-प्रो. संजय द्विवेदी
राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारतीय समाज के पुनर्गठन की वह प्रयोगशाला है,
जो विचार, सेवा और अनुशासन के आधार पर एक
सांस्कृतिक राष्ट्र का निर्माण कर रही है। 1925 में डॉ. केशव
बलिराम हेडगेवार की अनोखी भारतीय दृष्टि से उपजा यह संगठन आज अपनी शताब्दी मना रहा
है। यह केवल संगठन विस्तार की नहीं, बल्कि भारत के
सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक अनवरत यात्रा है।
सौ वर्षों की इस साधना में संघ और इसके
स्वयंसेवकों ने देश की चेतना को जाग्रत किया है। उन्होंने दिखाया कि न तो किसी
सरकारी सहयोग की आवश्यकता होती है और न ही प्रचार के माध्यम से प्रसिद्धि की। यदि
लक्ष्य पवित्र हो, मार्ग अनुशासित हो
और कार्यकर्ता समर्पित हों। सेवा संघ का मूल है और सामाजिक समरसता उसका लक्ष्य। एक
समरस समाज ही अपने सपनों में रंग भर सकता है और इससे ही सुंदर समाज का सृजन संभव
है। गैरबराबरी को खत्म करते हुए मन में सुंदर समरस भावों का सृजन राष्ट्र प्रथम की
भावना से ही संभव है।
सेवा:
राष्ट्र के हृदय को स्पर्श करती संवेदना-
संघ के
स्वयंसेवकों की सेवा-भावना समाज के सबसे वंचित वर्गों तक पहुंचती है। गिरिजनों और
वनवासियों से लेकर महानगरों की झुग्गी बस्तियों तक, संघ प्रेरित संगठन जैसे सेवा भारती, वनवासी कल्याण
आश्रम, एकल विद्यालय, राष्ट्र सेविका
समिति और आरोग्य भारती अखंड सेवा के भाव से कार्यरत हैं। इन संस्थाओं का उद्देश्य
केवल राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि लोगों को आत्मनिर्भर,
शिक्षित और संस्कारित बनाना है। सेवा, संघ के
लिए कर्मकांड नहीं, जीवनधर्म है। जो मानवता को जोड़ता है,
पोषित करता है और राष्ट्र के लिए भावनात्मक एकता निर्मित करता है।संघ
जैसा समावेशी, उदार और लचीला संगठन ढूंढने से नहीं मिलेगा।
अपने में परिवर्तन करने, आत्मसमीक्षा करने और अपना दायरा
बढ़ाते जाने के लिए संघ ख्यात रहा है। जिस तरह संघ ने समाज जीवन के सब क्षेत्रों,
सब वर्गों में, सभी विचारवंतों में, सभी सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी
सेवा भावना से जगह बनाई है, वह उसकी सोच को प्रकट करता है।
इस अर्थ में संघ कहीं से जड़वादी संगठन नहीं है, जिसके कारण
सांप्रदायिक और दायराबंद सोच पनपती है। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच, राष्ट्रीय सिख संगत, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, एकल विद्यालय जैसे संगठनों के माध्यम से
संघ ने यह स्थापित किया कि समाज को जोड़ना और सेवा के माध्यम से भारत को बदलना ही
उसका लक्ष्य है। सभी सरसंघचालकों ने स्वयंसेवकों में यह भाव भरने का प्रयास किया
और यह सूक्ति ही उनका ध्येय वाक्य बन गयी- नर सेवा
नारायण सेवा।
अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के बीच अपने
वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती
जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने जो मैदानी और जमीनी काम किया है उसका मुकाबला
सिर्फ जबानी जमा खर्च से सामाजिक परिवर्तन कर दावा करने वाले लोग नहीं कर सकते।
संघ में सेवा एक संस्कार है, मुख्य कर्तव्य है। यहां
सेवा कार्य का प्रचार नहीं, एक आत्मीय परिवार का सृजन
महत्व का है। अनेक अवसरों पर कुछ फल और कम्बल बांटकर अखबारों में चित्र छपवाने
वाली राजनीति इसको नहीं समझ सकती। समाज में व्याप्त भेदभाव, छूआछूत,
को मिटाने के लिए संत रविदास ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके
आदर्शों और कर्मों से सामाजिक एकता की मिसाल हमें देखने को मिलती है लेकिन वर्तमान
दौर में इस सामाजिक विषमता को मिटाने के सरकारी प्रयास असफल ही कहे जा सकते हैं।
कहीं-कहीं आशा की किरण समाज क्षेत्र में कार्यरत सेवा भारती जैसे संस्थानों के
प्रकल्पों में दृष्टिगोचर होती है।
भारत गावों में बसता है, गांवों में आज भी सामाजिक कुरीतियां कम नहीं हुयी हैं। राष्ट्रपिता
महात्मा गांधी ने छुआछूत को मिटाने का नारा दिया, उनका जीवन
भी सामाजिक समरसता की मिसाल है। गांधी जी ने स्वाधीनता आंदोलन में जितने भी
प्रकल्प तय किए, उनका ध्येय भारत की सामाजिक विषमता को पाटना
था। वे चाहते थे कि समाज में ऊंच-नीच, भेदभाव, लिंग अनुपात और आर्थिक सम्पन्नता,विपन्नता की खांई
खत्म हो और भारत एक लय, एक स्वर, एक
समानता और एक अखंडता के साथ मंडलाकार प्रवृत्ति में विश्व का नेतृत्व करे। कुछ ऐसी
ही परिकल्पना पं. दीनदयाल उपाध्याय ने भी की। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामाजिक एकता के इसी प्रकल्प को आगे बढ़ा रहे
हैं। आजादी के लगभग अस्सी वर्षों के बाद भी भारत से गरीबी हटी नहीं है और सामाजिक
विषमता दूर नहीं हो सकी है। इस विषमता से समाज में लड़ाई-झगड़े, वैमनस्यता और ऊंच-नीच की प्रवृत्ति बढ़ी है। इस समस्या को भारत में मिटाने
के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ आगे आया और सेवा के अनेक प्रकल्प शुरू
किए। उनके इन सेवा प्रकल्पों का उद्देश्य भेदभाव से मुक्त, स्वाभिमानी-समरस
और आत्मनिर्भर समाज बनाना था। सेवा भारती, संघ का एक ऐसा ही
संगठन है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक
जागरण एवं कौशल विकास के लगभग हजारों केंद्रों के द्वारा प्रकल्प चला रहा है। सेवा
भारती इस मुहिम में तीन दशक से जुटा हुआ है। वर्ष 2017 में सेवा भारती का रजत
जयंती वर्ष था। इस वर्ष में सेवा भारती अपने प्रकल्पों का आत्मावलोकन किया और नए
प्रकल्पों पर विचार करते हुए नए प्रकल्प प्रारंभ किए। रजत जयंती वर्ष पर सेवा
भारती भोपाल के लाल परेड मैदान पर ऐसे हजारों श्रम साधकों का संगम भी आयोजित किया।
इस संगम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत स्वयं उपस्थित रहे।
इस आयोजन में श्रमिकों और गरीब व पिछड़े वर्गों के लिए जीवन समर्पित करने वाले
साधकों का सम्मान भी किया गया।
आरएसएस निरंतर समाज के पिछड़े वर्गों की ओर देखता रहा है और विविध
प्रकल्पों के जरिए उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहा है। यह सच
है कि संत रविदास एक ऐसे संत थे जिन्होंने जीवन भर श्रम की साधना की। श्रम को
प्रतिष्ठा करने वाले इस महान संत के शिष्यों में काशी नरेश व भक्त मीराबाई भी
रहीं। अपने धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास के कारण संत रविदास जी ने
दिल्ली के शासक सिकंदर लोधी को भी कह दिया था कि मैं प्राण त्याग दूंगा पर अपना
धर्म नहीं छोडूंगा। हमारे अनेक संतों की तरह संत रविदास जी ने भी जन्म के आधार पर
ऊंच-नीच को नकार दिया था। भोपाल में श्रम साधक समागम उन्हीं संत रविदास जी की
जयंती पर आयोजित किया गया था।
उम्मीद की जानी चाहिए कि संत रविदास की
दृष्टि समाज के अंतिम छोर तक पहुंचेगी और जाति, पंथ
के आधार पर भेदभाव को मिटाने में कारगर हो सकेगी। यह साधारण नहीं है कि मध्यप्रदेश
आरंभ से ही संघ की एक प्रयोगशाला रहा है, जहां उसने सामाजिक,
राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रों में विविध प्रयोग
किए हैं। बैतूल एक ऐसा जिला है, जहां पर सैकड़ों गांवों को
केंद्र बनाकर ग्रामीण विकास का एक नया अध्याय लिखने की पहल हुयी है। संघ के
सरसंचालक मोहन भागवत ने ग्रामीण विकास के इन प्रकल्पों को सराहा था। इसके तहत
बैतूल जिले में नशामुक्ति, आर्थिक-सामाजिक विकास, पर्यावरण जैसे विषयों पर हो रहे ये काम निश्चय ही बदलते भारत की बानगी पेश
करते हैं।
मध्यप्रदेश एवं देश के तमाम राज्यों में सरकारी स्तर पर भी कई योजनाएं
श्रमिक और निचले तबके के उत्थान के लिए बनती रही हैं।
उन योजनाओं से इन वर्गों में कोई आमूलचूल बदलाव हुआ हो ऐसा कम ही दिखाई देता है।
आजादी के सत्तर वर्षों में यदि सरकारी योजनाएं आम आदमी तक पहुंच पाती तो संत
रविदास,राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बाबा
साहेब आंबेडकर और पं. दीनदयाल उपाध्याय के सपने सच हो जाते। किंतु अफसोस है कि
बदलाव की यह गति उतनी तेज नहीं रही जितनी होनी चाहिए। सरकारें आज भी उन्हीं के लिए
योजना बना रही हैं और हर बजट में अधिक वित्त का प्रावधान करती हैं किंतु धरातल पर
सूरतेहाल नहीं बदलते। यही कारण है कि सामाजिक विषमता अमरबेल की तरह पनप रही है। इस
वर्ग के जो व्यक्ति समाज का नेतृत्व करते हैं, वह भी आगे आ
जाने पर पीछे मुड़कर नहीं देखते हैं। बाद में अपने लोग ही उन्हें बेगाने लगने लगते
हैं। सरकारी स्तर पर इस सामाजिक विषमता को पाटना नामुमकिन लगता है। इसमें समाज और
सामाजिक संगठनों की सहभागिता जरूरी है। इसी ध्येय को आत्मसात कर राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक विषमता को दूर करने का बीड़ा उठाया है और सेवा प्रकल्पों
में श्रम साधकों के माध्यम से सामाजिक साधना का काम निरंतर किया जा रहा है। भोपाल
के इस महती आयोजन में शामिल होने वाले लोग दरअसल वे हैं जो दैनिक रोजी-रोजी कमाने
के लिए रोज अपना पसीना बहाते हैं। इन वर्गों से संवाद और उनकी एकजुटता के बहाने
संघ एक बड़ी सामाजिक पहल कर रहा है, इसमें दो राय नहीं है।
जातिभेद
से मुक्ति जरूरी-
सामाजिक समरसता के बिना कोई भी राष्ट्र अग्रणी
नहीं बन सकता। गुरु घासीदास कहते हैं- “मनखे-मनखे एक हैं।” किंतु जातिवाद ने इस भेद को गहरा किया है। तमाम प्रयासों के बाद भी आज भी
हम इस रोग से मुक्त नहीं हो सके हैं। भेदभाव ने हमारे समाज को विभाजित कर रखा है,
जिसके चलते दुनिया में हमारी छवि ऐसी बनाई जाती है कि हम अपने ही
लोगों से मानवीय व्यवहार नहीं करते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे- “अस्पृश्यता ईश्वर और मानवता के प्रति अपराध है।” राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक
रहे पू. बालासाहब देवरस ने इस संकट को रेखांकित करते हुए बसंत व्याख्यानमाला में
कहा था कि- “अगर छूआछूत गलत
नहीं है दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है, इसे मूल से नष्ट कर
देना चाहिए।” ऐसे में हमें
यह समझना होगा कि जो कुछ भी सैकड़ों सालों से परंपरा के नाम पर चल रहा है वह हमारा
धर्म नहीं है। इतिहास में हुए इन पृष्ठों का कोई भी सभ्य समाज समर्थन नहीं कर
सकता। जबकि हमारे धर्म ग्रंथ और शास्त्र इससे अलग हैं। हमारे ऋषि और ग्रंथों के
रचयिता सभी वर्गों से हैं। भगवान बाल्मीकि और वेद व्यास इसी परंपरा से आते हैं।
यानि यह भेद शास्त्र आधारित नहीं है। यह विकृति है। इससे मुक्ति जरूरी है।हमें
इसके सचेतन प्रयास करते हुए अपने आचरण, व्यवहार और वाणी से
समरसता का अग्रदूत बनना होगा। सभी समाजों और वर्गों से संवाद और सहकार बनाकर हम एक
आदर्श समाज की रचना में सहयोगी हो सकते हैं। इससे समाज का सशक्तिकरण भी होगा।
समानता का व्यवहार, वाणी संयम, परस्पर
सहयोग, संवेदनशीलता से हम दूरियों को घटा सकते हैं और भ्रम
के जाले साफ कर सकते हैं। साथ ही अपने गांव, नगर के मंदिर,
जलश्रोत, श्मशान सबके लिए समान रूप से खुल
होने ही चाहिए। इसमें कोई भी भेद नहीं होना चाहिए।
वैचारिक
आंदोलन से बदलेगा समाज-

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