पठनीयता
के गहरे संकट से जूझते समाचार पत्र क्या करें?
हां, सामने मीडिया की पढ़ाई करने की चाह रखने
वाले विद्यार्थी ही थे, उम्मीद की जानी चाहिए कि वे कोई अखबार, मैगजीन या किताबें
पढ़कर आए होंगे। लगभग 110 विद्यार्थियों से बात करते हुए यह अहसास हुआ कि अखबार अब
उनकी जिंदगी में कोई जगह नहीं रखता। वे जो कुछ भी ग्रहण कर रहे हैं, आनलाइन ही कर
रहे हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया के सामने बहुत गहरे संकट हैं। क्योंकि इस डिजिटल
समय में उनके ई-पेपर ही पलटे जा रहे हैं। क्या अब हाथ में अखबार लेकर पढ़ने वाले दुर्लभ
हो जाएंगें?
बदल
गए हैं पढ़ने के तरीके-
डिजिटल मीडिया और स्मार्टफोन ने पढ़ने के
तरीके को बदलकर रख दिया है। पोर्टल्स, सोशल मीडिया और न्यूज एप्स के कारण पाठकों
को पल-पल की खबरें मुफ्त में उनके मोबाइल पर मिल रही हैं। जिससे 24 घंटे में एक
बार आनेवाला अखबार क्या मुकाबला करेगे। रीयल टाइम अपडेट एक ऐसी घटना है जिसने सारा
कुछ बदलकर रख दिया है। ऐसे में अखबारों को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए नए
रास्ते तलाशने की जरूरत है। नई पीढ़ी लंबी सामग्री पढ़ने के बजाए अब वीडियो,
शार्ट्स, पाडकास्ड और विजुअल इंफ्रोग्राफिक्स के जरिए चीजों को देखना,सुनना और समझना
सीख गई है। प्रिंट मीडिया के प्रति उसका आकर्षण खत्म सा है।
आर्थिक
संकट से भी हैं हलाकान-
इस
परिघटना ने प्रिंट मीडिया से कमाई के मौके भी छीनने शुरु कर दिए हैं। हम जानते हैं
अखबार मूलतः विज्ञापनों ( स्पेस सेलिंग) पर निर्भर हैं। अब जबकि कंपनियां अपना बड़ा
बजट डिजिटल प्लेटफार्म जैसे गूगल,मेटा और यू-ट्यूब पर खर्च कर रही हैं, जहां वे
अपने लक्षित समूह ( टारगेट आडियंस) तक आसानी से पहुंच रही हैं। इसकी लागत भी कम
पड़ रही है। एल्गोरिद्म ने बाजार और ग्राहक की पहुंच को बहुत आसान बना दिया है।
कागज, स्याही और छपाई की बढ़ती कीमतों से अखबार पहले ही हलाकान थे, बिजली और
प्रिंटिंग मशीनों का रख-रखाव उनकी अलग चिंताओं को बढ़ाता रहा है। इन स्थितियों में
अखबार की न सिर्फ लागत बढ़ जाती है बल्कि उसे लोगों तक पहुंचाना सरल नहीं रह गया
है। अखबारों को सुबह छापना और लोगों के घरों तक पहुंचाना हमेशा ही कठिन काम था।
भारत जैसे बाजार में जहां लोग पढ़ने के लिए खर्च को तैयार नहीं है, यह संकट और
जटिल हो जाता है। आज भी हिंदुस्तान के बाजार में अखबार 3 से 7 रूपए के बीच ही बेचे
जा रहे हैं। जो उसकी वास्तविक लागत से बहुत कम होता है। विज्ञापनों में आती कमी के
बीच इसे छापना असंभव होता जाएगा। हम ध्यान से देखें तो हाकरों की नई पीढ़ी की रूचि
अखबार बांटने में रूचि कम रख रही है। दूध या अन्य व्यवसाय के साथ अखबार वितरण भी
किया जा रहा है। स्टाल कम हो रहे हैं जहां पत्र-पत्रिकाएं मिला करती थीं। स्टेशनों
से लेकर नगरों, कस्बों तक अखबारों और पत्रिकाओं के स्टाल समाप्त हो रहे हैं या
उनपर खाद्य सामग्री बिक रही है।
भरोसे
का संकट बड़ी चुनौती-
टीवी और डिजिटल मीडिया से होड़ कर रहे
प्रिंट मीडिया ने भी गहरी रिर्पोटिंग और विश्लेषणात्मक सामग्री के बजाए हल्की-फुल्की
प्रस्तुति से खुद को अप्रासंगिक बना लिया है। बहुत कम अखबार हैं जो सामग्री की
गुणवत्ता और विचारों पर ध्यान क्रेंद्रित कर रहे हैं। ऐसे में जब आनलाइन उपलब्ध
सामग्री जैसे ही विषयवस्तु अखबारों में होगी तो निश्चित ही पाठक दूर जाएंगें। कागज
के निर्माण में पेड़ों की कटाई और जल की खपत जैसे मुद्दे उठाकर भी अखबारों से दूर करने की एक नैतिक और
व्यवहारिक चिंताएं खड़ी करने के प्रयास भी हो रहे हैं। ऐसे में राजस्व में गिरावट
के कारण जहां मझोले और छोटे अखबारों के सामने अस्तित्व का संकट है तो बड़े अखबार
भी संपादकीय बजट में कटौती, पत्रकारों की छंटनी जैसे काम कर रहे हैं। इस पूरे
परिदृश्य में अखबारों की अधिकाधिक निर्भरता कारपोरेट और सरकारी विज्ञापनों पर बहुत
बढ़ गई है। संकट का असली सिरा यहीं है। भरोसे,विश्वसनीयता का संकट इन्हीं सब
कारणों से बढ़ रहा है। निष्पक्ष पत्रकारिता बहुत चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।
आखिर
रास्ता क्या है-
जाहिर है संकटों से घिरे प्रिंट मीडिया के
सामने विकल्प सीमित हैं। अब केवल संकटों की बात, समस्याओं का बातें करने से आगे
समाधान परक पत्रकारिता की आवश्यक्ता है। जिसमें अखबार संकटों के साथ उनके संभावित
समाधानों, सफल माडल्स और सकारात्मक प्रयासों की बात भी करें। व्याख्या, विश्लेषण
और खोजी पत्रकारिता पर फोकस करके उन्हें खबर क्यों घटी और इसके मायने क्या हैं
बताने होंगे। अखबार अब सूचना के वाहक नहीं उनके विश्लेषण और व्याख्याओं के वाहक
बनें। डेटा, शोध और गहन मैदानी कवरेज ही वह रास्ता है जिससे प्रिंट स्वयं को
प्रासंगिक बनाए रख सकता है। फैक्ट चेकिंग की अनिर्वायता के साथ हमें गलत खबरों का
पर्दाफाश भी करना होगा। सबसे पहले खबर देने के बजाए सबसे सटीक खबर देने के
सिद्धांत पर लौटना होगा। इसके साथ ही आत्मनिर्भर वित्तीय माडल पर काम करते हुए
पाठक द्वारा पोषित मीडिया खड़ा करना होगा। पत्रकारों को तकनीक से डरने के बजाय
उसका इस्तेमाल अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए करना चाहिए। डेटा एनालिसिस,
ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद और रूटीन री-लेखन में
एआई (AI) का इस्तेमाल करें ताकि पत्रकारों का समय फील्ड वर्क,
मानवीय संवेदनाओं की कहानियों और खोजी रिपोर्टिंग में लग सके।
पत्रकारिता तब तक निष्पक्ष नहीं हो सकती जब तक पत्रकार स्वयं सुरक्षित और आर्थिक
रूप से निश्चिंत न हों।
मीडिया
साक्षरता भी है जरूरी-
मीडिया संस्थानों और समाज को
मिलकर ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संवाददाताओं के लिए सुरक्षा कवर, बीमा और सम्मानजनक मानदेय सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाना होगा। पत्रकारों
और मीडिया संस्थानों को आम जनता के बीच 'मीडिया साक्षरता'
की समझ बहुत जरूरी है। जब पाठक यह समझना सीख जाएंगे कि कौन-सी खबर
प्रायोजित है, कौन-सा एजेंडा है और कौन-सी वास्तविक
पत्रकारिता, तो वे खुद-ब-खुद घटिया और सनसनीखेज कंटेंट को
नकारना शुरू कर देंगे। भरोसा वह शब्द है जो आसानी से अर्जित नहीं होता, अखबारों की
स्वीकार्यता में विश्वसनीयता और प्रामणिकता का सर्वाधिक योगदान होगा। उम्मीद की
जानी कि नई डिजिटल चुनौतियों के बीच भी कुछ लोग उस भरोसे को कायम रखेंगें, जो
भारतीय पत्रकारिता ने अपनी लंबी यात्रा से अर्जित किया है।

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