'हाइपर कनेक्टिविटी' के दौर में युवाओं पर गहराता
अकेलापन
-प्रो.
संजय द्विवेदी
सही मायनों में मानव सभ्यता के इतिहास में
दुनिया इतनी कनेक्टेड कभी नहीं थी। एक क्लिक, एक
संदेश और कुछ ही सेकेंड्स में सात समंदर पार बातचीत हो जाना किसी जादुई अहसास जैसा
है। मोबाइल की चौबीस घंटे चमकती स्क्रीन ने इस जादुई दुनिया को हमारी हकीकत बना
दिया है। लेकिन इस तकनीकी छलांग का दूसरा पहलू बेहद डरावना है। इतिहास के इस दौर
में हम 'हाइपर कनेक्टेड' तो हैं,
लेकिन शायद सबसे ज्यादा अकेले भी। सोशल मीडिया के आभासी मंचों पर
हमारे दोस्तों और चाहने वालों की कतार बेहद लंबी है, मगर
संकट के क्षणों में सिर रखने के लिए एक वास्तविक कंधा भी मयस्सर नहीं होता। हम
निरंतर 'बातचीत' की भूलभुलैया में तो
उलझे हैं, किंतु आंतरिक 'संवाद'
के लिए तरस रहे हैं। सिर झुकाए और स्क्रीन के कोलाहल में डूबे समाज
की बेचैनियां निरंतर बढ़ रही हैं। आधुनिक विमर्श में लाखों की भीड़ के बीच अकेले
होने की त्रासदी इसी को कहते हैं।
अकेलापन इस समय की सबसे बड़ी और चिंताजनक
सामाजिक परिघटना बन चुका है। एक विचारक ने ठीक ही कहा है, "दोस्तों का न होना कोई अपराध नहीं है, लेकिन खुद में
अकेला हो जाना एक त्रासदी है।"
सोशल मीडिया के इस दौर ने हमें अपनी ही
बनाई भीड़ ने एकाकी कर दिया है। हालात इस हद तक बदल चुके हैं कि अब वास्तविक
इंसानी रिश्तों की जगह 'एआई फ्रेंड्स'
(आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मित्र) ले रहे हैं। मशीनें हमारी सहायक,
मार्गदर्शक और दोस्त बन रही हैं। मेरे जैसे मीडिया शिक्षक के लिए यह
तथ्य रेखांकित करना बेहद पीड़ादायक है कि क्लासरूम में स्मार्टफोन की स्क्रीन पर
चमकती युवा आँखें, फोन जेब में जाते ही एक अजीब से सन्नाटे
और सामाजिक संकोच से घिर जाती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी पहचान और
व्यक्तित्व का निर्माण अब वास्तविक समाज नहीं, बल्कि यह पाँच
इंच की स्क्रीन कर रही है। सच तो यह है कि आज के युवाओं का एकांत भी शांत नहीं है,
वह आभासी कोलाहल से भरा हुआ है।
नए समय की माँग के अनुसार सोशल मीडिया पर
उपस्थिति को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। तकनीक ने इस माध्यम को मोबाइल के
जरिए हर हाथ और हर जेब तक पहुँचाया है। सोशल मीडिया पर मिलने वाले 'लाइक' और 'कमेंट्स' हमारे मस्तिष्क में तात्कालिक खुशी का संचार करते हैं। डिजिटल मंचों पर
विचरते लोग इस आभासी प्रशंसा के आदी हो चुके हैं। यह क्षणिक खुशी एक नशे की तरह
काम करती है। दिनभर लगातार पोस्ट करते, रील्स देखते और
प्रतिक्रियाएं देते लोग अनजाने में ही इस माध्यम के गहरे चंगुल में फंस जाते हैं। 'डोपामाइन' का यह मायाजाल आज हमारे सामाजिक ताने-बाने
को छिन्न-भिन्न कर रहा है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अमूमन चमकती हुई
चीजें ही परोसी जाती हैं। लोग अपनी सुनहरी यादों, सफलताओं और सबसे खूबसूरत पलों को ही यहाँ साझा करते हैं। सोशल मीडिया पर
परोसी जा रही इस 'चमकीली जिंदगी' (रील्स,
वेकेशन, महँगी पार्टियां) को देखकर सामान्य
पृष्ठभूमि का युवा अपनी साधारण वास्तविक जिंदगी की तुलना उनकी 'रील्ड लाइफ' से करने लगता है। यह तुलना अंततः उसे
हीनभावना की ओर धकेल देती है, जिससे 'तुलना
का अवसाद' पैदा होता है। पूर्ववर्ती दौर में युवा फिल्मों से
सीखते थे, लेकिन तब महीनों में कोई एक फिल्म आती थी जिसका
प्रभाव लंबे समय तक रहता था। अब रील्स के दौर में यह मानसिक बमबारी हर सेकंड जारी
है।
हमें 'बातचीत'
और 'संवाद' के बुनियादी
अंतर को समझना होगा। आँखों में आँखें डालकर की जाने वाली आत्मीय बातचीत के बजाय
लोग अब केवल मोबाइल स्कॉलिंग में उलझे हैं। यात्राओं, सार्वजनिक
स्थानों, पार्कों और यहाँ तक कि कॉलेजों के कैम्पस में भी
लोग आपस में बतियाने के बजाय सिर झुकाए स्क्रीन निहारते दिखते हैं। मोबाइल द्वारा
दिए गए इस एकाकीपन ने हमारी संवादात्मक क्षमता को गंभीर रूप से पंगु बना दिया है।
जिन भावनाओं को शब्दों में बयां किया जाना चाहिए था, उन्हें
अब 'इमोजी', 'शॉर्ट्स' और 'टेक्स्ट' के छोटे टुकड़ों
में समेटा जा रहा है। इसके कारण युवा पीढ़ी में वास्तविक सामाजिक कौशल तेजी से
लुप्त हो रहे हैं। संवादहीनता के कारण मन की वास्तविक आकांक्षाएं अधूरी रह जाती
हैं और हम एक ऐसे उदासीन समाज में तब्दील हो रहे हैं, जिसे
स्क्रीन पर गुस्सा जाहिर करना तो आता है, लेकिन वास्तविक
जीवन में प्रेम और करुणा व्यक्त करना नहीं।
अकेलापन अब सिर्फ किसी व्यक्ति का निजी
मामला या भावनात्मक उदासी नहीं रह गया है; यह
एक गंभीर वैश्विक संकट का रूप ले चुका है। यह संकट इतना गहरा है कि इससे मानसिक ही
नहीं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी घातक चुनौतियाँ मिल रही
हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा गठित 'सोशल कनेक्शन कमीशन'
की महत्वपूर्ण रिपोर्ट इस बात पर विशेष प्रकाश डालती है कि सामाजिक
अलगाव और अकेलापन दुनिया भर में एक मूक महामारी की तरह फैल रहे हैं, जिनका समाज पर गहरा लेकिन अनदेखा प्रभाव पड़ रहा है। नवीनतम वैज्ञानिक
साक्ष्यों के आधार पर यह रिपोर्ट तत्काल वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देती
है। आयोग के निष्कर्ष बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर हर छह में से एक युवा इस समय
गंभीर अकेलेपन का अनुभव कर रहा है।
विभिन्न शोध रिपोर्ट्स के आंकड़े बताते हैं
कि भारतीय युवा प्रतिदिन औसतन 4 से 5 घंटे स्मार्टफोन की स्क्रीन को दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय
रहने वाले हर पाँच में से दो युवा (लगभग 40 प्रतिशत) किसी न
किसी स्तर पर अकेलेपन या एंग्जायटी (घबराहट) का सामना कर रहे हैं। स्क्रीन-टाइम के
इस अनियंत्रित फैलाव के कारण युवाओं में अनिद्रा, चिड़चिड़ापन
और 'नोमोफोबिया' (मोबाइल से दूर होने
का डर) में करीब 30 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आए दिन
ऐसी खबरें सामने आती हैं जहाँ माता-पिता द्वारा फोन छीन लिए जाने पर बच्चों ने
आत्मघाती कदम उठा लिए या घर छोड़ दिया।
यह समस्या केवल सामान्य पृष्ठभूमि तक
सीमित नहीं है; देश के सबसे तेज और तकनीकी रूप
से उन्नत दिमाग वाले छात्र भी इस डिजिटल अकेलेपन और 'परफॉर्मेंस
प्रेशर' के चक्रव्यूह में फंसे हैं। 'आईआईटी
बॉम्बे' के 'स्टूडेंट वेलनेस सेंटर'
(काउंसिलिंग सेल) ने छात्रों में सोशल मीडिया जनित अवसाद के गंभीर
लक्षण दर्ज किए हैं। हालांकि, इसके सकारात्मक समाधान के रूप
में छात्रों ने खुद परिसरों में 'डिजिटल डिटॉक्स' और 'नो गैजेट नाइट्स' जैसे
जमीनी अभियानों की शुरुआत की है। इन अभियानों के तहत छात्र सप्ताह में एक शाम अपना
फोन कमरों में छोड़कर केवल आपस में बातचीत करने, खेलने और
कलात्मक गतिविधियों के लिए मैदानों में इकट्ठा होते हैं। यह अनूठी पहल साबित करती
है कि तकनीक का कोई भी एल्गोरिदम कभी भी जीवंत इंसानी जुड़ाव का विकल्प नहीं बन
सकता।
इस चुनौतीपूर्ण समय में हम तकनीक या सोशल
मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की वकालत नहीं कर सकते,
क्योंकि मोबाइल विहीन आधुनिक जीवन की कल्पना अब असंभव है। समाधान
पूरी तरह से तकनीक को छोड़ना नहीं, बल्कि 'डिजिटल हाइजीन' को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना
है। हमें सजगता से अपने स्क्रीन टाइम को घटाकर 'ग्रीन टाइम'
(प्रकृति, परिवार और वास्तविक मित्रों के साथ
बिताया जाने वाला समय) को बढ़ाना होगा।
अगली बार जब हम किसी कैफ़े,
मेट्रो या ड्राइंग रूम में बैठें, तो इंटरनेट
की वर्चुअल दुनिया में खोने के बजाय, अपने सामने उपस्थित
व्यक्ति की बात को पूरी आत्मीयता से सुनें। समाज, संस्कृति
और मनुष्यता को जिंदा रखने के लिए हमें इंसानों की संवेदनशीलता की ज़रूरत है,
मशीनी एल्गोरिदम की नहीं। मनुष्य का जीवन अनमोल है, किंतु हमारी मनुष्यता उससे भी बड़ी है। मानव और अन्य जीवों के बीच सबसे
बड़ा अंतर यही है कि हमने भाषाएं विकसित कीं, बातचीत से
संवाद की यात्रा तय की और कलाओं के माध्यम से संचार का मानवीय दायरा बढ़ाया। तकनीक
को हमारा सहयोगी होना चाहिए था, संचालक नहीं। समय आ गया है
कि हम अपनी वास्तविक खुशियों और आंतरिक आनंद को बचाए रखने के लिए तकनीक को वापस
सहायक की भूमिका में लाएं, न कि उसे अपनी चेतना का नियंता
बनने दें।
(लेखक
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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