समीक्षक -
डॉ. प्रदीप डहेरिया
पुस्तकः संजय उवाच (प्रो.संजय द्विवेदी के व्याख्यान)
प्रकाशक: शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, शाहदरा,
दिल्ली
मूल्य- 495/- रुपए
कोई भी व्याख्यान समय की रेत पर मिट
जाने वाली आवाज़ हो सकते हैं, लेकिन जब वे लिपिबद्ध होकर
पुस्तक का आकार लेते हैं, तो वे इतिहास के अमर दस्तावेज़
बन जाते हैं। किसी भी समाज, राष्ट्र या संगठन को सही दिशा
देने में उसके नेतृत्वकर्ता के विचारों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब उन सशक्त विचारों
को केवल सुना ही नहीं, बल्कि 'भाषण संग्रह' के रूप में सहेजकर एक पुस्तक का रूप दे दिया जाता है, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शिका बन जाती है। हाल ही में प्रकाशित
'संजय उवाच' नामक यह पुस्तक, जो विशिष्ट, चुनिंदा एवं प्रभावी भाषणों का संकलन है। वह वैचारिक जगत में एक अनमोल उपहार की
तरह ही है। पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार, संपादक, चिंतक और मीडिया अध्यापन की दुनिया में चर्चित व्यक्तित्व प्रोफेसर संजय द्विवेदी
कृत है।
'संजय उवाच, केवल कागज़ पर छपे हुए शब्द नहीं हैं, बल्कि यह उस गहरे अनुभव, संवेदनशीलता और दूरदर्शिता
का जीवंत प्रमाण है जो डा. संजय द्विवेदी ने अपने सार्वजनिक जीवन में अर्जित किये हैं।
किसी भी प्रकार के व्याख्यान की सबसे बड़ी खूबी उसका सीधा दिल तक पहुँचना होता है। इस
पुस्तक में संकलित व्याख्यानों की भाषा इतनी सरल, सहज और सजीव है कि पाठक को पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो वह स्वयं सामने बैठकर
वक्ता को सुन रहा हो। शब्दों का चयन और वाक्यों का प्रवाह हर वर्ग के पाठक को बांधे
रखता है। इस दृष्टि से 'संजय उवाच' पुस्तक बिल्कुल फिट है। इस पुस्तक कि सबसे बड़ी ताकत इसकी विषय-वस्तु है। इसमें
केवल एक ढर्रे पर बात नहीं की गई है, बल्कि सामाजिक सरोकार, राष्ट्र निर्माण, युवा प्रेरणा, संस्कृति, और वैश्विक चुनौतियों जैसे गंभीर विषयों पर बेहद व्यावहारिक और दूरदर्शी विचार
प्रस्तुत किए गए हैं। प्रत्येक व्याख्यान पाठक को सोचने पर मजबूर करता है और एक नई
दृष्टि देता है। आज के दौर में जहाँ चारों ओर सूचनाओं का अंबार है, वहाँ यह पुस्तक वैचारिक स्पष्टता लाती है। निराश मन में उत्साह फूंकना और युवाओं
को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना इस पुस्तक का मूल स्वर है। संजय जी देश के
नामी-गिरामी संवाद कार्यक्रमों में शिरकत करते रहते हैं। उनकी वाक कला के लोग कायल
हैं। उनकी इस पुस्तक का हर शब्द पाठकों से सजीव संवाद करता लगता है। यह अवश्य पठनीय
पुस्तक है।इसके पन्नों को पलटते हुए पाठक के भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार निश्चित
ही होगा।


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