- संजय
द्विवेदी
भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो मृत्युंजय है। विश्व के अनेक विद्वानों, रहस्यदर्शियों, वैज्ञानिकों और प्रतिभावान शोधार्थियों ने भारत की अमरता को सिद्ध किया है। किसी ने इसे ज्ञान की भूमि कहा तो किसी ने मोक्ष की, किसी ने इसे सभ्यताओं का मूल कहा तो किसी ने इसे भाषाओं की जननी कहा। किसी ने यहां आत्मिक पिपासा बुझाई तो कोई यहां के वैभव से चमत्कृत हुआ। कोई इसे मानवता का पालना मानता है तो किसी ने इसे संस्कृतियों का संगीत कहा। ऐसी महान संस्कृति का आंगन भारत है, जिसकी हर सांस में ही पूरी वसुधा को एक कुटुम्ब मानने की आकांक्षा है। अपनी इसी आकांक्षा के नाते यह देश कह पाया कि- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। दरअसल इसीलिए भारत मृत्युंजय है। वह वसुधा पर ऐसी संस्कृति का संवाहक है जो प्रेम, करूणा, संवेदना के भावों से भरी है और समूची मानवता के कल्याण के बात करती है। इसी तरह उत्तर प्रदेश हमारी सांस्कृतिक परंपरा का सबसे जीवंत उत्तराधिकारी है। राम,कृष्ण शिव से जुड़े स्थान उसे अलग ही गरिमा प्रदान करते हैं। उत्तर प्रदेश में सांस्कृतिक नगरियों के रूप में अयोध्या, मथुरा और काशी की उपस्थिति इसके इतिहास वैभव को दर्शाती हैं। पुण्यसलिला गंगा के किनारे बसे तमाम नगर और गांव भारत की असली कहानी कहते हैं। यह गौतम बुद्ध की घरती है। जहां कुशीनगर और सारनाथ जैसे स्थान युवाओं को प्रेरित करते हैं।
ऐसी महान संस्कृति हमारे लिए प्रेरणा का
कारण बनना चाहिए। किंतु गुलामी के लंबे कालखंड और विदेशी विचारों ने हमारे अपने
गौरव ग्रंथों, मानबिंदुओं, पुण्यस्थलों पर गर्द की चादर डाल दी। इस पूरे दृश्य को इतना
धुंधला दिया गया कि हमें अपने गौरव का, अपने मान का, अपने ज्ञान का आदर ही न रहा। यह हर क्षेत्र में हुआ। हर क्षेत्र को विदेशी
नजरों से देखा जाने लगा। हमारे अपने पैमाने और मानक भोथरे बना दिए गए। स्वामी
विवेकानंद को याद करें वे उसी स्वाभिमान को जगाने की बात करते हैं। महात्मा गांधी
से लेकर जयप्रकाश नारायण ने हमें उसी स्वत्व की याद दिलायी। सोते हुए भारत को
जगाने और झकझोरने का काम किया। ऐसे समय में जब एक बार फिर हमें अपने स्वत्व के
पुर्नस्मरण की जरूरत है तो पत्रकारिता इसमें एक बड़ा साधन बन सकती है। हम देश में
अपने नायकों की तलाश कर रहे हैं। वे हमारी जमीन के नायक हैं,इस
देश के इतिहास के नायक हैं। उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार ने अनेक नायकों को
स्मरण करते हुए उनके महत्व से आने वाली पीढ़ी को अवगत कराना आरंभ किया है।
साहित्यिक
नायकों की भूमि-
साहित्य और पत्रकारिता के अनेक नायक भी उत्तर
प्रदेश की भूमि से उपजे हैं। पत्रकारिता की अपनी एक संस्कृति है। खासकर भारत के
संदर्भ में पत्रकारिता लोकजागरण का ही अनुष्ठान है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में
ही देश में तेजी से पत्रकारिता का विकास हुआ और इसके चलते देशभक्ति,
जनजागरण और समाज सुधार के भाव इसकी जड़ों में हैं। आजादी के बाद
इसमें कुछ बदलाव आए और आज बाजारवादी शक्तियों का प्रभाव इस माध्यम पर काफी देखा जा
रहा है। साहित्य हो या मीडिया दोनों का काम है, लोकमंगल
के लिए काम करना। राजनीति का भी यही काम है। लोकमंगल हम सबका ध्येय है। लोकतंत्र
का भी यही उद्देश्य है। संकट तब खड़ा होता है जब लोक हमारी नजरों से ओझल हो जाता है। लोक हमारे
संस्कारों का प्रवक्ता है वह हमें बताता है कि क्या करने योग्य है और क्या करने
योग्य नहीं है। इसलिए लोकमानस की मान्यताएं ही हमें
संस्कारों से जोड़ती हैं और इसी से हमारी संस्कृति पुष्ट होती है।
भारतीय संस्कृति में सामाजिक संवाद की अनेक
धाराएं है। संवाद की परंपराएं हैं। शास्त्रार्थ हमारे लोकजीवन का हिस्सा है। समाज
में विविध समाजों और रिश्तों के बीच संवाद की परंपराएं हैं। हमें उनपर ध्यान देने
की जरूरत है। सुसंवाद से ही सुंदर समाज की रचना संभव है। मीडिया इसी संवाद का
केंद्र है। वह हमें भाषा भी सिखाता है और जीवन शैली को भी प्रभावित करता है। आज
खासकर दृश्य मीडिया पर जैसी भाषा बोली और कही जा रही है उससे सुसंवाद कायम नहीं
होता,
बल्कि समाज में तनाव बढ़ता है। इसका भारतीयकरण करने की जरूरत है।
हमारे जनमाध्यम ही इस जिम्मेदारी को निभा सकते हैं। वे समाज में मची होड़ और
हड़बड़ी को एक सहज संवाद में बदल सकते हैं।
उत्तर
प्रदेश की धरती पर देसराग-
कोई भी समाज सिर्फ आधुनिकताबोध के साथ नहीं
जीता, उसकी सांसें तो ‘लोक’ में ही होती हैं। भारतीय जीवन की मूल चेतना तो लोकचेतना ही है। नागर जीवन
के समानांतर लोक जीवन का भी विपुल विस्तार है। खासकर हिंदी का मन तो लोकविहीन हो
ही नहीं सकता। यह भाग्य ही है उत्तर प्रदेश कवि तुलसीदास, कबीर, रसखान, सूरदास
की भूमि है। बाद में मैथिलीशरण गुप्त से लेकर अज्ञेय तक उप्र की भूमि से संपर्क
रखते थे। नागरबोध आज भी हिंदी जगत की उस तरह से पहचान नहीं बन सका है। भारत गांवों
में बसने वाला देश होने के साथ-साथ एक प्रखर लोकचेतना का वाहक देश भी है। किंतु
लोकजीवन के तमाम किस्से, गीत-संगीत और प्रदर्शन कलाएं, शिल्प एक नई पैकेजिंग में सामने आ रहे हैं। इनमें बाजार की ताकतों ने
घालमेल कर इनका मार्केट बनाना प्रारंभ किया है। इससे इनकी जीवंतता और मौलिकता को
भी खतरा उत्पन्न हो रहा है। जैसे आदिवासी शिल्प को आज एक बड़ा बाजार हासिल है
किंतु उसका कलाकार आज भी फांके की स्थिति में है। जाहिर तौर पर हमें अपने लोक को
बचाने के लिए उसे उसकी मौलिकता में ही स्वीकारना होगा। हजारों-हजार गीत, कविताएं, साहित्य, शिल्प
और तमाम कलाएं नष्ट होने के कगार पर हैं। किंतु उनके गुणग्राहक कहां हैं।
उत्तर प्रदेश जैसे एक विशाल भू-भाग में बोली
जाने वाली अनेक बोलियां, उनका
साहित्य-जो वाचिक भी है और लिखित भी। उसकी कलाचेतना, प्रदर्शन
कलाएं सारा कुछ मिलकर एक ऐसा लोक रचती है जिस तक पहुंचने के लिए अभी काफी समय
लगेगा। लोकचेतना तो वेदों से भी पुरानी है। क्योंकि हमारी परंपरा में ही ज्ञान बसा
हुआ है। ज्ञान, नीति-नियम, औषधियां, गीत, कथाएं, पहेलियां
सब कुछ इसी ‘लोक’ का हिस्सा
हैं। हिंदी अकेली भाषा है जिसका चिकित्सक भी ‘कविराय’ कहा जाता था। बाजार आज सारे मूल्य तय कर रहा है और यह ‘लोक’ को नष्ट करने का षडयंत्र है। यह सही मायने
में बिखरी और कमजोर आवाजों को दबाने का षडयंत्र भी है। इसका सबसे बड़ा शिकार हमारी
बोलियां बन रही हैं, जिनकी मौत का खतरा मंडरा रहा है।
मुख्यधारा मीडिया के मीडिया के पास इस
संदर्भों पर काम करने का अवकाश नहीं है। किंतु समाज के प्रतिबद्ध पत्रकारों, साहित्यकारों को आगे आकर इस चुनौती को स्वीकार करने की जरूरत है क्योंकि ‘लोक’ की उपेक्षा और बोलियों को नष्ट कर हम अपनी
प्रदर्शन कलाओं, गीतों, शिल्पों
और विरासतों को गंवा रहे हैं। जबकि इसके संरक्षण की जरूरत है। संस्कृति अलग से कोई चीज नहीं होती, वह हमारे समाज
के सालों से अर्जित पुण्य का फल है। इसे बचाने के
लिए, संरक्षित करने के लिए और इसके विकास के लिए समाज और
मीडिया दोनों को साथ आना होगा। तभी हमारे गांव बचेगें, लोक
बचेगा और लोक बच गया तो संस्कृति बचेगी।
यह बहुत खुशी की बात है कि उत्तर प्रदेश
सरकार द्वारा युवाओं के समग्र विकास के लिए तैयार की जा रही 'एकीकृत युवा नीति' में शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के साथ-साथ राज्य की समृद्ध संस्कृति और विरासत के
संरक्षण को भी प्रमुखता से शामिल किया गया है, ताकि युवा
अपनी जड़ों से जुड़े रहें। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की
'कला संस्कृति विकास योजना' और युवा
कलाकारों के लिए छात्रवृत्ति योजना। उत्तर प्रदेश के युवा कलाकार शास्त्रीय संगीत,
लोक नृत्य और पारंपरिक थिएटर (जैसे नौटंकी और ख्याल) को जीवित रखने
के लिए इन राष्ट्रीय छात्रवृत्ति और गुरु-शिष्य परंपरा का लाभ उठा रहे हैं। उत्तर
प्रदेश सरकार की 'एक जिला, एक उत्पाद'
(ODOP) और 'मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना'। प्रदेश के युवा इन योजनाओं के वित्तीय समर्थन से भदोही के कालीन,
लखनऊ की चिकनकारी और वाराणसी की सिल्क साड़ियों जैसे पारंपरिक
उद्योगों को आधुनिक ई-कॉमर्स से जोड़कर वैश्विक स्तर पर पहुँचा रहे हैं।
युवा
संभालें जिम्मेदारी-
देश के सबसे युवा राज्यों में शामिल होने के
नाते,
यूपी के पास कार्यबल की बड़ी ताकत है, जो
राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संपदा को आर्थिक विकास का मुख्य आधार बना सकती
है।अयोध्या (श्री राम जन्मभूमि), काशी विश्वनाथ कॉरिडोर,
मथुरा-वृंदावन और प्रयागराज कुंभ का वैश्विक स्वरूप। इन
सांस्कृतिक-धार्मिक केंद्रों पर पर्यटकों की रिकॉर्ड वृद्धि के कारण स्थानीय
युवाओं के लिए टूर गाइड, होटल मैनेजमेंट, और इवेंट प्लानिंग के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित
हुए हैं। संविधान के तहत राज्य के युवाओं का यह नैतिक और संवैधानिक दायित्व है कि
वे हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली
परंपरा का परीक्षण करें और ऐतिहासिक स्मारकों की रक्षा करें। राज्य के युवा तकनीकी
नवाचार का उपयोग करके 'आर्ट-टेक' स्टार्टअप्स
की शुरुआत कर रहे हैं, जिसके जरिए प्राचीन पांडुलिपियों,
लोक कथाओं और ऐतिहासिक धरोहरों को डिजिटल आर्काइव में बदला जा रहा
है। कजरी, चैती, रसिया और बिहावा जैसे
लोकगीतों को आधुनिक संगीत शैली के साथ प्रस्तुत करके प्रदेश के युवा नई पीढ़ी के
बीच अपनी सांस्कृतिक विरासत को लोकप्रिय बना रहे हैं। इसके तहत युवाओं को
हस्तशिल्प डिजाइनिंग, ट्रेडिशनल पेंटिंग और हेरिटेज
प्रिजर्वेशन जैसी विधाओं में प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिससे
पारंपरिक कलाओं का व्यावसायिक क्षरण रुक सके। आधुनिकीकरण के प्रभाव के बीच यूपी के
युवाओं के समक्ष पश्चिमी संस्कृति और अपनी समृद्ध पारंपरिक पहचान के बीच संतुलन
बनाने की चुनौती है, जिसे वे अपनी रचनात्मकता से सार्थक कर
रहे हैं।

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