शनिवार, 20 अगस्त 2016

हमारा कश्मीर, तुम्हारा बलूचिस्तान

-संजय द्विवेदी

     देर से ही सही भारत की सरकार ने एक ऐसे कड़वे सच पर हाथ रख दिया है जिससे पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान को मिर्ची लगनी ही थी। दूसरों के मामले में दखल देने और आतंकवाद को निर्यात करने की आदतन बीमारियां कैसे किसी देश को खुद की आग में जला डालती हैं, पाकिस्तान इसका उदाहरण है। बदले की आग में जलता पाकिस्तान कई लड़ाईयां हारकर भारत के खिलाफ एक छद्म युद्ध लड़ रहा है और कश्मीर के बहाने उसे जिलाए हुए है। पड़ोसी को छकाए-पकाए और आतंकित रखने की कोशिशों में उसने आतंकवाद को जिस तरह पाला-पोसा और राज्याश्रय दिया, आज वही लोग उसके लिए भस्मासुर बन गए हैं।
     दुनिया के देशों के बीच पाकिस्तानी वीजा एक लांछित और संदिग्ध वस्तु है। वहां के नागरिक जीवन में जिस तरह का भय और असुरक्षा व्याप्त है, उससे पाकिस्तान के जनजीवन के हालत का पता चलता है। सही मायने में वह अपनी ही लगाई आग में सुलगता हुआ देश है। जिसका खुद की ही कोई मुकाम और लक्ष्य नहीं है, वह भारत की तबाही में ही अपनी खुशी खोज रहा है। बावजूद इसके भारतीय उपमहाद्वीप के देश कहां से कहां जा पहुंचे हैं पर पाकिस्तान नीचे ही जा रहा है। अमरीकी और चीनी मदद और इमदाद पर वहां का सत्ता प्रतिष्ठान जिंदा है एवं लोग परेशान हाल हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस समय बलूचिस्तान, पीओके तथा गिलगित के सवाल उठाए हैं, यह वक्त ही इसके लिए सही समय है। यह समय पाकिस्तान को आईना दिखाने का भी है और कश्मीरी भाईयों को यह बताने का भी है कि पाकिस्तान के साथ होकर उनका हाल क्या हो सकता है। यहां सवाल नीयत का है। विश्व जानता है कि भारत ने कश्मीर की प्रगति और विकास के लिए क्या कुछ नहीं किया। आप पीओके से भारत के कश्मीर की तुलना करके प्रसन्न हो सकते हैं कि यहां पर भारत ने अपना सारा कुछ दांव पर लगाकर विकास के हर काम किए हैं।
    कश्मीर में लगातार बंद, हिंसा और आतंक की वजह से विकास की गति धीमी होने के बावजूद भी भारत सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, आवागमन और व्यापार हर नजरिए से कश्मीर को ताकत देन की कोशिशें की हैं। कश्मीर की वादियों में आतंक के बाद भी वहां विकास की गतिविधियां निरंतर हैं। अराजकता के बाद भी इरादे चट्टानी हैं। भारत की संसद ने हर बार उसे अपना अभिन्न अंग माना और नागरिकों को हो रहे कष्टों पर दुख जताया। यह नागरिकों को मिले दर्द से उपजी पीड़ा ही थी कि कश्मीरी नागरिकों को पैलेट गन से लगी चोटों पर संसद से लेकर न्यायपालिका तक चिंतित नजर आई। इस संवेदना को क्या बलूचिस्तान और पीओके में रह रहे लोग महसूस कर सकते हैं? क्या पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान और पाक सेना के द्वारा किए जा रहे अत्याचारों से दुनिया अनभिज्ञ है? बलूच नेताओं की वाणी से जो दर्द फूट रहा है, वह वहां के आवाम का दर्द है, उनकी पीड़ा है जो वे भोग रहे हैं। पाकिस्तान के अत्याचारों से कराहते ये इलाके उनकी सेना के बूटों से निकली हैवानियत की कहानी बयान करते हैं। बलूचिस्तान के भूमि पुत्र अपनी ही जमीन पर किस तरह लांछित हैं, यह एक काला अध्याय है। जबकि भारत का कश्मीर एक लोकतांत्रिक जमीन का हिस्सा है। भारत का दिल है, भारत का मुकुट है। हमारे कश्मीर में पाक प्रेरित आतंकियों ने बर्बर कार्रवाई कर कश्मीरी पंडितों पर भीषण अत्याचार किए, उन्हें कश्मीर घाटी छोड़ने के लिए विवश कर दिया, किंतु फिर भी हर हिंदुस्तानी कश्मीरी की माटी और वहां के लोगों से उतनी ही मुहब्बत करता है जितनी पहले करता था।
     हर भारतीय को पता है कश्मीर में जो कुछ चल रहा है वह आम कश्मीरी हिंदुस्तानी का स्वभाव नहीं है। उसके नौजवानों को बहला-फुसला कर जेहाद के बहाने जन्नत के ख्वाब दिखाए गए हैं। उन्हें बताया गया है कि पाकिस्तान के साथ जाकर वे एक नई दुनिया में रहेंगें जहां सुख ही होगा, विकास होगा और वे एक नयी जमीन तोड़ सकेंगे। पाकिस्तान प्रेरित आतंकी कभी धन से कभी, आतंकित कर कश्मीरियों का इस्तेमाल कर उनकी जिंदगी को जहन्नुम बना रहे हैं। जबकि उनके द्वारा कब्जा किए गए कश्मीर की हालत लोगों से छिपी नहीं है। बलूचियों का जिस तरह पाकिस्तान ने भरोसा तोड़ा और उनके मान-सम्मान और जीवन जीने के हक भी छीन लिए, वह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में भारत में रहकर पाकिस्तान का सपना देखने वालों की आंखें खुल जानी चाहिए, क्योंकि भारत में होना एक लोकतंत्र में होना है। जहां कोई भी नागरिक- ताकतवर से ताकतवर व्यक्ति, पुलिस या सेना के खिलाफ अपनी बात कर सकता है। उचित मंचों पर शिकायत भी कर सकता है। लेकिन पाकिस्तान में होना सेना और आतंकियों के द्वारा पोषित ऐसे खतरनाक लोगों के बीच रहना है जहां किसी की जान सलामत नहीं है। जो देश अपने नागरिकों में भी भेद रखता है, उनके ऊपर भी दमन चक्र चलाए रखता है। पाकिस्तान की जमीन इन्हीं पापों से लाल है और वहां असहमति के लिए कोई जगह नहीं है। भारत और पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के चरित्र का आकलन और विश्लेषण करने वाले जानते हैं कि भारत ने खुद को पिछले सत्तर सालों में एक लोकतांत्रिक चरित्र के साथ विकसित किया है। अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत और स्थिर किया है। जबकि पाकिस्तान का लोकतंत्र आज भी सेना के बूटों तले कभी भी रौंदा जा सकता है। वहां अल्पसंख्यकों के अधिकारों का क्या हाल है? इतना ही नहीं वहां के तमाम मुसलमान आज किस हाल में हैं। हत्याएं, आतंक और खून वहां का दैनिक चरित्र है।
     पूरी दुनिया के लिए खतरा बन चुके पाकिस्तान की सच्चाईयां सामने लाना जरूरी है। यह बताना जरूरी है कि कैसे सेना, मुल्ला और आतंकवादी मिलकर एक देश और वहां के आवाम को बंधक बना चुके हैं। कैसे वहां पर आतंकवाद को राज्याश्रय मिला हुआ है और सरकारें उनसे कांप रही हैं। पाकिस्तान का कंधा अपने मासूम बच्चों को कंधा देते हुए भी नहीं कांपा। वह आतंकवाद के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें करता है, पर सच यह है कि ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने पाकिस्तान की जमीन पर ही पाया। आज भी ओसामा की मानसिकता लिए अनेक आतंकी और अपराधी वहां खुले आम घूमकर दहशतगर्दों की भर्ती करते हुए पूरी दुनिया में आतंक का निर्यात कर रहे हैं। ऐसे खतरनाक देश का टूटकर बिखर जाना ही विश्व मानवता के हित में है।

( लेखक राजनीतिक विश्वेषक है)

शनिवार, 6 अगस्त 2016

इस गर्जन-तर्जन से क्या हासिल?

अपनी पाकिस्तान यात्रा से आखिर क्या हासिल कर पाए हमारे गृहमंत्री
-संजय द्विवेदी

  जब पूरा पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान कश्मीर में आग लगाने की कोशिशें में जुटा है तब हमारे गृहमंत्री राजनाथ सिंह पाकिस्तान क्यों गए, यह आज भी अबूझ पहेली है। वहां हुयी उपेक्षा, अपमान और भोजन छोड़कर स्वदेश आकर उनकी सिंह गर्जना से क्या हासिल हुआ है? क्या उनके इस प्रवास और आक्रामक वक्तव्य से पाकिस्तान कुछ भी सीख सका है? क्या उसकी सेहत पर इससे कोई फर्क पड़ा है? क्या उनके पाकिस्तान में दिए गए व्याख्यान से पाकिस्तान अब आतंकवादियों की शहादत पर अपना विलाप बंद कर देगा? क्या पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान भारत के प्रति सद्भाव से भर जाएगा और कश्मीर में आतंकवादियों को भेजना कर देगा? जाहिर तौर पर इसमें कुछ भी होने वाला नहीं है। इस यात्रा के बहाने पाकिस्तान के आतंकवादी जहां एक मंच पर आ गए वहीं पाकिस्तानी सरकार की उनके साथ संलग्नता साफ नजर आई। अपनी पीठ ठोंकने को गृहमंत्री और उनकी सरकार दोनों प्रसन्न हो सकते हैं, किंतु सही तो यह है कि संभावित अपमान से बचना ही बुद्धिमत्ता होती है।
   हमारे जाने का न कोई मान था, ना ही लौटकर आने से कोई इज्जत बढ़ी है। पाकिस्तान ने कश्मीर को एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने में सफलता हासिल कर ली है, जबकि हम पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान को लेकर अभी भी संकोच से भरे हैं। आखिर वह दिन कब आएगा जब पाकिस्तान को हम उसी के हथियारों से जवाब देना सीखेगें? हम क्यों पाकिस्तान से रिश्ते रखने, सुधारने और संवाद रखने के लिए मरे जा रहे हैं? क्या हम पाकिस्तान के द्वारा निरंतर किए जा रहे पापों को भूल चुके हैं? पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ कश्मीर के सवाल पर, आतंकियों की पर मौत पर अपना दुख जताकर, कश्मीर को भारत में मिल जाने की दुआ कर रहे हैं। ऐसे में हम कौन सा मुंह लेकर उनसे हाथ मिलाने के लिए आतुर हैं। यह न रणनीति है, न कूटनीति और न ही समझदारी। भारत की इस तरह की कोशिशों से कोई लाभ मिलेगा, इसमें भी संदेह है।
    हमारे गृहमंत्री वहां से जिस मुद्रा में लौटे और जो वक्तव्य संसद में दिया, उसके बाद पूरे देश ने एकमत से उनका साथ दिया। संसद में कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों में एक सुर से उनकी उपेक्षा पर पाकिस्तान को खरी-खोटी सुनाई। एक देश के नाते यह एकजुटता, राष्ट्रीय मुद्दों पर एक राय जरूरी भी है। किंतु क्या जरूरी है कि हम अपमान के अवसर स्वंय तलाशें।
   पाकिस्तान से आज हमारे रिश्ते जिस मोड़ पर हैं, वहां गाड़ी पटरी से उतर चुकी है। एक विफल राष्ट्र पाकिस्तान और सेना की कृपा पर आश्रित वहां की सरकार आखिर आतंकवाद के खिलाफ क्या खाकर लड़ेगी? नवाज शरीफ जैसे परजीवी राजनेता को अगर सत्ता में रहना है तो कश्मीर राग और भारत विरोधी सुर अलापना ही होगा। यह समझना मुश्किल है कि भाजपा सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि वह अपमान, आतंक और हत्याएं सहकर भी पाकिस्तान से बेहतर रिश्ते बनाना चाहती है? हम चाहें तो बंगलादेश जैसै छोटे मुल्क से भी कुछ सीख सकते हैं। श्रीलंका से सीख सकते हैं, जिसने लिट्टे के आतंक का शानदार मुकाबला किया और अपनी अस्मिता को आंच नहीं आने दी। आज हालात यह हैं कि युद्ध के लिए हमारी ही जमीन का इस्तेमाल हो रहा है, हमारे अपने लोग ही हलाक हो रहे हैं। भारतीयों के हाथ में बंदूकें और एके-47 देकर पाकिस्तान ने हमारे सीने छलनी कर रखे हैं। कश्मीर की जंग को हम बहुत साधारण तरीके से ले रहे हैं। क्या हमने तय कर रखा है कि हमें अनंतकाल तक लड़ते ही रहना है, या हम इस छद्म युद्ध की कीमत थोड़ा बढ़ाएंगें। पाकिस्तान के लिए इस लड़ाई की कीमत बढाना ही इसका उपाय है। एक विफल राष्ट्र हमें लगातार धोखा दे रहा है और धोखा खाने को अपनी शान समझ बैठे हैं। किसके दम पर? अपने सैनिकों और आम लोगों के दम पर?
       संसद से लेकर आपके सबसे सुरक्षित एयरबेस तक हमले कर वे हमें बता चुके हैं कि पाकिस्तान क्या कर सकता है। किंतु लगता है कि हम इस छद्म युद्ध के आदी हो चुके हैं। हमें इसके साथ रहने में मजा आने लगा है। एक जमाने में जनरल जिया उल हक ने कहा था भारत को एक हजार जगह धाव दो। गिनिए तो यह संख्या भी पूरी हो चुकी है। भारत का पूरा शरीर छलनी है। हमारे सैनिकों की विधवाएं हमारे सामने एक सवाल की तरह हैं। हिंदुस्तान के कुछ लीडरों ने हालात ऐसे कर दिए हैं कि आप बहस भी नहीं कर सकते। अपनी सुरक्षा चिंताओं पर संवाद करना कठिन होता जा रहा है। आप संवाद इसलिए नहीं करते कि मुसलमान नाराज हो जाएंगें। क्या भारत की सुरक्षा चिंता मुसलमानों और हिंदुओं की साझा चिंता नहीं है। क्या भारत के मुसलमान किसी हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसी और जैनी से कम भारतीय हैं? हम सब पहले हिंदुस्तानी हैं, बाद में कुछ और। इस भावना का विस्तार और लोकव्यापीकरण करना होगा। हमारा जीना-मरना इसी देश के लिए है। इसलिए अपने मानस में बदलाव लाते हुए, हर बात का राजनीतिकरण करने के बजाए, एक नए तरीके से सोचना होगा। ईरान जैसे देश ने सऊदी अरब से अपने राजनायिक संबंध तोड़ लिए , क्या मजबूरी है कि हम पाकिस्तान से रिश्ते बनाए हुए हैं। भारत सरकार पाक में पदस्थ राजनायिकों से कह रही है कि अपने बच्चों को पाकिस्तान के स्कूलों में न पढ़ाएं। क्या ही बड़ी बात होती, हम वहां अपने दूतावास बंद कर देते। आतंकी मानसिकता, धोखे व षडयंत्रों से बनी सोच से बने एक देश से हम दर्द के अलावा क्या पा सकते हैं? भारत की वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना मनुष्यों के लिए है, आतंकी सोच से भरी मानवता के दुश्मनों के लिए नहीं। दक्षेस के देशों को भी पता है कि पाकिस्तान की नीति और नीयत क्या है। खुद श्रीलंका ने लिट्टे के साथ क्या किया। हमें भी विश्व जनमत की बहुत परवाह किए बिना, अपने स्टैंड साफ करने होगें। एक व्यापारी देश की तरह मिमियाने के बजाए ताकत के साथ बात करनी होगी। हमारी जमीन आतंकवाद के लिए इस्तेमाल नहीं होगी, पाक को यह बहुत साफ बताना होगा। इसराइल, श्रीलंका और अमरीका हमारे सामने उदाहरण हैं। हमें भी अपनी शक्ति को पहचानना होगा। वाचिक गर्जन-तर्जन के बजाए, मैदान में उतरकर बताना होगा कि हमारे खिलाफ छद्म युद्ध कितना महंगा है। किंतु लगता है कि हम जबानी तलवारें भांजकर ही अपनी राष्ट्ररक्षा का दम भरते रहेगें और इस कायरता की कीमत सारा देश लंबे समय तक चुकाता रहेगा।

(लेखक राजनीतिक विश्वलेषक हैं)

सोमवार, 1 अगस्त 2016

कश्मीर में कुछ करिए

स्पष्ट संदेश दीजिए कि नहीं मिलेगी आजादी
-संजय द्विवेदी

    गनीमत है कि कश्मीर के हालात जिस वक्त बहुत बुरे दौर से गुजर रहे हैं, उस समय भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में नहीं है। कल्पना कीजिए कि इस समय केंद्र और राज्य की सत्ता में कोई अन्य दल होता और भाजपा विपक्ष में होती तो कश्मीर के मुद्दे पर भाजपा और उसके समविचारी संगठन आज क्या कर रहे होते। इस मामले में कांग्रेस नेतृत्व की समझ और संयम दोनों की सराहना करनी पड़ेगी कि एक जिम्मेदार विपक्ष के नाते उन्होंने अभी तक कश्मीर के सवाल पर अपनी राष्ट्रीय और रचनात्मक भूमिका का ही निर्वाह किया है।
  ऐसे कठिन समय में जब कश्मीर की मुख्यमंत्री को एक आतंकी को मारे जाने पर अफसोस और उसकी मौत को शहादत बताने की राजनैतिक नासमझी दिख रही हो, तब यह मानना ही पड़ेगा कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य नहीं है। जिले के जिले कर्फ्यू और अराजकता की गिरफ्त में हैं। वहां के अतिवादियों के निशाने पर सेना और पुलिस के जवान हैं, जिन पर पत्थर बरस रहे हैं। पूरी संसद कश्मीरियों की कश्मीरियत और इंसानियत पर फिदा है, जबकि वे अपनी ही सेना पर पत्थर बरसा रहे हैं, अपने हम वतन पुलिस वालों को पीट रहे हैं। ऐसे कठिन समय में जबकि सेना और पुलिस के 2228 लोग पत्थरों के हमलों में घायल हैं, तब हम उनका विचार न कर उन 317 लोगों के बारे में विलाप कर रहे हैं, जो पेलेट गन से जख्मी हुए हैं। पत्थरों को बरसाने के जिहादी तेवरों का मुकाबला आप कैसे करेगें इस पर सोचने की जरूरत है। लेकिन लगता है कि भारतीय मीडिया और राजनीति का एजेंडा तय करने वाले नान इश्यु को इश्यु बनाने में महारत हासिल कर चुके हैं। इसी हीला-हवाली और ना-नानुर वाली स्थितियों ने कश्मीर को इस अँधेरी सुरंग में भेज दिया है। हमारी सारी सहानुभूति पत्थर फेंकने वाले समूहों के साथ है। जबकि सेना और पुलिसवाले भी हमारे ही हैं। कश्मीर में पेलेट गन से घायल लोगों के अपराध क्या कम हैं? स्कूल-कालेजों से लौटते और मस्जिदों से निकलते समय खासकर जुमे की नमाज के बाद देशविरोधी नारे बाजियां, पाकिस्तान और आईएस के झंडे लहराना तथा सेना व पुलिस की चौकियों पर पथराव एक सामान्य बात है। क्या इस तरह से हम कश्मीर को संभाल पाएंगें? आतंकियों के जनाजे में हजारों की भीड़ एकत्र हो रही है और हम उस आवाम को देशभक्त और इंसानियत पसंद बताकर क्या मजाक बना रहे हैं। अब समय आ गया है कि भारत सरकार इन तथाकथित आजादी के दीवानों को साफ संदेश दे दे। उन्हें साफ बताना होगा कि कश्मीरियों को उतनी ही आजादी मिलेगी जितनी देश के किसी भी नागरिक को है। वह नागरिक उप्र का हो या महाराष्ट्र का या कश्मीर का। उन्हें हर हालत में हिंदुस्तान के साथ रहने का मन बनाना होगा। पाकिस्तानी टुकड़ों पर पलने वालों को यह साफ बताना होगा कि उन्हें ऐसी आजादी किसी कीमत पर नहीं मिल सकती, जिसके वे सपने देख रहे हैं, कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। इन पत्थरों और नारों से भारत की सरकार को दबाने और ब्लैकमेल करने की कोशिशें बंद होनी चाहिए। दूसरी बात कहनी चाहिए कि जब तक पूर्ण शांति नहीं होगी, कश्मीरी पंडित अपने घरों या नई कालोनियों में नहीं लौटते तब तक न तो सेना हटेगी, ना ही सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम को हटाया जाएगा। सरकारों की लीपापोती करने की आदतों और साफ भाषा में संवाद न करने से कश्मीर संकट और गहरा ही हो रहा है।
      भारत सरकार की सारी विकास योजनाएं और सारी धनराशि खर्च करने के बाद भी वहां शांति नहीं आ सकती, क्योंकि वहां के कुछ लोगों के मन में एक पापी सपना पल रहा है और उस सपने को तोड़ना जरूरी है। कश्मीर के अतिवादियों की ताकत दरअसल पाकिस्तान है। भारत की सरकार पाकिस्तान से हर तरह का संवाद बनाए रखकर संकट को और गहरा कर रही है। पाकिस्तान को आइसोलेट किए बिना कश्मीर में शांति नहीं आ सकती यह सब जानते हैं। कश्मीर के अतिवादी नेताओं के दुष्प्रचार के विरूद्ध हमें भी उनका सच सामने लाना चाहिए कि वे किस तरह कश्मीर के नाम पर पैसे बना रहे हैं और आम कश्मीरी युवकों का इस्तेमाल कर अपनी राजनीति चमका रहे हैं। इन्हीं अतिवादियों के बेटे-बेटियां और संबंधी विदेशों और भारत के बड़े शहरों में आला जिंदगी बसर कर रहे हैं और आम कश्मीरी अपना धंधा खराब कर पत्थर फेंकने और आतंकियों के जनाजों में शामिल होकर खुद को धन्य मान रहा है। ये अतिवादी अपनी लंबी हड़तालों से किस तरह कश्मीर की अर्थव्यवस्था को नष्ट करके वहां के सामान्य नागरिक के जीवन को नरक बना रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। वहां के युवाओं को अच्छी राह दिखाने, पढकर अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के बजाए एक ऐसी सुरंग में धकेल रहे हैं जहां से लौटना मुश्किल है।

  भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को बेहतर बनाने का यह समय नहीं हैं जबकि पूरा पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान आतंकियों और अतिवादियों की गोद में जा बैठा है। पाकिस्तान से अपने रिश्तों पर हमें पुर्नविचार करना होगा। यह ठीक बात है कि हम अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते पर पड़ोसी से रिश्ते रखने या न रखने की आजादी तो हमें मिलनी चाहिए। तमाम राजनीति-कूटनीतिक पहलकदमियां करके भारत देख चुका है कि पाकिस्तान फिर लौटकर वहीं आ जाता है। भारतद्वेष और भारत से घृणा उसके डीएनए में है। जाहिर तौर पर पाकिस्तान से दोस्ती का राग अलापने वाले इस पाकिस्तान को नहीं पहचानते। भारत के प्रति घृणा ही पाकिस्तान को एक किए हुए है। भारत के प्रति विद्वेष खत्म होते ही पाकिस्तान टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। इसलिए भारत घृणा वह विचार बीज है, जिसने अंतर्विरोधों से घिरे पाकिस्तान को जोड़ रखा है। कश्मीर उसका दूसरा दर्द है। इसके साथ ही विश्व स्तर पर चल रहा इस्लामी आतंकवाद और जेहाद ने इसमें जगह बना ली है। कश्मीर आज उसकी प्रयोगशाला है। कश्मीर में हम हारे तो हारते ही जाएंगें। इसलिए कश्मीर में चल रहे इस अघोषित युद्ध को हमें जीतना है, किसी भी कीमत पर। लेकिन हम देखते हैं कि चीजें लौटकर वहीं आ जाती हैं। कभी पाकिस्तान से रिश्तों को लेकर तत्कालीन कांग्रेस सरकार को वर्तमान प्रधानमंत्री पाकिस्तान को लव लेटर लिखने की झिड़कियां दिया करते थे। आज की विदेश मंत्री एक सर के बदले दस सिर की बात करती थीं। सारा कुछ वही मंजर है, देश चिंतित है क्या इस बार आप कश्मीर पर देशवासियों से मन की बात करेंगें। एक साफ संदेश देशवासियों और कश्मीर को देंगें कि यह देश अब और सहने को तैयार नहीं हैं। न तो पत्थर, न गोलियां और ना ही आजादी के नारे।

शनिवार, 16 जुलाई 2016

क्या संभव हैं एक साथ लोस-विस चुनाव ?

-संजय द्विवेदी
  देश में इस वक्त यह बहस तेज है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं। देखने और सुनने में यह विचार बहुत सराहनीय है और ऐसा संभव हो पाए तो सोने में सुहागा ही होगा।
   भारतीय लोकतंत्र दुनिया का विशालतम लोकतंत्र है और समय के साथ परिपक्व भी हुआ है। बावजूद इसके चुनाव सुधारों की तरफ हम बहुत तेजी से नहीं चल पा रहे हैं। चुनाव आयोग जैसी बड़ी और मजबूत संस्था की उपस्थिति के बाद भी चुनाव में धनबल का प्रभाव कम होने के बजाए बढ़ता ही जा रहा है। यह धनबल हमारे प्रजातंत्र के सामने सबसे बड़ा संकट है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ हों इसे लेकर जो विमर्श प्रारंभ हुआ है, वह कई मायनों में बहुत महत्व का है। इसके चलते देश में विकास की गति बढ़ने की संभावनाएं भी जताई जा रही है। चुनाव आचार संहिता के चलते बाधित विकास के काम, एक बार ही रूकेंगें और देश की गाड़ी तेजी से चल पड़ेगी। इसके साथ ही वर्ष भर पूरे देश में कहीं न कहीं चुनाव होने के कारण सरकारों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। राजनीतिक दल राज्यों के चुनावों के चलते तमाम फैसलों को टालते हैं या लोक-लुभावन फैसले लेते हैं। इससे सुशासन का स्वप्न धरा रह जाता है। सरकारें लोकप्रियतावाद में फंसकर रह जाती हैं और राजनेता चुनावी मोड  से वापस नहीं आ पाते। भारतीय राजनीति के लिए यह एक गहरा संकट और चुनौती दोनों है।
  यह अच्छी बात है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने के सवाल पर सरकार और चुनाव आयोग तो साथ हैं ही, देश के अनेक राजनीतिक दल इससे सहमत हैं। एक साथ चुनाव कराने की मूल भावना को दल और चुनाव आयोग दोनों समझ रहे हैं। लगातार चुनावों के चलते भारत जैसे देश में हमेशा चुनावी माहौल बना रहता है। हमारे देश में लोकसभा से लेकर पंचायतों तक के चुनाव होते हैं और सब उत्सव सरीखे ही हैं। इन्हें ही लोकतंत्र का पर्व कहा जाता है। इसमें हर चुनाव के चलते आचार संहिता लगती है और विकास के काम रूक जाते हैं। इसके साथ ही सरकार और चुनाव आयोग को चुनाव कराने में भारी धन खर्च करना पड़ता है। इतना ही नहीं राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को भी अरबों-रूपये खर्च करने पड़ते हैं। बार-बार चुनाव समाज जीवन और राजनीतिक जीवन में कड़वाहट और रस्साकसी का वातावरण बनाए रखता है। वाद-विवाद की स्थितियां बनी रहती हैं। कुल मिलाकर चुनाव के ये दिन हर तरह की अस्थिरता के दिन होते हैं। आजादी के बाद 1952, 57,62 और 67 तक लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ होते रहे। उसके बाद हालात बदले और अलग-अलग चुनावों का सिलसिला ऐसा बना कि आज देश में वर्ष भर चुनाव होते रहते हैं।
  जहां तक साथ-साथ चुनाव कराने की बात है तो इस बारे में मंच से चिताएं तो व्यक्त की जा रही हैं किंतु कोई ठोस काम नहीं हो सका। देश आज विकास की नई चुनौतियों के समक्ष खड़ा है, जब उसे वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति को साबित करना है। ऐसे में बिगड़ी गाड़ी को पुनः ट्रेक पर लाने की जरूरत है। लंबे समय बाद फिर इस बार बात शुरू हुयी है। यह फैसला निश्चय ही एक बड़ा निर्णय होगा जो हमारे राजनीतिक-सामाजिक परिवेश को भी प्रभावित करेगा। माना जा रहा है कि राजनीतिक दल बढ़ते चुनाव खर्च और चुनाव की अन्य समस्याओं से जूझते रहते हैं, इसलिए उनको भी यह मार्ग उचित दिख रहा है। समय-समय पर चुनाव सुधारों को लेकर जब भी बातें चलती हैं तो यह मुद्दा केंद्र में आता ही है। देश की राजनीतिक पार्टियां अगर एकमत होकर इस बात पर सहमत हो जाती हैं तो यह एक बड़ी छलांग होगी। इससे न सिर्फ हमारे राजनीतिक परिवेश में कुछ मात्रा में शुचिता बढ़ेगी बल्कि लोकतंत्र भी मजबूत होगा। देश की सामूहिक शक्ति का प्रकटीकरण होगा और राजनीतिक दलों में राष्ट्रीय सोच का विकास होगा। राज्यों में अलग और केंद्र में अलग व्यवहार करने की प्रवृत्ति भी कम होगी। देश में यह व्यवस्था कई मायनों में हमारे लोकतंत्र को ज्यादा व्यवहारिक बनाएगी। आम जनता के राजनीतिक प्रबोधन का संकल्प भी एक स्तर पर जा पहुंचेगा। ये चुनाव दरअसल एक राष्ट्रीय चुनाव बन जाएंगें, जहां देश अपनी संपूर्णता और समग्रता में व्यक्त हो रहा होगा।
   इस व्यवस्था को लागू होने से हमारे सामने कुछ यक्ष प्रश्न भी होंगें जिनके उत्तर हमें तलाशने होगें। अनेक राज्यों में सरकारें अपना कार्यकाल कई कारणों से पूरा नहीं कर पाती, तो वहां के लिए क्या व्यवस्था होगी। कई बार कुछ राज्यों में मुख्यमंत्री चुनाव की छः माह पूर्व ही सिफारिश कर देते हैं। केंद्र सरकार भी पहले चुनाव में जाने का मन बना सकती है। ऐसी संवैधानिक व्यवस्थाओं के हल भी हमें खोजने होगें। एक आदर्श विचार को जमीन पर उतारने से पहले हमें अपनी व्यवस्था के सामने खड़े ऐसे प्रश्नों पर भी विचार करना होगा। किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने या सरकार गिर जाने की स्थिति में क्या चुनाव पूर्व में होगें या इंतजार करना होगा। हमें यह भी देखना होगा कि राज्यों में एक लोकप्रिय सरकार से जनता को लंबे समय तक वंचित नहीं रखा जा सकता।

   चुनाव सुधारों पर काम करने वाले विद्वानों को चुनाव सुधार और विधानसभाओं की अवधि से जुड़े ऐसे सभी सवालों पर काम करने की जरूरत है। लोकसभा चुनावों में अभी तीन साल शेष हैं, यह प्रयोग और इसकी तैयारी में अभी से जुटा जा सकता है। इस प्रयोग के करने के बाद उठने वाले सवालों के ठोस और वाजिब हल भी तलाशे जा सकते हैं। राजनीति के मैदान में सक्रिय खिलाड़ियों के अलावा राजनीति विज्ञान, समाज शास्त्र, चुनाव सुधार, प्रशासन और सुशासन में रूचि रखने वाले अध्येता इस मामले पर विमर्श प्रारंभ कर सकते हैं। पांच दशक बाद ही सही इस दिशा में सोच और अध्ययन से हम भारतीय लोकतंत्र को पुनः एक नई ऊर्जा से भर सकते हैं। सारा देश जब समवेत स्वर और समवेत आकांक्षाओं से अपनी-अपनी राज्य और केंद्र की सरकारों को चुन रहा होगा तब हम इस अवसर को वास्तव में लोकतंत्र का महापर्व कह पाएंगें।

विश्व मंच पर भारत का परचम

प्रधानमंत्री के दौरों से दुनिया में बनी एक अलग पहचान
-संजय द्विवेदी
  विश्व मंच पर भारत की इतनी प्रभावी उपस्थिति शायद पहले कभी नहीं थी। दुनिया के तमाम देश भारत के इस उभार को देख रहे हैं, तो कुछ परंपरागत प्रतिद्वंदी देश भारी दुख और पीड़ा से भर गए हैं। अपनी निरंतर विदेश यात्राओं से नरेंद्र मोदी ने जो हासिल किया है, दुनिया के तमाम राजनेता उसके लिए तरसते हैं। दुनिया के राष्ट्रध्यक्षों से दोस्ताना ऐसा कि सामान्य कूटनीतिक प्रोटोकाल अक्सर टूटते हुए दिखते हैं। यह बड़ी और महत्वपूर्ण बात इसलिए है क्योंकि नरेंद्र मोदी सिर्फ दो साल पहले तक एक राज्य के मुख्यमंत्री थे और वैश्विक राजनीति का उनका अनुभव बहुत नया है। वे न तो केंद्र कभी मंत्री रहे न ही कूटनीति के क्षेत्र के विद्यार्थी। दिल्ली में आकर जिस तरह उन्होंने वैश्चिक राजनेता सरीखी छवि बनाई है, वह किसी को भी प्रेरित कर सकती है। उनकी राजनीतिक यात्रा में यह बेहद महत्वपूर्ण दिन हैं, जब उन्हें दुनिया की सबसे ताकतवर शक्तियां सलाम कर रही हैं और राष्ट्राध्यक्ष उनके लिए प्रोटोकाल को धता बता रहे हैं।
   यह एक संयोग ही है कि विदेश नीति भारतीय प्रधानमंत्रियों का एक पसंदीदा क्षेत्र रहा है। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी और अटलबिहारी वाजपेयी तक हम इस धारा को देखते हैं। इंद्रकुमार गुजराल और डा. मनमोहन सिंह तो वैश्विक अनुभवों वाले राजनेता रहे ही हैं। इस सूची में नरेंद्र मोदी का प्रवेश सर्वथा नया किंतु विस्मयकारी है। वे भारत और भारतीय जन को संबोधित करने वाले नेता रहे हैं। उनकी देहभाषा और उनकी जीवन यात्रा भारत के उत्थान और उसके जनमानस को स्पंदित करती रही है। उनकी वाणी उनके साथ है तो गुजरात में मुख्यमंत्री के नाते किए गए काम एक उदाहरण। लेकिन दिल्ली आकर जिस तरह वैश्चिक मंच पर उन्होंने धूम मचाई वह एक लंबी तैयारी के बाद ही संभव है।
   एक तरफ जहां वे गुजरात के मुख्यमंत्री के नाते अमरीकी वीजा से वंचित थे, वहीं अमरीका में सांसदों के बीच वे अति गरिमामय तरीके से सम्मानित होते नजर आए। यह साधारण नहीं है कि उन्होंने बराक ओबामा के साथ कम समय में जैसा रिश्ता विकसित किया है, उसने वर्षों की दूरियां महीनों में पाट दी हैं। अप्रैल,2016 में जब ह्वाइट हाउस में ओबामा ने दुनिया के पचास से अधिक राष्ट्राध्यक्षों को डिनर दिया तो नरेंद्र मोदी को ओबामा के बगल वाली सीट दी गयी। हालांकि ओबामा डा. मनमोहन सिंह का भी बहुत आदर करते थे, किंतु रिश्चों में जो गर्मजोशी मोदी के साथ दिखती है, वह दुर्लभ है। अब जबकि ओबामा अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में हैं तो वे जो विरासत छोड़कर जाएंगे, उस पर भारत और अमरीका अपना नया भविष्य गढ़ रहे होगें। पिछले दिनों पांच देशों की यात्रा से लौटे प्रधानमंत्री की यात्रा की जैसी व्याख्याएं पाकिस्तान और चीन के मीडिया में हुयी हैं, वे बताती हैं कि हालात बदल चुके हैं। कूटनीति के मोर्चे पर भारत आज एक लंबी छलांग लगा चुका है और उसकी पीड़ा उसके परंपरागत प्रतिद्वंदियों के हाव-भाव और प्रतिक्रियाओं से प्रकट हो रही है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स की टिप्पणियां बताती हैं कि चीन इस यात्रा को किस नजर से देखता है। मोदी के इस प्रवास को चीन और पाकिस्तान दोनों ही एक प्रकार की खेमेबंदी मान रहे हैं, जो उनके खिलाफ है। शायद इसीलिए चीनी अखबार ने कहा कि चीन का रास्ता रोककर भारत के सपने पूरे नहीं होगें। जाहिर तौर पर यह बौखलाहट है और चीन का दर्द भी। पाकिस्तान भी इसी प्रकार की जलन और कुंठा का शिकार है। उनके टीवी पर तो पाकिस्तान की सरकार को कोसने वाले लोग छाए हुए हैं। वे अपनी ही सरकार की चुन-चुन कर गलतियां बता रहे हैं और कोस रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के दो वर्षों में 38 देशों की यात्राएं कर चुके मोदी जिस भरोसे और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं, वह बात महत्व की है। वे भारतीय समुदाय के लोगों को दुनिया भर में अपने भरोसे से जोड़ रहे हैं, जो आज एक बड़ी ताकत बन चुके हैं। दुनिया सब देशों के राजनीतिक-सामाजिक- आर्थिक जीवन में भारतीयों की एक बड़ी उपस्थिति है। ईरान से लेकर ब्रिटेन और अमरीका सब मोदी की नजर में हैं। अफगानिस्तान से रिश्तों को उन्होंने एक तरह से फिर पटरी पर ला दिया है। उनकी यह वैश्विक उपस्थिति साधारण नहीं हैं।
   उनका आत्मविश्वास, उनकी भाषण कला ने उनके विरोधियों को भी मोदी का मुरीद बनाती है। यह बात सही है कि एनएसजी में भारत की राह आसान नहीं है किंतु मोदी ने जिस तरह भारत का पक्ष और भारत का व्यक्तित्व दुनिया के सामने रखा है, उसे आजतक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन ही कहा जाएगा। आप इस बात पर उनका आनंद ले सकते हैं कि वे ज्यादातर विदेशों में रहते हैं, लेकिन उनकी दिनचर्चा और सक्रियता देखकर क्या यह दावे से कह सकते हैं कि उन्होंने एक पल भी व्यर्थ गंवाया है। वे समय को साधने और भारतीय जन में आत्मविश्वास भरने वाले राजनेता  के रूप में उभरे हैं। देश की आंतरिक राजनीति और उसके मुद्दों से मोदी की इस कवायद को मापा नहीं जा सकता। ये भारत के कल को बनाने वाली यात्राएं हैं, जिनके सुफल आने शीध्र ही प्रारंभ हो जाएंगे।

   अनेक समस्याओं, संकटों और गरीबी जैसे हजारों दुखों से घिरे देश भारत के पास, उसके नेता के पास रास्ता क्या है? क्या वह इन दुखों पर विलाप करता बैठा रहे या वह उपलब्ध शक्ति और संसाधनों का अधिकतम उपयोग करता हुआ कर्मरत रहे? जाहिर तौर पर मोदी अपने संकटों में उलझने के बजाए संभावनाओं में निवेश कर रहे हैं। वे विलाप के बजाए समाधानों पर ध्यान दे रहे हैं। मंदी की शिकार विश्व व्यवस्था में भारतीय जन के जीवन स्तर को उठाने के लिए, उनके जीवन को वैभव से भरने के लिए प्रयास कर रहे हैं। मोदी की ये कोशिशें देश के अंदर और बाहर दोनों उनकी जिजीविषा को प्रकट करती हैं। वे सही कर रहे हैं या गलत इसका आकलन करना हो, तो पिछले दिनों के पाकिस्तान और चीन के अखबारों को पढ़ लीजिए।