गुरुवार, 6 अगस्त 2026

राजेंद्र माथुर- विचारों की पत्रकारिता के नायक

 जयंती ( 7 अगस्त) पर विशेष-

-प्रो.संजय द्विवेदी



  राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण लगने लगते हैं। उन्होंने जो कुछ पाया, एकाएक नहीं पाया; संघर्ष से पाया, नियमित लेखन से पाया और अपनी रचनाशीलता से पाया। इसी संघर्ष की वृत्ति ने उन्हें असाधारण पत्रकार और संपादक बना दिया। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात से तय होता है कि आखिर उनके लेखन में विचारों की गहराई कितनी है। अपने अखबार को ऊंचाइयों पर ले जाने का उनका संकल्प कितना गहरा है और हमारे समय के प्रश्नों के जवाब तलाशने तथा नए सवाल खड़े करने की कितनी प्रश्नाकुलता संबंधित व्यक्ति में है। राजेंद्र माथुर का संपादकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात की गवाही देता है कि वे असहज प्रश्नों से मुंह नहीं चुराते, बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं। वे सवालों से जूझते हैं और उनके सही एवं प्रासंगिक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं।

     वे सही मायने में पत्रकारिता में विचारों के एक ऐसे प्रतीक पुरुष बनकर सामने आए, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से एक बौद्धिक उत्तेजना का सृजन किया और हिंदी को एक ऐसी भाषा तथा विराट अनुभव-संसार दिया, जिसकी प्रतीक्षा में वह सालो से खड़ी थी। इस मायने में राजेंद्र माथुर की उपस्थिति अपने समय में एक कद्दावर पत्रकार-संपादक की मौजूदगी है। वरिष्ठ पत्रकार श्री सूर्यकांत बाली के मुताबिक,माथुर साहब जैसा बोलते थे, वैसा ही लिखते थे। वे धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत बोलते थे, तो धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत लिखते भी थे। श्री बाली आगे लिखते हैं कि वह एक ऐसा संपादक है, जिसके मन-समुद्र में विचारों की लहरें एक के बाद एक लगातार, अनवरत उठती हैं; कोई लहर किसी दूसरी लहर को नष्ट कर आगे बढ़ने के अहंकार का शिकार नहीं होती। और पूर्णिमा की कोई ऐसी भली रात हर महीने आती है, जब ये लहरें किसी विराट-सर्वोच्च को छू लेने को बेताब हो उठती हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय एवं संपादकीय व्यक्तित्व में एक बौद्धिक आकर्षण दिखता है। उनके लेखन में भारत-जिज्ञासा, भारत-अनुराग और भारत-स्वप्न पूरी समग्रता में प्रकट होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है कि  राजेंद्र माथुर हिंदी पत्रकारिता के उस संधिकाल में संपादक के रूप में सामने आए थे, जब हिंदी अखबार अपने पुरखों के पुण्य के संचित कोष को बढ़ा नहीं पा रहे थे। यह जमा-पूंजी इतनी नहीं थी कि हिंदी की पत्र-पत्रिकाएं व्यावसायिकता की बढ़ती हुई चुनौती को स्वीकार करते हुए इसे बाजार के दबाव से बचा सकें। राजेंद्र माथुर में बौद्धिकता और सच्चरित्रता का असाधारण संगम था, इसीलिए वे हिंदी पत्रकारिता में शिखर स्थान पा सके। वे असाधारण शैलीकार थे। अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक होने के बावजूद उनकी हिंदी लेखन शैली बिंब-प्रधान थी। उनके मुहावरे अपने होते थे। उनमें अभिव्यंजना की अद्भुत शक्ति थी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में वे एक शैलीकार के रूप में याद किए जाएंगे।

  राजेंद्र माथुर एक श्रेष्ठ संपादक थे। उनकी उपस्थिति ही 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' को एक ऐसा समाचार पत्र बनाने में सफल हुई, जिस पर हिंदी पत्रकारिता को नाज है। 'नवभारत टाइम्स' में श्री माथुर के सहयोगी रहे श्री विष्णु खरे ने लिखा है कि, राजेंद्र माथुर महान संपादक होने का अभिनय करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते थे। दरअसल, लिबास से लेकर बोलचाल तक उनकी कोई बनावटी शैली या लहजा नहीं था; वे अपने मामूलीकरण में विश्वास करते थे, वैशिष्ट्य में नहीं। उनकी संपादकीय आदेशों या हुक्मों से नहीं, एक गुणात्मक तथा नैतिक विकिरण से चलती थी। वे एक आणविक ताप या विद्युत संयंत्र की तरह बेहद चुपचाप काम करते थे, जो अपने प्रभाव से लगभग उदासीन रहता है। लेकिन वे बेहद परिश्रमी संपादक थे और शायद एक या दो उपसंपादकों की मदद से एक दस पेज का अखबार रोज निकाल सकते थे। वे अजातशत्रु और धर्मराज युधिष्ठिर जैसे थे, लेकिन जरूरत पड़ने पर वज्र की तरह कठोर भी हो सकते थे। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व बेहद प्रेरक था। आज की पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में घुस आई तमाम बुराइयों से उनका व्यक्तित्व एकदम अलग था। संपादक की जैसी शास्त्रीय परिभाषाएं बताई गई हैं, श्री माथुर उन पर पूरी तरह फिट बैठते हैं। उनका व्यक्तित्व बौद्धिक ऊंचाइयां लिए हुए था। अपनी पत्रकारिता को कुछ पाने और लाभ लेने की सीढ़ी बनाना उन्हें नहीं आता था।

     उनके समकक्ष पत्रकारों की राय में, जिस समय वे दिल्ली में 'नवभारत टाइम्स' जैसे बड़े अखबार के संपादक थे, वे सत्ता के लाभ उठा सकते थे। आज की पत्रकारिता में जिस तरह पत्रकार एवं संपादक सत्ता से लाभ लेकर मंत्री से लेकर राज्यसभा की सीटें ले रहे हैं, श्री माथुर भी ऐसे प्रलोभनों के पास जा सकते थे। किंतु उन्होंने तमाम चर्चाओं के बीच इससे खुद को बचाया। पत्रकार विष्णु खरे अपने लेख में इस बात की पुष्टि भी करते हैं। सही मायने में राजेंद्र माथुर एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने अपने पत्रकारीय व्यक्तित्व को वह ऊंचाई दी जिसके लिए पीढ़ियां उन्हें याद कर रही हैं। विष्णु खरे उनके इन्हीं व्यक्तित्व की खूबियों को रेखांकित करते हुए कहते हैं, राजेंद्र माथुर का जीवन और उनके कार्य एक खुली पुस्तक की तरह थे। कानाफूसी, चुगलखोरी, षड्यंत्र, झूठ-फरेब, मक्कारी उनके स्वभाव में थे ही नहीं। वे किसी चीज को गोपनीय रखना ही नहीं चाहते थे और अक्सर कई ऐसी सूचनाएं निहायत मामूली ढंग से देते थे, जिन पर दूसरे लोग कारोबार कर लेते हैं। इसलिए उनसे बातें करना बेहद असुविधाजनक स्थितियां पैदा कर देता, क्योंकि वे कभी भी किसी के द्वारा कही गई बात को जगजाहिर कर देते थे और वह व्यक्ति अपना मुंह छिपाता फिरता था। उनकी स्मरण शक्ति अद्वितीय थी और भारतीय तथा विश्व राजनीति में सतही और चालू दिलचस्पी न रखने के बावजूद राष्ट्रीय व विदेशी घटनाक्रम तथा इतिहास में उनकी पैठ आश्चर्यजनक थी। एक सच्चे पत्रकार की तरह उन्हें जमाने भर के विषयों के बारे में जानकारी थी और वे घंटों अपने प्रबुद्ध श्रोताओं को मंत्रमुग्ध रख सकते थे। 'नवभारत टाइम्स' के प्रधान संपादक बन जाने के बाद वे भविष्य में क्या बनेंगे, इसको लेकर उनके मित्रों में दिलचस्प अटकलबाजियां होती थीं और बात राष्ट्रसंघ और मंत्रिमंडल तक पहुंचती थी। लेकिन अपने अंतिम दिनों तक राजेंद्र माथुर 'एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया' जैसी पेशेवर संस्था के काम में ही स्वयं को होमते रहे।

    उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी हिंदी पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे संपादक थे, जो लगातार यह सोचते रहे कि हिंदी पत्रकारिता का विचार-दारिद्र्य कैसे दूर किया जाए और कैसे हिंदी में एक संपूर्ण अखबार निकले तथा उसे व्यापक लोकस्वीकृति भी मिल सके। 'नवभारत टाइम्स' के कार्यकारी संपादक रहे स्व. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उनकी इन चिंताओं को निकटता से देखा था। वे लिखते हैं, माथुर साहब का गहन इतिहास-बोध, शुद्ध श्रद्धा और उससे उत्पन्न गरिमामय अतीत की मरीचिका पर आधारित हिंदी पत्रकारिता की कमजोर आधारभूमि के बारे में उन्हें बार-बार सचेत करता रहता था। वे भूतकाल के वायवीय स्वर्णिम अतीत में जीने वाले नहीं थे। वे स्वप्नदर्शी थे और अपने सपनों की उदात्तता के साथ उन्होंने कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य उन्हें बार-बार विचलित तो कर देता था, लेकिन एक कुशल अभियात्री की तरह उन्होंने अपने जहाज की दिशा को क्षणिक प्रलोभनों के लिए किसी अन्य रास्ते पर डालने के बारे में क्षणिक विचार भी नहीं किया।

     उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की विशिष्टता यह भी है कि वे अंग्रेजी के प्राध्यापक और विद्वान होने के बावजूद अपने लेखन की भाषा के नाते हिंदी को चुनते हैं। हिंदी उनकी सांसों में बसती थी। हिंदी पत्रकारिता को नई जमीन तोड़ने के लिए प्रेरित करने और हिंदी लेखकों एवं पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी का निर्माण करने का काम श्री माथुर जीवन भर करते रहे। इंदौर से लेकर दिल्ली तक उनकी पूरी यात्रा में एक भारत-प्रेम, भारत-बोध और हिंदी-प्रेम साफ नजर आता है। शायद इसी के चलते वे देश की पत्रकारिता को एक नई और सही दिशा देने में सफल रहे। श्री मधुसूदन आनंद लिखते हैं, माथुर साहब ने अंग्रेजी में एम.ए. किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ अंग्रेजी पत्रकारों को भी विस्मय में डालती थी। लेकिन उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को चुना, तो शायद इसलिए कि वे अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। अगर यह कहा जाए कि हिंदी पत्रकारों की एक पीढ़ी माथुर साहब को पढ़कर पली और बढ़ी है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। उनके असामयिक निधन के बाद 'नवभारत टाइम्स' को देश के दूर-दूर के इलाकों से हजारों पत्र प्राप्त हुए थे। ये वे पाठक थे, जो उनके उत्कट राष्ट्र-प्रेम, समाज के प्रति उनके सरोकारों, इतिहास की अतल गहराइयों से अनमोल तथ्य ढूंढ कर लाने के उनके सामर्थ्य और शालीन भाषा में राजनेताओं की खिंचाई करने के उनके साहस पर मुग्ध थे। शब्दों का कारोबार करने वाले हमारे जैसे अनपढ़ों और बौद्धिक संस्कारहीनों के साथ तो नियति ने सचमुच अन्याय किया है। उनके लेखन से हम जैसे लोगों को एक दृष्टि तो मिलती ही थी, ज्ञान का वह विपुल भंडार भी कभी बातचीत से तो कभी उनके लेखन से टुकड़ों-टुकड़ों में मिल जाता था, जो प्रायः अंग्रेजी में ही उपलब्ध है और जिसे पढ़कर पचा लेना प्रायः कठिन होता है।

पत्रकारीय सहयोगियों और मित्रों की नजर से देखें, तो राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय व्यक्तित्व की कुछ खूबियां साफ नजर आती हैं

  • अध्ययनशीलता: वे बेहद अध्ययनशील संपादक एवं पत्रकार थे। उनका अध्ययन और विषयों के प्रति उनके ज्ञान की गहराई उन्हें अपने सहयोगियों के बीच अलग ही व्यक्तित्व प्रदान करती थी।
  • भारतीयता के प्रति समर्पण: उनका लेखन भारतीयता और उसके मूल्यों को पूरी तरह समर्पित था।
  • पदलाभ से मुक्ति: उनके मन में किसी प्रकार की पद-लाभ की कामना नहीं थी। वे अपने काम के प्रति समर्पित थे और किसी गंदी राजनीति का हिस्सा नहीं थे।
  • मानवीय गुण व अहंकारहीनता: उनमें मानवीय गुण भरे हुए थे, जिसके चलते वे मानवीय कमजोरियों और पद के अहंकार के शिकार नहीं हुए। एक बड़े अखबार के संपादक का पद, रुतबा और अहम् उन्हें छू नहीं पाया।

यह उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता थी, जिसे उनके सहयोगी रहे सूर्यकांत बाली इन शब्दों में रेखांकित करते हैं,हमारे प्रधान संपादक को कोई पांचवां काम आता है, इस पर तो मुझे पूरा शक है: बस सोचना, पढ़ना, बतियाना और लिखना, उनकी सारी दुनिया इन चार कामों में सिमट चुकी थी। श्री माथुर के व्यक्तित्व पर यह एक मुकम्मल टिप्पणी है, जो बताती है कि वे किस तरह के पत्रकार-संपादक थे। उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व इसीलिए एक अलग किस्म की आभा के साथ सामने आता है, जिसमें एक बौद्धिक तेज और आकर्षण निरंतर दिखता है। जाहिर तौर पर ऐसे उदाहरण आने वाली पत्रकार-पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं कि किस तरह उन्होंने खुद को तैयार किया और असहज एवं वैश्विक सवालों पर इतनी कम आयु में लेखन शुरू कर अपनी देशव्यापी पहचान बनाई। शायद इसीलिए देश के दो महत्वपूर्ण अखबारों 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' के प्रधान संपादक पद तक वे पहुंच पाए। यह यात्रा एक ऐसा सफर है, जिसमें श्री माथुर ने जो रचा और लिखा, वह आज भी पत्रकारिता की पूंजी और धरोहर है। पत्रकारिता का लेखन सामयिक होता है और उसकी तात्कालिक पहचान होती है। श्री माथुर के पत्रकारीय लेखन के बहाने हम लगभग चार दशक की राजनीति, उसकी समस्याओं और चिंताओं से रूबरू होते हैं। यह एक दैनिक इतिहास की तरह का लेखन है, जिससे हम अपने विगत में झांक सकते हैं और गलतियों से सबक लेकर नए रास्ते तलाश सकते हैं।

     उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक ऐसे लेखक-संपादक के तौर पर सामने आते हैं, जो पूर्णकालिक पत्रकार थे। वे किसी साहित्य की परंपरा से आने वाले संपादक नहीं थे। अतः उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यकार-संपादकों द्वारा दी गई भाषा और उसके मुहावरों से अलग एक अनूठी पत्रकारीय भाषा का अनुभव दिया। हिंदी को संवाद, संचार और सूचना की भाषा बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही मायने में वे एक ऐसे संपादक और लेखक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने बहुत से अनछुए विषयों को हिंदी के अनुभव का विषय बनाया, जिन पर पहले अंग्रेजी के पत्रकारों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने भावनाओं से ऊपर विचार और बौद्धिकता को महत्व दिया। इसके चलते हिंदी को एक नई भाषा, एक नया अनुभव और अभिव्यक्ति का एक नया संबल मिला। उनकी बौद्धिकता ने हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों के सामने सम्मान से खड़े होने लायक बनाया, जिससे हिंदी पत्रकारिता ने एक नया आत्मविश्वास और नई ऊर्जा हासिल की।  आज हिंदी पत्रकारिता पर जिस तरह बाजारवादी ताकतों का दबाव गहरा रहा है, ऐसे समय में राजेंद्र माथुर के बहाने हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल एक आवश्यक विमर्श बन गई है। शायद उनकी स्मृति के बहाने हम कुछ ऐसे रास्ते तलाश पाएं, जो हमें इस कठिन समय में अपने मूल्यों के साथ काम करने का हौसला दे सकें।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

 

युवा शक्ति के जागरण से ही बनेगा समर्थ भारत


-प्रो.संजय द्विवेदी

 


   भारत इस अर्थ में गौरवशाली है कि वह एक युवा देश है। युवाओं की संख्या के हिसाब से भी, अपने सामर्थ्य और चैतन्य के आधार पर भी भारत पूरी दुनिया में एक विशिष्ट स्थान रखता है। भारत एक ऐसा अनूठा देश है, जिसके सारे नायक युवा हैं। हमारे गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक चेतना के केंद्र श्रीराम, श्रीकृष्ण, जगदगुरू शंकराचार्य और आधुनिक युग के नायक स्वामी विवेकानंद तक सभी युवा नायक रहे हैं। युवा कोई केवल शारीरिक आयु नहीं है, युवा वास्तव में एक विराट चेतना है, जिसमें अपार ऊर्जा बसती है, गहरा भरोसा बसता है, अडिग विश्वास बसता है, सुंदर सपने पलते हैं और नई आकांक्षाएं लगातार धड़कती हैं। इसलिए युवा होना भारत को बेहद रास आता है।

      भारत के सारे भगवान युवा हैं। वे कभी बुजुर्ग नहीं होते, वे सदैव शाश्वत युवा रहते हैं। यही युवा चेतना और ऊर्जा भारत की जीवंतता का मुख्य आधार है। आज जबकि दुनिया के तमाम देशों में युवा शक्ति का भारी अभाव दिखता है, भारत का चेहरा उनमें बिल्कुल अलग और ओजस्वी दिखाई देता है।  छात्र होना यदि निरंतर सीखना और ज्ञान अर्जित करना है, तो युवा होना अपने कर्म को पूजा मानकर पूरी लगन से राष्ट्र निर्माण में जुट जाना है। एक सीख है, तो दूसरा प्रचंड कर्म है। सीखी गई हर चीज को हमारे युवा ही परिणाम देते हैं और उसे धरातल पर साकार करते हैं। ऐसे में भारत की इस विराट छात्र शक्ति को सीखने के बेहतर और पारदर्शी अवसर देना,उनकी अंतर्निहित प्रतिभा के उन्नयन के लिए नए अनंत आकाश उपलब्ध कराना, हमारे समाज और चुनी हुई सरकारों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि हमारे छात्र को छात्र जीवन में ठीक से गढ़ा नहीं जाएगा, तो वह आगे चलकर एक आदर्श और जिम्मेदार नागरिक कैसे बनेगा?

      देश के प्रति अपनी मौलिक जिम्मेदारियों का निर्वहन वह किस प्रकार करेगा? भारत के शिक्षा परिसर ही नए भारत के निर्माण की असली आधारशिला हैं, अतः उनका वैचारिक रूप से जीवंत होना और निरंतर सक्रिय रहना बेहद जरूरी है। अराजनैतिक छात्र शक्ति का निर्माण आज हमारे समाज की एक बड़ी विडंबना बन चुकी है। देश में पूरी तरह से एक ऐसा कृत्रिम वातावरण बनाया जा रहा है जिसमें छात्र सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचे, अपने व्यक्तिगत करियर और पैकेज के बारे में सोचे। उसमें सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों, राष्ट्र के प्रति गहरे सद्भाव और संवेदनशीलता कैसे पैदा हो, इस ओर गंभीर प्रयास आज बहुत जरूरी हैं। यह अत्यंत आवश्यक है कि वे अपने देश के बारे में गहराई से जानें, उसकी विविधताओं और बहुलताओं का सम्मान करें, तथा ऐसे प्रबुद्ध नागरिक बनें जो विश्वमंच पर भारत की मान-प्रतिष्ठा को बढ़ा सकें। अतीत में तमाम सामाजिक संगठनों से जुड़कर हमारी छात्र-युवा शक्ति अनेक प्रकार के सामाजिक और रचनात्मक प्रकल्पों को चलाती भी रही है। किंतु दुर्भाग्यवश, हमारी वर्तमान औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में ऐसी कोई जीवंत व्यवस्था पूरी तरह नदारद दिखाई देती है। आज ऐसा महसूस होता है कि वर्तमान शिक्षा से हमारे युवा जो कुछ भी प्राप्त कर रहे हैं, उससे वे संवेदनशील मनुष्य कम और संवेदनहीन मशीन ज्यादा बन रहे हैं। वे कॉरपोरेट जगत के लिए काम के लोग तो बनते हैं, किंतु नागरिक और राष्ट्रीय चेतना से लैस संपूर्ण मनुष्य नहीं बन पाते हैं।

        छात्रों और युवाओं में राष्ट्रीय चेतना किसी भी सामान्य व्यक्ति की तुलना में  बहुत ज्यादा और प्रखर होती है। इसलिए यदि हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में ही राष्ट्रीय भाव और सामाजिक मूल्य समाहित होते, तो आज देश के हालात बिल्कुल अलग और बेहतर होते। हालात यह हैं कि जो छात्र और युवा व्यक्तिगत रूप से सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से नहीं जुड़े हैं, उनकी राष्ट्रीय विषयों पर कोई स्पष्ट सोच या राय नहीं बन पाती है, क्योंकि उन्हें इस दिशा में सोचने और खुलकर काम करने का अवसर ही नहीं मिलता। इस प्रकार हमने अनजाने में या किसी सुनियोजित व्यवस्था के तहत छात्र-युवाओं को पूरी तरह अराजनैतिक और नितांत व्यक्तिगत सोच वाला बना दिया है। आज का मुख्यधारा का छात्र-युवा केवल तात्कालिक आनंद और बाहरी उत्सवों में मस्त है। वह लेट-नाइट पार्टियों, सोशल मीडिया के आभासी संसार और मस्त माहौल को ही अपना सर्वस्व समझ रहा है। ऐसी गंभीर स्थितियों में यह बेहद जरूरी है कि छात्रों का स्वस्थ राजनीतिकरण हो, उन्हें एक मजबूत वैचारिक आधार से लैस किया जाए, और देश के बुनियादी प्रश्नों पर वे खुलकर परिसरों में संवाद करें। आज देश के तमाम बड़े शिक्षा परिसरों  में छात्रसंघ चुनाव भी नहीं कराए जाते। आखिर एक लोकतांत्रिक देश में छात्रों के राजनीतिकरण और उनकी वैचारिक प्रखरता से किसे डर लगता है? सच तो यह है कि सत्ताएं हमेशा चाहती हैं कि युवा मस्त-मस्त जीवन जीते रहें, और समाज में खड़े बुनियादी सवालों से कभी न टकराएं। वे पार्टियों में झूमते रहें और फौरी मनोरंजन ही उनके जीवन का आधार बना रहे।

       मनोरंजन और सिर्फ अपने करियर से आगे सोचने वाली युवा शक्ति का अभाव आज हमारे समय की सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती है। आवश्यकता आज इस बात की है कि हमारे शिक्षा परिसरों को ज्यादा जीवंत, उत्तरदायी और प्रासंगिक बनाया जाए। हमारे परिसरों को सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों पर विमर्श और प्रशिक्षण का मुख्य केंद्र बनाया जाए।अगर हमारे परिसर जीवंत होंगे, तो उनसे निकलने वाला नया समाज भी उतना ही जीवंत और जागरूक बनेगा। भारतीय परंपरा में संवाद और विवाद की अनंत धाराएं रही हैं। यह समाज मूलतः एक संवादित समाज है। जिन दिनों संचार के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तो भी हमारा समाज उतना ही संवादित और वैचारिक रूप से सक्रिय था। कुंभ के विशाल आयोजनों से लेकर अनेक मेलों में समाज आपस में संवाद करता था और महत्वपूर्ण विषयों पर मंथन करता था। नए समय ने समाज के इस आपसी संवाद के अनेक मार्ग बंद कर दिए हैं। सामयिक प्रश्नों पर संवाद बेहद कम होने के कारण नई पीढ़ी को देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक चुनौतियों से रू-ब-रू होने का अवसर ही नहीं मिलता। इसलिए देश के युवा आज अपने समय की वास्तविक चुनौतियों को नहीं पहचान पा रहे हैं।

             युवाओं को एक ऐसा रोबोटिक युवा बनाया जा रहा है जो करियर और मनोरंजन से आगे कभी न सोच सके। इस प्रकार सामाजिक सोच का स्वाभाविक विकास पूरी तरह बाधित हो रहा है। ऐसे में देश के छात्र संगठनों को अपनी बड़ी जिम्मेदारी निभानी होगी। छात्र संगठनों की यह जिम्मेदारी है कि वे राजनीतिक दलों के पिछलग्गू बनने के बजाय अपने संकुचित दायरे से बाहर आएं। आज जहां व्यावसायिकता के कारण शिक्षा और शिक्षक छात्रों का साथ छोड़ रहे हैं, छात्र संगठनों को वहीं पर छात्रों का साथ पकड़ना होगा। छात्र संघों को छात्रों की सर्वांगीण प्रतिभा के उन्नयन का मार्ग प्रशस्त करना होगा। छात्र संघ अपनी भूमिका का विस्तार करते हुए सिर्फ छात्र समस्याओं और संकीर्ण राजनीतिक कामों के बजाय देश के बड़े सवालों पर सोचने और उन पर निरंतर विमर्श का कार्य भी कर सकते हैं। छात्र शक्ति की सक्रिय और जागरूक भागीदारी से देश में आमूल-चूल परिवर्तन आ सकता है। एक बार राष्ट्र कल्याण का मिशन और ध्येय पैदा होते ही छात्र एक ऐसी अपराजेय युवा शक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जिससे देश का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होता है। आज देश के सभी क्षेत्रों में रचनात्मक जन-आंदोलन कमजोर हुए हैं। इन आंदोलनों के कमजोर होने के कारण विविध क्षेत्रों की वास्तविक और शोषित आवाजें नीति-निर्धारकों तक सुनाई देनी बंद हो गई हैं। इसके चलते सत्ताओं का अतिरेक और आत्मविश्वास अनियंत्रित रूप से बढ़ रहा है। जनसंगठन और छात्र संगठन एक सामाजिक दंड शक्ति के रूप में काम करें,इसके लिए उन्हें पूरी सजगता के साथ सचेतन प्रयास करने होंगे। इससे सत्ता और प्रशासन को भी सामाजिक शक्ति और जनभावना का विचार करना पड़ता है।

      लोकतंत्र में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी ही उसे सफल और सार्थक बनाती है। अगर नागरिक जागरूक नहीं होते, तो उनको उसके भयंकर परिणाम भोगने पड़ते हैं। एक सोया हुआ समाज कभी भी न्याय प्राप्ति की उम्मीद नहीं कर सकता। एक जागृत समाज ही अपने हितों की रक्षा करता हुआ अपने राष्ट्र की चौमुखी प्रगति में अपना अमूल्य योगदान देता है। अगर छात्रों में छात्र जीवन से ही ये राष्ट्रीय मूल्य स्थापित कर दिए जाएं, तो वे आगे चलकर देश के एक सक्रिय और ईमानदार नागरिक बनेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्हें अपनी जड़ों से गहरा प्रेम होगा, अपनी संस्कृति से प्रेम होगा, अपने समाज और उसके लोगों से सच्चा प्यार होगा। वह कभी किसी से नफरत नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसके मन में राष्ट्रीय भावना का प्रवेश हो चुका होगा। वह राष्ट्र को सदैव सर्वोपरि मानेगा और राष्ट्र के सभी नागरिकों को अपना भाई- बंधु समझेगा। वह जानेगा कि उसके द्वारा किए गए हर कार्य का क्या सामाजिक परिणाम है। उसे बखूबी पता होगा कि देश के समक्ष उपस्थित विभिन्न चुनौतियों का सामना उसे किस तरह करना है। देश के छात्र संगठन अपनी-अपनी विचारधाराओं और राजनीतिक धाराओं को मजबूत करते हुए भी का यह पावन भाव अपने संपर्क में आने वाले हर युवा में भर सकते हैं। सही मायने में यही जागरूक युवा आगे चलकर एक समर्थ, आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करेंगें।