सोमवार, 13 जनवरी 2014

भारतीय राजनीति का केजरीवाल समय !


-संजय द्विवेदी
    यह भारतीय राजनीति का केजरीवाल समय है। ईमानदारी, भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था, सत्ता से प्रतिरोध और दुस्साहस इसके मूल्य हैं। यह परंपरागत राजनीतिक धाराओं के सामने एक चुनौती है और एक नई तरह की समानांतर धारा की शुरूआत भी। जिसमें मुख्यधारा के सभी दल एक तरफ और दूसरी तरफ अकेली आप है।
   आप ने परंपरागत सत्ता प्रतिष्ठानों को चुनौती दी, सड़क पर संघर्ष किया और अब वह दिल्ली की सत्ता में है। लंबी खामोशी के बाद अगर नरेंद्र मोदी ने भी आप की टीवी प्रियता पर टिप्पणी की है, तो हमें मान लेना चाहिए कि मामला साधारण नहीं रह गया है। यह बात तब और स्थापित हो जाती है, जब लखनऊ से अमेठी के रास्ते भर कुमार विश्वास विरोध का सामना करते हैं। यह घबराहटें बताती हैं कि परंपरागत राजनीतिक दलों में एक घबराहट है और आप को मिल रहे अतिरिक्त जनसमर्थन और टीवी कवरेज से चिंताएं भी। यह अकारण नहीं है कि कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उन्हीं टोटकों को अपनाने की कोशिशें कीं, जिन पर केजरीवाल और उनके मंत्री अमल करते दिख रहे हैं। सही मायने में केजरीवाल एक ऐसा नाम साबित हुए हैं, जिसने पारंपरिक राजनीति को नए पाठ पढ़ाने शुरू किए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख हों या उससे जुड़े एक प्रमुख पत्रकार सभी भाजपा को उसकी जड़ों की याद दिला रहे हैं। संघ समर्थक उक्त पत्रकार ने जो लेख लिखा उसका शीर्षक ही है- भाजपा के लिए बैक टू बेसिक्स का समय
   जाहिर तौर पर भाजपा जैसी पार्टी जिसका पूर्व नाम जनसंघ था, देश की राजनीति में एक वैकल्पिक दर्शन की शुरूआत के लिए जानी गयी। उसके नेताओं में दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोग भी रहे जिनके त्याग, शालीनता और सादगी के किस्से मशहूर हैं। यह श्रृखंला काफी लंबी रही जो कुशाभाऊ ठाकरे से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी तक जाती है। किंतु आज इस दल की बेबसी देखिए कि वह बार-बार अपने एक मुख्यमंत्री मनोहर पारीकर का नाम दुहराने के लिए मजबूर है। दलों के विस्तार ने सादगी व सिद्धांतों को शिथिल किया, बदले जमाने में जीत सकने वाले उम्मीदवारों की खोज शुरू हुयी और समझौतों ने मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया। डा. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के उत्तराधिकारियों का हाल भी किसी से छिपा नहीं है। जेपी आंदोलन के नेताओं ने देश में जैसी राजनीतिक संस्कृति को जन्म दिया वह सबके सामने है। लोहिया के चेले मुलायम सिंह का कारपोरेट समाजवाद अक्सर चर्चा में रहता है। ऐसे में आदर्श राजनीति के प्रतीक भी खोजे नहीं मिलते।
   उदारीकरण के बाद बनी स्थितियों में राजनीतिक दलों की आम जनता से दूरी बढ़ती चली गयी। महंगाई बाजार के हवाले कर दी गयी। आवश्यक वस्तुओं की कीमतों, पेट्रोल-डीजल की कीमतें आकाश छूने लगीं। बढ़ते वेतन के बावजूद जिंदगी कठिन लगने लगी। महानगरों में तो यह और भी दुष्कर हो गयी। मध्यवर्ग भी त्राहि-त्राहि कर उठा। इस बीच सारी प्रतियोगिता सार्वजनिक धन को निजी धन में तब्दील करने में सीमित हो गयी। राजनेता-नौकरशाह-व्यापारी-मीडिया का एक गठजोड़ बन गया, जिसमें जल्दी और ज्यादा कमाने की होड़ देखी गयी। रोज-रोज हो रहे घोटाले इस अनास्था को और गहरा कर रहे थे। जमीन से कटे नेताओं की टोली आम जन में चल रहे इस गुस्से को भांप नहीं पाई। गरीब की भूख, उसके ज्यादा खाने, एक रूपए से लेकर 5 रूपए की थाली जैसे मजाक बनते रहे। सेवा के बजाए राजनीति एक व्यवसाय में बदलती गयी। स्पेक्ट्रम से लेकर खनिजों की लूट से देश ठगा सा सारा कुछ देख रहा था। इस बीच बाबा रामदेव पर हुए दमन ने देश को झकझोर कर रख दिया। उसके बाद अन्ना हजारे ने एक उम्मीद जगाई और सड़कों पर लोगों का हूजूम उतर पड़ा। लगा की भारत जाग रहा है। देश भर में एक आलोड़न खड़ा हुआ और उस बदलते हुए भारत का कुछ नौजवान चेहरा बन गए। अरविंद केजरीवाल उनमें अग्रणी हैं।
  आप देखें तो किस तरह यह समय बाबा रामदेव, अन्ना हजारे से होता हुआ केजरीवाल तक जा पहुंचा। केजरीवाल की देहभाषा, समर्पण, मीडिया की ओर से उन्हें मिला अटेंशन आज देश की राजनीति की दिशा तय कर रहा है। वे दिल्ली के मुख्यमंत्री और देश के हीरो हैं। वे उम्मीदों का वही चेहरा हैं, जैसा कभी वीपी सिंह रहे होंगें। लेकिन वीपी सिंह की समस्या यह थी कि वे अपनी राजनीति का विकल्प उन्हीं परंपरागत खांचों में देख रहे थे और पारंपारिक राजनीति में ही अवसर खोज रहे थे। केजरीवाल ने किसी राजनीतिक दल में न जाकर, एक समानंतर राजनीति खड़ी की है, जिसका चेहरा, विचार और संविधान वे स्वयं हैं। उनकी जिदें, उनके संकल्प, उनके विचार इस दल का विचार हैं। अनेक राजनीतिक धाराओं के लोग उनके साथ हैं, कुछ और साथ आते जा रहे हैं। यानी अपनी राजनीतिक का एजेंडा तो वे सेट कर ही रहे हैं, शेष राजनीतिक दलों को भी अपने एजेंडे पर आने के लिए मजबूर कर रहे हैं। सत्ता किसे प्रिय नहीं है किंतु वे वाचिक तौर पर निरंतर सत्तामोह से दूरी बनाते हैं। वे देश की राजनीति में एक नए विमर्श के वाहक बन गए हैं,जिसकी हदें और सरहदें अभी तय नहीं हैं। देखना यह है कि भारतीय राजनीति का यह केजरीवाल समय हमें कितना और कैसे प्रभावित करता है। देश के बड़े नेताओं की नजर में यह बुलबुला है पर अगर कुछ लोग इसमें लहर या तूफान की संभावनाएं देख रहे हैं तो उन पर आज भी अविश्वास कैसे किया जा सकता है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय , भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

"आप" की आंखों में कुछ बहके हुए से ख़्वाब हैं!

                           -संजय द्विवेदी


 अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने जिस तरह की उम्मीदें जगाई हैं वह बताती है राजनीति इस तरह से भी की जा सकती है। लालबत्तियों से मुक्ति, सुरक्षा न लेना और छोटे मकानों में रहना जैसै प्रतीकात्मक कदम भी आज के राजनीतिक परिवेश में कम नहीं हैं। इन पर चलना कठिन नहीं है, किंतु इनके लोभ से बचकर रह पाना बहुत कठिन है। निश्चय ही ऐसी कोशिशों का स्वागत होना चाहिए।
 यह भी नहीं है कि ऐसा करने वाले अरविंद केजरीवाल अकेले हैं। वर्तमान में मनोहर पारीकर(गोवा), ममता बनर्जी(प.बंगाल), माणिक सरकार(त्रिपुरा), एन. रंगास्वामी(पांडिचेरी) जैसे मुख्यमंत्री और एके एंटोनी, बुद्धदेव भट्टाचार्य, वी. अच्युतानंदन जैसे तमाम नेता इसी कोटि में आते हैं। गाँधीवादी, समाजवादी, वामपंथी, और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की धाराओं में भी ऐसे तमाम राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता मिलेंगें, जिनकी त्याग की भावना असंदिग्ध है। बावजूद इसके ऐसा क्या है जो अरविंद केजरीवाल को अधिक चर्चा और ज्यादा टीवी फुटेज दिलवा रहा है। इसे समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि अरविंद ने निजी जीवन में शुचिता के सवाल को जिस तरह अपनी राजनीति का केंद्रीय विषय बनाया है, वह उन्हें सबके बीच अलग खड़ा करता है। वे राजनीति की एक नई धारा के प्रतिनिधि हैं। वे उन लोगों की तरह से नहीं है जिनके लिए ईमानदारी एक व्यक्तिगत संकल्प है। वे इसे अपने दल की पहचान बनाना चाहते हैं। वे पारीकर और ममता से इस मामले में अलग हैं कि दोनों की ईमानदारी एक व्यक्तिगत विषय है। ममता के साथ रहकर आप बेईमान रह सकते हैं। साधनों का उपयोग कर सकते हैं। पारीकर भी निजी ईमानदारी का विज्ञापन नहीं करते और तंत्र या अपने दल को ईमानदार रहने के लिए मजबूर भी नहीं करते। वे अपने संकल्प पर अडिग हैं किंतु उनका आग्रह बेहद निजी है। केजरीवाल इस अर्थ में अलग हैं वे न सिर्फ इस ईमानदारी,सादगी का विज्ञापन कर रहे हैं बल्कि अपने दल के नेताओं को ये शर्तें मानने के लिए राजी कर रहे हैं। ऐसे में यह ईमानदारी एक अभियान में बदल जाती है। यह अपने दल को भी उसी रास्ते पर डालने जैसा मामला है। यह मामला ऐसा नहीं है कि ममता तो निजी जीवन को बेहद ईमानदारी से जिएं और बाकी सारी पार्टी और तंत्र आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा रहे। याद करें कि जब आप पार्टी के एक विधायक बिन्नी मंत्रिमंडल में जगह न मिलने से नाराज होते हैं तो उन्हें मनाने के बजाए अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि यह दल पद चाहने वालों के लिए नहीं है, क्रांतिकारियों के लिए है। हम देखते हैं कि बिन्नी मान जाते हैं और आप के मंत्रियों की शपथ में कोई व्यवधान नहीं होता। अरविंद की जिदें साधारण नहीं हैं। वे बंगला नहीं लेते, एक बड़ा फ्लैट लेने पर शोर मचता है तो उसे भी वापस कर देते हैं। लोक की इतनी चिंता साधारण नहीं है। आलोचना को सुनना और उस पर अमल करना साधारण नहीं है किंतु अरविंद ऐसा कर रहे हैं और करते हुए दिख भी रहे हैं।
  अरविंद में एक सात्विक क्रोध दिखता है, आप उसे सात्विक अहंकार भी कह सकते हैं। किंतु उनमें, उनकी देहभाषा में, उनकी आंखों में जो तड़प है वह बताती है वे अभी भी इस व्यवस्था में एक अलग रोशनी बिखेरने की ताकत रखते हैं। सही मायने में दिल्ली में होना अरविंद के लिए एक ज्यादा लाभ, ज्यादा चर्चा, ज्यादा मीडिया अटेंशन दिलाने वाला साबित हुआ है। किंतु इससे भी इनकार नहीं करना चाहिए कि अरविंद ने एक आम हिंदुस्तानी के मन, उसके आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम किया है। निराशा और अवसाद से घिरा आम हिंदुस्तानी आज एक नई रौशनी की ओर देख रहा है। भारत जैसे महादेश में जहां क्रांतियां प्रतीक्षारत ही रह जाती हैं, अरविंद ने उसे संभव बनाया है। यह साधारण नहीं है कि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के लिए अरविंद ने ठंड में पसीने ला दिए हैं। आप अरविंद के प्रशांत भूषण जैसे साथियों की कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की मांग की आलोचना कर सकते हैं किंतु अरविंद के नेतृत्व में जब नौजवान भारत मां की जय बोलते हैं, वंदेमातरम् का जयघोष करते हैं तो किस हिंदुस्तानी का मन नहीं प्रसन्न होता। लंबे समय के बाद भारतीय मध्यवर्ग को जो अपनी रोजी-रोटी और दैन्दिन संर्घषों से आगे की नहीं सोचता था, परिवर्तन और बदलाव की किसी प्रेरणा से खाली था, उम्मीदें नजर आने लगी हैं। जिस समय में छात्र, मजदूर और तमाम आंदोलन अपनी खामोश मौत मर रहे थे और कारपोरेट का शिकंजा आम आदमी के गले तक आ चुका है। ऐसे में केजरीवाल का उदय हमें हिम्मत देता है,ताकत देता है। केजरीवाल जैसे लोगों की सफलता-असफलता मायने नहीं रखती है। मायने इस बात के हैं कि वे किस तरह सत्ता के प्रतिस्पर्धी दलों का दंभ तोड़ते हैं और उन्हें जनमुद्दों के करीब लाते हैं। भारतीय राजनीति के इस समय में केजरीवाल 28 विधायकों की छोटी सी पार्टी के नेता और दिल्ली जैसे आधे-अधूरे राज्य के मुख्यमंत्री भले हों, वे उस हिंदुस्तानी जनता की उम्मीदों का चेहरा है, जिसने अपने सपने देखने बंद कर दिए थे। उदारीकरण की चकाचौंध में चकराई सरकारों और सत्ता प्रतिष्ठानों के सामने वे भारतीय जन के आत्मविश्वास और लोकचतना के सबसे बड़े प्रतीक बन चुके हैं। उनका मुकाबला आज किसी से नहीं है क्योंकि कोई भी सत्ता प्रतिष्ठान आम आदमी के साथ नहीं है। वे सत्ता और राजनीति को उसकी भटकी राहें याद दिला रहे हैं। गांधी टोपी की वापसी के बहाने वे एक ऐसी राजनीति को जन्म दे चुके हैं जहां जाति, पंथ के सवाल हवा हो चुके हैं। भगवान उन्हें इतना ही निष्पाप, जिद्दी और हठी बने रहने की शक्ति दे।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

पं. बृजलाल द्विवेदी अभा साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत होंगें प्रेम जनमेजय


भोपाल,1 जनवरी। हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिलभारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष व्यंग्य यात्रा (दिल्ली) के संपादक डा.प्रेम जनमेजय  को दिया जाएगा। डा. प्रेम जनमेजय साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ देश के जाने-माने व्यंग्यकार एवं लेखक हैं। वे पिछले नौ वर्षों से व्यंग्य विधा पर केंद्रित महत्वपूर्ण पत्रिका व्यंग्य यात्रा का संपादन कर रहे हैं।

      पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव, रमेश नैयर, डा. सच्चिदानंद जोशी, डा.सुभद्रा राठौर और जयप्रकाश मानस शामिल हैं। इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज(गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश ( दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाज और सद्भावना दर्पण( रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज को दिया जा चुका है। त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिलभारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रूपए, शाल, श्रीफल, प्रतीकचिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है। सम्मान कार्यक्रम 7, फरवरी, 2014 को गांधी भवन, भोपाल में आयोजित किया गया है। मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्कार, बुद्धिजीवी और पत्रकार हिस्सा लेगें। इस अवसर मीडिया और लोकजीवन विषय पर व्याख्यान भी आयोजित किया जाएगा।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

जन्मदिन(25दिसंबर)परविशेषः करिश्माई नेता हैं वाजपेयी

-संजय द्विवेदी
       

अटलबिहारी वाजपेयी यानि एक ऐसा नाम जिसने भारतीय राजनीति को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से इस तरह प्रभावित किया जिसकी मिसाल नहीं मिलती। एक साधारण परिवार में जन्मे इस राजनेता ने अपनी भाषण कला, भुवनमोहिनी मुस्कान, लेखन और विचारधारा के प्रति सातत्य का जो परिचय दिया वह आज की राजनीति में दुर्लभ है। सही मायने में वे पं.जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के सबसे करिश्माई नेता और प्रधानमंत्री साबित हुए।
   एक बड़े परिवार का उत्तराधिकार पाकर कुर्सियां हासिल करना बहुत सरल है किंतु वाजपेयी की पृष्ठभूमि और उनका संघर्ष देखकर लगता है कि संकल्प और विचारधारा कैसे एक सामान्य परिवार से आए बालक में परिवर्तन का बीजारोपण करती है। शायद इसीलिए राजनैतिक विरासत न होने के बावजूद उनके पीछे एक ऐसा परिवार था जिसका नाम संघ परिवार है। जहां अटलजी राष्ट्रवाद की ऊर्जा से भरे एक ऐसे महापरिवार के नायक बने, जिसने उनमें इस देश का नायक बनने की क्षमताएं न सिर्फ महसूस की वरन अपने उस सपने को सच किया जिसमें देश का नेतृत्व करने की भावना थी। अटलजी के रूप में इस परिवार ने देश को एक ऐसा नायक दिया जो वास्तव में हिंदू संस्कृति का प्रणेता और पोषक बना। याद कीजिए अटल जी की कविता तन-मन हिंदू मेरा परिचय। वे अपनी कविताओं, लेखों ,भाषणों और जीवन से जो कुछ प्रकट करते रहे उसमें इस मातृ-भू की अर्चना के सिवा क्या है। वे सही मायने में भारतीयता के ऐसे अग्रदूत बने जिसने न सिर्फ सुशासन के मानकों को भारतीय राजनीति के संदर्भ में स्थापित किया वरन अपनी विचारधारा को आमजन के बीच स्थापित कर दिया।
समन्वयवादी राजनीति की शुरूआतः
सही मायने में अटलबिहारी वाजपेयी एक ऐसी सरकार के नायक बने जिसने भारतीय राजनीति में समन्वय की राजनीति की शुरूआत की। वह एक अर्थ में एक ऐसी राष्ट्रीय सरकार थी जिसमें विविध विचारों, क्षेत्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले तमाम लोग शामिल थे। दो दर्जन दलों के विचारों को एक मंत्र से साधना आसान नहीं था। किंतु अटल जी की राष्ट्रीय दृष्टि, उनकी साधना और बेदाग व्यक्तित्व ने सारा कुछ संभव कर दिया। वे सही मायने में भारतीयता और उसके औदार्य के उदाहरण बन गए। उनकी सरकार ने अस्थिरता के भंवर में फंसे देश को एक नई राजनीति को राह दिखाई। यह रास्ता मिली-जुली सरकारों की सफलता की मिसाल बन गया। भारत जैसे देशों में जहां मिलीजुली सरकारों की सफलता एक चुनौती थी, अटलजी ने साबित किया कि स्पष्ट विचारधारा,राजनीतिक चिंतन और साफ नजरिए से भी परिवर्तन लाए जा सकते हैं। विपक्ष भी उनकी कार्यकुशलता और व्यक्तित्व पर मुग्ध था। यह शायद उनके विशाल व्यक्तित्व के चलते संभव हो पाया, जिसमें सबको साथ लेकर चलने की भावना थी। देशप्रेम था, देश का विकास करने की इच्छाशक्ति थी। उनकी नीयत पर किसी कोई शक नहीं था। शायद इसीलिए उनकी राजनीतिक छवि एक ऐसे निर्मल राजनेता की बनी जिसके मन में विरोधियों के प्रति भी कोई दुराग्रह नहीं था।
आम जन का रखा ख्यालः
 उनकी सरकार सुशासन के उदाहरण रचने वाली साबित हुई। जनसमर्थक नीतियों के साथ महंगाई पर नियंत्रण रखकर सरकार ने यह साबित किया कि देश यूं भी चलाया जा सकता है। सन् 1999 के राजग के चुनाव घोषणापत्र का आकलन करें तो पता चलता है कि उसने सुशासन प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धता जैसे विषय को उठाने के साथ कहा-लोगों के सामने हमारी प्रथम प्रतिबद्धता एक ऐसी स्थायी, ईमानदार, पारदर्शी और कुशल सरकार देने की है, जो चहुंमुखी विकास करने में सक्षम हो। इसके लिए सरकार आवश्यक प्रशासनिक सुधारों के समयबद्ध कार्यक्रम शुरू करेगी, इन सुधारों में पुलिस और अन्य सिविल सेवाओं में किए जाने वाले सुधार शामिल हैं राजग ने देश के सामने ऐसे सुशासन का आदर्श रखा जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण, संघीय समरसता, आर्थिक आधुनिकीकरण, सामाजिक न्याय, शुचिता जैसे सवाल शामिल थे। आम जनता से जुड़ी सुविधाओं का व्यापक संवर्धन, आईटी क्रांति, सूचना क्रांति इससे जुड़ी उपलब्धियां हैं।
एक भारतीय प्रधानमंत्रीः
   अटलबिहारी बाजपेयी सही मायने में एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो भारत को समझते थे।भारतीयता को समझते थे। राजनीति में उनकी खींची लकीर इतनी लंबी है जिसे पारकर पाना संभव नहीं दिखता। अटलजी सही मायने में एक ऐसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं जिसने राष्ट्रवाद को सर्वोपरि माना। देश को सबसे बड़ा माना। देश के बारे में सोचा और अपना सर्वस्व देश के लिए अर्पित किया। उनकी समूची राजनीति राष्ट्रवाद के संकल्पों को समर्पित रही। वे भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश मंत्री भी रहे। उनकी यात्रा सही मायने में एक ऐसे नायक की यात्रा है जिसने विश्वमंच पर भारत और उसकी संस्कृति को स्थापित करने का प्रयास किया। मूलतः पत्रकार और संवेदनशील कवि रहे अटल जी के मन में पूरी विश्वमानवता के लिए एक संवेदना है। यही भारतीय तत्व है। इसके चलते ही उनके विदेश मंत्री रहते पड़ोसी देशों से रिश्तों को सुधारने के प्रयास हुए तो प्रधानमंत्री रहते भी उन्होंने इसके लिए प्रयास जारी रखे। भले ही कारगिल का धोखा मिला, पर उनका मन इन सबके विपरीत एक प्रांजलता से भरा रहा। बदले की भावना न तो उनके जीवन में है न राजनीति में। इसी के चलते वे अजातशत्रु कहे जाते हैं।
  आज जबकि राष्ट्रजीवन में पश्चिमी और अमरीकी प्रभावों का साफ प्रभाव दिखने लगा है। रिटेल में एफडीआई के सवाल पर जिस तरह के हालात बने वे चिंता में डालते हैं। भारत के प्रधानमंत्री से लेकर बड़े पदों पर बैठे राजनेता जिस तरह अमरीकी और विदेशी कंपनियों के पक्ष में खड़े दिखे वह बात चिंता में डालती है। यह देखना रोचक होता कि अगर सदन में अटलजी होते तो इस सवाल पर क्या स्टैंड लेते। शायद उनकी बात को अनसुना करने का साहस समाज और राजनीति में दोनों में न होता। सही मायने में राजनीति में उनकी अनुपस्थिति इसलिए भी बेतरह याद की जाती है, क्योंकि उनके बाद मूल्यपरक राजनीति का अंत होता दिखता है। क्षरण तेज हो रहा है, आदर्श क्षरित हो रहे हैं। उसे बचाने की कोशिशें असफल होती दिख रही हैं। आज भी वे एक जीवंत इतिहास की तरह हमें प्रेरणा दे रहे हैं। वे एक ऐसे नायक हैं जिसने हमारे इसी कठिन समय में हमें प्रेरणा दी और हममें ऊर्जा भरी और स्वाभिमान के साथ साफ-सुथरी राजनीति का पाठ पढ़ाया। हमें देखना होगा कि यह परंपरा उनके उत्तराधिकार कैसे आगे बढाते हैं। उनकी दिखायी राह पर भाजपा और उसका संगठन कैसे आगे बढ़ता है।
   अपने समूचे जीवन से अटलजी जो पाठ पढ़ाते हैं उसमें राजनीति कम और राष्ट्रीय चेतना ज्यादा है। सारा जीवन एक तपस्वी की तरह जीते हुए भी वे राजधर्म को निभाते हैं। सत्ता में रहकर भी वीतराग उनका सौंदर्य है। वे एक लंबी लकीर खींच गए हैं, इसे उनके चाहनेवालों को न सिर्फ बड़ा करना है बल्कि उसे दिल में भी उतारना होगा। उनके सपनों का भारत तभी बनेगा और सामान्य जनों की जिंदगी में उजाला फैलेगा। स्वतंत्र भारत के इस आखिरी  करिश्माई नेता का व्यक्तित्व और कृतित्व सदियों तक याद किया जाएगा, वे धन्य हैं जिन्होंने अटल जी को देखा, सुना और उनके साथ काम किया है। ये यादें और उनके काम ही प्रेरणा बनें तो भारत को परमवैभव तक पहुंचने से रोका नहीं जा सकता। शायद इसीलिए उनको चाहनेवाले उनकी लंबी आयु की दुआ  करते हैं और गाते हुए आगे बढ़ते हैं चल रहे हैं चरण अगणित, ध्येय के पथ पर निरंतर



बुधवार, 13 नवंबर 2013

क्यों सिकुड़ रहा है राष्ट्रीय दलों का जनाधार?

क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत से अखिलभारतीयता को मिलती चुनौती
                                                       -संजय द्विवेदी


  अरसा हुआ देश ने केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं देखी। स्वप्न सरीखा लगता है जब राजीव गांधी ने 1984 के चुनाव में 415 लोकसभा सीटें जीतकर दिल्ली में सरकार बनायी थी। इतिहास ऐसे अवसर किसी किसी को ही देता है। राजीव गांधी को यह अवसर मिला, यह अलग बात है अपनी राजनीतिक अनुभवहीनता, अनाड़ी दोस्तों की सोहबत और कई गलत फैसलों से उनकी सरकार जल्दी विवादित हो गयी और बोफोर्स के धुंए में सब तार-तार हो गया। तबसे लेकर आजतक दिल्ली को एक ऐसी सरकार का इंतजार है जो फैसलों को लेकर सहयोगियों के दबावों से मुक्त होकर काम कर सके। जो अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को दृढ़ता के साथ लागू कर सके। भारतीय संविधान ने अनेक संवैधानिक व्यवस्थाएं करके केंद्रीय शासन को समर्थ बनाया है किंतु इन सालों में हमने प्रधानमंत्री को ही सबसे कमजोर पाया है। सत्ता के अन्य केंद्र, दबाव समूह, सत्ता के साझेदार कई बार ज्यादा ताकतवर नजर आते हैं। वीपी सिंह, देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह सरकार सबकी एक कहानी है।
   इसका सबसे कारण है हमारे राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की विफलता और उफान मारती क्षेत्रीय आकांक्षाएं। आखिर क्या हुआ कि हमारे राष्ट्रीय राजनीतिक दल सिमटने लगे और क्षेत्रीय दलों का अभूतपूर्व विस्तार हुआ। राष्ट्रीय दल होने के नाते कांग्रेस का पराभव हुआ, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ताकत घटी और भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस की छोड़ी हुयी जगहों को तेजी से भर नहीं पायी। जाहिर तौर पर अखिलभारतीयता के विचार और भाव भी हाशिए लग रहे थे। राष्ट्रीय राजनीतिक दल वैसे भी भारत में बहुत ज्यादा नहीं थे। सही मायने में तो कांग्रेस,जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टियां ही अखिलभारतीयता के चरित्र का सही मायने में प्रतिनिधित्व करती थीं किंतु हालात यहां तक आ पहुंचे कि राजीव गांधी को जिस सदन ने 415 का बहुमत दिया, उसी सदन में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी तेलगू देशम थी- यानि कि एक क्षेत्रीय दल भारत का प्रमुख विपक्षी दल बन गया। यह समय ही भारत में राष्ट्रीय दलों के क्षरण का प्रारंभकाल है। तबसे आज तक क्षेत्रीय दलों की शक्ति और क्षमता को हम लगातार बढ़ता हुआ देख रहे हैं। समाजवादी आंदोलन के बिखराव ने सोशलिस्ट पार्टी को खत्म कर दिया या वे कई क्षेत्रीय दलों में बंटकर क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रतिनिधि पार्टिंयां बन गयीं और बचे हुए समाजवादी कांग्रेस- भाजपा-बसपा जहां भी मौका मिला उस दल की गोद में जा बैठे। यह आश्चर्यजनक नहीं है नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह से लेकर भाजपा के आरिफ बेग तक एक समय तक समाजवादी ही थे। किंतु समय बदलता गया और राष्ट्रीय दलों का प्रभामंडल कम होता गया। आज हालात यह हैं कि बिना गठबंधन दिल्ली में कोई दल सरकार बनाने का स्वप्न भी नहीं देखता। जबकि राजनेता तो सपनों के सौदागर ही होते हैं। किंतु वास्तविकता यह है आने वाले आम चुनावों में जनता किस गठबंधन के साथ जाएगी, उसके लिए अपना कुनबा बढ़ाने पर जोर है। नरेंद्र मोदी जैसे समर्थ नेतृत्व की उपस्थिति के बावजूद भाजपा परिवार में चिंता है तो इसी बात की चुनाव के बाद हमें किन-किन दलों का समर्थन मिल सकता है। यह भी सही है कि इस दौर ने विचारधारा के आग्रहों को भी शिथिल किया है। वरना क्या यह साधारण बात थी कि एनडीए की अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में उमर अब्दुला, नीतिश कुमार, रामविलास पासवान, ममता बनर्जी, अरूणाचल के पूर्व मुख्यमंत्री गेगांग अपांग के बेटे तक मंत्री पद पर देखे गए। वहीं जयललिता से लेकर चंद्रबाबू नायडू वाजपेयी सरकार को समर्थन देते रहे। आज कांग्रेस के साथ भी बहुत से दल शामिल हैं। वे भी हैं जो कल तक एनडीए के साथ थे। ऐसे में यह कहना बहुत कठिन है कि राजनीति में अखिलभारतीयता के चरित्र को कैसे स्थापित किया जा सकता है। अखिलभारतीयता एक सोच है,संवेदना है और फैसले लेने में प्रकट होने वाली राष्ट्रीय भावना है। क्षेत्रीय दल उस संवेदना से युक्त नहीं हो सकते, जैसा राष्ट्रीय राजनीतिक दल होते हैं। क्योंकि क्षेत्रीय दलों को अपने स्थानीय सरोकार कई बार राष्ट्रीय हितों से ज्यादा महत्वपूर्ण दिखते हैं। उमर अब्दुला या महबूबा मुफ्ती को क्या फर्क पड़ता है यदि शेष देश को उनके किसी कदम से दर्द होता हो। इसी तरह नवीन पटनायक या जयललिता के लिए उनका अपना राज्य और वोट आधार जिस बात से पुष्ट होता है, वे वैसा ही आचरण करेंगें। लिट्टे के मामले में तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों के रवैये का अध्ययन इसे समझने में मदद कर सकता है। क्षेत्रीय राजनीति किस तरह अपना आधार बनाती है उसे देखना हो तो राज ठाकरे परिघटना भी हमारी सहायक हो सकती है। कैसे अपने ही देशवासियों के खिलाफ बोलकर एक दल क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति करते हुए राज्य में एक शक्ति बन जाता है। निश्चित ही ऐसी राजनीति का विस्तार न सिर्फ घातक है बल्कि देश को कमजोर करने वाला है। इस तरह के विस्तार से सिर्फ केंद्र की सरकार ही कमजोर नहीं होती बल्कि देश भी कमजोर होता है। इसके लिए हमें इन कारणों की तह में जाना होगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि देश आज क्षेत्रीय दलों की आवाज ज्यादा सुनता है। देश के तमाम राज्यों जैसे जम्मू-कश्मीर, पंजाब, तमिलनाडु, उप्र, बिहार, उड़ीसा, प.बंगाल, झारखंड में जहां क्षेत्रीय दल सत्ता में काबिज हैं तो वहीं अनेक राज्यों में वे सत्ता के प्रबल दावेदार या मुख्य विपक्षी दल हैं। ऐसे में यह कहना बहुत कठिन है कि राजनीति में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के दिल जल्दी बहुरने वाले हैं। क्षेत्रीय दलों के फैसले भावनात्मक और क्षेत्रीय आधार पर ही होते हैं। देश की सामूहिक आकांक्षाएं उनके लिए बहुत मतलब नहीं रखतीं। अपने स्थानीय दृष्टिकोण से बंधे होने के कारण उनकी प्रतिक्रियाएं क्या रूप ले सकती हैं, इसे हम और आप तेलंगाना की आग में जलते हुए आंध्र प्रदेश को देखकर समझ सकते हैं।
    दरअसल अखिलभारतीयता एक चरित्र है। भाजपा जब उसका विस्तार बहुत सीमित था तब भी वह एक अखिलभारतीय चरित्र की पार्टी थी। आज तो वह एक राष्ट्रीय दल है ही। इसी तरह कम्युनिस्ट पार्टियां भले आज बहुत सिकुड़ गयी हैं, उनकी धार कुंद हो गयी हो किंतु वे अपने चरित्र में ही अखिलभारतीय सोच का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी तरह डा. राममनोहर लोहिया के जीवन तक समाजवादी पार्टी भी अखिलभारतीय चरित्र की प्रतिनिधि बनी रही। चौधरी चरण सिंह ने भले ही उप्र, राजस्थान और हरियाणा की पिछड़ा वर्ग, जाट पट्टी में अपना खासा आधार खड़ा किया किंतु उनकी लोकदल एक अखिलभारतीय चरित्र की पार्टी बनी रही। इसका कारण सिर्फ यह था कि ये दल कोई भी फैसला लेते समय देश के मिजाज और शेष भारत पर उसके संभावित असर का विचार करते हैं। पूरे देश में अपने दल की संगठनात्मक उपस्थिति के नाते वे अपने काडर-कार्यकर्ताओं-नेताओं पर पड़ने वाले प्रभावों और फीडबैक से जुड़े होते हैं।
   बावजूद इसके अखिलभारतीयता में आ रही कमी और राष्ट्रीय दलों के सिकुड़ते आधार के लिए इन दलों की कमियों को भी समझना होगा। क्योंकि आजादी के समय कांग्रेस ही सबसे बड़ा दल था जिससे देश की जनता की भावनाएं जुड़ी हुयी थीं। ऐसा क्या हुआ कि राष्ट्रीय दलों से लोग दूर होते गए और क्षेत्रीय दल शक्ति पाते गए। निश्चय ही इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे राष्ट्रीय राजनीतिक दल क्षेत्रीय आकांक्षाओं, भावनाओं, उनके सपनों को संबोधित नहीं कर पाए। बड़े राजनीतिक दल यह समझ पाने में असफल रहे कि कोई भी राष्ट्रीयता, स्थानीयता के संयोग से ही बनती है। स्थानीयता सह राष्ट्रीयता के मूलमंत्र को भूलकर तमाम क्षेत्रों,वर्गों की तरफ उपेक्षित निगाहें रखी गयीं, उसी का परिणाम है कि आज क्षेत्रीय और जातीय अस्मिताएं दलों के रूप में एक ताकत बनकर सामने आई हैं। वे अपनी संगठित शक्ति से अब न सिर्फ प्रांतीय-स्थानीय सत्ता में प्रभावी हुयी हैं वरन् वे केंद्रीय सत्ता में भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं। ऐसे में राजनीति की अखिलभारतीयता की भावना को खरोंचें लगें तो लगें इससे प्रांतीय, क्षेत्रीय और जातीय अस्मिता की राजनीति करने वालों को बहुत वास्ता नहीं है। वे केंद्रीय सत्ता को सहयोग देकर बहुत कुछ हासिल ही नहीं कर रही हैं, वरन कई बार-बार दिल्ली की सत्ता पर कब्जे का स्वप्न भी देखती हैं। देवगौड़ा को याद कीजिए, मायावती-मुलायम-नीतिश कुमार के सपनों पर गौर कीजिए। मिली-जुली सरकारों के दौर में हर असंभव को संभव होते हुए देखने का यह समय है। यह तो भला हो कि इन क्षेत्रीय क्षत्रपों की आपसी स्पर्धा और महत्वाकांक्षांओं का कि वे एक मंच पर साथ आने को तैयार नहीं हैं और छोटे स्वार्थों में बिखर जाते हैं, वरना क्षेत्रीय दलों के अधिपति ही दिल्ली पति लंबे समय से बने रहते। इसके चलते ही कांग्रेस या भाजपा के पाले में खड़े होना उनकी मजबूरी दिखती है। बावजूद इसके यह सच है कि क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति से इस राष्ट्र का मंगल संभव नहीं है। राष्ट्रीय दलों को अपनी भूमिका को बढ़ाते हुए अपने आत्मविश्वास का प्रदर्शन करना होगा और अपने दम पर केंद्रीय सत्ता में आने के स्वप्न पालने होगें। क्योंकि मजबूत केंद्र के बिना हम अपनी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, देश की आकांक्षाओं, सपनों और ज्वलंत प्रश्नों को हल नहीं कर सकते। एक समन्वित रणनीति बनाकर अखिलभारतीय दलों को देश के ज्वलंत प्रश्नों पर एक राय बनानी होगी। कुछ सवालों को राजनीति से अलग रखते हुए देश में एक राष्ट्रीयता की चेतना जगानी होगी। कम्युनिस्ट पार्टियां तो देश की राजनीति में अप्रासंगिक हो गई हैं। समाजवादी आंदोलन भी बिखराव का शिकार है और अंततःजातीय-क्षेत्रीय अस्मिता की नारेबाजियों में फंसकर रह गया है। कांग्रेस, भाजपा की इस दिशा में एक बड़ी जिम्मेदारी है कि वे अपने अखिलभारतीय चरित्र से देश को जोड़ने का काम करें। देश की राजनीति की अखिलभारतीयता का वाहक होने के नाते वे इस चुनौती से भाग भी नहीं सकते।