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शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

जब संसद भी बेमानी हो जाए


-संजय द्विवेदी
  प्रदर्शन सड़क पर होने चाहिए और बहस संसद में। लेकिन हो उल्टा रहा है प्रदर्शन संसद में हो रहे हैं, बहस सड़क और टीवी न्यूज चैनलों पर। ऐसे में हमारी संसदीय परम्पराएं और उच्च लोकतांत्रिक आदर्श हाशिए पर हैं। राजनीति के मैदान में जुबानी कड़वाहटें अपने चरम पर हैं और मीडिया इसे हवा दे रहा है। सही मायने में भारतीय संसदीय इतिहास के लिए ये काफी बुरे दिन हैं। संसद और विधानसभाएं अगर महत्व खो रही हैं तो हमारे राजनेता भी अपना प्रभाव खो बैठेंगें। बहस के लिए बनी संस्थाओं में नाहक मुद्दों के आधार पर जिस तरह बाधा डाली जा रही है, उससे लगता है किसंसदीय परम्पराओं और मूल्यों की हमारे राजनीतिक दलों को बहुत परवाह नहीं है।
  बढ़ती कड़वाहटों ने संवाद का स्तर तो गिराया ही है, आपसी संबंधों पर भी तुषारापात किया है। सत्ता परिवर्तन को सहजता से स्वीकार न करके सत्ता में बने रहने के अभ्यासी दल बेतुकी प्रतिक्रियाएं कर रहे हैं। संसद के अंदर जैसे दृश्य रोज बन रहे हैं और उसके चलते हमारी राजनीति का जो चेहरा बन रहा है, उससे उसके प्रति जनता वितृष्णा और बढ़ेगी। क्या जनता के हित और देशहित अलग-अलग हैंअगर दोनों एक ही हैं तो जनता को राहत देने वाले कानूनों को तुरंत पास करने के लिए हमारे राजनीतिक दल एक क्यों नहीं है? क्या यह श्रेय की लड़ाई है या फिर जनता की परवाह किसी को नहीं है।
महत्व खोती संसदः इस पूरे विमर्श की सबसे बड़ी चिंता यह है कि संसद और विधानसभाएं महत्व खो रही हैं। उनका चलना मुश्किल है, और उन्हें चलाने की कोशिशें भी नदारद दिखती हैं। सत्ता पक्ष की अपनी अकड़ है तो विपक्ष के दुराग्रह भी साफ दिखते हैं। समाधान निकालने की कोशिशें नहीं दिखती और जनता का हितों को हाशिए लगते देख भी किसी को दर्द नहीं हो रहा है। लोकसभा अध्यक्ष के तमाम प्रयासों के बाद भी संवाद सहज होता नहीं दिख रहा है। अगर संसद में कानून नहीं बनेंगे, संसद में विमर्श न होंगें तो क्या होगा?  यह संकट पूरी संसदीय प्रक्रिया और राजनीति के सामने है। राजनीति का क्षेत्र बहुत जिम्मेदारी का है और जिस तरह की राजनीति हो रही है, उसमें इस जिम्मेदारी के भाव का अभाव दिखता है। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संसदीय प्रक्रिया के इस मर्म को समझा और संसद को उदार लोकतांत्रिक मूल्यों का मंच बनाने के लिए उन्होंने काफी जतन किए। अपने विपक्षी सदस्यों की भावनाओं और उनके तर्कों को उन्होंने अपने खिलाफ होने के बावजूद सराहा। आज उनकी ही पार्टी नाहक सवालों का संसद का समय नष्ट करती हुयी दिखती है। लोकतंत्र की रक्षा और उसके संसदीय परम्पराओं को बचाए, बनाए रखना और निरंतर समृद्ध करना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है। किंतु राष्ट्रीय दलों को यह जिम्मेदारी ज्यादा है क्योंकि  उनके आचरण और व्यवहार की छोटे दल नकल करते हैं। संसद से जो लहर चलती है वह राज्यों तक जाती है। अगर संसद नहीं चलेगी तो उसके परिणाम यह होंगे कि विधानसभाएं भी अखाड़ा बन जाएगीं। संसद दरअसल हमारे एक संपूर्ण भारतीय जनशक्ति की सामूहिक अभिव्यक्ति है। अगर वह बंटी-बंटी दिखेगी तो यह ठीक नहीं। कम से कम जनता के सवालों पर, राष्ट्रीय प्रश्नों पर संसद एक दिखेगी तो इसके दूरगामी शुभ परिणाम दिखेंगे।
सत्ता पक्ष अपनाए लचीला रवैयाः संसद को चलाना दरअसल सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी होती है। सत्ता पक्ष थोड़ा लचीला रवैया अपना कर सबको साथ ले सकता है। लोकतंत्र में हमारे संविधान ने ही सबकी हदें और सरहदें तय कर रखी हैं। मीडिया के उठाए प्रश्नों में उलझने के बजाए हमारे राजनेता संवाद को निरंतर रखने की विधियों पर जोर दें। संसद भारत की संवाद परम्परा का एक अद्भुत मंच है। जहां पूरा देश एक होता हुआ दिखता है। देश के सभी क्षेत्रों के प्रतिनिधि यहां आकर देश की भावना की अभिव्यक्ति करते हैं। इसे ज्यादा जीवंत और सार्थक बनाने की जरूरत है। संसद और संवाद कभी बाधित न हो यह परम्परा ही हमारी संसदीय परम्परा को सम्मानित बनाएगी। संसद को कभी राजनीतिक दलों के निजी हितों का अखाड़ा नहीं बनने देना चाहिए। नारे बाजी और शोरगुल से न तो समस्याओं का समाधान होता, ना ही ध्यान जाता है। हमारी परंपरा में बहसों का अनंत आकाश रहा है, शास्त्रार्थ हमारी परंपरा में है। इससे निकले निकष ही समाज को अमृतपान करवाते रहे हैं। मंथन चाहे अमृत के लिए हो या विचारों के लिए हमें उसे स्वीकारना ही चाहिए। संसद का कोई भी सत्र बेमानी न हो। जो भी लंबित बिल हों पास हों। जनता के सवालों पर संवाद हो। उनके दुख दूर करने के जतन हों। संसद को रोकना दरअसल इस देश के साथ भी घात है। हमें अपने लोकतंत्र को जीवंत बनाना है तो प्रश्नों से भागने के बजाए उससे टकराना होगा, और समाधान निकालना होगा। आने वाले दिनों में ये कड़वाहटें कैसे धुलें इस पर ध्यान होगा। प्रबल बहुमत पाकर सत्ता में आई भाजपा अगर आज मुट्ठी भर कांग्रेस सदस्यों के चलते खुद को विवश पा रही है तो यही तो लोकतंत्र की शक्ति है। 47-48 सांसदों ने लोकसभा को बेजार कर रखा है। इसकी विधि भी सत्ता पक्ष को निकालनी होगी कि किस तरह लोकसभा को काम की सभा बनाया जाए। क्या कुछ लोगों की मर्जी के आधार पर कानून बनेंगे। अदालतों में चल रहे मुद्दों पर लोकसभा को रोकना जायज नहीं कहा जा सकता। पर ऐसा हो रहा है  और समूचा देश इसे देख रहा है।  ऐसे कठिन समय में सत्ता पक्ष को आगे आकर बातचीत की कई धाराएं और कई स्तर खोलने चाहिए ताकि अड़ियल रवैया अपनाने वाले लोग बेनकाब भी हों तथा जनता के सामने सच आ सके।
सांसद भी समझें अपना कर्तव्यः सांसदों के ऊपर देश की बड़ी जिम्मेदारियां हैं। वे संसद में इस देश की जनता के प्रतिनिधि के रूप में हैं। इसलिए राजनीतिक कारणों से जनहित प्रभावित नहीं होना चाहिए। ऐसा कानून जिससे जनता को राहत की जरा भी उम्मीद है तुरंत पास करवाने के लिए सांसदों को दबाव बनाना चाहिए। देश यूं ही नहीं बनता उसे बनाने के लिए हमारे नेताओं ने लगातार संघर्ष किया है। राष्ट्रीय मुद्दों पर पक्ष-विपक्ष की सीमाएं टूट जानी चाहिए। क्योंकि देश हित एक है उस पर हमें एक दिखना भी चाहिए। जिस तरह विदेश नीति के सवालों पर, पाकिस्तान के मुद्दे पर भी हमारे मतभेद प्रकट दिख रहे है, वह हमारी राजनीति के भटकाव को प्रकट करते हैं। हमें इससे बचकर एक राष्ट्र और एक जन की भावना का प्रकटीकरण राजनीति में भी करना होगा। यह देश हम सबका है। इसके संकट और सफलताएं दोनों हमारी है। इसीलिए हमने इसे पुण्यभूमि कहा है। इसके लोगों के आंसू पोंछना, उनके दर्द में साथ खड़े होना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। ये जिम्मेदारियां हमें निभानी होगीं। ऐसा हम कर पाए तो यह बात भारतीय लोकतंत्र के माथे पर सौभाग्य का टीका साबित होगी।

बुधवार, 12 मार्च 2014

इस लहूलुहान लोकतंत्र में!

माओवादी आतंक के सामने सरकारों के घुटनाटेक रवैये से बढ़ा खतरा
-संजय द्विवेदी


वो काली तारीख भूली नही हैं अभी, 25 मई,2013 की शाम जब जीरम घाटी खून से नहा उठी थी। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं सहित 30 लोगों की निर्मम हत्या के जख्म अभी भरे नहीं थे कि जीरम घाटी एक बार फिर खून से लथपथ है। 11 मार्च,2014 की तारीख फिर एक काली तारीख के रूप में दर्ज हो गयी, जहां 16 जवानों की निर्मम हत्या कर नक्सली नरभक्षी अपनी जनक्रांति का उत्सव मनाने जंगलों में लौट गए। आखिर ये सिलसिला कब रूकेगा।
    माओवादी आतंकवाद के सामने हमारी बेबसी की हकीकत क्या है? साथ ही एक सवाल यह भी क्या भारतीय राज्य माओवादियों से लड़ना चाहता है? वह इस समस्या का समाधान चाहता है? खून बहाती जमातों से शांति प्रवचन की भाषा, संवाद की कोशिशें तो ठीक हैं किंतु खून का बहना कैसे रूकेगा? किसके भरोसे आपने एक बड़े इलाके की जनता और वहां तैनात सुरक्षा बलों को छोड़ रखा है। माओवाद से लड़ने की जब हमारी कोई नीति ही नहीं है तो कम वेतन पर काम करने वाले सुरक्षाकर्मियों और पुलिसकर्मियों को हमने इन इलाकों में मरने के लिए क्यों छोड़ रखा है? उनकी गिरती लाशों से सरकारों को फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वे किन्हीं और कामों में लगी हैं। राजनीति और नेताओं  के पास पांच साल की ठेकेदारी के सपनों के अलावा सोचने के लिए वक्त कहां हैं? वे चुनाव से आगे की नहीं सोचते। चुनाव नक्सली जिता दें या बंग्लादेशी घुसपैठिए उन्हें फर्क नहीं पड़ता। ऐसे खतरनाक समय में भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ घोषित युद्ध लड़ रहे माओवादी विचारकों के प्रति सद्भावना रखने वाले विचारकों की भी कमी नहीं है। उन्हें बहता हुआ खून नहीं दिखता क्योंकि वे विचारधारा के बंधुआ हैं। उन्हें लाल होती जमीन के पक्ष में कुतर्क की आदत है। इसलिए वे नरसंहारों के जस्टीफाई करने से भी नहीं चूकते। जबकि यह बात गले से उतरने वाली नहीं है कि माओवादी जनता के साथ हैं। ताजा मामले में भी हुयी घटना विकास के कामों को रोकने के लिए अंजाम दी गयी है।
   माओवादी नहीं चाहते कि भारतीय राज्य, राजनीति, राजनीतिक दलों की उपस्थिति उनके इलाकों में हो। वे किसी भी तरह की सामाजिक-राजनीतिक और विकास की गतिविधि से डरते हैं। वे अंधेरा बनाने और अंधेरा बांटने में ही यकीन रखते हैं और सही मायने में भय के व्यापारी हैं। इसमें दो राय नहीं कि उन्होंने जंगलों में अपनी सक्रियता से एक बड़े समाज को भारतीय राज्य के विरूद्ध कर दिया है। जो बंदूकें लेकर हमारे सामने खड़े हैं। किंतु उनकी इस साजिश के खिलाफ हमारी विफलताओं का पाप कहीं बड़ा है। यह भारतीय लोकतंत्र की विफलता ही है कि माओवादी हमारे बीच इतने शक्तिवान होते जा रहे हैं। हम न तो उनके सामाजिक आधार को कम कर पा रहे हैं न ही भौगोलिक आधार को। यह बात चिंता में डालने वाली है कि जो माओवादी निरंतर भारतीय राज्य को चुनौती देते हुए हमले कर रहे हैं उसके प्रतिकार के लिए हम क्या कर रहे हैं? अकेले छत्तीसगढ़ को लें तो वे 6 अप्रैल,2010 को दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 75 जवानों सहित 76 लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं। 25 मई,2013 को उनका दुस्साहस देखिए वे कांग्रेस के दिग्गज नेताओं विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल, उदय मुद्लियार सहित 30 लोगों की घेरकर निर्मम हत्या कर देते हैं और उसके बाद भी हम चेतते नहीं हैं। देश के 9 राज्य और 88 जिले आज माओवादी हिंसा से प्रभावित हैं। वर्ष 2013 में 1136 माओवादी आतंक की घटनाएं हो चुकी हैं। जाहिर तौर पर हमारी सरकारों का रवैया घुटनाटेक ही रहा है। इससे माओवादियों के मनोबल में वृद्धि हुयी है और वे ज्यादा आक्रामक तरीके से सामने आ रहे हैं। यह भी गजब है राजनीति ऐसे तत्वों और अभियानों से लड़ने के बजाए उनको पाल रही है। माओवादियों को सूचना, हथियार और मदद देने वालों में राजनीतिक दलों के लोग शामिल रहे हैं। कई ने तो चुनावों में उनका इस्तेमाल भी किया है। किंतु सवाल यह उठता है जो काम हम पंजाब में कर चुके हैं। आंध्र में कर चुके हैं, पश्चिम बंगाल में ममता कर चुकी हैं, उसे करने में छत्तीसगढ़ में परेशानी क्या है। क्या कारण है सशस्त्र बलों की क्षमता बढ़ाने पर हमारा जोर नहीं है। अब तक सैनिक मरते थे तो सरकारें लापरवाह दिखती थीं। अब जब हमारे बड़े राजनेताओं तक भी माओवादी आतंक पहुंच रहा है, तब राजनीति की निष्क्रियता आशंकित करती है। भारतीय राज्य की दिशाहीनता और कायरता ने ये दृश्य रचे हैं। इसे कहने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए कि जब कोई राज्य अपने लोगों की रक्षा न कर सके तो उसके होने के मायने क्या हैं।

   आवश्यकता इस बात की है कि हम कैसे भी हिंसक गतिविधियों को रोकें और अपने लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाएं। जनजातीय समाज इस पूरे युद्ध का सबसे बड़ा शिकार है। वे दोनों ओर से शोषण के शिकार हो रहे हैं। सही मायने में यह भारतीय लोकतंत्र की विफलता है कि हमने प्रकृति से आच्छादित सुंदर क्षेत्रों को रणक्षेत्र बना रखा है। ये इलाके जहां नीरव शांति, प्रेम, सहजता और सरल संस्कृति के प्रतीक थे आज अविश्वास,छल और मरने-मारने के खेल का हिस्सा बन गए हैं। सच तो यह है कि हमारी सरकारें माओवादी आतंकवाद के प्रति गंभीर नहीं है वे घटना होने के बयानबाजी के बाद फिर अपने नित्यकर्मों में लग जाती हैं। सही मायने में वे आतंकवाद से लड़ना नहीं चाहती हैं। उनमें इतना आत्मविश्वास नहीं बचा है कि वे देश के सामने उपस्थित ज्वलंत सवालों पर बात कर सकें। सरकारों का खुफिया तंत्र ध्वस्त है और पुलिस बल हताश। ऐसे में बस्तर जैसे इलाके एक खामोश मौत मर रहे हैं। यहां दिन-प्रतिदिन कठिन होती जिंदगी बताती है, ये युद्ध रूकने के आसार नहीं हैं। हिंसा और आतंक के खिलाफ खड़े हुए सलवा जूडुम जैसे आंदोलन भी अब खामोश हैं। माओवादी आतंक के खिलाफ एक प्रखर आवाज महेंद्र कर्मा अब जीवित नहीं हैं। माओवाद के खिलाफ इस इलाके में बोलना गुनाह है। कहीं कोई भी दादा लोगों (माओवादियों) का आदमी हो सकता है। पुलिस के काम करने के अपने अजीब तरीके हैं जिसमें निर्दोष ही गिरफ्त में आता है। न जाने कितने निर्दोष माओवादियों के नाम पर जेलों में हैं लेकिन माओवादी आंदोलन बढ़ रहा है क्योंकि सरकारें मान चुकी हैं यह युद्ध जीता नहीं जा सकता है। किंतु इस न जीते जाने युद्ध के चलने तक सरकार कितनी लाशों, कितनी मौतों, कितने जन-धन और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान के बाद मैदान में उतरेगी, कहना कठिन है।

सोमवार, 10 मार्च 2014

चुनावी समर में भाजपा की सोशल इंजीनिरिंग

-संजय द्विवेदी
 देश की हर पार्टी को यह हक है कि वह अपने सामाजिक और भौगोलिक विस्तार के न सिर्फ सपने देखे, बल्कि उसे हकीकत में बदलने के जतन भी करे। राष्ट्रीय रंगमंच पर जैसे-जैसे चुनावी गतिविधियां तेज हो रही हैं, भाजपा में अपने सामाजिक आधार के विस्तार की तड़प साफ दिख रही है। लगभग आधे भारत में अनुपस्थित भाजपा की समस्या यह है कि वृहत्तर हिंदू समाज की रहनुमाई का दम भरने वाली इस पार्टी के छाते के नीचे अभी भी एक बड़ा समाज नहीं है। खासकर दलितों ,आदिवासियों और पिछड़ों के बीच इसे अपनी स्थाई जगह अभी बनानी है। शायद इसी को भांपते हुए पार्टी ने ताबड़तोड़ ऐसे फैसले लिए हैं जिससे एक वातावरण बने कि भाजपा के छाते के नीचे वृहत्तर हिंदू समाज एकत्र तो हो ही रहा है और बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक भी उसके छाते के नीचे आ रहे हैं। पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह के मुसलमानों से माफी मांगने के बयान को इस रोशनी में देखा जा सकता है।
दलितों की जगहः भाजपा और संघ परिवार की लाख कोशिशों के बावजूद दलित नेतृत्व का अभाव पार्टी को हमेशा महसूस होता रहा है। सूरजभान, बंगारू लक्ष्मण सरीखे एकाध नेताओं को छोड़ दें तो भाजपा के दलित नेता राष्ट्रीय रंगमंच पर अपनी जगह नहीं बना पाए। वहीं दूसरे दलों से आए संघप्रिय गौतम जैसे नेता भी भाजपा में उस तरह रच-बस नहीं पाए कि वे दल को कोई शक्ति दे पाते। अब भाजपा ने इसकी तोड़ के लिए एक बार फिर जतन शुरू किए हैं। इंडियन जस्टिस पार्टी के नेता उदित राज को भाजपा में शामिल कर इस ओर एक बड़ा कदम उठाया है। संजय पासवान जैसे बिहार भाजपा के दलित नेता इस दिशा में निरंतर प्रयास कर रहे हैं। वे बाबा साहेब अंबेडकर से लेकर कांशीराम और जगजीवन राम के चित्र अपने कार्यालय में लगाकर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा दलितों के सवालों पर गंभीर है। यहां बौद्ध और हिंदु एकता के प्रयास भी देखे जा रहे हैं। जैसे भाजपा शासित मध्यप्रदेश में बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना कर वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बड़ा कदम उठाया है। जिससे दुनिया भर के बौद्ध धर्मावलंबी देश आकर्षित हुए हैं। बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना सांची(मप्र) में करने का एक प्रतीकात्मक महत्व भी है। उदित राज भी एक ऐसे नेता हैं जो हिंदु समाज की तमाम रीति-नीति पर सवाल खड़े करते हुए बौद्ध बन गए थे। उनका भाजपा में आना एक संकेत जरूर है कि राजनीति में बदलाव आ रहा है। भाजपा का दिल भी बड़ा हो रहा है और उसमें अन्य विचारों के लिए भी जगह बन रही है। इसी प्रकार महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया के नेता रामदास आठवले आज राजग गठबंधन के एक बड़े नायक बन चुके हैं। भाजपा ने अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर के स्थान पर उन्हें समर्थन देकर राज्यसभा में भेजा है। जाहिर तौर पर भाजपा की यह उदारता अकारण नहीं है। वह अपने सामाजिक विस्तार की पीड़ा में बहुत से कदम उठाते हुए, ज्यादा सरोकारी और ज्यादा व्यापक बनने की कोशिशों में लगी है। इसी तरह रामविलास पासवान की पार्टी को सप्रयास राजग में लाना साधारण नहीं है। इस फैसले से बिहार के राजनीतिक समीकरणों में अकेली पड़ी भाजपा को जहां राहत मिलेगी, वहीं दलितों के बीच एक राष्ट्रीय अपील भी बनेगी। इसमें दो राय नहीं कि देश में मायावती, रामविलास पासवान, रामदास आठवले और उदितराज ऐसे नाम हैं, जिन्हें दलित नेता के नाते जाना-पहचाना जाता है। इनमें मायावती को छोड़कर तीनों आज राजग और भाजपा के मंच पर हैं।हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे कुलदीप विश्नोई के साथ गठबंधन बना हुआ है। इसी तरह तमिलनाडु में वायको का साथ आना भी भाजपा की राजनीति को सफल बनाता है। जयललिता के तीसरे मोर्चे के मंच पर जाने से भाजपा का अकेलापन तमिलनाडु में वायको निश्चित ही भरने में सफल होंगें। वैसे भी वे वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके हैं।

पिछड़े वर्ग के प्रधानमंत्री का नाराः भाजपा लंबे समय तक पिछड़ों में लोकप्रिय रही है। किंतु 1990 के बाद हुए सामाजिक बदलावों ने भाजपा को काफी पीछे छोड़ दिया। पूरा उत्तर भारत सामाजिक न्याय की शक्तियों की लीलाभूमि बन गया, जिसमें समाजवादी विचारधारा से आने वाले पिछड़े वर्गों के अनेक नेता प्रभावी हो गए।  वहीं रही सही कसर भाजपा के कल्याण सिंह, उमा भारती जैसे नेताओं की नाराजगी ने पूरी कर दी। इससे सबक लेकर भाजपा ने पहले अपने नाराज नेताओं को मनाया और आज कल्याण सिंह व उमा भारती दोनों पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में पुनः दल में शामिल हो चुके हैं। वहीं उप्र में स्व.सोनेलाल पटेल जो अपना दल बनाकर कुर्मियों में खास आधार रखते थे, की बेटी अनुप्रिया पटेल का समर्थन भाजपा ने हासिल कर लिया है। बिहार में कुशवाहा समाज के प्रमुख नेता  उपेंद्र कुशवाहा का तालमेल भी भाजपा से हो चुका है।इसके साथ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछड़ा वर्ग से आने के कारण मिलने वाले लाभ पर भी भाजपा की नजर है। मोदी अपने भाषणों में अपनी जाति और काम (चाय बेचना) दोनों की याद दिलाना नहीं भूलते हैं। निश्चित ही इसके अपने अर्थ हैं और यह नाहक कही जा रही बात तो कतई नहीं है। पिछले चुनाव में भी भाजपा ने उप्र में अजीत सिंह के साथ तालमेल किया था, किंतु सत्ता आते ही वे कांग्रेस के गठबंधन में शामिल हो गए। इस बार भाजपा अपने साथियों के चुनाव में सर्तकता तो बरत रही है किंतु वह इस चुनाव को लेकर खासी गंभीर भी है। दो चुनावों की हार ने उसके आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया है, यही कारण है उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, मप्र की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती,कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीएस येदुरप्पा, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल जैसे तमाम नेताओं को साथ लेकर वह परिवार की एकता और पिछड़ा वर्गों के नेतृत्व की एकजुटता का संदेश देना चाहती है। आज देश में उसके पास कर्ई पिछड़ा वर्ग के नेता हैं जो उसका आधार बढ़ाने में सहायक हैं। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, बिहार के नेता प्रतिपक्ष सुशील कुमार मोदी जैसे चेहरे भाजपा को राहत देते नजर आते हैं। भाजपा की इस सोशल इंजिनियरिंग में अकेले झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी शेष हैं। बाकी अपने सारे बागियों को भाजपा अपने मंच पर वापस ला चुकी है। यह साधारण नहीं है कि भाजपा से बगावत करने वाले ज्यादातर बड़े नेताओं में आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्ग के नेता ही शामिल थे। इस पर भाजपा को विश्लेषण करने की जरूरत है कि आखिर वह क्या कारण है कि पार्टी इन वर्गों के नेताओं की शक्ति और जनाधार का सही उपयोग नहीं कर पाती और वे बगावत की सीमा तक चले जाते हैं। कल्याण सिंह, उमा भारती, बाबूलाल मरांडी, प्रहलाद पटेल, वीएस येदुरप्पा, शंकर सिंह बाधेला, केशूभाई पटेल जैसे तमाम नाम इसी परंपरा में आते हैं। भाजपा में मोदी युग का आरंभ होने के बाद एक बार फिर बिखरा भाजपा परिवार एक हो रहा है। देखना है कि यह एकता और नए समीकरण चुनाव को किस तरह प्रभावित करते हैं।

शनिवार, 7 अगस्त 2010

कश्मीरः कब पिघलेगी बर्फ


-संजय द्विवेदी
इन्तहा हो गई है, कश्मीर एक ऐसी आग में झुलस रहा है, जो कभी मंद नहीं पड़ती । आजादी के छः दशक बीत जाने के बाद भी लगता है कि सूइयां रेकार्ड पर ठहर सी गयी हैं। समस्या के समाधान के लिए सारी ‘पैथियां’ आजमायी जा चुकी हैं और अब वर्तमान प्रधानमंत्री ‘प्राकृतिक चिकित्सा’ से इस लाइलाज बीमारी का हल करने में लगे हैं। ‘जाहिर है मामला ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के सवालों जैसा आसान नहीं है, कश्मीर में आपकी सारी ‘लाइफ लाइन्स’ मर चुकी हैं और अब कोई ऐसा सहारा नहीं दिखता जो इसके समाधान की कोई सीधी विधि बता सके।
यह बात बुरी लगे पर मानिए कि पूरी कश्मीर घाटी में आज भारत की अपनी आवाज कहने और उठाने वाले लोग न्यूनतम हो गए हैं । आप सेना के भरोसे कितना कर सकते हैं, या जितना कर सकते हैं-कमोबेश घाटी उतनी ही देर तक आपके पास है। यहां वहां से पलायन करती हिंदू पंडितों की आबादी के बाद शेष बचे मुस्लिम समुदाय की नीयत पर कोई टिप्पणी किए बिना इतना जरूर जोड़ना है कश्मीर में गहरा आए खतरे के पीछ सिर्फ उपेक्षा व शोषण नहीं है। ‘धर्म’ के जुनून एवं नशे में वहां के युवाओं को भटकाव के रास्ते पर डालने की योजनाबद्ध रणनीति ने भी हालात बदतर किए हैं, पाकिस्तान का पड़ोसी होना इस मामले में बदतरी का कारण बना । ये सब स्थितियां चाहे वे भौगोलिक, आर्थिक व सामाजिक हों, मिलकर कश्मीर का चेहरा बदरंग करती हैं। लेकिन सिर्फ विकास व उपेक्षा को कश्मीर से उठती अलगावादी आवाजों का कारण मानना समस्या को अतिसरलीकृत करके देखना है। बंदूक से समस्याएं नहीं सुलझ सकतीं, विकास नहीं आ सकता, लेकिन ‘इस्लाम का राज’ आ सकता है-समस्या के मूल में अंशतः सही, यह भावना जरूर है। अगर यह बात न होती तो पाकिस्तान के शासकों व दुनिया के जघन्यतम अपराधी लादेन की कश्मीरियों से क्या हमदर्दी थी ? भारत के खिलाफ कश्मीर की युवाशक्ति के हाथ में हथियार देने वाले निश्चय ही एक ‘धार्मिक बंधुत्व भाव व अपनापा’ जोड़कर एक कश्मीरी युवक को अपना बना लेते हैं। वहीं हम जो अनादिकाल से एक सांस्कृतिक परंपरा व भावनात्मक आदान-प्रदान से जुड़े हैं, अचानक कश्मीरियों को उनका शत्रु दिखने लगते हैं। लड़ाई यदि सिर्फ कश्मीर की, उसके विकास की, वहां के नौजवानों को काम दिलाने की थी तो वहां के कश्मीरी पंडित व सिखों का कत्लेआम कर उन्हें कश्मीर छोड़ने पर विवश क्यों किया गया ? जाहिर है मामला धर्मांधता से प्रेरित था। उपेक्षा के सवाल नारेबाजी के लिए थे, निशाना कुछ और था। इसलिए यह कहने में हिचक नहीं बरतनी चाहिए कि सेना के अलावा आज घाटी में ‘भारत माँ की जय’ बोलने वाले शेष नहीं रह गए हैं। जिन लोगों की भावनाएं भारत के साथ जुड़ी हैं, वे भी कुछ मजबूरन-कुछ मसलहतन जुबां पर ताले लगाकर खामोश हैं। मंत्री भयभीत हैं, अफसरान दहशत जदा हैं, आतंक का राज जारी है।इन हालात में प्रधानमंत्री कश्मीर में ‘अमन का राज’ लाना चाहते हैं । लेकिन क्या इस ‘शांति प्रवचन’ से पाकिस्तान और लश्कर के गुंडे कश्मीर में आतंक का प्रसार बंद देंगे। आंखों पर पट्टी बांधकर जुनूनी लड़ाई लड़ने वाले अपने हथियार फेंक देंगे। जाहिर है ये बातें इतनी आसान नहीं दिखतीं । जब तक सीमा पार से आतंकवाद का पोषण नहीं रुकेगा, कश्मीर की समस्या का समाधान सोचना भी बेमानी है। कश्मीर की भौगोलिक स्थितियां ऐसी हैं कि घुसपैठ को रोकना वैसे भी संभव नहीं है। अन्य राष्ट्रों से लगी लंबी सीमा, पहाड़ और दर्रे वहां घुसपैठ की स्थितियों को सुगम बनाते हैं। पाक व तालिबान की प्रेरणा व धन से चल रहे कैंपों से प्रशिक्षित उग्रवादी वहां के आंतकवाद की असली ताकत हैं। सरकार को इन हालात के मद्देनजर ‘आतंकवादी संगठनों’ की कृपा पाने के बजाए उनके प्रेरणास्त्रोतों पर ही चोट करनी होगी, क्योंकि जब तक विदेशी सहयोग जारी रहेगा, यह समस्या समाप्त नहीं हो सकती । हुर्रियत या अन्य कश्मीरी संगठनों से वार्ता कर भी ये हालात सुधर नहीं सकते, क्योंकि हुर्रियत अकेली न कश्मीरियों की प्रतिनिधि है, न ही उसकी आवाज पर उग्रवादी हथियार डालने वाले हैं। जाहिर है समस्या को कई स्तरों पर कार्य कर सुलझाने की जरूरत है। सबसे बड़ी चुनौती सीमा पर घुसपैठ की है और हमारे युवाओं के उनके जाल में फंसने की है-यह प्रक्रिया रोकने के लिए पहल होनी चाहिए। आबादी का संतुलन बनाना दूसरी बड़ी चुनौती है। कुछ मार्ग निकालकर घाटी के क्षेत्रों में भूतपूर्व सैनिकों को बसाया जाना चाहिए तथा कश्मीर पंडितों की घर वापसी का माहौल बनाना चाहिए। कश्मीर युवकों में पाक के दुष्प्रचार का जवाब देने के लिए गैरसरकारी संगठनों को सक्रिय करना चाहिए। उसकी सही तालीम के लिए वहां के युवाओं को देश के विभिन्न क्षेत्रों में अध्ययन के लिए भेजना चाहिए ताकि ये युवा शेष भारत से अपना भावनात्मक रिश्ता महसूस कर सकें। ये पढ़कर अपने क्षेत्रों में लौटें तो इनका ‘देश के प्रति राग’ वहां फैले धर्मान्धता के जहर को कुछ कम कर सके। निश्चय ही कश्मीर की समस्या को जादू की छड़ी से हल नहीं किए जा सकता। कम से कम 10 साल की ‘पूर्व और पूर्ण योजना’ बनाकर कश्मीर में सरकार को गंभीरता से लगना होगा। इससे कम पर और वहां जमीनी समर्थन हासिल किए बिना, ‘जेहाद’ के नारे से निपटना असंभव है। हिंसक आतंकवादी संगठन अपना जहर वहां फैलाते रहेंगे-आपकी शांति की अपीलें एके-47 से ठुकरायी जाती रहेंगी। समस्या के तात्कालिक समाधान के लिए कश्मीर का 3 हिस्सों में विभाजन भी हो सकता है। कश्मीर लद्दाख और जम्मू 3 हिस्सों में विभाजन के बाद सारा फोकस ‘कश्मीर’ घाटी के करके वहां उन्हीं विकल्पों पर गौर करना होगा, जो हमें स्थाई शांति का प्लेटफार्म उपलब्ध करा सकें वरना शांति का सपना, सिर्फ सपना रह जाएगा। जमीन की लड़ाई लड़कर हमें अपनी मजबूती दिखानी होगी होगी तो कश्मीरियों का हृदय जीतकर एक भावनात्मक युद्ध भी लड़ना । भटके युवाओं को हम भारत-पाकिस्तान का अंतर समझा सके तो यह बात इस समस्या की जड़ को सुलझा सकती है। सच्चे मन से किए गए प्रयास ही इस इलाके में जमी बर्फ को पिघला सकते हैं। यही बात कश्मीर की ‘डल झील’ और उसमें चलते ‘शिकारों’ पर फिर हंसी-खुसी और जिंदगी को लौटा सकती है। हवा से बारुद की गंध को कम कर सकती है और फिजां में खुशबू घोल सकती है।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

मैदानों में सना कीचड़

-संजय द्विवेदी

खेल और खेल उत्सव दोनों अब इतने पवित्र नहीं रहे कि उनसे बहुत नैतिक अपेक्षाएं पाली जाएं। हाकी के खिलाड़ियों के यौन उत्पीड़न को लेकर जो खबरें सामने आई हैं उसमें नया कुछ भी नहीं हैं। ये चीजें तभी सामने आती हैं जब इसमें कोई एक पक्ष विरोध में उतरता है या कोई किसी के पीछे पड़ जाए। यह दरअसल एक नैतिक सवाल भी है कि हम अपनी महिला खिलाड़ियों को इन वहशियों के हाथों में जाने से कैसे बचा सकते हैं, जबकि वे प्रमुख निर्णायक पदों पर हों। वह भी तब जबकि समर्पण पर पुरस्कार और स्वाभिमान दिखाने पर तिरस्कार मिलना तय हो। निर्णायक पदों पर बैठे पुरूष ही इन लड़कियों के भाग्य विधाता होते हैं। सवाल जब कोच जैसे पद का हो तो उसकी महिमा और बढ़ जाती है। एक मानवीय कमजोरी के नाते किसी का विचलित हो जाना स्वाभाविक है किंतु इसे एक चलन बना लेना और नैतिकता की सीमाओं को लांधकर महिलाओं के शोषण का कुचक्र रचना तो उचित नहीं कहा जा सकता। किंतु यह हो रहा है और हम इसे देखते रहने के लिए विवश हैं। सवाल यह भी है कि जो लड़की इन घटनाओं का विरोध करते हुए आगे आती है उसके साथ हमारा व्यवहार क्या होता है। क्या वह आगे के जीवन में सहज होकर इन मैदानों में खेल सकती है? अधिकारी वर्ग उसके प्रति एक शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण नहीं अपना लेता होगा ? और उसे अंततः मैदान से बाहर धकेलने की कोशिश क्या नहीं की जाती होगी ? क्योंकि उसने पुरूष सत्ता को चुनौती दी होती है।
अपने कोच और खेल अधिकारियों के खिलाफ जाना किसी भी खिलाड़ी के साधारण नहीं होता। वह तभी संभव होता है जब पानी सर से उपर जा चुका हो। आज हाकी पर जिस तरह के घिनौने आरोप हैं उससे मैदान तो गंदा हुआ ही है, आने वाली पीढ़ी को भी लोग मैदानों में भेजने में संकोच करेंगें। महिला हाकी वैसे ही इस देश में एक उपेक्षित खेल है। ऐसी घटनाओं के बाद वहां कौन सी रौनक लौट पाएगी,कहा नहीं जा सकता। अगर एक महिला खिलाड़ी अपने मुख्य कोच पर सेक्स उत्पीड़न के आरोप लगाती है तो शक की पूरी वजह है। कोच अपने को निर्दोष भले बता रहे हों किंतु जब महिला हाकी की एक पूर्व कप्तान हेलेन मेरी यह कहती हैं कि चार साल पहले उन्हें भी इस कोच के चलते ही हाकी छोड़नी पड़ी थी तो कहने को क्या रह जाता है। अब जबकि महिला आयोग भी इस मामले में दिलचस्पी ले रहा है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि कुछ सही निष्कर्ष और समाधान भी सामने आएंगें।
इसके साथ ही एक वृहत्तर प्रश्न यह भी उठता है कि हम अपने खेलों को सेक्स के साथ जोड़कर उसके उत्सवधर्म को एक बेहदूगी क्यों बना रहे हैं। इस पर भी सोचना जरूरी है। हमने देखा कि खेलों के उत्सवों में आज लड़कियां, वेश्याएं, शराब और अश्लील पार्टियां एक जरूरी हिस्सा हो गए हैं। इससे कौन सा खेल धर्म पुष्ट हो रहा है सोचना मुश्किल है। औरत की देह इस समय खेल प्रबंधकों और इलेक्ट्रानिक मीडिया का सबसे लोकप्रिय विमर्श है । खेल उत्सव, सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को ध्वस्त कर दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चेनलों से आगे अब वह सभी संचार माध्यमों पर पसरा हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक मोबाइल पर अश्लीलता का कारोबार भी पांच सालों में 5अरब डॉलर तक जा पहुंचेगा । यह पूरा हल्लाबोल 24 घंटे के चैनलों के कोलाहल और अन्य संचार माध्यमों से दैनिक होकर जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। शायद इसीलिए इंटरनेट के माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 60 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है। मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति दी है। इस पूरे वातावरण को इलेक्ट्रानिक टीवी चेनलों ने आंधी में बदल दिया है। इंटरनेट ने सही रूप में अपने व्यापक लाभों के बावजूद सबसे ज्यादा फायदा सेक्स कारोबार को पहुँचाया । पूंजी की ताकतें सेक्सुएलिटी को पारदर्शी बनाने में जुटी है। मीडिया इसमें उनका सहयोगी बना है, अश्लीलता और सेक्स के कारोबार को मीडिया किस तरह ग्लोबल बना रहा है इसका उदाहरण विश्व कप फुटबाल बना। मीडिया रिपोर्ट से ही हमें पता चला कि वेश्यालय इसके लिए तैयार हुए और दुनिया भर से वेश्याएं वहाँ पहुंचीं।कुछ विज्ञापन विश्व कप के इस पूरे उत्साह को इस तरह व्यक्त करते है ‘मैच के लिए नहीं, मौज के लिए आइए’ । दुनिया भर की यौनकर्मियों ने दक्षिण अफ्रीका के फुटबाल मैचों में एक अलग ही रंग भरा। खेलों में उत्साह भरने के लिए उसके प्रबंधक और मीडिया मिलकर जैसा वातावरण रच रहे हैं उसमें खेलों को गंदगी से मुक्त कराना कठिन है।
हमने देखा कि आईपीएल के खेलों में किस तरह चीयर लीर्डस का इस्तेमाल हुआ और रंगीन पार्टियों ने अलग का तरह शमां बांधे रखा। बाजार इसी तरह से हमारे हर खेल उत्सव को अपनी जद में ले रहा है और हम इसे देखते रहने के लिए विवश हैं। यही कारण है कि आईपीएल खेलों से ज्यादा उत्साह रात को होने वाली नशीली पार्टियों में दिखता था। इससे क्रिकेट को क्या मिला किंतु व्यापारी मालामाल हो गए और सेक्स के कारोबार को उछाल मिला। एक उपेक्षित खेल हाकी के एक अधिकारी की रातें अगर इतनी रंगीन हैं तो क्रिकेट जैसे खेल के अधिकारियों और आईपीएल के अधिकारियों की शामों का अंदाजा लगाया जा सकता है। एक माह तक चले आईपीएल खेलों के लिए ढाई सौ चीयर लीडर्स की मौजूदगी यूं ही नहीं थी। इसके साथ ही हजार से ज्यादा यौनकर्मी विभिन्न शहरों से खास मेहमानों के स्वागत के लिए मौजूद रहती थीं। यही हाल और नजारे जल्दी ही दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों में दिखने वाले हैं। दिल्ली में अक्टूबर में होने जा रहे इन खेलों के लिए भी देह की मंडी सजने जा रही है। दुनिया भर से वेश्याएं यहां पहुंचेगीं और कई एस्कार्ट कंपनियां करोंड़ों का कारोबार करेंगीं। यूक्रेन,उजबेकिस्तान, अजरबेजान, चेचन्या, किर्गीस्तान, फिलीपींस जैसे देशों से तमाम यौनकर्मियों के आने की खबरें हैं। ऐसे हालात में हमारे पास इसे रोकने के कोई इंतजाम नहीं है। खेल प्रबंधकों, मीडिया प्रबंधकों और हमारी सरकारों की साझा युति से ये काम चलते आए हैं और चलते रहेंगें। मैदान से लेकर मैदान के बाहर खेलों का पूरा तंत्र ही उसे कलुषित करने की तैयारी है। जिसमें औरतें सबसे आसान शिकार हैं चाहे वे खिलाड़ी के रूप में या चीयर लीर्डस के रूप में या धन कमाने के लिए आई यौनकर्मी के रूप में। भारत जैसे देश में जहां ऐसे कामों को सामाजिक तौर पर स्वीकृति नहीं है वहां इसमें रोमांच और बढ़ जाता है। किंतु चिंता की बात यही है कि हमारे खेल प्रबंधकों को यह सोचना होगा कि अगर ऐसे ही हालात रहे तो क्या हम मैदानों में अपने परिवार के बच्चों को खेलते हुए देखना चाहेंगें। इसलिए भारतीय महिला हाकी टीम के ही बहाने जो बातचीत शुरू हुई है उसे निष्कर्ष तक पहुंचाना और दोषियों को दंडित करना जरूरी है। वरना फिल्मों के कास्टिंग काउच की तरह हमारे खेलों के मैदान भी ऐसे ही कीचड़ से सने हुए दिखेंगें।

शुक्रवार, 18 जून 2010

नहीं संभले तो यह कालिख हमें ले डूबेगी


पेड न्यूज के सवाल पर चुनाव आयोग के रूख का स्वागत कीजिए

सच मानिए यह कालिख हमें ले डूबेगी। पेड न्यूज की खबरों ने जितना और जैसा नुकसान मीडिया को पहुंचाया है, उतना नुकसान तो आपातकाल में घुटने टेकने पर भी नहीं हुआ था। चुनावी कवरेज के नाम पर यह एक ऐसी लूट थी जिसमें हम सब शामिल थे। इस लूट ने हमारे सिर शर्म से झुका दिए थे। नौकरी की मजबूरियों में खामोश पत्रकार भी अंदर ही अंदर बिलबिला रहे थे। पर हमारे मालिकों की बेशर्मी ऐसी कि एक ने कहा कि “सबको दर्द इसलिए हो रहा है कि पैसा हिंदी वालों को मिला। ” इस गंदे पैसे से हिंदी की सेवा करने के लिए आतुर इन महान मालिकों से किसने कहा कि वे राष्ट्रभाषा में अखबार निकालें। कोई और काम या व्यापार करते हुए, जाकर उन्हीं नेताओं से पैसे मांगकर देखें, जो मजबूरी में मालिक संपादकों को सिर पर बिठाते हैं। एक बार अखबार का विजिटिंग कार्ड न होगा तो सारे काले-पीले काम बंद हो जाएंगे, यह तो उन्हें जानना ही चाहिए। अपनी विश्वसनीयता और प्रामणिकता को दांव को लगाकर सालों से अर्जित भाषाई पत्रकारिता के पुण्य पर पेड न्यूज का ग्रहण जितनी जल्दी हटे बेहतर होगा। शायद इसीलिए चुनाव आयोग ने पेड न्यूज पर मचे बवाल पर चिंता जताते हुए यह तय किया है कि अब आयोग ऐसे विज्ञापनों की निगरानी करेगा।
पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पेड न्यूज का मुद्दा खासा विवादों में आया था जब तमाम समाचार पत्र समूहों और टीवी चैनलों ने मोटी रकम उम्मीदवारों से लेकर उनके पक्ष में समाचार छापे और दिखाए थे। हालात यह थे कि पैसे के आधार पर छपी खबरों में यह पहचानना मुश्किल था कि कौन सा समाचार है और कौन सा विज्ञापन। यह बहुत राहत देने की बात है कि इसके खिलाफ मीडिया से जुड़े लोगों ने ही आवाज उठायी और इसे एक बड़े संकट के रूप में निरूपित किया। हमारे समय के बड़े पत्रकार स्वा. प्रभाष जोशी इस विषय पर पूरे देश में अलख जागते हुए ही विदा हुए। जाहिर तौर पर यह एक ऐसी प्रवृत्ति थी जिसका विरोध होना ही चाहिए। क्योंकि आखिर जब छपे हुए शब्दों की विश्वसनीयता ही नहीं रहेगी तो उसका मतलब क्या है। ऐसे में तमाम राजनेता, पत्रकार, समाजसेवी, बुद्धिजीवी इस चलन के खिलाफ खड़े हुए। सत्ता और मीडिया के बीच बहुत सरस संबंधों से वैसे भी सच कहीं दुबक कर रह जाता है। भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव पर भी अगर हमारे अखबार झूठ की बारिश करेंगें तो पत्रकारिता की शुचिता, पवित्रता और प्रामणिकता कहां बचेगी। ऐसे कठिन समय में चुनाव आयोग का इस तरफ ध्यान देना बहुत स्वाभाविक था। आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यचुनाव अधिकारियों को दिए अपने निर्देश में जिला निर्वाचन अधिकारियों से इस मामले में मीडिया पर कड़ी नजर रखने को कहा है।आयोग ने कहा कि जिले में प्रसारित और प्रकाशित होने वाले सभी समाचार पत्रों की कड़ी जांच पड़ताल के लिए चुनाव की धोषणा होते ही जिला स्तरीय समितियों का गठन जिला निर्वाचन अधिकारी कर सकते हैं। ताकि न्यूज कवरेज की आड़ में प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों का पता लगाया जा सके। चुनाव आयोग ने यह भी व्यवस्था दी है कि जिला निर्वाचन अधिकारियों को करीब से प्रिंट मीडिया में जारी होने वाले विज्ञापनों पर नजर रखनी चाहिए जिनमें समाचार के रूप में छद्म विज्ञापन हों और जहां जरूरत हो उन मामलों में उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को नोटिस दिए जाएं ताकि इस मद में आने वाला खर्च संबंधित उम्मीदवार या पार्टी के चुनाव खर्च में डाला जा सके। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को हाल में ही उनके खिलाफ पेड न्यूज के एक मामले में नोटिस दिया गया था। चुनाव आयोग की यह सक्रियता बताती है उसका इन खतरों की तरफ ध्यान है और वह चुनावों को साफ-सुथरे ढंग से कराने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे में हमारे राजनेता, राजनीतिक दलों और मीडिया समूहों तीनों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। स्वच्छ चुनावों के लिए हमारे राजनेताओं की प्रतिबद्धता के बिना प्रयास सफल न होंगें। देश के मीडिया ने तमाम राष्ट्रीय प्रश्नों पर अपनी सकारात्मक भूमिका का निर्वहन किया है। उसके सचेतन प्रयासों से लोकतंत्र के प्रति जनविश्वास बढ़ा है।
ऐसे में पेड न्यूज की विकृति स्वयं मीडिया के प्रति जनविश्वास का क्षरण करेगी। ऐसे में मीडिया समूहों को स्वयं आगे आकर अपनी प्रामणिकता और विश्वसनीयता की रक्षा करनी चाहिए। ताकि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को इस तरह के नियमन की जरूरत ही न पड़े। उम्मीद है मीडिया के हमारे नियामक इन बदनामियों से नाम कमाने के बजाए पूंजी अर्जन के कुछ नए रास्ते निकालेंगे। हमारे लोकतंत्र को नेताओं ने लोकतंत्र को लूटतंत्र में बदल दिया है, किंतु इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि नेताओं की लूट में मीडिया का भी हिस्सा है। मीडिया ने यह समझा कि नेताजी काफी कमाया है सो उस लूट के माल में हमारा भी हिस्सा है। जाहिर तौर पर इस लूट में शामिल होने के बाद आप नैतिकता और समाज के पहरूए की भूमिका खो देते हैं। मीडिया को किसी कीमत पर यह छूट नहीं दी जानी कि वह किसी तरह की सरकारी या गैर सरकारी लूट का हिस्सा बने। अगर मीडिया के मालिक ऐसा करते हैं तो वे सालों-साल से अर्जित पुण्यफल का क्षरण ही कर रहे हैं और ऐसे आचरण से उनके अखबार पोस्टर में बदल जाएंगें। उन्हें जो जनविश्वास अर्जित है उसका क्या होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारा मीडिया नई लीक पर चल अपने आत्मविश्वास को न खोते हुए अपनी आत्मनिर्भरता के लिए नए रास्ते तलाशेगा ताकि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को इस तरह के नियमन की जरूरत न पड़े। ताकि मीडिया को लोकतंत्र को मजबूत करने वाली संस्था के रूप में देखा जाए न की लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने वाले माध्यम के रूप में उसे आरोपित किया जाए। बेहतर होगा कि मीडिया सत्ता और सत्ता और राजनीति के साथ आलोचनात्मक विमर्श का रिश्ता बनाए, क्योंकि यही बात उसके पक्ष में है और उसकी प्रामणिकता को बचाए व बनाए रखने में सहायक भी।

गुरुवार, 28 मई 2009

छत्तीसगढ़ में इस तरह तो नहीं खड़ी होगी कांग्रेस


छत्तीसगढ़ में कांग्रेस रसातल की ओर जा रही है लेकिन इसे रोकने के किसी प्रयास के लिए आलाकमान तैयार नहीं दिखता। 4 लोकसभा सीटों वाले हिमाचल प्रदेश में एक सीट पाकर दो कैबिनेट मंत्री बनाने वाली कांग्रेस को 11 सीटों वाले छत्तीसगढ़ की याद नहीं आयी। हिमाचल से जीते एकमात्र लोकसभा सदस्य वीरभद्र सिंह और राज्यसभा के सदस्य आनंद शर्मा को मंत्रिमंडल में जगह दी गयी है किंतु छत्तीसगढ़ से जीते एकमात्र सांसद के लिए मंत्रिमंडल में जगह नहीं है। उल्लेखनीय है कि चरणदास महंत कोरबा से जीतने वाले कांग्रेस के एकमात्र लोकसभा सदस्य हैं। यही कहानी पिछली लोकसभा में भी दुहराई गयी जब अजीत जोगी को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। बाद में हुए लोकसभा के उपचुनाव में देवब्रत सिंह राजनांदगांव से चुनाव जीते, दोनों सांसदों को दिल्ली की सरकार में कोई मौका नहीं दिया गया।

याद करें भाजपा की एनडीए सरकार को जिसने छत्तीसगढ़ से लगातार दो मंत्री केंद्र में बनाए रखे। रायपुर के सांसद रमेश बैस और राजनांदगांव से जीते डा. रमन सिंह दोनों को दिल्ली मंत्री बनाया गया। इसी तरह डा. सिंह के राज्य में आने के बाद दिलीप सिंह जूदेव को भी मंत्री पद दिया गया। लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं कर पायी। ऐसा क्यों हुआ इसका सीधा उत्तर भी किसी कांग्रेसी के पास नहीं है। राज्य की यह उपेक्षा निश्चित ही रेखांकित की जानी चाहिए। छत्तीसगढ़ एक नवसृजित राज्य है जहां विकास की अपार संभावनाएं देखी और महसूसी जा रही हैं किंतु कांग्रेस आलाकमान ने पिछले पांच साल से पार्टी को उपेक्षा से ही देखा है। बाकी कसर गुटों में बंटी पार्टी के नेताओं ने तोड़फोड़ मचाकर पूरी कर दी है।

राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी का लगभग हर गुट से पंगा है। आपस में लड़ते-झगड़ते कांग्रेसी किसी भी सवाल पर एकमत होने को तैयार नहीं है। इसके चलते राज्य में पार्टी का संगठन ध्वस्त हो गया है। जिन राहुल गांधी के नाम पर पूरे देश में इतनी ढोल पीटी जा रही है वही राहुल बस्तर में रैली करते हैं और बस्तर की 12 में 11 विधानसभा सीटें भाजपा जीत जाती है । एक सीट पर उसके विधायक कवासी लखमा कुल 200 सीटों से जीत पाते हैं। वह आदिवासी बहुल सीटें जिनपर भारी जीत दर्ज करवाकर छत्तीसगढ़ की सीटों की बदौलत कांग्रेस संयुक्त मप्र में अपनी सरकार बनाया करती थी उसकी इतनी बुरी हालत की वजह क्या है इसे सोचना होगा। राहुल गांधी के जिस करिश्मे पर दिल्ली में सरकार बनने की बात कही जा रही है वही राहुल छ्त्तीसगढ़ में इसी लोकसभा चुनाव में छः रैलियां करते हैं जिनमें राजनांदगांव, मरवाही, राजिम, रायगढ़, जांजगीर-चांपा, अम्बिकापुर शामिल हैx आपको बता दें कि इनमें से मरवाही के अलावा कांग्रेस को कहीं बढ़त नहीं मिली। यह भी जान लें कि मरवाही अजीत जोगी का चुनाव क्षेत्र है जहां कांग्रेस को पिछले दो विधानसभा चुनावों में क्रमशः 40 और 50 हजार वोटों की लीड मिली थी। इसी तरह श्रीमती सोनिया गांधी इस बार दो क्षेत्रों में सभाएं लेने पहुंची जिनमें कांकेर और बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र हैं, इन पर भाजपा जीती है। इस तरह का आकलन वैसे तो चीजों को अतिसरलीकृत करके देखने जैसा है किंतु यह उस प्रचार की पोल खोलता कि गांधी परिवार के चलते कांग्रेस को बड़ी सफलताएं मिल रही हैं। यदि ऐसा देश के संर्दभ में सच भी हो तो छत्तीसगढ़ में यह जादू क्यों नहीं चल रहा है इस पर कांग्रेस को जरूर सोचना चाहिए।

यह सिर्फ डा. रमन सिंह का करिश्मा है या इस हालत के लिए कांग्रेस आलाकमान खुद भी कोई जिम्मेदारी लेगा। इस खराब होते हालात को संभालने के लिए कोई हाथ आगे बढ़ता दिखाई नहीं देता। शायद यही कारण है कि पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी के नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, प्रदेश अध्यक्ष धनेंद्र साहू, विधानसभा में उपनेता रहे भूपेश बधेल, पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा चुनाव हार गए। इस लोकसभा चुनाव में भी अजीत जोगी की धर्मपत्नी रेणु जोगी बिलासपुर से, भूपेश बधेल रायपुर से, प्रदीप चौबे भाजपा में भारी बगावत के बावजूद दुर्ग से, राजनांदगांव से देवब्रत सिंह जैसे दिग्गज चुनाव हार गए। चरणदास महंत ने जरूर कोरबा की प्रतिष्ठापूर्ण सीट पर भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अटलविहारी वाजपेयी की भतीजी करूणा शुक्ला को चुनाव हराकर कांग्रेस की लाज रखी। बावजूद इसके लगता है कि आलाकमान की प्राथमिकताओं में छत्तीसगढ़ कहीं नहीं है वरना कांग्रेसी दिग्गज मोतीलाल वोरा भी राज्यसभा के सदस्य हैं उन्हें भी मौका देकर छत्तीसगढ़ को प्रतिनिधित्व दिया जा सकता था। राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने अपने छत्तीसगढ़ दौरों में लगातार आदिवासी समाज के प्रति अपने प्रेम का प्रगटीकरण किया था। किंतु इसे प्रकट करने के जो भी अवसर आए कांग्रेस ने इससे किनारा ही किया है। जाहिर तौर पर इस तरीके से तो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को कोई करिश्मा ही खड़ा कर सकता है। सकारात्मक परिणाम पाने के लिए सकारात्मक संदेश भी भेजने होते हैं किंतु कांग्रेस आलाकमान ने राज्य की कांग्रेस को उसके बुरे हाल पर छोड़ दिया है। दिल्ली से आने वाले केंद्रीय मंत्री अक्सर डा. रमन सिंह की सरकार की तारीफ करके चले जाते हैं और स्थानीय कांग्रेसजन इसे लेकर सिर पीटते रह जाते हैं किंतु ऐसा लगने लगा है कि वे अनायास ऐसा नहीं करते। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में कांग्रेस के पास अब सिर्फ अतीत की स्वर्णिम यादें हैं और बदहाल भविष्य,जिसे संवारने के लिए फिलहाल तो उसके पास कोई भागीरथ नहीं दिखता।

शुक्रवार, 22 मई 2009

रमन राज में रमी भाजपा

सत्ता और संगठन के तालमेल से रचा इतिहास
राजनीति में जब सारा कुछ इतना अस्थाई और क्षणभंगुर है तो आखिर छत्तीसगढ़ भाजपा और रमन सिंह का ऐसा क्या करिश्मा है कि जनता का प्यार एक स्थाई विश्वास में बदल गया है। वह क्या जादू है जिसने लगातार छः साल से राज्य की राजनीति में हर स्तर के हुए चुनावों में डा. रमन सिंह के प्रति अपना भरोसा जताया है। वह तब जब इस नवगठित राज्य का राजनीतिक अतीत इसे ऐसी आजादी नहीं देता। छत्तीसगढ़ के इस इलाके के भरोसे ही संयुक्त मध्यप्रदेश में कांग्रेस अपनी सरकारें बनाती रही। राज्य की पहली सरकार भी कांग्रेस ने बनाई। नेताओं और संगठन की नजर से भी कांग्रेस का इस इलाके में एक खास आधार रहा है। किंतु डा. रमन सिंह जिन्हें उनके सर्मथक राज्य के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में संबोधित करते हैं, की चुनावी सफलताएं पूरे देश में चर्चा का कारण बन गई हैं।
बावजूद इसके डा. रमन इन सफलताओं का श्रेय लेने के उत्सुक नहीं दिखते, उनकी यह विनम्रता ही उन्हें अपने समकालीन नेताओं के बीच यशस्वी बनाती है। वे राज्य में आज छः साल के बाद भी जनता के विश्वासभाजन बने हुए हैं। पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में जब वे पिछली लोकसभा के परिणामों को दोहराते हुए दिखते हैं तो यह लगता है कि यह सिर्फ संयोग और भाग्य का मामला नहीं है। वे हाल में ही विधानसभा के चुनावों में 50 सीटें जीते, अपने पिछले चुनाव में भी उनके पास 50 ही विधायक थे। यानि दोनों चुनावों में बराबर सीटें। इसी का दुहराव लोकसभा में हुआ, 10 सीटें 2004 में जीतीं तो 2009 में भी 10 सीटें जीतकर जनता ने उनका मान बनाए रखा है। यह एक गंभीर विश्लेषण का मामला है कि एक नवसृजित राज्य में जब जनआकाक्षाएं उफान पर होती हैं। लोग अपना राज्य हासिल करने के नाते सपनों में रंग भरने के लिए उतावले दिखते हैं। ऐसे में राजनीतिक नेतृत्व को कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ता है। रमन सिंह ने न सिर्फ ये परीक्षाएं पास की वरन विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण होते दिखते हैं। आज के दौर में जब राजनेताओं और राजनीति के सामने विश्वसनीयता का गंभीर संकट है ऐसे ये साधारण नहीं है कि उन्होंने जनता के मन में अपने लिए एक खास जगह बना ली है। उनका भोलापन, सज्जनता, विनम्रता, नक्सलवाद के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता, राज्य आदिवासी,वनवासी और गरीब वर्ग के प्रति ध्यान में रखकर बनाई गयी योजनाएं डा. रमन सिंह को एक ऐसे ब्रांड में बदलती है जो भरोसे का ब्रांड है। विकास जिसकी प्रतिबद्धता है और राज्य की बेहतरी जिसका सपना। रमन सिंह का यह ब्रांड यूं ही तैयार नहीं होता, भरोसा और सहजता उसकी यूएसपी (यूनिक सेलिंग प्वाइंट) हैं।

भरोसे से जीते कठिन मुकाबलेः
यह करिश्मा अनायास घटित नहीं होता। रमन सिंह आज सत्ता और संगठन के बीच समन्वय की मिसाल बन गए हैं। आमतौर पर सफलताएं व्यक्ति में अहंकार का सृजन करती हैं और वह श्रेय लेने की दौड़ में लग जाता है। छत्तीसगढ़ भाजपा और मुख्यमंत्री दोनों के बीच का समन्वय, एक-दूसरे को शक्ति देते हुए चलना ही आज जनविश्वास का आधार है। यही कारण है लोकसभा के इस चुनाव में जहां भाजपा हारती दिख रही थी, वहां से भी उसे संबल मिला, जनविश्वास मिली। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय, रायगढ़ की एक बेहद कठिन सीट पर मुकाबले में थे। जहां कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में बढ़त पायी थी। स्वंय श्री साय, पत्थलगांव सीट से चुनाव हार गए थे, यह संगठन का आत्मविश्वास ही कहा जाएगा कि उसने अपने अध्यक्ष को पुनः रायगढ़ से मैदान में उतरा और तमाम अटकलों को खारिज करते हुए विजयश्री भी दिलाई। ऐसा ही विश्वास दुर्ग लोकसभा क्षेत्र में देखने को मिला पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद रहे ताराचंद साहू की बगावत से एक बड़ी चुनौती सामने थी लेकिन तमाम बेसुरी अपीलों, नारेबाजियों में आने के बजाए जनता ने भाजपा पर भरोसा जताया और भाजपा प्रत्याशी सरोज पाण्डेय को विजय मिली। दुर्ग एक ऐसे मैदान में बदल गया था जहां भाजपा समर्थक वोटों में गहरा बंटवारा था ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक इस सीट को भाजपा के खाते से बाहर मानकर चल रहे थे, किंतु समय ने साबित किया कि संगठन की एकजुटता और जनविश्वास ही अंततः निर्णायक शक्ति है। यही हाल बिलासपुर सीट का था जहां दिलीप सिंह जूदेव के मुकाबले कांग्रेस के दिग्गज नेता की धर्मपत्नी श्रीमती रेणु जोगी मुकाबले में थीं। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद अजीत जोगी परिवार सभी चुनावों में विजयी रहा है। यह पहला चुनाव था जिसमें भाजपा संगठन ने अपने नेता दिलीप सिंह जूदेव को मैदान में उतार यह साबित किया कि वे राज्य के आज भी सबसे लोकप्रिय नेता हैं। इसके साथ ही उस मिथक को भी तोड़ दिया कि जोगी परिवार राज्य में अविजित है।

सत्ता और संगठन का अनोखा समन्वयः
छत्तीसगढ़ शायद उन राज्यों में है जहां उसके गठन से ही सत्ता और संगठन का रिश्ता बेहतर रहा है। स्व.कुशाभाऊ ठाकरे, गोविंद सारंग, लखीराम जी अग्रवाल,पंढ़रीराव कृदत्त, लरंग साय जैसे संगठनकर्ताओं की आत्मा आज निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ भाजपा का ऐसा विकास देखकर सुख पाती होगी। संगठन और सरकार के मतभेद आजतक किसी रूप में सामने नहीं आए। इसका श्रेय निश्चय ही राज्य भाजपा के पदाधिकारियों और सरकार के मुखिया डा. रमन सिंह को जाता है। लगातार चुनावों की जीत लोगों में अहंकार और श्रेय लेने की होड़ जगाती है किंतु यहां मुखिया मुख सो चाहिए खानपान में एक का मुहावरा साकार होता दिखता है। सर्वश्री सौदान सिंह, रामप्रताप सिंह का नेतृत्व पार्टी के लिए ऐसे अवसर में बदल गया है कि आज केंद्रीय नेतृत्व भी छत्तीसगढ़ भाजपा की ओर बहुत आशा भरी निगाहों से देखता है। शायद यही कारण है भाजपा के सामने विपक्षी दल बौने साबित हो रहे हैं। विधानसभा चुनावों जहां भाजपा को 50 सीटें मिली थीं वही इस लोकसभा चुनाव में उसे 61 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली है। यानि संगठन के सतत प्रयासों से सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ कायम ही नहीं है वरन लगातार बढ़ रहा है।
यूं नहीं होता करिश्माः
राजनीति में करिश्मे यूं ही घटित नहीं होते इसके एक लंबी रणनीति और साधना की जरूरत होती है। छत्तीसगढ़ भाजपा के कार्यकर्ताओं की मेहनत और संगठन की रणनीति को रेखांकित किए बिना इस करिश्मे को समझना आसान नहीं है। यह बात लगभग मानी हुय़ी है कि डा. रमन सिंह स्वभाव से बहुत प्रचारप्रिय नहीं हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते उनपर मीडिया फोकस रहता है किंतु वे स्वयं के प्रयास से प्रचारित होने का जतन करने वाले लोंगों में नहीं है। किंतु यह सौभाग्य ही कहा जाएगा कि उन्हें एक संगठन,ऐसा राज्य और ऐसी जनता मिली है जो उनकी इस सादगी, सदभाव भरे व्यवहार को बहुत पसंद करती है। वे इसीलिए आज अपने समकालीन नेताओं में सबसे आगे दिखने लगे हैं। छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहां की जनता बेहद सीधी-साधी, सदभाव से रहने वाली, बहुत प्रतिक्रिया न करते हुए आत्मसंतोष भरा जीवन जीने वाली है, साथ ही साथ निवासियों में धार्मिक भावना भी बहुत है। ऐसे लोगों को राजनीति के आज के छल-छद्म से अलग ऐसा नेतृत्व मिला जिसका आचरण राज्य की तासीर से मेल खाता है। डा. रमन सिंह की सफलता और जनता के उनपर भरोसे को इस नजर से भी देखा जाना चाहिए। इस भरोसे को आगे बढ़ाने में संगठन की रणनीति काम आयी। संगठन ने सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उसके परिणाम जाहिर तौर पर लाभकारी साबित हुए।

काम आई विकास की राजनीतिः
एक नया राज्य होने के कारण आम जन की आकांक्षाएं उफान पर थीं। संसाधनों की विपुलता के बावजूद एक पिछड़े क्षेत्र का तमगा इस इलाके पर लगा था। राज्य की सत्ता में आने के बाद भाजपा और उसके मुख्यमंत्री ने विकास को अपना एजेंडा बनाया। भावनात्मक नारेबाजी से अलग काम करने वाली सरकार का तमगा हासिल करने के लिए सरकार जुटी। सबसे पहले तो गरीब सर्मथक योजनाओं के माध्यम से सरकार ने जनता को भरोसा दिलाया कि आखिरी पंक्ति में खड़े लोग उसके एजेंडे में सबसे पहले हैं। तीन रूपए किलो चावल से लेकर आज अंत्योदय कार्ड पर एक रुपए किलो चावल एक ऐसी ही योजना साबित हुयी जिसने डा. रमन सिंह को चाउरवाले बाबा का प्यारा संबोधन दिलाया। चावल की योजना को लागू करने के लिए सरकार और संगठन ने एक दिन में एक साथ छत्तीसगढ़ के एक जिले को छोड़कर सबमें कार्यक्रम आयोजित किए, जिसके तहत इन जिला केंद्रों पर भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं ने चावल योजना की शुरूआत की। एक साथ एक छोटे से राज्य में इतने स्थानों पर हुए आयोजन ने एक ही दिन में इस योजना को गांव-गांव तक लोकप्रिय बना दिया। मीडिया ने इस उत्सव को कारपोरेट बांबिग की संज्ञा दी। इसी तरह गांव चलो-घर-घर चलो अभियान के भाजपा के कार्यकर्ता लगभग 20 हजार गांवों तक पहुंचे। अपनी विकास योजनाओं की जानकारी दी और यूपीए सरकार के खिलाफ माहौल बनाया। आमतौर सत्ता हासिल करने के बाद सरकारी मशीनरी तो काम करती है पर संगठन बैठ जाता है किंतु राज्य भाजपा ने सत्तारूढ़ दल होने के बावजूद अभियान जारी रखे। इसी तरह ग्राम सुराज अभियान के माध्यम से सरकार जनता के पास पहुंची। मुख्यमंत्री जब औचक किसी गांव में उतरकर आमजनता की बातें सुनते हैं तो इससे जनविश्वास तो बहाल होता ही है, सरकारी योजनाओं की वास्तविकता का भी पता चलता है। इसके बाद विकास यात्रा नाम से जो कार्यक्रम चलाया गया,वह भी मूलतः सरकारी आयोजन था जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री ही नहीं उनके मंत्री भी अलग-अलग इलाकों में जाकर विकास योजनाओं की हकीकत मापते थे और जनता से सीधा संवाद करते थे। इससे जनता में एक काम करने और सतत संपर्क में रहने वाली सरकार की छवि तो बनी ही। विकास संचार के नए आयाम बने जिसमें जनता अपने नेता और सरकार से एक रिश्ता बना पा रही थी, सरकार को फीडबैक भी मिल ही रही थी। बाद में इस प्रयोग को इसी नाम से बिहार सरकार ने भी अपनाया। संसदीय सम्मेलनों के माध्यम से पार्टी काडर को जगाए और एकजुट रखने के प्रयास भी हुए। कुल मिलाकर सरकार एक काम करती हुई, भरोसा जगाती हुयी संस्था में बदलती नजर आयी,जिसके चलते भाजपा ने अपने परंपरागत वोट आधार से अलग भी अपना विस्तार किया। वह चाहे शहरी इलाके हों या सूदूर सरगुजा और बस्तर के वनवासी क्षेत्र। यह विस्तार भौगोलिक और सामाजिक दोनों था, जिससे पार्टी का आधार व्यापक होता नजर आ रहा है। शायद यही कारण है बहुजन समाज पार्टी जैसे दल बहुत ताकत झोंकने के बावजूद यहां बड़ी सफलताएं नहीं पा सके न ही कांग्रेस के स्टार प्रचारकों से पार्टी को बहुत मदद मिली। यही कारण है आज छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का संगठन काफी कमजोर हो गया है।

नक्सलवाद के खिलाफ प्रतिबद्धताः
नक्सलवाद के खिलाफ यह पहली ऐसी सरकार है, जो इतनी प्रखरता के साथ हर मोर्चे पर जूझ रही है। सिर्फ़ बढ़ती नक्सली घटनाओं का जिक्र न करें, तो राज्य सरकार की सोच नक्सलियों के खिलाफ ही रही है। डा. रमन सिंह की सरकार की इस अर्थ में सराहना ही की जानी चाहिए कि उसने राजकाज संभालने के पहले दिन से ही नक्सलवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबध्दता का ऐलान कर दिया था। राजनैतिक लाभ के लिए तमाम पार्टियां नक्सलियों की मदद और हिमायत करती आई हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। इन आरोपों-प्रत्यारोपों से अलग डा. रमन सिंह की सरकार ने पहली बार नक्सलियों को उनके गढ़ में चुनौती देने का हौसला दिखाया है। राज्य सरकार की यह प्रतिबध्दता उस समय और मुखर रूप में सामने आई, जब श्री ओपी राठौर राज्य के पुलिस महानिदेशक बनाए गए। डा. रमन सिंह और श्री राठौर की संयुक्त कोशिशों से पहली बार नक्सलवाद के खिलाफ गंभीर पहल देखने में आई। वर्तमान डीजीपी विश्वरंजन की कोशिशों को भी उसी दिशा में देखा जाना चाहिए। होता यह रहा है कि नक्सल उन्मूलन के नाम पर सरकारी पैसे को हजम करने की कोशिशों से ज्यादा प्रयास कभी नहीं दिखे। पहली बार नक्सलियों को वैचारिक और मैदानी दोनों मोर्चों पर शिकस्त देने के प्रयास शुरू हुए हैं। यह अकारण नहीं है कि सलवा जुड़ूम का आंदोलन तो पूरी दुनिया में कुछ बुध्दिजीवियों के चलते निंदा और आलोचना का केंद्र बन गया किंतु नक्सली हिंसा को नाजायज बताने का साहस ये बुध्दिवादी नहीं पाल पाए। जब युध्द होते हैं, तो कुछ लोग अकारण ही उसके शिकार होते ही हैं। संभव है इस तरह की लड़ाई में कुछ निर्दोष लोग भी इसका शिकार हो रहे हों। लेकिन जब चुनाव अपने पुलिस तंत्र और नक्सल के तंत्र में करना हो, तो आपको पुलिस तंत्र को ही चुनना होगा। क्योंकि यही चुनाव विधि सम्मत है और लोकहित में भी। पुलिस के काम करने के अपने तरीके हैं और एक लोकतंत्र में होने के नाते उसके गलत कामों की आलोचना तथा उसके खिलाफ कार्रवाई करने के भी हजार हथियार भी हैं। क्योंकि पुलिस तंत्र अपनी तमाम लापरवाहियों के बावजूद एक व्यवस्था के अंतर्गत काम करता है, जिस पर समाज, सरकार और अदालतों की नजर होती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की इसलिए तारीफ करनी पड़ेगी कि पहली बार उन्होंने इस 'छद्म जनवादी युध्द को राष्ट्रीय आतंकवाद की संज्ञा दी। इसका कारण यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी जिस 'विचार परिवार से जुड़ी है वह चाहकर भी माओवादी अतिवादियों के प्रति सहानुभूति नहीं रख सकती। एक वैचारिक गहरे अंर्तविरोध के नाते भारतीय जनता पार्टी की सरकार राजनैतिक हानि सहते हुए भी माओवाद के खिलाफ ही रहेगी। यह बात कहीं न कहीं नक्सल प्रभावित इलाकों में डा. रमन सिंह के पक्ष में गयी। विधानसभा चुनावों में बस्तर की 12 में 11 सीटें जीतकर भाजपा ने साबित किया कि लोग आतंक के खिलाफ भाजपा की जंग के विश्वसनीय मानते हैं। इस लोकसभा चुनाव में भी कांकेर, सरगुजा और बस्तर की जीत यही कहती है।
भाजपा का रमन ब्रांडः
चुनाव के परिणामों के बाद यह विचार सबल हो उठा है भाजपा का डा. रमन ब्रांड आज सबसे लोकप्रिय है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह अगर अपनी सरकार के छः साल से अधिक का समय पूरा करने के बावजूद जनप्रिय बने हुए हैं, तो यह सोचना बहुत मौजूं है कि आखिर उनके व्यक्तित्व की ऐसी क्या खूबियां हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता के शिखर पर होने के बावजूद अलोकप्रियता के आसपास भी नहीं जाने दिया। देखा जाए तो डा. रमन सिंह एक मुख्यमंत्री से कहीं ज्यादा मनुष्य हैं। उनका मनुष्य होना उन सारे इंसानी रिश्तों और भावनाओं के साथ होना है, जिसके नाते कोई भी व्यक्ति वामन से विराट हो जाता है। मुख्यमंत्री बनने के पूर्व डा. रमन सिंह के व्यक्तित्व की तमाम खूबियां बहुज्ञात नहीं थीं। शायद उन्हें इन चीजों को प्रगट करने का अवसर भी नहीं मिला। वे कवर्धा में जरूर 'गरीबों के डाक्टर के नाम से जाने जाते रहे किंतु आज वे समूचे छत्तीसगढ़ के प्रिय डाक्टर साहब हैं। उनकी छवि इतनी निर्मल है कि वे बड़ी सहजता के साथ लोगों के साथ अपना रिश्ता बना लेते हैं। राजनेताओं वाले लटकों-झटकों से दूर अपनी सहज मुस्कान से ही वे तमाम किले इस तरह जीतते चले गए। सरकारी तंत्र की तमाम सीमाओं के बावजूद मुख्यमंत्री की नीयत पर शक नहीं किया जा सकता। पहले दिन से ही उनके ध्यान में आखिरी पंक्ति पर खड़े लोग ही हैं। राज्य शासन की ज्यादातर योजनाएं इसी तबके को ध्यान में रखते हुए बनाई गईं। आदिवासियों को गाय-बैल, बकरी देने की बात हो, उन्हें चरण पादुका देने की बात हो, गरीब छात्राओं को साइकिल देने या पच्चीस पैसे में नमक और तीन रुपया किलो चावल सबका लक्ष्य अंत्योदय ही है। इस तरह की तमाम योजनाएं मुख्यमंत्री की दृष्टि और दृष्टिपथ ही साबित करती हैं। विकास की महती संभावनाओं के साथ आज भी पिछड़ेपन और गरीबी के मिले-जुले चित्र राज्य की सर्वांगीण प्रगति में बाधक से दिखते हैं। अमीर और गरीब के बीच की खाई इतनी गहरी है कि सरकार की अत्यंत सक्रियता के बिना विकास के पथ पर बहुत पीछे छूट गए लोगों को मुख्य धारा से जोड़ पाना संभव नहीं है। भूमि, वन, खनिज और मानव संसाधन की प्रचुरता के बावजूद यह राज्य बेहद चुनौतीपूर्ण है, जहां पर एक तरफ विकास की चौतरफा संभावनाएं दिखती हैं, तो दूसरी तरफ बहुत से घरों में न सिर्फ फाका होता है, बल्कि रोजगार की तलाश में नित्य पलायन हो रहा है। भूख, कुपोषण और महामारी जैसे दृश्य यहां बहुत आम हैं। इस दृश्य से निजात दिलाना राज्य भाजपा की एक बड़ी चुनौती है।

अब सपनों को सच करने की जिम्मेदारीः
एक नवंबर, 2000 को अपना भूगोल रचने वाला यह राज्य आज भी एक 'भागीरथ के इंतजार में है। छत्तीसगढ़ का भौगोलिक क्षेत्रफल 1, 35, 194 वर्गकिलोमीटर है, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्र का 4.1 प्रतिशत है। क्षेत्रफल की दृष्टि से छत्तीसगढ़ देश के सोलह राज्यों से बड़ा है। यह कई छोटे-छोटे राष्ट्रों से भी विशाल है। छत्तीसगढ़ का क्षेत्रफल पंजाब, हरियाणा और केरल इन तीनों राज्यों के योग से ज्यादा है। जाहिर है इस विशाल भूगोल में बसने वाली जनता छत्तीसगढ़ की सत्ता पर बैठे मुखिया की तरफ बहुत आशा भरी निगाहों से देखती है। इन अर्थों में डा. रमन सिंह के पास एक ऐसी कठिन जिम्मेदारी है, जिसका निर्वहन उन्हें करना ही होगा। इस विशाल भूगोल में सालों साल से रह रही आबादी अपनी व्यापक गरीबी और पिछड़ेपन से मुक्त होने का इंतजार कर रही है। भाजपा और उसके नेता ने राज्य की जनता ने लगातार भरोसा जताते हुए बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। विरासत में मिली इन तमाम चुनौतियों की तरफ देखना और उनके जायज समाधान खोजना किसी भी राजसत्ता की जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को इतिहास की इस घड़ी में यह अवसर मिला है कि वे इस वृहतर भूगोल को उसकी तमाम समस्याओं के बीच एक नया आयाम दे सकें। सालों साल से न्याय और विकास की प्रतीक्षा में खड़ी 'छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा के हर क्षण का रचनात्मक उपयोग करें। बहुत चुनौतीपूर्ण और कंटकाकीर्ण मार्ग होने के बावजूद उन्हें इन चुनौतियों को स्वीकार करना ही होगा, क्योंकि सपनों को सच करने की जिम्मेदारी इस राज्य के भूगोल और इतिहास दोनों ने उन्हें दी है। जाहिर है वे इन चुनौतियों से भागना भी नहीं चाहेंगे। फिलहाल तो राज्य की आम जनता इस विजय पर उन्हें शुभकामनाओं के सिवा क्या दे सकती है।

बुधवार, 23 जुलाई 2008

राजनीति और नैतिकता के प्रश्न


राजनीति के मैदान में नैतिकता का प्रश्न कभी इतना अप्रासंगिक नहीं हुआ था। राजनीति खुद को कितना लांछित करना चाहती है इसे देखना एक रोचक अनुभव है। डा. राममनोहर लोहिया कहा करते थे लोकराज लोकलाज से चलता है। आज की राजनीति को देखकर वे क्या कहते यह सोचना भी मौंजू है। वर्तमान राजनीति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अब हमें राजनीति से बहुत नैतिक अपेक्षाएं नहीं पालनी चाहिए।

लोकसभा में विश्वास मत के दौरान जैसे नजारे देखने में आए वे वास्तव में हैरत में डालते हैं। राजनीति का मैदान कभी इतने अविश्वास से भरा नहीं था। पूरी दुनिया में सबसे बड़े लोकतंत्र का डंका पीटनेवाले हम वास्तव में कितने बेचारे हैं यह इस दौर की एक कड़वी सच्चाई है। राजनीति की यह बेबसी समझी जा सकती है। हमारी चिंताओं में यदि सत्ता सुख और व्यापार ही हो तो मनमोहन सिंह जैसे साधु स्वभाव के प्रधानमंत्री को भी अमर सिंह के साथ खड़ा होना पड़ सकता है। यह बेचारगी राजनीति की भी है, लोकतंत्र की भी और हम भारत के लोंगों की भी। बाजार में खड़ी हमारी राजनीति के सामने अमरीका की राजी-नाराजगी, महंगाई से बड़े प्रश्न हैं। पूरे चार साल तक कांग्रेस के साथ चिपके रहे वाममोर्चा के नेता यदि चुनाव के वक्त ही समर्थन वापस लेने की कार्रवाई कर रहे हैं तो इसके अर्थ समझे जा सकते हैं। यदि वामपंथियों की इस कार्रवाई से सरकार गिर जाती और मध्यावधि चुनाव होते तो भी वामपंथियों के सामने चुनाव के बाद भी बहुत सीमित विकल्प होते। यह तो तय ही है कि चुनाव जब भी हों कांग्रेस या भाजपा दोनों में से किसी एक को पूर्ण बहुमत मिलना संभव नहीं है। ऐसे में वामपंथी क्या भाजपा की सरकार बनवाएंगें। जाहिर है नहीं। किंतु अपने धुर अमेरीका विरोध के चलते वामपंथियों ने देश को एक चुनाव के मुहाने पर खड़ा कर दिया था। इस सबके बीच सबसे ज्यादा भद पिटी भारतीय जनता पार्टी की जिसके न सिर्फ सात सांसदों ने बगावत कर कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया वरन उसकी नैतिक नारेबाजी की पोल भी खोल दी। भाजपा न तो अपनी पार्टी को एकजुट रख सकी न ही एनडीए की एकता बनी रह सकी। इससे भाजपा और एनडीए दोनों की भद पिटी है। कई बड़े मामलों के आरोपियों को टिकट देने वाले दलों को भी इन आरोपियों ने अच्छा सबक सिखाया है। समाजवादी पार्टी ने कभी फूलपुर के सांसद अतीक अहमद के लिए मायावती से लंबी लड़ाई लड़ी। अतीक, बसपा के एक विधायक की हत्या के आरोपी हैं। अब वही अतीक अहमद , मायावती की मार से ढीले पड़ गए हैं और अविश्वास मामले पर बसपा के साथ खड़े दिखे। वहीं भाजपा को भी अपराधियों को टिकट देने से कभी परहेज नहीं रहा।

भाजपा के एक ऐसे ही सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने भी बगावत कर वोटिंग की। इसका संदेश यह है कि अपराधी सिर्फ संरक्षण पाने के लिए राजनीति में आते हैं। जिसकी ताकत होगी वह उनका आका अपने आप हो जाता है।लगभग यही हाल व्यापारी या उद्योग समूहों के लिए काम करने वाले दलाल किस्म के राजनेताओं का है। वे सत्ता के साथ अनूकूलन में बेहद अभ्यस्त होते हैं। आप उन्हें सत्ता से दूर रख ही नहीं सकते। इस मामले में फायदे में कांग्रेस तो रही है ही दूसरा बड़ा फायदा अमर सिंह एंड कंपनी का हुआ है। इससे अंबानी, अमिताभ,मुलायम और सभी अमर प्रेम से जुड़े बंधुओं को लाभ ही मिलेगा। राजनीति में कोई स्थाई शत्रु या मित्र नहीं होता यह कहावत एक बार फिर अपने जीवंत रूप में सामने दिख रही है। राजनीति में विचारधारा की जगह भी नहीं बची यह बात भी सामने दिख रही है।हां,वामपंथी इस बात पर संतोष जरूर कर सकते हैं कि उनके सांसदों ने उनकी लाज रखी और उनका कुनबा एकजुट रहा। पर इस अकेली बात के लिए उन्हें साधुवाद के अलावा क्या दिया जा सकता है। राजनीत के मैदान में वामपंथी अपनी राह चलने की बातें भले करें पर उनके भी आपसी द्वंद कम नहीं हैं। लोकसभा अध्यक्ष के मामले में उनकी उलटबासियां सबके सामने दिख ही रही हैं। फिर उनके सामने केरल और प.बंगाल के वामपंथियों के झगड़े अलग हैं।

कुल मिलाकर देश की राजनीति में नैतिकता के सवाल पर बातचीत बेमानी है चुकी है। राजनीति आज तीव्र व्यवसायीकरण की शिकार है। पैसे की बढ़ती भूख और उद्योग में बदलता राजनीतिक चिंता का एक बड़ा कारण है। कितुं अफसोस यह है कि राजनीति पर नैतिक चिंता करने वाले लोगों में आज राजनीति से जुड़े लोग नहीं हैं। ऐसे में राजनीति की पवित्रता की बात पर कोई भी चर्चा बेहद अकादमिक हो जाती है या अखबारी। राजनीति पर यदि राजनीति से जुड़े लोग ही चर्चा नहीं करेगें तो यह हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत घातक होगा। आजादी के छ दशक के बाद हमारा लोकतंत्र कई चुनौतियों के सामने है। जिसमें सबसे बड़ी चुनौती है जनविश्वास को कायम रखना। यदि लोकतंत्र की व्यवस्था से भी लोगों का भरोसा उठ गया तो कौन सी व्यवस्था हमें न्याय दिलाएगी। कहा जाता है लोकतंत्र अपनी तमाम बुराईयों के बावजूद सबसे अच्छी व्यवस्था है। शायद यह इसलिए क्योंकि लोंगों की आवाज इसी व्यवस्था में सुनी जा सकती है। लोग अपनी भावनाओं के प्रकटीकरण के लिए इस व्यवस्था को सबसे अच्छी व्यवस्था मानते हैं। इस विश्वास को बचाए औऱ बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। राजनीति और नैतिकता के सवाल पर गंभीर विमर्श आज की सबसे बड़ी जरूरत है यही हमारे लोकतंत्र और जनविश्वास की बहाली के सबसे आवश्यक है। आज के राजनीतिक परिवेश को देखकर यह कल्पना करना मुशिकल है कि हम आने वाली पीढ़ी को कैसा भविष्य दे पाएंगें। देश जिस तरह चौतरफा आतंक, असुरक्षा, कदाचार, अशिक्षा के जाल में जकड़ता जा रहा उसे देखकर हैरत होती है। जातीय औऱ क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने के लिए राजनीति लगी ही है। ऐसे कठिन समय में गांधी हमें रास्ता दिखाते हैं। वे हमें लोक से जोड़ते हैं। वे हमें बताते हैं कि किस तरह आज की चुनौतियों की सामना किया जा सकता है। भारत के संकट का कारण ही दरअसल अपने आध्यत्मिक अधिष्ठान के भटक जाने के कारण है। भारतीयता की जड़ें उसी लोक में है जिसे पहली बार गांधी ने पहचाना था। अफसोस कि आज की राजनीति लोक से शक्ति ग्रहण नहीं करती। वह चमत्कारों, मीडिया, पैसे, ताकत से सत्ता पाना चाहती है। वह स्वालंबन में भरोसा नहीं रखती वह विश्व बाजार में अपनी नीलामी के भटकती हुई आत्माएं हैं। इनकी मुक्ति पैसै में है। ये जनता का भरोसा जगाने नहीं तोड़ने वाली राजनीति है। यह भरोसा जगाने वाली नहीं आत्मविश्वास को तोड़ने वाली राजनीति है। जाहिर है ऐसी राजनीति जनता आदर कहां पा सकती है। संघर्ष की पाठशाला से निकला नेतृत्व की जनमन की भावनाओं का संस्पर्श पा सकता है और समर्थन भी। क्या हमारी राजनीति इसके लिए तैयार है।

सोमवार, 21 अप्रैल 2008

सदके इन मासूम तर्कों के

वायुयान से देवदूतों की तरह रायपुर की धरती पर उतरने वाले बुध्दिजीवी बस्तर के गाँवों के दर्द को नहीं समझ सकते। आंखों पर जब खास रंग का चश्मा लगा हो, तो खून का रंग नहीं दिखता। वे लोगों के गाँव छोड़ने से दुखी हैं। लेकिन कोई किस पीड़ा, किस दर्द में, अपनी आत्मरक्षा के लिए अपना गाँव छोड़ता है, इस संदर्भ को नहीं जानते। सलवा-जुड़ूम के शिविरों की पीडा उन्हें दिख जाती है, लेकिन नक्सलियों द्वारा दी जा रही सतत यातना और मौत के मंजर उन्हें नहीं दिखते।

छत्तीसगढ़ के कांग्रेसियों को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने पहली बार मुस्कराने का मौका दिया है। उन्होंने रायपुर में छत्तीसगढ़ सरकार की आलोचना कर लंबे समय से चली आ रही कांग्रेसियों की मुराद पूरी कर दी है। होता यह रहा है कि केंद्र सरकार के मंत्री राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहे हैं। राज्य में आने वाले लगभग हर मंत्री ने जब भी मौका मिला राज्य सरकार के कामकाज की तारीफ ही की। श्री प्रकाश जायसवाल ने नक्सल मामले पर रमन सरकार को नाकाम बताते हुए कहा कि छ: महीने बाद जब राज्य में कांग्रेस की सरकार होगी, तो वह ही नक्सलियों से निपटेगी। जाहिर है केंद्रीय गृह राज्यमंत्री का यह बयान राज्य सरकार की तार्किक आलोचना कम, चुनावी बयान ज्यादा है। चुनाव निकट आते देख एक सच्चो कांग्रेसी होने के नाते उनका जो फर्ज है, उसे उन्होंने निभाया है। यह सिर्फ़ संदर्भ के लिए कि पिछले महीने जब श्रीप्रकाश जायसवाल के 'बास केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल रायपुर प्रवास पर आए थे तो उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।

गृह राज्यमंत्री ने नक्सलवाद के मुद्दे पर राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया, तो इसके कोई बहुत मायने नहीं हैं। क्योंकि नक्सलवाद के खिलाफ यह पहली सरकार है, जो इतनी प्रखरता के साथ हर मोर्चे पर जूझ रही है। सिर्फ़ बढ़ती नक्सली घटनाओं का जिक्र न करें, तो राज्य सरकार की सोच नक्सलियों के खिलाफ ही रही है। डा. रमन सिंह की सरकार की इस अर्थ में सराहना ही की जानी चाहिए कि उसने राजकाज संभालने के पहले दिन से ही नक्सलवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबध्दता का ऐलान कर दिया था। राजनैतिक लाभ के लिए तमाम पार्टियां नक्सलियों की मदद और हिमायत करती आई हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। इन आरोपों-प्रत्यारोपों से अलग डा. रमन सिंह की सरकार ने पहली बार नक्सलियों को उनके गढ़ में चुनौती देने का हौसला दिखाया है। राज्य सरकार की यह प्रतिबध्दता उस समय और मुखर रूप में सामने आई, जब श्री ओपी राठौर राज्य के पुलिस महानिदेशक बनाए गए। डा. रमन सिंह और श्री राठौर की संयुक्त कोशिशों से पहली बार नक्सलवाद के खिलाफ गंभीर पहल देखने में आई। वर्तमान डीजीपी विश्वरंजन की कोशिशों को भी उसी दिशा में देखा जाना चाहिए।

होता यह रहा है कि नक्सल उन्मूलन के नाम पर सरकारी पैसे को हजम करने की कोशिशों से ज्यादा प्रयास कभी नहीं दिखे। पहली बार नक्सलियों को वैचारिक और मैदानी दोनों मोर्चों पर शिकस्त देने के प्रयास शुरू हुए हैं। यह अकारण नहीं है कि सलवा जुड़ूम का आंदोलन तो पूरी दुनिया में कुछ बुध्दिजीवियों के चलते निंदा और आलोचना का केंद्र बन गया किंतु नक्सली हिंसा को नाजायज बताने का साहस ये बुध्दिवादी नहीं पाल पाए। जब युध्द होते हैं, तो कुछ लोग अकारण ही उसके शिकार होते ही हैं। संभव है इस तरह की लड़ाई में कुछ निर्दोष लोग भी इसका शिकार हो रहे हों। लेकिन जब चुनाव अपने पुलिस तंत्र और नक्सल के तंत्र में करना हो, तो आपको पुलिस तंत्र को ही चुनना होगा। क्योंकि यही चुनाव विधि सम्मत है और लोकहित में भी। पुलिस के काम करने के अपने तरीके हैं और एक लोकतंत्र में होने के नाते उसके गलत कामों की आलोचना तथा उसके खिलाफ कार्रवाई करने के भी हजार हथियार भी हैं। क्योंकि पुलिस तंत्र अपनी तमाम लापरवाहियों के बावजूद एक व्यवस्था के अंतर्गत काम करता है, जिस पर समाज, सरकार और अदालतों की नजर होती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की इसलिए तारीफ करनी पड़ेगी कि पहली बार उन्होंने इस 'छद्म जनवादी युध्द को राष्ट्रीय आतंकवाद की संज्ञा दी। वे देश के पहले ऐसे राजनेता हैं, जिन्होंने इस समस्या को उसके राष्ट्रीय संदर्भ में पहचाना है।

आज भले ही केंद्रीय गृह राज्यमंत्री राज्य शासन को कटघरे में खड़ा कर रहे हों, लेकिन उन्हें यह तो मानना ही होगा कि नक्सलियों के खिलाफ छत्तीसगढ़ सरकार की नीयत पर कोई संदेह नहीं किया जाना चाहिए। इसका कारण यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी जिस 'विचार परिवार से जुड़ी है वह चाहकर भी माओवादी अतिवादियों के प्रति सहानुभूति नहीं रख सकती। एक वैचारिक गहरे अंर्तविरोध के नाते भारतीय जनता पार्टी की सरकार राजनैतिक हानि सहते हुए भी माओवाद के खिलाफ ही रहेगी। यह उसकी वैचारिक और राजनैतिक दोनों तरह की मजबूरी और मजबूती दोनों है।

नक्सलवाद के खिलाफ आगे आए आदिवासी समुदाय के सलवा-जुड़ूम आंदोलन को कितना भी लांछित किया जाए, वह किसी भी कथित जनक्रांति से महान आंदोलन है। महानगरों में रहने वाले, वायुयान से देवदूतों की तरह रायपुर की धरती पर उतरने वाले बुध्दिजीवी बस्तर के गाँवों के दर्द को नहीं समझ सकते। आंखों पर जब खास रंग का चश्मा लगा हो, तो खून का रंग नहीं दिखता। वे लोगों के गाँव छोड़ने से दुखी हैं, लेकिन कोई किस पीड़ा, किस दर्द में अपनी आत्मरक्षा के लिए अपना गाँव छोड़ता है, इस संदर्भ को नहीं जानते। सलवा-जुड़ूम के शिविरों की यातना और पीडा उन्हें दिख जाती है, लेकिन नक्सलियों द्वारा की जा रही सतत यातना और मौत के मंजर उन्हें नहीं दिखते। इस तरह का ढोंग रचकर वैचारिकता का स्वांग रचने वाले लोग यहां के दर्द को नहीं समझ सकते, क्योंकि वे पीड़ा और दर्द के ही व्यापारी हैं। उन्हें बदहाल, बदहवास हिंदुस्तान ही रास आता है। हिंदुस्तान के विकृत चेहरे को दिखाकर उसकी मार्केटिंग उन्हें दुनिया के बाज़ार में करनी है, डालर के बल पर देश तोड़क अभियानों को मदद देनी है। उन्हें वैचारिक आधार देना है, क्योंकि उनकी मुक्ति इसी में है। दुनिया में आज तक कायम हुई सभी व्यवस्थाओं में लोकतंत्र को सर्वश्रोष्ठ व्यवस्था माना गया है। जिनकी इस लोकतंत्र में भी सांसें घुट रही हैं, उन्हें आखिर कौन सी व्यवस्था न्याय दिला सकती है। वे कौन सा राज लाना चाहते हैं, इसके उत्तर उन्हें भी नहीं मालूम हैं। निरीह लोगों के खिलाफ वे एक ऐसी लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसका अंत नजर नहीं आता। अब जबकि सरकारों को चाहे वे केंद्र की हों या राज्य की कम से कम नक्सलवाद के मुद्दे पर हानि-लाभ से परे उठकर कुछ कड़े फैसले लेने ही होंगे। नक्सल प्रभावित सभी राज्यों और केंद्र सरकार के समन्वित प्रयासों से ही यह समस्या समूल नष्ट हो सकती है। यह बात अनेक स्तरों पर छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से कही जा चुकी है। समाधान का रास्ता भी यही है। सही संकल्प के साथ, न्यूनतम राजनीति करते हुए ही इस समस्या का निदान ढूंढा जा सकता है। छत्तीसगढ़ राज्य में चल रही यह जंग छत्तीसगढ़ की अकेली समस्या नहीं है। देश के अनेक राज्य इस समस्या से जूझ रहे हैं और दिन-प्रतिदिन नक्सली अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करते जा रहे हैं।

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री भले ही यह कहें कि राज्य सरकार में नक्सलवाद से लड़ने की इच्छाशक्ति नहीं है, किंतु सच्चाई यह है कि पहली बार छत्तीसगढ़ सरकार ने ही यह इच्छाशक्ति दिखाई है। इसे हौसला, हिम्मत और साधन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है वरना आरोपों-प्रत्यारोपों के अलावा हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा।