गुरुवार, 24 सितंबर 2026

खबरों की दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चुनौती

 

यहां आंखों देखा और कानों सुना भी झूठ हो सकता है!

-प्रो.संजय द्विवेदी



       मीडिया की दुनिया के लिए यह सबसे कठिन समय है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने सब कुछ हिलाकर रख दिया है। अगले पांच वर्षों में न्यूज रुम का चेहरा बदलने के संकल्प के साथ इस नए ज्ञान क्षेत्र ने जितने कम समय में अपनी उपयोगिता बनाई है, वह चकित करने वाली है। जिस दौर में समूचा मीडिया विश्वसनीयता और प्रामणिकता के संकट से जूझ रहा है, ऐसे समय में एआई के लिए मीडिया समूहों का उत्साह और उसकी स्वीकार्यता वास्तव में आश्चर्य में डालने वाली है।

       सही मायनों में यह वह समय है जब आंखों देखी तथा कानों सुनी बातें भी छलावा और धोखा साबित हो रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक ने सूचनाओं का ऐसा धुंधला समंदर रच दिया है, जहाँ कुछ क्षणों में फर्जी खबरें सच का लिबास पहनकर तैरने लगती हैं। ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि खबर कितनी तेजी से आप तक पहुँच रही है, बल्कि असली चुनौती यह है कि उस पर भरोसा कितना किया जाए। मशीनी एल्गोरिदम शब्दों को सजा सकता है, आंकड़े जोड़ सकता है, लेकिन सच को तलाशने की नैतिक हिम्मत और मानवीय संवेदना केवल एक निष्पक्ष पत्रकार के पास ही होती है।

डीपफेक से मुकाबला-

         युद्ध और राजनीतिक भाषणों के फर्जी वीडियो और आडियो वायरल हो जाना अब नई बात नहीं रही। पिछले चुनाव में भी कई दिवंगत नेताओं के वीडियो चले जिसमें वे अपनी पार्टी के वोट की अपीलें कर रहे हैं। जनमत को प्रभावित करने के लिए ऐसे प्रयास चरम पर हैं, जिनकी विश्वसनीयता शून्य है। 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम' की एक रिर्पोट में एआई जनित गलत सूचनाओं को दुनिया के बड़े खतरों में बताया गया है। आज दुनिया और देश के अनेक बड़े मीडिया हाउस आधिकारिक तौर पर एआई का उपयोग डेटा विश्लेषण और अनुवाद के लिए कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि कई हजार पेज के डेटा का आंकलन -विश्लेषण सामान्य मनुष्य के लिए कई महीनों का काम है जिसे एआई के टूल्स मिनटों में संभव कर रहे हैं। बावजूद इसके अनेक मीडिया आउटलेट्स एआई से खबरें या विश्लेषण लिखवाकर हंसी के पात्र बन रहे हैं। ऐसे में संशोधन, सुधार और मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त सामग्री से कचरा तो बढ़ ही रहा है, विश्वनीयता के नए संकट सामने हैं। बड़े भाषा माडल (एलएलएम) कभी पूरी तरह से काल्पनिक आंकड़े, अदालत के फैसला और ऐतिहासिक घटनाएं गढ़ते हुए दिखते हैं। जिसे सामान्य पाठक सच समझ बैठता है। तकनीकी विशेषज्ञ इसे हैलुसिनेशन कह रहे हैं। जिसका सीधा आशय यह है कि जिन चीजों के सटीक जवाब एआई के पास नहीं होते वह उनके मनगढंत उत्तर प्रस्तुत कर देता है। सजग संपादक और संपादकीय दृष्टि के अभाव में यह सामग्री कई तरह से संकट पैदा कर सकती है।

खबरों में सच की तलाश-

       सच और झूठ का फासला बहुत कम हो गया है। खबरों का सत्यापन पत्रकारिता की पहली शर्त है। लेकिन होड़ और दौड़ में वह धूमिल हो रही है। सामान्य से लगते कामों में एआई का उपयोग तो किया जा रहा है किया भी जाना चाहिए। किंतु किसी खोजी रिपोर्ट के लिए जमीनी स्तर पर जाकर काम करना, कागजात की जांच करना पत्रकारों की ही जिम्मेदारी है। तकनीक पर अति निर्भरता के समय में हमें उसके गंभीर खतरों का भी भान होना चाहिए। मैदानी पत्रकारिता में मिट्टी की जो खुशबू है वह मैदान में उतरे बिना प्रामणिक और भरोसेमंद नहीं हो सकती। मानवीय संस्पर्श और संवेदना किसी खबर का वितान बड़ा कर सकती है। जाहिर तौर पर पत्रकारिता की निर्भरता पूरी तरह एआई टूल्स पर संभव नहीं है। पत्रकारिता जहां निष्पक्षता, समाज के हित-सद्भाव, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर चिंतन को प्राथमिकता देती है, वहीं एल्गोरिदम का पूर्वाग्रह संभव है। अतः इसे समझने की जरुरत है। एआई माडल उसी डेटा से सीखते हैं जो उपलब्ध है। ऐसे में उपलब्ध डेटा अगर किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त है तो एआई भी उसी प्रकार के परिणाम देगा। कई शोध बताते हैं कि पश्चिमी मानकों पर ट्रेंड एआई माडल अक्सर विकासशील देशों के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर गलत संदर्भ प्रस्तुत करते हैं।

आसानी से अर्जित नहीं होता भरोसा-

        भरोसा या विश्वास वह शब्द है जिसे प्राप्त करना आसान नहीं है। आप भले एआई का उपयोग करें किंतु जैसे ही आप यह लिखते हैं कि –खबर एआई द्वारा बनी है और इसे मानव संपादक के द्वारा देख लिया गया है। पाठक का भरोसा एआई जनित खबर पर तुरंत कम हो जाता है। पाठक वास्तविक पत्रकारों और लेखकों द्वारा लिखी गई सामग्री को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। कोई भी अखबार या मीडिया हाउस सालों-साल में यह प्रतिष्ठा अर्जित करता है। उसे एआई के नए माध्यम तुरंत समाप्त कर सकते हैं। दूसरी ओर कापीराइट और बौद्धिक संपदा से जुड़े संकट भी सामने खड़े हैं। कई प्रमुख मीडिया संगठन इस बात पर आपत्ति कर रहे हैं तो कई ने बिना अनुमति और बिना भुगतान उनकी सामग्री के उपयोग के लिए एआई कंपनियों पर मुकदमे भी किए थे। ऐसे में तमाम ऐसे विवाद अभी भी एआई के साथ जुड़े हुए हैं। बताया जाता है कि इंटरनेट पर हजारों की संख्या में ऐसी वेबसाइट्स तैर रही हैं जो केवल विज्ञापन से पैसे कमाने के लिए झूठ का व्यापार कर रही हैं। वे हर पल एआई से झूठी खबरें गढ़ते हुए पोस्ट करती रहती हैं। मीडिया वाचडाग न्यूज गार्ड ने ऐसे तमाम अविश्वसनीय वेबसाइटों की पहचान की है। ऐसे में सच और झूठ के बीच मीडिया के सत्यान्वेषण का धर्म सहम कर रह जाता है। हम सब मानते हैं संपादकीय विवेक का कभी कोई विकल्प नहीं हो सकता। इस दौर में भी यह एक सच्चाई है। नैतिक विवेक और समाज की गहरी समझ के बिना किया गया कोई भी संवाद या संचार संकट ही खड़ा करेगा।

मुख्यधारा के मीडिया की ओर लौटना होगा-

       सारी तकनीकी क्रांति के बाद भी मुख्यधारा के मीडिया का वजूद बचा रहेगा क्योंकि एआई जनित भ्रमों, फर्जी खबरों की बाढ़ के बीच हमें सत्यापित जानकारी की ओर लौटना ही है। ऐसे में प्रिंट इज डेड जैसी अवधारणाओं के बीच भी मुख्यधारा का मीडिया अपनी विशेषताओं के कारण, संपादकीय गुणवत्ता के कारण बना और बचा रहेगा। सत्य आसानी से नहीं मिलता, इसे समाज भी स्वीकारेगा। इसके साथ ही प्रामणिक और भरोसेमंद मंचों की ओर लौटना ही होगा। क्योंकि यहां प्रामणिक मंच केवल खबरों का व्यापार नहीं कर रहे होगें बल्कि वे अपनी खबरों के सच होने के गारंटी भी देगें। जाहिर है पारंपरिक मीडिया के लिए वह दिन बहुत खास होगा। डीपफेक और एल्गोरिदम के समय में अब चुनौती ही असली और सही खबर पाना है। क्या वो आपके पास है?

तकनीक के जंगल में खो सकती है भाषाई विरासत!

 

क्या एआई छीन लेगा हमारी भाषाओं की आत्मा

-प्रो.संजय द्विवेदी



    अब जब वह जमाना बीत रहा है जिसमें हम अपने पसंदीदा लेखकों को मुग्ध होकर पढ़ते थे, उनकी भाषा, उनकी शैली की दीवानगी हमें उनसे जोड़कर रखती थी। यह ऐसा रिश्ता था जो हमें किसी खास लेखक का पाठक बना देता था। क्या डिजिटल क्रांति के इस दौर में मशीनें जिस तरह लिख-पढ़ रही हैं, लेखकों का वजूद रह जाएगा? जनरेटिव एआई अब केवल तकनीकी टूल न रहकर भाषा, विचार और अभिव्यक्ति का माध्यम बन रही हैं, उससे चिंता की लकीरें गहरी हो गयी हैं। हमें आश्वासन दिए जा रहे हैं कि वे एक मशीनी भाषा लिखेंगीं, पर दिल कहां से लाएंगी? संवेदनाएं कहां से लाएंगीं? लेकिन दिमाग इस तरह से भी सोचता है कि अगर वे दिल और भावनाएं भी ला सकीं, हमारे आपके जैसा ही सोचने और लिखने लगीं तो क्या होगा?

हमारे लिए क्या छोड़ेंगी मशीनें?

    बहुत कुछ तो एआई कर ही रहा है। सीखते हुए बड़ी और समझदार हो रही मशीनें क्या हमें लिखने लायक भी छोंडेंगी? मशीनों पर बढ़ती निर्भरता क्या हमें मौलिक चिंतन के लायक छोड़ेगी? ये बड़े सवाल हैं। एआई के अनेक टूल्स हिंदी और भारतीय भाषाओं में धाराप्रवाह लिख रहे हैं, कंटेट क्रिएट कर रहे हैं। यह हमारी भाषाई विविधता के लिए बड़ा अवसर है या भाषाई पहचान और भाषा से जुड़े व्यवसाय के लिए संकट के दिन, कहना कठिन है। माना जा रहा है कि ये प्रयोग डिजिटल खाइयों (डिजिटल डिवाइड) को कम करेंगें। अंग्रेजी न लिखने, बोलने और समझने वाले बड़े समाज के लिए बहुत कुछ पहुंच में आ जाएगा। वे सरकारी योजनाओं, सेवाओं, सूचनाओं को अपनी भाषा में ग्रहण कर सकेंगें। भारतीय भाषाओं का रीयल टाइम अनुवाद हमारी भाषाई सद्भावना को बढ़ाने का काम करेगा। हमारा संपूर्ण भारतीय साहित्य और ज्ञान परंपरा सब भाषा भाषियों तक पहुंच सकेगा। इसी के साथ लुप्त हो रही बोलियां, संवाद और लोक परंपराएं और प्रदर्शन कलाएं संरक्षित किए जाने की पहल भी हो सकती है। डिजिटल आकार्इव हमें यह सुविधा देगा कि हम अपना बहुत कुछ बचा सकें और अपनी-अपनी भाषाओं में उसे सुन सकें, पढ़ सकें।

क्या रूप, रस, गंध खो बैठेंगीं भाषाएं?

   सबसे बड़ा संकट है भाषाओं की आत्मा का। उसकी चिति का। उसके मुहावरों- लोकोक्तियों का। उसके नाद का। मशीनी अनुवाद,मशीनी लेखन से भाषाएं क्या अपना मूल रस,स्वाद,गंध और भाव खो बैठेंगी। क्या उन्हें संवेदना के तल पर रिक्त छोड़ दिया जाएगा। क्या भाषाएं अब सूचना की वाहक तो होंगीं किंतु भावों का निर्वहन करने लायक नहीं बचेंगीं? हमारे एआई माडल्स मूलतः पश्चिमी या अंग्रेजी डेटासेट पर प्रशिक्षित हैं। वे भारतीय भाषाओं का सुंदर अनुवाद कर रहे हैं। लेकिन उसमें प्रयुक्त मुहावरों, लोकोक्तियों, मानवीय संस्पर्श की कोमल भावनाओं, व्यंग्य और भावनात्मक गहराई को छू नहीं पा रहे हैं। संभावना है कि वे भविष्य में इन्हें छूने और पकड़ने का प्रयास करें।

      भाषाई समरूपता कई बार भाषा प्रवाह में ही बाधा बनती है। मशीनी अनुवाद की सीमाएं भी जाहिर ही हैं। इनके कारण लेखन में मशीनीपन और भाषा में भाव की कमी साफ दिखती है। भारतीय भाषाओं की डेटा आज भी बहुत कम है। वे समाज में गहरी पैठी हुई भाषाएं तो हैं किंतु डिजिटल दुनिया में उनकी उपस्थिति अभी सीमित है। ऐसे में स्थानीय डेटासेट बड़ी संभावनाओं के द्वार खोलता है। भारतीय भाषाओं के लिए स्वदेशी टूल्स (एलएलएम्स) का विकास जरुरी है, जिससे हमारी भाषाएं भी अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन यहां कर सकें। इससे हमारी संस्कृति, हमारी वाक् परंपरा और व्याकरण का संरक्षण  भी होगा। सभी कहते हैं कि एआई को सहायक के रुप में देखें न कि लेखक के रूप में। लेकिन एआई पर बढ़ती निर्भरता क्या लेखक के विचारों और उसकी चिंतन प्रक्रिया को अनुकूलित नहीं करेगी? वह उन्हीं विषयों, विचारों और दायरों में कैद होकर रह जाएगा जहां एआई उसे ले जाएगी। स्वतंत्र चिंतन के लिए एआई का प्रयोग कितना उपयोगी है, यह सोचने की जरुरत है। आज हमारे पास कोई नीतिगत ढांचा और नैतिक निर्देश नहीं हैं। ऐसे में हम अपनी हदों और सरहदों को कैसे तय करें?

संस्कृति की वाहक है भाषा-

   इसमें दो राय नहीं कि एआई के पास भाषा आ चुकी है। वह उसे लिखना, बोलना और व्यक्त करना जानता है। कई बार उसकी भाषा परिशुद्ध भी होती है, गलतियों के बिना और व्याकरणपरक भी। बावजूद इसके उसके मशीनीकृत रूप के भी कई रूप रचे जा सकते हैं। वह अनेक शैलियों में पारंगत हो रहा है। अनुवाद कुशल तो वह है ही। ऐसे में भाषा की आत्मा का क्या होगा, यह प्रश्न ज्यों का त्यों सामने खड़ा है। भाषा अकेली नहीं आती, वह किसी संस्कृति की वाहक होती है। स्थानीयता की भी वाहक होती है। संवेदना, विचार, संस्कृति और स्थानीय तत्वों से मिलकर भाषा अपने मुहावरे में ही मुक्ति पाती है। इससे उसकी दुनिया बड़ी होती है। उसका पाठक संसार खड़ा होता है। भारतीय भाषाओं के सामने सबसे बड़ा संकट यही है क्या वे अपनी मूल चेतना और रस-गंध को खो बैठेंगीं? वे  सूचनाएं देंगी पर पर कुछ कहेंगीं नहीं। बतियाएंगी नहीं। उनमें बातें कहने की क्षमता हो सकती है पर वे संवाद नहीं कर पाएंगी।

सूचना का सुपर हाइवे मौलिकता की बलि न ले-

   तकनीक की तेज रफ्तार के बीच में हमें भाषाई मौलिकता,मानवीय संस्पर्श को बचाए और बनाए रखने के सचेतन प्रयास करने होगें। डिजिटल क्रांति से भाषाओं का विस्तार तो हो किंतु उनकी मूल संवेदना, मुहावरे, लोकोक्तियां और संस्कृति न छूटें इसका प्रयास हम भाषाप्रेमियों को ही करना होगा। भाषाई दीवारें गिराने पर आमादा एआई हमारे लिए एक  अवसर है, किंतु यह अवसर आत्मसमर्पण का कारण नहीं बने, इसके लिए हमें सोचना होगा। शब्द इंसान के हों किंतु भाषा मशीनी हो ऐसा तो हममें से कोई नहीं चाहेगा। सूचना का यह सुपर हाइवे हमारी मौलिकता की बलि न ले ले, इसकी जिम्मेदारी हर उस व्यक्ति की है जो अपनी भाषा से प्यार करता है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

 

विदेश नीति के भी महारथी हैं मोदी!

 

पांच देशों की यात्रा से बने हैं रिश्ते और सरोकार




        भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर यह कहा जाता है कि वे विदेश यात्राएं खूब करते हैं। एक जमाने में उन्हें लेकर मजाक भी चला कि कुछ दिन तो गुजारिए हिंदुस्तान में। किंतु उनकी विदेश यात्राओं ने भारत के साथ दुनिया के साथ रिश्तों को सहज किया है। खासकर अरब देशों के साथ भारत के रिश्ते अपने उच्चतम स्तर पर हैं। संवाद की सहजता और गतिशीलता ने भारतीय विदेश नीति को एक नए मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां औपचारिक संवाद से आगे व्यक्तिगत रिश्तों की बात भी होने लगी है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप हों, चीनी राष्ट्रपति हों या रूस के पुतिन। सबके सब मोदी का नाम लेते हैं और भारत को नजरंदाज नहीं कर सकते। इटली दौरे पर पीएम मोदी ने जियोर्जिया मेलोनी को पारले कंपनी की 'मेलोडी' टॉफी का पैकेट गिफ्ट किया, यह पल इंटरनेट पर बहुत वायरल हुआ और मेलोनी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इसका वीडियो शेयर करके पीएम मोदी को धन्यवाद दिया। जाहिर है ऐसे दृश्यों के बीच नरेंद्र मोदी ने रिश्तों का जो पुल बनाया है। उसकी चर्चा समूची दुनिया में है।

      वैश्विक तनाव के बीच भारत-यूरोप संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली सहित कई यूरोपीय देशों का दौरा किया। यह यात्रा एक ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया में जंग के हालात हैं। इन तनावपूर्ण हालात में प्रधानमंत्री का उद्देश्य सिर्फ रिश्ते बनाना नहीं हैं बल्कि भारत की जरूरतों के लिए भी है। यह तो तय है प्रधानमंत्री कोई भी काम अकारण नहीं करते। कई बार उनकी दूरदृष्टि देखी गयी है। जबकि आज की राजनीति तुरंत परिणाम देने वाले संकेतों को ही समझती है। जबकि विदेशनीति में आज रोपे गए बीज कल वृक्ष बनकर परिणाम देते हैं। संवाद और सातत्य ही इसका एकमात्र हल है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री की यह यात्रा भी अनेक लक्ष्यों को साधती है। बताते है कि उनकी यह यात्रा तो काफी पहले से ही नियोजित थी जिसमें भारत-नार्डिक शिखर सम्मेलन भी शामिल था। किंतु 2025 में हुए पहलगाम हमले से सारा कुछ ठहर गया। यह यात्रा उन भारत-यूरोप संबंधों पर नए तरह से रिश्तों को पारिभाषित करना चाहती थी, क्योंकि इन दिनों वैश्विक राजनीति में विश्व शक्तियों का आचरण और व्यवहार काफी कुछ बदला हुआ है।

युद्ध में दुनिया और भारत की भूमिका-

यूक्रेन युद्ध से प्रारंभ हुआ वैश्विक तनाव अब इजराइल-अमरीका और ईरान युद्ध तक जा पहुंचा है। युद्धकामी शक्तियां पीछे हटने को तैयार नहीं है। भारत जैसा देश जो अपनी ऊर्जा सहित तमाम जरूरतों के लिए दुनिया के तमाम देशों पर निर्भर है, वह बैठा नहीं रह सकता। साथ ही अमरीका की टैरिफ से जुड़ी मनमानियां और चीन का अड़ियल रवैया भारत को शांति से बैठने नहीं दे रहा। ऐसे में भारत के राष्ट्रध्यक्ष की चुनौतियां बहुत बढ़ जाती हैं। उन्हें न सिर्फ देश के अंतर की व्यवस्था के सामान्य रखना है बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत के हितों का ख्याल रखना है। क्योंकि दोंनो एक दूसरे से संयुक्त हैं। हम देखते हैं कि पिछले साल लागू हुआ भारत-ईएफटीए व्यापार समझौता और इस साल के आखिर में संपुष्ट/हस्ताक्षरित होने वाला भारत-ईयू एफटीए सप्लाई चेनों और बाजारों में विविधता लाने की साझा इच्छा को दिखाते हैं। खास तौर पर उन नॉर्डिक देशों के साथ, जहां भारत के संग होने वाला द्विपक्षीय व्यापार 20 अरब डॉलर के नीचे बना हुआ है। ऐसे में भारत को इन देशों के साथ ज्यादा बेहतर रिश्ते बनाने की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता।

   आज के समय में भारत की प्राथमिकता एक ऐसी दुनिया को स्थापित करने पर जिसमें विदेशी मुद्रा और ऊर्जा संरक्षण दोनों की बचत हो सके। इन लक्ष्यों को साधे बिना किसी भी विकासशील देश के सामने गहरे संकट घिर जाएंगें। संयुक्त अरब अमीरात में दीर्घकालिक रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्वों पर और नॉर्डिक-भारत शिखर सम्मेलन में हरित रणनीतिक साझेदारियों पर हुई चर्चाओं का लक्ष्य ऊर्जा सुरक्षा पर सहयोग को आगे ले जाना था। मोदी इन सामूहिक लक्ष्यों के साथ युद्धविहीन दुनिया का सपना देखते हैं। वे साफ कहते हैं कि यह युद्ध का समय नहीं है। आंतकवाद और युद्ध विहीन दुनिया उनका ही हर भारतवासी का सामूहिक स्वप्न है। क्योंकि भारत का उद्देश्य ही विश्वमंगल है और उसका ध्येय मंत्र वसुधैव कुटुम्बकम् है। प्रधानमंत्री इसी भारत भाव को दुनिया के हर मंच पर स्थापित करते हुए दिखते हैं। मोदी की समूची यात्रा में यूक्रेन और ईरान संघर्षों पर स्वस्थ चर्चा, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बातचीत शामिल रही। एआई गवर्नेंस और क्रिटिकल मिनरल संबंधी पहलों पर भी फोकस था। नॉर्डिक देशों ने जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुए आर्कटिक में वैज्ञानिक सहयोग और समुद्री (मैरिटाइम) सहकार पर फोकस किया। इन दौरों से कुछ खास ठोस नतीजे या वास्तविक व्यापार समझौते हासिल नहीं हुए, लेकिन दोस्ताना माहौल और मोदी को दिये गये पुरस्कारों ने ज्यादा गहरे भारत-यूरोप सहयोग की उम्मीदों का संकेत दिया। यह जुड़ाव और मजबूत होगा जब वह जून में जी-7 आउटरीच समिट के लिए फ्रांस की यात्रा करेंगे और स्लोवाकिया का द्विपक्षीय दौरा करेंगे, और इसी साल के आखिर में ब्रुसेल्स में भारत-ईयू एफटीए पर दस्तखत करेंगे।

रिश्तों पर खास जोर-

 यह यात्रा साफ बताती है कि प्रधानमंत्री यूरोपीय देशों से अपने रिश्ते बेहतर करना चाहते हैं। एक शानदार लोकतंत्र भारत के लोग यूरोप के देशों से जुड़ना चाहते हैं। उनका विचार है यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यूक्रेन में रुस की आक्रामता, अमरीकी-इजराइल और ईरान के संघर्ष के बीच चीन का आर्थिक दबाव तीन ऐसे कारण हैं जो हमें साथ होने के प्रेरित करते हैं। इसका साफ उद्देश्य है कि अंतराष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था बने और चले भी। ताकि किसी देश की तानाशाही के आधार पर चीजों को बिगाड़ा न जा सके। भारत ईएफटीए व्यापार समझौते और आगामी भारत ईयूएफटीए पर केंद्रित है। इसके साथ ही मोदी का जोर आपूर्ति श्रृखंलाओं और बाजारों के विविधीकरण पर है। ताकि हमारा व्यापार विशेष रुप से नार्डिक देशों के साथ बढ़ सके, जो अभी मात्र 20 अरब डालर से कम है। जाहिर तौर यह क्षेत्र संभावनाओं से भरा है, जहां भारत दांव लगा रहा है।

ऊर्जा जरुरतों के लिए बढ़ती साझेदारी-

 भारत की ऊर्जा जरूरतें इस समय एक बड़ी चुनौती हैं। संयुक्त अरब अमीरात में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को लेकर चर्चा हुई। भारत और यूएई ने पेट्रोलियम भंडार, दीर्घकालिक एलपीजी आपूर्ति और रक्षा सहयोग से संबंधित कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। ये समझौते पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच अबू धाबी में उच्च स्तरीय वार्ता के बाद हुए। यूएई ने भारत में 5 अरब अमरीकी डॉलर के निवेश का भी वादा किया है। इन समझौतों में इंडियन स्‍ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्वस लिमिटेड और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए हस्ताक्षरित रणनीतिक सहयोग समझौता शामिल हैं। इसमें पेट्रोलियम भंडार में सहयोग और तरल प्राकृतिक गैस और एलपीजी भंडारण सुविधाओं पर सहयोग शामिल है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस समझौते से भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में यूएई की हिस्सेदारी बढ़कर 3 करोड़ बैरल हो जाएगी और भारत में रणनीतिक गैस भंडार स्थापित किए जाएंगे। दोनों पक्षों ने एलपीजी पर एक अलग रणनीतिक सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर किए, जिससे भारत में व्यापक रूप से ईंधन की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित होने की उम्मीद है।भारत और संयुक्त अरब अमीरात ने एक रणनीतिक रक्षा साझेदारी के ढांचे पर भी हस्ताक्षर किए, जो रक्षा औद्योगिक सहयोग, प्रौद्योगिकी साझाकरण, नवाचार और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग पर केंद्रित है।

संवाद से संकटों के हल तलाशने की तैयारी-

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलग रहते हुए भी संकटों के हल के लिए चल रहे प्रयासों से खुद को अलग नहीं किया। वे संवाद के स्तर रूस और यूक्रेन दोनों देशों से संवाद बनाए हुए हैं। इसी तरह ईरान, इजराइल और अमरीका से भारत का संवाद निरंतर है। इन यात्राओं में प्रधानमंत्री ने एआई गर्वनेंस पर चर्चा की और खनिज पहलों पर भी संवाद किया। ओस्लो में, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, डेनमार्क की कार्यवाहक प्रधानमंत्री सुश्री मेटे फ्रेडरिक्सन, नॉर्वे के प्रधानमंत्री श्री जोनास गहर स्टोरे, फिनलैंड के प्रधानमंत्री श्री पेटेरी ओर्पो, आइसलैंड की प्रधानमंत्री सुश्री क्रिस्ट्रुन म्योल फ्रॉस्टडॉटिर और स्वीडन के प्रधानमंत्री श्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया। यह शिखर सम्मेलन 2022 में कोपेनहेगन और 2018 में स्टॉकहोम में आयोजित पिछले दो शिखर सम्मेलनों पर आधारित है। प्रधानमंत्रियों ने इस बात पर ध्यान दिया कि वे वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल और तीव्र आर्थिक एवं तकनीकी परिवर्तन के दौर में मिल रहे हैं और साझा हितों और मूल्यों पर आधारित पारस्परिक लाभ के लिए भारत और नॉर्डिक देशों के बीच साझेदारी को गहरा करने और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सहयोग करने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की। इस संदर्भ में, उन्होंने भारत-नॉर्डिक संबंधों को एक विश्वसनीय हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाने का निर्णय लिया। प्रधानमंत्रियों ने तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में हुई चर्चाओं पर संतोष व्यक्त किया और भारत-नॉर्डिक सहयोग को और अधिक विस्तारित एवं गहरा करने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की। नेताओं ने निर्णय लिया कि चौथे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी फिनलैंड करेगा।

सम्मान से जीवंत रिश्तों का प्रारंभ-

    नार्वे में उन्हें  रॉयल नॉर्वे ऑर्डर ऑफ मेरिट के ग्रैंड क्रॉससे सम्मानित किया गया तो वहीं स्वीडन के प्रतिष्ठित रॉयल ऑर्डर ऑफ़ पोलर स्टार, कमांडर ग्रैंड क्रॉस से भी वे अलंकृत किए गए। यह सम्मान भारत और स्वीडन के बीच मजबूत होते कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों का प्रतीक माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों में व्यापार, हरित ऊर्जा, तकनीक और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में साझेदारी लगातार बढ़ी है। ये सूचनाएं बताती हैं कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में दुनिया के मंचों पर भारत की बात सुनी जा रही है और उसे गंभीरता से लिया जा रहा है। पांच देशों की उनकी यात्रा से तत्काल भले कुछ हासिल होता हुआ न दिखे, किंतु रिश्तों की महक, खुशबू और आने वाले समय के लिए कुछ तार तो जुड़े ही हैं। विदेश नीति को इस सहजता और सौजन्य से लेना ही मोदी की विरासत है।


 

 

 

 

 

डिग्रियों की बाढ़ और कौशल का सूखा!

 

स्नातकों की घटती रोजगार क्षमता बड़ी चुनौती

-प्रो.संजय द्विवेदी



      पढ़ तो रहे हैं पर आप सीखते क्या हैं?  यह सवाल हमारी शिक्षा व्यवस्था के सामने यक्ष प्रश्न की तरह खड़ा है। इसे ऐसे ही समझिए कि भाषा के विद्यार्थी के पास सही भाषा नहीं है, उसके उपयोग का कौशल नहीं है। ऐसे में कौशल विकास की नारेबाजियों के बीच हम क्या कर रहे हैं यह एक बड़ा सवाल है। आंकड़े बताते हैं कि देश में उच्च शिक्षा के व्यापक विस्तार से अब शोध करने वालों की संख्या भी बढ़ी है। यानि उच्च शिक्षा में बहार के दिन हैं। स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले बढ़े हैं। हर वर्ग, समुदाय की शिक्षा के प्रति ललक बढ़ी है, किंतु स्नातकों की रोजगार-क्षमता (इंप्लायबिलिटी) अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। डिग्री और जॉब मार्केट के बीच की इन खाइयों को पाटने पर चिंतन जरुरी हो जाता है।

डिग्रियां बांटने का कारखाना बने हैं परिसर-

      आखिरकार हमारे नौजवान क्या और कैसे पढ़ रहे हैं कि वे रोजगार के मोर्चे पर आवश्यक योग्यताएं नहीं रखते। सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों, कालेजों की पहुंच बढ़ी है। शिक्षा के लिए सरकार के इंतजाम तो हैं ही शिक्षा में सक्रिय बाजार के खिलाड़ी भी उत्साहित हैं। देश में उच्च शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सकल नामांकन अनुपात में ऐतिहासिक वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी तरफ युवाओं और स्नातकों के बीच बेरोजगारी व कौशल अंतराल (स्किल गैप) एक गंभीर विमर्श का विषय बन गया है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (2023-24) की रिपोर्ट और श्रम बाजार पर आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि हालात अच्छे नहीं हैं। ऐसे में क्या हमारी उच्च शिक्षा केवल 'डिग्रियां बांटने का कारखाना' बनकर रह गई है या यह युवाओं को वास्तविक अर्थों में सक्षम बना रही है? डिग्रियां लेकर समाज में खड़े नौजवान आखिर क्या करेगें, क्या वे डिग्रीधारी बेरोजगार बनकर रह जाएंगें। ऐसे में बेरोजगारी को समाप्त करने के लिए रास्ता क्या है। नई शिक्षा नीति कौशल विकास पर खासा जोर देती है किंतु हमारे पास अधोसंरचना का टोटा है और अध्यापकों का अभाव जिसके चलते हर अच्छा सपना दम तोड़ देता है। देश के सामाजिक, भौगोलिक और आर्थिक हालात में समान शिक्षा की बात बेमानी है। निजी विश्वविद्यालयों में बहुत फीस देकर भी बहुत कुछ अर्जित नहीं हो रहा है। विद्यार्थियों के साथ क्लाइंट्स सरीखा व्यवहार हो रहा है और कई जगह सिर्फ डिग्रियां बंट रही हैं। कुछ विद्यार्थी भी ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ नाम के लिए डिग्री चाहिए, ऐसे लोग वातावरण को बिगाड़ने का ही काम करते हैं।

परिसरों में हैं पर कुछ सीखते नहीं-

      देश में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात बढ़कर 30% तक पहुँच गया है। कुल नामांकन बढ़कर 4.50 करोड़ हो गया है, जिसमें महिलाओं की हिस्सेदारी 31.2 और कुल नामांकन 2.24 करोड़ में उल्लेखनीय और निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की भागीदारी में ऐतिहासिक उछाल आया है, जो सामाजिक समावेशन का बड़ा संकेत है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित पाठ्यक्रमों में भी विद्यार्थियों की संख्या बढ़कर 1.02 करोड़ हो गई है। विभिन्न श्रम एवं आजीविका अध्ययनों (जैसे स्टेट ऑफ वर्किंग इंडियाऔर इंडिया स्किल्स रिपोर्ट’) के अनुसार, 25 वर्ष से कम आयु के स्नातकों में बेरोजगारी दर लगभग 40% के करीब है, जबकि 25-29 वर्ष आयु वर्ग के स्नातकों में यह करीब 20% है। राष्ट्रीय स्तर पर समग्र रोजगार-क्षमता सीमित बनी हुई है, जो दर्शाती है कि डिग्री धारकों के पास आधुनिक उद्योगों की माँग के अनुकूल व्यावहारिक कौशल की कमी है। उच्च डिग्रियां (जैसे इंजीनियरिंग या स्नातकोत्तर) हासिल करने के बाद भी युवाओं का पारंपरिक या बेहद कम कौशल वाले अस्थाई कार्यों पर निर्भर होना। यह चिंता की बात है बहुत बड़ी डिग्रियां लेकर भी नौजवानों को उनकी शिक्षा के अनुरुप कार्य नहीं मिलता। इसका कारण सिर्फ बेरोजगारी नहीं है बल्कि उनका कौशल युक्त न होना भी है। निजी क्षेत्र में रोजगार पाने के लिए बेहद सक्रिय व्यक्तित्व और हुनर के आधार पर ही होता है। अनेक नियोक्ताओं से चर्चा होती है तो वे बेहतर का

     उच्च शिक्षा संस्थानों में आज भी सैद्धांतिक और पारंपरिक शिक्षा पर अधिक जोर है, जबकि उद्योग जगत की मांग तकनीकी व विश्लेषणात्मक दक्षता की है। भारी संख्या में संस्थानों के खुलने के बावजूद छात्र-शिक्षक अनुपात और बुनियादी शोध निवेश के मामले में हम वैश्विक मानकों से पीछे हैं। स्कूली शिक्षा के स्तर से ही (विशेषकर छठी कक्षा से) व्यावसायिक और कौशलपरक शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल करने की आवश्यकता पर नीति आयोग ने बल दिया है। नई शिक्षा नीति भी इसी ओर ध्यान दिलाती है किंतु हमारे परिसर इसके लिए तैयार हैं? पाठ्यक्रम ऐसे हों जो बाजार की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर सकें। डिग्री कार्यक्रमों के साथ 'कमाने के साथ और अप्रेंटिसशिप मॉडल को बढ़ावा देना चाहिए । देश को जनसांख्यिकी लाभांश का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है जब हम मात्रात्मक विस्तार से आगे बढ़कर गुणात्मक उत्कृष्टता और रोजगार-उन्मुख सुधारों की ओर तेजी से कदम बढ़ाएं। भारत जैसे देश में जहां उसका आकार-प्रकार एक समस्या है। दूसरी ओर गांवों की ओर हालात काफी खराब हैं। शासकीय विद्यालयों में भी शिक्षकों का अभाव है। लोग ग्रामीण, गिरिवासी और वनवासी क्षेत्रों में जाना नहीं चाहते और शहर के आसपास ही नौकरियां करना चाहते है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। निजी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के संजाल से शिक्षा का हाल भी बदहाल हो रहा है। आज सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों मिलकर भी इस देश की आवश्यक्ता की पूर्ति नहीं कर सकते। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चुनौती तो अलग है ही। इसके चलते देश में कई स्तरों की शिक्षा चल रही है। समान शिक्षा और समान अवसर ऐसे समय में स्वप्न ही बनकर रह गया है।

(लेखक भारतीय जन संचार संस्थान-आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक हैं। संप्रति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

 

 

उत्तर प्रदेश का सांस्कृतिक परिदृश्य और युवाओं की भूमिका

 

          -   संजय द्विवेदी


    भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो मृत्युंजय है। विश्व के अनेक विद्वानों, रहस्यदर्शियों, वैज्ञानिकों और प्रतिभावान शोधार्थियों ने भारत की अमरता को सिद्ध किया है। किसी ने इसे ज्ञान की भूमि कहा तो किसी ने मोक्ष की, किसी ने इसे सभ्यताओं का मूल कहा तो किसी ने इसे भाषाओं की जननी कहा। किसी ने यहां आत्मिक पिपासा बुझाई तो कोई यहां के वैभव से चमत्कृत हुआ। कोई इसे मानवता का पालना मानता है तो किसी ने इसे संस्कृतियों का संगीत कहा। ऐसी महान संस्कृति का आंगन भारत हैजिसकी हर सांस में ही पूरी वसुधा को एक कुटुम्ब मानने की आकांक्षा है। अपनी इसी आकांक्षा के नाते यह देश कह पाया कि- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। दरअसल इसीलिए भारत मृत्युंजय है। वह वसुधा पर ऐसी संस्कृति का संवाहक है जो प्रेम, करूणा, संवेदना के भावों से भरी है और समूची मानवता के कल्याण के बात करती है। इसी तरह उत्तर प्रदेश हमारी सांस्कृतिक परंपरा का सबसे जीवंत उत्तराधिकारी है। राम,कृष्ण शिव से जुड़े स्थान उसे अलग ही गरिमा प्रदान करते हैं। उत्तर प्रदेश में सांस्कृतिक नगरियों के रूप में अयोध्या, मथुरा और काशी की उपस्थिति इसके इतिहास वैभव को दर्शाती हैं। पुण्यसलिला गंगा के किनारे बसे तमाम नगर और गांव भारत की असली कहानी कहते हैं। यह गौतम बुद्ध की घरती है। जहां कुशीनगर और सारनाथ जैसे स्थान युवाओं को प्रेरित करते हैं।

      ऐसी महान संस्कृति हमारे लिए प्रेरणा का कारण बनना चाहिए। किंतु गुलामी के लंबे कालखंड और विदेशी विचारों ने हमारे अपने गौरव ग्रंथों, मानबिंदुओं, पुण्यस्थलों  पर गर्द की चादर डाल दी। इस पूरे दृश्य को इतना धुंधला दिया गया कि हमें अपने गौरव का, अपने मान का, अपने ज्ञान का आदर ही न रहा। यह हर क्षेत्र में हुआ। हर क्षेत्र को विदेशी नजरों से देखा जाने लगा। हमारे अपने पैमाने और मानक भोथरे बना दिए गए। स्वामी विवेकानंद को याद करें वे उसी स्वाभिमान को जगाने की बात करते हैं। महात्मा गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण ने हमें उसी स्वत्व की याद दिलायी। सोते हुए भारत को जगाने और झकझोरने का काम किया। ऐसे समय में जब एक बार फिर हमें अपने स्वत्व के पुर्नस्मरण की जरूरत है तो पत्रकारिता इसमें एक बड़ा साधन बन सकती है। हम देश में अपने नायकों की तलाश कर रहे हैं। वे हमारी जमीन के नायक हैं,इस देश के इतिहास के नायक हैं। उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार ने अनेक नायकों को स्मरण करते हुए उनके महत्व से आने वाली पीढ़ी को अवगत कराना आरंभ किया है।

साहित्यिक नायकों की भूमि-

    साहित्य और पत्रकारिता के अनेक नायक भी उत्तर प्रदेश की भूमि से उपजे हैं। पत्रकारिता की अपनी एक संस्कृति है। खासकर भारत के संदर्भ में पत्रकारिता लोकजागरण का ही अनुष्ठान है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ही देश में तेजी से पत्रकारिता का विकास हुआ और इसके चलते देशभक्ति, जनजागरण और समाज सुधार के भाव इसकी जड़ों में हैं। आजादी के बाद इसमें कुछ बदलाव आए और आज बाजारवादी शक्तियों का प्रभाव इस माध्यम पर काफी देखा जा रहा है। साहित्य हो या मीडिया दोनों का काम हैलोकमंगल के लिए काम करना। राजनीति का भी यही काम है। लोकमंगल हम सबका ध्येय है। लोकतंत्र का भी यही उद्देश्य है। संकट तब खड़ा होता है जब लोक हमारी नजरों से ओझल हो जाता है। लोक हमारे संस्कारों का प्रवक्ता है वह हमें बताता है कि क्या करने योग्य है और क्या करने योग्य नहीं है। इसलिए लोकमानस की मान्यताएं ही हमें संस्कारों से जोड़ती हैं और इसी से हमारी संस्कृति पुष्ट होती है।

      भारतीय संस्कृति में सामाजिक संवाद की अनेक धाराएं है। संवाद की परंपराएं हैं। शास्त्रार्थ हमारे लोकजीवन का हिस्सा है। समाज में विविध समाजों और रिश्तों के बीच संवाद की परंपराएं हैं। हमें उनपर ध्यान देने की जरूरत है। सुसंवाद से ही सुंदर समाज की रचना संभव है। मीडिया इसी संवाद का केंद्र है। वह हमें भाषा भी सिखाता है और जीवन शैली को भी प्रभावित करता है। आज खासकर दृश्य मीडिया पर जैसी भाषा बोली और कही जा रही है उससे सुसंवाद कायम नहीं होता, बल्कि समाज में तनाव बढ़ता है। इसका भारतीयकरण करने की जरूरत है। हमारे जनमाध्यम ही इस जिम्मेदारी को निभा सकते हैं। वे समाज में मची होड़ और हड़बड़ी को एक सहज संवाद में बदल सकते हैं।

उत्तर प्रदेश की धरती पर देसराग-

     कोई भी समाज सिर्फ आधुनिकताबोध के साथ नहीं जीताउसकी सांसें तो ‘लोक’ में ही होती हैं। भारतीय जीवन की मूल चेतना तो लोकचेतना ही है। नागर जीवन के समानांतर लोक जीवन का भी विपुल विस्तार है। खासकर हिंदी का मन तो लोकविहीन हो ही नहीं सकता। यह भाग्य ही है उत्तर प्रदेश कवि तुलसीदासकबीररसखानसूरदास की भूमि है। बाद में मैथिलीशरण गुप्त से लेकर अज्ञेय तक उप्र की भूमि से संपर्क रखते थे। नागरबोध आज भी हिंदी जगत की उस तरह से पहचान नहीं बन सका है। भारत गांवों में बसने वाला देश होने के साथ-साथ एक प्रखर लोकचेतना का वाहक देश भी है। किंतु लोकजीवन के तमाम किस्सेगीत-संगीत और प्रदर्शन कलाएंशिल्प एक नई पैकेजिंग में सामने आ रहे हैं। इनमें बाजार की ताकतों ने घालमेल कर इनका मार्केट बनाना प्रारंभ किया है। इससे इनकी जीवंतता और मौलिकता को भी खतरा उत्पन्न हो रहा है। जैसे आदिवासी शिल्प को आज एक बड़ा बाजार हासिल है किंतु उसका कलाकार आज भी फांके की स्थिति में है। जाहिर तौर पर हमें अपने लोक को बचाने के लिए उसे उसकी मौलिकता में ही स्वीकारना होगा। हजारों-हजार गीतकविताएंसाहित्यशिल्प और तमाम कलाएं नष्ट होने के कगार पर हैं। किंतु उनके गुणग्राहक कहां हैं।

    उत्तर प्रदेश जैसे एक विशाल भू-भाग में बोली जाने वाली अनेक बोलियांउनका साहित्य-जो वाचिक भी है और लिखित भी। उसकी कलाचेतनाप्रदर्शन कलाएं सारा कुछ मिलकर एक ऐसा लोक रचती है जिस तक पहुंचने के लिए अभी काफी समय लगेगा। लोकचेतना तो वेदों से भी पुरानी है। क्योंकि हमारी परंपरा में ही ज्ञान बसा हुआ है। ज्ञाननीति-नियमऔषधियांगीतकथाएंपहेलियां सब कुछ इसी ‘लोक’ का हिस्सा हैं। हिंदी अकेली भाषा है जिसका चिकित्सक भी ‘कविराय’ कहा जाता था। बाजार आज सारे मूल्य तय कर रहा है और यह ‘लोक’ को नष्ट करने का षडयंत्र है। यह सही मायने में बिखरी और कमजोर आवाजों को दबाने का षडयंत्र भी है। इसका सबसे बड़ा शिकार हमारी बोलियां बन रही हैंजिनकी मौत का खतरा मंडरा रहा है। 

    मुख्यधारा मीडिया के मीडिया के पास इस संदर्भों पर काम करने का अवकाश नहीं है। किंतु समाज के प्रतिबद्ध पत्रकारोंसाहित्यकारों को आगे आकर इस चुनौती को स्वीकार करने की जरूरत है क्योंकि ‘लोक’ की उपेक्षा और बोलियों को नष्ट कर हम अपनी प्रदर्शन कलाओंगीतोंशिल्पों और विरासतों को गंवा रहे हैं। जबकि इसके संरक्षण की जरूरत है। संस्कृति अलग से कोई चीज नहीं होती, वह हमारे समाज के सालों से अर्जित पुण्य का फल है। इसे बचाने के लिए, संरक्षित करने के लिए और इसके विकास के लिए समाज और मीडिया दोनों को साथ आना होगा। तभी हमारे गांव बचेगें, लोक बचेगा और लोक बच गया तो संस्कृति बचेगी।

    यह बहुत खुशी की बात है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा युवाओं के समग्र विकास के लिए तैयार की जा रही 'एकीकृत युवा नीति' में शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के साथ-साथ राज्य की समृद्ध संस्कृति और विरासत के संरक्षण को भी प्रमुखता से शामिल किया गया है, ताकि युवा अपनी जड़ों से जुड़े रहें। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की 'कला संस्कृति विकास योजना' और युवा कलाकारों के लिए छात्रवृत्ति योजना। उत्तर प्रदेश के युवा कलाकार शास्त्रीय संगीत, लोक नृत्य और पारंपरिक थिएटर (जैसे नौटंकी और ख्याल) को जीवित रखने के लिए इन राष्ट्रीय छात्रवृत्ति और गुरु-शिष्य परंपरा का लाभ उठा रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की 'एक जिला, एक उत्पाद' (ODOP) और 'मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना'। प्रदेश के युवा इन योजनाओं के वित्तीय समर्थन से भदोही के कालीन, लखनऊ की चिकनकारी और वाराणसी की सिल्क साड़ियों जैसे पारंपरिक उद्योगों को आधुनिक ई-कॉमर्स से जोड़कर वैश्विक स्तर पर पहुँचा रहे हैं।

युवा संभालें जिम्मेदारी-

     देश के सबसे युवा राज्यों में शामिल होने के नाते, यूपी के पास कार्यबल की बड़ी ताकत है, जो राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संपदा को आर्थिक विकास का मुख्य आधार बना सकती है।अयोध्या (श्री राम जन्मभूमि), काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, मथुरा-वृंदावन और प्रयागराज कुंभ का वैश्विक स्वरूप। इन सांस्कृतिक-धार्मिक केंद्रों पर पर्यटकों की रिकॉर्ड वृद्धि के कारण स्थानीय युवाओं के लिए टूर गाइड, होटल मैनेजमेंट, और इवेंट प्लानिंग के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं। संविधान के तहत राज्य के युवाओं का यह नैतिक और संवैधानिक दायित्व है कि वे हमारी सामासिक संस्कृति  की गौरवशाली परंपरा का परीक्षण करें और ऐतिहासिक स्मारकों की रक्षा करें। राज्य के युवा तकनीकी नवाचार का उपयोग करके 'आर्ट-टेक' स्टार्टअप्स की शुरुआत कर रहे हैं, जिसके जरिए प्राचीन पांडुलिपियों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक धरोहरों को डिजिटल आर्काइव में बदला जा रहा है। कजरी, चैती, रसिया और बिहावा जैसे लोकगीतों को आधुनिक संगीत शैली के साथ प्रस्तुत करके प्रदेश के युवा नई पीढ़ी के बीच अपनी सांस्कृतिक विरासत को लोकप्रिय बना रहे हैं। इसके तहत युवाओं को हस्तशिल्प डिजाइनिंग, ट्रेडिशनल पेंटिंग और हेरिटेज प्रिजर्वेशन जैसी विधाओं में प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिससे पारंपरिक कलाओं का व्यावसायिक क्षरण रुक सके। आधुनिकीकरण के प्रभाव के बीच यूपी के युवाओं के समक्ष पश्चिमी संस्कृति और अपनी समृद्ध पारंपरिक पहचान के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है, जिसे वे अपनी रचनात्मकता से सार्थक कर रहे हैं।

युवा शक्ति के जागरण से ही बनेगा समर्थ भारत

 

मनोरंजन और करियर से आगे भी सोचें नौजवान

-प्रो.संजय द्विवेदी




   भारत इस अर्थ में गौरवशाली है कि वह एक युवा देश है। युवाओं की संख्या के हिसाब से भी, अपने सामर्थ्य और चैतन्य के आधार पर भी भारत पूरी दुनिया में एक विशिष्ट स्थान रखता है। भारत एक ऐसा अनूठा देश है, जिसके सारे नायक युवा हैं। हमारे गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक चेतना के केंद्र श्रीराम, श्रीकृष्ण, जगदगुरू शंकराचार्य और आधुनिक युग के नायक स्वामी विवेकानंद तक सभी युवा नायक रहे हैं। युवा कोई केवल शारीरिक आयु नहीं है, युवा वास्तव में एक विराट चेतना है, जिसमें अपार ऊर्जा बसती है, गहरा भरोसा बसता है, अडिग विश्वास बसता है, सुंदर सपने पलते हैं और नई आकांक्षाएं लगातार धड़कती हैं। इसलिए युवा होना भारत को बेहद रास आता है।

      भारत के सारे भगवान युवा हैं। वे कभी बुजुर्ग नहीं होते, वे सदैव शाश्वत युवा रहते हैं। यही युवा चेतना और ऊर्जा भारत की जीवंतता का मुख्य आधार है। आज जबकि दुनिया के तमाम देशों में युवा शक्ति का भारी अभाव दिखता है, भारत का चेहरा उनमें बिल्कुल अलग और ओजस्वी दिखाई देता है।  छात्र होना यदि निरंतर सीखना और ज्ञान अर्जित करना है, तो युवा होना अपने कर्म को पूजा मानकर पूरी लगन से राष्ट्र निर्माण में जुट जाना है। एक सीख है, तो दूसरा प्रचंड कर्म है। सीखी गई हर चीज को हमारे युवा ही परिणाम देते हैं और उसे धरातल पर साकार करते हैं। ऐसे में भारत की इस विराट छात्र शक्ति को सीखने के बेहतर और पारदर्शी अवसर देना,उनकी अंतर्निहित प्रतिभा के उन्नयन के लिए नए अनंत आकाश उपलब्ध कराना, हमारे समाज और चुनी हुई सरकारों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि हमारे छात्र को छात्र जीवन में ठीक से गढ़ा नहीं जाएगा, तो वह आगे चलकर एक आदर्श और जिम्मेदार नागरिक कैसे बनेगा?

      देश के प्रति अपनी मौलिक जिम्मेदारियों का निर्वहन वह किस प्रकार करेगा? भारत के शिक्षा परिसर ही नए भारत के निर्माण की असली आधारशिला हैं, अतः उनका वैचारिक रूप से जीवंत होना और निरंतर सक्रिय रहना बेहद जरूरी है। अराजनैतिक छात्र शक्ति का निर्माण आज हमारे समाज की एक बड़ी विडंबना बन चुकी है। देश में पूरी तरह से एक ऐसा कृत्रिम वातावरण बनाया जा रहा है जिसमें छात्र सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचे, अपने व्यक्तिगत करियर और पैकेज के बारे में सोचे। उसमें सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों, राष्ट्र के प्रति गहरे सद्भाव और संवेदनशीलता कैसे पैदा हो, इस ओर गंभीर प्रयास आज बहुत जरूरी हैं। यह अत्यंत आवश्यक है कि वे अपने देश के बारे में गहराई से जानें, उसकी विविधताओं और बहुलताओं का सम्मान करें, तथा ऐसे प्रबुद्ध नागरिक बनें जो विश्वमंच पर भारत की मान-प्रतिष्ठा को बढ़ा सकें। अतीत में तमाम सामाजिक संगठनों से जुड़कर हमारी छात्र-युवा शक्ति अनेक प्रकार के सामाजिक और रचनात्मक प्रकल्पों को चलाती भी रही है। किंतु दुर्भाग्यवश, हमारी वर्तमान औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में ऐसी कोई जीवंत व्यवस्था पूरी तरह नदारद दिखाई देती है। आज ऐसा महसूस होता है कि वर्तमान शिक्षा से हमारे युवा जो कुछ भी प्राप्त कर रहे हैं, उससे वे संवेदनशील मनुष्य कम और संवेदनहीन मशीन ज्यादा बन रहे हैं। वे कॉरपोरेट जगत के लिए काम के लोग तो बनते हैं, किंतु नागरिक और राष्ट्रीय चेतना से लैस संपूर्ण मनुष्य नहीं बन पाते हैं।

        छात्रों और युवाओं में राष्ट्रीय चेतना किसी भी सामान्य व्यक्ति की तुलना में  बहुत ज्यादा और प्रखर होती है। इसलिए यदि हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में ही राष्ट्रीय भाव और सामाजिक मूल्य समाहित होते, तो आज देश के हालात बिल्कुल अलग और बेहतर होते। हालात यह हैं कि जो छात्र और युवा व्यक्तिगत रूप से सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से नहीं जुड़े हैं, उनकी राष्ट्रीय विषयों पर कोई स्पष्ट सोच या राय नहीं बन पाती है, क्योंकि उन्हें इस दिशा में सोचने और खुलकर काम करने का अवसर ही नहीं मिलता। इस प्रकार हमने अनजाने में या किसी सुनियोजित व्यवस्था के तहत छात्र-युवाओं को पूरी तरह अराजनैतिक और नितांत व्यक्तिगत सोच वाला बना दिया है। आज का मुख्यधारा का छात्र-युवा केवल तात्कालिक आनंद और बाहरी उत्सवों में मस्त है। वह लेट-नाइट पार्टियों, सोशल मीडिया के आभासी संसार और मस्त माहौल को ही अपना सर्वस्व समझ रहा है। ऐसी गंभीर स्थितियों में यह बेहद जरूरी है कि छात्रों का स्वस्थ राजनीतिकरण हो, उन्हें एक मजबूत वैचारिक आधार से लैस किया जाए, और देश के बुनियादी प्रश्नों पर वे खुलकर परिसरों में संवाद करें। आज देश के तमाम बड़े शिक्षा परिसरों  में छात्रसंघ चुनाव भी नहीं कराए जाते। आखिर एक लोकतांत्रिक देश में छात्रों के राजनीतिकरण और उनकी वैचारिक प्रखरता से किसे डर लगता है? सच तो यह है कि सत्ताएं हमेशा चाहती हैं कि युवा मस्त-मस्त जीवन जीते रहें, और समाज में खड़े बुनियादी सवालों से कभी न टकराएं। वे पार्टियों में झूमते रहें और फौरी मनोरंजन ही उनके जीवन का आधार बना रहे।

       मनोरंजन और सिर्फ अपने करियर से आगे सोचने वाली युवा शक्ति का अभाव आज हमारे समय की सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती है। आवश्यकता आज इस बात की है कि हमारे शिक्षा परिसरों को ज्यादा जीवंत, उत्तरदायी और प्रासंगिक बनाया जाए। हमारे परिसरों को सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों पर विमर्श और प्रशिक्षण का मुख्य केंद्र बनाया जाए।अगर हमारे परिसर जीवंत होंगे, तो उनसे निकलने वाला नया समाज भी उतना ही जीवंत और जागरूक बनेगा। भारतीय परंपरा में संवाद और विवाद की अनंत धाराएं रही हैं। यह समाज मूलतः एक संवादित समाज है। जिन दिनों संचार के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तो भी हमारा समाज उतना ही संवादित और वैचारिक रूप से सक्रिय था। कुंभ के विशाल आयोजनों से लेकर अनेक मेलों में समाज आपस में संवाद करता था और महत्वपूर्ण विषयों पर मंथन करता था। नए समय ने समाज के इस आपसी संवाद के अनेक मार्ग बंद कर दिए हैं। सामयिक प्रश्नों पर संवाद बेहद कम होने के कारण नई पीढ़ी को देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक चुनौतियों से रू-ब-रू होने का अवसर ही नहीं मिलता। इसलिए देश के युवा आज अपने समय की वास्तविक चुनौतियों को नहीं पहचान पा रहे हैं।

             युवाओं को एक ऐसा रोबोटिक युवा बनाया जा रहा है जो करियर और मनोरंजन से आगे कभी न सोच सके। इस प्रकार सामाजिक सोच का स्वाभाविक विकास पूरी तरह बाधित हो रहा है। ऐसे में देश के छात्र संगठनों को अपनी बड़ी जिम्मेदारी निभानी होगी। छात्र संगठनों की यह जिम्मेदारी है कि वे राजनीतिक दलों के पिछलग्गू बनने के बजाय अपने संकुचित दायरे से बाहर आएं। आज जहां व्यावसायिकता के कारण शिक्षा और शिक्षक छात्रों का साथ छोड़ रहे हैं, छात्र संगठनों को वहीं पर छात्रों का साथ पकड़ना होगा। छात्र संघों को छात्रों की सर्वांगीण प्रतिभा के उन्नयन का मार्ग प्रशस्त करना होगा। छात्र संघ अपनी भूमिका का विस्तार करते हुए सिर्फ छात्र समस्याओं और संकीर्ण राजनीतिक कामों के बजाय देश के बड़े सवालों पर सोचने और उन पर निरंतर विमर्श का कार्य भी कर सकते हैं। छात्र शक्ति की सक्रिय और जागरूक भागीदारी से देश में आमूल-चूल परिवर्तन आ सकता है। एक बार राष्ट्र कल्याण का मिशन और ध्येय पैदा होते ही छात्र एक ऐसी अपराजेय युवा शक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जिससे देश का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होता है। आज देश के सभी क्षेत्रों में रचनात्मक जन-आंदोलन कमजोर हुए हैं। इन आंदोलनों के कमजोर होने के कारण विविध क्षेत्रों की वास्तविक और शोषित आवाजें नीति-निर्धारकों तक सुनाई देनी बंद हो गई हैं। इसके चलते सत्ताओं का अतिरेक और आत्मविश्वास अनियंत्रित रूप से बढ़ रहा है। जनसंगठन और छात्र संगठन एक सामाजिक दंड शक्ति के रूप में काम करें,इसके लिए उन्हें पूरी सजगता के साथ सचेतन प्रयास करने होंगे। इससे सत्ता और प्रशासन को भी सामाजिक शक्ति और जनभावना का विचार करना पड़ता है।

      लोकतंत्र में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी ही उसे सफल और सार्थक बनाती है। अगर नागरिक जागरूक नहीं होते, तो उनको उसके भयंकर परिणाम भोगने पड़ते हैं। एक सोया हुआ समाज कभी भी न्याय प्राप्ति की उम्मीद नहीं कर सकता। एक जागृत समाज ही अपने हितों की रक्षा करता हुआ अपने राष्ट्र की चौमुखी प्रगति में अपना अमूल्य योगदान देता है। अगर छात्रों में छात्र जीवन से ही ये राष्ट्रीय मूल्य स्थापित कर दिए जाएं, तो वे आगे चलकर देश के एक सक्रिय और ईमानदार नागरिक बनेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्हें अपनी जड़ों से गहरा प्रेम होगा, अपनी संस्कृति से प्रेम होगा, अपने समाज और उसके लोगों से सच्चा प्यार होगा। वह कभी किसी से नफरत नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसके मन में राष्ट्रीय भावना का प्रवेश हो चुका होगा। वह राष्ट्र को सदैव सर्वोपरि मानेगा और राष्ट्र के सभी नागरिकों को अपना भाई- बंधु समझेगा। वह जानेगा कि उसके द्वारा किए गए हर कार्य का क्या सामाजिक परिणाम है। उसे बखूबी पता होगा कि देश के समक्ष उपस्थित विभिन्न चुनौतियों का सामना उसे किस तरह करना है। देश के छात्र संगठन अपनी-अपनी विचारधाराओं और राजनीतिक धाराओं को मजबूत करते हुए भी का यह पावन भाव अपने संपर्क में आने वाले हर युवा में भर सकते हैं। सही मायने में यही जागरूक युवा आगे चलकर एक समर्थ, आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करेंगें।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

संचार और प्रबंधन के गुणों को सिखाते हैं श्री गणेश

 

-प्रो.संजय द्विवेदी



     भारतीय संस्कृति अपने नायकों, प्रतीकों और उनकी कथाओं से जीवन रस लेकर ही आजतक प्राणवान है। जीवंत है। उसके नायक चिरयुवा हैं और संकटों से जूझकर सुंदर दुनिया बनाने की आकांक्षा से भरे-पूरे हैं। राम, कृष्ण, शिव, गणेश और ऐसे न जाने कितने देव हमें प्रेरित करते हैं। सबका जीवन सरल नहीं है। सब जूझते हैं और समाधान पाते हैं। आदर पाते हैं। लोकमंगल ही सबका ध्येय है। इन सबमें श्री गणेश की महिमा सबसे अलग है। गणेश चतुर्थी के प्रसंग पर उनकी पूजा के साथ यह जानना जरूरी है कि आखिर उनमें ऐसा क्या खास है जो उन्हें सबसे अलग बनाता है। वे असाधारण संचारकर्ता और कुशल प्रबंधक की तरह हमारे सामने आते हैं।

सुनते हैं सब कुछ ध्यान से-

   गणेश जी के बड़े कान इस बात की गवाही हैं कि वे हर बात को ध्यान से सुनते हैं। सुनना एक साधना है। ध्यान से सुनना उससे बड़ी साधना है। उन्होंने श्रवण कौशल को साध लिया है। दूसरों को ध्यान से सुने बिना न आप समझ सकते हैं न ही उचित निदान तक पहुंच सकते हैं। फैसले लेने हों या न लेने हों, सुनना तो पड़ेगा। गणेश जी ने इसे साध लिया है। इसलिए उन्हें विध्नहर्ता कहा गया, वे सुनकर हमारी समस्याओं का हल करने की क्षमता से लैस हैं।

बारीक नजर और दूरदर्शी नजरिया-

   नजर से ही नजरिया बनता है। आंखें सबके पास होती हैं किंतु दृष्टि सबके पास नहीं होती। सूक्ष्म विश्लेषण का गुण ऐसे ही अर्जित नहीं होता। संकट या सामान्य दिनों में भी बारीक और पैनी नजर रखना व्यक्ति का विलक्षण गुण है। गणेश जी इसी गुण के समादृत हुए। उनकी छोटी आंखें पैनी नजर और तीक्ष्ण एकाग्रता का प्रतीक हैं। वे किसी भी संकट का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं।

परिस्थितियों के अनुसार आचरण-

  श्री गणेश में समय के साथ चलते हैं। मौके पर वे अनुकूलन कर लेते हैं और लचीलापन उनका स्वभाव है। कलाकारों को देखिए वे उनकी कितनी तरह की प्रतिमाएं बनाते हैं। उनका व्यक्तित्व ऐसा है कि उनमें प्रयोग संभव है। उनकी लचीली सूंड यह बताती है कि एक अच्छा कम्युनिकेटर (संचारक) कभी भी अपने रवैये में कठोर नहीं होता। लचीलापन, स्वीकार्यता और समावेशिता उसका मूल गुण है। समय और वातावरण को पहचान कर आचरण ही एक सफल संचारक की पहचान होती है। लोगों को प्रभावित करने में वे इसीलिए सफल होते हैं। आप देखें तो गणेश जी सकारात्मक संचार करते हैं। उनकी सर्वाधिक प्रतिमाएं इसलिए भेंट की जाती हैं, क्योंकि वे शुभ और सकारात्मकता का संचार करती हैं।

सीमित संसाधनों से बनाएं बेहतर जिंदगी-

कम से कम संसाधनों के उपयोग से बेहतर जिंदगी का पाठ वे पढ़ाते हैं। उनके माता-पिता पूज्य शिव और मां पार्वती उनके सामने ब्रम्हांड का चक्कर लगाने की शर्त रखते हैं तो कार्तिक अपने तेज वाहन मयूर से तत्काल यात्रा पर निकल जाते हैं। किंतु श्रीगणेश अपनी अप्रतिम बुद्धिमत्ता और सीमित संसाधनों के प्रयोग के संकल्प पर कायम रहते हुए अपने वाहन ( मूषक-चूहा) की सीमाओं को भी समझते हुए आउट आफ बाक्स निर्णय लेते हैं। वे अपने माता-पिता की परिक्रमा करके ही स्मार्ट वर्क और रिसोर्स मैनेजमेंट का उदाहरण देते हैं। ऐसे कौशल ने उन्हें अप्रतिम बना दिया।

रुकना नहीं, चैरेवेति-चैरेवेति-

वे रुकना नहीं जानते, निरंतर काम पर हैं। बाधाएं आती हैं तो आएं , इससे वे प्रभावित नहीं होते। महाभारत लिखने की कथा को आप याद करें। उस समय महर्षि वेदव्यास तेज गति से बोल रहे थे। गणेश जी उनके लेखक हैं। उनकी लेखनी टूट जाती है। वे पल भर का समय नहीं देखते। तत्काल अपना एक दांत तोड़कर लिखना प्रारंभ कर देते हैं। इसलिए उनको एकदंत के रूप में भी पूजा जाता है। अपनी समय सीमा में रहते हुए काम को वक्त पर पूरा करना ऐसी प्रतिबद्धता है जिसके वे उदाहरण बने। अपने ऐसे प्रबंधकीय और लेखकीय गुणों से उन्होंने मानवता की सेवा की।

जमीन से जुड़े नायक –

   वे सब करते हैं। सब जानते हैं। संकटों के समाधान कर रास्ता बताने वाले हैं किंतु सबके प्रिय गणेश जी कभी भी अपनी जमीन छोड़ते। पद और ज्ञान का अहंकार उन्हें छू तक नहीं गया है। वे जो हैं वह होना कठिन है। उनका विशाल शरीर है, वे असीम बुद्धिमत्ता से भरे हैं। इसके बाद भी वे छोटे से वाहन मूषक पर चल रहे हैं। आज जरा सी पद प्रसिद्धि पाते ही लोग बड़े वाहनों पर चलने लगते हैं। हवाई यात्राओं में ही उनका समय बीतता है। गणेश जी सब कुछ हैं। किंतु वे अपने पुराने वाहन और पुराने सहयोगियों को नहीं भूलते। अहंकार उनके आसपास भी नहीं है। लोगों का मंगल करते हुए, लोगों के कष्ट दूर करते हुए वे सतत् प्रवास करते हैं। संवाद करते हैं।

सब पचा लेते हैं-

उनका बड़ा उदर (पेट) साधारण नहीं है। वे सब कुछ पचा जाते हैं। समाज और संगठन में हो रही हर अच्छी- बुरी बातों को संभालते हैं। उनका बड़ा पेट इस बात को बताता है कि कैसे लीडर को काम करना चाहिए । किस तरह उसको बिना विचलित हुए बहुत सारी निंदा, आलोचना और सुझावों को आत्मसात करते हुए पचा जाना चाहिए। वे निरंतर परिशुद्ध होते जाते हैं। समस्याओं का समाधान करते हुए लोकमंगल का व्रत निभाते हुए। वे कड़े भी हैं सरल भी। उनके हाथ में अंकुश भी है और पाश भी है। वे जानते हैं कि कब उन्हें कठोर होना है और कब सामान्य जनों को अपने प्रेम पाश में बांध कर रखना है। इसलिए देखिए तो गणेश जी बच्चों के सबसे प्रिय देवता हैं,वे अपने से लगते हैं। तो श्रेष्ठ जनों में उनको लेकर अलग पूज्य भाव दिखते हैं। इस तरह गणेश जी का कवरेज एरिया बहुत व्यापक है।

  गणेश जी संकटों से घबराते नहीं रास्ता दिखाते हैं। वे ही हैं जिन्हें विध्नहर्ता कहा गया। रिस्क मैनेजमेंट उनकी विशेषज्ञता का क्षेत्र है। उनको समाधान ही दिखते हैं, संकट नहीं। वे संकट को भांपकर उपयुक्त समाधान देते हैं। विविधता की स्वीकार्यता उनका गुण है। वे अपने पिता शिव के समस्त गणों से भी संवाद रखते हैं। जिनमें भूत,प्रेत, पशु, देवता सभी शामिल हैं। इतने विविध समुदायों से संवाद और उनका साहर्चय प्राप्त करते हुए वे विविधता को साधने वाले देवता बन जाते हैं। जिनके लिए को भी अलग नहीं है। सभी उनके हैं। महान प्रबंधक कैसे विविध लोगों को साधते हैं। गणेश इसके उदाहरण हैं। वे माता-पिता दोनों के प्रिय हैं। दुलारे हैं। वे सभी के लिए गणपति हैं। सभी उन्हें प्रथम पूज्य मानते हैं। अपने जीवन के आरंभ में ही हुई महान दुर्धटना से उन्होंने खुद को उबार लिया। उसका दुख उन्होंने कभी प्रकट नहीं किया। वे बताते हैं जिंदगी रुकती नहीं आगे भी चलती है।