंग रचना पड़ता है। एक तरफ तो वह स्वयं को अपने समाज के बीच अपनी कौम और उसके प्रतीकों का रक्षक बताता है, वहीं दसरी ओर उसे अपने राजनीतिक मंच (पार्टी) पर भारतीय राष्ट्र राज्य के साथ अपनी प्रतिबद्धता का स्वांग रचना पड़ता है। समूचे भारतीय समाज की स्वीकृति पाने के लिए सही अर्थों में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। फिलवक्त की राजनीति में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। फिलवक्त की राजनीति में तो ऐसा संभव नहीं दिखता ।भारतीय समाज में ही नहीं, हर समाज में सुधारवादी और परंपरावादियों का संघर्ष चलता रहा है। मुस्लिम समाज में भी ऐसी बहसे चलती रही हैं। इस्लाम के भीतर एक ऐसा तबका पैदा हुआ, जिसे लगता था कि हिंदुत्व के चलते इस्लाम भ्रष्ट और अपवित्र होता जा रहा है। वहीं मीर तकी मीर, नजीर अकबरवादी, अब्दुर्रहीम खानखाना, रसखान की भी परंपरा देखने को मिलती है। हिंदुस्तान का आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर एक शायर था और उसे सारे भारतीय समाज में आदर प्राप्त था। एक तरफ औरंगजेब था तो दूसरी तरफ उसका बड़ा भाई दारा शिकोह भी था, जिसनें ‘उपनिषद्’ का फारसी में अनुवाद किया। इसलिए यह सोचना कि आज कट्टरता बढ़ी है, संवाद के अवसर घटे हैं-गलत है। आक्रामकता अकबर के समय में भी थी, आज भी है। यही बात हिंदुत्व के संदर्भ में भी उतनी ही सच है। सावरकर और गांधी दोनों की उपस्थिति के बावजूद लोग गांधी का नेतृत्व स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन इसके विपरीत मुस्लिमों का नेतृत्व मौलाना आजाद के बजाए जिन्ना के हाथ में आ जाता है। इतिहास के ये पृष्ठ हमें सचेत करते हैं। यहां यह बात रेखांकित किए जाने योग्य है कि अल्पसंख्यक अपनी परंपरा एवं विरासत के प्रति बड़े चैतन्य होते हैं। वे चाहते हैं कि कम होने के नाते कहीं उनकी उपेक्षा न हो जाए । यह भयग्रंथि उन्हें एकजुट भी रखती है। अतएव वे भावनात्मक नारेबाजियों से जल्दी प्रभावित होते हैं। सो उनके बीच राजनीति प्रायः इन्हीं आधारों पर होती है। यह अकारण नहीं था कि आज न पढ़ने वाले मोहम्मद अली जिन्ना, जो नेहरू से भी ज्यादा अंग्रेजी थे, मुस्लिमों के बीच आधार बनाने के लिए कट्टर हो गए । आधुनिक संदर्भ में सैय्यद शहबुद्दीन का उदाहरण ताजा है, जिन्हें एक ईमानदार और उदार अधिकारी जानकार ही अटलबिहारी वाजपेयी ने राजनीति में खींचा । लेकिन जब उन्होंने अपनी ‘मुस्लिम कांस्टिटुएंसी’ बनानी शुरु की तो वे खुद को ‘कट्टर मुस्लिम’ प्रोजेक्ट करने लगे । कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की शिक्षा-दीक्षा विदेशों में हुई है, लेकिन जामिया मिलिया में मचे धमाल में वे कट्टरपंथियों के साथ खड़े दिखे थे । मुस्लिम राजनीति वास्तव में आज एक खासे द्वंद में हैं, जहां उसके पास नेतृत्व का संकट है । आजादी के बाद 1964 तक पं. नेहरु मुसलमानों के निर्विवादित नेता रहे । सच देखें तो उनके बाद मुसलमान किसी पर भरोसा नहीं कर पाया और जब किया तब ठगा गया । बाबरी मस्जिद काण्ड के बाद मुस्लिम समाज की दिशा काफी बदली है । बड़बोले राजनेताओं को समाज ने हाशिए पर लगा दिया है । मुस्लिम समाज में अब राजनीति के अलावा सामाजिक, आर्थिक, समाज सुधार, शिक्षा जैसे सवालों पर बातचीत शुरु हो गई है । सतह पर दिख रहा मुस्लिम राजनीति का यह ठंडापन एक परिपक्वता का अहसास कराता है । मुस्लिम समाज में वैचारिक बदलाव की यह हवा जितनी ते होगी, समाज उतना ही प्रगति करता दिखेगा । एक सांस्कृतिक आवाजाही, सांस्कृतिक सहजीविता ही इस संकट का अंत है । जाहिर है इसके लिए नेतृत्व का पढ़ा, लिखा और समझदार होना जरुरी है । नए जमाने की हवा से ताल मिलाकर यदि देश का मुस्लिम अपने ही बनाए अंधेरों को चीरकर आगे आ रहा है ति भविष्य उसका स्वागत ही करेगा । वैसे भी धार्मिक और जज्बाती सवालों पर लोगों को भड़काना तथा इस्तेमाल करना आसान होता है । गरीब और आम मुसलमान ही राजनीतिक षडयंत्रों में पिसता तथा तबाह होता है, जबकि उनका इस्तेमाल कर लोग ऊंची कुर्सियां प्राप्त कर लेते हैं और उन्हें भूल जाते हैं । आरएसएस जैसे संगठन भी यदि यह मानने लगे हैं कि देश की प्रगति बिना मुस्लिम समाज को साथ लिए संभव नहीं है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। जैसा कि रायपुर सम्मेलन का निष्कर्ष है –शिक्षा और वतनपरस्ती ही मुस्लिम समाज की मुक्ति में सहायक हो सकते हैं। यह मान लेने में संकोच नहीं करना चाहिए कि आरएसएस इस पहल को यदि सच्चे दिल से कर रहा है तो इससे सही परिणाम भी दिखने लगेंगें। क्योंकि आरएसएस की निष्ठा और ईमानदारी पर शक उसके विरोधी भी नहीं करते। आरएसएस जैसा कह रहा है वैसा कर पाया तो भारतीय जनमानस में फैले असुरक्षा और अंधकार के बाद छंट सकते हैं। यही क्षण भारत मां के माथे पर सौभाग्य का टीका साबित होगा।

शुक्रवार, 29 मई 2009

कैसा बन रहा है हमारा भारत

प्राथमिक शिक्षा की बदहाली पर सोचना होगा

नारे 21 वीं सदी को भारत की सदी बनाने के हैं, लेकिन हमारी प्राथमिक शिक्षा की बदहाली तो यही कहती है कि यह सपना कहीं सपना ही न रह जाए। जिस तरह से इस बार परीक्षा परिणाम आए हैं वे चौंकाते हैं, सरकारी स्कूलों में पढ़ रही नई पीढ़ी का हम कैसा भविष्य गढ़ रहे हैं इस पर सवाल खड़े हो गए हैं।


परीक्षा के बिगड़े परिणामों से सरकार हैरत में है और अब इसकी समीक्षा की जा रही है। पर देखना होगा कि क्या इसके हालात सरकारी तंत्र ने ही ऐसे नहीं बना दिए हैं। आज हालत यह है कि थोड़ी सी बेहतर आर्थिक स्थिति वाले लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजना चाहते। यहां ठहरकर सोचना होगा कि आजादी के छः दशक में ऐसा क्या हुआ कि हमारे सरकारी स्कूल जहां देश का भविष्य गढ़ा जाना था वे एक अराजकता के केंद्र में तब्दील हो गए। सरकारी शिक्षकों को ऐसा क्या हुआ है कि वे सरकारी नौकरी में आकर एक ऐसे व्यक्ति में तब्दील हो जाते हैं जिसमें काम का जूनून प्रायः नहीं दिखता। सरकारी तंत्र में ऐसा क्या है कि वह व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति ही उदासीन बना देता है। मप्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, उप्र, बिहार जैसे तमाम राज्य जहां आज भी एक बड़ी आबादी सरकारी स्कूलों पर ही निर्भर है हमें अपनी प्राथमिक शिक्षा के ढांचे पर विचार करना होगा। हमें यह मान लेना चाहिए कि हमारे स्कूल स्लम में तब्दील हो रहे हैं, जहां एक बड़ी आबादी के सपने दफन किए जा रहे हैं।


चमकीली प्रगति कई तरह का भारत रचकर नहीं हो सकती है। लेकिन सचाई यह है कि हम भारत और इंडिया के बीच की खाई और चौड़ी करते जा रहे हैं। सरकारी स्कूलों से पढ़कर निकली पीढ़ी, अंग्रेजी और हिंदी माध्यम के प्राइवेट स्कूलों से निकली पीढ़ी के अलावा एक बहुत हाई-फाई पीढ़ी भी हम तैयार कर रहे हैं जो आधुनिकतम सुविधाओं से लैस स्कूलों में तैयार हो रही है और लाखों रूपए सालाना फीस देकर पढ़ रही है। यह तीन तरह का भारत हम एक साथ तैयार कर रहे हैं। जिसमें पहला भारत सेवा के लिए, दूसरा बाबू बनने के लिए और तीसरा शासक बनने के लिए तैयार किया जा रहा है। इससे भारत में सामाजिक-आर्थिक परिवेश में बहुत गहरे विभेद पैदा हो रहे हैं जिसके नकारात्मक फलितार्थ हमें दिखाई देने लगे हैं। समाज में इस तरह के विभाजन के अपने खतरे हैं जिसे उठाने के लिए देश तैयार नहीं है। अपने सरकारी स्कूलों को इस हाल में जाता देखने के लिए सरकारें विवश हैं क्योंकि इनकी उपेक्षा के चलते ही ये स्कूल इन हालात में पहुंचे है। सरकार की शिक्षा के प्रति उदासीनता के चलते ही प्राथमिक शिक्षा का बाजार पनपा है और अब उसके हाथ उच्च शिक्षा तक भी पहुंच रहे हैं।


क्या कारण है कि ये सरकारी स्कूल बदहाली के शिकार हैं। क्या कारण है कि इनमें काम करने वाले अध्यापक आज शिक्षा कर्मी के नाम से भर्ती किए जा रहे हैं जिन्हें चपरासी से भी कम वेतन दिया जा रहा है। इसके अलावा तमाम सरकारी काम भी इसी अमले के भरोसे डाल दिए जाते हैं। मतदाता सूची के सर्वेक्षण, मतदान कराने से लेकर, सरकार की तमाम योजनाओं में इन्हीं शिक्षकों का इस्तेमाल किया जाता है। जाहिर तौर पर हमारी प्राथमिक शिक्षा इन्हीं स्थितियों में दम तोड़ रही है। हमें देखना होगा कि हम कैसे इस खोखली होती नींव को बचा सकते हैं। एक बहुत व्यावहारिक सुझाव यह है कि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के बच्चे भी इन स्कूलों में नहीं जाते, क्या ही अच्छा होता कि यह अनिर्वायता होती कि हर सरकारी कर्मचारी का बच्चे अब सरकारी स्कूल में जाएंगें। इससे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार तो कम होगा ही सरकारी स्कूलों के हालात सुधर जाएंगें। क्योंकि प्राथमिक एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था आजतक हम लागू नहीं कर पाए, इससे हमारा लोकतंत्र बेमानी बनकर रह गया है। तमाम कमेटियों की रिपोर्ट धूल फांक रही है। बच्चे एक प्रयोग का विषय बनकर रह गए हैं। यशपाल कमेटी कहती है कि उन्हें उनकी मातृभाषा में शिक्षा दीजिए,हम उनपर सारे विषय अंग्रेजी में पढ़ने का दबाव बनाए हुए हैं। यह शिक्षा की विसंगतियां हमारे देश के भविष्य पर ग्रहण की तरह खड़ी हैं। बच्चों के परीक्षा परिणाम बिगड़ रहे हैं। शिक्षक मनमानी कर रहे हैं क्योंकि उन्हें सुविधाएं नहीं हैं। सीमित क्षमताओं के साथ ज्यादा अपेक्षाएं पाली जा रही हैं। पाठ्यक्रमों पर भी विचार का सही समय आ गया है। किताबों का बोझ और रटने वाली विद्या से तैयार हो रही पीढ़ी आज के दौर की चुनौतियों से जूझने के लिए कितनी सक्षम है यह भी देखना होगा। हालात बिगड़ने पर ही जागने वाले हम हिंदुस्तानियों ने अपनी प्राथमिक शिक्षा की विसंगतियों पर आज गौर नहीं किया तो कल बहुत देर हो जाएगी। एक लाचार और नाराज पीढ़ी का निर्माण करके हम अपने देश के सुखद भविष्य की कामना तो नहीं कर सकते।

गुरुवार, 28 मई 2009

छत्तीसगढ़ में इस तरह तो नहीं खड़ी होगी कांग्रेस


छत्तीसगढ़ में कांग्रेस रसातल की ओर जा रही है लेकिन इसे रोकने के किसी प्रयास के लिए आलाकमान तैयार नहीं दिखता। 4 लोकसभा सीटों वाले हिमाचल प्रदेश में एक सीट पाकर दो कैबिनेट मंत्री बनाने वाली कांग्रेस को 11 सीटों वाले छत्तीसगढ़ की याद नहीं आयी। हिमाचल से जीते एकमात्र लोकसभा सदस्य वीरभद्र सिंह और राज्यसभा के सदस्य आनंद शर्मा को मंत्रिमंडल में जगह दी गयी है किंतु छत्तीसगढ़ से जीते एकमात्र सांसद के लिए मंत्रिमंडल में जगह नहीं है। उल्लेखनीय है कि चरणदास महंत कोरबा से जीतने वाले कांग्रेस के एकमात्र लोकसभा सदस्य हैं। यही कहानी पिछली लोकसभा में भी दुहराई गयी जब अजीत जोगी को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। बाद में हुए लोकसभा के उपचुनाव में देवब्रत सिंह राजनांदगांव से चुनाव जीते, दोनों सांसदों को दिल्ली की सरकार में कोई मौका नहीं दिया गया।

याद करें भाजपा की एनडीए सरकार को जिसने छत्तीसगढ़ से लगातार दो मंत्री केंद्र में बनाए रखे। रायपुर के सांसद रमेश बैस और राजनांदगांव से जीते डा. रमन सिंह दोनों को दिल्ली मंत्री बनाया गया। इसी तरह डा. सिंह के राज्य में आने के बाद दिलीप सिंह जूदेव को भी मंत्री पद दिया गया। लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं कर पायी। ऐसा क्यों हुआ इसका सीधा उत्तर भी किसी कांग्रेसी के पास नहीं है। राज्य की यह उपेक्षा निश्चित ही रेखांकित की जानी चाहिए। छत्तीसगढ़ एक नवसृजित राज्य है जहां विकास की अपार संभावनाएं देखी और महसूसी जा रही हैं किंतु कांग्रेस आलाकमान ने पिछले पांच साल से पार्टी को उपेक्षा से ही देखा है। बाकी कसर गुटों में बंटी पार्टी के नेताओं ने तोड़फोड़ मचाकर पूरी कर दी है।

राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी का लगभग हर गुट से पंगा है। आपस में लड़ते-झगड़ते कांग्रेसी किसी भी सवाल पर एकमत होने को तैयार नहीं है। इसके चलते राज्य में पार्टी का संगठन ध्वस्त हो गया है। जिन राहुल गांधी के नाम पर पूरे देश में इतनी ढोल पीटी जा रही है वही राहुल बस्तर में रैली करते हैं और बस्तर की 12 में 11 विधानसभा सीटें भाजपा जीत जाती है । एक सीट पर उसके विधायक कवासी लखमा कुल 200 सीटों से जीत पाते हैं। वह आदिवासी बहुल सीटें जिनपर भारी जीत दर्ज करवाकर छत्तीसगढ़ की सीटों की बदौलत कांग्रेस संयुक्त मप्र में अपनी सरकार बनाया करती थी उसकी इतनी बुरी हालत की वजह क्या है इसे सोचना होगा। राहुल गांधी के जिस करिश्मे पर दिल्ली में सरकार बनने की बात कही जा रही है वही राहुल छ्त्तीसगढ़ में इसी लोकसभा चुनाव में छः रैलियां करते हैं जिनमें राजनांदगांव, मरवाही, राजिम, रायगढ़, जांजगीर-चांपा, अम्बिकापुर शामिल हैx आपको बता दें कि इनमें से मरवाही के अलावा कांग्रेस को कहीं बढ़त नहीं मिली। यह भी जान लें कि मरवाही अजीत जोगी का चुनाव क्षेत्र है जहां कांग्रेस को पिछले दो विधानसभा चुनावों में क्रमशः 40 और 50 हजार वोटों की लीड मिली थी। इसी तरह श्रीमती सोनिया गांधी इस बार दो क्षेत्रों में सभाएं लेने पहुंची जिनमें कांकेर और बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र हैं, इन पर भाजपा जीती है। इस तरह का आकलन वैसे तो चीजों को अतिसरलीकृत करके देखने जैसा है किंतु यह उस प्रचार की पोल खोलता कि गांधी परिवार के चलते कांग्रेस को बड़ी सफलताएं मिल रही हैं। यदि ऐसा देश के संर्दभ में सच भी हो तो छत्तीसगढ़ में यह जादू क्यों नहीं चल रहा है इस पर कांग्रेस को जरूर सोचना चाहिए।

यह सिर्फ डा. रमन सिंह का करिश्मा है या इस हालत के लिए कांग्रेस आलाकमान खुद भी कोई जिम्मेदारी लेगा। इस खराब होते हालात को संभालने के लिए कोई हाथ आगे बढ़ता दिखाई नहीं देता। शायद यही कारण है कि पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी के नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, प्रदेश अध्यक्ष धनेंद्र साहू, विधानसभा में उपनेता रहे भूपेश बधेल, पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा चुनाव हार गए। इस लोकसभा चुनाव में भी अजीत जोगी की धर्मपत्नी रेणु जोगी बिलासपुर से, भूपेश बधेल रायपुर से, प्रदीप चौबे भाजपा में भारी बगावत के बावजूद दुर्ग से, राजनांदगांव से देवब्रत सिंह जैसे दिग्गज चुनाव हार गए। चरणदास महंत ने जरूर कोरबा की प्रतिष्ठापूर्ण सीट पर भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अटलविहारी वाजपेयी की भतीजी करूणा शुक्ला को चुनाव हराकर कांग्रेस की लाज रखी। बावजूद इसके लगता है कि आलाकमान की प्राथमिकताओं में छत्तीसगढ़ कहीं नहीं है वरना कांग्रेसी दिग्गज मोतीलाल वोरा भी राज्यसभा के सदस्य हैं उन्हें भी मौका देकर छत्तीसगढ़ को प्रतिनिधित्व दिया जा सकता था। राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने अपने छत्तीसगढ़ दौरों में लगातार आदिवासी समाज के प्रति अपने प्रेम का प्रगटीकरण किया था। किंतु इसे प्रकट करने के जो भी अवसर आए कांग्रेस ने इससे किनारा ही किया है। जाहिर तौर पर इस तरीके से तो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को कोई करिश्मा ही खड़ा कर सकता है। सकारात्मक परिणाम पाने के लिए सकारात्मक संदेश भी भेजने होते हैं किंतु कांग्रेस आलाकमान ने राज्य की कांग्रेस को उसके बुरे हाल पर छोड़ दिया है। दिल्ली से आने वाले केंद्रीय मंत्री अक्सर डा. रमन सिंह की सरकार की तारीफ करके चले जाते हैं और स्थानीय कांग्रेसजन इसे लेकर सिर पीटते रह जाते हैं किंतु ऐसा लगने लगा है कि वे अनायास ऐसा नहीं करते। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में कांग्रेस के पास अब सिर्फ अतीत की स्वर्णिम यादें हैं और बदहाल भविष्य,जिसे संवारने के लिए फिलहाल तो उसके पास कोई भागीरथ नहीं दिखता।

रविवार, 26 अप्रैल 2009

लोकतंत्र का महापर्व और मीडिया

भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया की समझ और उसका कवरेज बहुत आसान नहीं है। चुनावों में न सिर्फ मीडिया की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है वरन स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में यह चुनौतीपूर्ण भी हो जाती है। चुनाव के दौरान मीडिया की विश्वसनीयता भी दांव पर लग जाती है और यह कहना बहुत कठिन है कि वह इसमें कितना खरा उतरता है। भारत जैसे महादेश की विशाल संरचना, विविध भाषाएं, क्षेत्रीय अस्मिताएं, आकांक्षाएं, जाति चेतना, शिक्षा का विविध स्तर जिस तरह सामने आते हैं उसमें कोई संतुलित दृष्टि बना पाना वास्तव में आसान नहीं होता। प्रिंट मीडिया ने तो लंबे अनुभव से इसमें एक परंपरागत कौशल अर्जित कर लिया है लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया को अभी इस क्षेत्र में लंबा मुकाम तय करना है।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की तमाम खूबियों के बावजूद तमाम बुराइयां भी हैं जो चुनाव के समय ज्यादा प्रकट रूप में सामने आती हैं। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है जाहिर तौर पर मीडिया की जिम्मेदारी भी इस लोकतंत्र के महापर्व में विशेष हो जाती है। किंतु जैसी बातें सुनने में आती हैं मीडिया भी हमारे संसदीय लोकतंत्र बुराइयों से बच नहीं पा रहा है। चुनावी कवरेज में भी पैकेज का खेल शुरू हो गया है जिससे जनतंत्र मजबूत तो नहीं हो रहा है उल्टे मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान उठने लगे हैं। यह बात रेखांकित करने योग्य है कि है कि देश के दो महत्वपूर्ण पत्र समूहों ने चुनावी कवरेज की पवित्रता के लिए संकल्प जताया है। सो सब कुछ बुरा ही है ऐसा सोचना ठीक नहीं किंतु विचार का बिंदु यह है कि हम अपनी चुनावी कवरेज या रिर्पोटिंग की प्रामणिकता और विश्वसनीयता कैसे बचाएं। कई बार मीडिया अपनी तरफ से एजेंडा सेट कर लेता है और जमीनी हकीकत उससे उलट होती है, तब दंभी राजनीति मीडिया को लांछित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती। जाहिर तौर पर चुनावी कवरेज को हमें इस स्तर पर ले जाना होगा ताकि कोई राजनीतिक दल मीडिया के आंकलनों का मजाक न बना सके। यहां यह करते हुए हमें अपनी सीमाओं का भी ध्यान रखना होगा कि हम जाने अनजाने किसी के हाथ का खिलौना तो नहीं बन रहे हैं। पत्रकार की राजनीतिक विचारधारा हो सकती है और बहुत संभव है कि वह अपनी राजनितिक विचारधारा को राज करते देखने का भी आकांक्षी भी हो। किंतु उसकी पोलिटिकल लाइन कहीं पार्टी लाइन में तो नहीं बदल रही है, इसे उसे सचेत होकर देखना होगा। अपनी निगहबानी और निगरानी उसे खुद करनी होगी। तभी वह अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदार रह पाएगा। यहां सवाल यह भी उठता है कि पत्रकार की व्यक्तिगत ईमानदारी से क्या काम चल जाएगा। मीडिया संस्थानों के प्रबंधकों को भी इसमें योगदान देना होगा। एक तरफ पत्रकार का मिशन तो दूसरी ओर मीडिया प्रबंधकों और संस्थान का एजेंडा जिसे व्यवसाय की आड़ में पत्रकारिता को कलंकित करने की छूट होती है इससे बचना होगा।

चुनाव रिर्पोटिंग दरअसल बच्चों का खेल नहीं है यह एक सावधानी पूर्ण काम है जिसे अनुभव, अध्ययन, प्रदेश की सामाजिक, आर्थिक, जातीय स्थितियों और सामाजिक ताने बाने को समझे बिना नहीं किया जा सकता। जनता की आंख और कान होने का दावा करने वाले मीडिया की जिम्मेवारी है कि वह सही तथ्यों को जनता के सामने रखे और प्रतिनिधि का रिर्पोट कार्ड बिना हील-हुज्जत के लोगों को बताए। सिर्फ जातीय समीकरणों के आधार होने वाली रिर्पोटिंग से आगे बढ़कर मुद्दों को आगे लाने की कोशिश भी मीडिया की एक बड़ी जिम्मेदारी है। आज खबर पहले दिखाने की होड़ जिस दौर में पहुंच गयी है वहां पत्रकार की चिंताएं बहुत बढ़ गयी हैं। रिर्पोटिंग का स्वभाव भी सुविधाओं की गोद में बैठने का होता जा रहा है जबकि जमीन पर उतरे बिना सच्चाई सामने नहीं आती है। प्रायः पत्रकार बहुत अंदर के गांवों और वनवासी क्षेत्रों में नहीं जाते। जिससे वहां चलने वाली हलचलों का पता नहीं चल पाता। इससे तमाम क्षेत्रों की सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती। जिन सर्वेक्षणों के चलते मीडिया का विश्वसनीयता सर्वाधिक प्रभावित हो रही है उसे करने वाली कंपनियों की भी विश्वसनीयता दांव पर रहती है। पर प्रायः ये सर्वेक्षण सच के करीब नहीं आ पाते। यह भी सोचने की बात है कि कई बड़ी मीडिया कंपनियां अब राजनीतिक दलों से मिलकर सर्वे के परिणामों में उलटफेर करती हैं। यह सोचना भी बहुत डरावना है कि ऐसे में उस साख का क्या होगा जिसे लेकर मीडिया जनता के बीच आदर पाता है। प्रिंट माध्यम में कई समाचार पत्र बाजार के तमाम दबावों के बावजूद बेहतर काम कर रहे हैं किंतु इलेक्ट्रानिक माध्यमों के सामने चुनौती बड़ी है। उन्हें न सिर्फ नजरिए में बदलाव लाना होगा वरन अपने माध्यम के दैनिक कर्म से अलग चुनावी कवरेज को गंभीर बनाना होगा। बाजार के हाथ का खिलौना हर कोई बनना चाहता है किंतु साख को कायम एक अलग ही बात है। न्यूज चैनलों को सही तस्वीर दिखाने के लिए आगे आना होगा। कैसे कोई वीआईपी इलाका बन जाता है तो कैसे कोई क्षेत्र बहुत पिछड़ा रह जाता है। विकास के साधनों की बंदरबांट और जनप्रतिनिधि की अपने क्षेत्र के बारे में सोच के प्रकटीकरण का चुनाव बेहद उपयुक्त माध्यम हैं। टीवी पर होने वाली बहसें भी कभी कभार छिछली चर्चा में तब्दील हो जाती हैं क्योंकि कई बार खुद एंकर की पकड़ विषय या क्षेत्र पर नहीं होती। अब जबकि चुनाव आयोग लगातार अपनी सक्रियता से चुनावों में कम से कम दिखने वाले कदाचारों को रोकने में तो सक्षम है मीडिया को भी सिर्फ कार्रवाईयों के विवरण के बजाए अपनी सक्रियता दिखानी चाहिए ताकि आर्दश आचार संहिता का पालन राजनीतिक दलों के लिए अनिवार्य हो जाए। चुनावी कवरेज में कई बार बाहर से गए अनुभवी पत्रकार ज्यादा सच्चाईयां सामने ला सकते हैं। छोटे स्थान की अपनी सीमाएं होती हैं वहां नेता, प्रशासन, आपराधिक तत्वों का एक गठबंधन बन जाता है। सो स्थानीय पत्रकार भी कई बार भय के कारण भी सामने नहीं आ पाते ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकारों को कमान संभालनी चाहिए। इसी तरह मीडिया के तमाम संगठनों ने शत प्रतिशत मतदान के लिए प्रयास शुरू किए हैं। अपने जागरूकता फैलाने वाले विज्ञापनों से उन्होंने लोगों में मतदान का प्रतिशत बढ़ाने का प्रयास किए ऐसे रचनात्मक प्रयासों से मीडिया अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भी निभा रहा है। अब जबकि हर साल देश में कहीं न कहीं चुनाव चलते ही रहते हैं हमें अपने लोकतंत्र को सार्थक बनाने के लिए मीडिया के योगदान को एक वैज्ञानिक कर्म में बदल देना चाहिए। जिससे हम चुनावी कवरेज की ऐसी विधि विकसित कर सकें जिसमें आमजन की जागरूकता से राजनीति पर समाज का नैतिक नियंत्रण कायम हो सके। इससे मीडिया जनविश्वास तो हासिल करेगा ही लोकतंत्र को भी मजबूत बनाने में अपनी भूमिका निभा सकेगा।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

राखी, मीडिया और स्वयंवर

राखी सावंत पर एक बार फिर मीडिया फिदा है। वे फिदा करना जानती भी हैं। अब वे एक टीवी चैनल पर शादी रचाने जा रही हैं। राखी फिर खबर बन गई हैं। मीका प्रकरण से आगे बढ़कर प्रेमी को कैमरों के सामने थप्पड़ मारती और उसे अपने पैरों पर नाक रगड़वाती राखी, नृत्य प्रतियोगिता में धमाल मचाती राखी, बिग बास के घर में कभी नाचती कभी रूठती राखी अब फिर एक नए अवतार में हैं। चौदह एपीसोड के इस शो में राखी जीतने वाले से शादी कर लेगीं। जाहिर तौर यह सनसनी वही कर सकती हैं। उन्हें अपनी सीमित क्षमताओं के बावजूद बाजार के मंत्र और उनका इस्तेमाल करना आ गया है। कलंक जब पब्लिसिटी के काम आने लगें तो उदाहरण आम हो जाते हैं।
राखी- मीका चुम्बन प्रसंग की याद करें तो इस प्रकरण पर समाचारों, क्लीपिंग्स के साथ-साथ चैनलों पर छिड़े विमर्शों को देखना एक अलग अनुभव था। शायद यही नए मीडिया की पदावली है और उसका लोकप्रिय विमर्श भी। चुम्बन से चमत्कृत मीडिया के लिए आडटम गर्ल रातोरात स्टार बन जाती हैं। राखी हर चैनल पर मौजूद थीं, अपने मौजूं किंतु शहीदाना स्त्री विमर्श के साथ। यही वह क्षण है जिसने राखी को भारतीय मनोरंजन जगत ही नहीं मीडिया का भी एक अनिवार्य चेहरा बना दिया। वे चुम्बन का एक ऐसा शिकार थीं जो अपनी जंग को नैतिकता का जामा पहना रहा था और खासकर दृश्य मीडिया राखी के दुख में आंसू टपका रहा था। ऐसे प्रसंगों पर तो 24 घंटे के समाचार चैनलों की पौ बारह हो ही जाती है।
आत्मविश्वास से भरी राखी, कभी भावुक, कभी रौद्र रूप लेती राखी का स्त्री विमर्श अदभुत है। चैनलों पर विचारकों के पैनल थे, जनता थी जो हर बात पर ताली बजाने में सिद्धहस्त है। बहस सरगर्म है। इसे लंबा और लंबा खींचने की होड़ जारी रहती है। शायद ऐसे ही दृश्य राखी के स्वयंवर पर भी नजर आएं। इस आयोजन की घोषणा होते ही मीडिया ने राखी के स्वयंवर को लेकर काफी चिंता जताई है और उनके लंबे इंटरव्यू प्रसारित किए हैं। जाहिर तौर पर राखी मीडिया का ऐसा चेहरा बन गयी हैं जो साहसी है और जिसे खुद की मार्केटिंग आती है। राखी-मीका चुम्बन प्रकरण को भी प्रचार पाने का हथकंड़ा बताया गया था। अब स्वयंवर भी उसी परंपरा का विस्तार सरीखा ही है। भारतीय समाज में शादी जैसे प्रसंग पहली बार इस तरह से प्रस्तुत हो रहे हैं। इसके चलते भारतीय समाज का भौंचक होकर इसे देखना लाजिमी है। टीआरपी और बाजार की नजर से भी प्रथम दृष्ट्या यह बिकनेवाला मसाला है। राखी इस कार्यक्रम के प्रोमो में जिस तरह के वक्तव्य दे रही हैं वह भी अद्बभुत हैं। राखी मीडिया के एक लिए चेहरा भर नहीं है वे एक मार्केट उपलब्ध कराती हैं। वे किसी भी आयोजन को अपने तौर-तरीकों और वक्रता से एक पापुलर विमर्श में बदल देती हैं। लड़ती-झगड़ती राखी को सच में कैमरों से प्यार है और कैमरा भी उन्हें इतना ही प्यार करता है। गणपति की पूजा से लेकर वेलेंटाइन डे हर पर्व पर वे मीडिया को मसाला दे सकती हैं। इसलिए यह प्यार गहरा होता जा रहा है और यही उन्हें नायाब बनाता है। वे जो चाहती हैं कहती हैं और अपेक्षित साहस का प्रमाण भी देती हैं। वे एक ऐसी लड़की हैं जो किसी फिल्मी खानदान से इस मायावी दुनिया में नहीं आयी हैं, ना ही वे अंग्रजी माध्यम के स्कूलों की उपज हैं, उनके पास अच्छे अभिनय का भी हुनर नहीं हैं, जाहिर तौर पर उनका संघर्ष बड़ा है। वे अगर इस तरह न होतीं तो आज राखी का नाम हमारी जुबां पर न होता। वे चाहकर भी अपने इस रूप को छोड़ नहीं सकतीं क्योंकि इसी ने उन्हें स्पर्धा में सबसे आगे कर दिया है। वे मूलतः एक डांसर हैं। किंतु उन्होंने अपनी सीमित क्षमताओं को ही अपनी ताकत बना लिया है। वे विवाद रचती हैं कैमरे उन्हें विस्तार देते हैं। यह कहना कठिन है कौन किसका इस्तेमाल कर रहा है। मीडिया और राखी मिलकर जो संसार रचते हैं उससे दोनों की रोजी चलती है। समाज की दोहरी मानसिकता का मीडिया और फिल्म माध्यम इस्तेमाल करते आ रहे हैं और करते रहेंगें। शायद हमारी इसी सोच के मद्देनजर कभी पामेला बोर्डस ने कहा था –यह समाज अभी भी मिट्टी- गारे से बनी झोपड़ी में रहता है। चुम्बन प्रकरण से लेकर आन स्क्रीन स्वयंवर तक का राखी का सफर हमारे समाज और मीडिया दोनों के द्वंद का बयान करता है। तो आइए हम सब राखी के स्वयंवर उत्सव में शामिल हों और उनके साहस पर ताली बजाएं।

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

संतुलन साधने की कवायद

छत्तीसगढ़ः नई सरकार, नया मंत्रिमंडल

छत्तीसगढ़ की सरकार की नई सरकार के मंत्रिमंडल ने सोमवार को शपथ ले ली। राज्य में दुबारा सरकार बनाकर लौटी भाजपा के पास जहां रमन सिंह के रूप में एक सौम्य और अनुभवी चेहरा है वहीं उसकी सेना में अब अनुभवी सिपाही भी हैं। रमन सिंह को जोड़कर बने 12 सदस्यीय मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय संतुलन, जातीय संतुलन और कार्यक्षमता का बराबर ध्यान रखा गया है। आत्मविश्ववास से भरे-पूरे डा. रमन सिंह ने जब अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के नाम की घोषणा की तो ऐसा नहीं लगा कि यह टीम कहीं से भी कमजोर है।

आदिवासी क्षेत्रों और वोटों के भरोसे सत्ता में आई भाजपा ने इसका ऋण पांच आदिवासी समाज के मंत्री बनाकर चुकाया है। पिछली बार की तरह इस बार भी गृहमंत्री का पद आदिवासी समाज के नेता को ही दिया गया है और मंत्रिमंडल में नंबर दो का दर्जा भी इस समाज के मंत्री हासिल होगा। यह बात राहत देने वाली है कि इस पद पर पार्टी के बुर्जग आदिवासी नेता ननकीराम कंवर को मौका मिला है। जबकि ननकीराम कंवर को पिछली बार जिस कड़वाहट के बाद मंत्री पद छोड़ना पड़ा था उसमें इसे रमन सिंह का बड़ा दिल ही कहा जाएगा कि वे इस अनुभवी नेता को पुनः मुख्यधारा में वापस ले आए। ननकीराम कंवर इस बार भी अपनी परंपरागत सीट रामपुर से चुनाव जीतकर आए हैं। कोरबा जिले से चुनाव जीतने वाले वे अकेले भाजपा विधायक हैं। आदिवासी समाज के अन्य मंत्रियों में रामविचार नेताम, केदार कश्यप, लता उसेंड़ी, विक्रम उसेंडी शामिल हैं। बस्तर संभाग के तीन मंत्रियों को मौका देकर डा. रमन ने इस इलाके पर खास फोकस किया है। इस इलाके की 12 में से 11 सीटों पर भाजपा विधायकों को जीत हासिल हुयी है। इसी तरह सरगुजा इलाके से जीते रामविचार नेताम को फिर मंत्री बनाया गया है। पिछली बार वे मंत्रिमंडल में गृहमंत्री के रूप में शामिल थे।

रायपुर संभाग से भाजपा के चार दिग्गज मंत्रिमंडल में शामिल किए गए हैं। बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत, हेमचंद यादव और चंद्रशेखर साहू का नाम इस संभाग से मंत्री बनाए जाने वालों में शामिल हैं। चंद्रशेखर साहू, अभनपुर से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष धनेंद्र साहू को हराकर विधानसभा में पहुंचे हैं। जाहिर तौर पर उनकी इस विजय का पुरस्कार उन्हें मंत्री बनाकर दिया गया है। साहू तीसरी बार विधायक बने हैं और महासमुंद से एक बार लोकसभा के सदस्य भी रह चुके चुके हैं। बिलासपुर संभाग से तीन मंत्रियों को जगह मिली है। जिसमें अमर अग्रवाल, पुन्नूलाल मोहले और ननकीराम कंवर शामिल हैं। अमर पहले भी राज्य शासन में मंत्री थे, मोहले और कंवर को जगह मिली है।

श्री मोहले चार बार से बिलासपुर से सांसद हैं। इस बार बिलासपुर की सीट सामान्य हो गयी है सो मोहले ने मुंगेली क्षेत्र से विधानसभा के लिए किस्मत आजमायी और सफल रहे, जाहिर तौर पर इतने वरिष्ठ सांसद को मंत्री बनाना ही था। इसके चलते पिछली सरकार में मंत्री रहे डा. कृष्णमूर्ति बांधी जरूर मंत्री नहीं बन सके। इसका कारण यह है कि वे भी बिलासपुर के मस्तूरी इलाके से ही चुनाव जीते हैं और सतनामी समाज से ही आते हैं। आयु, अनुभव, जातीय समीकरण हर लिहाज से मोहले उनपर बीस साबित हुए।

सरगुजा संभाग जरूर सिर्फ एक मंत्री पाने की शिकायत कर सकता है। किंतु सभी जिलों को सीमित मंत्री संख्या के नाते प्रतिनिधित्व दे पाना संभव नहीं है। ऐसे में मंत्रिमंडल में कुल 9 जिलों को ही प्रतिनिधित्व मिल सका है और 9 जिलों से कोई मंत्री नहीं बना है। यह एक तरह की मजबूरी है जिसका समाधान नहीं है। सबसे ज्यादा मंत्री रायपुर से बनाए गए हैं जिनकी संख्या तीन है। इसी तरह महिलाओं को भी कोई खास तरजीह नहीं मिली है, भाजपा ने कुल 10 महिलाओं को टिकट दी थी जिसमें 6 जीतकर भी आईं किंतु सिर्फ एक महिला को ही मंत्री बनाया गया है। आदिवासी समाज में भाजपा ने कुल आरक्षित 29 सीटों से ज्यादा 32 सीटों पर आदिवासी खड़े किए थे जिनमें 20 को जीत हासिल हुई और इसीलिए सबसे ज्यादा पांच मंत्री इसी समाज से बनाए गए हैं। अनुसूचित जाति के लिए कुल 9 सीटें आरक्षित हैं जिनमे पांच पर भाजपा के लोग जीते हैं इनमें केवल एक को ही मंत्री (पुन्नूलाल मोहले) बनाया गया है।

मंत्रिमंडल में पहली बार मंत्री बने लोगों में चंद्रशेखर साहू और पुन्नूलाल मोहले शामिल हैं, यह संयोग ही है कि दोनों पूर्व सांसद हैं और कई बार विधायक भी रह चुके हैं। यानि पहली बार मंत्री बने ये दोनों भी संसदीय अनुभव में कमजोर नहीं हैं। एक अदभुत संयोग यह भी है कि डा. रमन सरकार के पिछले कार्यकाल में आरंभिक दिनों में मंत्री रहे दो सहयोगी ननकीराम कंवर और विक्रम उसेंडी फिर मंत्री बनाए गए हैं। इन दोनों को अनेक कारणों से पिछली बार मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ा था। इस पूरे दौर में विधानसभा उपाध्यक्ष बद्रीधर दीवान की एक जातिगत टिप्पणी के अलावा कुछ भी बेसुरा नजर नहीं आया। दीवान का दर्द भी जातिगत कम व्यक्तिगत ज्यादा है। उम्मीद है डा. सिंह उन्हें समझा लेंगें।

कुल मिलाकर रमन सरकार में इस बार अनुभव और उत्साह का संयोग देखने को मिलेगा। पिछली बार जहां पहली बार चुनाव जीते विधायकों के चलते मंत्रियों की अनुभवहीनता आरंभिक दिनों में काफी रेखांकित की गयी थी इस बार वैसा नहीं है। अनुभवी मंत्रियों से सजी रमन सिंह की टीम के पास पाने के लिए पूरा आकाश है, सवाल यह है कि क्या वे इसके लिए तैयार हैं। फिलहाल शपथ ग्रहण के बाद उन सब पर जिम्मेदारियों का एक बड़ा सवाल मुंह बाए खड़ा है, राज्य की 2 करोड़ जनता इस मौके पर अपने मंत्रियों को शुभकामनाओं के सिवा क्या दे सकती है।


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जो बने मंत्री
ननकीराम कंवर, बृजमोहन अग्रवाल, रामविचार नेताम, पुन्नूलाल मोहले, चंद्रशेखर साहू, अमर अग्रवाल, हेमचंद यादव, विक्रम उसेंडी, राजेश मूणत, केदार कश्यप, लता उसेंडी।

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कहां से कितने मंत्री ( मुख्यमंत्री सहित संभाग गणित)
रायपुर संभाग-5, बस्तर संभाग-3, बिलासपुर संभाग-3, सरगुजा-1

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पहली बार बने मंत्री
चंद्रशेखर साहू और पुन्नूलाल मोहले पहली बार मंत्री बने हैं। लेकिन संसदीय अनुभव में दोनो काफी आगे हैं। साहू जहां तीसरी बार विधानसभा पहुंचे है वहीं वे महासमुंद से लोकसभा में भी पहुंच चुके हैं। इसी तरह पुन्नूलाल मोहले पहले विधायक रहे और चार बार बिलासपुर से सांसद रह चुके हैं। यह एक संयोग ही है दोनों पूर्व सांसद हैं। जिन्हें रमन सरकार में मंत्री बनाया गया है।

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हाशिए पर महिलाएं
भाजपा ने राज्य की 90 विधानसभा पर 10 महिला उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें 6 को जीत हासिल हुई है। इसमें मात्र एक को मंत्री बनाया गया है। मंत्री बनने वाली लता उसेंडी पिछली बार भी रमन सरकार में मंत्री रही हैं। उन्हें आदिवासी महिला होने का लाभ मिला है।


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आदिवासियों को मौके ज्यादा
सरकार में आदिवासियों को सबसे ज्यादा पांच मंत्री पद मिले हैं। अनुसूचित जाति को एक, अन्य पिछड़ा वर्ग को दो, वैश्य समाज को तीन पद मिले हैं। इसी तरह ठाकुर समुदाय से डा. रमन सिंह अकेले सरकार में हैं। किसी ब्राम्हण को मंत्री नहीं बनाया गया है। इससे भाजपा विधायक बद्रीधर दीवान ने नाराजगी जताई है। पिछली बार भी किसी ब्राम्हण को मंत्री नहीं बनाया गया था, हां विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर जरूर ब्राम्हण समुदाय को जगह मिली थी। जिसमें विधासभा अध्य़क्ष रहे प्रेमप्रकाश पाण्डेय इस बार भिलाई से चुनाव हार गए हैं। भाजपा के तीन जीते ब्राम्हण विधायकों सरोज पाण्डेय, रविशंकर त्रिपाठी और बद्रीधर दीवान में से किसी को भी मंत्री नहीं बनाया गया है।

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का समय


अब तो देश की राजनीति को शर्म आ ही जानी चाहिए। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में हुई घटनाएं भारतीय राजनीति और शासन पर एक ऐसा तमाचा है जिसकी गूंज काफी दिनों तक सुनाई देगी। आखिर कब जागेंगें हम और कम से कम ऐसे सवालों पर भी एक राय बना सकेंगें। राजनीति जिस तरह आतंकवाद के सवाल पर विभाजित नजर आती है उस पर कोई भी देशवासी सिर्फ शर्मसार हो सकता है। हमारे राजनेताओं को यह सोचना होगा कि आखिर वे अपने छुद्र स्वार्थों के लिए कब तक देश की जनता और हमारे पुलिस-सैन्य बलों की शहादत लेते रहेंगें।


11 सितंबर,2001 को अमरीका में हुए वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद अमरीकी राजनीति के सबक सीखने लायक हैं। अमरीका ने जिस तरह के प्रबंध किए उससे वह तमाम ज्ञात- अज्ञात खतरों से बच सका। जाहिर तौर पर अमरीका को आदर्श मानने वाले हमारे राजनेता किस तरह की राजनीति कर रहे हैं। वे देश की जनता के अमन चैन से क्यों खेल रहे हैं। हमें सोचना होगा कि राजनीति अगर लोंगों को जिंदगी जीने की आजादी भी नहीं दे सकती है तो इस लोकतंत्र के मायने क्या हैं। डा. राममनोहर लोहिया कहा करते थे लोकराज लोकलाज से चलता है। किंतु हमारी राजनीति ने लोकलाज की सारी सीमाएं तोड़ दी हैं। ऐसे में यह कहना बहुत कठिन है कि आने वाले समय में भी हम जनता को कोई राहत दे पाएंगें। राजनीति की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा यह है कि मुंबई धमाकों में हमारे जांबांज पुलिस अफसरों और आम जनता की शहादत उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। शायद बहुत से खतरों से मुकाबिल देश और उसकी नपुंसक राजनीति ने इसी तरह जीने का ढंग सीख लिया है। क्या सरकारें इस घटना से कोई सबक ले पाएंगीं यह एक बड़ा सवाल है। आतंकवाद का यह नंगा नाच जो दिन प्रतिदिन विकराल रूप लेता जा रहा है उससे मुंह मोड़ना एक हमारे राष्ट्र-राज्य की अस्मिता के लिए बहुत चिंता की बात है। इस घटना के बाद तो केंद्र और महाराष्ट्र सरकार के नियंताओं के सिर शर्म से झुक जाने चाहिए। नरसंहार की इस घटना के लिए जितने जिम्मेदार आतंकवादी हैं उतनी ही जिम्मेदार हमारी राजनीति भी है जिसकी कायरता ने आतंकियों के हौसले बढ़ा रखे हैं। वे राजनेता जो सिमी की पैरवी में खड़े हैं, जो लगातार कुछ वोटों की लालच में इस राष्ट्र और राज्य को खतरे के सामने छोड़कर मुस्करा रहे हैं। सच कहें तो वोट बैंक की राजनीति ने हमारी नैतिकता, देशप्रेम और निष्ठा की बलि ले ली है।
हर आतंकी वारदात के बाद एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति शुरू हो जाती है जो हमें समस्या के समाधान के लिए प्रेरित नहीं कर पाती। देश बंटा हुआ नजर आता है। टुकड़ों में बंटा देश इस हालात में किस तरह दुनिया का सामना कर पाएगा। भारत यदि एक आपराधिक राज्य के रूप में, आतंकवादी ताकतों के पनाहगाह के रूप में चिंहित हो गया तो हम विश्व के सामने क्या मुंह लेकर जाएंगें। देश के तमाम हिस्सों में आतंकवादी और अतिवादी आंदोलन पल रहे हैं, लेकिन जब हम अपने महानगरों को नहीं बचा पा रहे हैं तो जंगलों- गांवो में पनप रहे नक्सलवाद या अन्य अतिवादी समूहों का सामना कैसे करेंगें। मुंबई की घटना एक ऐसी मिसाल है जिस पर कोई भी देश सिर्फ शर्मसार हो सकता है। यह हमारे विकृत हो चुके समय की ऐसी बानगी है जिसे हमने स्वयं ही आमंत्रित किया है। यह बात साबित करती है हमने अपनी आजादी और उसकी कीमत को नहीं समझा है। देश के करोंडो़ लोगों की जानमाल हमारे लिए कोई मायने नहीं रखती। आतंकवादी जिस तरह से भारत को बंधक बनाकर कहीं भी किसी तरह की घटना को अंजाम दे रहे हैं वह हमारी कायरता का ही फलित है। देश के लोग जो अपनी बेहतर और सर्वश्रेष्ठ क्षमता का प्रर्दशन करते हुए इसके विकास में अपना योगदान दे रहे हैं उन्हें संरक्षण देने के बजाए हमारी सरकारों ने उनके शांति से जीने के अधिकार को भी संकट में डाल रखा है। इससे देश के सामने चिंता के बादल गहरे हो गए हैं। हमारी राजनीति की यह भीरूता देश पर भारी पड़ रही है। देश की प्रगति और विकास के सपने इसी आतंकवाद के चलते दफन हो रहे हैं। आम हिंदुस्तानी आज खून के आंसू रो रहा है, आतंकवाद की बलि चढ़ रहे लोग हमारे लिए एक ऐसा सवाल हैं जो लगातार हमें रूलाते रहेंगे। लेकिन क्या हमारी बेशर्म, बेबस, कायर और लालची राजनीति इन सवालों से टकराने का साहस रखती है।

गुरुवार, 19 जून 2008

मेरे आलेख पर प्रतिक्रिया-15

छत्तीसगढ़ी : लोकभाषा से राजभाषा तक

कनक तिवारी

छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण से कुछ मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां और मुद्दे उभर कर आए हैं। भाषा को लेकर कुछ महत्वपूर्ण मांगे और स्थापनाएं की जा रही हैं। मसलन छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी को तरजीह देनी होगी। इन स्थापनाओं की पड़ताल की जरूरत है। ये मोटे तौर पर इस तरह हैं:-(1) छत्तीसगढ़ का प्रशासन छत्तीसगढ़ी में चलाया जाए। (2) छत्तीसगढ़ी को छत्तीसगढ़ की भाषा घोषित किया जए। (3) छत्तीसगढ़ के मूर्धन्य साहित्यकार जिनकी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी रही छत्तीसगढ़ी में कुछ नहीं लिखने के कारण छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा के लिए शासन और प्रशासन से अधिक दोषी हैं। (4) छत्तीसगढ़ी लेखकों को विशेष सम्मान प्राप्त होना चाहिए। (5) छत्तीसगढ़ी को मानक भाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए।

भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार छत्तीसगढ़ी हिन्दी का ही स्वरूप है। वह अवधी तथा बघेलखंडी से काफी मिलती है। प्रसिध्द विद्वान डॉ. ग्रियर्सन ने कहा है 'यदि कोई छत्तीसगढ़ी अवध में जाकर रहे तो वह एक ही सप्ताह में वहां की बोली इस तरह बोलने लगेगा मानो वही उसकी मातृभाषा हो। इतिहासकारों के अनुसार इसका मुख्य कारण हैहयवंशियों का राज्य भी हो सकता है, क्योंकि वह अवधी के इलाके के ही रहने वाले थे। छत्तीसगढ़ी का व्याकरण डॉ. हीरालाल ने लिखा था, जिसका अनुवाद डॉ. ग्रियर्सन ने किया था। उसका संशोधित संस्करण वर्षों पूर्व लोचन प्रसाद पांडेय के संपादन में प्रकाशित हुआ है। अनुच्छेद 351 ये बौध्दिक स्थापनाएं करता है। 1. हिंदी का प्रसार और विकास संघ का कर्तव्य है। 2. हिंदी को भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाता है। 3. हिंदी की (मौजूदा) प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी, अन्य भारतीय (प्रादेशिक) भाषाओं और मुख्यतया संस्कृत शब्द, रूप, शैली आदि ग्रहण करते हुए हिंदी को समृध्द करना है। इस संवेदनशील बिन्दु पर आकर छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने के सवाल पर विचार हो सकता है। यह बेहद दुखद और आश्चर्यजनक है कि संविधान हिंदी की अभिवृध्दि के लिए हिंदी रूपों वाली लोकबोलियों जैसे बृज भाषा, अवधी, बैसवारी, मैथिल, भोजपुरी, मालवी, निमाड़ी, बुन्देलखंडी, बघेलखंडी, हरियाणवी आदि पर निर्भर नहीं रहना चाहता।

यदि छत्तीसगढ़ी को भी राजनीति के सहारे शासकीय कामकाज की भाषा बना दिया गया तो वह अपनी जनसंस्कृति की केंचुल छोड़ देगी। छत्तीसगढ़ी भाषा या बोली के इतिहास, भूगोल, ध्वनिशास्त्र और प्रेषणीयता को लेकर शोध प्रबंध लिखना संभव हो सकता है लेकिन इस भाषा या बोली को रोजमर्रे के कामकाज में गले उतारना सरल नहीं है। संविधान में ऐसे कई प्रावधान हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। मूलभूत अधिकारों का तीसरा परिच्छेद पेंचीदगियां पैदा करता है। अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता उत्पन्न करने वाला द्विगु समास है। अनुच्छेद 16 भाषायी विषमता रहते हुए भी लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता देता है। युवा पीढ़ी का पूरा भविष्य इसी अनुच्छेद के विश्वविद्यालय में है। मंदिरों में इबादत करने के सेवानिवृत्त पीढ़ी के आग्रह की तरह छत्तीसगढ़ी का झंडा उन हाथों में ज्यादा है जिनका कोई भविष्य नहीं है। भाषायी आंदोलन बेकारी भत्ता से लेकर पेंशन की अदायगी तक का अर्थशास्त्र भी होते हैं-यह बात हमने दक्षिण हिंदी विरोधी आंदोलनों के उत्तर में देखी है। अनुच्छेद 19 के वाक् स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के छाते के नीचे खड़े होकर लोग अपनी रुचि की भाषा के अखबार और किताबें पढ़ सकते हैं। बहरहाल जब तक छत्तीसगढ़ी आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं होती तब तक किसी न्यायालय को अधिकार नहीं है कि वह किसी गवाह तक का बयान छत्तीसगढ़ी में दर्ज करे। न्यायिक सेवा में गैर छत्तीसगढ़ी न्यायाधीश भी हैं। वे न्यायालय की भाषा अर्थात हिंदी और अंग्रेजी में ही काम करने के लिए संविधान द्वारा संरक्षित हैं। यही स्थिति प्रशासनिक सेवा की है। वैसे भी केंद्रीय हिन्दुस्तान के विद्यार्थी सर्वोच्च नौकरशाही में ज्यादा नहीं हैं। छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालय क्षेत्रीय भाषा में अध्यापन करने का मौलिक अधिकार नहीं रखते। उच्चतम न्यायालय ने 1963 में ही अपने फैसले में गुजरात विश्वविद्यालय में केवल गुजराती माध्यम में शिक्षा देने की कोशिश को नाकाम कर दिया है। शिक्षा पाने के अनुच्छेद 41 के नीति निदेशक को संविधान के हृदय स्थल अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन का अधिकार माना गया है। ऐसी स्थिति में सरकार को फिलहाल इस बात का अधिकार नहीं है कि वह छत्तीसगढ़ी को समग्र शिक्षा का माध्यम बनाए। यदि कुछ विद्यार्थी छत्तीसगढी भाषा और साहित्य पढ़ भी लेंगे तो हम उनकी सफलता की नदियों और ङाीलों के बदले तालाब रच देंगे। इसमें कोई शक नहीं कि विज्ञान, तकनीक, डॉक्टरी, समाजशास्त्र, गणित और कम्प्यूटर जैसे ढेरों ऐसे विषय हैं जिनमें सफलता के लिए छत्तीसगढ़ के विद्यार्थियों की मदद करनी होगी, उनकी दुनिया को संकुचित करने के लिए नहीं।

यह तथ्य है कि छत्तीसगढ़ी भाषा या बोली को लेकर जितने भी शोध विगत वर्षों में हुए हैं, उनमें पहल, परिणाम या पथ प्रदर्शन का बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़वासियों के खाते में नहीं है। यह मध्यप्रदेश का सौभाग्य रहा है कि यहां के विश्वविद्यालयों में बार-बार भाषा-विज्ञानी कुलपतियों की नियुक्तियां हुई है। डॉ. बाबूराम सक्सेना, डॉ. धीरेंद्र वर्मा और डॉ. उदयनारायण तिवारी जैसे भाषा विज्ञानियों ने मध्यप्रदेश की भाषायी स्थिति पर काम करने के लिए प्रेरणाएं दी हैं। अकेले डॉ. रमेशचंद्र मेहरोत्रा सभी कट्टर तथा रूढ़ छत्तीसगढ़ी-समर्थक भाषा विद्वानों के बराबर होंगे, जिनकी निस्पृह, खामोश और अनवरत छत्तीसगढ़ सेवा का मूल्यांकन कहां किया गया है। छत्तीसगढ़ी बोली को हिंदी की जगह लेने के निजी आग्रह बौध्दिक-मुद्रा की ठसक लिए हुए हैं। छत्तीसगढ़ी की तुलना दक्षिण की भाषाओं या मराठी, बंगाली वगैरह से की जा रही है। समाचार पत्रों में जगह का आरक्षण मांगा जा रहा है।

डॉ. रमेशचंद्र मेहरोत्रा ने छत्तीसगढ़ को बीसियों छात्रों को डाक्टरेट की डिग्रियां दिलवाई हैं। एक वीतरागी की तरह जीवन जीने सेवानिवृत्ति के बाद वे छत्तीसगढ़ में ही बस गए हैं। कथित परदेश नहीं लौट गए हैं। वैसे मानक छत्तीसगढ़ी बोली का अब तक स्थिरीकरण कहां हुआ है। बस्तर, खैरागढ़ और सरगुजा की बोली पूरी तौर पर एक जैसी कहां है। बकौल भगवान सिंह वर्मा इसमें कोई शक नहीं कि छत्तीसगढ़ी बेहद सरस, प्रवाहमयी और लचीली होने के कारण ब्रज या बैसवारी की तरह मधुर है। यह तीन चौथाई छत्तीसगढ़ी आबादी द्वारा बोली भी जाती है। इन सभी विषयों और समस्याओं का विस्तार विद्वानों की पुस्तकों मे है, जिनमें भोलानाथ तिवारी, केएन तिवारी, हीरालाल शुक्ल, कांतिकुमार वगैरह का भी सरसरी तौर पर उल्लेख किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ की विधानसभा ने प्रस्ताव पारित किया है कि उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। संविधान संशोधन के बगैर यह नहीं हो सकता। हिंदी की तमाम अन्य उपभाषाएं या बोलियां प्रतीक्षा सूची में पचास वर्षों से लामबंद हैं। इक्कीसवीं सदी में छत्तीसगढ़ी भी पीछे आकर खड़ी हो गई है। छत्तीसगढ़ की सरकार ने पहली हिंदी से अंग्रेजी की पढ़ाई को अनिवार्य कर दिया। एक तीन है तो दूसरी छह अर्थात दोनों मिलाकर छत्तीस। संविधान में अनुच्छेद 350 एक और दिलचस्प तथा नामालूम सा प्रावधान है। इसके अनुसार छत्तीसगढ़ की सरकार को प्रत्येक व्यक्ति को हिंदी में अभ्यावेदन देने का अधिकार है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि वह छत्तीसगढ़ी को हिंदी की उपभाषा करार देते हुए लोगों को यह छूट दे दे कि वे अपने अभ्यावेदन छत्तीसगढ़ी में करना शुरू कर दें। उन्हें उत्तर भी छत्तीसगढ़ी में ही देने शुरू किया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ी व्यथा, अन्याय, शोषण और हीनता के कोलाज की भाषा हैं। हिन्दी छत्तीसगढ़ी से सहानुभूति, सहकार और आश्वासन की। और अंग्रेजी अन्तत: की जिसे शब्दकोश में अन्याय कहा जाता है। संविधान ने शिक्षा का मूलभूत अधिकार चौदह वर्ष तक प्रत्येक नागरिक को दिया है। भाषा का अलबत्ता वैकल्पिक अधिकार दिया है।

संविधान सभा में छत्तीसगढ़ से रविशंकर शुक्ल, घनश्याम सिंह गुप्त, बैरिस्टर छेदीलाल सिंह, किशोरीमोहन त्रिपाठी, गुरू आगमदास और रतनलाल मालवीय वगैरह सदस्य थे। इनमें से सबसे ज्यादा घनश्याम सिंह गुप्त से यह उम्मीद की जा सकती थी कि वे संविधान सभा में छत्तीसगढ़ी के समर्थन में कुछ कहेंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। अलबत्ता वे प्रबल हिंदी समर्थक के रूप में उभरे। छत्तीसगढ़ी के लेखक सभी श्रोष्ठ साहित्य का अनुवाद करने की पहल क्यों नहीं करते जिसमें न केवल ग्रामीण पाठक वर्ग परिचित हो बल्कि रचनाकर्मी भी छत्तीसगढ़ी अभिव्यक्तियों को समृध्द कर सकें। संविधान में उन प्रादेशिक भाषाओं का उल्लेख है जिनकी उपस्थिति लोक जीवन में इस तरह रही है कि उनके बिना संबंधित प्रदेशों में प्रशासन नहीं चलाया जा सकता। इनमें हिंदी की उपभाषाएं शामिल नहीं हैं। इस भाषायी स्थिति को सामासिक आदतों के सहकार के साथ स्वीकार कर लिया गया है। संविधान के लागू होने के बाद सिंधी, कोकणी, और मैथिली, नेपाली वगैरह को संविधान के अंतर्गत मान्य भाषाओं का दर्जा दिया गया है। छत्तीसगढ़ी बोलने वालों की संख्या इनसे कम नहीं है। कार्यपालिका तथा न्यायिक प्रशासन जनता के सरोकार हैं, भाषा और बोली के जानकारों के नहीं।

संविधान में संशोधन किए बिना प्रशासन को भाषा से हटकर बोली में रूपांतरण करना संभव नहीं है। शीर्ष स्तर पर आज भी अंग्रेजी न्यायिक और कार्यपालिका प्रशासन की भाषा है। छत्तीसगढ़ी में अंग्रेजी में अनुवाद किए बिना सर्वोच्च स्तर पर इस क्षेत्र की निजी और सामूहिक समस्याएं कैसे पहुंचेगी। छत्तीसगढ़ी की तरह हिंदी की उपरोक्त सहोदराएं पचास साठ वर्षों से संविधान पुत्री घोषित होने के लिए प्रतीक्षारत हैं। इन सब संवैधानिक और अनुसंधानिक आवश्यकताओं को पूरा किए बिना छत्तीसगढ़ी को नए प्रदेश की राजभाषा घोषित करना कैसे मुमकिन किया जा सकता है।
(लेखक प्रख्यात अधिवक्ता एवं विचारक हैं)

शनिवार, 14 जून 2008

मेरे आलेख पर प्रतिक्रिया-14

मातृभाषा जरूरी है तो अंग्रेजी मजबूरी है!

गजेंद्र तिवारी

शिक्षा का माध्यम क्या हो? मातृभाषा या और कोई भाषा? इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करने से पहले एक निवेदन करना चाहूंगा। कुछ शब्दों और शब्द समूहों से, कुछ समय के लिए परहेज करने का अभ्यास करना होगा। केवल कुछ समय के लिए। (फौर द टाइम बीइंग) कारण यह है कि ऐसे शब्द या शब्द युग्म विवादों की दिशा को सही नहीं रहने देते, संवेदनाओं का तड़का लगाकर उसकी तासीर बदल देते हैं। हां तो पहले ये शब्द। अस्मिता, आत्मगौरव, आत्माभिमान, स्वाभिमान, माटीपुत्र, माटी की सोंधी गंध। ये तथा इसी भावनात्मक परिवार से जुड़े हुए शब्द और शब्द-युग्म! अस्तु।

स्वीकृत तथ्य है कि छत्तीसगढ़ी भाषा दो करोड़ से भी ज्यादा लोगों के द्वारा व्यवहृत की जाने वाली भाषा है। ऐसी दशा में यदि ऐसी भाषा को समादृत किए जाने की आवाज अगर उठाई जाती है तो उसमें कुछ भी अनुचित दिखाई नहीं देता है। छत्तीसगढ़ एक राज्य है और इस नाते उसकी अपनी स्वीकृत राजभाषा होनी चाहिए। ठीक ही निर्णय लेकर छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया है। अब यह तो एक बात हुई। इसी से लगी बात यह है कि राजभाषा तो छत्तीसगढ़ी को घोषित कर दिया गया, अब राजकाज की भाषा बनाओ। दैनिंदिन और सर्वमान्य उपयोग की भाषा बनाओ। शिक्षा का माध्यम छत्तीसगढ़ी हो, ऐसी व्यवस्था करो। ठहरिये, ठहरिये। इतनी जल्दी नहीं। ये विषय ऐसे नहीं हैं कि इन पर 'ओव्हरनाइट कोई फैसला हो सके। ये गंभीर और व्यापक विषय हैं और इनके निराकरण में वैसी ही गंभीरता और व्यापकता अपेक्षित है। मसलन, राजकाज की या प्रशासन की भाषा बनाने का सवाल। यह कोई आसान काम नहीं है। अभी तक हिंदी यह मुकाम हासिल नहीं कर पाई है। अंग्रेजी ही प्रशासन की सर्वमान्य भाषा है आज भी। ऐसे में आनन-फानन में छत्तीसगढ़ी को प्रशासन की भाषा घोषित करने की प्रक्रिया क्या आसान है? और क्या ऐसा घोषित करने का आग्रह करना उचित है?

शिक्षा का माध्यम कौन सी भाषा हो? पहले प्राथमिक शिक्षा का माध्यम निर्धारित करना ही उचित होगा। इस संबंध में जो अध्ययन हैं उनमें इस बारे में मातृभाषा की अनुशंसा की गई है। प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने से सीखने की प्रक्रिया में आसानी रहती है, ऐसा शिक्षा संबंधी शोधों से प्रमाणित होता है। अब यह तो हुई सिध्दांत की बात। इसे व्यवहारिक स्तर पर लागू करने में क्या और कैसी दिक्कतें दरपेश हो सकती हैं? सबसे पहली बात तो यह है कि प्रदेश में सर्वत्र छत्तीसगढ़ी का प्रयोग नहीं होता। अनेक स्थानों में अन्य स्थानीय बोलियों या भाषाओं का प्रयोग होता है, हिन्दी का प्रयोग होता है। ऐसी बहुलतावादी स्थिति में आने वाली अड़चनों का निराकरण कैसे होगा? छत्तीसगढ़ की मान्यता प्राप्त भाषा छत्तीसगढ़ी हो इसमें कोई शंका नहीं होनी चाहिए। रही बात अन्य स्थानीय बोलियों की सो पाठयक्रमों की विरचना इस ढंग से भी की जा सकती है कि सभी का समन्वय और संतुलन कायम रखा जा सके। इस नुक्ते पर भी विवाद की स्थिति कदाचित ही दिखाई पड़ती है।

अब इस व्यवस्था में नकारात्मक क्या है? आज का समय वैश्वीकरण का है। अंग्रेजी की ध्वजा फहरा रही है चारों ओर। गांव-गांव में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने हेतु खासी संख्या में अंग्रेजी स्कूल खोल दिए गए हैं। और स्कूल खोले जाने का यह सिलसिला अभी भी बदस्तूर जारी है। जाहिर है ऐसे स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर निकले हुए विद्यार्थियों का अंग्रेजी का स्तर काफी अच्छा होगा। हमारी सरकार ने निर्णय लिया है कि प्राथमिक कक्षाओं में अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाए और उसमें परीक्षा भी ली जाए, जिसमें पास होना जरूरी भी होगा। अब आगे चलकर पढ़ाई के स्टैन्डर्ड का मसला फिर उठेगा? अनेक सवालिया निशान खड़े होंगे।

सोचना यह है कि बेहतर क्या होगा? मातृभाषा में शिक्षा या अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा? ध्यान रहे इन सवालों के जवाब में हमें संवेदनाओं और भावनाओं को नहीं देखना है। शुध्द व्यवहारिक स्तर पर विचार करना है। मोटे तौर पर देखा जाए तो अंग्रेजी आज रोजी-रोटी की भाषा है। अगर अंग्रेजी नहीं आती तो मौन रहिए कोई पुछन्ता नहीं मिलेगा। हम कोई निर्णय नहीं दे रहे हैं, आपको विचार करना है। मातृभाषा भी जरूरी है, अंग्रेजी भी जरूरी है। जरूरी से ज्यादा मजबूरी है। इसे किन्हीं अर्थों में अभिशाप की स्थिति भी कहा जा सकता है। ऐसा अभिशाप जिसे ङोलना हमारी नियति है। आज अंग्रेजी का बोलबाला है। अन्य भाषाओं की हालत दोयम दर्जे की है। दरअसल, ङागड़ा लोकभाषाओं में नहीं है। ङागड़े की जड़ है अंग्रेजी। ङागड़ा संस्कृत का भी नहीं है। संस्कृत का जो स्थान है, वह कोई बताने की बात नहीं है। तो फिर आखिर विवाद किसलिए है? इस संबंध में एक संभावित जवाब यह हो सकता है कि विवाद समय के नुक्ते यानी टाइम फैक्टर का है। छत्तीसगढ़ में राजकाज की भाषा और व्यापक बोलचाल एवं व्यवहार की भाषा के रूप में छत्तीसगढ़ी समादृत हो। अन्य प्रदेशों में वहां की प्रादेशिक भाषाओं को जो ओहदा मिला हुआ है वही ओहदा छत्तीसगढ़ी को छत्तीसगढ़ में प्राप्त हो, इस बात से किसे इंकार हो सकता है? ऐसा होना तो निश्चित है। ऐसा तो होगा ही। बस समय की बात है। अधोसंरचना विकसित होने दीजिए? भाषा को मानकीकृत कीजिए। प्रशासन के लायक मजबूत बनाइये भाषा को। भाषा की मजबूती के लिए केवल साहित्य पर्याप्त नहीं होता। अन्य विषय भी होते हैं। इसके लिए सोच समङा कर योजना बनाना जरूरी है। एकीकृत प्रयत्न किए जाने जरूरी हैं। यह काम विवादों से, आंदोलनों से, राजनैतिक पैतरेबाजी से नहीं होगा। विद्वत-मंडली को बैठना होगा इसके लिए और छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण और मजबूतीकरण के लिए ठोस योजनाएं बनानी होगी।
(लेखक सुपरिचित व्यंग्यकार हैं।)



मेरे आलेख पर प्रतिक्रिया-13
छत्तीसगढ़ी मातृभाषा में शिक्षा ज्यादा जरूरी

रामेश्वर वैष्णव

नंदकिशोर शुक्ल का यह विचार कतई आपत्तिजनक नहीं है कि कक्षा प्रथम से संस्कृत पढ़ाने का प्रावधान न केवल अनुपयोगी है, अपितु छात्रों के लिए अति श्रमसाध्य भी। चूंकि यहां के छात्रों की मातृभाषा छत्तीसगढ़ी है अत: छत्तीसगढ़ी पढ़ाना ज्यादा लाभदायक है। साथ ही छात्रों की दृष्टि से सुगम भी। विश्व के तमाम भाषा विज्ञानियों तथा शिक्षा शास्त्रियों ने मातृभाषा में शिक्षण की व्यवस्था को न केवल अत्यधिक लाभकारी माना है, अपितु छात्रों के बौध्दिक विकास का सुगम रास्ता निरूपित किया है। नंदकिशोर शुक्ल ने किसी भी पंक्ति में संस्कृत का विरोध नहीं किया है, यह तो संपादक का अधिकार है कि वे जैसा चाहे शीर्षक दें। बस उसी आधार पर उन्हें संस्कृत विरोधी घोषित करने की मानसिकता क्या सिध्द करती है? जबसे छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिलाने वाला प्रस्ताव पास हुआ है, तब से कुछ स्थापित विद्वानों के मन में अपनी उपेक्षा होने का संदेह बैठ गया है। छत्तीसगढ़ में बोली जाने वाली तमाम लोकभाषाएं छत्तीसगढ़ी की ही उपभाषाएं हैं। इनमें आपसी विरोध होने का सवाल ही नहीं उठता। भारतीय भाषाओं के बीच कहीं कोई अंर्तद्वंद नहीं है, अगर है तो केवल अंग्रेजी से। छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा कर किसी भी भाषा को प्राथमिकता देना महावीर प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में 'अपनी माता को असहाय छोड़कर पराई माता की सेवा करने जैसा उपक्रम है। अपनी माता को महत्व देना क्या संकीर्णता है, क्षेत्रीयता है या सीमित दृष्टि है। संस्कृत के देववाणी होने, समस्त भाषाओं की जननी होने या भारतीयता के भीतर ङाांकने की खिड़की होने में किसको संदेह हो सकता है? इसे पूर्ववत कक्षा छठवीं से पढ़ाए जाने पर ही इसकी गरिमा व दिव्यता से परिचित होने में कोई छात्र समर्थ होगा। कक्षा प्रथम से पढ़ाने का न तो कोई तुक है और न ही प्रयोजन। दरअसल जिस तरह अंग्रेजी को विश्व को देखने की खिड़की माना जाता है, उसी तरह संस्कृत भी भारत की आत्मा को देखने की खिड़की है और अपने घर से अपने इर्द-गिर्द देखने की खिड़की का श्रोय मातृभाषा को ही दिया जा सकता है जो कि छत्तीसगढ़ी का हक है।
(लेखक छत्तीसगढ़ी के कवि एवं साहित्यकार हैं)
मेरे आलेख पर प्रतिक्रिया-12
भाषा के नाम पर राजनीति न करें

डॉ. सोमनाथ यादव

संस्कृत एक ऐसी भाषा है जो पूरे देश की बोली-भाषाओं को संस्कार देती रही है। यही कारण है कि संस्कृत से संस्कृति बनी है। अंग्रेज खेती की ओर प्रमुखता देते हैं इसलिए एग्रीकल्चर से 'कल्चर नि:सृत है जबकि विचार प्रेषण के कारण और विश्व-वंदया होने के कारण हमारा देश भाषा की दृष्टि से संपन्न रहा है। संस्कृत को देवभाषा व लिपि को देवनागरी लिपि से संबोधित करने हमने इसे पावन और अलौकिक स्थान दिया है। यह वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न भाषा है जिसमें लेखन और उच्चारण में समानता है। इसने सभी देश की बोलियों और भाषाओं को पुत्रवत पोषण किया है। यह सभी भाषाओं की जननी है। नई पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी को पिछड़ा कह सकती है, बेटी मां की उपेक्षा कर सकती है लेकिन इससे न मां का महत्व कम होता और न पुरानी पीढ़ी की चमक कम होती। थोड़ा सा भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति इस तथ्य से सुपरिचित है लेकिन छत्तीसगढ़ी राजभाषा के प्रयोग के परिप्रेक्ष्य में कोई संस्कृत को तिरस्कृत करने का वक्तव्य दे तो उसे किस आक्रोश से चिन्हित करेंगे, यह आप खुद समझें।

राजभाषा के रूप में छत्तीसगढ़ी को सम्मान सरकार दे रही है लेकिन बिना तैयारी के हम छत्तीसगढ़ी में पढ़ाई-लिखाई के लिए वक्तव्य दें और संस्कृत का अध्यापन बंदकर छत्तीसगढ़ी में प्रारंभ करने की बात कहें तो हास्यास्पद स्थिति हमें मूर्ख ही तो प्रमाणित करेगी। कोई एक व्यक्ति जो न तो कोई साहित्यकार है, न ही भाषाविद् अत: त्रिभाषा फार्मूला से अनजान होकर वे जो वक्तव्य दे रहे हैं तथा छत्तीसगढ़ी बोलने और पढ़ने-पढ़ाने के लिए जिस तरह बयानबाजी कर रहे है, उसमें अधिकांश लोगों को राज ठाकरे की आत्मा दिखाई देने लगी है। क्या इस प्रदेश से हिंदी, अंग्रेजी को न पढ़कर छत्तीसगढ़ में रहने वाले छत्तीसगढ़ी ही पढ़ेंगे क्या यह राष्ट्र हित में है? यहां हिंदी ने 90 प्रतिशत लगभग प्राप्त कर लिया है और शिक्षा व कार्यालयों में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है। व्यावसायिक दृष्टि से जब तक अंग्रेजी आजीविका का साधन रहेगी, इसे ज्ञान और औपचारिकता के लिए अपनाने में क्या हर्ज है? इसकी उपेक्षा करके छत्तीसगढ़ पिछड़ा नहीं कहलाएगा? क्या यहां के बच्चों को संस्कृत और अंग्रेजी के ज्ञान से उपेक्षित कर दें। उन्हें केवल छत्तीसगढ़ी पढ़ाएं। इससे क्या होगा और यह कैसे संभव होगा। क्या वे लोग बताएंगे कि उनके घर के बच्चो सरकारी स्कूलों में पढ़ने की जगह अंग्रेजी माध्यम जैसी निजी स्कूलों में क्यों पढ़ते हैं? क्या वे यह भी बताएंगे कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों के साथ ही भेदभाव क्यों? सक्षम एवं धनाढय लोगों के बच्चों को ही सिर्फ अधिकार है अंग्रेजी पढ़ने का? कुछ लोग बयानबाजी कर और कुछ न समङा लोगों को जोड़कर या कहे अंधे में काना राजा बनकर आत्ममुग्ध जीवन जीना चाहते हैं। ऐसे लोगों का समूह बनाकर कुछ लोग भाषायी कटुता रखकर और कट्टरता दिखाकर भूमि पुत्र बनने का नाटक कर रहे हैं। जिस छत्तीसगढ़ी को संस्कृत का संस्कार है, उसे भी विलोपित करने की बात करके उन्होंने सुर्खियों में बने रहने का सफल नाटक किया है या कहें छत्तीसगढ़ी भाषाविद् बनने के फेर में और राजभाषा के अगुवा बनने की तिकड़म में आवेशवश और अज्ञानतावश ऐसा वक्तव्य देकर छीछा लेदर करा रहे हैं। छत्तीसगढ़ी-हिंदी की ही तरह (वैसे भी पूर्वी हिंदी की एक शैली है) संस्कृतनिष्ठ भाषा है। तत्सम के प्रचुर शब्द हिंदी और छत्तीसगढ़ी में मिलते हैं। अत: बेटी द्वारा मां की उपेक्षा का आरोप लगाना संभव ही नहीं है।
(लेखक छत्तीसगढ़ी राजभाषा परिषद् के प्रांतीय महासचिव एवं राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य हैं)
मेरे आलेख पर प्रतिक्रिया-11

छत्तीसगढ़ी भाषा का चरम विकास लक्ष्य हो
जे.आर.सोनी

इन दिनों राज्य के एक समाचार पत्र में नंदकिशोर शुक्ल द्वारा लिखित आलेख की चर्चा और आलोचना का बाजार गर्म है। श्री शुक्ल ने अपने इस आलेख में राज्य के दो करोड़ लोगों की आत्मनिर्भरता और समोन्नति को ध्यान में रखकर नवोदित राज्य की हित रक्षा के लिए मातृभाषा को विशेष रूप से रेखांकित किया था। चूंकि राज्य में छत्तीसगढ़िया शांत, मूक, सहनशील और पिछड़े रहे हैं और उनके सिर पर और कोई ददा-दाई की छत्रछाया नहीं है। शुक्ल जी ने इन्हीं का संज्ञान लेते हुए राज्य की मातृभाषा के विकास पर अपना पक्ष रखा था। श्री संजय द्विवेदी और श्री महेशचंद्र शर्मा के आलेख लेखन कला से चमत्कृत करने वाले अपराजेय, बहुस्वीकृत और यथार्थवादी भले ही प्रतीत हो रहे हों किन्तु छत्तीसगढ़ की अतृप्त माटी की सौंधी गंध जो शुक्ल ने देनी चाही, वह कहां? छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा राज्य सरकार और आम जनता द्वारा पूर्णरूपेण प्रयुक्त हो, यही मुख्य आलेख का लक्ष्य था और होना भी चाहिए। रोड़ा अटकाने वाले ही नहीं समर्थन करने वाले भी जानते हैं कि पाठयक्रम में अंग्रेजी का वर्चस्व है। संस्कृत, हिंदी या मातृभाषा का दर्जा पूरे देश में साठ वर्ष होने के बाद भी अंग्रजी दां राजनेताओं को मान्य नहीं हुआ। विरोध अंग्रेजी का होना चाहिए। जाहिर है सब भाषाओं की जननी संस्कृत हम सब जनों की नानी-दादी है तो हिंदी, अंग्रेजी माता-विमाता। भाषाओं के इस परिवार में छत्तीसगढ़ी भाषा स्वमाता है। भाषा पर विवाद ठीक नहीं। उनकी दृष्टि का केंद्र बिंदु छत्तीसगढ़ की मातृभाषा छत्तीसगढ़ी भाषा का चरम और मुक्त विकास है। संस्कृत भाषा और विकास से द्रोह नहीं।
लेखक, पूर्व प्राचार्य हैं
मेरे आलेख पर प्रतिक्रिया-10

संस्कृत में है इस देश की संस्कृति
सच्चिदानंद उपासने
संस्कृत हमारे पूर्वजों की भाषा रही है। हमारे सभी धर्मग्रंथ यथा-वेद, पुराण, उपनिषद आदि संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। इन ग्रंथों में हिंदुस्तान की आत्मा बसती है। इन्हीं की चाओं के बल पर हिन्दुस्तान को अतीत में जगद्गुरु का पद प्राप्त था।

हमारे पूर्वज मानते थे कि देवगण संस्कृत में ही संभाषण करते हैं, अत: संस्कृत को देवभाषा भी कहा जाता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गहन अध्ययन एवं शोधों के पश्चात सभी मूर्धन्य भाषाविज्ञानी एवं व्याकरणाचार्य इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि संस्कृत ही व्याकरण की दृष्टि से सबसे शुध्द एवं पूर्ण भाषा है। संस्कृत में कोई भी तकनीकी कमी नहीं है। हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में ही (जो संस्कृत में रचित हैं) 'वसुधैव कुटुम्बकम का नारा दिया गया है। संस्कृत में ही रचित हमारे आदि ग्रंथों में, 'सर्वेभवंतु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मा कश्चिद् दुख भाग्भवेत् जैसी महान एवं मानवतापूर्ण सीख दी गई है।

ऐसी महान भाषा के विषय में जब मैंने एक अखबार में प्रदेश के वरिष्ठ व संस्कारित पत्रकार नंदकिशोर शुक्ल का लेख 'संस्कृत की बजाय शिक्षा छत्तीसगढ़ी में क्यों नहीं? पढ़ा, तो मन बेचैन हो उठा, मस्तिष्क में एक प्रकार की खलबली मच गई कि आखिर हिन्दुस्तान किस ओर जा रहा है। यहां की राजनीति तो चलिए धर्म, जाति, भाषा, बोली, क्षेत्र ऐसे वादों पर संचालित है, किन्तु जब एक बुध्दिजीवी ऐसे विचार रखे कि संस्कृत को प्राथमिक शालाओं में न पढाया जाए, तो हैरान और दुखी होना स्वाभाविक है। यहां छत्तीसगढ़ी का विरोध कतई नहीं है। निश्चित रूप से बच्चों की प्राथमिक शिक्षा उसी भाषा में होनी चाहिए जो उसकी मातृभाषा हो, जैसी कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर यशपाल जैसे विद्वानों की भी सोच है।

प्रदेश की प्राथमिक शालाओं में तीन भाषाएं पढ़ाई जाती हैं, इसमें प्राथमिक स्तर पर छत्तीसगढ़ी को शिक्षा का माध्यम बनाकर संस्कृत को भी एक भाषा के रूप में बेरोकटोक एवं सुविधापूर्वक पढ़ाया जा सकता है। इसमें कहीं कोई समस्या, कहीं कोई कठिनाई है ही नहीं। प्राथमिक से माध्यमिक स्तर पर 6 से 14 वर्ष की आयु में बच्चों में सीखने की दर भी अत्यंत तेज होती है, विद्वानों की राय है कि इस आयु-समूह के बच्चो कई भाषाएं एक साथ सीख सकते हैं। ऐसे में श्री शुक्ल का यह विचार कि प्राथमिक स्तर पर संस्कृत न पढ़ाई जाए, बिल्कुल औचित्यहीन है। इस बारे में 'हरिभूमि में संजय द्विवेदी के प्रकाशित विचारों से मैं पूर्णत: सहमत हूं। संस्कृत ने हमारे देश को महान एवं प्रकांड विद्वान दिए हैं तथा संस्कृत साहित्य में हमारी धरोहर विराजित है यदि हमारा भविष्य संस्कृत का अध्ययन ही नहीं करेगा तो वह साहित्य व धरोहर तो काला अक्षर भैंस समान हो जाएगा। संस्कृत में तो हमारी संस्कृति निहित है। मैं तो यही कहना चाहूंगा कि संस्कृत भाषा को भी सभी भारतीय भाषाओं की जननी कहलाती है, संस्कृत को वही स्नेह, वही सम्मान व संरक्षण मिलना चाहिए, जो उसे आदिकाल में प्राप्त था। तभी हम उस भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रख सकेंगे, जिस पर हमें गर्व है एवं जिसके द्वारा ही संपूर्ण विश्व एवं मानवता का विकास एवं कल्याण संभव है। निहित स्वार्थ हेतु संस्कृत जैसी देवभाषा को विवाद का विषय बनाना कतई उचित नहीं कहा जा सकता।

(लेखक छत्तीसगढ़ ब्रेवरेज कारपोरेशन के अध्यक्ष हैं)

शुक्रवार, 13 जून 2008

मेरे आलेख पर प्रतिक्रिया-9
भाषाएं नहीं होती हैं साम्प्रदायिक
डॉ. सुधीर शर्मा
पं. नंदकिशोर शुक्ल और संजय द्विवेदी के बहाने अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी के साथ-साथ विश्व की आधार भाषा संस्कृत का गौरव-गान करने का सौभाग्य मिल रहा है। भाषा की महत्ता और उसकी अस्मिता से दूर केवल बोलचाल तक सिमट रहे जनमानस को जगाने के लिए यह बहस सार्थक साबित हो रही है। अनेक विद्वानों ने संस्कृत और छत्तीसगढ़ी की महत्ता विभिन्न संदर्भों और अनुभवों के माध्यम से प्रतिपादित की है। बहस एक-दूसरे को काटने के बजाय एक-दूसरे के विचारों को आगे बढ़ाने में क्रियाशील है।

बहस के केंद्र में छत्तीसगढी क़े लिए मर-मिटने के लिए बुढ़ापे में निकले पं. नंदकिशोर शुक्ल हैं। श्री शुक्ल का यह कथन कि संस्कृत के बजाय छत्तीसगढ़ी को प्राथमिक स्तर से पाठयक्रम में शामिल करना निश्चित ही विवाद का विषय है, और कोई भी भाषावैज्ञानिक इससे पूरी तरह सहमत नहीं हो सकता। हमें बजाय शब्द पर आपत्ति है। श्री शुक्ल ने अपनी भाषा एवं अस्मिता के लिए विभिन्न मोर्चों पर सतत संघर्षरत विद्वानों को एकजुट करने का सराहनीय कार्य किया था। यह भी सच है कि छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाए जाने के निर्णय के आसपास वे पूरी तरह निष्ठा के साथ मौजूद थे। उनके साथ इस आंदोलन में उनके तेवर और सत्ताधीशों के साथ तू-तू, मैं-मैं से हम वाकिफ हैं। दरअसल श्री शुक्ल छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़ के अस्मिता को लेकर गुस्सा भी जाते हैं और इसी उतावलापन या अतिउत्साह से वे संस्कृत के बारे में टिप्पणी कर चुके होंगे। बहरहाल इस बहस के बहाने कुछ ठोस बिन्दुओं पर बातचीत जारी रखें।

संस्कृत की विश्वव्यापी महत्ता आज से नहीं हजारों-हजार वर्षों से है। विश्व के अधुनातन देशों ने भी प्रारंभ से संस्कृत की महत्ता को स्वीकार किया है। दरअसल पश्चिमी भाषा वैज्ञानिक संस्कृत के व्याकरणिक ढांचे को लेकर ही अपनी भाषा का अध्ययन कर पाते हैं। पाणिनि, यास्क, कात्यायन, पंतजलि, आनंदवर्धन, भर्तृहरि, भाष्य जैसे अनेक व्याकरणार्च और विभिन्न शास्त्रों के ज्ञाताओं ने सैकड़ों वर्ष पूर्व जिन सिध्दांतों का प्रतिपादन किया था, आज भी उन्हीं सिध्दांतों के सहारे ही भाषावैज्ञानिक अध्ययन कर रहे हैं। ब्लूमफील्ड, सस्यूर, नॉम चॉमस्की जैसे अनेक पश्चिमी विद्वानों का अध्ययन भी संस्कृत के इन महान आचार्यों के सामने बौना दिखाई देता है। वे कहीं न कहीं उनसे प्रेरित या उनकी छाया में गुम दिखाई देते हैं। देरिदा भी नागार्जुन, शंकराचार्य और अरविंद से प्रभावित लगते हैं। संस्कृत दरअसल प्रयोग में न आने के बावजूद समूचे विश्व की भाषा है। संस्कृत भाषा विश्व परिवार एवं सार्वजनीन भ्रातृभाव की जननी है। शंकराचार्य और रामानुजाचार्य ने अपनी पूरी शक्ति इसके उत्थान के लिए लगा दी थी। चीन की बड़ी दीवार पर संस्कृत के धर्मसूत्र अंकित हैं। मध्य एशिया में अनेक स्थलों पर संस्कृत-ग्रंथों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। भाषा विज्ञान ने संस्कृत को मानव जाति की प्राचीनतम भाषा माना है। मैक्समूलर ने आंतरिक शांति के उद्देश्य से रचित साहित्य को संस्कृत भाषा का साहित्य माना है। वास्तव में संस्कृत हमारी संस्कृति का मूलाधार है। इसके साहित्य में देश की आत्मा बसी है। ऐसी कोई विधा नहीं जो संस्कृत साहित्य में पूरी तार्किकता के साथ मौजूद नहीं, ऐसा कोई ज्ञान-क्षेत्र नहीं जो अपने मौलिक सिध्दांत के साथ उपस्थित न हो।

बात संस्कृत को प्राथमिक स्तर पर पढ़ाए जाने के संबंध में की जा रही है, तब इस बात की भी चिंता करनी चाहिए कि प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई किस पध्दति से हो रही है और वर्तमान मानसिकता किस ओर है। समूचा भारत और अब एशिया के अनेक देश भी अंग्रेजी की ओर मुंह ताक रहे हैं। ग्लोबलाइजेशन ने इसे और मजबूत कर दिया है। विश्व बाजार में अपना वर्चस्व बनाने अंग्रेजी के सहारे की जरूरत दिखाई देती है। दूसरी ओर इस बाजार के दादाओं की ओर देखें तो उन्हें लगता है कि बिना देशीय या क्षेत्रीय भाषाओं के उनके उत्पाद और उसके साथ विचार गांवों तक नहीं पहुंच सकते हैं। प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी अब अनिवार्य हो चुकी है। संस्कृत का अध्यापन कराने से एक लाभ जरूर होगा कि हम भाषा की शुध्दता एवं उसके आधार को आत्मसात कर सकेंगे। परंतु संस्कृत का पाठ गंभीरता से न होकर बचकाना और महज औपचारिकता के लिए कराया गया तो और भी अनर्थ होगा। हो यही रहा है। अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में संस्कृत और हिंदी को मजाक की तरह पढ़ाया जा रहा है। हम स्वयं अपनी भाषा के प्रति सचेत नहीं है। अशुध्द अंग्रेजी बोलने से भयभीत रहते हैं और दिनभर अशुध्द हिंदी का प्रयोग कर जी रहे हैं। इसलिए संस्कृत को पूरी गंभीरता और योजनाबध्द ढंग से अध्ययन के लिए लागू करना चाहिए।

संस्कृत से अलग मातृभाषा के अध्यापन की बात करें तो केंद्र सरकार ने पहले ही फरमान जारी किया हुआ है कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा का माध्यम मातृभाषाएं हों। अनेक राज्यों में ऐसा हो भी रहा है। छत्तीसगढ़ में भी अनेक बोलियों के लिए पाठयक्रम तैयार किए गए हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ी को बार-बार छोड़ना किस मानसिकता की ओर इशारा करता है। दरअसल छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना से जो भय का वातावरण राज्य बनने से पहले था, लगभग वही वातावरण छत्तीसगढ़ी को लेकर है। यह सत्य ही है कि मातृभाषाएं मनुष्य को दिल से जोड़ती हैं। बिखरा हुआ समाज अपनी मातृभाषा की मिठास पाकर एकजुट हो जाता है। यह एकजुटता क्षेत्रीय अस्मिता की सबसे बड़ी पूंजी है। इसी ताकत का अपने अधिकारों की रक्षा के लिए प्रयोग किया जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य की सशक्त वैचारिक आंदोलन के पीछे भी मैं छत्तीसगढ़ी की ताकत को खड़ा पाता हूं। यही ताकत क्षेत्रीय अस्मिता को देश के दूसरे राज्यों की तरह दूसरी ओर न धकेल दे यही चिंता अनेक लोगों की है। दूसरी ओर बिना छत्तीसगढ़ी के छत्तीसगढ़ में न तो सत्ता पाई जा सकती है, न व्यापार किया जा सकता है और तो और छत्तीसगढ़ियों का शोषण भी नहीं किया जा सकता। अंग्रेजों ने संस्कृत, हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को सीखने और उस पर वृहद अध्ययन करने का कार्य यूं ही नहीं किया था। भारत में इकलौता वृहद भाषा-सर्वेक्षण का कार्य उन्होंने ही तो अपने निहित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया था। उसी अध्ययन से हीरालाल काव्योपाध्याय का छत्तीसगढ़ी व्याकरण उपजा है, जिस पर आज हम गर्व करते हैं। जिन लोगों ने छत्तीसगढ़ी के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी को आत्मसात किया है वे सुखी हैं। इसके विपरीत जो लोग अपनी भाषा-अपनी अस्मिता के दीप को प्रावलित रखना जरूरी समङाते हैं, वे गैर छत्तीसगढ़िया कहलाने का दुख भी ङोल रहे हैं। यह बहस बहुत लंबी हो सकती है, लेकिन निष्कर्ष यही निकलता है कि भाषाएं साम्प्रदायिक नहीं होती। एक-दूसरे की भाषा और संस्कृति की रक्षा करना और उसका सम्मान करना हमारी मानवीय आवश्यकता है।

(लेखक छत्तीसगढ़ी राजभाषा आंदोलन से जुड़े साहित्यकार हैं)