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गुरुवार, 8 जनवरी 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्षों की कहानी

                                                 ‘तत्वमसि’ में है प्रचारकों की जिंदगी का बयान

-प्रो.संजय द्विवेदी



 देश में हुए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति सामान्यजन की जिज्ञासा बढ़ा दी है। इस बीच अपनी यात्रा के 100 साल संघ ने पूरे कर लिए हैं। इसलिए संघ की संपर्क गतिविधियां भी सामान्य दिनों से ज्यादा हैं। ऐसे समय में संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्रीधर पराड़कर का उपन्यास ‘तत्वमसि’ बड़ी सरलता से आरएसएस के बारे में बताता है। यह उपन्यास एक आत्मकथात्मक उपन्यास भी कहा जा रहा है, जिसके केंद्र में खुद लेखक और उसके अनुभव हैं। बावजूद इसके एक प्रचारक की जिंदगी के बहाने संघ को समझाने में यह उपन्यास पूरी तरह सफल है।

     कहानियों से चीजों को बताना आसान होता है, विचार कई बार भ्रमित भी करते हैं और उन्हें समझना सबके बस की बात नहीं। उसे वही ग्रहण कर सकता है जिसकी उस विचार विशेष में रुचि हो। शायद इसीलिए पूज्य सरसंघचालक डा. मोहन भागवत इस बात को रेखांकित करते रहे हैं कि “संघ को संघ के भीतर आकर ही समझा जा सकता है।” अपनी स्थापना के समय से ही संघ कुछ शक्तियों के निशाने पर रहा है। खासकर आजाद भारत में उसे इसके दंश कई बार भोगने पड़े। श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास उनके अर्जित अनुभवों का बयान भी है। इसलिए इस कृति की विश्वसनीयता बढ़ जाती है। सही मायनों में यह भोगा हुआ सत्य है, जिसकी अनुभूति इसे पढ़ते समय सहज ही होती है। 

     हम जानते हैं कि श्रीधर पराड़कर, संघ प्रेरित अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहे हैं और लंबे समय से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हैं। एक लेखक,चिंतक,विचारक और संगठनकर्ता के नाते वे राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिलब्ध हैं। ऐसे सरोकारी व्यक्ति का लेखन निश्चित ही बहुत सारे सवालों के जवाब लेकर आता है। किसी भी उपन्यास या कहानी की सबसे बड़ी सफलता है उसकी रोचकता। कहानी को सुनने-पढ़ने का मन होना। कथारस में बहते चले जाना। विचार और संगठन जैसी बोझिल समझी जाने वाली कथा को भी पराड़करजी ने जिस अंदाज में व्यक्त किया है उसने पुस्तक की पठनीयता बनाए रखी है। यह किताब न सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार तत्व, प्रचारकों की जीवन शैली, संघ के समावेशी चरित्र का बयान करती है बल्कि किस तरह वह समाज परिवर्तन को व्यक्ति परिर्वतन के माध्यम से संभव कर रहा है इसे भी बताती है। 

   उपन्यास के मुख्य पात्र परितोष बाबू संघ के प्रचारक हैं। प्रचारक परंपरा के बारे में समाज में न्यूनतम जानकारियां हैं। इस किताब में ‘प्रचारक परंपरा’ जो सामान्य वस्त्रों में रहकर भी ‘साधु परंपरा’ का पालन करती है का विषद वर्णन है। समाज जीवन में काम करते हुए आने वाली कठिनाइयों से लेकर,समाज के प्रश्नों का उत्तर भी प्रचारक खोजते हैं। भाषा की रवानी और कथा शैली ऐसी कि संगठन शास्त्र जैसे विषयों को किस्सागोई के साथ कहने में लेखक सफल रहे हैं। पत्रकार अनंत विजय ने किताब के फ्लैप पर ठीक ही लिखा है कि-“मेरे जानते हिंदी के किसी लेखक ने किसी संगठन को केंद्र में रखकर इस तरह का उपन्यास नहीं लिखा है। यह अभिनव प्रयोग है, जिसके मोहजाल में पाठक का पड़ना तय है।”

    पुस्तक के आरंभ में ही अपनी रेलयात्रा के माध्यम से परितोष बाबू न सिर्फ अपना स्वभाव,विचार रख देते हैं बल्कि समाज को लेकर अपनी सोच को भी प्रकट करते हैं। पहले दृश्य से बांध लेना इसे ही कहते हैं। यह उपन्यास एक कर्मनिष्ठ प्रचारक की जिंदगी से गुजरत हुए समाज के अनेक प्रश्नों के उत्तर भी देता चलता है। इसमें जो पात्र हैं वे बहुत सुनियोजित तरीके से कथा के उद्देश्य को पूरा करने में सहयोग करते हैं। विभिन्न पंथों और विचारों से जुड़े पात्रों का संवाद भी परितोष बाबू से होता है। यहां यह भी प्रकट होता है कि वे व्यक्ति से व्यक्ति का संवाद पसंद करते हैं। मुस्लिम युवा अफरोज से संवाद का अवसर आता है तो वे अपने सहयोगी से कहते हैं,-“ उन्हें बुलाना नहीं हम उनसे मिलने उनके घर जाएंगें।” इससे पता चलता है कि संघ की कार्यपद्धति क्या है। जहां वह व्यक्ति से नहीं बल्कि परिवार से जुड़ता है ताकि उनसे सच्चा जुड़ाव हो सके। उनके सुख-दुख अपने हो जाएं।

     यह उपन्यास इस अर्थ में विशिष्ठ है कि यह अपने समय और उसके सवालों से जूझता  है। उसके ठोस और वाजिब हल खोजने की कोशिशें भी करता है। संवाद के माध्यम से यह उपन्यास जो कहता है उसे बहुत बड़े वक्तत्वों से नहीं समझाया जा सकता। प्रो. संजय कपूर, विदेशी मूल की युवती नोरा, महेश बाबू, अफरोज,सदानंद, अनिता और स्नेहल जैसे पात्रों के बहाने जो ताना-बाना बुना गया है वह अप्रतिम है। सदानंद,अमित और स्नेहल से हुए संवाद में परितोष बाबू जिस तरह संघ से जुड़े सवालों के उत्तर देते हैं,वैसे ही वे समाज और परिवार के मुद्दों पर राय रखते हैं। वे एक ऐसे बुर्जग की तरह पेश आते हैं जिस पर सबकी आस्था है। भारतीय परिवारों में बुर्जगों की भूमिका क्या होनी चाहिए, क्या है इसे भी परितोष बाबू की छवि में देखा जा सकता है। परितोष बाबू जैसे लोग जिन्होंने अपना परिवार नहीं बनाया, उसकी मनोभूमि कैसे तैयार होती है। कैसे वे सब कुछ त्यागकर अपने समाज और देश की बेहतरी के स्वयं को आत्मार्पित कर देते हैं। यह सीखने वाली बात है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में बहुत से बने हुए भ्रमों, दुष्प्रचारों को यह उपन्यास एक जवाब है। भगवा ध्वज को गुरू मानना और सरसंघचालक परंपरा जैसे विषय भी सहज संवाद से सरल लगने लगते हैं।

   समकालीन कथासाहित्य में प्रायः एक ही तरह की कहानियां और उपन्यास पढ़कर जिस तरह के मनोविकार और अवसाद उपजते हैं, उसके बीच में यह उपन्यास एक ठंडी हवा के झोंके की तरह है। यह पाठकों को एक संगठन और उसके प्रचारक की कथा तो सुनाता ही है, नए भारत के निर्माण में जुटे राष्ट्रप्रेमियों से भी परिचित कराता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारतीय समाज के पुनर्गठन की वह प्रयोगशाला है, जो विचार, सेवा और अनुशासन के आधार पर एक सांस्कृतिक राष्ट्र का निर्माण कर रही है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की अनोखी भारतीय दृष्टि से उपजा यह संगठन आज अपनी शताब्दी मना रहा है। यह केवल संगठन विस्तार की नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक अनवरत यात्रा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सही निगाहों से देखना और उसका उचित मूल्यांकन किया जाना अभी शेष है, यह उपन्यास उस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। 



बुधवार, 7 जनवरी 2026

कोई अच्छा है तो अच्छा क्यों है?

 

लेखक -प्रो. संजय द्विवेदी


चित्र परिचय- इंद्रेश कुमार

    करीब दो दशक पहले की बात है श्री इंद्रेश कुमार से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेरी मुलाकात हुयी थी। आरएसएस के उन दिनों वे राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, जयपुर उनका केंद्र था। दैनिक हरिभूमि का स्थानीय संपादक होने के नाते मैं उनका इंटरव्यू करने पहुंचा था। अपने बेहद निष्पाप चेहरे और सुंदर व्यक्तित्व से उन्होंने मुझे प्रभावित किया। बाद में मुझे पता चला कि वे मुसलमानों को आरएसएस से जोड़ने के काम में लगे हैं। रायपुर में भी उनके तमाम चाहने वाले अल्पसंख्यक वर्ग में भी मौजूद थे। उनसे थोड़े ही समय के बाद आरएसएस की प्रतिनिधि सभा में रायपुर में फिर मुलाकात हुयी। वे मुझे पहचान गए। उनकी स्मरण शक्ति पर थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि वे सालों पहले हुयी मुलाकातों और मेरे जैसे साधारण आदमी को भी याद रखते हैं। इस नायाब आदमी पर एक मौजूं शेर है, जो उनकी शख्सियत पर फिट बैठता है-

मसला यह भी इस दुनिया में

कोई अच्छा है तो अच्छा क्यों है।

   सही मायनों में यह व्यक्तित्व एक ऐसा अभियान में लगा है जो कई बार विफल हो चुका है। कट्टरपंथी ताकतें बहुत आसानी से मुस्लिम समाज को भ्रमित करने में कामयाब होती रही हैं। ऐसे कठिन समय में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक इंद्रेश जी हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते हैं। वह मुसलमानों को राष्ट्रवाद की राह पर डालकर सदियों से उलझे रिश्तों को ठीक करने की बात करते हैं। क्योंकि आज नहीं अगर दस साल बाद भी इंद्रेश कुमार अपने इरादों में सफल हो जाते हैं तो भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं की दुकान बंद हो जाएगी। वे एक ऐसा आदमी हैं जो सदियों से जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिशें कर रहे हैं।

      अब उन इंद्रेश कुमार की भी सोचिए जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन में काम करते रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज का संगठन है। ऐसे संगठन में रहते हुए मुस्लिम समाज से संवाद बनाने की कोशिश क्या उनके अपने संगठन (आरएसएस) में भी तुरंत स्वीकार्य हो गयी होंगी। जाहिर तौर पर इंद्रेश कुमार की लड़ाई अपनों से भी रही होगी और बाहर खड़े राजनीतिक षडयंत्रकारियों से भी है। वे अपनों के बीच भी अपनी सफाई देते रहे हैं कि वे आखिर मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास क्यों कर रहे हैं,  जबकि संघ का मूल काम हिंदू समाज का संगठन है। किंतु इंद्रेश कुमार की कोशिशें रंग लाने लगी हैं। वे एक ऐसे काम को अंजाम दे रहे हैं जिसकी जड़ें हिंदुस्तान के इतिहास में बहुत भयावह और रक्तरंजित हैं। मुसलमानों के बीच कायम भयग्रंथि और कुठांओं को निकालकर उन्हें 1947 के बंटवारे को जख्मों से अलग करना भी आसान काम नहीं है। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद जैसे महानायकों की मौजूदगी के बावजूद हम देश का बंटवारा नहीं रोक पाए। उस आग में आज भी कश्मीर जैसे इलाके सुलग रहे हैं।

     तमाम हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम रिश्ते अविश्वास की आग में जल रहे हैं। ऐसे कठिन समय में इंद्रेश कुमार क्या इतिहास की धारा की मोड़ देना चाहते हैं और उन्हें यह तब क्यों लगना चाहिए कि यह काम इतना आसान है। देश को पता है कि इंद्रेश कुमार, आरएसएस के ऐसे नेता हैं जो मुसलमानों और हिंदू समाज के बीच संवाद के सेतु बने हैं। वे लगातार मुसलमानों के बीच काम करते हुए देश की एकता को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। हिंदू- मुस्लिम एकता का यह राष्ट्रवादी दूत इसीलिए एक समय राजनीतिक षडयंत्रों का शिकार भी हुआ। संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल पुलिस का इस्तेमाल करते रहे हैं, किंतु राजनीतिक दल इस स्तर पर गिरकर एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व पर कलंक लगाने का काम करेंगें, यह देखना भी शर्मनाक था। इससे इतना तो साफ है कि कुछ ताकतें देश में ऐसी जरूर हैं जो हिंदू-मुस्लिम एकता की दुश्मन हैं। उनकी राजनीतिक रोटियां सिकनी बंद न हों, इसलिए दो समुदायों को लड़ाते रहने में ही इनकी मुक्ति है। शायद इसीलिए इंद्रेश कुमार निशाने पर थे क्योंकि वे जो काम कर रहे हैं वह इस देश की विभाजनकारी और वोटबैंक की राजनीति के अनूकूल नहीं था। लेकिन समय ने उन्हें बेदाग साबित किया।

   हमें यह समझने की जरूरत है कि आखिर वे कौन से लोग हैं जो हिंदू-मुस्लिम समाज की दोस्ती में बाधक हैं। वे कौन से लोग हैं जिन्हें भय के व्यापार में आनंद आता है। हिंदुस्तान के 20 करोड़ मुसलमानों को देश की मुख्यधारा में लाने की यह कोशिश अगर विफल होती है तो शायद फिर कोई इंद्रेश कुमार हमें ढूंढना मुश्किल होगा । कुछ लोग इंद्रेश कुमार जैसे लोगों के इरादे पर शक करके हम वही काम कर रहे हैं जो मुहम्मद अली जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग ने किया था जिन्होंनें महात्मा गांधी को एक हिंदू धार्मिक संत और कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहकर लांछित किया था। राष्ट्र जीवन में ऐसे प्रसंगों की बहुत अहमियत नहीं है।
इस देश को यह कहने का साहस पालना ही होगा कि हमें एक नहीं हजारों इंद्रेश कुमार चाहिए जो एक हिंदू संगठन में काम करते हुए भी मुस्लिम समाज के बारे में सकारात्मक सोच रखते हों।

     मुस्लिम समाज के संकट वस्तुतः भारतीय राजनीति और समाज के ही संकट हैं। उनकी चुनौतियां कम या ज्यादा गंभीर हो सकती हैंपर वे शेष भारतीय समाज के संकटों से जरा भी अलग नहीं है। सही अर्थों में पूरी भारतीय राजनीति का चरित्र ही कमोबेश भावनात्मक एवं तात्कालिक महत्व के मुद्दों के इर्द-गर्द नचाता रहा है। आम जनता का दर्दउनकी आकांक्षाएं और बेहतरी कभी भारतीय राजनीति के विमर्श के केंद्र में नहीं रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति का यह सामूहिक चरित्र हैअतएव इसे हिंदूमुस्लिम या दलित राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखने को कोई अर्थ नहीं है और शायद इसलिए ‘जनता का एजेंडा’ किसी की राजनीति का एजेंडा नहीं है। मुस्लिम नेताओं पर यह आरोप तो आसानी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कौम को आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़ा बनाए रखालेकिन क्या यही बात अन्य वर्गों की राजनीति कर रहे लोगों तथा मुख्यधारा की राजनीति करने वालों पर लागू नहीं होती ? बेरोजगारीअशिक्षाअंधविश्वासगंदगीपेयजल ये समूचे भारतीय समाज के संकट हैं और यह भी सही है कि हमारी राजनीति के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक परिवेश में आश्चर्यजनक ही है। देश की मुस्लिम राजनीति का एजेंडा भी हमारी मुख्यधारा की राजनीति से ही परिचालित होता है। जाहिर है मूल प्रश्नों से भटकाव और भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द समूची राजनीति का ताना बुना जाता है। इंद्रेश जी जैसे लोग समाज की सामूहिक चिंताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंथिक राजनीतिक के बजाए राष्ट्र प्रथम का भाव भरने का प्रयास कर रहे हैं।

      आप देखें तो हिंदुस्तान के हर मुसलमान नेता को एक ढोंग रचना पड़ता है। एक तरफ तो वह स्वयं को अपने समाज के बीच अपनी कौम और उसके प्रतीकों का रक्षक बताता हैवहीं दूसरी ओर उसे अपने राजनीतिक मंच (पार्टी) पर भारतीय राष्ट्र- राज्य के साथ अपनी प्रतिबद्धता का स्वांग रचना पड़ता है। समूचे भारतीय समाज की स्वीकृति पाने के लिए सही अर्थों में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। आज की राजनीति में तो ऐसा संभव नहीं दिखता। भारतीय समाज में ही नहींहर समाज में सुधारवादियों और परंपरावादियों का संघर्ष चलता रहा है। मुस्लिम समाज में भी ऐसी बहसें चलती रही हैं। इस्लाम के भीतर एक ऐसा तबका पैदा हुआजिसे लगता था कि हिंदुत्व के चलते इस्लाम भ्रष्ट और अपवित्र होता जा रहा है। वहीं मीर तकी मीरनजीर अकबरवादीअब्दुर्रहीम खानखानारसखान की भी परंपरा देखने को मिलती है। हिंदुस्तान का आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर एक शायर था और उसे सारे भारतीय समाज में आदर प्राप्त था। एक तरफ औरंगजेब था तो दूसरी तरफ उसका बड़ा भाई दारा शिकोह भी थाजिसनें ‘उपनिषद्’ का फारसी में अनुवाद किया। इसलिए यह सोचना कि आज कट्टरता बढ़ी हैसंवाद के अवसर घटे हैं-गलत है। आक्रामकता अकबर के समय में भी थीआज भी है।

     यहां यह बात रेखांकित किए जाने योग्य है कि अल्पसंख्यक अपनी परंपरा एवं विरासत के प्रति बड़े चैतन्य होते हैं। वे चाहते हैं कि कम होने के नाते कहीं उनकी उपेक्षा न हो जाए । यह भयग्रंथि उन्हें एकजुट भी रखती है। अतएव वे भावनात्मक नारेबाजियों से जल्दी प्रभावित होते हैं। सो उनके बीच राजनीति प्रायः इन्हीं आधारों पर होती है। यह अकारण नहीं था कि नमाज न पढ़ने वाले मोहम्मद अली जिन्नाजो नेहरू से भी ज्यादा अंग्रेज थेमुस्लिमों के बीच आधार बनाने के लिए कट्टर हो गए ।  मुस्लिम राजनीति वास्तव में आज एक खासे द्वंद में हैंजहां उसके पास नेतृत्व का संकट है । मुस्लिम समाज में अब राजनीति के अलावा सामाजिकआर्थिकसमाज सुधारशिक्षा जैसे सवालों पर बातचीत शुरु हो गई है । सतह पर दिख रहा मुस्लिम राजनीति का यह ठंडापन एक परिपक्वता का अहसास कराता है । मुस्लिम समाज में वैचारिक बदलाव की यह हवा जितनी तेज होगीसमाज उतना ही प्रगति करता दिखेगा। एक सांस्कृतिक आवाजाहीसांस्कृतिक सहजीविता ही इस संकट का अंत है । जाहिर है इसके लिए नेतृत्व का पढ़ालिखा और समझदार होना जरुरी है । नए जमाने की हवा से ताल मिलाकर यदि देश का मुस्लिम अपने ही बनाए अंधेरों को चीरकर आगे आ रहा है तो भविष्य उसका स्वागत ही करेगा । वैसे भी धार्मिक और जज्बाती सवालों पर लोगों को भड़काना तथा इस्तेमाल करना आसान होता है । गरीब और आम मुसलमान ही राजनीतिक षडयंत्रों में पिसता तथा तबाह होता हैजबकि उनका इस्तेमाल कर लोग ऊंची कुर्सियां प्राप्त कर लेते हैं और उन्हें भूल जाता हैं । अभिजात्य और जमाने की दौड़ में आगे आ गए मुस्लिम नेता दरअसल अपने कौम की खिदमत और उसे रास्ता बताने के बजाए उन्हें उसी बदहाली में रहने देना चाहते हैं ।इस संदर्भ में प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी का यह शेर हमारी मुस्लिम राजनीति के ही नहींसमूची भारतीय राजनीति के चरित्र को बेनकाब करता है-

इस्लाम की अजमत का क्या जिक्र करुं हमदम

काउंसिल में बहुत सैय्यदमस्जिद में फकत जुम्मन

भारतीय समाज में इंद्रेश कुमार जैसे लोग इसलिए एक नया उजाला लेकर आ रहे हैं। संवाद के माध्यम से नया भारत बना रहे हैं।

   दूसरी ओर भाजपा भी आगे बढ़कर मुस्लिम समाज से संवाद कर रही है तो मुस्लिम नेतृत्व को भी भरोसा रखते हुए उनकी बात सुननी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हौव्वा खड़ा कर आरएसएस के लिए प्रलाप किया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि संघ मुस्लिम विरोधी है। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। आरएसएस के नेताओं ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के सहयोग से मुस्लिम समाज से संवाद प्रारंभ किया है। आपातकाल के समय जमाते इस्लामी और आरएसएस के नेता कई जेलों में एक साथ थे। उनके बीच बेहतर रिश्ते भी विकसित हुए थे। इसलिए मुस्लिम वोटों की ठेकेदारी करने के बजाए मुस्लिम समाज को स्वतंत्र रूप से सोचने और अपने फैसले करने का अवसर देना चाहिए। भाजपा भी अब राजनीतिक रूप से अछूत नहीं है। उसकी अटलजी के नेतृत्व वाली सरकार में उमर अब्दुला से लेकर सभी तथाकथित सेकुलर दलों के लोग मंत्री रह चुके हैं। अटलजी से लेकर नरेंद्र मोदी जी तक  की सरकारों में क्या उनके चरित्र में कहीं अल्पसंख्यक विरोधी रवैया ध्वनित होता हैसच्चाई तो यह है कि वाजपेयी सरकार ने न सिर्फ डा. एपीजे कलाम को देश के राष्ट्रपति पद पर प्रतिष्ठित किया वरन बाद के राष्ट्रपति चुनाव में एक ईसाई आदिवासी पीए संगमा को अपना समर्थन दिया था। सही तो यह है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी के विरूद्ध अभियान चलाने वाले मुस्लिम वोटों के सौदागर हिंदु-मुस्लिम रिश्तों में सहजता के विरोधी हैं।

 इंद्रेश कुमार को हमारे समय का ऐसा नायक कहा जा सकता है जो वैश्विक तौर पर बन गयी इस्लाम की छवि को बदलने के लिए भारतीय मुसलमानों का नेतृत्व कर रहे हैं। वे मानवता के अग्रदूत हैं जहां सब राष्ट्र प्रथम की भावना रखकर देश के नवनिर्माण में लगे हैं। वे यह मानते हैं कि देश सबके योगदान और सबकी प्रगति से ही विश्वगुरु बनेगा। अपनी-अपनी भूमिका सबको निभानी होगी। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच उनकी साधना का प्रतिफल है। एक नया सवेरा आएगा, ऐसा भरोसा उनकी संकल्पशक्ति से होता है। वे शतायु हों और एक समर्थ, समरस और आत्मीयता से भरा भारत अपनी आँखों से देखें,यही प्रार्थना है।



सामाजिक समरसता से बनेगी सुंदर दुनिया

                                                                     -प्रो. संजय द्विवेदी



    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारतीय समाज के पुनर्गठन की वह प्रयोगशाला है, जो विचार, सेवा और अनुशासन के आधार पर एक सांस्कृतिक राष्ट्र का निर्माण कर रही है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की अनोखी भारतीय दृष्टि से उपजा यह संगठन आज अपनी शताब्दी मना रहा है। यह केवल संगठन विस्तार की नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक अनवरत यात्रा है।

     सौ वर्षों की इस साधना में संघ और इसके स्वयंसेवकों ने देश की चेतना को जाग्रत किया है। उन्होंने दिखाया कि न तो किसी सरकारी सहयोग की आवश्यकता होती है और न ही प्रचार के माध्यम से प्रसिद्धि की। यदि लक्ष्य पवित्र हो, मार्ग अनुशासित हो और कार्यकर्ता समर्पित हों। सेवा संघ का मूल है और सामाजिक समरसता उसका लक्ष्य। एक समरस समाज ही अपने सपनों में रंग भर सकता है और इससे ही सुंदर समाज का सृजन संभव है। गैरबराबरी को खत्म करते हुए मन में सुंदर समरस भावों का सृजन राष्ट्र प्रथम की भावना से ही संभव है।

सेवा: राष्ट्र के हृदय को स्पर्श करती संवेदना-

संघ के स्वयंसेवकों की सेवा-भावना समाज के सबसे वंचित वर्गों तक पहुंचती है। गिरिजनों और वनवासियों से लेकर महानगरों की झुग्गी बस्तियों तक, संघ प्रेरित संगठन जैसे सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, एकल विद्यालय, राष्ट्र सेविका समिति और आरोग्य भारती अखंड सेवा के भाव से कार्यरत हैं। इन संस्थाओं का उद्देश्य केवल राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि लोगों को आत्मनिर्भर, शिक्षित और संस्कारित बनाना है। सेवा, संघ के लिए कर्मकांड नहीं, जीवनधर्म है। जो मानवता को जोड़ता है, पोषित करता है और राष्ट्र के लिए भावनात्मक एकता निर्मित करता है।संघ जैसा समावेशी, उदार और लचीला संगठन ढूंढने से नहीं मिलेगा। अपने में परिवर्तन करने, आत्मसमीक्षा करने और अपना दायरा बढ़ाते जाने के लिए संघ ख्यात रहा है। जिस तरह संघ ने समाज जीवन के सब क्षेत्रों, सब वर्गों में, सभी विचारवंतों में, सभी सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी सेवा भावना से जगह बनाई है, वह उसकी सोच को प्रकट करता है। इस अर्थ में संघ कहीं से जड़वादी संगठन नहीं है, जिसके कारण सांप्रदायिक और दायराबंद सोच पनपती है। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच, राष्ट्रीय सिख संगत, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, एकल विद्यालय जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने यह स्थापित किया कि समाज को जोड़ना और सेवा के माध्यम से भारत को बदलना ही उसका लक्ष्य है। सभी सरसंघचालकों ने स्वयंसेवकों में यह भाव भरने का प्रयास किया और यह सूक्ति ही उनका ध्येय वाक्य बन गयी- नर सेवा नारायण सेवा।

    अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के बीच अपने वनवासी कल्याण आश्रमसेवा भारती जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने जो मैदानी और जमीनी काम किया है उसका मुकाबला सिर्फ जबानी जमा खर्च से सामाजिक परिवर्तन कर दावा करने वाले लोग नहीं कर सकते। संघ में सेवा एक संस्कार हैमुख्य कर्तव्य है। यहां सेवा कार्य का प्रचार नहींएक आत्मीय परिवार का सृजन महत्व का है। अनेक अवसरों पर कुछ फल और कम्बल बांटकर अखबारों में चित्र छपवाने वाली राजनीति इसको नहीं समझ सकती। समाज में व्याप्त भेदभाव, छूआछूत, को मिटाने के लिए संत रविदास ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके आदर्शों और कर्मों से सामाजिक एकता की मिसाल हमें देखने को मिलती है लेकिन वर्तमान दौर में इस सामाजिक विषमता को मिटाने के सरकारी प्रयास असफल ही कहे जा सकते हैं। कहीं-कहीं आशा की किरण समाज क्षेत्र में कार्यरत सेवा भारती जैसे संस्थानों के प्रकल्पों में दृष्टिगोचर होती है।

    भारत गावों में बसता है, गांवों में आज भी सामाजिक कुरीतियां कम नहीं हुयी हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने छुआछूत को मिटाने का नारा दिया, उनका जीवन भी सामाजिक समरसता की मिसाल है। गांधी जी ने स्वाधीनता आंदोलन में जितने भी प्रकल्प तय किए, उनका ध्येय भारत की सामाजिक विषमता को पाटना था। वे चाहते थे कि समाज में ऊंच-नीच, भेदभाव, लिंग अनुपात और आर्थिक सम्पन्नता,विपन्नता की खांई खत्म हो और भारत एक लय, एक स्वर, एक समानता और एक अखंडता के साथ मंडलाकार प्रवृत्ति में विश्व का नेतृत्व करे। कुछ ऐसी ही परिकल्पना पं. दीनदयाल उपाध्याय ने भी की। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामाजिक एकता के इसी प्रकल्प को आगे बढ़ा रहे हैं। आजादी के लगभग अस्सी वर्षों के बाद भी भारत से गरीबी हटी नहीं है और सामाजिक विषमता दूर नहीं हो सकी है। इस विषमता से समाज में लड़ाई-झगड़े, वैमनस्यता और ऊंच-नीच की प्रवृत्ति बढ़ी है। इस समस्या को भारत में मिटाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ आगे आया और सेवा के अनेक प्रकल्प शुरू किए। उनके इन सेवा प्रकल्पों का उद्देश्य भेदभाव से मुक्त, स्वाभिमानी-समरस और आत्मनिर्भर समाज बनाना था। सेवा भारती, संघ का एक ऐसा ही संगठन है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक जागरण एवं कौशल विकास के लगभग हजारों केंद्रों के द्वारा प्रकल्प चला रहा है। सेवा भारती इस मुहिम में तीन दशक से जुटा हुआ है। वर्ष 2017 में सेवा भारती का रजत जयंती वर्ष था। इस वर्ष में सेवा भारती अपने प्रकल्पों का आत्मावलोकन किया और नए प्रकल्पों पर विचार करते हुए नए प्रकल्प प्रारंभ किए। रजत जयंती वर्ष पर सेवा भारती भोपाल के लाल परेड मैदान पर ऐसे हजारों श्रम साधकों का संगम भी आयोजित किया। इस संगम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत स्वयं उपस्थित रहे। इस आयोजन में श्रमिकों और गरीब व पिछड़े वर्गों के लिए जीवन समर्पित करने वाले साधकों का सम्मान भी किया गया।

  आरएसएस निरंतर समाज के पिछड़े वर्गों की ओर देखता रहा है और विविध प्रकल्पों के जरिए उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहा है। यह सच है कि संत रविदास एक ऐसे संत थे जिन्होंने जीवन भर श्रम की साधना की। श्रम को प्रतिष्ठा करने वाले इस महान संत के शिष्यों में काशी नरेश व भक्त मीराबाई भी रहीं। अपने धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास के कारण संत रविदास जी ने दिल्ली के शासक सिकंदर लोधी को भी कह दिया था कि मैं प्राण त्याग दूंगा पर अपना धर्म नहीं छोडूंगा। हमारे अनेक संतों की तरह संत रविदास जी ने भी जन्म के आधार पर ऊंच-नीच को नकार दिया था। भोपाल में श्रम साधक समागम उन्हीं संत रविदास जी की जयंती पर आयोजित किया गया था।

     उम्मीद की जानी चाहिए कि संत रविदास की दृष्टि समाज के अंतिम छोर तक पहुंचेगी और जाति, पंथ के आधार पर भेदभाव को मिटाने में कारगर हो सकेगी। यह साधारण नहीं है कि मध्यप्रदेश आरंभ से ही संघ की एक प्रयोगशाला रहा है, जहां उसने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रों में विविध प्रयोग किए हैं। बैतूल एक ऐसा जिला है, जहां पर सैकड़ों गांवों को केंद्र बनाकर ग्रामीण विकास का एक नया अध्याय लिखने की पहल हुयी है। संघ के सरसंचालक मोहन भागवत ने ग्रामीण विकास के इन प्रकल्पों को सराहा था। इसके तहत बैतूल जिले में नशामुक्ति, आर्थिक-सामाजिक विकास, पर्यावरण जैसे विषयों पर हो रहे ये काम निश्चय ही बदलते भारत की बानगी पेश करते हैं।

   मध्यप्रदेश एवं देश के तमाम राज्यों में सरकारी स्तर पर भी कई योजनाएं श्रमिक और निचले तबके के  उत्थान के लिए बनती रही हैं। उन योजनाओं से इन वर्गों में कोई आमूलचूल बदलाव हुआ हो ऐसा कम ही दिखाई देता है। आजादी के सत्तर वर्षों में यदि सरकारी योजनाएं आम आदमी तक पहुंच पाती तो संत रविदास,राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बाबा साहेब आंबेडकर और पं. दीनदयाल उपाध्याय के सपने सच हो जाते। किंतु अफसोस है कि बदलाव की यह गति उतनी तेज नहीं रही जितनी होनी चाहिए। सरकारें आज भी उन्हीं के लिए योजना बना रही हैं और हर बजट में अधिक वित्त का प्रावधान करती हैं किंतु धरातल पर सूरतेहाल नहीं बदलते। यही कारण है कि सामाजिक विषमता अमरबेल की तरह पनप रही है। इस वर्ग के जो व्यक्ति समाज का नेतृत्व करते हैं, वह भी आगे आ जाने पर पीछे मुड़कर नहीं देखते हैं। बाद में अपने लोग ही उन्हें बेगाने लगने लगते हैं। सरकारी स्तर पर इस सामाजिक विषमता को पाटना नामुमकिन लगता है। इसमें समाज और सामाजिक संगठनों की सहभागिता जरूरी है। इसी ध्येय को आत्मसात कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक विषमता को दूर करने का बीड़ा उठाया है और सेवा प्रकल्पों में श्रम साधकों के माध्यम से सामाजिक साधना का काम निरंतर किया जा रहा है। भोपाल के इस महती आयोजन में शामिल होने वाले लोग दरअसल वे हैं जो दैनिक रोजी-रोजी कमाने के लिए रोज अपना पसीना बहाते हैं। इन वर्गों से संवाद और उनकी एकजुटता के बहाने संघ एक बड़ी सामाजिक पहल कर रहा है, इसमें दो राय नहीं है।

जातिभेद से मुक्ति जरूरी-

   सामाजिक समरसता के बिना कोई भी राष्ट्र अग्रणी नहीं बन सकता। गुरु घासीदास कहते हैं- मनखे-मनखे एक हैं। किंतु जातिवाद ने इस भेद को गहरा किया है। तमाम प्रयासों के बाद भी आज भी हम इस रोग से मुक्त नहीं हो सके हैं। भेदभाव ने हमारे समाज को विभाजित कर रखा है, जिसके चलते दुनिया में हमारी छवि ऐसी बनाई जाती है कि हम अपने ही लोगों से मानवीय व्यवहार नहीं करते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे- अस्पृश्यता ईश्वर और मानवता के प्रति अपराध है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे पू. बालासाहब देवरस ने इस संकट को रेखांकित करते हुए बसंत व्याख्यानमाला में कहा था कि- अगर छूआछूत गलत नहीं है दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है, इसे मूल से नष्ट कर देना चाहिए। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि जो कुछ भी सैकड़ों सालों से परंपरा के नाम पर चल रहा है वह हमारा धर्म नहीं है। इतिहास में हुए इन पृष्ठों का कोई भी सभ्य समाज समर्थन नहीं कर सकता। जबकि हमारे धर्म ग्रंथ और शास्त्र इससे अलग हैं। हमारे ऋषि और ग्रंथों के रचयिता सभी वर्गों से हैं। भगवान बाल्मीकि और वेद व्यास इसी परंपरा से आते हैं। यानि यह भेद शास्त्र आधारित नहीं है। यह विकृति है। इससे मुक्ति जरूरी है।हमें इसके सचेतन प्रयास करते हुए अपने आचरण, व्यवहार और वाणी से समरसता का अग्रदूत बनना होगा। सभी समाजों और वर्गों से संवाद और सहकार बनाकर हम एक आदर्श समाज की रचना में सहयोगी हो सकते हैं। इससे समाज का सशक्तिकरण भी होगा। समानता का व्यवहार, वाणी संयम, परस्पर सहयोग, संवेदनशीलता से हम दूरियों को घटा सकते हैं और भ्रम के जाले साफ कर सकते हैं। साथ ही अपने गांव, नगर के मंदिर, जलश्रोत, श्मशान सबके लिए समान रूप से खुल होने ही चाहिए। इसमें कोई भी भेद नहीं होना चाहिए।

वैचारिक आंदोलन से बदलेगा समाज-

     राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है। उसने दिखाया है कि संगठन, विचार और समर्पण के बल पर समाज को बदला जा सकता है, और राष्ट्र का नव निर्माण संभव है। संघ की यात्रा सेवा से समरसता तक, अनुशासन से राष्ट्रधर्म तक और शाखा से संसद तक हर पड़ाव पर भारत की आत्मा को जागृत करती है। वह भारत को केवल एक राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना के रूप में स्थापित करना चाहता है। संघ के कार्य को कोई चाहे जितना विरोध करे, किंतु उसकी राष्ट्रनिष्ठा, सेवा भावना और समर्पण को नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि विरोधी भी व्यक्तिगत रूप से संघ के कार्यों की प्रशंसा करते हैं, और कहीं-न-कहीं उससे प्रेरित भी होते हैं। संघ की शताब्दी यात्रा भारत की उस यात्रा का प्रतीक है, जो हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति और साधना का प्रतिफल है। यह यात्रा निरंतर चल रही है-भारत के निर्माण, उत्थान और पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में। इसमें सामाजिक समरसता और सेवा का मंत्र सबसे प्रमुख है। संघ के स्वयंसेवक शताब्दी वर्ष में एक समरस, सशक्त समाज के सृजन को स्थायित्व देने में जुटे हैं ताकि भारतविरोधी शक्तियां हमें बांटकर अपने कुचक्रों में सफल न हो सकें। एक समरस समाज सभी संकटों का हल है यही समझकर हमें निरंतर आगे बढ़ना है। संघ के सामाजिक सेवा प्रकल्पों को अपेक्षित सहयोग और समय देना भी जरूरी है। समाज की सामूहिक शक्ति से जल्दी और ज्यादा बेहतर परिणाम पाए जा सकते हैं, इसमें दो राय नहीं है।

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

केवल सत्ता से मत करना परिवर्तन की आस!

 

-प्रो. संजय द्विवेदी



        एक जीवंत लोकतंत्र में रहते हुए क्या आप राजनीति से विरत रह सकते हैं? राजनीति जो नीति-निर्माण से लेकर आपके संपूर्ण जीवन के फैसले कर रही है, उससे अलग रहना क्या उचित है? क्या बदलाव सत्ता के बिना संभव है? क्या समाज की अपनी भी कोई शक्ति है या वह राजनीति से ही नियंत्रित होता है ? ऐसे अनेक प्रश्न चिंतनशील व्यक्तियों को मथते रहते हैं। ऐसे में एक संगठन जो सौ साल की आयु पूरी करने जा रहा है, उसके लिए राजनीति और सत्ता के मायने क्या हैं? सत्ता राजनीति उसे कितनी कम या ज्यादा रास आती है। लोकतंत्र में बदलाव की राजनीति और सत्ता की राजनीति के विमर्शों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहां खड़ा है। यह विचार जरूरी हो जाता है। संघ ऐसा संगठन बन चुका है, जिसने समाज जीवन के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उसके स्वयंसेवकों के उजले पदचिन्ह हर क्षेत्र में सफलता के मानक बन गए हैं। स्वयं को सांस्कृतिक संगठन बताने वाले संघ का मूल कार्य और केंद्र दैनिक शाखाहै, किंतु अब वह सत्ता-व्यवस्था में गहराई तक अपनी वैचारिक और सांगठनिक छाप छोड़ चुका है।

     संघ के संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक का सपना तो राष्ट्रीय चेतना का जागरण, सांस्कृतिक एकता का बोध और सालों की गुलामी के उपजे आत्मदैन्य को हटाकर हिंदू समाज की शक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करना था। इस दौर में डा. केशवराम बलिराम हेडगेवार ने ऐसे संगठन की परिकल्पना की, जो राष्ट्र को धर्म, भाषा, क्षेत्र से ऊपर उठाकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना से जोड़े। संघ की शाखाएं उसकी कार्यप्रणाली की रीढ़ बनीं। प्रतिदिन कुछ समय एक निश्चित स्थान पर एकत्रित होकर शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक प्रशिक्षण देना ही शाखा की आत्मा है। यह क्रमशः अनुशासित, राष्ट्रनिष्ठ और संस्कारित कार्यकर्ताओं का निर्माण करता है, जिन्हें 'स्वयंसेवक' कहा जाता है। संघ ने व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण" की अवधारणा को अपनाया है। इस प्रक्रिया में उसका जोर 'चरित्र निर्माण' और 'कर्तव्यपरायणता' पर होता है। ऐसे में विविध वर्गों तक पहुंचने के लिए संघ के विविध संगठन सामने आए जो अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हुए किंतु उनका मूल उद्देश्य राष्ट्र की चिति का जागरण और राष्ट्र निर्माण ही है। आप देखें तो संघ ने राजनीति और सत्ता के शिखरों पर बैठे लोगों से हमेशा संवाद बनाए रखा। राजनीति के महापुरुषों से भी संवाद रखा। आप देखें तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी,बाबा साहब भीमराव आंबेडकर, जयप्रकाश नारायण, पं. जवाहरलाल नेहरू  से लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी तक संघ का संवाद सबसे रहा। अपनी बातों को रखना और उस पर दृढ़ता से डटे रहना संघ का मूल स्वभाव है। संघ सत्ता राजनीति से संवाद रखते हुए भी सत्ता मोह से कभी ग्रस्त नहीं रहा। 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा जनसंघ की स्थापना में संघ का सक्रिय सहयोग था। इस पार्टी का सहयोग संघ द्वारा प्रशिक्षित अनेक प्रचारकों द्वारा किया गया। 1980 में जब भाजपा बनी, तो संघ के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता उसमें शामिल हुए। संघ ने अपने अनेक प्रचारक और कार्यकर्ता पार्टी में भेजे और उन्हें स्वतंत्रता दी। सत्ता राजनीति में भी राष्ट्रीय भाव प्रखर हो,यही धारणा रही। एक समय था जब संघ पर गांधी हत्या के झूठे आरोप में प्रतिबंध लगाकर स्वयंसेवकों को प्रताड़ित किया जा रहा था,किंतु संघ की बात रखने वाला कोई राजनीति में नहीं था। सत्ता की प्रताड़ना सहते हुए भी संघ ने अपने संयम को बनाए रखा और झूठे आरोपों के आधार पर लगा प्रतिबंध हटा।

   चीन युद्ध के बाद इसी संवाद और देश भक्ति पूर्ण आचरण के लिए उसी सत्ता ने संघ को 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में आमंत्रित किया। भारतीय मजदूर संघ के कार्यकर्ता रहे कृष्णलाल पठेला बताते हैं-स्वयंसेवकों की 1962 के युद्ध में उल्लेखनीय भूमिका को देखते हुए ही 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ को अपना जत्था भेजने के लिए आमंत्रित किया गया था। मुझे याद है, मैं भी उस जत्थे में शामिल था और जब संघ का जत्था राजपथ पर निकला था तब वहां मौजूद नागरिकों ने देर तक तालियां बजाई थीं। जहां तक मुझे याद है, उस जत्थे में 600 स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में शामिल हुए थे।

    संघ ने समाज जीवन के हर क्षेत्र में स्वयंसेवकों को जाने के लिए प्रेरित किया। किंतु अपनी भूमिका व्यक्ति निर्माण और मार्गदर्शन तक सीमित रखी। सक्रिय राजनीति के दैनिक उपक्रमों में शामिल न होकर समाज का संवर्धन और उसके एकत्रीकरण पर संघ की दृष्टि रही। इस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक वैचारिक परंपरा है। उसने भारतीय समाज में अनुशासन, संगठन और सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण किया है। सत्ता से उसका संवाद हमेशा रहा है और उसके पदाधिकारी राजनीतिक दलों से संपर्क में रहे हैं। इंदिरा गांधी से भी तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस का संवाद रहा है। उनका पत्र इसे बताता है। इस तरह देखें तो संघ किसी को अछूत नहीं मानता, उसकी भले ही व्यापक उपेक्षा हुई हो। संघ के अनेक प्रकल्पों और आयोजनों में विविध राजनीतिक दलों के लोग शामिल होते रहे हैं। इस तरह संघ एक जड़ संगठन नहीं है, बल्कि समाज जीवन के हर प्रवाह से सतत संवाद और उस पर नजर रखते हुए उसके राष्ट्रीय योगदान को संघ स्वीकार करता है। इस तरह सेवा, समर्पण ही संघ का मूल मंत्र है।

  संघ की प्रेरणा से उसके स्वयंसेवकों ने अनेक स्वतंत्र संगठन स्थापित किए हैं। उनमें भाजपा भी है। इन संगठनों में आपसी संवाद और समन्वय की व्यवस्था भी है किंतु नियंत्रित करने का भाव नहीं है। सभी स्वयं में स्वायत्त और अपनी व्यवस्थाओं में आत्मनिर्भर हैं। यह संवाद विचारधारा के आधार पर चलता है। समान मुद्दों पर समान निर्णय और कार्ययोजना भी बनती है। 1951 में जनसंघ की स्थापना के समय ही संघ के कई स्वयंसेवक जैसे पं.दीनदयाल उपाध्याय, अटलबिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख जैसे लोग शामिल थे।1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ, लेकिन आपसी मतभेदों और दोहरी सदस्यता के सवाल पर उपजे विवाद के कारण यह प्रयोग असफल रहा। 1980 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में एक नए राजनीतिक दल का जन्म हुआ, जिसमें संघ प्रेरित वैचारिक नींव और सांगठनिक समर्थन मजबूत रूप से विद्यमान था।

   संघ ने सत्ता या राजनीतिक दलों के सहयोग से बदलाव के बजाए, व्यक्ति को केंद्र में रखा है। संघ का मानना है कि कोई बदलाव तभी सार्थक होता है, जब लोग इसके लिए तैयार हों। इसलिए संघ के स्वयंसेवक गाते हैं-

केवल सत्ता से मत करना परिवर्तन की आस।
जागृत जनता के केन्द्रों से होगा अमर समाज।

सामाजिक शक्ति का जागरण करते हुए उन्हें बदलाव के अभियानों का हिस्सा बनाना संघ का उद्देश्य रहा है। चुनाव के समय मतदान प्रतिशत बढ़ाने और नागरिकों की सक्रिय भूमिका को सुनिश्चित करने के लिए मतदाता जागरण अभियान इसका उदाहरण है। लोकतंत्र को सशक्त बनाते हुए नागरिकों की सहभागिता सुनिश्चित करना एक बड़ा काम है। राजनीति में प्रसिद्धि एक अनिवार्य विषय है। नेता अपने स्वागत, सम्मान के लिए बहुत से इंतजाम करते हैं। संघ इस प्रवृत्ति को पहले पहचान कर अपने स्वयंसेवकों को प्रसिद्धिपरांगमुखता का पाठ पढ़ाता आया है। ताकि काम की चर्चा हो नाम की न हो। स्वयंसेवक गीत गाते हैं-

वृत्तपत्र में नाम छपेगा, पहनूंगा स्वागत समुहार।

छोड़ चलो यह क्षुद्र भावना, हिन्दू राष्ट्र के तारणहार।।

सही मायनों में सार्वजनिक जीवन में रहते हुए यह बहुत कठिन संकल्प हैं। लेकिन संघ की कार्यपद्धति ऐसी है कि उसने इसे साध लिया है। संचार और संवाद की दुनिया में बेहद आत्मीय, व्यक्तिगत संवाद ही संघ की शैली है। जहां व्यक्ति से व्यक्ति का संपर्क सबसे प्रभावी और स्वीकार्य है। इसमें दो राय नहीं कि इन सौ सालों में संघ के अनेक स्वयंसेवक समाज में प्रभावी स्थिति में पहुंचें तो अनेक सत्ता के शिखरों तक भी पहुंचे। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी और नरेंद्र मोदी इसमें शिखर तक पहुंचे लोग हैं। इसके अलावा एक लंबी श्रृंखला है जिनकी प्रेरणा संघ है। जिनके जीवन में भी संघ है। संघ का प्रशिक्षण न केवल वैचारिक स्पष्टता देता है, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन, जनसंपर्क कौशल और सेवा भाव भी समाहित करता है। यही कारण है कि संघ से निकले नेता राजनीतिक दृष्टि से अधिक प्रभावशाली, अनुशासित और संगठन-निष्ठ होते हैं। संघ के स्वयंसेवकों के सक्रिय सहभाग से समाज जीवन के हर क्षेत्र में अब नीतियों के निर्माण और क्रियान्वयन में परिर्वतन दिखने लगा है। इसे बदलाव की राजनीति कहते हैं। जबकि सत्ता राजनीति के मार्ग अलहदा हैं। स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, धार्मिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रवाद जैसे विषय संघ के लंबे समय से पोषित विचार रहे हैं, जिन्हें अब सरकारी नीतियों में प्राथमिकता मिलती दिखती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 हटाना, और समान नागरिक संहिता जैसे निर्णय संघ की वैचारिक दिशा को ही प्रकट करते हैं। इसमें कई कार्य लंबे आंदोलन के बाद संभव हुए। लोकजागरण की यह शैली संघ का लोकसंपर्क भी बताती है। किसी विषय को समाज में ले जाना और उसे स्थापित करना। फिर सरकारों के द्वारा उस पर पहल करना। लोकतंत्र को सशक्त करती यह परंपरा संघ ने अपने विविध संगठनों के साथ मिलकर स्थापित की है। संघ की प्रतिनिधि सभाओं में विविध मुद्दों पर पास प्रस्ताव बताते हैं कि संघ की राष्ट्र की ओर देखने की दृष्टि क्या है। ये प्रस्ताव हमारे समय के संकटों पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण रखते हुए राह भी बताते हैं। अनेक बार संघ पर यह आरोप लगते हैं कि वह राजनीति को नियंत्रित करना चाहता है। किंतु विरोधी इसके प्रमाण नहीं देते। संघ का विषय प्रेरणा और मार्गदर्शन तक सीमित है। संघ की पूरी कार्यशैली में संवाद,संदेश और सुझाव ही हैं, चाहे वह सरकार किसी की भी हो। अपने वैचारिक हस्तक्षेप, प्रतिनिधि सभा के प्रस्तावों और सकारात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से संघ ने समाज की बातों को ही सत्ता प्रतिष्ठानों के सामने रखा है। जिनमें कई बार सकारात्मक उत्तर आते हैं, तो कई बार कुछ मुद्दे उपेक्षित हो जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में संघ के स्वयंसेवकों की संख्या काफी है। जाहिर है भाजपा की सरकारों से स्वयंसेवकों की अपेक्षाएं भी ज्यादा रहती हैं। किंतु सरकारों के दैनिक कार्य में हस्तक्षेप के बजाए संघ सिर्फ वैचारिक और राष्ट्रहित के मुद्दों पर अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखता है। कई बार शासकीय स्तर पर, नीतियों के स्तर पर उन्हें सुना भी जाता है। इसे सत्ता पर दबाव के बजाए प्रेरणा और परस्पर सहमति के रूप में देखा जाना चाहिए।

  संघ राजनीति में आदर्शवादी कैडर और संस्कारी नेतृत्व का निर्माण करता हुआ दिखता है। उसकी विचारधारा राष्ट्रवादी,अनुशासित और निःस्वार्थ सेवा पर आधारित है। सत्ता में उसके स्वयंसेवकों के रहते हुए भी संघ का जोर सामाजिक सेवा, पारिवारिक मूल्यों और सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर रहता है। अनेक मुद्दों पर जैसे आर्थिक नीति, उदारवादी वैश्वीकरण की दिशा पर संघ ने हमेशा अपनी अलग राय व्यक्त की है। संघ इस तरह सत्ता राजनीति की मजबूरियों को समझते हुए भी उनकी हर बात से सहमत नहीं है। इसमें दो राय नहीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय राजनीति में एक वैकल्पिक वैचारिक धारा का निर्माण किया है। उसने हिंदुत्व आधारित राष्ट्रीय भाव को मुख्यधारा में स्थापित किया है और अपनी सांगठनिक शक्ति से भारतीय राजनीति को नई दिशा दी है। समाज की सज्जनशक्ति को एकत्र कर उनसे संवाद बनाते हुए लोकजागरण का काम भी किया है। एक जागृत समाज कैसे निष्क्रियता छोड़कर सजग और सक्रिय हस्तक्षेप करे, यह संघ के निरंतर प्रयास हैं। पंच परिवर्तन का संकल्प इसी को प्रकट करता है।

        संघ भले ही स्वयं राजनीति में न हो, पर राजनीति पर उसके विचारों का गहरा प्रभाव परिलक्षित होने लगा है। राजनीतिक दलों में भी संघ पर टीका करने की होड़ दिखती है। जबकि संघ अपने ऊपर लगने वाले निरंतर मिथ्या आरोपों पर भी प्रायः खामोश रहता है। क्योंकि राजनीति के द्वारा उठाए जा रहे प्रश्नों का उत्तर देकर वह घटिया राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहता। आज समाज जीवन में भी संघ को जानने की भूख है। लोग संघ से जुड़कर भारत का भविष्य गढ़ना चाहते हैं। इसलिए एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं-

भारत को जानो, भारत को मानो

भारत के बने, भारत को बनाओ।

   यह बदला हुआ समय संघ के लिए अवसर भी है और परीक्षा भी। उम्मीद की जानी कि संघ अपने शताब्दी वर्ष में ज्यादा सरोकारी भावों से भरकर सामाजिक समरसता, राष्ट्रबोध जैसे विषयों पर समाज में परिवर्तन की गति को तेज कर पाएगा। संघ के अनेक पदाधिकारी इसे ईश्वरीय कार्य मानते हैं।  जाहिर है उनके संकल्पों से भारत मां एक बार फिर जगद्गुरू के सिंहासन के विराजेगी, ऐसा विश्वास स्वयंसेवकों की संकल्प शक्ति को देखकर सहज ही होता है।

  

शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

पंच परिवर्तन से बदल जाएगा समाज का चेहरा-मोहरा

                                                                  -प्रो. संजय द्विवेदी


    इतिहास के चक्र में किसी सांस्कृतिक संगठन के सौ साल की यात्रा साधारण नहीं होती। यह यात्रा बीज से बिरवा और अंततः उसके वटवृक्ष में बदल जाने जैसी है। ऐसे में उस संगठन के भविष्य की यात्रा पर विमर्श होना बहुत स्वाभाविक है। स्वतंत्रता के अमृतकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संकल्प भविष्य के भारत की रचना में सहयोगी बन सकते हैं।

     अपने शताब्दी वर्ष में संघ ने पंच परिवर्तन का संकल्प लिया है। यह पंच परिवर्तन क्या है? इससे क्या होने वाला है? इसे भी जानना जरूरी है। संघ की मान्यता है कि व्यवस्था परिवर्तन का लक्ष्य तभी पूरा होगा, जब भारत की व्यवस्थाएं स्व पर आधारित हों।स्व आधारित तंत्र बनाना साधारण नहीं है। महात्मा गांधी से लेकर देश के तमाम विचारक और राजनेता स्व की बात करते रहे,किंतु व्यवस्था ने उनके विचारों को अप्रासंगिक बना दिया। समाज परिर्वतन के बिना व्यवस्था परिर्वतन संभव नहीं, इसे भी सब मानते हैं। वैचारिक संभ्रम इसका बहुत बड़ा कारण है। हम आत्मविस्मृति के शिकार और आत्मदैन्य से घिरे हुए समाज हैं। गुलामी के लंबे कालखंड ने इस दैन्य को बहुत गहरा कर दिया है। इससे हम अपना मार्ग भटक गए। स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, बाबा साहब आंबेडकर हमें वह रास्ता बताते हैं जिनपर चलकर हम अपनी कुरीतियों से मुक्त एक सक्षम, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी समाज बन सकते थे। किंतु अंग्रेजों के बाद सत्ता में आए नायकों ने सारा कुछ बिसरा दिया। उस आरंभिक समय में भी दीनदयाल उपाध्याय और डा. राममनोहर लोहिया जैसे नायक भारत की आत्मा में झांकने का प्रयास करते रहे किंतु सत्ता की राजनीति को वे विचार अनुकुल नहीं थे।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष में पंच परिर्वतन का जो संकल्प लिया है,वह भारत की चिति और उसकी स्मृति को जागृत करने का काम करेगा। राष्ट्रीय चेतना का स्तर बढ़ाने के लिए 1.नागरिक कर्तव्य, 2. स्वदेशी, 3. पर्यावरण संरक्षण, 4.समरसता, 5.कुटुंब प्रबोधन जैसे पांच संकल्प ही पंच परिवर्तन के सूत्र हैं। इन विषयों में भारत की आत्मा को झकझोरकर जगाने और नया भारत बनाने का संकल्प झलकता है।

नागरिक कर्तव्यबोध से नवचेतन का संचार-

किसी भी राष्ट्र और लोकतंत्र की सफलता उसके नागरिकों की सहभागिता और कर्तव्यबोध से ही सार्थक होती है। एक जीवंत लोकतंत्र की गारंटी उसकी नागरिक चेतना ही है। कानूनों की अधिकता और उसे न मानने का मानस दोनों साथ-साथ चलते हैं। अपनी माटी के प्रति प्रेम, उत्कट राष्ट्रभक्ति ही सफल राष्ट्र का आधार है। जापान जैसे देशों का उदाहरण देते समय हमें देखना होगा कि क्या हमारी राष्ट्रीय चेतना और संवेदना वही है जो एक जापानी में है। आखिर क्या कारण है कि अपनी महान परंपराओं, ज्ञान परंपरा के बाद भी हम एक लापरवाह और कुछ मामलों में अराजक समाज में बदलते जा हैं। कानूनों को तोड़ना यहां फैशन है। यहां तक की हम सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने और सड़कों पर रेड लाइट का उल्लंधन करने से भी बाज नहीं आते। ये बहुत छोटी बातें लगती हैं, किंतु हैं बहुत बड़ी। चुनावों में शत प्रतिशत मताधिकार तो दूर का सपना है। बहुत शिक्षित शहरों में वोटिंग 50 प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाती। ये सूचनाएं बताती हैं कि हमें अभी जागरूक नागरिक या सजग भारतीय होना शेष है।कानूनों का पालन, कर का समय पर भुगतान, सामाजिक और सामुदायिक सेवा, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा जरूरी है। एक शानदार समाज की पहचान है कि वह अपने परिवेश को न सिर्फ स्वच्छ और सुंदर बनाने का प्रयास करता है बल्कि अपने प्रयासों से अन्यों को भी प्रेरित करता है। देखा जाता है कि हममें अधिकार बोध बहुत है किंतु कर्तव्यबोध कई बार कम होता है। जबकि संविधान हमें मौलिक अधिकारों के साथ कर्तव्यों की भी सीख देता है। हमारे धार्मिक ग्रंथ हमें नागरिकता और सामाजिक आचरण का पाठ पढ़ाते हैं। सवाल यह है कि हम उन्हें अपने जीवन में कितना उतार पाते हैं।

स्वदेशी से बनेगा स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर भारत-

पंचपरिवर्तन का दूसरा सूत्र है स्वदेशी। स्वदेशी सिर्फ आत्मनिर्भरता का मामला नहीं है यह राष्ट्रीय स्वाभिमान का भी विषय है। अपनी जमीन पर खड़े रहकर विकास की यात्रा ही स्वदेशी का मूलमंत्र है। विनोबा जी कहते थे- स्वदेशी का अर्थ है आत्मनिर्भरता और अहिंसा।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसे सादगी से भी जोड़ता है। जिसके मायने हैं मितव्ययिता से जियो, कंजूसी से नहीं। स्वदेशी का सोच बहुत व्यापक है। परिवारों में भाषा, वेशभूषा, भवन, भ्रमण, भजन और भोजन ये छः चीजें हमारी ही होनी चाहिए। हम विदेशी भाषा, बोलें, दुनिया के साथ संवाद करें। किंतु अपने परिवारों अपनी मातृभाषा का उपयोग करें। विदेशी वस्त्रों से परहेज नहीं किंतु पारिवारिक मंगल आयोजनों और उत्सवों में अपनी वेशभूषा धारण करें। स्वभूषा, उपासना पद्धति, भोजन हमारा होना चाहिए। इसी तरह हम पूरी दुनिया घूमकर आएं किंतु भारत के तपोस्थलों, तीर्थस्थलों, वीरभूमियों तक भी हमारा प्रवास हो। हमारे परिजन जानें की राणा प्रताप कौन हैं और चित्तौड़गढ़ कहां है। शिवाजी कौन थे और रायगढ़ कैसा है। जालियांवालाबाग कहां है। इसी तरह हमारे घर भारतीयता का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखने चाहिए। वहां एक भारतीय परिवार रहता है ,यह प्रकट होना चाहिए। महापुरूषों की तस्वीरें। अपनी भाषा में नाम पट्ट और स्वागतम् जैसे उच्चार लिखे हों। परिवारों में हमारी संस्कृति की छाप साफ दिखनी चाहिए। तुलसी का पौधा और पूजाघर के साथ, किताबों का एक कोना भी हो जिसमें हमारे धार्मिक ग्रंथ गीता, रामायण, महाभारत आदि अवश्य हों। उनका समय-समय पर पाठ भी परिवार के साथ हो। हमारी जीवनशैली आधुनिक हो किंतु पश्चिमी शैली का अंधानुकरण न हो। परिवार में काम करने वाले सेवकों के प्रति सम्मान की दृष्टि भी जरूरी है। ऐसे अनेक विषय हैं जिन पर विचार होना चाहिए।

पर्यावरण संरक्षण से होगी जीवन रक्षा-

प्रकृति के साथ संवाद और सहजीवन भारत का मूल विचार है। अपनी नदियों, पहाड़ों और पेड़-पौधों में ईश्वर का वास देखने की हमारी संस्कृति और परंपरा रही  है। प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना असंभव है। प्रदूषण आज बहुत बड़ी चिंता बन गया है। कुछ भी स्वच्छ नहीं रहा। हवा भी जहरीली है। इसलिए हमें अपने भारतीय विचारों पर वापसी करनी ही होगी। प्रकृति और पर्यावरण के साथ सार्थक संवाद ही हमें बचा पाएगा। ग्लोबल वार्मिंग जैसी चिंताएं हमारे सामने चुनौती की तरह हैं। पानी, बिजली को बचाना, प्लास्टिक मुक्त समाज बनाने के साथ वाहनों का संयमित उपयोग जरूरी है। एयरकंडीशनर का न्यूनतम उपयोग, वनों और जंगलों की रक्षा जैसे अनेक प्रयासों से हम सुंदर दुनिया बना सकते हैं। घरों में पेड़-पौधे लगाएं और हरित घर का संकल्प लें। सच तो यह है कि अगर हम पर्यावरण की रक्षा करेंगें तो वह हमारी रक्षा करेगा।

सामाजिक समरसता से बनेगी सुंदर दुनिया-

सामाजिक समरसता के बिना कोई भी राष्ट्र अग्रणी नहीं बन सकता। गुरु घासीदास कहते हैं- मनखे-मनखे एक हैं। किंतु जातिवाद ने इस भेद को गहरा किया है। तमाम प्रयासों के बाद भी आज भी हम इस रोग से मुक्त नहीं हो सके हैं। भेदभाव ने हमारे समाज को विभाजित कर रखा है, जिसके चलते दुनिया में हमारी छवि ऐसी बनाई जाती है कि हम अपने ही लोगों से मानवीय व्यवहार नहीं करते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे- अस्पृश्यता ईश्वर और मानवता के प्रति अपराध है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे पू. बालासाहब देवरस ने इस संकट को रेखांकित करते हुए बसंत व्याख्यानमाला में कहा था कि- अगर छूआछूत गलत नहीं है दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है, इसे मूल से नष्ट कर देना चाहिए।ऐसे में हमें यह समझना होगा कि जो कुछ भी सैकड़ों सालों से परंपरा के नाम पर चल रहा है वह हमारा धर्म नहीं है। इतिहास में हुए इन पृष्ठों का कोई भी सभ्य समाज समर्थन नहीं कर सकता। जबकि हमारे धर्म ग्रंथ और शास्त्र इससे अलग हैं। हमारे ऋषि और ग्रंथों के रचयिता सभी वर्गों से हैं। भगवान बाल्मीकि और वेद व्यास इसी परंपरा से आते हैं। यानि यह भेद शास्त्र आधारित नहीं है। यह विकृति है। इससे मुक्ति जरूरी है।हमें इसके सचेतन प्रयास करते हुए अपने आचरण, व्यवहार और वाणी से समरसता का अग्रदूत बनना होगा। सभी समाजों और वर्गों से संवाद और सहकार बनाकर हम एक आदर्श समाज की रचना में सहयोगी हो सकते हैं। इससे समाज का सशक्तिकरण भी होगा। समानता का व्यवहार, वाणी संयम, परस्पर सहयोग, संवेदनशीलता से हम दूरियों को घटा सकते हैं और भ्रम के जाले साफ कर सकते हैं। साथ ही अपने गांव, नगर के मंदिर, जलश्रोत, श्मशान सबके लिए समान रूप से खुल होने ही चाहिए। इसमें कोई भी भेद नहीं होना चाहिए।

हमारी शक्ति है कुटुंब-

आज का सबसे बड़ा संकट कुटुंब का बिखराव है। एकल परिवारों में बंटते जाना और अकेले होते जाना इस समय की त्रासदी है। जबकि कल्याणकारी कुटुंब वह है जहां सब संरक्षण, स्नेह और संवेदना के सूत्र में बंधे होते हैं। जहां बालकों को प्यार और शिक्षा, वयस्कों को सम्मान और बुजुर्गों को सम्मान और सेवा मिलती है। परिवार हमारी शक्ति बनें इसके लिए पंच परिवर्तन का बड़ा मंत्र है- कुटुंब प्रबोधन। कुटुंब की एक परंपरा होती है। हम उसे आगे बढ़ाते हैं और संरक्षित करते हैं। मूल्यआधारित जीवन इससे ही संभव होता है। परिवार के मूल्यों से ही बच्चों को संस्कार आते हैं और वे सीखते हैं। जैसे देखते हैं वैसा ही आचरण करते हैं।कुटुंब दरअसर रिश्तों का विस्तार है। जिसमें पति-पत्नी और बच्चों के अलावा हमारे सगे-संबंधी भी शामिल हैं। उनके सुख में सुख पाना, दुख में दुखी होना और उन्हें संबल देना हमें मनुष्य बनाता है। इसके लिए बच्चों के साथ-साथ रिश्तों को समय देना जरूरी है। औपचारिक और अनौपचारिक रुप से कार्यक्रमों, खान-पान, उत्सवों के माध्यमों से ये रिश्ते दृढ़ होते जाएं यह बहुत जरूरी है।

    पंच परिवर्तन के साधारण दिखने वाले सूत्रों में ही भारत की आत्मा के दर्शन होते हैं। इन सूत्रों को अपनाकर हम एक सुंदर बनाने की दिशा में बड़ा काम कर सकते हैं। संघ की शताब्दी वर्ष में लिए गए ये संकल्प हमें एक समाज और राष्ट्र के रूप में संबल देने का काम करेगें इसमें दो राय नहीं है। 22 जनवरी,2024 को अयोध्या में राममंदिर में भगवान की प्राणप्रतिष्ठा के बाद राम राज्य की ओर हम बढ़ चले हैं। राम राज्य के मूल्य हमारे जीवन में आएं। परिवारों में आएं। इससे एक सबल, आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी भारत बनेगा। आचरण की शुचिता से आए परिर्वतन ही स्थाई होते हैं। इससे ही हमारे मन में राम रमेंगें और देश में रामराज्य आएगा।


गुरुवार, 17 जुलाई 2025

संघ, सत्ता और समाज

                                                                 -प्रो. संजय द्विवेदी


         एक जीवंत लोकतंत्र में रहते हुए क्या आप राजनीति से विरत रह सकते हैं? राजनीति जो नीति-निर्माण से लेकर आपके संपूर्ण जीवन के फैसले कर रही है, उससे अलग रहना क्या उचित है? क्या बदलाव सत्ता के बिना संभव है? क्या समाज की अपनी भी कोई शक्ति है या वह राजनीति से ही नियंत्रित होता है ? ऐसे अनेक प्रश्न चिंतनशील व्यक्तियों को मथते रहते हैं। ऐसे में एक संगठन जो सौ साल की आयु पूरी करने जा रहा है, उसके लिए राजनीति और सत्ता के मायने क्या हैं? सत्ता राजनीति उसे कितनी कम या ज्यादा रास आती है। लोकतंत्र में बदलाव की राजनीति और सत्ता की राजनीति के विमर्शों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहां खड़ा है। यह विचार जरूरी हो जाता है। संघ ऐसा संगठन बन चुका है, जिसने समाज जीवन के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उसके स्वयंसेवकों के उजले पदचिन्ह हर क्षेत्र में सफलता के मानक बन गए हैं। स्वयं को सांस्कृतिक संगठन बताने वाले संघ का मूल कार्य और केंद्र दैनिक शाखाहै, किंतु अब वह सत्ता-व्यवस्था में गहराई तक अपनी वैचारिक और सांगठनिक छाप छोड़ चुका है।

     संघ के संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक का सपना तो राष्ट्रीय चेतना का जागरण, सांस्कृतिक एकता का बोध और सालों की गुलामी के उपजे आत्मदैन्य को हटाकर हिंदू समाज की शक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करना था। इस दौर में डा. केशवराम बलिराम हेडगेवार ने ऐसे संगठन की परिकल्पना की, जो राष्ट्र को धर्म, भाषा, क्षेत्र से ऊपर उठाकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना से जोड़े। संघ की शाखाएं उसकी कार्यप्रणाली की रीढ़ बनीं। प्रतिदिन कुछ समय एक निश्चित स्थान पर एकत्रित होकर शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक प्रशिक्षण देना ही शाखा की आत्मा है। यह क्रमशः अनुशासित, राष्ट्रनिष्ठ और संस्कारित कार्यकर्ताओं का निर्माण करता है, जिन्हें 'स्वयंसेवक' कहा जाता है। संघ ने व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण" की अवधारणा को अपनाया है। इस प्रक्रिया में उसका जोर 'चरित्र निर्माण' और 'कर्तव्यपरायणता' पर होता है। ऐसे में विविध वर्गों तक पहुंचने के लिए संघ के विविध संगठन सामने आए जो अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हुए किंतु उनका मूल उद्देश्य राष्ट्र की चिति का जागरण और राष्ट्र निर्माण ही है। आप देखें तो संघ ने राजनीति और सत्ता के शिखरों पर बैठे लोगों से हमेशा संवाद बनाए रखा। राजनीति के महापुरुषों से भी संवाद रखा। आप देखें तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी,बाबा साहब भीमराव आंबेडकर, जयप्रकाश नारायण, पं. जवाहरलाल नेहरू  से लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी तक संघ का संवाद सबसे रहा। अपनी बातों को रखना और उस पर दृढ़ता से डटे रहना संघ का मूल स्वभाव है। संघ सत्ता राजनीति से संवाद रखते हुए भी सत्ता मोह से कभी ग्रस्त नहीं रहा। 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा जनसंघ की स्थापना में संघ का सक्रिय सहयोग था। इस पार्टी का सहयोग संघ द्वारा प्रशिक्षित अनेक प्रचारकों द्वारा किया गया। 1980 में जब भाजपा बनी, तो संघ के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता उसमें शामिल हुए। संघ ने अपने अनेक प्रचारक और कार्यकर्ता पार्टी में भेजे और उन्हें स्वतंत्रता दी। सत्ता राजनीति में भी राष्ट्रीय भाव प्रखर हो,यही धारणा रही। एक समय था जब संघ पर गांधी हत्या के झूठे आरोप में प्रतिबंध लगाकर स्वयंसेवकों को प्रताड़ित किया जा रहा था,किंतु संघ की बात रखने वाला कोई राजनीति में नहीं था। सत्ता की प्रताड़ना सहते हुए भी संघ ने अपने संयम को बनाए रखा और झूठे आरोपों के आधार पर लगा प्रतिबंध हटा।

   चीन युद्ध के बाद इसी संवाद और देश भक्ति पूर्ण आचरण के लिए उसी सत्ता ने संघ को 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में आमंत्रित किया। भारतीय मजदूर संघ के कार्यकर्ता रहे कृष्णलाल पठेला बताते हैं-स्वयंसेवकों की 1962 के युद्ध में उल्लेखनीय भूमिका को देखते हुए ही 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ को अपना जत्था भेजने के लिए आमंत्रित किया गया था। मुझे याद है, मैं भी उस जत्थे में शामिल था और जब संघ का जत्था राजपथ पर निकला था तब वहां मौजूद नागरिकों ने देर तक तालियां बजाई थीं। जहां तक मुझे याद है, उस जत्थे में 600 स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में शामिल हुए थे।

    संघ ने समाज जीवन के हर क्षेत्र में स्वयंसेवकों को जाने के लिए प्रेरित किया। किंतु अपनी भूमिका व्यक्ति निर्माण और मार्गदर्शन तक सीमित रखी। सक्रिय राजनीति के दैनिक उपक्रमों में शामिल न होकर समाज का संवर्धन और उसके एकत्रीकरण पर संघ की दृष्टि रही। इस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक वैचारिक परंपरा है। उसने भारतीय समाज में अनुशासन, संगठन और सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण किया है। सत्ता से उसका संवाद हमेशा रहा है और उसके पदाधिकारी राजनीतिक दलों से संपर्क में रहे हैं। इंदिरा गांधी से भी तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस का संवाद रहा है। उनका पत्र इसे बताता है। इस तरह देखें तो संघ किसी को अछूत नहीं मानता, उसकी भले ही व्यापक उपेक्षा हुई हो। संघ के अनेक प्रकल्पों और आयोजनों में विविध राजनीतिक दलों के लोग शामिल होते रहे हैं। इस तरह संघ एक जड़ संगठन नहीं है, बल्कि समाज जीवन के हर प्रवाह से सतत संवाद और उस पर नजर रखते हुए उसके राष्ट्रीय योगदान को संघ स्वीकार करता है। इस तरह सेवा, समर्पण ही संघ का मूल मंत्र है।

  संघ की प्रेरणा से उसके स्वयंसेवकों ने अनेक स्वतंत्र संगठन स्थापित किए हैं। उनमें भाजपा भी है। इन संगठनों में आपसी संवाद और समन्वय की व्यवस्था भी है किंतु नियंत्रित करने का भाव नहीं है। सभी स्वयं में स्वायत्त और अपनी व्यवस्थाओं में आत्मनिर्भर हैं। यह संवाद विचारधारा के आधार पर चलता है। समान मुद्दों पर समान निर्णय और कार्ययोजना भी बनती है। 1951 में जनसंघ की स्थापना के समय ही संघ के कई स्वयंसेवक जैसे पं.दीनदयाल उपाध्याय, अटलबिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख जैसे लोग शामिल थे।1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ, लेकिन आपसी मतभेदों और दोहरी सदस्यता के सवाल पर उपजे विवाद के कारण यह प्रयोग असफल रहा। 1980 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में एक नए राजनीतिक दल का जन्म हुआ, जिसमें संघ प्रेरित वैचारिक नींव और सांगठनिक समर्थन मजबूत रूप से विद्यमान था।

   संघ ने सत्ता या राजनीतिक दलों के सहयोग से बदलाव के बजाए, व्यक्ति को केंद्र में रखा है। संघ का मानना है कि कोई बदलाव तभी सार्थक होता है, जब लोग इसके लिए तैयार हों। इसलिए संघ के स्वयंसेवक गाते हैं-

केवल सत्ता से मत करना परिवर्तन की आस।
जागृत जनता के केन्द्रों से होगा अमर समाज।

सामाजिक शक्ति का जागरण करते हुए उन्हें बदलाव के अभियानों का हिस्सा बनाना संघ का उद्देश्य रहा है। चुनाव के समय मतदान प्रतिशत बढ़ाने और नागरिकों की सक्रिय भूमिका को सुनिश्चित करने के लिए मतदाता जागरण अभियान इसका उदाहरण है। लोकतंत्र को सशक्त बनाते हुए नागरिकों की सहभागिता सुनिश्चित करना एक बड़ा काम है। राजनीति में प्रसिद्धि एक अनिवार्य विषय है। नेता अपने स्वागत, सम्मान के लिए बहुत से इंतजाम करते हैं। संघ इस प्रवृत्ति को पहले पहचान कर अपने स्वयंसेवकों को प्रसिद्धिपरांगमुखता का पाठ पढ़ाता आया है। ताकि काम की चर्चा हो नाम की न हो। स्वयंसेवक गीत गाते हैं-

वृत्तपत्र में नाम छपेगा, पहनूंगा स्वागत समुहार।

छोड़ चलो यह क्षुद्र भावना, हिन्दू राष्ट्र के तारणहार।।

सही मायनों में सार्वजनिक जीवन में रहते हुए यह बहुत कठिन संकल्प हैं। लेकिन संघ की कार्यपद्धति ऐसी है कि उसने इसे साध लिया है। संचार और संवाद की दुनिया में बेहद आत्मीय, व्यक्तिगत संवाद ही संघ की शैली है। जहां व्यक्ति से व्यक्ति का संपर्क सबसे प्रभावी और स्वीकार्य है। इसमें दो राय नहीं कि इन सौ सालों में संघ के अनेक स्वयंसेवक समाज में प्रभावी स्थिति में पहुंचें तो अनेक सत्ता के शिखरों तक भी पहुंचे। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी और नरेंद्र मोदी इसमें शिखर तक पहुंचे लोग हैं। इसके अलावा एक लंबी श्रृंखला है जिनकी प्रेरणा संघ है। जिनके जीवन में भी संघ है। संघ का प्रशिक्षण न केवल वैचारिक स्पष्टता देता है, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन, जनसंपर्क कौशल और सेवा भाव भी समाहित करता है। यही कारण है कि संघ से निकले नेता राजनीतिक दृष्टि से अधिक प्रभावशाली, अनुशासित और संगठन-निष्ठ होते हैं। संघ के स्वयंसेवकों के सक्रिय सहभाग से समाज जीवन के हर क्षेत्र में अब नीतियों के निर्माण और क्रियान्वयन में परिर्वतन दिखने लगा है। इसे बदलाव की राजनीति कहते हैं। जबकि सत्ता राजनीति के मार्ग अलहदा हैं। स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, धार्मिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रवाद जैसे विषय संघ के लंबे समय से पोषित विचार रहे हैं, जिन्हें अब सरकारी नीतियों में प्राथमिकता मिलती दिखती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 हटाना, और समान नागरिक संहिता जैसे निर्णय संघ की वैचारिक दिशा को ही प्रकट करते हैं। इसमें कई कार्य लंबे आंदोलन के बाद संभव हुए। लोकजागरण की यह शैली संघ का लोकसंपर्क भी बताती है। किसी विषय को समाज में ले जाना और उसे स्थापित करना। फिर सरकारों के द्वारा उस पर पहल करना। लोकतंत्र को सशक्त करती यह परंपरा संघ ने अपने विविध संगठनों के साथ मिलकर स्थापित की है। संघ की प्रतिनिधि सभाओं में विविध मुद्दों पर पास प्रस्ताव बताते हैं कि संघ की राष्ट्र की ओर देखने की दृष्टि क्या है। ये प्रस्ताव हमारे समय के संकटों पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण रखते हुए राह भी बताते हैं। अनेक बार संघ पर यह आरोप लगते हैं कि वह राजनीति को नियंत्रित करना चाहता है। किंतु विरोधी इसके प्रमाण नहीं देते। संघ का विषय प्रेरणा और मार्गदर्शन तक सीमित है। संघ की पूरी कार्यशैली में संवाद,संदेश और सुझाव ही हैं, चाहे वह सरकार किसी की भी हो। अपने वैचारिक हस्तक्षेप, प्रतिनिधि सभा के प्रस्तावों और सकारात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से संघ ने समाज की बातों को ही सत्ता प्रतिष्ठानों के सामने रखा है। जिनमें कई बार सकारात्मक उत्तर आते हैं, तो कई बार कुछ मुद्दे उपेक्षित हो जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में संघ के स्वयंसेवकों की संख्या काफी है। जाहिर है भाजपा की सरकारों से स्वयंसेवकों की अपेक्षाएं भी ज्यादा रहती हैं। किंतु सरकारों के दैनिक कार्य में हस्तक्षेप के बजाए संघ सिर्फ वैचारिक और राष्ट्रहित के मुद्दों पर अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखता है। कई बार शासकीय स्तर पर, नीतियों के स्तर पर उन्हें सुना भी जाता है। इसे सत्ता पर दबाव के बजाए प्रेरणा और परस्पर सहमति के रूप में देखा जाना चाहिए।

  संघ राजनीति में आदर्शवादी कैडर और संस्कारी नेतृत्व का निर्माण करता हुआ दिखता है। उसकी विचारधारा राष्ट्रवादी,अनुशासित और निःस्वार्थ सेवा पर आधारित है। सत्ता में उसके स्वयंसेवकों के रहते हुए भी संघ का जोर सामाजिक सेवा, पारिवारिक मूल्यों और सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर रहता है। अनेक मुद्दों पर जैसे आर्थिक नीति, उदारवादी वैश्वीकरण की दिशा पर संघ ने हमेशा अपनी अलग राय व्यक्त की है। संघ इस तरह सत्ता राजनीति की मजबूरियों को समझते हुए भी उनकी हर बात से सहमत नहीं है। इसमें दो राय नहीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय राजनीति में एक वैकल्पिक वैचारिक धारा का निर्माण किया है। उसने हिंदुत्व आधारित राष्ट्रीय भाव को मुख्यधारा में स्थापित किया है और अपनी सांगठनिक शक्ति से भारतीय राजनीति को नई दिशा दी है। समाज की सज्जनशक्ति को एकत्र कर उनसे संवाद बनाते हुए लोकजागरण का काम भी किया है। एक जागृत समाज कैसे निष्क्रियता छोड़कर सजग और सक्रिय हस्तक्षेप करे, यह संघ के निरंतर प्रयास हैं। पंच परिवर्तन का संकल्प इसी को प्रकट करता है।

        संघ भले ही स्वयं राजनीति में न हो, पर राजनीति पर उसके विचारों का गहरा प्रभाव परिलक्षित होने लगा है। राजनीतिक दलों में भी संघ पर टीका करने की होड़ दिखती है। जबकि संघ अपने ऊपर लगने वाले निरंतर मिथ्या आरोपों पर भी प्रायः खामोश रहता है। क्योंकि राजनीति के द्वारा उठाए जा रहे प्रश्नों का उत्तर देकर वह घटिया राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहता। आज समाज जीवन में भी संघ को जानने की भूख है। लोग संघ से जुड़कर भारत का भविष्य गढ़ना चाहते हैं। इसलिए एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं-

भारत को जानो, भारत को मानो

भारत के बने, भारत को बनाओ।

   यह बदला हुआ समय संघ के लिए अवसर भी है और परीक्षा भी। उम्मीद की जानी कि संघ अपने शताब्दी वर्ष में ज्यादा सरोकारी भावों से भरकर सामाजिक समरसता, राष्ट्रबोध जैसे विषयों पर समाज में परिवर्तन की गति को तेज कर पाएगा। संघ के अनेक पदाधिकारी इसे ईश्वरीय कार्य मानते हैं।  जाहिर है उनके संकल्पों से भारत मां एक बार फिर जगद्गुरू के सिंहासन के विराजेगी, ऐसा विश्वास स्वयंसेवकों की संकल्प शक्ति को देखकर सहज ही होता है।