लेखक -प्रो.
संजय द्विवेदी
चित्र परिचय- इंद्रेश कुमार
करीब दो दशक पहले की बात है
श्री इंद्रेश कुमार से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेरी मुलाकात हुयी थी।
आरएसएस के उन दिनों वे राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, जयपुर उनका केंद्र था। दैनिक
हरिभूमि का स्थानीय संपादक होने के नाते मैं उनका इंटरव्यू करने पहुंचा था। अपने
बेहद निष्पाप चेहरे और सुंदर व्यक्तित्व से उन्होंने मुझे प्रभावित किया। बाद में
मुझे पता चला कि वे मुसलमानों को आरएसएस से जोड़ने के काम में लगे हैं। रायपुर में
भी उनके तमाम चाहने वाले अल्पसंख्यक वर्ग में भी मौजूद थे। उनसे थोड़े ही समय के
बाद आरएसएस की प्रतिनिधि सभा में रायपुर में फिर मुलाकात हुयी। वे मुझे पहचान गए।
उनकी स्मरण शक्ति पर थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि वे सालों पहले हुयी मुलाकातों और
मेरे जैसे साधारण आदमी को भी याद रखते हैं। इस नायाब आदमी पर एक मौजूं शेर है, जो
उनकी शख्सियत पर फिट बैठता है-
मसला
यह भी इस दुनिया में
कोई
अच्छा है तो अच्छा क्यों है।
सही मायनों में यह व्यक्तित्व एक ऐसा अभियान
में लगा है जो कई बार विफल हो चुका है। कट्टरपंथी ताकतें बहुत आसानी से मुस्लिम
समाज को भ्रमित करने में कामयाब होती रही हैं। ऐसे कठिन समय में भी राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ के प्रचारक इंद्रेश जी हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते हैं। वह
मुसलमानों को राष्ट्रवाद की राह पर डालकर सदियों से उलझे रिश्तों को ठीक करने की
बात करते हैं। क्योंकि आज नहीं अगर दस साल बाद भी इंद्रेश कुमार अपने इरादों में
सफल हो जाते हैं तो भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं
की दुकान बंद हो जाएगी। वे एक ऐसा आदमी हैं जो सदियों से जमी बर्फ को पिघलाने की
कोशिशें कर रहे हैं।
अब उन इंद्रेश कुमार की भी सोचिए जो
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन में काम करते रहे हैं,
जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज का संगठन है। ऐसे संगठन में रहते
हुए मुस्लिम समाज से संवाद बनाने की कोशिश क्या उनके अपने संगठन (आरएसएस) में भी
तुरंत स्वीकार्य हो गयी होंगी। जाहिर तौर पर इंद्रेश कुमार की लड़ाई अपनों से भी
रही होगी और बाहर खड़े राजनीतिक षडयंत्रकारियों से भी है। वे अपनों के बीच भी अपनी
सफाई देते रहे हैं कि वे आखिर मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास क्यों कर
रहे हैं, जबकि संघ का मूल काम हिंदू समाज
का संगठन है। किंतु इंद्रेश कुमार की कोशिशें रंग लाने लगी हैं। वे एक ऐसे काम को
अंजाम दे रहे हैं जिसकी जड़ें हिंदुस्तान के इतिहास में बहुत भयावह और रक्तरंजित हैं।
मुसलमानों के बीच कायम भयग्रंथि और कुठांओं को निकालकर उन्हें 1947 के बंटवारे को जख्मों से अलग करना भी आसान काम नहीं है। महात्मा गांधी,
पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद जैसे
महानायकों की मौजूदगी के बावजूद हम देश का बंटवारा नहीं रोक पाए। उस आग में आज भी
कश्मीर जैसे इलाके सुलग रहे हैं।
तमाम हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम रिश्ते
अविश्वास की आग में जल रहे हैं। ऐसे कठिन समय में इंद्रेश कुमार क्या इतिहास की
धारा की मोड़ देना चाहते हैं और उन्हें यह तब क्यों लगना चाहिए कि यह काम इतना
आसान है। देश को पता है कि इंद्रेश कुमार, आरएसएस
के ऐसे नेता हैं जो मुसलमानों और हिंदू समाज के बीच संवाद के सेतु बने हैं। वे
लगातार मुसलमानों के बीच काम करते हुए देश की एकता को मजबूत करने का काम कर रहे
हैं। हिंदू- मुस्लिम एकता का यह राष्ट्रवादी दूत इसीलिए एक समय राजनीतिक षडयंत्रों
का शिकार भी हुआ। संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल
पुलिस का इस्तेमाल करते रहे हैं, किंतु राजनीतिक दल इस स्तर पर गिरकर एक
राष्ट्रवादी व्यक्तित्व पर कलंक लगाने का काम करेंगें, यह
देखना भी शर्मनाक था। इससे इतना तो साफ है कि कुछ ताकतें देश में ऐसी जरूर हैं जो
हिंदू-मुस्लिम एकता की दुश्मन हैं। उनकी राजनीतिक रोटियां सिकनी बंद न हों, इसलिए
दो समुदायों को लड़ाते रहने में ही इनकी मुक्ति है। शायद इसीलिए इंद्रेश कुमार
निशाने पर थे क्योंकि वे जो काम कर रहे हैं वह इस देश की विभाजनकारी और वोटबैंक की
राजनीति के अनूकूल नहीं था। लेकिन समय ने उन्हें बेदाग साबित किया।
हमें यह समझने की जरूरत है कि आखिर वे कौन से
लोग हैं जो हिंदू-मुस्लिम समाज की दोस्ती में बाधक हैं। वे कौन से लोग हैं जिन्हें
भय के व्यापार में आनंद आता है। हिंदुस्तान के 20 करोड़ मुसलमानों को देश की मुख्यधारा में लाने की यह कोशिश अगर विफल होती
है तो शायद फिर कोई इंद्रेश कुमार हमें ढूंढना मुश्किल होगा । कुछ लोग इंद्रेश
कुमार जैसे लोगों के इरादे पर शक करके हम वही काम कर रहे हैं जो मुहम्मद अली
जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग ने किया था जिन्होंनें महात्मा गांधी को एक हिंदू
धार्मिक संत और कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहकर लांछित किया था। राष्ट्र जीवन में
ऐसे प्रसंगों की बहुत अहमियत नहीं है।
इस देश को यह कहने का साहस पालना ही होगा कि हमें एक नहीं हजारों
इंद्रेश कुमार चाहिए जो एक हिंदू संगठन में काम करते हुए भी मुस्लिम समाज के बारे
में सकारात्मक सोच रखते हों।
मुस्लिम समाज के संकट वस्तुतः भारतीय राजनीति और समाज के ही संकट हैं। उनकी चुनौतियां कम या ज्यादा गंभीर हो सकती हैं, पर वे शेष भारतीय समाज के संकटों से जरा भी अलग नहीं है। सही अर्थों में पूरी भारतीय राजनीति का चरित्र ही कमोबेश भावनात्मक एवं तात्कालिक महत्व के मुद्दों के इर्द-गर्द नचाता रहा है। आम जनता का दर्द, उनकी आकांक्षाएं और बेहतरी कभी भारतीय राजनीति के विमर्श के केंद्र में नहीं रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति का यह सामूहिक चरित्र है, अतएव इसे हिंदू, मुस्लिम या दलित राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखने को कोई अर्थ नहीं है और शायद इसलिए ‘जनता का एजेंडा’ किसी की राजनीति का एजेंडा नहीं है। मुस्लिम नेताओं पर यह आरोप तो आसानी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कौम को आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़ा बनाए रखा, लेकिन क्या यही बात अन्य वर्गों की राजनीति कर रहे लोगों तथा मुख्यधारा की राजनीति करने वालों पर लागू नहीं होती ? बेरोजगारी, अशिक्षा, अंधविश्वास, गंदगी, पेयजल ये समूचे भारतीय समाज के संकट हैं और यह भी सही है कि हमारी राजनीति के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक परिवेश में आश्चर्यजनक ही है। देश की मुस्लिम राजनीति का एजेंडा भी हमारी मुख्यधारा की राजनीति से ही परिचालित होता है। जाहिर है मूल प्रश्नों से भटकाव और भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द समूची राजनीति का ताना बुना जाता है। इंद्रेश जी जैसे लोग समाज की सामूहिक चिंताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंथिक राजनीतिक के बजाए राष्ट्र प्रथम का भाव भरने का प्रयास कर रहे हैं।
आप देखें तो हिंदुस्तान के हर मुसलमान नेता को
एक ढोंग रचना पड़ता है। एक तरफ तो वह स्वयं को अपने समाज के बीच अपनी कौम और उसके
प्रतीकों का रक्षक बताता है, वहीं
दूसरी ओर उसे अपने राजनीतिक मंच (पार्टी) पर भारतीय राष्ट्र- राज्य के साथ अपनी
प्रतिबद्धता का स्वांग रचना पड़ता है। समूचे भारतीय समाज की स्वीकृति पाने के लिए
सही अर्थों में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। आज की राजनीति
में तो ऐसा संभव नहीं दिखता। भारतीय समाज में ही नहीं, हर
समाज में सुधारवादियों और परंपरावादियों का संघर्ष चलता रहा है। मुस्लिम समाज में
भी ऐसी बहसें चलती रही हैं। इस्लाम के भीतर एक ऐसा तबका पैदा हुआ, जिसे लगता था कि हिंदुत्व के चलते इस्लाम भ्रष्ट और अपवित्र होता जा रहा
है। वहीं मीर तकी मीर, नजीर अकबरवादी, अब्दुर्रहीम खानखाना, रसखान की भी परंपरा देखने
को मिलती है। हिंदुस्तान का आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर एक शायर था और उसे सारे
भारतीय समाज में आदर प्राप्त था। एक तरफ औरंगजेब था तो दूसरी तरफ उसका बड़ा भाई
दारा शिकोह भी था, जिसनें ‘उपनिषद्’ का फारसी में अनुवाद किया। इसलिए यह सोचना कि आज कट्टरता बढ़ी है, संवाद के अवसर घटे हैं-गलत है। आक्रामकता अकबर के समय में भी थी, आज भी है।
यहां
यह बात रेखांकित किए जाने योग्य है कि अल्पसंख्यक अपनी परंपरा एवं विरासत के प्रति
बड़े चैतन्य होते हैं। वे चाहते हैं कि कम होने के नाते कहीं उनकी उपेक्षा न हो
जाए । यह भयग्रंथि उन्हें एकजुट भी रखती है। अतएव वे भावनात्मक नारेबाजियों से
जल्दी प्रभावित होते हैं। सो उनके बीच राजनीति प्रायः इन्हीं आधारों पर होती है।
यह अकारण नहीं था कि नमाज न पढ़ने वाले मोहम्मद अली जिन्ना, जो नेहरू से भी ज्यादा अंग्रेज थे, मुस्लिमों
के बीच आधार बनाने के लिए कट्टर हो गए । मुस्लिम
राजनीति वास्तव में आज एक खासे द्वंद में हैं, जहां
उसके पास नेतृत्व का संकट है । मुस्लिम समाज में अब राजनीति के अलावा सामाजिक, आर्थिक, समाज सुधार, शिक्षा जैसे सवालों पर बातचीत शुरु हो गई है । सतह पर दिख रहा मुस्लिम
राजनीति का यह ठंडापन एक परिपक्वता का अहसास कराता है । मुस्लिम समाज में वैचारिक
बदलाव की यह हवा जितनी तेज होगी, समाज उतना ही प्रगति
करता दिखेगा। एक सांस्कृतिक आवाजाही, सांस्कृतिक
सहजीविता ही इस संकट का अंत है । जाहिर है इसके लिए नेतृत्व का पढ़ा, लिखा और समझदार होना जरुरी है । नए जमाने की हवा से ताल मिलाकर यदि देश का
मुस्लिम अपने ही बनाए अंधेरों को चीरकर आगे आ रहा है तो भविष्य उसका स्वागत ही
करेगा । वैसे भी धार्मिक और जज्बाती सवालों पर लोगों को भड़काना तथा इस्तेमाल करना
आसान होता है । गरीब और आम मुसलमान ही राजनीतिक षडयंत्रों में पिसता तथा तबाह होता
है, जबकि उनका इस्तेमाल कर लोग ऊंची कुर्सियां प्राप्त
कर लेते हैं और उन्हें भूल जाता हैं । अभिजात्य और जमाने की दौड़ में आगे आ गए
मुस्लिम नेता दरअसल अपने कौम की खिदमत और उसे रास्ता बताने के बजाए उन्हें उसी
बदहाली में रहने देना चाहते हैं ।इस संदर्भ में प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी का
यह शेर हमारी मुस्लिम राजनीति के ही नहीं, समूची भारतीय
राजनीति के चरित्र को बेनकाब करता है-
‘इस्लाम की अजमत का
क्या जिक्र करुं हमदम
काउंसिल में बहुत सैय्यद, मस्जिद में फकत जुम्मन’
भारतीय
समाज में इंद्रेश कुमार जैसे लोग इसलिए एक नया उजाला लेकर आ रहे हैं। संवाद के
माध्यम से नया भारत बना रहे हैं।
दूसरी ओर भाजपा भी आगे बढ़कर मुस्लिम समाज से
संवाद कर रही है तो मुस्लिम नेतृत्व को भी भरोसा रखते हुए उनकी बात सुननी चाहिए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हौव्वा खड़ा कर आरएसएस के लिए प्रलाप किया जा रहा है।
यह कहा जा रहा है कि संघ मुस्लिम विरोधी है। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है।
आरएसएस के नेताओं ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के सहयोग से मुस्लिम समाज से संवाद
प्रारंभ किया है। आपातकाल के समय जमाते इस्लामी और आरएसएस के नेता कई जेलों में एक
साथ थे। उनके बीच बेहतर रिश्ते भी विकसित हुए थे। इसलिए मुस्लिम वोटों की ठेकेदारी
करने के बजाए मुस्लिम समाज को स्वतंत्र रूप से सोचने और अपने फैसले करने का अवसर
देना चाहिए। भाजपा भी अब राजनीतिक रूप से अछूत नहीं है। उसकी अटलजी के नेतृत्व
वाली सरकार में उमर अब्दुला से लेकर सभी तथाकथित सेकुलर दलों के लोग मंत्री रह
चुके हैं। अटलजी से लेकर नरेंद्र मोदी जी तक
की सरकारों में क्या उनके चरित्र में कहीं अल्पसंख्यक विरोधी रवैया ध्वनित
होता है? सच्चाई तो यह है कि वाजपेयी सरकार ने न सिर्फ डा. एपीजे कलाम को देश के
राष्ट्रपति पद पर प्रतिष्ठित किया वरन बाद के राष्ट्रपति चुनाव में एक ईसाई
आदिवासी पीए संगमा को अपना समर्थन दिया था। सही तो यह है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी
के विरूद्ध अभियान चलाने वाले मुस्लिम वोटों के सौदागर हिंदु-मुस्लिम रिश्तों में
सहजता के विरोधी हैं।
इंद्रेश कुमार को हमारे समय का ऐसा नायक कहा जा
सकता है जो वैश्विक तौर पर बन गयी इस्लाम की छवि को बदलने के लिए भारतीय मुसलमानों
का नेतृत्व कर रहे हैं। वे मानवता के अग्रदूत हैं जहां सब राष्ट्र प्रथम की भावना
रखकर देश के नवनिर्माण में लगे हैं। वे यह मानते हैं कि देश सबके योगदान और सबकी
प्रगति से ही विश्वगुरु बनेगा। अपनी-अपनी भूमिका सबको निभानी होगी। राष्ट्रीय
मुस्लिम मंच उनकी साधना का प्रतिफल है। एक नया सवेरा आएगा, ऐसा भरोसा उनकी संकल्पशक्ति
से होता है। वे शतायु हों और एक समर्थ, समरस और आत्मीयता से भरा भारत अपनी आँखों
से देखें,यही प्रार्थना है।


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