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सोमवार, 27 जुलाई 2026

शब्दों का सामर्थ्य और विचारों की धरोहर है 'संजय उवाच'

 

समीक्षक - डॉ. प्रदीप डहेरिया


पुस्तकः संजय उवाच (प्रो.संजय द्विवेदी के व्याख्यान)

प्रकाशक: शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, शाहदरा, दिल्ली

मूल्य- 495/- रुपए

 


      कोई भी व्याख्यान समय की रेत पर मिट जाने वाली आवाज़ हो सकते हैं, लेकिन जब वे लिपिबद्ध होकर पुस्तक का आकार लेते हैं, तो वे इतिहास के अमर दस्तावेज़ बन जाते हैं। किसी भी समाज, राष्ट्र या संगठन को सही दिशा देने में उसके नेतृत्वकर्ता के विचारों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब उन सशक्त विचारों को केवल सुना ही नहीं, बल्कि 'भाषण संग्रह' के रूप में सहेजकर एक पुस्तक का रूप दे दिया जाता है, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शिका बन जाती है। हाल ही में प्रकाशित 'संजय उवाच' नामक यह पुस्तक, जो विशिष्ट, चुनिंदा एवं प्रभावी भाषणों का संकलन है। वह वैचारिक जगत में एक अनमोल उपहार की तरह ही है। पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार, संपादक, चिंतक और मीडिया अध्यापन की दुनिया में चर्चित व्यक्तित्व प्रोफेसर संजय द्विवेदी कृत है।

      प्रो. संजय द्विवेदी मूलतः प्रिंट माध्यमों के विशेषज्ञ हैं। अपने अधिकांश मीडिया जीवन में उन्होंने मुद्रित माध्यमों में महत्वपूर्ण और सघन लेखन किया है। उनकी इस शब्द साधना का ही प्रताप है कि वे प्राकृतिक तौर पर धाराप्रवाह तमाम विषयों पर बोलते हैं। संजय जी का टेलीविजन और डिजिटल मीडिया में भी बहुत लंबा अनुभव रहा है। वे कई राष्ट्रीय चैनलों का प्रमुख चेहरा रहे हैं। इसके अलावा शैक्षणिक जीवन का भी विस्तृत और नेतृत्वकारी अनुभव उनके वक्तव्यों में प्रस्तुत होता है। उनकी इस संचित शब्द निधि से संपन्न यह पुस्तक एक अद्वितीय कृति बन जाती है। डा. संजय की जी लेखन यात्रा में कई पुस्तकें शामिल हैं। लेकिन संजय उवाचइस मामले में अलग है कि उनके व्याख्यानों का सार इस पुस्तक में पढ़ने को मिलता है। यह उनके लिए एक उपहार है जिन लोगों ने संजय जी की मंत्रमुग्ध कर देने वाली संवाद शैली का स्वाद नहीं चखा है। उनकी बातचीत का साक्षात करने वाले अनायास ही देश, समाज, राजनीति, युवा और मीडिया आदि विषयों पर ऐसी बातें, सूचनाएं और संस्मरण पा जाते हैं जो कहीं और नहीं मिलते। और एक बात यह भी कि संजय जी जिस तरह आत्मसात करने वाली शैली में संवाद करते हैं, वह श्रोताओं को आनंदित करती है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही चुंबकीय शक्तियों से लबरेज हैं।

         'संजय उवाच, केवल कागज़ पर छपे हुए शब्द नहीं हैं, बल्कि यह उस गहरे अनुभव, संवेदनशीलता और दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण है जो डा. संजय द्विवेदी ने अपने सार्वजनिक जीवन में अर्जित किये हैं। किसी भी प्रकार के व्याख्यान की सबसे बड़ी खूबी उसका सीधा दिल तक पहुँचना होता है। इस पुस्तक में संकलित व्याख्यानों की भाषा इतनी सरल, सहज और सजीव है कि पाठक को पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो वह स्वयं सामने बैठकर वक्ता को सुन रहा हो। शब्दों का चयन और वाक्यों का प्रवाह हर वर्ग के पाठक को बांधे रखता है। इस दृष्टि से 'संजय उवाच' पुस्तक बिल्कुल फिट है। इस पुस्तक कि सबसे बड़ी ताकत इसकी विषय-वस्तु है। इसमें केवल एक ढर्रे पर बात नहीं की गई है, बल्कि सामाजिक सरोकार, राष्ट्र निर्माण, युवा प्रेरणा, संस्कृति, और वैश्विक चुनौतियों जैसे गंभीर विषयों पर बेहद व्यावहारिक और दूरदर्शी विचार प्रस्तुत किए गए हैं। प्रत्येक व्याख्यान पाठक को सोचने पर मजबूर करता है और एक नई दृष्टि देता है। आज के दौर में जहाँ चारों ओर सूचनाओं का अंबार है, वहाँ यह पुस्तक वैचारिक स्पष्टता लाती है। निराश मन में उत्साह फूंकना और युवाओं को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना इस पुस्तक का मूल स्वर है। संजय जी देश के नामी-गिरामी संवाद कार्यक्रमों में शिरकत करते रहते हैं। उनकी वाक कला के लोग कायल हैं। उनकी इस पुस्तक का हर शब्द पाठकों से सजीव संवाद करता लगता है। यह अवश्य पठनीय पुस्तक है।इसके पन्नों को पलटते हुए पाठक के भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार निश्चित ही होगा।

      प्रो. संजय द्विवेदी सरल और सहज व्यक्तित्व के स्वामी हैं। उनका अध्ययन और विषयों पर पकड़ आश्चर्यजनक है। वे पिछले लगभग तीन दशकों से निरंतर लेखन करते रहे हैं। उनके खाते में कई शानदार पुस्तकों का रिकार्ड दर्ज है। इसी तरह उनके संवाद कार्यक्रम भी देश के कोने-कोने में होते रहते हैं। संजय उवाचको पढ़ने के बाद उनके आगामी संवाद में श्रोताओं की तादाद और बढ़ने वाली है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद हर पाठक निश्चित तौर पर उनके भाषणों को सजीव सुनने के लिए उत्सुक होने वाला है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि 'संजय उवाच' पुस्तक शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और जनसंचार के छात्रों के लिए एक बेहतरीन संदर्भ ग्रंथ एवं व्यावहारिक गाइड साबित होगी।  मैं प्रो. संजय द्विवेदी को इस पुस्तक प्रकाशन के लिए तहेदिल से बधाई देता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि वे आगे भी अपने लेख एवं भाषणों के माध्यम से समाज को दिशा देते रहेंगे।

 


 

डिजिटल चुनौती के बीच कैसे जिएं अखबार

 

पठनीयता के गहरे संकट से जूझते समाचार पत्र क्या करें?



   हां, सामने मीडिया की पढ़ाई करने की चाह रखने वाले विद्यार्थी ही थे, उम्मीद की जानी चाहिए कि वे कोई अखबार, मैगजीन या किताबें पढ़कर आए होंगे। लगभग 110 विद्यार्थियों से बात करते हुए यह अहसास हुआ कि अखबार अब उनकी जिंदगी में कोई जगह नहीं रखता। वे जो कुछ भी ग्रहण कर रहे हैं, आनलाइन ही कर रहे हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया के सामने बहुत गहरे संकट हैं। क्योंकि इस डिजिटल समय में उनके ई-पेपर ही पलटे जा रहे हैं। क्या अब हाथ में अखबार लेकर पढ़ने वाले दुर्लभ हो जाएंगें? 

बदल गए हैं पढ़ने के तरीके-

    डिजिटल मीडिया और स्मार्टफोन ने पढ़ने के तरीके को बदलकर रख दिया है। पोर्टल्स, सोशल मीडिया और न्यूज एप्स के कारण पाठकों को पल-पल की खबरें मुफ्त में उनके मोबाइल पर मिल रही हैं। जिससे 24 घंटे में एक बार आनेवाला अखबार क्या मुकाबला करेगे। रीयल टाइम अपडेट एक ऐसी घटना है जिसने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। ऐसे में अखबारों को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए नए रास्ते तलाशने की जरूरत है। नई पीढ़ी लंबी सामग्री पढ़ने के बजाए अब वीडियो, शार्ट्स, पाडकास्ड और विजुअल इंफ्रोग्राफिक्स के जरिए चीजों को देखना,सुनना और समझना सीख गई है। प्रिंट मीडिया के प्रति उसका आकर्षण खत्म सा है।

आर्थिक संकट से भी हैं हलाकान-

     इस परिघटना ने प्रिंट मीडिया से कमाई के मौके भी छीनने शुरु कर दिए हैं। हम जानते हैं अखबार मूलतः विज्ञापनों ( स्पेस सेलिंग) पर निर्भर हैं। अब जबकि कंपनियां अपना बड़ा बजट डिजिटल प्लेटफार्म जैसे गूगल,मेटा और यू-ट्यूब पर खर्च कर रही हैं, जहां वे अपने लक्षित समूह ( टारगेट आडियंस) तक आसानी से पहुंच रही हैं। इसकी लागत भी कम पड़ रही है। एल्गोरिद्म ने बाजार और ग्राहक की पहुंच को बहुत आसान बना दिया है। कागज, स्याही और छपाई की बढ़ती कीमतों से अखबार पहले ही हलाकान थे, बिजली और प्रिंटिंग मशीनों का रख-रखाव उनकी अलग चिंताओं को बढ़ाता रहा है। इन स्थितियों में अखबार की न सिर्फ लागत बढ़ जाती है बल्कि उसे लोगों तक पहुंचाना सरल नहीं रह गया है। अखबारों को सुबह छापना और लोगों के घरों तक पहुंचाना हमेशा ही कठिन काम था। भारत जैसे बाजार में जहां लोग पढ़ने के लिए खर्च को तैयार नहीं है, यह संकट और जटिल हो जाता है। आज भी हिंदुस्तान के बाजार में अखबार 3 से 7 रूपए के बीच ही बेचे जा रहे हैं। जो उसकी वास्तविक लागत से बहुत कम होता है। विज्ञापनों में आती कमी के बीच इसे छापना असंभव होता जाएगा। हम ध्यान से देखें तो हाकरों की नई पीढ़ी की रूचि अखबार बांटने में रूचि कम रख रही है। दूध या अन्य व्यवसाय के साथ अखबार वितरण भी किया जा रहा है। स्टाल कम हो रहे हैं जहां पत्र-पत्रिकाएं मिला करती थीं। स्टेशनों से लेकर नगरों, कस्बों तक अखबारों और पत्रिकाओं के स्टाल समाप्त हो रहे हैं या उनपर खाद्य सामग्री बिक रही है।

भरोसे का संकट बड़ी चुनौती-

     टीवी और डिजिटल मीडिया से होड़ कर रहे प्रिंट मीडिया ने भी गहरी रिर्पोटिंग और विश्लेषणात्मक सामग्री के बजाए हल्की-फुल्की प्रस्तुति से खुद को अप्रासंगिक बना लिया है। बहुत कम अखबार हैं जो सामग्री की गुणवत्ता और विचारों पर ध्यान क्रेंद्रित कर रहे हैं। ऐसे में जब आनलाइन उपलब्ध सामग्री जैसे ही विषयवस्तु अखबारों में होगी तो निश्चित ही पाठक दूर जाएंगें। कागज के निर्माण में पेड़ों की कटाई और जल की खपत जैसे मुद्दे उठाकर  भी अखबारों से दूर करने की एक नैतिक और व्यवहारिक चिंताएं खड़ी करने के प्रयास भी हो रहे हैं। ऐसे में राजस्व में गिरावट के कारण जहां मझोले और छोटे अखबारों के सामने अस्तित्व का संकट है तो बड़े अखबार भी संपादकीय बजट में कटौती, पत्रकारों की छंटनी जैसे काम कर रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य में अखबारों की अधिकाधिक निर्भरता कारपोरेट और सरकारी विज्ञापनों पर बहुत बढ़ गई है। संकट का असली सिरा यहीं है। भरोसे,विश्वसनीयता का संकट इन्हीं सब कारणों से बढ़ रहा है। निष्पक्ष पत्रकारिता बहुत चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।

आखिर रास्ता क्या है-

  जाहिर है संकटों से घिरे प्रिंट मीडिया के सामने विकल्प सीमित हैं। अब केवल संकटों की बात, समस्याओं का बातें करने से आगे समाधान परक पत्रकारिता की आवश्यक्ता है। जिसमें अखबार संकटों के साथ उनके संभावित समाधानों, सफल माडल्स और सकारात्मक प्रयासों की बात भी करें। व्याख्या, विश्लेषण और खोजी पत्रकारिता पर फोकस करके उन्हें खबर क्यों घटी और इसके मायने क्या हैं बताने होंगे। अखबार अब सूचना के वाहक नहीं उनके विश्लेषण और व्याख्याओं के वाहक बनें। डेटा, शोध और गहन मैदानी कवरेज ही वह रास्ता है जिससे प्रिंट स्वयं को प्रासंगिक बनाए रख सकता है। फैक्ट चेकिंग की अनिर्वायता के साथ हमें गलत खबरों का पर्दाफाश भी करना होगा। सबसे पहले खबर देने के बजाए सबसे सटीक खबर देने के सिद्धांत पर लौटना होगा। इसके साथ ही आत्मनिर्भर वित्तीय माडल पर काम करते हुए पाठक द्वारा पोषित मीडिया खड़ा करना होगा। पत्रकारों को तकनीक से डरने के बजाय उसका इस्तेमाल अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए करना चाहिए। डेटा एनालिसिस, ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद और रूटीन री-लेखन में एआई (AI) का इस्तेमाल करें ताकि पत्रकारों का समय फील्ड वर्क, मानवीय संवेदनाओं की कहानियों और खोजी रिपोर्टिंग में लग सके। पत्रकारिता तब तक निष्पक्ष नहीं हो सकती जब तक पत्रकार स्वयं सुरक्षित और आर्थिक रूप से निश्चिंत न हों।

मीडिया साक्षरता भी है जरूरी-

     मीडिया संस्थानों और समाज को मिलकर ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संवाददाताओं के लिए सुरक्षा कवर, बीमा और सम्मानजनक मानदेय सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाना होगा। पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को आम जनता के बीच 'मीडिया साक्षरता' की समझ बहुत जरूरी है। जब पाठक यह समझना सीख जाएंगे कि कौन-सी खबर प्रायोजित है, कौन-सा एजेंडा है और कौन-सी वास्तविक पत्रकारिता, तो वे खुद-ब-खुद घटिया और सनसनीखेज कंटेंट को नकारना शुरू कर देंगे। भरोसा वह शब्द है जो आसानी से अर्जित नहीं होता, अखबारों की स्वीकार्यता में विश्वसनीयता और प्रामणिकता का सर्वाधिक योगदान होगा। उम्मीद की जानी कि नई डिजिटल चुनौतियों के बीच भी कुछ लोग उस भरोसे को कायम रखेंगें, जो भारतीय पत्रकारिता ने अपनी लंबी यात्रा से अर्जित किया है।


 

 

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

संपादक के विस्थापन का कठिन समय!

                                                         हिंदी पत्रकारिता के 200 साल

-प्रो.संजय द्विवेदी




     हिंदी पत्रकारिता के 200 साल की यात्रा का उत्सव मनाते हुए हमें बहुत से सवाल परेशान कर रहे हैं जिनमें सबसे खास है संपादक का विस्थापन। बड़े होते मीडिया संस्थान जो स्वयं में एक शक्ति में बदल चुके हैं, वहां संपादक की सत्ता और महत्ता दोनों कम हुई है। अखबारों से खबरें भी नदारद हैं और विचार की जगह भी सिकुड़ रही है। बहुत गहरे सौंदर्यबोध और तकनीकी दक्षता से भरी प्रस्तुति के बाद भी अखबार खुद को संवाद के लायक नहीं बना पा रहे हैं। यह ऐसा कठिन समय है जिसमें रंगीनियां तो हैं पर गहराई नहीं। हर तथ्य और कथ्य का बाजार पहले ढूंढा जा रहा है, लिखा बाद में जा रहा है।

   नए समय में पत्रकारिता को सिर्फ कौशल या तकनीक के सहारे चलाने की कोशिशें हो रही हैं। जबकि पत्रकारिता सिर्फ कौशल नहीं बहुत गहरी संवेदना के साथ चलने वाली विधा है। जहां शब्द हैं, विचार हैं और उसका समाज पर पड़ने वाला प्रभाव है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या पत्रकारिता के पारंपरिक मूल्य और सिद्धांत अप्रासंगिक हो गए हैं या नए जमाने में ऐसा सोचना ठीक नहीं है। डिजीटल मीडिया की मोबाइल जनित व्यस्तता ने पढ़ने, गुनने और संवाद का सारा समय खा-पचा लिया है। जो मोबाइल पर आ रहा है,वही हमें उपलब्ध है। हम इसी से बन रहे हैं, इसी को सुन और गुन रहे हैं। ऐसे खतरनाक समय में जब अखबार पढ़े नहीं, पलटे जाने की भी प्रतीक्षा में हैं। दूसरी ओर वाट्सअप में अखबारों के पीडीएफ तैर रहे हैं। कुछ ऐसे हैं जो पीडीएफ पर ही छपते हैं। अखबारों को हाथ में लेकर पढ़ना और ई-पेपर की तरह पढ़ना दोनों के अलग अनुभव हैं। नई पीढ़ी मोबाइल सहज है। उसने मीडिया घरानों के एप मोबाइल पर ले रखे हैं। वे अपने काम की खबरें देखते हैं। न्यूज यू कैन यूज का नारा अब सार्थक हुआ है। खबरें भी पाठकों को चुन रही हैं और पाठक भी खबरों को चुन रहे हैं। यह कहना कठिन है कि अखबारों की जिंदगी कितनी लंबी है। 2008 में प्रिंट इज डेट किताब लिखकर जे. गोमेज इस अवधारणा को बता चुके हैं।

   सवाल यह नहीं है कि अखबार बचेंगे या नहीं मुद्दा यह है कि पत्रकारिता बचेगी या नहीं। उसकी संवेदना, उसका कहन, उसकी जनपक्षधरता बचेगी या नहीं। संपादक की सत्ता पत्रकारिता की इन्हीं भावनाओं की संरक्षक थी। संपादक अखबार की संवेदना, भाषा, उसके वैचारिक नेतृत्व,समाजबोध का संरक्षण करता था। उसकी विदाई के साथ कई मूल्य भी विदा हो जाएंगें। गुमनाम संपादकों को अब लोग समाज में नहीं जानते हैं। खासकर हिंदी इलाकों में अब पहचान विहीन और ब्रांड वादी अखबार निकाले जा रहे हैं। अब संपादक के होने न होने से फर्क नहीं पड़ता। उसके लिखने न लिखने से भी फर्क नहीं पड़ता। न लिखे तो अच्छा ही है। पहचानविहीन चेहरों की तलाश है, जो अखबार के ब्रांड को चमका सकें। संपादक की यह विदाई अब उस तरह से याद भी नहीं की जाती। पाठकों ने नए अखबार के साथ अनुकूलन कर लिया है। नया अखबार पहले पन्ने पर भी किसी भी प्रोडक्ट का एड छाप सकता है, संपादकीय पन्ने को आधा कर विचार को हाशिए लगा सकता है। खबरों के नाम पर एजेंडा चला सकता है। सत्य के बजाए यह नरेटिव के साथ खड़ा है। यहां सत्य रचे और तथ्य गढ़े जा सकते हैं। उसे बीते हुए समय से मोह नहीं है वह नए जमाने का नया अखबार है। वह विचार और समाचार नहीं कंटेट गढ़ रहा है। उसे बाजार में छा जाने की ललक है। उसके टारगेट पर खाये-अघाए पाठक हैं जो उपभोक्ता में तब्दील होने पर आमादा हैं। उसके कंटेंट में लाइफ स्टाइल की प्रमुखता है। वह जिंदगी को जीना और मौज सिखाने में जुटा है। इसलिए उसका जोर फीचर पर है, अखबार को मैग्जीन बनाने पर है। अखबार बहुत पहले रंगीन हो चुका है, उसका सारा ध्यान अब अपने सौंदर्यबोध पर है। वह प्रजेंटेबल बनना चाहता है। अपनी समूची प्रस्तुति में ज्यादा रोचक और ज्यादा जवान। उसे लगता है कि उसे सिर्फ युवा ही पढ़ते हैं और वह यह भी मानकर चलता है कि युवा को गंभीर चीजें रास नहीं आतीं।

    यह नया अखबार अब संपादक की निगरानी से मुक्त है। मूल्यों से मुक्त। संवेदनाओं से मुक्त। भाषा के बंधनों से मुक्त। यह भाषा सिखाने नहीं बिगाड़ने का माध्यम बन रहा है। मिश्रित भाषा बोलता हुआ। संपादक की विदा के बहुत से दर्द हैं जो दर्ज नहीं है। नए अखबार ने मान लिया है कि उसे नए पाठक चुनने हैं। बनाना है उन्हें नागरिक नहीं, उपभोक्ता। ऐसे कठिन समय में अब सक्रिय पाठकों का इंतजार है। जो इस बदलते अखबार की गिरावट को रोक सकें। जो उसे बता सकें कि उसे दृश्य माध्यमों से होड़ नहीं करनी है। उसे शब्दों के साथ होना है। विचार के साथ होना है।

   हिंदी के संपादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर ने कहा था, ‘‘पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंगठित कंपनियों के लिए ही संभव होगा। पत्र सर्वांग सुंदर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता होगी, कल्पकता होगी, गंभीर गवेषणा की झलक होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण संपादकों की नीति न होगी- इन गुणों से संपन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएंगे, संपादक की कुर्सी तक उनकी पहुंच भी न होगी। वेतनभोगी संपादक मालिक का काम करेंगे और बड़ी खूबी के साथ करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतंत्रता प्राप्त है वह उन्हें न होगी। वस्तुतः पत्रों के जीवन में यही समय बहुमूल्य है।

    श्री पराड़कर की यह भविष्यवाणी आज सच होती हुई दिखती है। समानांतर प्रयासों से कुछ लोग विचार की अलख जगाए हुए हैं। लेकिन जरूरी है कि हम अपने पाठकों के सक्रिय सहभाग से मूल्य आधारित पत्रकारिता के लिए आगे आएं। तभी उसकी सार्थकता है।

 

रामबहादुर राय होने का अर्थ समझाती एक किताब

‘दिल्ली’ में ‘भारत’ को जीने वाला बौद्धिक योद्धा!

-प्रोफेसर संजय द्विवेदी


   कभी जनांदोलनों से जुड़े रहे, पदम भूषण और पद्मश्री सम्मानों से अलंकृत श्री रामबहादुर राय का समूचा जीवन रचना, सृजन और संघर्ष की यात्रा है। उनकी लंबी जीवन यात्रा में सबसे ज्यादा समय उन्होंने पत्रकार के रूप में गुजारा है। इसलिए वे संगठनकर्ता, आंदोलनकारी, संपूर्ण क्रांति के नायक के साथ-साथ महान पत्रकार हैं और लेखक भी। अपने समय के नायकों से निरंतर संवाद और साहचर्य ने उनके लेखन को समृद्ध किया है। हमारे समय में उनकी उपस्थिति ऐसे नायक की उपस्थिति है, जिसके सान्निध्य का सुख हमारे जीवन को शक्ति और लेखन को खुराक देता है। उनका समावेशी स्वभाव, मानवीय संवेदना से रसपगा व्यक्तित्व भीड़ में उन्हें अलग पहचान देता है। ‘दिल्ली’ में ‘भारत’ को जीने वाले बौद्धिक योद्धा के रूप में पूरा देश उन्हें देखता, सुनता और प्रेरणा लेता है। जिस दौर की पत्रकारिता की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता पर ढेरों सवाल हों, ऐसे समय में राम बहादुर राय की उपस्थिति हमें आश्वस्त करती है कि सारा कुछ खत्म नहीं हुआ है। सही मायने में उनकी मौजूदगी हिन्दी पत्रकारिता की उस परंपरा की याद दिलाती है, जो बाबूराव विष्णुराव पराड़कर से होती हुई राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी तक जाती है।

   4 फरवरी, 1946 को उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के एक गांव में जन्में श्री राय सही मायने में पत्रकारिता क्षेत्र में शुचिता और पवित्रता के जीवंत उदाहरण हैं। वे एक अध्येता, लेखक, दृष्टि संपन्न संपादक, मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में प्रेरक छवि रखते हैं। भारतीय जीवन मूल्यों और पत्रकारिता के उच्च आदर्शों को जीवन में उतारने वाले रामबहादुर राय ने राजनीति के शिखर पुरुषों से रिश्तों के बावजूद कभी कलम को ठिठकने नहीं दिया। उन्होंने वही लिखा और कहा जो उन्हें सच लगा। राय साहब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर छात्र राजनीति में सक्रिय रहते हुए, ऐतिहासिक जयप्रकाश आंदोलन के नायकों में रहे। दैनिक 'आज' में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का आंखों देखा वर्णन लिखकर आपने अपनी पत्रकारीय पारी की एक सार्थक शुरुआत की। युगवार्ता फीचर सेवा, हिन्दुस्तान समाचार संवाद समिति में कार्य करने के बाद आप 'जनसत्ता' से जुड़ गए। 'जनसत्ता' में एक संवाददाता के रूप में कार्य प्रारंभ कर वे उसी संस्थान में मुख्य संवाददाता, समाचार ब्यूरो प्रमुख, संपादक, जनसत्ता समाचार सेवा के पदों पर रहे। आप नवभारत टाइम्स, दिल्ली में विशेष संवाददाता भी रहे। आप देश की अनेक सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं जिनमें प्रज्ञा संस्थान, युगवार्ता ट्रस्ट, दशमेश एजुकेशनल चेरिटेबल ट्रस्ट, इंडियन नेशनल कमीशन फॉर यूनेस्को, प्रभाष परंपरा न्यास, भानुप्रताप शुक्ल न्यास के नाम प्रमुख हैं।

   आपकी चर्चित किताबों में आजादी के बाद का भारत झांकता है। ये किताबें राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र की मूल्यवान किताबें हैं। जिनमें भारतीय संविधानःएक अनकही कहानी, रहबरी के सवाल (पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जीवनी), मंजिल से ज्यादा सफर (पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की जीवनी), काली खबरों की कहानी (पेड न्यूज पर केंद्रित), भानुप्रताप शुक्ल- व्यक्तित्व और विचार प्रमुख हैं। भारतीय पत्रकारिता की उजली परंपरा के नायक के रूप में रामबहादुर राय आज भी निराश नहीं हैं, बदलाव और परिवर्तन की चेतना उनमें आज भी जिंदा है। स्वास्थ्यगत समस्याओं के बावजूद आयु के इस मोड़ पर भी वे उतने ही तरोताजा हैं।

    पत्रकारिता के इस अनूठे नायक पर प्रो. कृपाशंकर चौबे की नई किताब ‘रामबहादुर रायःचिंतन के विविध आयाम’( प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित) उनके अवदान को अच्छी तरह से रेखांकित करती है। एक पत्रकार, संपादक, सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में बहुज्ञात राय साहब को इस तरह देखना निश्चित ही कृपाजी की उपलब्धि है। उनकी यह किताब राय साहब के संपूर्ण रचनाधर्मी स्वभाव का जिस तरह मूल्यांकन करती है, वह अप्रतिम है। किताब में उनका व्यक्तित्व, उनकी किताबें, उनके रिश्ते और रचना कर्म दिखता है। इस तरह यह किताब उन्हें जानने का सबसे बेहतरीन जरिया है। क्योंकि रामबहादुर राय जैसे बहुआयामी व्यक्तित्व को आप उनकी किसी एक किताब, एक मुलाकात, एक व्याख्यान से नहीं समझ सकते। किंतु यह किताब बड़ी सरलता से उनके बारे में सब कुछ कह देती है। किताब में अंत में छपा उनका साक्षात्कार तो अद्भुत है, एक यात्रा की तरह और फीचर का सुख देता हुआ। संवाद ऐसा कि चित्र और दृश्य साकार हो जाएं। रामबहादुर राय से यह सब कुछ कहलवा लेना लेखक के बूते ही बात है। यह किताब एक बड़ी कहानी की तरह धीरे-धीरे खुलती है और मन में उतरती चली जाती है। किताब एक बैठक में उपन्यास का आस्वाद देती है, तो पाठ-दर पाठ पढ़ने पर कहानी का सुख देती है। यह एक पत्रकार की ही शैली हो सकती है कि इतने गूढ़ विषय पर इतनी सरलता से, सहजता से संचार कर सके। संचार की सहजता ही इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है। 

  किताब की सबसे बड़ी विशेषता इसकी समग्रता है। वह बताती है कि किसी खास व्यक्ति का मूल्यांकन किस तरह किया जाना चाहिए। हिंदी पत्रकारिता में आलोचना की परंपरा बहुत समृद्ध नहीं है। इसका कारण यह है कि साहित्यिक आलोचना में सक्रिय लोग पत्रकारिता को बहुत गंभीरता से नहीं लेते, मीडिया अध्ययन संस्थानों में भी पत्रकारों के काम पर शोध का अभ्यास नहीं है। ऐसे में यह किताब हमें पत्रकारीय व्यक्तित्व की आलोचना का पाठ भी सिखाती है। 11 अध्यायों में फैली इस किताब का हर अध्याय समग्रता लिए हुए है। हमारे बीते दिनों की यात्राएं, आजादी के बाद एक बनते हुए देश की चिंताएं, सरकारों की आवाजाही, हमारे नायकों की मनोदशा सबकुछ। पहले अध्याय में संघर्ष और सरोकार के तहत उनके बचपन,स्कूली शिक्षा,कालेज जीवन, अखिलभारतीय विद्यार्थी परिषद में उनकी सक्रियता, संघर्ष, जेल यात्रा सब कुछ जीवंत हो उठा है। उनके आंदोलनकारी और छात्र राजनीति के पक्ष को यहां समझा जा सकता है। जयप्रकाश नारायण से उनका रिश्ता कैसे उन्हें रूपांतरित करता है, कैसे वे आंदोलन के मार्ग से लोकजागरण के लिए पत्रकारिता के मार्ग पर आते हैं, इसे पढ़ना सुख देता है।

       अध्याय दो में ‘प्रश्नोत्तर शैली में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जीवनी’ शीर्षक अध्याय में राय साहब की किताब ‘रहबरी के सवाल’ की चर्चा है। चंद्रशेखर जी के साथ संवाद से बनी यह किताब राजनीति, समाज और समय के संदर्भों की अनोखी व्याख्या है। जहां संवाद एक तरह के शिक्षण में बदल जाता है। पुस्तक में एक भाषण में भारत को पारिभाषित करते हुए चंद्रशेखर जी कहते हैं,-“भारत सिर्फ मिट्टी का नाम नहीं है। कुछ नदियों और पहाड़ों का समुच्चय नहीं है। भारत सत्य, एक सतत, शास्वत गवेषणा का नाम है। सत्य की इस धारा से दुनिया बार-बार आलोकित होती रही है।”

   अध्याय तीन में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की जीवनी (मंजिल से ज्यादा सफर) भी संवाद शैली में ही लिखी गयी है। इस स्तर के राजनेताओं के अनुभव निश्चय ही हमें समृद्ध करते हैं। क्योंकि वे आजादी के बाद के भारत की राजनीति, संसद और समाज की गहरी समझ लेकर आते हैं। पत्रकार राय साहब इस तरह समाजविज्ञानियों और राजनीतिशास्त्रियों के लिए मौलिक पाठ रचते नजर आते हैं। इस किताब की भूमिका में यशस्वी संपादक प्रभाष जोशी लिखते हैं -“रामबहादुर राय देश के एक बहुत विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार हैं। यह जल्दी में काता-कूता कपास नहीं है। बड़े जतन से बुनी गयी चादर है। ”

अध्याय चार और पांच महान समाजवादी चिंतक और राजनेता जेबी कृपलानी और जयप्रकाश नारायण को समझने में मदद करते हैं। अध्याय –छह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे बालासाहब देवरस की विचार दृष्टि पर चर्चा है। यह पाठ ‘हमारे बालासाहब देवरस’ नामक पुस्तक पर केंद्रित है जिसका संपादन राय साहब और राजीव गुप्ता ने किया था। अध्याय सात में गोविंदाचार्य पर संपादित किताब की चर्चा है। गोविंदाचार्य के बहाने यह किताब राजनीति की लोकसंस्कृति पर विमर्श खड़ा करती है। अध्याय आठ में पड़ताल शीर्षक से छपे उनके स्तंभ का विश्वेषण है। इस स्तंभ पर केंद्रित चार पुस्तकें अरुण भारद्वाज के संपादन में प्रकाशित हुई हैं। जिनका प्रो. कृपाशंकर चौबे ने नीर-क्षीर विवेचन किया है। अध्याय- नौ में राय साहब की बहुचर्चित किताब ‘भारतीय संविधान- एक अनकही कहानी’ की चर्चा है। इस किताब में संविधान सभा की बहसें हमारे सामने चलचित्र की तरह चलती हैं। बहुत मर्यादित और गरिमामय टिप्पणियों के साथ। शायद लेखक चाहते हैं कि उनके पाठक भी वही भाव और स्पंदन महसूस कर सकें, जिसे संविधान सभा में उपस्थित महापुरुषों ने उस समय महसूस किया होगा। रामबहादुर जी की कलम उस ताप को ठीक से महसूस और व्यक्त करती है। जैसे राजेंद्र प्रसाद जी को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष बनाते समय श्री सच्चिदानंद सिन्हा और अंत में बोलने वाली भारत कोकिला सरोजनी नायडू जी के वक्तव्य को पढ़ते हुए होता है। अध्याय-10 में राय साहब के निबंधों की चर्चा है। अध्याय-11 में राय साहब से कृपाशंकर जी का संवाद अद्भुत है। उसे पढ़ना पत्रकारिता में उनके अनुभवों के साथ बहुत सी बातें सामने आती हैं। खासकर नवभारत टाइम्स के संपादक राजेंद्र माथुर की मृत्य के कारणों पर उन्होंने जो कहा वह बहुत साहसिक है। यह वही समय है जब हमारी पत्रकारिता से संपादक के विस्थापन और कारपोरेट के पंजों की पकड़ मजबूत हो रही है। 

   अपनी आधी सदी की पत्रकारिता में रामबहादुर राय ने जिन आदर्शों और लोकधर्म का पालन किया है, यह किताब उनके जीवन मूल्यों को लोक तक लाने में सफल रही है। इस बहाने उनके जीवन, कृतित्व और सरोकारों से परिचित होने का मौका यह पुस्तक दे रही है। लेखक को इस शानदार किताब के लिए बधाई। राय साहब  के लिए प्रार्थनाएं कि वे शतायु हों।

शुक्रवार, 31 मई 2024

राजनीति में भी चमके मीडिया के सितारे

 

- प्रो. (डा.) संजय द्विवेदी

      इन दिनों देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। राजनीति का आकर्षण प्रबल है। सिने कलाकार, साहित्यकार, वकील, न्यायाधीश, खिलाड़ी, गायक, उद्योगपति सब क्षेत्रों के लोग राजनीति में हाथ आजमाना चाहते हैं। ऐसा ही हाल पत्रकारिता के सितारों का भी है। मीडिया और पत्रकारिता के अनेक चमकीले नाम राजनीति के मैदान में उतरे और सफल हुए।

     आजादी के आंदोलन में तो मीडिया को एक तंत्र की तरह इस्तेमाल करने के लिए प्रायः सभी वरिष्ठ राजनेता पत्रकारिता से जुड़े और उजली परंपराएं खड़ी कीं। बालगंगाधर तिलक, महात्मा गांधी से लेकर सुभाष चन्द्र बोस, महामना पं.मदनमोहन मालवीय, पंडित नेहरू सभी पत्रकार थे। आजादी के बाद बदलते दौर में पत्रकारिता और राजनीति की राहें अलग-अलग हो गईं, लेकिन सत्ता का आकर्षण बढ़ गया। जनपक्ष, राष्ट्र सेवा की पत्रकारिता अब आजाद भारत में राष्ट्र निर्माण का भाव भरने में लगी थी। सेवा राजनीति के माध्यम से भी की जा सकती है, यह भाव भी प्रबल हुआ।



मूल्यों पर अटलरहने वाले वाजपेयी’-

     राजनीतिक दलों से संबंधित समाचार पत्रों, पत्रिकाओं के अलावा मुख्यधारा की पत्रकारिता से भी लोग राजनीति में आए, जिसमें सबसे खास नाम श्री अटल बिहारी वाजपेयी का है।वे  'वीर अर्जुन' जैसे दैनिक अखबार के संपादक थे। इसके साथ ही वे 'स्वदेश', 'पांचजन्य' और 'राष्ट्रधर्म' के भी संपादक भी थे। वे जहां संसदीय राजनीति के लंबे अनुभव के साथ प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री भी रहे, तो वहीं भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष भी थे। पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी भी 'हिंदुस्तान समाचार' और 'ऑर्गनाइजर' से संबद्ध थे, फिर राजनीति में आए।

  कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रहे पं.कमलापति त्रिपाठी जाने-माने पत्रकार थे। आज(वाराणसी) के संपादक के रूप में उन्होंने ख्याति अर्जित की। बाद में वे लोकसभा के सदस्य चुने गए और केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र ने दैनिक 'लोकमत', साप्ताहिक 'सारथी' और 'श्री शारदा' के संपादक के रूप में ख्याति अर्जित की।तत्कालीन विंध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शंभूनाथ शुक्ल बाद में बने मध्यप्रदेश में मंत्री और सांसद रहे। 'विशाल भारत' के संपादक रहे बनारसी दास चतुर्वेदी दो बार राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। गणेश शंकर विद्यार्थी के शिष्य बालकृष्ण शर्मा नवीन 'प्रताप' के संपादक थे और कांग्रेस से राज्यसभा पहुंचे। महाराष्ट्र का दर्डा परिवार राजनीति में अग्रणी स्थान रखता है । 'लोकमत' समाचार के संस्थापक जवाहरलाल दर्डा, राजेन्द्र दर्डा और विजय दर्डा सांसद, विधायक और मंत्री रहे। 'विजया कर्नाटक' और 'कन्नड़ प्रभा' अखबार से जुड़े रहे प्रताप सिम्हा भाजपा से दो बार लोकसभा पहुंचे। उनका नाम चर्चा में तब आया, जब उनके द्वारा अनुमोदित विजिटर पास से दो युवकों ने नई संसद में पहुंच कर हंगामा किया। अंग्रेजी के नामवर पत्रकार खुशवंत सिंह राज्यसभा के लिए मनोनीत सदस्य के रूप राष्ट्रपति द्वारा नामित किए गए। सपा ने दैनिक जागरण के मालिकों में एक महेंद्र मोहन गुप्त को उप्र से राज्यसभा भेजा।

मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ तक सितारों की जगमगाहट-



     मूलतः पत्रकारिता से सार्वजनिक जीवन में आए मोतीलाल वोरा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और लंबे समय तक कांग्रेस के कोषाध्यक्ष थे। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने रायपुर से 'दैनिक महाकौशल' अखबार निकाला। भाजपा के मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद बने लखीराम अग्रवाल ने बिलासपुर से 'लोकस्वर' अखबार निकाला। बिलासपुर के पत्रकार बीआर यादव मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री और चार बार विधायक चुने गए। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी नवभारत, नागपुर के संपादक थे और बाद में सांसद बने। नवीन दुनिया, जबलपुर के संपादक मुंदर शर्मा विधायक और सांसद दोनों पदों पर चुने गए। जबलपुर से प्रहरी (साप्ताहिक) के संपादक रहे उसी शहर से मेयर और 2 बार राज्यसभा के सदस्य थे।

     बिलासपुर के रहने वाले कवि, पत्रकार श्रीकांत वर्मा कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा के सदस्य बने। वे 'दिनमान' के संपादक मंडल में रहने के बाद राजनीति में आए थे । छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के रहने वाले चंदूलाल चंद्राकर दैनिक 'हिन्दुस्तान' के संपादक बने। बाद में कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा में भेजा। चंद्राकर, राजीव गांधी की सरकार में मंत्री भी बने किंतु एक विवाद में नाम आने पर उनका इस्तीफा ले लिया गया। नवभारत से जुड़े रहे राजनांदगांव के पत्रकार लीलाराम भोजवानी छत्तीसगढ़ सरकार में श्रम मंत्री थे। 'देशबन्धु' में पत्रकारिता का पाठ पढ़ने वाले चंद्रशेखर साहू छत्तीसगढ़ से सांसद, मंत्री और विधायक बने। मध्यप्रदेश में सीहोर के पत्रकार शंकर लाल साहू विधायक थे। दमोह के आनंद श्रीवास्तव भी पत्रकार थे, बाद में विधायक बने। त्रिभुवन यादव पिपरिया से विधायक बने। कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे और दो बार विधायक चुने गए विष्णु राजोरिया मूलतः पत्रकार ही हैं, बाद में उन्होंने 'शिखर वार्ता' पत्रिका भी निकाली। मप्र में ही केएन प्रधान सांसद, विधायक और मंत्री भी थे। नागपुर के अंग्रेजी अखबार 'हितवाद' के प्रकाशन करने वाले बनवारी लाल पुरोहित कांग्रेस और भाजपा दोनों से लोकसभा पहुंचे। संप्रति वे पंजाब के राज्यपाल हैं।

भाजपा हो या कांग्रेस, सबने दिये मौके-



कांग्रेस ने अंग्रेजी के दिग्गज पत्रकार कुलदीप नैयर, एचके दुआ (हिंदुस्तान टाइम्स), हिंदी के राजीव शुक्ला, प्रफुल्ल कुमार माहेश्वरी, मराठी के कुमार केतकर आदि को राज्यसभा से नवाजा। राजीव शुक्ला मनमोहन सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे। शिवसेना से अंग्रेजी के पत्रकार और फिल्ममेकर प्रतीश नंदी राज्यसभा पहुंचे। पांचवा स्तंभ नामक मासिक पत्रिका निकालने वाली मृदुला सिन्हा गोवा की राज्यपाल बनीं। चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय भी जनता दल से फरूखाबाद से लोकसभा पहुंचे। वरिष्ठ पत्रकार संजय निरुपम भी लोकसभा पहुंचे, वे मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। 'सामना' के संपादक संजय राऊत अपने धारदार बयानों के लिए लोकप्रिय हैं, वे भी उद्धव ठाकरे की शिवसेना से राज्यसभा सदस्य हैं। जनता दल (यू) ने प्रभात खबर के संपादक रहे हरिवंश नारायण सिंह को दो बार राज्यसभा भेजा, वे इन दिनों राज्यसभा के उपसभापति भी हैं। 'ऑर्गनाइजर' के संपादक रहे श्री के.आर.मलकानी बाद में राज्यसभा पहुंचे। भारतीय जनता पार्टी ने अरूण शौरी, चंदन मित्रा, स्वप्नदास गुप्ता, दीनानाथ मिश्र, बलबीर पुंज, राजनाथ सिंह सूर्य, नरेन्द्र मोहन, प्रभात झा, तरुण विजय को राज्यसभा भेजा। शौरी वाजपेयी सरकार में संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री थे। उनके पास विनिवेश मंत्री का कार्यभार भी था। इनमें चंदन मित्रा बाद में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए, जबकि पुंज और झा पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी मनोनीत हुए। प्रभात झा मध्यप्रदेश भाजपा के चर्चित अध्यक्ष भी थे। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में रह चुके वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर किशनगंज से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे। बाद में भाजपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा और विदेश राज्यमंत्री बनाया। मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य कर चुके रमेश पोखरियाल निशंक का पत्रकारिता से गहरा नाता रहा है। वे दैनिक जागरण से जुड़े थे, साथ ही स्वयं का सीमांत वार्ता नाम का अखबार भी प्रकाशित किया।हिमाचल प्रदेश के उप मुख्यमंत्री मुकेश कौशिक भी मूलतः पत्रकार हैं। वह दिल्ली और शिमला में पत्रकारिता की लंबी पारी के बाद राजनीति में आए। हरियाणा के अंबाला लोकसभा क्षेत्र से 2014 में भाजपा सांसद चुने गए अश्विनी कुमार अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन 'पंजाब केसरी' के माध्यम से की गई उनकी धारदार पत्रकारिता लोगों के जेहन में है। 'इकोनॉमिक टाइम्स' में रहे देवेश कुमार बिहार में भाजपा से विधान परिषद में है और प्रदेश महामंत्री भी हैं। हरियाणा सरकार में वित्त मंत्री बने कैप्टन अभिमन्यु भी दैनिक 'हरिभूमि' के संपादक, प्रकाशक थे।

क्षेत्रीय दलों ने भी दिए अवसर-



तृणमूल कांग्रेस ने हाल में ही अंग्रेजी की पत्रकार सागरिका घोष को राज्यसभा भेजा है। इसके पूर्व उर्दू  पत्रकारिता से जुड़े रहे नदीमुल हक भी तृणमूल से राज्यसभा पहुंचे। हिंदी अखबार 'सन्मार्ग' के मालिक विवेक गुप्ता तृणमूल से सांसद भी रहे, अब विधानसभा में हैं। कुणाल घोष भी इसी दल से राज्यसभा पहुंचे।   उर्दू के पत्रकार शाहिद सिद्दीकी (उर्दू नई दुनिया) सपा से, तो मीम अफजल (अखबार-ए-नौ) कांग्रेस से राज्यसभा पहुंचे। शाहिद सपा, कांग्रेस, आरएलडी की परिक्रमा करके फिर सपा में हैं। आंध्र प्रदेश से छपने वाले तेलुगु अखबार 'वार्ता' के संपादक गिरीश सांघी कांग्रेस से राज्यसभा हो आए। पत्रकारिता से जुड़े रहे तेलंगाना के के. केशवराव कांग्रेस और टीआरएस दोनों दलों से राज्यसभा जा चुके हैं। कोलकाता के पत्रकार अहमद सईद मलीहाबादी भी राज्यसभा पहुंचे। जनता दल (यूनाइटेड) से एजाज अली भी राज्यसभा (2008 से 2010) में रहे। टीवी पत्रकार मनीष सिसोदिया आम आदमी पार्टी के दिग्गज नेताओं में हैं और दिल्ली सरकार में उपमुख्यमंत्री बने। संप्रति वे शराब घोटाले के आरोप में तिहाड़ जेल में हैं।

      कुछ पत्रकार लोकसभा चुनाव लड़कर भी संसद नहीं पहुंच पाए। जैसे वरिष्ठ पत्रकार उदयन शर्मा, सुप्रिया श्रीनेत (कांग्रेस), साजिया इल्मी, आशीष खेतान, आशुतोष (आप), और सीमा मुस्तफा जनता दल के टिकट पर लोकसभा नहीं पहुंच सके। साजिया अब बीजेपी में आ चुकी हैं।

कुछ ने नेपथ्य में तलाशी संभावनाएं-



   अनेक दिग्गज पत्रकार चुनावी समर में उतरने के बजाए नेपथ्य में ताकतवर रहे और अपने समय की राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते रहे। श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के साथ मीडिया सलाहकार एच.वाई. शारदा प्रसाद ने इंडियन एक्सप्रेस से अपना कैरियर प्रारंभ किया था। बाद में वे इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मासकम्युनिकेशन और नेशनल डिजाइन इंस्टीट्यूट की स्थापना में सहयोगी थे। उन्हें पद्मविभूषण से भी अलंकृत किया गया। इंडिया टुडे के पत्रकार सुमन दुबे भी राजीव गांधी के मीडिया सलाहकार थे। अब वे राजीव गांधी फाउंडेशन का काम देख रहे हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री कार्यालय में पदस्थ रहे अशोक टंडन, सुधीन्द्र कुलकर्णी,हरीश खरे, पंकज पचौरी, संजय बारू के नाम उल्लेखनीय हैं। इनमें टंडन और कुलकर्णी अटल जी के साथ और खरे,पचौरी, तथा बारू मनमोहन सिंह के साथ थे। बारू बाद में अपनी किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर लिखकर विवादों में भी आए।

       राजनीति के मंच पर ऐसे अनेक सितारे चमके और अपनी जगह बनाई। तमाम ऐसे भी थे, जो पार्टी के प्रवक्ता या बौद्धिक कामों से संबद्ध थे। तमाम अज्ञात ही रह गये। राजनीति वैसे भी कठिन खेल है, संभावनाओं से भरा भी। किंतु सबको इसका फल मिले यह जरूरी नहीं। बावजूद इसके इसका आकर्षण कम नहीं हो रहा। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी कहते थे, "पत्रकार की पोलिटिकल लाइन तो ठीक है, पर पार्टी लाइन नहीं होनी चाहिए।" किंतु यह लक्ष्मण रेखा भी टूट रही है। क्यों, इस पर सोचिए जरूर।

रविवार, 30 जनवरी 2022

भारतबोध का नया समयः नए युगबोध का दस्तावेज

 

- इंदिरा दांगी

(समीक्षक देश की प्रख्यात कहानीकार एवं उपन्यासकार हैं। इन दिनों भोपाल में रहती हैं।)


   प्रोफेसर संजय द्विवेदी भारतीय पत्रकारिता के प्रतिष्ठित आचार्य हैं। उनकी नई पुस्तक भारतबोध का नया समयके पहले आलेख में (जो कि पुस्तक का शीर्षक भी है) मीडिया आचार्य संजय द्विवेदी वसुधैव कुटुम्बकम् (धरती मेरा घर है) की उपनिषदीय अवधारणा को बताते हुए इस धरा को, इस धरती को ऋषियों-ज्ञानियों की जननी मानते हैं और इसी का परिणाम वे मानते हैं कि इस देश में राजसत्तायें भी लोकसत्तायें रही हैं। आलेख पुनर्जागरण से ही निकलेंगी राहेंमें लेखक प्रसिद्ध विचार गुलामी आर्थिक नहीं सांस्कृतिक होती हैकी रोशनी में अपनी बात रखते हैं। अपनी संस्कृति को लेकर नए समय के लोगों में जो हीनताबोध है, वही लेखक की चिंता है।

आज़ादी की ऊर्जा का अमृतआलेख में लेखक स्वाधीनता के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पुरोधाओं की महान परंपरा को कृतज्ञता से याद करते हैं। और एकदम यहां अनायास ही अपने पढ़ने वालों के जहन में एक सवाल भी छोड़ते चलते हैं। इस आलेख में स्वतंत्रता संग्राम के तौर पर सिर्फ कुछ गिने हुए महापुरुषों और हाईलाइट्सवाले आन्दोलनों का ही नाम नहीं लिया गया है, बल्कि वे जो सच्चे लोकनायक थे, जिनकी सब लड़ाईयां और शहादतें देश के लिए थीं, उन्हें भी समतुल्य खड़ा किया गया है। जय-विजय के बीच हम सबके रामआलेख पढ़ते हुए मुझे पंडित विद्यानिवास मिश्र का निबंध मेरे राम का मुकुट भीग रहा हैयाद आने लगता है। लेखक ने यहां तुलसी के राम, कबीर के राम, रहीम के राम से लेकर गांधी और लोहिया के राम तक को याद किया है।

गौसंवर्धन से निकलेंगी समृद्धि की राहेंआलेख न सिर्फ गौवंश पर आधारित भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अवलोकन करता है, वरन विश्व अर्थव्यवस्था में गाय के महत्त्व के साथ ही साथ उसके औषधीय महत्त्व पर भी रोशनी डालता है। एकात्म मानव दर्शन और मीडिया दृष्टिलेख में एक बहुत ही जरूरी बात है कि मीडिया की दृष्टि लोकमंगल की हो, समाज के शुभ की हो। इसी तरह चुनी हुई चुप्पियों का समयएक बहुत ही प्रासंगिक और समसमायिक आलेख है, और साथ ही इसकी विषय वस्तु कालातीत है। अद्भुत अनुभव है योगलेख को पढ़ते हुए आप इस पुस्तक में उस मुकाम तक पहुंच जाएंगे, जहां आपको लगेगा कि गौसंवर्धन का अर्थशास्त्रीय पहलू हो या नई शिक्षा नीति की बात या फिर वर्तमान राजनीति का सिनारियो या फिर विश्व योग के सिरमौर भारत पर चर्चाये पुस्तक वास्तव में इस नये समय में नये भारत को समझने में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

मोदी की बातों में माटी की महकआलेख में लेखक भारत के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी के जननायक हो जाने के सफर की पड़ताल करते हुए उनकी भाषण कला, देहभाषा और लोकविमर्श की शक्ति पर चर्चा करते हैं। खुद को बदल रहे हैं अखबारलेख में ई-पत्रकारिता के इस दौर में परंपरागत समाचार पत्रों को नये समय की चुनौतियों से रूबरू कराते हैं द्विवेदी जी। अगले लेख पत्रकारिता में नैतिकतामें जहां आचार्य द्विवेदी ग्रामीण पत्रकारिता की उपेक्षा की बात करते हैं, वहां मुझे याद आता है कि जब किसी छोटी जगह पर कोई बड़ा आयोजन होता है या कोई राजनेता जाता है तो रिपोर्टिंग करने के लिए स्टेट या राजधानी से पत्रकार जाते हैं, मतलब ग्रामीण भारत कितना उपेक्षित है भारतीय पत्रकारिता में, जबकि फिल्मी अभिनेत्रियों और अभिनेताओं की छोटी-से-छोटी खबर छपती हैं बड़े-बड़े अख़बारों में। मीडिया गुरु ने सही ही विषय लिया है इस आलेख में।

मीडिया शिक्षा के सौ वर्षमें लेखक ने पिछली एक सदी में मीडिया शिक्षा की दशा और दिशा से अवगत कराया है। संकल्प से सिद्धि का सूत्र मिशन कर्मयोगीआलेख में वे बताते हैं कि मिशन कर्मयोगी अधिकारियों और कर्मचारियों की क्षमता निर्माण की दिशा में अपनी तरह का एक नया प्रयोग है। देश को श्रेष्ठ लोकसेवकों आवश्यकता है, और ये पहली बार है कि बात सरकारी सेवकों के कौशल विकास की हो रही है।

इस पुस्तक में इन आलेखों से आगे, पत्रकारिता के शलाका पुरुषों, देव पुरुषों पर लेख हैं। देवर्षि नारद, विवेकानंद, माधवराव सप्रे, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय, बाबा साहेब आंबेडकर, वीर सावरकर, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन पर आधारित आलेख हैं।

इस तरह इस किताब में, नए युगबोध का ऐसा कोई विषय नहीं जो अछूता हो; अपनी पुस्तक में लेखक ने नए भारत से हमें मिलवाया है, नए भारतबोध के साथ। किताब पढ़कर एक आम पाठक शायद आखिर में यही सोचे कि पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में कैसी किताबें पढ़ाई जानी चाहिए-यकीनन भारत बोध का नया समयजैसी!!

पुस्तक : भारतबोध का नया समय

लेखक : प्रो. संजय द्विवेदी

मूल्य : 500 रुपये

प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, 4754/23, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली-110002