स्नातकों
की घटती ‘रोजगार क्षमता’ बड़ी चुनौती
-प्रो.संजय
द्विवेदी
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तो रहे हैं पर आप सीखते क्या हैं? यह सवाल हमारी शिक्षा व्यवस्था के सामने यक्ष
प्रश्न की तरह खड़ा है। इसे ऐसे ही समझिए कि भाषा के विद्यार्थी के पास ‘सही भाषा’ नहीं है, उसके उपयोग का कौशल नहीं है। ऐसे
में कौशल विकास की नारेबाजियों के बीच हम क्या कर रहे हैं यह एक बड़ा सवाल है।
आंकड़े बताते हैं कि देश में उच्च शिक्षा के व्यापक विस्तार से अब शोध करने वालों
की संख्या भी बढ़ी है। यानि उच्च शिक्षा में बहार के दिन हैं। स्नातक और
स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले बढ़े हैं। हर वर्ग, समुदाय की शिक्षा के प्रति
ललक बढ़ी है, किंतु स्नातकों की रोजगार-क्षमता (इंप्लायबिलिटी) अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। डिग्री और जॉब मार्केट के बीच की इन
खाइयों को पाटने पर चिंतन जरुरी हो जाता है।
डिग्रियां
बांटने का कारखाना बने हैं परिसर-
आखिरकार हमारे नौजवान क्या और कैसे पढ़ रहे
हैं कि वे रोजगार के मोर्चे पर आवश्यक योग्यताएं नहीं रखते। सरकारी और निजी
विश्वविद्यालयों, कालेजों की पहुंच बढ़ी है। शिक्षा के लिए सरकार के इंतजाम तो हैं
ही शिक्षा में सक्रिय बाजार के खिलाड़ी भी उत्साहित हैं। देश में उच्च शिक्षण
संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सकल नामांकन
अनुपात में ऐतिहासिक वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी तरफ युवाओं
और स्नातकों के बीच बेरोजगारी व कौशल अंतराल (स्किल गैप) एक
गंभीर विमर्श का विषय बन गया है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी अखिल
भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (2023-24) की रिपोर्ट और श्रम बाजार पर आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि हालात अच्छे नहीं
हैं। ऐसे में क्या हमारी उच्च शिक्षा केवल 'डिग्रियां बांटने
का कारखाना' बनकर रह गई है या यह युवाओं को वास्तविक अर्थों
में सक्षम बना रही है? डिग्रियां लेकर समाज में खड़े नौजवान
आखिर क्या करेगें, क्या वे डिग्रीधारी बेरोजगार बनकर रह जाएंगें। ऐसे में
बेरोजगारी को समाप्त करने के लिए रास्ता क्या है। नई शिक्षा नीति कौशल विकास पर
खासा जोर देती है किंतु हमारे पास अधोसंरचना का टोटा है और अध्यापकों का अभाव
जिसके चलते हर अच्छा सपना दम तोड़ देता है। देश के सामाजिक, भौगोलिक और आर्थिक
हालात में समान शिक्षा की बात बेमानी है। निजी विश्वविद्यालयों में बहुत फीस देकर
भी बहुत कुछ अर्जित नहीं हो रहा है। विद्यार्थियों के साथ क्लाइंट्स सरीखा व्यवहार
हो रहा है और कई जगह सिर्फ डिग्रियां बंट रही हैं। कुछ विद्यार्थी भी ऐसे हैं
जिन्हें सिर्फ नाम के लिए डिग्री चाहिए, ऐसे लोग वातावरण को बिगाड़ने का ही काम
करते हैं।
परिसरों
में हैं पर कुछ सीखते नहीं-
देश में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात
बढ़कर 30% तक
पहुँच गया है। कुल नामांकन बढ़कर 4.50 करोड़ हो गया है, जिसमें महिलाओं की हिस्सेदारी 31.2
और कुल नामांकन 2.24 करोड़ में उल्लेखनीय और
निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग
के छात्रों की भागीदारी में ऐतिहासिक उछाल आया है, जो
सामाजिक समावेशन का बड़ा संकेत है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी,
इंजीनियरिंग और गणित पाठ्यक्रमों में भी विद्यार्थियों की संख्या
बढ़कर 1.02 करोड़ हो गई है। विभिन्न श्रम एवं आजीविका
अध्ययनों (जैसे ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया’ और ‘इंडिया स्किल्स रिपोर्ट’) के
अनुसार, 25 वर्ष से कम आयु के स्नातकों में बेरोजगारी दर
लगभग 40% के करीब है, जबकि 25-29
वर्ष आयु वर्ग के स्नातकों में यह करीब 20% है। राष्ट्रीय स्तर पर समग्र रोजगार-क्षमता सीमित बनी हुई है, जो दर्शाती है कि डिग्री धारकों के पास आधुनिक उद्योगों की माँग के अनुकूल
व्यावहारिक कौशल की कमी है। उच्च डिग्रियां (जैसे इंजीनियरिंग या स्नातकोत्तर)
हासिल करने के बाद भी युवाओं का पारंपरिक या बेहद कम कौशल वाले अस्थाई कार्यों पर
निर्भर होना। यह चिंता की बात है बहुत बड़ी डिग्रियां लेकर भी नौजवानों को उनकी
शिक्षा के अनुरुप कार्य नहीं मिलता। इसका कारण सिर्फ बेरोजगारी नहीं है बल्कि उनका
कौशल युक्त न होना भी है। निजी क्षेत्र में रोजगार पाने के लिए बेहद सक्रिय
व्यक्तित्व और हुनर के आधार पर ही होता है। अनेक नियोक्ताओं से चर्चा होती है तो
वे बेहतर का
उच्च शिक्षा संस्थानों में आज भी सैद्धांतिक
और पारंपरिक शिक्षा पर अधिक जोर है, जबकि
उद्योग जगत की मांग तकनीकी व विश्लेषणात्मक दक्षता की है। भारी संख्या में
संस्थानों के खुलने के बावजूद छात्र-शिक्षक अनुपात और बुनियादी शोध निवेश के मामले
में हम वैश्विक मानकों से पीछे हैं। स्कूली शिक्षा के स्तर से ही (विशेषकर छठी
कक्षा से) व्यावसायिक और कौशलपरक शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल करने की आवश्यकता
पर नीति आयोग ने बल दिया है। नई शिक्षा नीति भी इसी ओर ध्यान दिलाती है किंतु
हमारे परिसर इसके लिए तैयार हैं? पाठ्यक्रम ऐसे हों जो बाजार
की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर सकें। डिग्री कार्यक्रमों के साथ 'कमाने के साथ और अप्रेंटिसशिप मॉडल’ को बढ़ावा देना चाहिए
। देश को जनसांख्यिकी लाभांश का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है जब हम मात्रात्मक
विस्तार से आगे बढ़कर गुणात्मक उत्कृष्टता और रोजगार-उन्मुख सुधारों की ओर तेजी से
कदम बढ़ाएं। भारत जैसे देश में जहां उसका आकार-प्रकार एक समस्या है। दूसरी ओर
गांवों की ओर हालात काफी खराब हैं। शासकीय विद्यालयों में भी शिक्षकों का अभाव है।
लोग ग्रामीण, गिरिवासी और वनवासी क्षेत्रों में जाना नहीं चाहते और शहर के आसपास
ही नौकरियां करना चाहते है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। निजी
विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के संजाल से शिक्षा का हाल भी बदहाल हो रहा है। आज
सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों मिलकर भी इस देश की आवश्यक्ता की पूर्ति नहीं कर
सकते। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चुनौती तो अलग है ही। इसके चलते देश में कई स्तरों
की शिक्षा चल रही है। समान शिक्षा और समान अवसर ऐसे समय में स्वप्न ही बनकर रह गया
है।
(लेखक
भारतीय जन संचार संस्थान-आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक हैं। संप्रति माखनलाल
चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग
के अध्यक्ष हैं।)

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