बुधवार, 11 जून 2014

अच्युतानंद मिश्र -एक असली आदमी


                                  -संजय द्विवेदी
हमारे समय के बेहद महत्वपूर्ण संपादक, पत्रकार, लेखक, पत्रकार संगठनों के अगुआ, शिक्षाविद्, आयोजनकर्ता, और सामाजिक कार्यकर्ता जैसी अच्युतानंद मिश्र की अनेक छवियां हैं। उनकी हर छवि न सिर्फ पूर्णता लिए हुए है वरन् लोगों को जोड़ने वाली साबित हुयी है। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानव की सहज कमजोरियां भी उनके आसपास से होकर नहीं गुजरी हैं। राग-द्वेष और अपने- पराए के भेद से परे जैसी दुनिया उन्होंने रची है उसमें सबके लिए आदर है, प्यार है, सम्मान है और कुछ देने का भाव है। देश के आला अखबारों जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, अमर उजाला, लोकमत समाचार के संपादक के नाते उन्हें हिंदी की दुनिया ने देखा और पढ़ा है।

  6 मार्च, 1937 को गाजीपुर के एक गांव में जन्मे श्री मिश्र पत्रकारों के संघर्षों की अगुवाई करते हुए संगठन को शक्ति देते रहे हैं तो एक शिक्षाविद् के रूप में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति के नाते उन्होंने पत्रकारिता शिक्षा और शोध के क्षेत्र में नए आयाम गढ़े। स्वतंत्र भारत की पत्रकारिता पर शोध परियोजना के माध्यम से उन्होंने जो काम किया है वह आने वाली पीढियों के लिए एक मानक काम है, जिसके आगे चलकर और भी नए रास्ते निकलेंगें। लोगों को जोड़ना और उन्हें अपने प्रेम से सींचना, उनसे सीखने की चीज है। उनके जानने वाले लोगों से आप मिलें तो पता चलेगा कि आखिर अच्युतानंद मिश्र क्या हैं। वे कितनी धाराओं, कितने विचारों, कितने वादों और कितनी प्रतिबद्धताओं के बीच सम्मान पाते हैं कि व्यक्ति आश्चर्य से भर उठता है। उनका कवरेज एरिया बहुत व्यापक है, उनकी मित्रता में देश की राजनीति, मीडिया और साहित्य के शिखर पुरूष भी हैं तो बेहद सामान्य लोग और साधारण परिवेश से आए पत्रकार और छात्र भी। वे हर आयु के लोगों के बीच लोकप्रिय हैं। उनके परिधानों की तरह उनका मन, जीवन और परिवेश भी बहुत स्वच्छ है। यह व्यापक रेंज उन्होंने सिर्फ अपने खरे पन से बनाई है, ईमानदारी भरे रिश्तों से बनाई है। लोगों की सीमा से बाहर जाकर मदद करने का स्वभाव जहां उनकी संवेदनशीलता का परिचायक है, वहीं रिश्तों में ईमानदारी उनके खांटी मनुष्य होने की गवाही देती है। वे जैसे हैं, वैसे ही प्रस्तुत हुए हैं। इस बेहद चालाक और बनावटी समय में वे एक असली आदमी हैं। अपनी भद्रता से वे लोगों के मन, जीवन और परिवारों में जगह बनाते गए। खाने-खिलाने, पहनने-पहनाने के शौक ऐसे कि उनसे हमेशा रश्क हो जाए। जिंदगी कैसे जीनी चाहिए उनको देख कर सीखा जा सकता है। डायबिटीज है पर वे ही ऐसे हैं जो खुद न खाने के बावजूद आपके लिए एक-एक से मिठाईंयां पेश कर सकते हैं। उनका आतिथ्यभाव,स्वागतभाव, प्रेमभाव मिलकर एक अहोभाव रचते हैं।  

ह्रदयनारायण दीक्षितः प्रखर राष्ट्रवादी स्वर

                                     


                                        - संजय द्विवेदी

वे हिंदी पत्रकारिता में राष्ट्रवाद का सबसे प्रखर स्वर हैं। दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा समेत देश के अनेक प्रमुख अखबारों में उनकी पहचान एक प्रख्यात स्तंभलेखक की है। राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर चल रही उनकी कलम के मुरीद आज हर जगह मिल जाएंगें। उप्र के उन्नाव जिले में जन्में श्री ह्दयनारायण दीक्षित मूलतः एक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। उनका सार्वजनिक जीवन और पत्रकारिता एक दूसरे ऐसे घुले-मिले हैं कि अंदाजा ही नहीं लगता कि उनका मूल काम क्या है। उनका सार्वजनिक जीवन उन्नाव जिले की सामाजिक समस्याओं, जनसमस्याओं से जूझते हुए प्रारंभ हुआ। वे अपने जिले में पुलिस अत्याचार, प्रशासनिक अन्याय लेकर लगातार आंदोलनरत रहे। इसी ने उन्हें राज्य की राजनीति का एक प्रमुख चेहरा बना दिया। जनता के प्रति यही संवेदनशीलता उनके पत्रकारीय लेखन में भी झांकती है।

    सन् 1972 में जिला परिषद, उन्नाव के सदस्य के रूप में अपना राजनीतिक जीवन प्रारंभ करने वाले श्री दीक्षित आपातकाल के दिनों में 19 महीने जेल में भी रहे। उप्र की विधानसभा में लगातार चार बार चुनाव जीतकर पहुंचे। राज्यसरकार में पंचायती राज और संसदीय कार्यमंत्री भी रहे। इन दिनों विधानपरिषद के सदस्य और भाजपा की उप्र इकाई में उपाध्यक्ष हैं। उनके पत्रकारीय जीवन पर एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। 1978 में उन्होंने कालचिंतन नाम से एक पत्रिका निकाली। जिसे  2004 तक चलाया। इसके साथ ही राष्ट्रवादी विचारधारा के अखबारों-पत्रिकाओं पांचजन्य और राष्ट्रधर्म में लिखने का सिलसिला शुरू हुआ। आज तो वे देश के सबसे बड़े हिंदी अखबार दैनिक जागरण के नियमित स्तंभलेखक हैं। अब तक उनके चार हजार से अधिक लेख अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं। राष्ट्रवादी विचारधारा के लेखक होने के नाते उनके सामने तमाम ऐसे सवाल जो मुख्यधारा की मीडिया को असहज लगते हैं उनपर भी उन्होंने खूब लिखा। उन्होंने उस दौर में राष्ट्रवादी पत्रकारिता का झंडा उठाया, जब इस विचार को मुख्यधारा की पत्रकारिता में बहुत ज्यादा स्वीकृति नहीं थी। दीनदयाल उपाध्याय पर लिखी गयी उनकी किताब-भारत के वैभव का दीनदयाल मार्गतथा दीनदयाल उपाध्यायः दर्शन, अर्थनीति और राजनीति खासी चर्चा में रही। इसके अलावा भगवदगीता पर भी उनकी एक किताब को सराहा गया। उनकी किताबसांस्कृतिक राष्ट्रदर्शन भारतीय राष्ट्रवाद के मूलस्रोत,विकास, राष्ट्रभाव और राष्ट्रीय एकता में बाधक तत्वों का विवेचन करती है। अब तक दो दर्जन पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति और उसकी समाजोपयोगी भूमिका का ही आपने रेखांकन किया है। संसदीय परंपराओं और राजनीतिक तौर-तरीकों पर उनका लेखन लोकतंत्र की जड़ों को मजबूती देने वाला है। एक लोकप्रिय स्तंभकार के नाते मध्य प्रदेश सरकार ने उनके पत्रकारीय योगदान को देखते हुए उन्हें गणेशशंकर विद्यार्थी सम्मान से अलंकृत किया। इसके अलावा राष्ट्रधर्म पत्रिका की ओर से भी उनको भानुप्रताप शुक्ल पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।  

शनिवार, 7 जून 2014

सोशल मीडिया जिसका है नाम !


सामाजिक परिवर्तन और बदलाव की संभावनाओं का प्रेरक है यह माध्यम
-संजय द्विवेदी
   भारतीय समाज में किसी नए प्रयोग को लेकर इतनी स्वीकार्यता कभी नहीं थी, जितनी कम समय में सोशल मीडिया ने अर्जित की है। जब इसे सोशल मीडिया कहा गया तो कई विद्वानों ने पूछा अरे भाई क्या बाकी मीडिया अनसोशल है? अगर वे भी सामाजिक हैं,तो यह सामाजिक मीडिया कैसे? किंतु समय ने साबित किया कि यह वास्तव में सोशल मीडिया है।
   पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है। दृश्य, विचार, कमेंट् और निजी सृजनात्मकता के अनुभव जब यहां तैरने शुरू हुए तो लोकतंत्र के पहरूओं और सरकारों का भी इसका अहसास हुआ। आज वे सब भी अपनी सामाजिकता के विस्तार के लिए सोशल मीडिया पर आ चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं भी कहा कि सोशल मीडिया नहीं होता तो हिंदुस्तान की क्रियेटिविटी का पता ही नहीं चलता। सोशल मीडिया अपने स्वभाव में ही बेहद लोकतांत्रिक है। जाति, धर्म, भाषा, लिंग और रंग की सीमाएं तोड़कर इसने न सिर्फ पारंपरिक मीडिया को चुनौती दी है वरन् यह सही मायने में आम आदमी का माध्यम बन गया है। इसने संवाद को निंरतर, समय से पार और लगातार बना दिया है। इसने न सिर्फ आपकी निजता को स्थापित किया है वरन एकांत को भी भर दिया है।
   सूचनाएं आज मुक्त हैं और वे इंटरनेट के पंखों पर उड़ रही हैं। सूचना 21 वीं सदी की सबसे बड़ी ताकत बनी तो सोशल मीडिया, सभी उपलब्ध मीडिया माध्यमों में सबसे लोकप्रिय माध्यम बन गया। सूचनाएं अब ताकतवर देशों, बड़ी कंपनियों और धनपतियों द्वारा चलाए जा रहे प्रचार माध्यमों की मोहताज नहीं रहीं। वे कभी भी वायरल हो सकती हैं और कहीं से भी वैश्विक हो सकती हैं। स्नोडेन और जूलियन असांजे को याद कीजिए। सूचनाओं ने अपना अलग गणतंत्र रच लिया है। निजता अब सामूहिक संवाद में बदल रही है। वार्तालाप अब वैश्विक हो रहे हैं। इस वचुर्अल दुनिया में आपका होना ही आपको पहचान दिला रहा है। ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय कहने वाले देश में अब एक वाक्य का विचार क्रांति बन रहा है। यही विचार की ताकत है कि वह किताबों और विद्वानों के इंतजार में नहीं है।
   सोशल साइट्स का समाजशास्त्र अलग है। यहां ट्वीट फैशन भी है और सामाजिक काम भी। फेसबुक और ट्विटर नए गणराज्य हैं। इस खूबसूरत दुनिया में आपकी मौजूदगी को दर्ज करते हुए गणतंत्र। एक नया भूगोल और नया प्रतिपल नया इतिहास रचते हुए गणतंत्र। निजी जिंदगी से लेकर जनांदोलन और चुनावों तक अपनी गंभीर मौजूदगी को दर्ज करवा रहा ये माध्यम, सबको आवाज और सबकी वाणी देने के संकल्प से लबरेज है। कंप्यूटर से आगे अब स्मार्ट होते मोबाइल इसे गति दे रहे हैं। इंटरनेट की प्रकृति ही ऐसी है कि वह डिजीटल गैप को समाप्त करने की संभावनाओं से भरा –पूरा है। यहां मनुष्य न तो सत्ता का मोहताज है, न ही व्यापार का। कोई भी मनुष्यता सहअस्तित्व से ही सार्थक और जीवंत बनती है। यहां यह संभव होता हुआ दिख रहा है।
  अपने तमाम नकारात्मक प्रभावों के बावजूद इसके उपयोग के प्रति बढ़ती ललक बताती है कि सोशल मीडिया का यह असर अभी और बढ़ने वाला है। 2014 के अंत तक मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले साढे सात करोड़ हो जाएंगें। यह विस्तार इस माध्यम को शक्ति देने वाला है। इसे टाइम किलिंग मशीन और धोखे का बाजार कहने वाले भी कम नहीं हैं। अपसंस्कृति के विस्तार का भी इसे दोषी माना जाने लगा है। व्यक्ति का हाइपरऐक्टिव होना, उसकी एकाग्रता में कमी,अवसाद और एबिलिटी में कमी जैसे दोष भी इस माध्यम को दिए जाने लगे हैं। इसके स्वास्थ्यगत प्रभावों, मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर बातचीत तेज हो रही है। ऐसे में यह मान लेने में हिचक नहीं करनी चाहिए कि यहां मोती भी हैं और कीचड़ भी। झूठ, बेईमानी, अपराध और बेवफाई के किस्से हैं तो दूसरी तरफ निभ रही दोस्तियों की लंबी कहानियां हैं। हो चुकी और चल रही शादियों की लंबी श्रृंखला है। आज जबकि अस्सी प्रतिशत युवा सोशल नेटवर्क पर हैं, तो शोध यह भी बताते हैं कि दिन में इन माध्यमों के अभ्यासी 111 (एक सौ ग्यारह) बार मोबाइल चेक करते हैं। जाहिर तौर पर यह सच है तो एकाग्रता में कमी आना संभव है। आज देश के लगभग 22 करोड़ लोग इंटरनेट पर हैं। आप देखें तो कभी किसी भी माध्यम के प्रति इतना स्वागत भाव नहीं था। फिल्में आई तो अच्छे घरों के लोग न इसमें काम करते थे, ना ही वे फिल्में देखने जाते थे। मां-पिता से छिपकर युवा सिनेमा देखने जाते थे। टीवी आया तो उसे भी इडियट बाक्स कहा गया। टीवी को लगातार देखते हुए भी हिंदुस्तान उसके प्रति आलोचना के भाव से भरा रहा और आज भी है। किंतु सोशल मीडिया के प्रति आरंभ से ही स्वागत भाव है। इसके प्रति समाज में अस्वीकृति नहीं दिखती क्योंकि यह कहीं न कहीं संबंधों का विस्तार कर रहा है। संवाद की गुंजाइश बना रहा है। रहिए कनेक्ट के नारे को साकार कर रहा है। इसके सही और सार्थक इस्तेमाल से छवियां गढ़ी जा रही हैं, चुनाव लड़े और जीते जा रहे हैं। समाज में पारदर्शिता का विस्तार हो रहा है। लोग कहने लगे हैं। प्रतिक्रिया करने लगे हैं।
  इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा किसी भी माध्यम का गलत इस्तेमाल हमें संकट में ही डालता है। यह समय इंफारमेशन वारफेयर का भी है और साइको वारफेयर का भी। इस दौर में सूचनाएं मुक्त हैं और प्रभावित कर रही हैं। यहां संपादक अनुपस्थित है और रिर्पोटर भी प्रामाणिक नहीं हैं। इसलिए सूचनाओं की वास्तविकता भी जांची जानी चाहिए। कई बार जो संकट खड़े हो रहे हैं, वह वास्तविकता से दूर होते हैं। सोशल मीडिया की पहुंच और प्रभाव को देखते हुए यहां दी जा रही सूचनाओं के सावधान इस्तेमाल की जरूरत भी महसूस की जाती है। इसे अफवाहें, तनाव और वैमनस्य फैलाने का माध्यम बनाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। हमारे साईबर कानूनों में भी अपेक्षित गंभीरता का अभाव है और समझ की भी कमी है। इसके चलते तमाम स्थानों पर निर्दोष लोग प्रताड़ित भी रहे हैं। पुणे में एक इंजीनियर की हत्या सभ्य समाज पर एक तमाचा ही है। ऐसे में हमें एक ऐसा समाज रचने की जरूरत है जहां संवाद कड़वाहटों से मुक्त और निरंतर हो। जहां समाज के सवालों के हल खोजे जाएं न कि नए विवाद और वितंडावाद को जन्म दिया जाए। सोशल मीडिया में समरस और मानवीय समाज की रचना की शक्ति छिपी है। किंतु उसकी यह संभावना उसके इस्तेमाल करने वालों में छिपी हुयी है। इसका सही इस्तेमाल ही हमें इसके वास्तविक लाभ दिला सकता है। सामाजिक सवालों पर जागरूकता और जनचेतना के जागरण में भी यह माध्यम सहायक सिद्ध हो सकता है। आम चुनावों में राजनीतिक दलों ने इस माध्यम की ताकत को इस्तेमाल किया और समझा है। आज युवा शक्ति के इस माध्यम में बड़ी उपस्थित के चलते इसे सामाजिक बदलाव और परिवर्तन का वाहक भी माना जा रहा है। सकात्मकता से भरे-पूरे युवा और सामाजिक सोच से लैस लोग इस माध्यम से उपजी शक्ति को भारत के निर्माण में लगा सकते हैं। ऐसे समय में जब सोशल मीडिया की शक्ति का प्रगटीकरण साफ है, हमें इसके सावधान, सर्तक और समाज के लिए उपयोगी प्रयोगों की तरफ बढ़ने की जरूरत है। यदि ऐसा संभव हो सका तो सोशल मीडिया की शक्ति हमारे लोकतंत्र के लिए वरदान साबित हो सकती है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

रविवार, 1 जून 2014

अरविंद केजरीवालः भरोसा तोड़ता नायक

अरविंद केजरीवालः भरोसा तोड़ता नायक
-संजय द्विवेदी
   हमारे जैसे देश के तमाम लोग अरविंद केजरीवाल से नाराज हैं। देश की जनता की उम्मीदों का चेहरा और एक समय में मध्यवर्ग के हीरो बन चुके इस आदमी को आखिर हुआ क्या है? शायद ही कोई हो जो अपनी मेहनत से अर्जित सार्वजनिक छवि को खुद मटियामेट करे। आज लोगों को यह सवाल मथ रहा है कि क्या अरविंद केजरीवाल अंततः और प्रथमतः एक आंदोलनकारी ही बनकर रह जाएंगें? सवाल यह भी उठता है कि जिन सवालों को लेकर उनका आंदोलन खड़ा हुआ और वह बाद में एक पार्टी में तब्दील हुआ,वे सवाल तो आज भी जस के तस हैं। अरविंद सही मायने में एक ऐसे नायक हैं, जिन्होंने लोगों में सपने जगाए भी और उन्हें अपने हाथों से तोड़ा भी।
     अरविंद केजरीवाल पर भरोसा करते हुए दिल्ली की जनता ने जिस तरह से उनके पक्ष में अपनी एकजुटता दिखाई, वह अभूतपूर्व थी। किंतु लगता है कि इस सफलता ने उनमें विनम्रता के बजाए अहंकार ही भरा। सत्ता को छोड़कर भागना और बाद में उसके लिए पछताना। साथियों का एक-एक कर अलग होते जाना, यह बताता है कि वे कहीं न कहीं अपनी कार्यशैली से लोगों को आहत कर रहे थे। उनके नासमझ फैसले बताते हैं कि राजनीति में अपनी जमीन छोड़ना कितना खतरनाक होता है। दिल्ली, हरियाणा,पंजाब जैसे राज्यों को केंद्र बनाकर अपनी एक ठोस राजनीतिक जमीन बनाने के बजाए उनका वामन से विराट बनने का सपना, उनकी रणनीतिक  विफलता तो है ही दिल तोड़ने वाली भी है। दिल्ली में एक आंदोलन से उपजी पार्टी ने जिस तरह का वातावरण बनाकर राजधानी में अपनी पैठ बनाई, उसके नेताओं का बनारस, अमेठी की ओर पलायन बताता था कि वे एक गहरे भ्रम के शिकार हैं। अरविंद इसलिए दोषी नहीं हैं कि वे राजनीतिक तौर पर असफल हो गए। यह कोई बड़ी बात नहीं है। वे असफल इसलिए हुए हैं कि उन्होंने जो जनविश्वास अर्जित किया था वह खो दिया। लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया और उन्हीं कठघरों में कैद होकर रह जाए जिसमें भारतीय राजनीति अब तक कैद है और उसे वहां से निकालने की जरूरत लोग गहरे महसूस करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि अपने दल के विस्तार का सपना देखना गुनाह नहीं है, किंतु विस्तार एक चरणबद्ध और सुनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा है। टीवी पर बनी आत्मछवि से मुग्ध होकर देश के सभी मैदानों में कमजोर सिपाही उतारने के बजाए कुछ ठोस जगहों पर ठोस काम करके दिखाया जाए। अरविंद यहीं चूक गए। उनके सलाहकार जो उन्हें प्रधानमंत्री का राजपथ दिखा रहे थे, उनसे भी गहरी चूक हुई है। लगता है कि वे इस देश के भौगोलिक-सामाजिक व्याप और आकांक्षाओं को नहीं समझते। आम आदमी पार्टी अंतिम दिनों तक मीडिया के केंद्र में रही। ये देखना आश्चर्यजनक था कि मीडिया के सभी आयोजनों में देश में अनेक प्रमुख दलों की उपस्थिति के बावजूद अगर तीन प्रतिनिधि बुलाए जाते थे उनमें एक कांग्रेस, एक भाजपा और एक आम आदमी पार्टी का होता था। टीवी मीडिया के सभी चुनावी प्रोमो में राहुल,मोदी और केजरीवाल की छवि रहती थी। जबकि देश में तमाम ऐसे नेता और दल हैं जो केजरीवाल से बड़ा सामाजिक और भौगोलिक आधार रखते हैं। मीडिया कवरेज में विसंगति थी। हर क्षेत्र में लड़ रहे आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार के बारे में दो प्रमुख दलों के साथ जरूर बताया जाता था। यह बात बताती है मीडिया में इस दल की मौजूदगी कैसी थी। अरविंद ने कई बार मीडिया पर भी गुस्सा जताया लेकिन देखा जाए तो आम आदमी पार्टी को उसकी हैसियत से ज्यादा जगह मीडिया में मिली। शायद उनका दिल्लीपति होना इसका कारण रहा हो। आप देखें तो मीडिया का असंतुलन इसी से पता चलता है कि इस विकराल चुनावी शोर में सीमांध्र, तेलंगाना, उड़ीसा के विधानसभा परिणामों को बिल्कुल जगह नहीं मिली। इसी तरह ममता बनर्जी और जयललिता का की भारी विजय पर बात कहां हो रही है। आप कल्पना करें ममता और जयललिता सरीखी लोकसभा सीटें आम आदमी पार्टी को मिली होतीं तो मीडिया में बैठे उनके क्रांतिकारी दोस्त मोदी की जीत को भी पराजय में बदल देते और केजरीवाल को भविष्य का प्रधानमंत्री घोषित कर देते। लेकिन देश की जनता बहुत समझदार है। वह आपके आचरण, देहभाषा, वादों और इरादों को तुरंत स्कैन कर लेती है।
   इसमें भी कोई दो राय नहीं कि देश में जो बैचैनियां पल रही थीं। जो अंसतोष मन में पनप रहा था, उसे स्वर देने का प्रारंभिक काम अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव जैसे लोगों ने किया। सही मायने में ये लोग ही संसद में न होने के बावजूद वास्तविक प्रतिपक्ष बन गए थे। साहस के साथ मंत्रियों, सरकार और गांधी परिवार पर जैसे हमले इन्होंने किए, उसने सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का वातावरण तैयार किया। भारतीय मध्यवर्ग और आम लोगों में एक भरोसा बनाया कि कुछ बदल सकता है। इतना ही नहीं उदास और हताश लोगों को राजनीतिक विमर्श में शामिल करने का श्रेय भी काफी हद तक इस समूह को जाता है। किंतु इन बैचैनियों, आलोड़नों को संभालने के आत्मविश्वास से अरविंद खाली थे। आगे उनके दल और उनकी राह क्या होगी कहना कठिन है। जनांदोलनों की धार को लंबे समय के लिए कुंद और भोथरा बनाकर वे चले गए हैं, यह कहने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। देश में उपस्थित तमाम चुनौतियों के मद्देनजर जनांदोलन और सामाजिक शक्तियों की एकजुटता जरूरी है। जनता के एजेंडे पर बात और सरकारों की निगहबानी जरूरी है। किंतु अरविंद ने जनांदोलनों की विश्वसनीयता को जो क्षति पहुंचाई है, उसकी मिसाल खोजे नहीं मिलेगी। अन्ना हजारे का आंदोलन दरअसल उनके चेहरे और निष्पाप भोलेपन के नाते एक विश्वसनीयता अर्जित कर सका। दूसरी बात उसकी टाईमिंग बहुत सटीक थी। यह ऐसा समय था जब बाबा रामदेव बुरी तरह पिटकर वापस जा चुके थे। देश में सरकारविहीनता के खिलाफ गुस्सा फैल रहा था और ऐसे समय में अन्ना और उनके समर्थकों ने एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया जिसमें आम आदमी उम्मीदें देखने लगा। बाद की कथाएं सबको पता हैं। राजनीतिक दल बनाने का अरविंद का फैसला और दिल्ली के चुनावों के अप्रत्याशित परिणामों ने यह संदेश भी दिया कि कांग्रेस के दिन अब लद गए हैं। बावजूद इसके दिल्ली में सरकार बनाना आम आदमी पार्टी के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ। क्या ही अच्छा होता कि अरविंद भाजपा को समर्थन देकर उन्हें ज्यादा विधायक होने के नाते सरकार बनाने का मौका देते और उसकी निगहबानी करते। राजनीतिक प्रशिक्षण का एक दौर इससे पूरा होता और कम सीटों पर लोकसभा का चुनाव लड़कर वे बेहतर संभावनाओं को जन्म दे सकते थे। समाज के पढ़े-लिखे वर्ग, मध्य वर्ग और तमाम संवेदनशील लोगों ने आम आदमी पार्टी में एक वैकल्पिक राजनीति की उम्मीदें देखनी शुरू कर दी थीं। इन उम्मीदों को इस दल के नेताओं ने स्वयं घराशाही कर दिया। दिल्ली की सफलता को पचा न पाने और बड़े सपनों ने छोटी सफलताएं भी छीन लीं। उनके द्वारा खड़े किए गए प्रखर आंदोलन और मुखर राजनीति का काफी लाभ नरेंद्र मोदी और उनके दल को मिला। एक देशव्यापी संगठन आधार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेटवर्क ने इस असंतोष और पीड़ा को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। जिस काम को अन्ना हजारे ने शुरू किया उसे नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों ने अंजाम तक पहुंचाया। अपने 12 साल गुजरात के मुख्यमंत्रित्वकाल की विश्लसनीयता उनके साथ थी। काम करने वाले व्यक्ति की छवि, विकास व सुशासन के मुद्दे उन्हें मदद दे रहे थे। एक तरफ सरकार से भागता नायक था दूसरी तरफ आशाएं जगाता हुआ हीरो, लोगों ने दूसरे पर भरोसा जताया। वाराणसी और अमेठी की जंग ने सारा कुछ बहुत साफ-साफ कह दिया है। इन परिणामों के बावजूद आम आदमी पार्टी के चरित्र में बहुत परिवर्तन आता नहीं दिख रहा है। वहां मंथन और चिंतन के बजाए इस्तीफों का दौर जारी है। जबकि सच्चाई यह है कि राजनीति में कुछ भी खत्म नहीं होता। एक नवोदित पार्टी  होने के नाते उसे मिले वोट और सफलताएं बेमानी नहीं हो जाते हैं। राजनीतिक विमर्श में चाहे-अनचाहे आम आदमी पार्टी एक खास जगह घेर रही है। मीडिया, लेखक समुदाय में उसके प्रति सदभाव रखने वाले क्रांतिकारियों की कमी भी नहीं है। किंतु सत्ता जाने की विकलता और सत्ता पाने लिप्सा को आज भी यह दल छिपा नहीं पा रहा है। जब कांग्रेस के खिलाफ जनरोष था तो वे नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़े रहे थे, अब मोदी सरकार की निगहबानी का समय है तो वे आपस में लड़ रहे हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी को अपनी कार्यशैली और फैसलों पर फिर से विचार करने की जरूरत है। वरना भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों की तरह वे भी ऐतिहासिक भूलें करते और उनके लिए क्षमा मांगते रह जाएंगें।
(लेखक राजनीतिक विश्वेषक हैं)

शनिवार, 24 मई 2014

सशक्त समाज के लिए जरूरी है स्वतंत्र पत्रकारिता


                                   


लेखक लोकेन्द्र सिंह की पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' विमोचित 
ग्वालियर, 24 मई। पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं का संप्रेषण नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता में संवेदनशील लेखन होना चाहिए। आज देश में जिस प्रकार से पत्रकारिता और राजनीति में विकृतियां उत्पन्न हो रही हैं, उनके मूल में विदेशी पूंजी निवेश है। इसलिए सशक्त समाज के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता बहुत आवश्यक है। वर्तमान में पत्रकार परतंत्र हो गए हैं, जब तक पत्रकारों को लिखने की आजादी प्राप्त नहीं होगी तब तक हम सशक्त समाज का निर्माण नहीं कर सकते। यह बात गणेश शंकर विद्यार्थी मंच एवं जीवाजी विश्वविद्यालय दूरस्थ शिक्षण अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में 'पत्रकारिता, राजनीति और देश' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में आमंत्रित वक्ताओं ने कही। गालव सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के प्रोडक्शन सहायक लोकेन्द्र सिंह राजपूत की पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' का विमोचन भी किया गया। 
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रघु ठाकुर थे। जबकि अध्यक्षता मुंशी प्रेमचंद सृजनपीठ उज्जैन के निदेशक जगदीश तोमर ने की। विशिष्ट अतिथियों के रूप में आईटीएम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष एवं राजनीतिक विश्लेषक संजय द्विवेदी उपस्थित थे। इस मौके पर स्वदेश के सम्पादक लोकेन्द्र पाराशर दूरस्थ शिक्षण अध्ययनशाला के उप निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा एवं पुस्तक के लेखक लोकेन्द्र सिंह भी मंचासीन थे।

राजनीति और पत्रकारिता एक सिक्के के दो पहलू : रघु ठाकुर
गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रघु ठाकुर ने कहा कि पत्रकारिता और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन्हें धर्म के रास्ते पर चलाना चाहिए। धर्म का तात्पर्य यह है कि वह समाज की पीड़ा को समझें। उन्होंने पत्रकारिता की आजादी की बात करते हुए कहा कि आज देश में लिखने वाले परतंत्र हो गए हैं। जब तक पत्रकारों को लिखने की आजादी नहीं होगी तब तक हम सशक्त समाज का निर्माण नहीं कर सकते। श्री ठाकुर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज राजनीति और पूंजी में एक रिश्ता बन गया है। राजनीति और पूंजी के घालमेल के कारण आज समाज प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को ऐसा लेखन करना चाहिए जिससे समाज सही दिशा पा सके। उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों के मालिक निजी स्वार्थ देखते हैं। पत्रकारों के भले के लिए मालिक नहीं सोच रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी अब तक देश के प्रमुख समाचार पत्रों ने मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की हैं। मजीठिया से संबंधित कोई समाचार भी समाचार-पत्रों में भेजा जाए तो एक लाइन भी नहीं छपेगा। उन्होंने मीडिया के वर्तमान स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के मीडिया के लिए खबर के मुख्य आधार हैं- क्राइम, कॉमेडी, क्रिकेट, सिनेमा और सेलेब्रिटी। सामाजिक सरोकार आज पत्रकारिता में कहीं पीछे छूट गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने आम चुनाव में खर्च की सीमा तय कर दी ७० लाख रुपए। ऐसे में क्या कोई आम आदमी चुनाव लड़ सकेगा। क्या आम आदमी चुनाव में खड़े होकर ७० लाख रुपए खर्च करने के क्षमता रखने वाले व्यक्ति से मुकाबला कर सकेगा। 

सवालों से मजबूत होता है लोकतंत्र : संजय द्विवेदी  
राजनीतिक विश्लेषक और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने कहा कि हिन्दुस्तान को समझने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि जनता को मीडिया और राजनेताओं से सवाल करते रहना चाहिए क्योंकि सवालों से ही लोकतंत्र मजबूत होता है। निष्पक्ष होकर पत्रकार को अपनी कलम चलानी चाहिए। किसी पार्टी विशेष से जुड़कर लिखेंगे तो उस लेखन में वह धार नहीं होगी। किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर लेखन करना भी ठीक नहीं। चुनाव के दौरान कई लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी सुपारी लेकर कलम चला रहे थे कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे। क्यों नहीं बनने देंगे, इसका किसी के पास वाजिब जवाब नहीं था। यह तरीका ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता, राजनीति और देश आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता देश हित में होनी चाहिए। श्री द्विवेदी ने मुजफ्फरनगर के दंगों का जिक्र करते हुए बताया कि मुजफ्फरनगर के दंगों की रिपोर्टिंग गलत तरीके से की गई। इसका नतीजा यहा रहा कि स्थितियां और अधिक बिगड़ीं।  
स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है : रमाशंकर सिंह
कार्यक्रम के विशिष्ट आईटीएम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह  ने कहा कि महात्मा गांधी भी मानते थे कि स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है। उन्होंने कहा कि आज मीडिया और राजनीति में गहरा रिश्ता हो गया है, जिसे समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज शेयर बाजार, सट्टा और सर्वे कई गलत तस्वीरें समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं, जिससे समाज प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान तभी आगे बढ़ेगा जब लोगों में सामाजिक न्याय के लिए भूख पैदा होगी। पत्रकारिता का यह दायित्व है कि लोगों में सामाजिक चेतना की भूख पैदा करे। 

कठपुतलियों की डोर अपने हाथ में ले जनता : लोकेन्द्र पाराशर
स्वदेश के सम्पादक लोकेन्द्र पाराशर ने कहा कि मीडिया और पत्रकारिता में भिन्नता है लेकिन समाज को दोनों एक ही दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया प्रबंधन हो रहा है तो उसमें पत्रकारिता नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज का दर्द लिखने के लिए लेखक या पत्रकार के मन में आग होनी चाहिए। यह आग एक से दूसरे के मन में जलनी चाहिए। पुस्तक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश कठपुतलियों के हाथ में नहीं होना चाहिए। अगर कठपुतलियों के हाथ में देश है भी तो इन कठपुतलियों की डोर हमारे हाथ में होनी चाहिए, किसी और के हाथ में डोर नहीं होनी चाहिए।

लोकेन्द्र ने देश के मानस को झकझोरा है : जगदीश तोमर
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश तोमर ने पत्रकारिता और पत्रकार को समाज का महत्वपूर्ण अंग बताया। उन्होंने कहा कि आजादी के समय भी हर पत्रकार एक स्वतंत्रता सेनानी की भूमिका में था। पत्रकार अच्छे से काम कर सके, सकारात्मक पत्रकारिता कर सके इसके लिए समाज को उसका साथ देना चाहिए। पत्रकारिता के मूल्यों में समय के साथ कमी आई है लेकिन यह सही नहीं है कि पत्रकारिता में सब बुरा ही बुरा है। पत्रकारिता एकदम भ्रष्ट हो गई है। पत्रकारिता में अब भी अच्छे लोग हैं। उनका साथ देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता आज भी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और वह अपना धर्म आज भी निभा रही है। श्री तोमर ने 'देश कठपुतलियों के हाथ मेंÓ पुस्तक के लेखक एवं युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह को बधाई देते हुए कहा कि लोकेन्द्र ने अपने आलेखों के माध्यम से देश के मानस को झकझोरने की कोशिश की है। उनके लेखों में सकारात्मकता है। पत्रकारिता को सही मायने में एक विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए। लोकेन्द्र ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से उसी विपक्ष की भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि लोकेन्द्र सिंह के आलेख ही नहीं बल्कि उनकी कहानियां भी विचारोत्तेजक हैं। वे लेखक हैं, कहानीकार हैं, कवि हैं। लोकेन्द्र बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी हैं।

प्रबुद्धजन रहे मौजूद : 
पुस्तक विमोचन समारोह और संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत सहकार्यवाह यशवंत इंदापुरकर, दूरदर्शन केन्द्र ग्वालियर के निदेशक संतोष अवस्थी, वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र श्रीवास्तव, सुरेश सम्राट, राकेश अचल, देव श्रीमाली, जनसम्पर्क विभाग के संयुक्त संचालक डॉ. एच.एल. चौधरी, सुभाष अरोरा, प्रो. ए.पी.एस. चौहान, डॉ. केशव ङ्क्षसह गुर्जर, प्रो. अयूब खान सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन कर किया गया। अतिथियों का स्वागत हरेकृष्ण दुबोलिया, विभोर शर्मा, गिरीश पाल, विवेक पाठक द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन जयंत तोमर ने एवं आभार दूरस्थ शिक्षण अध्ययन के उप निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा ने व्यक्त किया।