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गुरुवार, 24 सितंबर 2026

विदेश नीति के भी महारथी हैं मोदी!

 

पांच देशों की यात्रा से बने हैं रिश्ते और सरोकार




        भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर यह कहा जाता है कि वे विदेश यात्राएं खूब करते हैं। एक जमाने में उन्हें लेकर मजाक भी चला कि कुछ दिन तो गुजारिए हिंदुस्तान में। किंतु उनकी विदेश यात्राओं ने भारत के साथ दुनिया के साथ रिश्तों को सहज किया है। खासकर अरब देशों के साथ भारत के रिश्ते अपने उच्चतम स्तर पर हैं। संवाद की सहजता और गतिशीलता ने भारतीय विदेश नीति को एक नए मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां औपचारिक संवाद से आगे व्यक्तिगत रिश्तों की बात भी होने लगी है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप हों, चीनी राष्ट्रपति हों या रूस के पुतिन। सबके सब मोदी का नाम लेते हैं और भारत को नजरंदाज नहीं कर सकते। इटली दौरे पर पीएम मोदी ने जियोर्जिया मेलोनी को पारले कंपनी की 'मेलोडी' टॉफी का पैकेट गिफ्ट किया, यह पल इंटरनेट पर बहुत वायरल हुआ और मेलोनी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इसका वीडियो शेयर करके पीएम मोदी को धन्यवाद दिया। जाहिर है ऐसे दृश्यों के बीच नरेंद्र मोदी ने रिश्तों का जो पुल बनाया है। उसकी चर्चा समूची दुनिया में है।

      वैश्विक तनाव के बीच भारत-यूरोप संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली सहित कई यूरोपीय देशों का दौरा किया। यह यात्रा एक ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया में जंग के हालात हैं। इन तनावपूर्ण हालात में प्रधानमंत्री का उद्देश्य सिर्फ रिश्ते बनाना नहीं हैं बल्कि भारत की जरूरतों के लिए भी है। यह तो तय है प्रधानमंत्री कोई भी काम अकारण नहीं करते। कई बार उनकी दूरदृष्टि देखी गयी है। जबकि आज की राजनीति तुरंत परिणाम देने वाले संकेतों को ही समझती है। जबकि विदेशनीति में आज रोपे गए बीज कल वृक्ष बनकर परिणाम देते हैं। संवाद और सातत्य ही इसका एकमात्र हल है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री की यह यात्रा भी अनेक लक्ष्यों को साधती है। बताते है कि उनकी यह यात्रा तो काफी पहले से ही नियोजित थी जिसमें भारत-नार्डिक शिखर सम्मेलन भी शामिल था। किंतु 2025 में हुए पहलगाम हमले से सारा कुछ ठहर गया। यह यात्रा उन भारत-यूरोप संबंधों पर नए तरह से रिश्तों को पारिभाषित करना चाहती थी, क्योंकि इन दिनों वैश्विक राजनीति में विश्व शक्तियों का आचरण और व्यवहार काफी कुछ बदला हुआ है।

युद्ध में दुनिया और भारत की भूमिका-

यूक्रेन युद्ध से प्रारंभ हुआ वैश्विक तनाव अब इजराइल-अमरीका और ईरान युद्ध तक जा पहुंचा है। युद्धकामी शक्तियां पीछे हटने को तैयार नहीं है। भारत जैसा देश जो अपनी ऊर्जा सहित तमाम जरूरतों के लिए दुनिया के तमाम देशों पर निर्भर है, वह बैठा नहीं रह सकता। साथ ही अमरीका की टैरिफ से जुड़ी मनमानियां और चीन का अड़ियल रवैया भारत को शांति से बैठने नहीं दे रहा। ऐसे में भारत के राष्ट्रध्यक्ष की चुनौतियां बहुत बढ़ जाती हैं। उन्हें न सिर्फ देश के अंतर की व्यवस्था के सामान्य रखना है बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत के हितों का ख्याल रखना है। क्योंकि दोंनो एक दूसरे से संयुक्त हैं। हम देखते हैं कि पिछले साल लागू हुआ भारत-ईएफटीए व्यापार समझौता और इस साल के आखिर में संपुष्ट/हस्ताक्षरित होने वाला भारत-ईयू एफटीए सप्लाई चेनों और बाजारों में विविधता लाने की साझा इच्छा को दिखाते हैं। खास तौर पर उन नॉर्डिक देशों के साथ, जहां भारत के संग होने वाला द्विपक्षीय व्यापार 20 अरब डॉलर के नीचे बना हुआ है। ऐसे में भारत को इन देशों के साथ ज्यादा बेहतर रिश्ते बनाने की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता।

   आज के समय में भारत की प्राथमिकता एक ऐसी दुनिया को स्थापित करने पर जिसमें विदेशी मुद्रा और ऊर्जा संरक्षण दोनों की बचत हो सके। इन लक्ष्यों को साधे बिना किसी भी विकासशील देश के सामने गहरे संकट घिर जाएंगें। संयुक्त अरब अमीरात में दीर्घकालिक रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्वों पर और नॉर्डिक-भारत शिखर सम्मेलन में हरित रणनीतिक साझेदारियों पर हुई चर्चाओं का लक्ष्य ऊर्जा सुरक्षा पर सहयोग को आगे ले जाना था। मोदी इन सामूहिक लक्ष्यों के साथ युद्धविहीन दुनिया का सपना देखते हैं। वे साफ कहते हैं कि यह युद्ध का समय नहीं है। आंतकवाद और युद्ध विहीन दुनिया उनका ही हर भारतवासी का सामूहिक स्वप्न है। क्योंकि भारत का उद्देश्य ही विश्वमंगल है और उसका ध्येय मंत्र वसुधैव कुटुम्बकम् है। प्रधानमंत्री इसी भारत भाव को दुनिया के हर मंच पर स्थापित करते हुए दिखते हैं। मोदी की समूची यात्रा में यूक्रेन और ईरान संघर्षों पर स्वस्थ चर्चा, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बातचीत शामिल रही। एआई गवर्नेंस और क्रिटिकल मिनरल संबंधी पहलों पर भी फोकस था। नॉर्डिक देशों ने जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुए आर्कटिक में वैज्ञानिक सहयोग और समुद्री (मैरिटाइम) सहकार पर फोकस किया। इन दौरों से कुछ खास ठोस नतीजे या वास्तविक व्यापार समझौते हासिल नहीं हुए, लेकिन दोस्ताना माहौल और मोदी को दिये गये पुरस्कारों ने ज्यादा गहरे भारत-यूरोप सहयोग की उम्मीदों का संकेत दिया। यह जुड़ाव और मजबूत होगा जब वह जून में जी-7 आउटरीच समिट के लिए फ्रांस की यात्रा करेंगे और स्लोवाकिया का द्विपक्षीय दौरा करेंगे, और इसी साल के आखिर में ब्रुसेल्स में भारत-ईयू एफटीए पर दस्तखत करेंगे।

रिश्तों पर खास जोर-

 यह यात्रा साफ बताती है कि प्रधानमंत्री यूरोपीय देशों से अपने रिश्ते बेहतर करना चाहते हैं। एक शानदार लोकतंत्र भारत के लोग यूरोप के देशों से जुड़ना चाहते हैं। उनका विचार है यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यूक्रेन में रुस की आक्रामता, अमरीकी-इजराइल और ईरान के संघर्ष के बीच चीन का आर्थिक दबाव तीन ऐसे कारण हैं जो हमें साथ होने के प्रेरित करते हैं। इसका साफ उद्देश्य है कि अंतराष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था बने और चले भी। ताकि किसी देश की तानाशाही के आधार पर चीजों को बिगाड़ा न जा सके। भारत ईएफटीए व्यापार समझौते और आगामी भारत ईयूएफटीए पर केंद्रित है। इसके साथ ही मोदी का जोर आपूर्ति श्रृखंलाओं और बाजारों के विविधीकरण पर है। ताकि हमारा व्यापार विशेष रुप से नार्डिक देशों के साथ बढ़ सके, जो अभी मात्र 20 अरब डालर से कम है। जाहिर तौर यह क्षेत्र संभावनाओं से भरा है, जहां भारत दांव लगा रहा है।

ऊर्जा जरुरतों के लिए बढ़ती साझेदारी-

 भारत की ऊर्जा जरूरतें इस समय एक बड़ी चुनौती हैं। संयुक्त अरब अमीरात में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को लेकर चर्चा हुई। भारत और यूएई ने पेट्रोलियम भंडार, दीर्घकालिक एलपीजी आपूर्ति और रक्षा सहयोग से संबंधित कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। ये समझौते पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच अबू धाबी में उच्च स्तरीय वार्ता के बाद हुए। यूएई ने भारत में 5 अरब अमरीकी डॉलर के निवेश का भी वादा किया है। इन समझौतों में इंडियन स्‍ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्वस लिमिटेड और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए हस्ताक्षरित रणनीतिक सहयोग समझौता शामिल हैं। इसमें पेट्रोलियम भंडार में सहयोग और तरल प्राकृतिक गैस और एलपीजी भंडारण सुविधाओं पर सहयोग शामिल है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस समझौते से भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में यूएई की हिस्सेदारी बढ़कर 3 करोड़ बैरल हो जाएगी और भारत में रणनीतिक गैस भंडार स्थापित किए जाएंगे। दोनों पक्षों ने एलपीजी पर एक अलग रणनीतिक सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर किए, जिससे भारत में व्यापक रूप से ईंधन की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित होने की उम्मीद है।भारत और संयुक्त अरब अमीरात ने एक रणनीतिक रक्षा साझेदारी के ढांचे पर भी हस्ताक्षर किए, जो रक्षा औद्योगिक सहयोग, प्रौद्योगिकी साझाकरण, नवाचार और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग पर केंद्रित है।

संवाद से संकटों के हल तलाशने की तैयारी-

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलग रहते हुए भी संकटों के हल के लिए चल रहे प्रयासों से खुद को अलग नहीं किया। वे संवाद के स्तर रूस और यूक्रेन दोनों देशों से संवाद बनाए हुए हैं। इसी तरह ईरान, इजराइल और अमरीका से भारत का संवाद निरंतर है। इन यात्राओं में प्रधानमंत्री ने एआई गर्वनेंस पर चर्चा की और खनिज पहलों पर भी संवाद किया। ओस्लो में, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, डेनमार्क की कार्यवाहक प्रधानमंत्री सुश्री मेटे फ्रेडरिक्सन, नॉर्वे के प्रधानमंत्री श्री जोनास गहर स्टोरे, फिनलैंड के प्रधानमंत्री श्री पेटेरी ओर्पो, आइसलैंड की प्रधानमंत्री सुश्री क्रिस्ट्रुन म्योल फ्रॉस्टडॉटिर और स्वीडन के प्रधानमंत्री श्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया। यह शिखर सम्मेलन 2022 में कोपेनहेगन और 2018 में स्टॉकहोम में आयोजित पिछले दो शिखर सम्मेलनों पर आधारित है। प्रधानमंत्रियों ने इस बात पर ध्यान दिया कि वे वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल और तीव्र आर्थिक एवं तकनीकी परिवर्तन के दौर में मिल रहे हैं और साझा हितों और मूल्यों पर आधारित पारस्परिक लाभ के लिए भारत और नॉर्डिक देशों के बीच साझेदारी को गहरा करने और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सहयोग करने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की। इस संदर्भ में, उन्होंने भारत-नॉर्डिक संबंधों को एक विश्वसनीय हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाने का निर्णय लिया। प्रधानमंत्रियों ने तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में हुई चर्चाओं पर संतोष व्यक्त किया और भारत-नॉर्डिक सहयोग को और अधिक विस्तारित एवं गहरा करने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की। नेताओं ने निर्णय लिया कि चौथे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी फिनलैंड करेगा।

सम्मान से जीवंत रिश्तों का प्रारंभ-

    नार्वे में उन्हें ‘द रॉयल नॉर्वे ऑर्डर ऑफ मेरिट के ग्रैंड क्रॉस’से सम्मानित किया गया तो वहीं स्वीडन के प्रतिष्ठित “रॉयल ऑर्डर ऑफ़ पोलर स्टार, कमांडर ग्रैंड क्रॉस” से भी वे अलंकृत किए गए। यह सम्मान भारत और स्वीडन के बीच मजबूत होते कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों का प्रतीक माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों में व्यापार, हरित ऊर्जा, तकनीक और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में साझेदारी लगातार बढ़ी है। ये सूचनाएं बताती हैं कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में दुनिया के मंचों पर भारत की बात सुनी जा रही है और उसे गंभीरता से लिया जा रहा है। पांच देशों की उनकी यात्रा से तत्काल भले कुछ हासिल होता हुआ न दिखे, किंतु रिश्तों की महक, खुशबू और आने वाले समय के लिए कुछ तार तो जुड़े ही हैं। विदेश नीति को इस सहजता और सौजन्य से लेना ही मोदी की विरासत है।


 

 

 

 

 

गुरुवार, 4 जुलाई 2024

नफरतों, कड़वाहटों और संवादहीनता का समय!


-सार्थक संवाद की दृष्टि से निराशाजनक रहा लोकसभा का पहला सत्र 

-प्रो.संजय द्विवेदी 



   भारतीय संसद अपनी गौरवशाली परंपराओं, विमर्शों और संवाद के लिए जानी जाती है। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लोकतांत्रिक बहसों को प्रोत्साहित किया और अपने प्रतिपक्ष के नेताओं डा.राममनोहर लोहिया, श्यामा प्रसाद मुखर्जी,अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर पीलू मोदी तक को मुग्ध भाव से सुना। राष्ट्र प्रेम ऐसा कि चीन युद्ध के बाद गणतंत्र दिवस की परेड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों को आमंत्रित कर उनकी राष्ट्रभक्ति को सराहा। किंतु लोकसभा के प्रथम सत्र में जो कुछ हुआ,वह संवाद की धारा को रोकने वाला है। इससे संसद विमर्श और संवाद का केंद्र नहीं अखाड़ा बन गयी। 

  राष्ट्रपति के भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में जब नेता सदन और प्रधानमंत्री बोल रहे थे, उनके लगभग दो घंटे के भाषण में विपक्षी सदस्यों ने आसमान सिर पर उठा रखा था। लगातार नारेबाजी से उनका भाषण सुनना मुश्किल था। इसके विपरीत जब पहले दिन नेता प्रतिपक्ष बोल रहे थे,तो उनके भाषण में सत्तारूढ़ दल के प्रधानमंत्री सहित तीन मंत्रियों ने हस्तक्षेप किया। नेता प्रतिपक्ष को बताया गया कि वे सदन के पटल पर गलत तथ्य न रखें। यह दोनों स्थितियां भारतीय राजनीति में बढ़ते अतिवाद को स्पष्ट करती हैं, जहां संवाद संभव नहीं है। लोकसभा अध्यक्ष पर नेता प्रतिपक्ष द्वारा की गई अनावश्यक टीका-टिप्पणी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

  नेता प्रतिपक्ष की गलत बयानी के लिए बाद में सत्तारूढ़ दल के वक्ता अपने भाषणों में उनके भाषण की चीरफाड़ कर सकते थे। किंतु शीर्ष स्तर से लगातार हस्तक्षेप ने नेता प्रतिपक्ष का मनोबल बढ़ा दिया। वे सत्ता पक्ष को उत्तेजित करने में सफल रहे और पहले दिन के मीडिया विमर्श में उन्हें 'सक्रिय नेता प्रतिपक्ष' घोषित कर दिया गया। सेकुलर मीडिया के सेनानियों ने उन्हें 'मैन आफ द मैच' घोषित कर दिया। ज़ाहिर है लंबे समय से गंभीर राजनेता की छवि बनाने के लिए आतुर राहुल गांधी के लिए यह अप्रतिम समय था। किंतु पहले दिन की वाहवाही अगले दिन ही धराशाई हो गई जब प्रधानमंत्री के भाषण में दो घंटे तक नारेबाजी चलती रही। देश की जनता दोनों तरह की अतियों के विरुद्ध है। सदन की गरिमा को बचाने के लिए राजनीतिक दलों को कुछ ज्यादा उदार होना चाहिए। 

  लोकसभा के प्रथम सत्र से निकली छवियां बता रही हैं कि आगे भी सब कुछ सामान्य नहीं रहने वाला है। किंतु संसद को अखाड़ा, चौराहे की चर्चा के स्तर पर ले जाने के लिए किसे जिम्मेदार माना जाए? यह ठीक बात है कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है, किंतु सदन में सार्थक और प्रभावी विमर्श खड़ा करना विपक्षी दलों की भी जिम्मेदारी है। अब जबकि विपक्ष अपनी बढ़ी संख्या पर मुग्ध है तो क्या उसे संसदीय मर्यादाओं को छोड़कर अराजकता का आचरण करना चाहिए? सच तो यह है कि सदन के इस तरह चलने से सत्तारूढ़ दल का ही लाभ है।  बिना बहस और चर्चा के कानून इसीलिए पास होते हैं क्योंकि संसद का ज्यादातर समय हम विवादों में खर्च कर देते हैं। संसदीय परंपरा रही है कि हर नयी सरकार को प्रतिपक्ष कम से कम छः माह का समय देता है। उसके कार्यक्रम और योजनाएं का मूल्यांकन करता है। पहले दिन से ही सदन को अराजकता की ओर ढकेलना उचित नहीं कहा जा सकता। अपनी लंबी संसदीय प्रणाली में भारत ने अनेक संकटों का समाधान किया है। हमारे संसदीय परंपरा का मूलमंत्र है संवाद से संकटों और समस्याओं का समाधान खोजना। संसद इसी का सर्वोच्च मंच है। यह प्रक्रिया नीचे पंचायत तक जाती है। इससे सहभागिता सुनिश्चित होती है, सुशासन का मार्ग प्रशस्त होता है। संसद से नीचे के सदनों विधानसभा सभाओं,विधान परिषदों, नगरपालिका, नगर निगमों और पंचायतों को भी सांसदों का आचरण ही रास्ता दिखाता है। लोकसभा के पहले सत्र का लाइव प्रसारण देखते हुए हर संवेदनशील भारतीय जन को ये दृश्य अच्छे नहीं लगे हैं। संसदीय मर्यादाओं और परंपराओं की रक्षा हमारे सांसद गण नहीं करेंगे तो कौन करेगा? संसदीय राजनीति के शिखर पर बैठे दायित्ववान सांसदों की यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि वे अपने आचरण से इस महान संस्था का गौरव बढ़ाने में सहयोगी बनें। नफरतों, कड़वाहटों और संवादहीनता से 'राजनीति' तो संभव है पर 'राष्ट्रनीति' हम न कर पाएंगे।

सोमवार, 10 जून 2024

निरंतरता, अनुभव और उत्साह का संगम है केंद्रीय मंत्रिमंडल

-डा.संजय द्विवेदी 


   केंद्र सरकार का नया मंत्रिमंडल निरंतरता की गवाही देता है। यह बात बताती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी टीम पर भरोसा कायम है। प्रमुख विभागों में अपनी आजमाई जा चुकी टीम को मौका देकर मोदी ने बहुत गंभीर संदेश दिए हैं। मंत्रिमंडल में अनुभव, उत्साह और नवाचारी विचारों के वाहक नायकों को जगह मिली है।

अनुभवी सरकार:

यह मंत्रिमंडल गहरी राजनीतिक सूझबूझ वाले नायकों से संयुक्त है। लंबे समय तक राज्य सरकारों को चलाने वाले 7 पूर्व मुख्यमंत्री इस सरकार में शामिल हैं। कैबिनेट में नरेंद्र मोदी सहित सात पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हैं। जिनमें मोदी खुद गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हैं। इसके अलावा राजनाथ सिंह (उप्र), शिवराज सिंह चौहान (मप्र), जीतनराम मांझी (बिहार), एचडी कुमारस्वामी (कर्नाटक), मनोहरलाल खट्टर(हरियाणा), सर्वानंद सोनोवाल (असम) मुख्यमंत्री रहे हैं। भारत सरकार के विदेश सचिव और पिछली सरकार में विदेश मंत्री रह चुके एस.जयशंकर अपने क्षेत्र के दिग्गज हैं। आईएएस अधिकारी रहे अश्विनी वैष्णव अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में उनके सचिव रहे,विविध अनुभव संपन्न वैष्णव सरकार में नवाचारों के वाहक हैं। पिछली सरकार उनके प्रदर्शन की गवाही है। इसी क्रम में नौकरशाह रहे हरदीप सिंह पुरी सरकार की शक्ति हैं।  नितिन गडकरी का महाराष्ट्र सरकार से लेकर अब केंद्र में 10 साल का कार्यकाल सबकी नजर में है। देश में हुई परिवहन और सड़क क्रांति के वे वाहक हैं। वे केंद्र में सबसे लंबे समय तक परिवहन मंत्री रहने का रिकार्ड बना चुके हैं।

   भाजपा के पास अनुभवी मंत्रियों की टीम सरकार के संकल्पों की वाहक बनेगी, इसमें दो राय नहीं। धर्मेंद्र प्रधान, पीयूष गोयल, प्रहलाद जोशी,किरण रिजिजू, भूपेंद्र यादव,जोएल ओराम, गजेंद्र सिंह शेखावत, डा.वीरेंद्र कुमार , ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावी हस्ताक्षर बन चुके हैं। सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के प्रभावी संचालन का रिकार्ड इनके नाम है। 

सरकार के संकटमोचक:

केंद्रीय मंत्रिमंडल में राजनाथ सिंह और अमित शाह इस सरकार के संकटमोचक हैं। राजनाथ सिंह के साथ जहां सहयोगी दलों का शानदार संवाद है, वहीं अमित शाह अपने कुशल राजनीतिक प्रबंधन के लिए जाने जाते हैं।  इस सरकार में सहयोगी दलों के 11 मंत्री हैं। जबकि 2014 में 5 और 2019 में सहयोगी दलों के 4 मंत्री शामिल थे। यह संख्या अभी और बढ़ सकती है। ऐसे में सरकार में कुशल प्रबंधन की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। आने वाले समय में महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के चुनाव भी होने हैं। यही इस सरकार का पहला सार्वजनिक टेस्ट भी है।

    मंत्रिमंडल में प्रतिबद्धता, निरंतरता और वरिष्ठता का ख्याल रखते हुए भी युवाओं को खास मौके दिए गए हैं। इसके साथ ही यह अखिल भारतीय चरित्र की सरकार भी है, केरल, तमिलनाडु से लेकर जम्मू कश्मीर तक का प्रतिनिधित्व इस सरकार में है। पांच अल्पसंख्यक समुदायों से भी सरकार में मंत्री बने हैं। साथ ही सामाजिक समरसता की दृष्टि से यह समावेशी सरकार कही जा सकती है। 

  अभी तक की स्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सुशासन को लेकर सरकार पर कोई दबाव नहीं है। लेकिन समान नागरिक संहिता, मुस्लिम आरक्षण, जातीय जनगणना, राज्यों को विशेष दर्जा जैसे मुद्दे मतभेद का कारण जरूर बनेंगे। प्रधानमंत्री के कद और उनकी छवि जरूर इन साधारण प्रश्नों से बड़ी है। सरकार के प्रबंधक इन मुद्दों से कैसे जूझते हैं,यह बड़ा सवाल है। सहयोगी दलों के साथ संतुलन और उनकी महत्ता बनाए रखते हुए चलना सरकार की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह अपने अभिभावकत्व और नेतृत्व से एनडीए को संभालते हुए काम प्रारंभ किया है। वे आसानी से साधारण विवादों का हल भी निकाल ही लेंगे। 



रविवार, 9 जून 2024

'सर्वमत' और 'सुशासन' से बनेगा विकसित भारत

- आर्थिक-सामाजिक विकास तथा सामाजिक न्याय ही रहेगा एजेंडा 

-प्रो.संजय द्विवेदी 



 लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी भले ही सीटों के मामले में अपने घोषित लक्ष्य से पीछे रह गए हों , किन्तु चुनौती स्वीकार करने की उनकी जिजीविषा स्पष्ट है। पिछले तीन दिनों से उनके भाषण, बाडी लैंग्वेज बता रही है कि वे राजग की सरकार को उसी अंदाज से चलाना चाहते हैं, जैसी सरकार वे अब तक चलाते आए हैं। सहयोगी दलों से मिली पूर्ण आश्वस्ति के पश्चात मोदी ने अपने नेता पद पर चयन के बाद 'बहुमत' से नहीं बल्कि 'सर्वमत' से सरकार चलाने की बात कही है। वैसे भी चंद्रबाबू नायडू तथा नीतिश कुमार की ज्यादा रूचि अपने राज्यों की राजनीति में हैं। इसलिए सीधे तौर पर दो बड़े सहयोगी दलों तेलुगु देशम और जनता दल (यूनाइटेड) से कोई तात्कालिक चुनौती नहीं है। इसके साथ ही 'सुशासन' मोदी, नायडू और नीतिश तीनों की प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पिछले 22 वर्षों से मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पदों पर रहते हुए सरकारों का नेतृत्व कर रहे हैं। उनमें सबको साथ लेकर चलने की अभूतपूर्व क्षमता है। सुशासन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टालरेंस उनकी कार्यशैली है। यह बात उन्होंने इस बार भी स्पष्ट कर दी है। लंबे नेतृत्व अनुभव ने उनमें साथियों के प्रति सद्भाव और अभिभावकत्व भी पैदा किया है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके लिए एनडीए का हर एक सांसद समान है।  मोदी जब 2014 में प्रधानमंत्री बने तब यह बात काफी कही गई थी कि उन्हें दिल्ली की समझ नहीं है। विदेश नीति जैसे विषयों पर क्या मोदी नेतृत्व दे पाएंगे। जबकि पिछले 10 वर्षों में मोदी ने इन दोनों प्रारंभिक धारणाओं को खारिज किया। ऐसे में गठबंधन सरकार का नेतृत्व वे सफलतापूर्वक करेंगे, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। 

   सत्ता के संकटों और सीमाओं के बाद भी नरेंद्र मोदी ने अपने विजन और नेतृत्व क्षमता से लंबी लकीर खींची है। गहरी राष्ट्रीय चेतना से लबरेज उनका व्यक्तित्व एनडीए की चुनावी सफलताओं की गारंटी बन गया है। अब जबकि एनडीए के लगभग 303 सांसद हो चुके हैं,तब यह मानना ही पड़ेगा यह सरकार आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और सामाजिक कल्याण की योजनाएं लागू करते हुए तेज़ी से आगे बढ़ेगी। अरूणाचल प्रदेश, उड़ीसा की राज्य सरकारें मोदी मैजिक का ही परिणाम है। केरल में खाता खोलने के साथ तेलंगाना, आंध्र और कर्नाटक के परिणाम दक्षिण भारत में भाजपा की बढ़ती स्वीकार्यता बताते हैं। इन परिणामों में नरेंद्र मोदी की छवि और उनका परिश्रम संयुक्त है। 

  उत्तर प्रदेश, राजस्थान,बंगाल और महाराष्ट्र से गंभीर नुकसान के बाद भी सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को जिताकर ले आना और एनडीए को बहुमत दिलाने में उनकी खास भूमिका है।  एनडीए सांसद और सहयोगी दल भी मानते हैं उन्हें मोदी की छवि का फायदा अपने-अपने क्षेत्रों में मिला है। 10 साल के सत्ता विरोधी रूझानों के बाद भी अन्य क्षेत्रों में विस्तार करते हुए भाजपा और एनडीए अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रहे, यह साधारण बात नहीं है।

   राजग ने चुनावी जंग में मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश की सभी सीटें जीत लीं। बावजूद इसके अपराजेय समझे जाने वाले 'मोदी -योगी ब्रांड' को उत्तर प्रदेश में बहुत गहरा झटका लगा है। प्रधानमंत्री की वाराणसी में जीत के अंतर को भी विरोधी रेखांकित कर रहे हैं। अयोध्या की हार मीडिया की सबसे बड़ी खबर बन गयी है। जाहिर तौर पर इसे लोकतंत्र की खूबसूरती ही मानना चाहिए। इसलिए इसे जनादेश कहते हैं। आरक्षण और संविधान बदलाव के भ्रामक प्रचार ने जैसा उत्तर प्रदेश में असर दिखाया है , संभव है बिहार में चिराग पासवान और जीतनराम मांझी गठबंधन में न होते तो वहां भी ऐसा ही नुकसान संभावित था। 

 कांग्रेस और उसके गठबंधन को निश्चित ही बड़ी सफलता मिली है। इसके चलते संसद और उसके बाहर मोदी सरकार को चुनौतियां मिलती रहेंगी। विपक्ष का बढ़ा आत्मविश्वास क्या आनेवाले समय में सरकार के लिए संकट खड़ा कर पाएगा, इसे देखना रोचक होगा।

  भारतीय लोकतंत्र वैसे भी निरंतर परिपक्व हुआ है। सर्वसमावेशी होना उसका स्वभाव है। 'सबका साथ, सबका विकास' ही मोदी मंत्र रहा है। बाद में मोदी ने इसमें दो चीजें और जोड़ीं 'सबका विश्वास और सबका प्रयास'। गठबंधन सरकार चलाने के लिए इससे अच्छा मंत्र क्या हो सकता है। मोदी और उनकी पार्टी ने विकसित भारत बनाने का कठिन उत्तरदायित्व लिया है, वे इस संकल्प को पूरा करने के लिए प्रयास करेंगे तो यही बात भारत मां के माथे पर सौभाग्य का टीका साबित होगी।


रविवार, 30 जनवरी 2022

समकालीन भारत को समझने की कुंजी

                                                     - प्रो. कृपाशंकर चौबे

             (समीक्षक- महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष हैं)



जनसंचार के गंभीर अध्येता प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘भारतबोध का नया समय’ का पहला ही निबंध इसी शीर्षक से है। भारतबोध की समझ को स्पष्ट करने के लिए लेखक ने गांधी, धर्मपाल, लोहिया, वासुदेव शरण अग्रवाल, निर्मल वर्मा से लेकर रामविलास शर्मा के राष्ट्रबोध संबंधी चिंतन का अवलंबन लिया है। इस निबंध में संजय द्विवेदी ठीक कहते हैं कि भारतीय दर्शन संपूर्ण जीव सृष्टि का दर्शन है। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि समस्त ब्रह्मांड के मंगल की ही कामना सनातन धर्म करता है और अध्यात्मवाद भी। ‘सर्वे भवन्ति सुखिनः’, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसी सूक्तियों को छोड़ भी दें तो प्राचीनतम वेद ऋग्वेद में कहा गया है, ‘विश्व पुष्टं ग्रामे अस्मिन अनातुरम’। अथर्ववेद में भी कहा गया है, ‘सर्वा आशा मम मित्रं भवंतु’। भारतीय दर्शन में लोक को सबसे अधिक वरीयता दी जाती है। लोक कोरे मनुष्य नहीं, सारे जीव-जंतु, सभी वनस्पति, नदी, समुद्र, पहाड़ सबको लेकर बनता है। भारतीय दृष्टि चूंकि पेड़, पत्ते, दूब, पौधे, नदी, समुद्र, पहाड़ में दैवी सत्ता का साक्षात्कार करती है, इसीलिए वह उदात्त है। भारतबोध की शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की पुकार कुछ लोग सुन रहे हैं, कुछ सुनकर भी बहरे बने हुए हैं। वैसे ही लोग भारतबोध की बहस को बहकाने में लगे हैं। संजय द्विवेदी लिखते हैं कि विविधता में एकता देश की प्रकृति है। जाहिर है कि विविधता भारत की कमजोरी नहीं, शक्ति है। एक और महत्त्वपूर्ण बात संजय द्विवेदी ने कही है कि भारत राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक अवधारणा से बना है।

इस सांस्कृतिक अवधारणा का विस्तार रवींद्रनाथ ठाकुर तक की रचनाओं में भी हम देख सकते हैं। ‘भारत तीर्थ’ कविता में टैगोर कहते हैं-आर्य अनार्य, द्रविड़, चीनी, शक, हूण, पठान, मुगल सब यहां एक देह में लीन हो गए। यह देह ही भारतबोध है। उसी विश्व भ्रातृत्व भावना को विवेकानंद के शिकागो भाषण के संबोधन के चार शब्दों ‘मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’ में समूचे विश्व ने साक्षात किया था। विवेकानंद इसीलिए विश्व को धर्म का मर्म समझा पाए थे। संजय द्विवेदी ने विवेकानंद को सही अभिप्राय में उद्धृत किया है। किताब में विवेकानंद पर एक स्वतंत्र अध्याय भी है। उसका शीर्षक है ‘विवेकानंद : युवा शक्ति के प्रेरक’। विवेकानंद ने कहा था, “उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिए जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जाएं।” विवेकानंद ने देशवासियों में ही ईश्वर को देखा था। उन्होंने कहा था कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मंदिरों में स्थापित कर दिया जाए और मंदिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाए। इस महान विचार के कारण विवेकानंद सदा-सर्वदा प्रेरणा पुरुष बने रहेंगे।

पुस्तक में आजादी के अमृत महोत्सव पर स्वतंत्र अध्याय है, जिसमें संजय द्विवेदी बताते हैं कि कितने उत्कट बलिदानों के बाद आजादी मिली। आजादी के बाद के भारत को गढ़ने में जिनका भी योगदान रहा, उसका वे स्मरण करते हैं। इस तरह के प्रसंगों के कारण पूरी पुस्तक एकांगी होने के दोष से मुक्त है। इसी अध्याय में लेखक ने वेद और श्रीमद्भागवत गीता को उद्धृत कर अमृत महोत्सव का आशय बताया है। एक वैदिक ऋचा में कहा गया है, ‘मृत्योः मुक्षीय मामृतात्’ अर्थात हम दुःख, कष्ट, क्लेश और विनाश से निकलकर अमृत की तरफ बढ़ें। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, ‘सम दुःख-सुखम् धीरम् सः अमृत त्वाय कत्यचे’ अर्थात जो सुख-दुःख, आराम, चुनौतियों के बीच भी धैर्य के साथ अटल, अडिग और सम रहता है, वही अमृत को, अमरत्व को प्राप्त करता है। लेखक ने ‘स्वतंत्रता आंदोलन और पत्रकारिता’ शीर्षक अध्याय में जेल-जब्ती-जुर्मानेवाली पत्रकारिता का स्मरण किया है। पुस्तक में संकलित ‘लोकमंगल है मीडिया का धर्म’, ‘पत्रकारिता में नैतिकता’, ‘नारद : लोकमंगल के संचार कर्ता’, ‘आंबेडकर और मूकनायक’, ‘भारतीय पत्रकारिता के कर्मवीर’, ‘एकात्म मानववाद और मीडिया दृष्टि’, ‘मन की बात’ शीर्षक लेख पत्रकारिता के विद्यार्थियों व अध्येताओं के लिए बहुत उपयोगी हैं। लगे हाथ ‘मीडिया शिक्षा के सौ वर्ष’ और राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर भी अलग-अलग अध्यायों में संजय द्विवेदी ने विहंगम दृष्टि डाली है। लेखक ने गांधी, माधव राव सप्रे, वीर सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर नरेंद्र मोदी की प्रेरणाओं के प्रयोजन को भी रेखांकित किया है। एक अलग अध्याय में लेखक ने ‘नए भारत की चुनौती’ पर विचार किया है, तो श्रीराम, गौसंवर्द्धन, योग, संसद, मिशन कर्मयोगी पर भी। समकालीन भारत और विमर्शों को समझने के लिए यह पुस्तक कुंजी का काम करेगी।

पुस्तक : भारतबोध का नया समय

लेखक : प्रो. संजय द्विवेदी

मूल्य : 500 रुपये

 प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, 4754/23, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली-110002

 अमेजन पर उपलब्ध-

 https://www.amazon.in/dp/9385696890/ref=cm_sw_r_awdo_navT_g_710TT5DT9CS014K5CB97

फिल्पकार्ड पर उपलब्ध-

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बुधवार, 16 सितंबर 2020

मोदी की बातों में है माटी की महक

                                                                     -प्रो.संजय द्विवेदी




    भारत जैसे महादेश को संबोधित करना आसान नहीं है। इस विविधता भरे देश में वाक् चातुर्य से भरे विद्वानों, राजनेताओं, प्रवचनकारों और अदीबों की कमी नहीं है। अपनी वाणी से सम्मोहित कर लेने वाले अनेक विद्वानों को हमने सुना और परखा है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क्षमताएं उनमें विलक्षण हैं। वे हमारे समय के अप्रतिम संचारकर्ता हैं। संचार का विद्यार्थी होने के नाते मैं उनकी तरफ बहुत विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखता हूं, किंतु वे अपनी देहभाषा, भाव-भंगिमा, शब्दावली और वाक् चातुर्य से जो करते हैं, उसमें कमियां ढूंढ पाना मुश्किल है। उनका आत्मविश्वास और शैली तो विलक्षण है ही, वे जो कहते हैं उस बात पर भी सहज विश्वास करने का मन होता है। मोदी सही मायने में संवाद के महारथी हैं। वे जनसभाओं के नायक हैं तो ट्विटर जैसे नए माध्यमों पर भी उनकी तूती बोलती है। पारंपरिक मंचों से लेकर आधुनिक सोशल मीडिया मंचों पर उनकी धमाकेदार उपस्थिति बताती है संवाद और संचार को वे किस बेहतर अंदाज में समझते हैं।

   गुजरात के एक छोटे से कस्बे बड़नगर में पले-बढ़े नरेंद्र मोदी में ऐसा क्या है जो लोंगों को सम्मोहित करता है? उनकी राजनीतिक यात्रा भी विवादों से परे नहीं रही है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें जिस तरह निशाना बनाकर उनकी छवि मलिन करने के सचेतन प्रयास हुए, वे सारे प्रसंग लोकविमर्श में हैं। बावजूद इसके वे हिंदुस्तानी समाज के नायक बने हुए हैं तो इसके पीछे उनकी संप्रेषण कला और देहभाषा का अध्ययन प्रासंगिक हो जाता है। नरेंद्र मोदी देश के ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो कभी सांसद नहीं थे और पहली बार लोकसभा पहुंचकर देश के प्रधानमंत्री बने। 2014 के आमचुनावों की याद करें तो देश किस तरह निराशा और अवसाद से भरा हुआ था। लोग राजनीति और राजनेताओं से उम्मादें छोड़ चुके थे। अन्ना आंदोलन से एक अलग तरह का गुस्सा लोगों के मन में पनप रहा था। तभी एक आवाज गूंजती है ‘मैं देश नहीं झुकने दूंगा।’ दूसरी आवाज थी ‘अच्छे दिन आने वाले हैं।’ ये दो आवाजें थीं नरेंद्र मोदी की, जो देश को एक विकल्प देने के लिए मैदान में थे। राजनीति में आश्वासनपरक आवाजों का बहुत मतलब नहीं होता, क्योंकि राजनीति तो सपनों और आश्वासनों के आधार पर ही की जाती है। किंतु नरेंद्र मोदी ने इस दौर में जो कुछ कहा उसे देश ने बहुत ध्यान से सुना। उनका दल लंबे समय से सत्ता से बाहर था और वे अपने दल की ओर से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार बनाए जा चुके थे। जाहिर है अवसाद और निराशा से भरी जनता को एक अवसर था परख करने का। मोदी इस अवसर का लाभ उठाते हैं और जनता के मन में भरोसा जगाने का प्रयास करते हैं। वे लगातार अपनी सभाओं में कहते हैं कि वे ही इस देश को उसके संकटों से उबार सकने की क्षमता से लैस हैं। जनता मुग्ध होकर उनके भाषणों को सुनती है। अपनी अप्रतिम संवादकला से वे लोगों में यह भरोसा जगाने में सफल हो जाते हैं कि वे कुछ कर सकते हैं।

        2014 में मोदी सत्ता में आते हैं और संचार के सबसे प्रभावकारी माध्यम को साधते हैं। वे आकाशवाणी पर ‘मन की बात’ के माध्यम से लोगों से संवाद का अवसर चुनते हैं। यानि उनका संवाद अवसर और चुनाव केंद्रित नहीं है, निरंतर है। उनमें एक सातत्य है। बदलाव के लिए, परिवर्तन के लिए, लोकजागरण के लिए। वे मन की बात को राजनीतिक विमर्शों के बजाए लोकविमर्शों का केंद्र बनाते हैं। जिसमें जिंदगी की बात है, सफाई की बात है, शिक्षा और परीक्षा की बात है, योग की बात है। मन की बात के माध्यम से वे खुद को एक ऐसे अभिभावक की तरह पेश करने में सफल होते हैं, जिसे देश और देशवासियों की चिंता है। संवाद की यही सफलता है और यही उसका उद्देश्य है। अपने लक्ष्य समूह को निरंतर अपने साथ जोड़े रखना मोदी की संवाद कला की दूसरी सफलता है। करोना संकट में भी हमने देखा कि उनकी अपीलों को किस तरह जनमानस ने स्वीकार किया, चाहे वे करोना वारियर्स के सम्मान में दीप जलाने और थाली बजाने की ही क्यों न हों। यह बातें बताती हैं कि अपने नायक पर देश का भरोसा किस तरह कायम है।  

     मोदी अपनी देहभाषा से कमाल करते हैं। कई बार चौंकाते भी हैं। देश की गहरी समझ भी इसका बड़ा कारण है, यही कारण है वे देश के जिस हिस्से में होते हैं वहां की स्थानीय बोली, वस्त्रों और प्रतीकों का सचेत इस्तेमाल करते हैं। इसके साथ ही उनकी पोशाकें, उनका हाफ कुर्ता, जैकेट्स आज एक तरह से स्टाइल स्टेटमेंट है। उनका अनुसरण कर नौजवान आज खद्दर और सूती कपड़ों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। हम विश्लेषण करें तो पाते हैं कि उनका समर्पित जीवन और ईमानदारी से उनकी वाणी का भी एक रिश्ता है। जब हम सिर्फ बोलते हैं तो उसका असर अलग होता है। किंतु अगर हम जो बोलते हैं उसमें कृतित्व भी शामिल हो तो बात का असर बढ़ जाता है। नरेंद्र मोदी अपनी असंदिग्ध ईमानदारी, राष्ट्रनिष्ठा और देशभक्ति के प्रतीक हैं। उनका समूचा जीवन राष्ट्र के लिए अर्पित है। ऐसा व्यक्ति जब कोई बात कहता है तो उसका असर बहुत ज्यादा होता है। क्योंकि आपकी वाणी को आपके जीवन का समर्थन है। सिर्फ देश की बात करना और देश के लिए जीना दो बातें हैं। मुझे लगता है जीवन और कर्म में एक रूप होने के नाते मोदी बाकी राजनेताओं से बहुत आगे निकल जाते हैं। क्योंकि उनकी राष्ट्रनिष्ठा पर सबको भरोसा है, इसलिए उनकी वाणी पर भी सहज विश्वास आता है। इस तरह उनकी वाणी ‘भाषण’ न होकर ‘ह्दय से ह्दय के संवाद’ में बदल जाती है। लोंगों को भरोसा है कि वे हमारी ही बात कर रहे हैं और हमारे लिए ही कर रहे हैं। मोदी ने अपनी साधारण पृष्ठभूमि की बात कभी छिपाई नहीं, जब भी उनकी साधारण स्थितियों का मजाक बनाया गया तो उसे भी उन्होंने एक सफल अभियान में बदल दिया। ‘चाय पर चर्चा’ का कार्यक्रम किस तरह बना, उसके संदर्भ हम सबके ध्यान में हैं। नरेंद्र मोदी सही मायने में सामान्य जनों में भरोसा जगाते हैं कि अगर संकल्प हों, इच्छाशक्ति हो तो व्यक्ति क्या नहीं कर सकता। यह एक बात लोगों को उनसे कनेक्ट करती है। अनेक राजनेता हैं, जो साधारण पृष्ठभूमि से आए हैं। किंतु उनका या तो अपनी जड़ों से उनका रिश्ता टूट गया है या वे उन विथिकाओं को याद नहीं करना चाहते। जबकि नरेंद्र मोदी अपनी जड़ों को नहीं भूलते वे हमेशा उसे याद करते हैं और खुद पर भरोसा करते हैं। यही कारण है उनका कनेक्ट सीधा जनता से बनता है। वे प्रधानमंत्री होकर भी अपने से नजर आते हैं। संचार, संवाद और पोजिशिनिंग की यह कला उनमें सहज है। बिना जतन के भी वे इन सबको साधते हैं और साधते रहेंगें क्योंकि आसमान पर होकर भी माटी की सोंधी महक उन्हें जड़ों से जोड़े रखती है। इसलिए उनका संवाद दिलों को जोड़ता है, देश को भी।

   

रविवार, 17 मई 2020

देश के दुखों की नदी में तैरते सवाल


कोरोना के बहाने आइए अपने असल संकटों पर विचार करें
-प्रो. संजय द्विवेदी


  कोरोना संकट के बहाने भारत के दुख-दर्द,उसकी जिजीविषा, उसकी शक्ति, संबल, लाचारी, बेबसी, आर्तनाद और संकट सब कुछ खुलकर सामने आ गए हैं। इन सात दशकों में जैसा देश बना या बनाया गया है, उसके कारण उपजे संकट भी सामने हैं। दिनों दिन बढ़ती आबादी हमारे देश का कितना बड़ा संकट है यह भी खुलकर सामने है, किंतु इस प्रश्न पर संवाद का साहस न राजनीति में है न विचारकों में । संकटों में भी राजनीति तलाशने का अभ्यास भी सामने आ रहा है। मीडिया से लेकर विचारकों के समूह कैसे विचारधारा या दलीय आस्था के आधार पर चीजों को विश्लेषित और व्याख्यायित कर रहे हैं कि सच कहीं सहम कर छिप गया है। देश के दुख, देश के लोगों के दुख और संघर्ष भी राजनीतिक चश्मों से देखे और समझाए जा रहे हैं।
   ऐसे कठिन समय में सच को व्यक्त करना कठिन है, बहुत कठिन। क्योंकि सभी विचारवंतों के ‘अपने अपने सच’ हैं। जो राजनीतिक आस्थाओं के आधार देखे और परखे जा रहे हैं। भारतीय बौद्धिकता और मीडिया के शिखर पुरुषों ने इतना निराश कभी नहीं किया था। साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल बताने वाले देश ने राजनीतिक आस्थाओं को ही सच का पर्याय मान लिया है। संकटों के समाधान खोजने, उनके हल तलाशने और देश को राहत देने के बजाए जख्म को कुरेद-कुरेद कर हरा करने में मजा आ रहा है। यह सडांध तब और गहरी होती दिखती है, जब कुछ लोग पलायन की पीड़ा भोग रहे हिंदुस्तान के दुख में भी आनंद की अनुभूति सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि देश के नेता के सिर उसका ठीकरा फोड़ा जा सके। केंद्र की मजबूत सरकार और उसके मजबूत नेता को विफल होते देखने की हसरत इतनी प्रबल है कि वह लोगों की पीड़ा और आर्तनाद में भी आनंद का भाव खोज ले रही है। हमारी केंद्र और राज्य की सरकारों की विफलता दरअसल एक नेता की विफलता नहीं है। यह समूचे लोकतंत्र और इतने सालों में विकसित तंत्र की भी विफलता है। सामान्य संकटों में भी हमारा पूरा तंत्र जिस तरह धराशाही हो जाता है वह अद्भुत है। बाढ़, सूखा, भूकंप और अन्य दैवी आपदाओं के समय हमारे आपदा प्रबंधन के सारे इंतजाम धरे रह जाते हैं। सामान्यजन इसकी पीड़ा भोगता है। यह घुटनाटेक रवैया निरंतर है और इस पर लगाम कब लगेगी कहा नहीं जा सकता। व्यंग्य कवि स्व. प्रदीप चौबे ने लिखा –बाढ़ आए या सूखा मैं खाऊं तू खा। यानि जहां बाढ़ आ रही है, वहां सालों से हर साल आ रही। फिर उसी इलाके में सूखा भी हर साल आ रहा है। यानि इस संकट ने उस इलाके में एक इको सिस्टम बना लिया है और उसके साथ लोग जीना सीख गए हैं। हमारा महान प्रशासनिक तंत्र इन संकटों से निजात पाने के उपाय नहीं खोजता, उसके लिए हर संकट में एक अवसर है।
     हम अपने संकटों को चिन्हिंत करें तो वे ज्यादा नहीं हैं, वे आमतौर पर विपुल जनसंख्या और उससे उपजे हुए संकट ही हैं। उत्तर भारत के राज्यों के सामने यह कुछ ज्यादा विकराल हैं क्योंकि यहां की राजनीति ने राजनेता और राजनीतिक योद्धा तो खूब दिए किंतु जमीन पर उतरकर संकटों के समाधान तलाशने की राजनीति यहां आज भी विफल है। ये इलाके आज भी जातीय दंभ, अहंकार, माफियाराज, लूटपाट, गुंडागर्दी के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसलिए उत्तर भारत के राज्य इस संकट में सबसे ज्यादा परेशानहाल दिखते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़, बंगाल जिस तरह पलायन की पीड़ा से बेहाल हैं, उसे देखकर आंखें भर आती हैं। एक बार दक्षिण और पश्चिम के राज्यों महाराष्ट्र,गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल की ओर हमें देखना चाहिए। आखिर क्या कारण हैं हमारे हिंदी प्रदेश हर तरह के संकट का कारण बने हुए हैं।पलायन, जातिवाद, सांप्रदायिकता, माफिया,भ्रष्टाचार, ध्वस्त स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था सब इनके हिस्से हैं। यह संभव है कि समुद्र के किनारे बसे राज्यों की व्यवस्थाएं, अवसर और संभावनाएँ बलवती हैं। किंतु उत्तर भारत के हरियाणा, पंजाब जैसे राज्य भी उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी संभावनाओं को जमीन पर उतारा है। प्रधानमंत्रियों का राज्य रहा उत्तर प्रदेश आज भी देश और दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। अपनी विशाल आबादी और विशाल संकटों के साथ। जमाने से कभी गिरिमिटिया मजदूरों के रूप में विदेशों में ले जाए जाने की पीड़ा तो आजादी के बाद मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, रंगून जैसे महानगरों में संघर्ष करते, पसीना बहाते लोग एक सवाल की तरह सामने हैं। यही हाल बिहार का है। एक जमाने में गांवों में गाए जाने वाले लोकगीत भी इसी पलायन के दर्द का बयान करते हैं-
रेलिया बैरन पिया को लिए जाए हो, रेलिया बैरन।
(रेल मेरी दुश्मन है जो मेरे पति को लेकर जा रही है)
मेरे पिया गए रंगून किया है वहां से टेलीफून,
तुम्हारी याद सताती है जिया में आग लगाती है।
  आजादी के बाद भी ये दर्द कम कहां हुए हैं? स्वदेशी, स्वावलंबन का ‘गांधी पथ’ छोड़कर सत्ताधीश नए मार्ग पर दौड़ पड़े जो गांवों को खाली करा रहे थे और शहरों को बेरोजगार युवाओं की भीड़ से भर रहे थे। एक समय में आत्मनिर्भर रहे हमारे गांव अचानक ‘मनीआर्डर एकोनामी’ पर पलने लगे। गांवों में स्वरोजगार के काम ठप पड़ गए। कुटीर उद्योग ध्वस्त हो गए। भारतीय समाज को लांछित करने के लिए उस पर सबसे बड़ा आरोप वर्ण व्यवस्था का है। जबकि वर्ण व्यवस्था एक वृत्ति थी, टेंपरामेंट थी। आपके स्वभाव, मन और इच्छा के अनुसार आप उसमें स्थापित होते थे। व्यावसायिक वृत्ति का व्यक्ति वहां क्षत्रिय बना रहने के मजबूर नहीं था, न ही किसी को अंतिम वर्ण में रहने की मजबूरी थी। अब ये चीजें काल बाह्य हैं। वर्ण व्यवस्था समाप्त है। जाति भी आज रूढ़ि बन गयी किंतु एक समय तक यह हमारे व्यवसाय से संबंधित थी। हमारे परिवार से हमें जातिगत संस्कार मिलते थे-जिनसे हम विशेषज्ञता प्राप्त कर ‘जाब गारंटी’ भी पाते थे। इसमें सामाजिक सुरक्षा थी और इसका सपोर्ट सिस्टम भी था। बढ़ई, लुहार, सोनार, निषाद, माली, धोबी, कहार ये जातियां भर नहीं है। इनमें एक व्यावसायिक हुनर और दक्षता जुड़ी थी। गांवों की अर्थव्यवस्था इनके आधार पर चली और मजबूत रही। आज यह सारा कुछ उजड़ चुका है। हुनरमंद जातियां आज रोजगार कार्यालय में रोजगार के लिए पंजीयन करा रही हैं या महानगरों में नौकरी के लिए धक्के खा रही हैं। जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था दोनों ही अब अपने मूल स्वरूप में काल बाह्य हो चुके हैं। अप्रासंगिक हो चुके हैं। ऐसे में जाति के गुण के बजाए, जाति की पहचान खास हो गयी है। इसमें भी कुछ गलत नहीं है। हर जाति का अपना इतिहास है, गौरव है और महापुरुष हैं। ऐसे में जाति भी ठीक है, जाति की पहचान भी ठीक है, पर जातिभेद ठीक नहीं है। जाति के आधार भेदभाव यह हमारी संस्कृति नहीं। यह मानवीय भी नहीं और सभ्य समाज के लिए जातिभेद कलंक ही है।
      हमें हमारे गांवों की ओर देखना होगा। मनीषी धर्मपाल की ओर देखना होगा, उन्हें पढ़ना होगा, जो बताते हैं कि किस तरह हमारे गांव स्वावलंबी थे। जबकि आज नई अर्थव्यवस्था में किसान आत्महत्या करने लगे और कर्ज को बोझ से दबते चले गए। 1991 के लागू हुयी नई आर्थिक व्यवस्था ने पूरी तरह से हमारे चिंतन को बदलकर रख दिया। संयम के साथ जीने वाले समाज को उपभोक्ता समाज में बदलने की सचेतन कोशिशें प्रारंभ हुयीं। 1991 के खड़ा हुआ यह अर्थतंत्र इतना निर्मम है कि वह दो महीने भी आपको संकटों में संभाल नहीं सकता। आप देखें तो छोटे उद्यमियों की छोड़ें,बड़ी कंपनियों ने भी अपने कर्मियों के वेतन में तत्काल कटौती करने में कोई कमी नहीं की। यहां से जो गाड़ी पटरी से उतरी है,संभलने को नहीं है। ईएमआई के चक्र ने जो जाल बुना है, समूचा मध्यवर्ग उससे जूझ रहा है। निम्न वर्ग उससे स्पर्धा कर रहा है। इससे समाज में बढ़ती गैरबराबरी और स्पर्धा की भावना एक बड़े समाज को निराशा और अवसाद से भर रही है। जाहिर है संकट हमारे हैं, इसके हल हम ही निकालेगें। शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, कृषकों के संकट, बढ़ती जनसंख्या के सवाल हमारे सामने हैं। इनके ठोस और वाजिब हल निकालना हमारी जिम्मेदारी है। कोरोना संकट ने हमें साफ बताया है कि हम आज भी नहीं संभले तो कल बहुत देर हो जाएगी। अंधे पूंजीवाद और निर्मम कारपोरेट की नीतियों से अलग एक मानवीय,संवेदनशील समाज बनाने की जरूरत है जो भले महानगरों में बसता हो उसकी जड़ों में संवेदना और आत्मीयता हो। सिर्फ हासिल करने और हड़पने की चालाकी न हो। देने का भाव भी हो। भरोसा कीजिए हम इस दुखों की नदी को पार कर जाएंगें।





बुधवार, 13 मई 2020

करोना के बाद सपनों को सच करने की जिम्मेदारी


-प्रो.संजय द्विवेदी


             संकट कितने भी बड़े, गहरे और लाइलाज हों। एक नायक को उम्मीदों और सपनों के साथ ही होना होता है। वह चाहकर भी निराशा नहीं बांट सकता। अवसाद नहीं फैला सकता। उसकी जिम्मेदारी है कि टूटे हुए मनों, दिलों और आत्मा पर लग रही खरोंचों पर मरहम ही रखे। ऐसे कठिन समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 मई,2020 के राष्ट्र के नाम संदेश की भावनाओं को समझा जाना चाहिए। करोना के अंधेरे समय में जब दुनिया की तमाम प्रगतिशील अर्थव्यवस्थाएं संकटों से घिरी हैं और घबराई हुई हैं, तब भी वे उम्मीदों और सपनों का साथ नहीं छोड़ते। एक समर्थ नेता की तरह वे लोगों में निराशा नहीं भरते, बल्कि भरोसा जगाते हैं। वे निराश और हताश नहीं हैं, बल्कि संकटों में अवसर की तलाश कर रहे हैं। वे करोना महामारी के व्यापक प्रसार के क्षणों में भी कहते हैं कि “हम करोना से लड़ेंगें और आगे बढेंगे।”
    करोना संकट के बाद अखबार बुरी खबरों से भरे पड़े हैं। गांव जाते हुए ट्रेन से कटते श्रमिक, भूख से बिलखते हुए बच्चे, गहरी असुरक्षा से घिरे छोटी गाड़ियों,साइकिलों, मोटरसाइकिलों और पैदल ही गांव को जाते लोग जैसी तमाम छवियां मन को दुखी कर जाती हैं। इस नकारात्मकता के संसार में सोशल मीडिया पर अखंड विलाप करते लोग भी हैं, जो लोकतंत्र की बेबसी और हमारे सरकारी तंत्र की विफलताओं की रूदाली कर रहे हैं। इस गहरे अंधकार, नकारात्मक सूचनाओं के संसार में एक राष्ट्रनायक का काम क्या है? सही मायने में एक राष्ट्र के नायक का यही कर्तव्य है कि वह राष्ट्रजीवन में निराशा और अवसाद के बादल न चढ़ने दे। वह दुखी जनों को और संतप्त न करे। कठिनतम जीवन संघर्ष में लगी जनता को प्रेरित कर उन्हें रास्ता दिखाए। देश की विशाल आबादी हमारा संकट है। बावजूद इसके इस प्रश्न पर बोलना खतरे से खाली भी नहीं है। सारे संसाधन पैदा होते ही अगर कम हो जाते हैं तो इसका कारण हमारी विशाल जनसंख्या ही है। शायद इसीलिए मोदी यह कहते नजर आ रहे हैं कि “अर्थ केंद्रित वैश्वीकरण या मनुष्य केंद्रित वैश्वीकरण ?” उनका यह प्रश्न खुद से भी है, देश से भी और नीति-निर्माताओं से भी है। उन देशों से भी है जो तमाम चमकीली प्रगति के बाद भी गहरी निराशा में हैं।  मोदी मानते हैं कि आपदा को अवसर में बदला जा सकता है। लोगों के दुख कम किए जा सकते हैं। उन्होंने भुज के उदाहरण से समझाने की कोशिश भी की है कि कैसे खत्म हुए इलाके फिर सांस लेने लगते हैं, धड़कने लगते हैं।
   प्रधानमंत्री के इस भाषण की सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने ‘आत्मनिर्भर भारत’ शब्द का कई बार इस्तेमाल किया। यह आत्मनिर्भर भारत ही दरअसल अपने पैरों पर खड़ा भारत, स्वावलंबी भारत है। जहां अपने जरूरत की चीजें और उनका निर्माण हम कर पाते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य ‘वन डिस्ट्रिक वन प्रोडक्ट’ जैसे अभियान के माध्यम से इसे संभव भी कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री जो उदार आर्थिक नीतियों के पक्ष में रहे हैं, अगर आज आत्मनिर्भर भारत को एकमात्र मार्ग बता रहे हैं तो इसके विशिष्ट अर्थ हैं। यानि अब वह स्थिति है जिसमें भारत एक ग्लोबल लीडर बनने की आतुरता दिखा रहा है। वे यहीं नहीं रुके उन्होंने यह भी कहा कि “लोकल ने हमें बचाया है, लोकल के लिए वोकल बनिए और यही हमारा जीवन मंत्र होना चाहिए।”  
     करोना के वैश्विक संकट ने भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के सामने जैसे प्रश्न खड़े किए हैं, उनके उत्तर हमेशा सकारात्मक नहीं हो सकते। सरकारों और उसके तंत्र को कोसते आए हम लोग अचानक उसकी श्रेष्ठता और जनपक्षधरता का बखान नहीं कर सकते। यह तंत्र जैसा भी है, बना और बनाया गया है। यह जितना भी उपयोगी या अनुपयोगी है, सच यह है कि वही हमारे काम आ रहा है। बहुनिंदित पुलिस, सरकारी डाक्टर, नर्स, सफाई और स्वच्छता से जुड़ा सरकारी तंत्र ही इस महान संकट में अपनी जान जोखिम में डालकर आपके पास पहुंच रहा है। बावजूद इसके कि हर जगह उनके लिए फूल नहीं बरस रहे। कहीं पत्थर हैं तो कहीं व्यापक असहयोग। आप सोचें की जिस तरह निजीकरण की अंधी आंधी 1991 से चली और यह लगा कि सरकार का काम स्कूल, अस्पताल और सेवा के तमाम करना नहीं है, ये सारे काम तो निजी क्षेत्र में ही गुणवत्ता से संभव हैं । आप कल्पना करें अगर यह बुरे और खराब सेवाएं देने वाले सरकारी अस्पताल भी हमारे पास न होते क्या होता?      
   हम जानते हैं कि कभी भी नायक उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ते। देश की विशाल आबादी जो अपने संकटों के कारण अब महानगरों से पलायन कर रही है। उसकी उम्मीदें टूट रही हैं और वह किसी भी हाल में अपने गांव या घर पहुंचना चाहती है। ऐसे में सरकारों का दायित्व क्या है? राष्ट्रनायकों का दायित्व क्या है? यही कि वे भरोसे को दरकने न दें। उम्मीदों को टूटने न दें। सपनों को मरने न दें। हमें यह मान लेना चाहिए कि देश की इतनी विशाल आबादी के लिए कोई भी तंत्र या व्यवस्था द्वारा बनाए गए इंतजाम नाकाफी ही साबित होंगे। किंतु जहां जैसे संकट खड़े हो रहे हैं, सरकारें और समाज पीड़ित जनों के साथ खड़े होते ही हैं। सरकारी तंत्र की सबसे बड़ी विफलता है कि उसके प्रति विश्वास खत्म हो चुका है। वे कुछ भी करें, अब वह भरोसा हासिल नहीं कर सकते। यह भरोसा धीरे-धीरे तोड़ा गया है। सरकार, मीडिया, समाज और प्रभु वर्ग सबने मिलकर सरकारी संस्थाओं, सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, सरकारी सेवाओं से लोगों का भरोसा डिगाया है। सरकारी फोन से लेकर सरकारी पीडीएस की दूकानों की तरफ देखने की हमारी खास दृष्टि है। आप यह भी देखें कि प्राइवेट विश्वविद्यालय, प्राइवेट फोन कंपनियां, प्राइवेट अस्पताल भी तमाम गलतियां करते हैं पर निशाने पर सरकारी संस्थाएं ही होती हैं। मीडिया के निशाने पर भी सरकारी संस्थाएं ही होती हैं, जैसे निजी क्षेत्र में रामराज्य कायम हो। सरकारों की जड़ता, नीति-नियंताओं की स्वार्थपरता ने हालात और बिगाड़ दिए हैं । अपनी ही संस्थाओं के प्रति सरकारें अनुदार होती गयीं और निजी क्षेत्र पर उनकी कृपा और संवेदना बरसने लगी। किंतु जब संकट आन पड़ा तो वही बहुनिंदित, लापरवाह और कथित तौर पर भ्रष्ट तंत्र ही हमारे काम आया। आज भी नीचे के स्तर पर हमारे सफाई कामगारों, नर्स बहनों से लेकर, सेनिटाइजेशन के काम से जुड़े लोग, पुलिसकर्मियों से लेकर आंगनबाड़ी की बहनों की सेवाओं की ओर देखना चाहिए।
          सही मायनों में मोदी सपनों के सौदागर हैं। वे निराश नहीं होते, निराशा नहीं बांटते। अवसाद की परतें तोड़ते हैं और उजास जगाते हैं। वे इसीलिए अपने इस भाषण में एक नायक की तरह बात करते हैं वे कहते हैं “कर्मठता की पराकाष्ठा और कौशल(क्राफ्ट) की पूंजी से ही भारत आत्मनिर्भर बनेगा।” वे जोड़ते हैं मिट्टी की महक से बनेगा नया भारत। हम देखें तो एक नायक तौर पर मोदी संभावनाओं में ही निवेश कर रहे हैं। वे मुख्यमंत्रियों के साथ सतत संवाद कर रहे हैं। उन्हें नेतृत्व दे रहे हैं। अपनी ओर से विविध वर्गों से संवाद कर रहे हैं। एक लोकतंत्र में संवाद से ही दुनिया बनती और अवसर सृजित होते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि संकट गहरा है, इंतजाम नाकाफी हैं, सेवाएं गुणवत्तापूर्ण नहीं है, रामराज्य अभी भी प्रतीक्षित ही है, ईमानदारी से कर्तव्य निर्वहन करने वालों की संख्या सीमित है। फिर भी हिंदुस्तान का मन मरा नहीं है। अपनी विशाल आबादी, विशाल संकटों के बाद उसका हौसला टूटा नहीं है। उसकी संवेदनाएं मरी नहीं है। हमारे श्रमदेव और श्रमदेवियों की अपार उपेक्षा के बाद भी, हमारे किसानों के लाख संकटों के बाद भी भारत फिर उठ खड़ा होगा और सपनों की ओर दौड़ लगाएगा, भरोसा कीजिए। करोना संकट के बाद का भारत एक नई तरह से सोचेगा, व्यवहार करेगा। साथ ही ज्यादा आत्मनिर्भर और ज्यादा समर्थ होगा।