गुरुवार, 24 सितंबर 2026

विदेश नीति के भी महारथी हैं मोदी!

 

पांच देशों की यात्रा से बने हैं रिश्ते और सरोकार




        भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर यह कहा जाता है कि वे विदेश यात्राएं खूब करते हैं। एक जमाने में उन्हें लेकर मजाक भी चला कि कुछ दिन तो गुजारिए हिंदुस्तान में। किंतु उनकी विदेश यात्राओं ने भारत के साथ दुनिया के साथ रिश्तों को सहज किया है। खासकर अरब देशों के साथ भारत के रिश्ते अपने उच्चतम स्तर पर हैं। संवाद की सहजता और गतिशीलता ने भारतीय विदेश नीति को एक नए मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां औपचारिक संवाद से आगे व्यक्तिगत रिश्तों की बात भी होने लगी है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप हों, चीनी राष्ट्रपति हों या रूस के पुतिन। सबके सब मोदी का नाम लेते हैं और भारत को नजरंदाज नहीं कर सकते। इटली दौरे पर पीएम मोदी ने जियोर्जिया मेलोनी को पारले कंपनी की 'मेलोडी' टॉफी का पैकेट गिफ्ट किया, यह पल इंटरनेट पर बहुत वायरल हुआ और मेलोनी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इसका वीडियो शेयर करके पीएम मोदी को धन्यवाद दिया। जाहिर है ऐसे दृश्यों के बीच नरेंद्र मोदी ने रिश्तों का जो पुल बनाया है। उसकी चर्चा समूची दुनिया में है।

      वैश्विक तनाव के बीच भारत-यूरोप संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली सहित कई यूरोपीय देशों का दौरा किया। यह यात्रा एक ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया में जंग के हालात हैं। इन तनावपूर्ण हालात में प्रधानमंत्री का उद्देश्य सिर्फ रिश्ते बनाना नहीं हैं बल्कि भारत की जरूरतों के लिए भी है। यह तो तय है प्रधानमंत्री कोई भी काम अकारण नहीं करते। कई बार उनकी दूरदृष्टि देखी गयी है। जबकि आज की राजनीति तुरंत परिणाम देने वाले संकेतों को ही समझती है। जबकि विदेशनीति में आज रोपे गए बीज कल वृक्ष बनकर परिणाम देते हैं। संवाद और सातत्य ही इसका एकमात्र हल है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री की यह यात्रा भी अनेक लक्ष्यों को साधती है। बताते है कि उनकी यह यात्रा तो काफी पहले से ही नियोजित थी जिसमें भारत-नार्डिक शिखर सम्मेलन भी शामिल था। किंतु 2025 में हुए पहलगाम हमले से सारा कुछ ठहर गया। यह यात्रा उन भारत-यूरोप संबंधों पर नए तरह से रिश्तों को पारिभाषित करना चाहती थी, क्योंकि इन दिनों वैश्विक राजनीति में विश्व शक्तियों का आचरण और व्यवहार काफी कुछ बदला हुआ है।

युद्ध में दुनिया और भारत की भूमिका-

यूक्रेन युद्ध से प्रारंभ हुआ वैश्विक तनाव अब इजराइल-अमरीका और ईरान युद्ध तक जा पहुंचा है। युद्धकामी शक्तियां पीछे हटने को तैयार नहीं है। भारत जैसा देश जो अपनी ऊर्जा सहित तमाम जरूरतों के लिए दुनिया के तमाम देशों पर निर्भर है, वह बैठा नहीं रह सकता। साथ ही अमरीका की टैरिफ से जुड़ी मनमानियां और चीन का अड़ियल रवैया भारत को शांति से बैठने नहीं दे रहा। ऐसे में भारत के राष्ट्रध्यक्ष की चुनौतियां बहुत बढ़ जाती हैं। उन्हें न सिर्फ देश के अंतर की व्यवस्था के सामान्य रखना है बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत के हितों का ख्याल रखना है। क्योंकि दोंनो एक दूसरे से संयुक्त हैं। हम देखते हैं कि पिछले साल लागू हुआ भारत-ईएफटीए व्यापार समझौता और इस साल के आखिर में संपुष्ट/हस्ताक्षरित होने वाला भारत-ईयू एफटीए सप्लाई चेनों और बाजारों में विविधता लाने की साझा इच्छा को दिखाते हैं। खास तौर पर उन नॉर्डिक देशों के साथ, जहां भारत के संग होने वाला द्विपक्षीय व्यापार 20 अरब डॉलर के नीचे बना हुआ है। ऐसे में भारत को इन देशों के साथ ज्यादा बेहतर रिश्ते बनाने की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता।

   आज के समय में भारत की प्राथमिकता एक ऐसी दुनिया को स्थापित करने पर जिसमें विदेशी मुद्रा और ऊर्जा संरक्षण दोनों की बचत हो सके। इन लक्ष्यों को साधे बिना किसी भी विकासशील देश के सामने गहरे संकट घिर जाएंगें। संयुक्त अरब अमीरात में दीर्घकालिक रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्वों पर और नॉर्डिक-भारत शिखर सम्मेलन में हरित रणनीतिक साझेदारियों पर हुई चर्चाओं का लक्ष्य ऊर्जा सुरक्षा पर सहयोग को आगे ले जाना था। मोदी इन सामूहिक लक्ष्यों के साथ युद्धविहीन दुनिया का सपना देखते हैं। वे साफ कहते हैं कि यह युद्ध का समय नहीं है। आंतकवाद और युद्ध विहीन दुनिया उनका ही हर भारतवासी का सामूहिक स्वप्न है। क्योंकि भारत का उद्देश्य ही विश्वमंगल है और उसका ध्येय मंत्र वसुधैव कुटुम्बकम् है। प्रधानमंत्री इसी भारत भाव को दुनिया के हर मंच पर स्थापित करते हुए दिखते हैं। मोदी की समूची यात्रा में यूक्रेन और ईरान संघर्षों पर स्वस्थ चर्चा, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बातचीत शामिल रही। एआई गवर्नेंस और क्रिटिकल मिनरल संबंधी पहलों पर भी फोकस था। नॉर्डिक देशों ने जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुए आर्कटिक में वैज्ञानिक सहयोग और समुद्री (मैरिटाइम) सहकार पर फोकस किया। इन दौरों से कुछ खास ठोस नतीजे या वास्तविक व्यापार समझौते हासिल नहीं हुए, लेकिन दोस्ताना माहौल और मोदी को दिये गये पुरस्कारों ने ज्यादा गहरे भारत-यूरोप सहयोग की उम्मीदों का संकेत दिया। यह जुड़ाव और मजबूत होगा जब वह जून में जी-7 आउटरीच समिट के लिए फ्रांस की यात्रा करेंगे और स्लोवाकिया का द्विपक्षीय दौरा करेंगे, और इसी साल के आखिर में ब्रुसेल्स में भारत-ईयू एफटीए पर दस्तखत करेंगे।

रिश्तों पर खास जोर-

 यह यात्रा साफ बताती है कि प्रधानमंत्री यूरोपीय देशों से अपने रिश्ते बेहतर करना चाहते हैं। एक शानदार लोकतंत्र भारत के लोग यूरोप के देशों से जुड़ना चाहते हैं। उनका विचार है यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यूक्रेन में रुस की आक्रामता, अमरीकी-इजराइल और ईरान के संघर्ष के बीच चीन का आर्थिक दबाव तीन ऐसे कारण हैं जो हमें साथ होने के प्रेरित करते हैं। इसका साफ उद्देश्य है कि अंतराष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था बने और चले भी। ताकि किसी देश की तानाशाही के आधार पर चीजों को बिगाड़ा न जा सके। भारत ईएफटीए व्यापार समझौते और आगामी भारत ईयूएफटीए पर केंद्रित है। इसके साथ ही मोदी का जोर आपूर्ति श्रृखंलाओं और बाजारों के विविधीकरण पर है। ताकि हमारा व्यापार विशेष रुप से नार्डिक देशों के साथ बढ़ सके, जो अभी मात्र 20 अरब डालर से कम है। जाहिर तौर यह क्षेत्र संभावनाओं से भरा है, जहां भारत दांव लगा रहा है।

ऊर्जा जरुरतों के लिए बढ़ती साझेदारी-

 भारत की ऊर्जा जरूरतें इस समय एक बड़ी चुनौती हैं। संयुक्त अरब अमीरात में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को लेकर चर्चा हुई। भारत और यूएई ने पेट्रोलियम भंडार, दीर्घकालिक एलपीजी आपूर्ति और रक्षा सहयोग से संबंधित कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। ये समझौते पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच अबू धाबी में उच्च स्तरीय वार्ता के बाद हुए। यूएई ने भारत में 5 अरब अमरीकी डॉलर के निवेश का भी वादा किया है। इन समझौतों में इंडियन स्‍ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्वस लिमिटेड और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए हस्ताक्षरित रणनीतिक सहयोग समझौता शामिल हैं। इसमें पेट्रोलियम भंडार में सहयोग और तरल प्राकृतिक गैस और एलपीजी भंडारण सुविधाओं पर सहयोग शामिल है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस समझौते से भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में यूएई की हिस्सेदारी बढ़कर 3 करोड़ बैरल हो जाएगी और भारत में रणनीतिक गैस भंडार स्थापित किए जाएंगे। दोनों पक्षों ने एलपीजी पर एक अलग रणनीतिक सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर किए, जिससे भारत में व्यापक रूप से ईंधन की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित होने की उम्मीद है।भारत और संयुक्त अरब अमीरात ने एक रणनीतिक रक्षा साझेदारी के ढांचे पर भी हस्ताक्षर किए, जो रक्षा औद्योगिक सहयोग, प्रौद्योगिकी साझाकरण, नवाचार और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग पर केंद्रित है।

संवाद से संकटों के हल तलाशने की तैयारी-

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलग रहते हुए भी संकटों के हल के लिए चल रहे प्रयासों से खुद को अलग नहीं किया। वे संवाद के स्तर रूस और यूक्रेन दोनों देशों से संवाद बनाए हुए हैं। इसी तरह ईरान, इजराइल और अमरीका से भारत का संवाद निरंतर है। इन यात्राओं में प्रधानमंत्री ने एआई गर्वनेंस पर चर्चा की और खनिज पहलों पर भी संवाद किया। ओस्लो में, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, डेनमार्क की कार्यवाहक प्रधानमंत्री सुश्री मेटे फ्रेडरिक्सन, नॉर्वे के प्रधानमंत्री श्री जोनास गहर स्टोरे, फिनलैंड के प्रधानमंत्री श्री पेटेरी ओर्पो, आइसलैंड की प्रधानमंत्री सुश्री क्रिस्ट्रुन म्योल फ्रॉस्टडॉटिर और स्वीडन के प्रधानमंत्री श्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया। यह शिखर सम्मेलन 2022 में कोपेनहेगन और 2018 में स्टॉकहोम में आयोजित पिछले दो शिखर सम्मेलनों पर आधारित है। प्रधानमंत्रियों ने इस बात पर ध्यान दिया कि वे वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल और तीव्र आर्थिक एवं तकनीकी परिवर्तन के दौर में मिल रहे हैं और साझा हितों और मूल्यों पर आधारित पारस्परिक लाभ के लिए भारत और नॉर्डिक देशों के बीच साझेदारी को गहरा करने और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सहयोग करने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की। इस संदर्भ में, उन्होंने भारत-नॉर्डिक संबंधों को एक विश्वसनीय हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाने का निर्णय लिया। प्रधानमंत्रियों ने तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में हुई चर्चाओं पर संतोष व्यक्त किया और भारत-नॉर्डिक सहयोग को और अधिक विस्तारित एवं गहरा करने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की। नेताओं ने निर्णय लिया कि चौथे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी फिनलैंड करेगा।

सम्मान से जीवंत रिश्तों का प्रारंभ-

    नार्वे में उन्हें  रॉयल नॉर्वे ऑर्डर ऑफ मेरिट के ग्रैंड क्रॉससे सम्मानित किया गया तो वहीं स्वीडन के प्रतिष्ठित रॉयल ऑर्डर ऑफ़ पोलर स्टार, कमांडर ग्रैंड क्रॉस से भी वे अलंकृत किए गए। यह सम्मान भारत और स्वीडन के बीच मजबूत होते कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों का प्रतीक माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों में व्यापार, हरित ऊर्जा, तकनीक और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में साझेदारी लगातार बढ़ी है। ये सूचनाएं बताती हैं कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में दुनिया के मंचों पर भारत की बात सुनी जा रही है और उसे गंभीरता से लिया जा रहा है। पांच देशों की उनकी यात्रा से तत्काल भले कुछ हासिल होता हुआ न दिखे, किंतु रिश्तों की महक, खुशबू और आने वाले समय के लिए कुछ तार तो जुड़े ही हैं। विदेश नीति को इस सहजता और सौजन्य से लेना ही मोदी की विरासत है।


 

 

 

 

 

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