सोमवार, 13 अप्रैल 2015
अखबारों की क्लिपिंग्स
प्रो.संजय द्विवेदी,
पत्रकार एवं लेखक
ब्लाग में व्यक्त विचार निजी हैं। इसका किसी संगठन अथवा मेरे व्यवसाय से संबंध नहीं है।
शनिवार, 11 अप्रैल 2015
कश्मीरी पंडितों की वापसी से कौन डरता है ?
-संजय द्विवेदी
कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने को लेकर अलगाववादी संगठनों
की जैसी प्रतिक्रियाएं हुयी हैं, वे बहुत स्वाभाविक हैं। यह बात साबित करती है कि
कश्मीर घाटी में जो कुछ हुआ, उसमें इन अलगाववादियों की भूमिका और समर्थन रहा है।
कश्मीर पंडितों की कालोनी बनाने की बात पर उन्हें ‘यहूदी’ शब्द से संबोधित
करना कितना खतरनाक है। यह वहां पल रही घातक मानसिकता और विचारधारा दोनों का
प्रगटीकरण है। कश्मीरी पंडित एक पीड़ित पक्ष हैं, जबकि इजराइल के यहूदी एक ताकतवर
समूह हैं। उनसे कश्मीरी पंडितों की तुलना अन्याय ही है। इतने अत्याचार और दमन के
बावजूद पंडितों ने अब तक अपनी लड़ाई कानूनी और अहिंसक तरीके से ही लड़ी है। वे
हथियार उठाने और कत्लेआम करने वाले लोग नहीं है। पाकप्रेरित अलगाववादी संगठन घाटी
को हिंदुमुक्त करने के नापाक इरादे में कामयाब हुए तो उन्हें यह लगा कि कश्मीर अब
अलग हो जाएगा। किंतु हिंदुस्तान के लोग, कश्मीर के लोग इस हिस्से को भारत का मुकुट
मानते हैं। उनके सुख-दुख में साथ खड़े होते हैं, समान संवेदना का अनुभव करते हैं।
कुछ मुट्ठी भर लोग इस सांझी विरासत से भरोसा उठाना चाहते हैं।उन्हें बार-बार
विफलता हाथ लगी है और आगे भी लगेगी। क्या कश्मीरी अलगाववादी यह कहना चाहते हैं कि
जहां मुसलमान बहुसंख्यक होंगे वहां दूसरे पंथ के लोग नहीं रह सकते?
पाकिस्तान के
द्विराष्ट्रवाद पर तमाचाः
कश्मीर दरअसल पाकिस्तान के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर एक तमाचा है। किसी
राज्य में बहुसंख्यक मुस्लिम जनता और भारत का शासन यह पाकिस्तान से बर्दाश्त नहीं
होता। हम साथ मिलकर रह रहे हैं, रह सकते हैं, यही पाकिस्तान की पीड़ा है। कश्मीर
भारत का सांस्कृतिक परंपरा का अविछिन्न अंग है। हमारे तीर्थ, पर्व, मंदिर, देवस्थल
सब यहां हैं। अमरनाथ और वैष्णो देवी से लेकर शंकराचार्य के मंदिर यही कथा कहते
हैं। यह क्षेत्र ऋषियों-मुनियों की तपस्यास्थली रहा है। लेकिन अलगाववादियों के
अपने तर्क हैं। उन्होंने बंदूकों, अपहरणों, दुराचारों, लूट और आतंक के आधार पर इस
इलाके को नरक बनाने की कोशिशें कीं। किंतु हाथ क्या लगा? आज भी वहां एक चुनी
हुयी सरकार है, जिसमें भारत का एक राष्ट्रवादी दल हिस्सेदार है। यह साधारण नहीं है
कि घाटी में भाजपा को वोट नहीं मिले, यह गहरे विभाजन का संकेत है। यह बात बताती है
कि एक खास इलाके में किस तरह से लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा से काटकर देश के
खिलाफ खड़ा कर दिया गया है। इस मानसिकता को पालने-पोसने और विकसित करने के जतन
निरंतर हो रहे हैं। भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियां चलाने वालों को समर्थन देने
वाले तत्व आज भी घाटी में मौजूद हैं। भारतीय सेना पर पत्थर फेंकना इसी मानसिकता का
परिचायक है। ऐसे असुरक्षित वातावरण में जहां पुलिस और सेना के लोग पत्थर खा रहे
हों, मार दिए जाते हैं वहां मुट्ठी भर कश्मीरी पंडित किस भरोसे और विश्वास पर
बसेंगें ? निश्चय
ही यह अलगाववादियों की पीड़ा है कि उन्होंने कितने जतन और षडयंत्रों से कश्मीरी
पंडितों को यहां से भगाया और वे फिर यहां बस जाएंगें। ये वही लोग हैं जो भारत से
आजादी चाहते हैं और पाकिस्तानी हुक्मरानों के तलवे चाटते हैं।
अब
शुरू कीजिए पाक अधिकृत कश्मीर की मांगः
कश्मीर की आजादी का सवाल उठाने वाले लोग अब यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि
उनकी हसरत पूरी नहीं हो सकती। भारत के लोग कभी यह होने नहीं देंगे। राजनीतिक
पहलकदमी से परे हिंसक आंदोलन चलाने वाली ये ताकतें भारत के खिलाफ कश्मीरी मानस में
जहर भरने का काम निरंतर कर रही हैं। भारत सरकार भी इनके प्रति नरम रवैया अख्तियार
करती रही है। जाने किस कूटनीति के चलते भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर के बारे में बात
करनी बंद कर रखी है। जबकि भारत की सरकार को प्रखरता से आजाद कश्मीर (पाक अधिकृत
कश्मीर) के बारे में बात करनी चाहिए। कश्मीर घाटी ही नहीं हमें पूरा कश्मीर चाहिए
यही इस संकट का वास्तविक समाधान है। राजा हरि सिंह के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर
के बाद हुयी राजनीतिक गफलतों ने ही कश्मीर के हालात बिगाड़े हैं। घाटी की
हिंदू-सिख आबादी के साथ जो कुछ हुआ उसके भी दोषियों को दंडित करने और उन पर मुकदमे
चलाने की जरूरत है। कश्मीरी पंडितों पर जो अत्याचार हुआ, उसके दोषी आज भी मजे से
घूम रहे हैं। 2012 के दंगों पर एक गुजरात की सरकार के पीछे पड़े लोग, क्या
कश्मीरियों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ बोलेगें? गुजरात दंगों पर तो
सैंकड़ों को जेल और सजा हो चुकी है। क्या कश्मीर घाटी के गुनहगारों पर भी हमारी
सरकारों की नजर जाएगी? अपराध-अपराध है उसे चयनित आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। मलियाना के
गुनहगारों के लिए सारे मीडिया में स्यापा है। लेकिन कश्मीर में जो हुआ उसे पूरी
इंसानियत शर्मिंदा है। सरकार को चाहिए कि ऐसे मानवता विरोधी आतंकियों की पड़ताल कर
उनके खिलाफ,उनके मददगारों के खिलाफ मामले खोले और नए सिरे से कार्रवाई प्रारंभ
करे। जिन कश्मीरी पंडितों के घरों पर कब्जे करके लोग बैठे हैं, उनके कब्जे हटाए
जाएं। भारत की आजादी के बाद शायद ये सबसे बड़ा विस्थापन था, जिसमें 65 हजार
कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ना पड़ा। भारत औऱ राज्य की सरकार की यह जिम्मेदारी
है वे गुनहगारों को कतई माफ न करें।
यहां सिर्फ सेना ही
है भारत के साथः
आज चारो तरफ से एक ही आवाज आती है कि घाटी से सेना से हटाओ। सवाल यह उठता
है कि क्या सेना को हटाने से कश्मीर में आया अमन-चैन रह पाएगा? क्या इस हिस्से में
पुनः आतंकी शक्तियां हावी नहीं हो जाएगीं? लोकतंत्र के मायने मनमानी नहीं होती।
किंतु कश्मीरी अलगाववादियों ने इस राज्य को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अहमद शाह
गिलानी की लंबी हड़तालों, प्रदर्शनों ने राज्य की अर्थव्यवस्था को तो चौपट किया ही
है लोगों को जान-माल के खतरे भी दिए। ऐसे नेताओं से लोग अब ऊब चुके हैं। गिलानी भी
अब बूढ़े हो चुके हैं और कश्मीर को भारत से अलग करने का उनका सपना अब तो पूरा होने
से रहा। एक चुनी हुयी सरकार अब कश्मीर में है। जरूरत इस बात की है कश्मीर को विकास
के मोर्चे पर आगे लाकर खड़ा किया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी निरंतर
कश्मीर के सवाल को अपनी प्राथमिकता में रखा है। तमाम आलोचनाओं और राजनीतिक
मजबूरियों के बावजूद इस राज्य में मुफ्ती सरकार के साथ गठजोड़ किया। यह संकेत
बताते हैं कि भारत सरकार इस राज्य के विकास में रोड़े अटकाना नहीं चाहती। किंतु इस
पूरे खेल में सिर्फ लेना ही नहीं चलेगा। यह संभव नहीं कि भारत की सरकार आपके हर
दर्द में साथ खड़ी हो और आप पाकिस्तान के झंडे लहराएं। कश्मीर के अलगाववादी तत्वों
के साफ संदेश देने की जरूरत है कि वे आतंक, हिंसा, खून-खराबे, पत्थर फेंकने जैसे
सारे हथियार आजमा चुके हैं अब उन्हें चाहिए कि वे लोकतंत्र की खुली हवा में लोगों
को सांस लेने दें। ऐसे हालात बनाएं कि सेना बैरकों में जा सके। इसके पहले उन्हें
यह भरोसा देना होगा कि घाटी में सेना के अलावा अब तथाकथित अलगाववादी भी भारत के
प्रति प्रेम रखते हैं। हालात यह हैं कि घाटी में आज भी भारत विरोधी और पाक समर्थक
आवाजें गूंज रही हैं। ऐसे समय. में कश्मीरी पंडितों की वापसी का विरोध करके
अलगाववादियों ने अपना असली चेहरा दिखा दिया है। हालांकि श्राइन बोर्ड के जमीन देने
के सवाल पर ऐसे ही प्रपंची स्वर सामने आ चुके थे। यह समझना मुश्किल नहीं है कश्मीर
का असल संकट घाटी के मुट्ठी पर अलगाववादी हैं, जो पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं
के इशारे पर नाचते रहते हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ये अलगाववादी कश्मीर की
आवाज नहीं हैं। कश्मीर की जनता ने फैसला कर दिया है, एक लोकप्रिय सरकार वहां बनी
है, उसे काम करने दें। अगर शौक है तो अगले चुनाव में उतरकर अपनी हैसियत आजमा लें।
लोकतंत्र में यही एकमात्र विकल्प है। बंदूकों के साए में आजादी-आजादी की रट लगाने
से क्या हासिल है इसे वे अच्छी तरह जानते हैं।
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सोमवार, 6 अप्रैल 2015
भाजपाः वाणी को कर्म में बदलने की चुनौती
-संजय
द्विवेदी
भारतीय
जनता पार्टी की बेंगलूरू कार्यकारिणी के संदेश आखिर क्या हैं? क्या पार्टी नई
चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार है? बदलते देश की बड़ी उम्मीदों पर सवार भाजपा सरकार
के लिए वास्तव में कुछ कर दिखाने का समय है। उसके सामने उसके चतुर सुजान
प्रतिद्वंदी दल और वैचारिक विरोधी जिस तरह एकजुट होकर उस पर हमले बोल रहे हैं, उसे
देखते हुए भाजपा को संभलकर चलना चाहिए। भाजपा को सांप्रदायिक, कारपोरेट समर्थक और
किसान विरोधी साबित करने के तीन आरोप इस वक्त विपक्ष के हाथ में हैं। इसलिए भाजपा
को इन आरोपों की काट तैयार रखनी चाहिए। अपने वाणी और कर्म से भाजपा सरकार को ऐसा
कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे पार्टी की छवि पर दाग लगे। भाजपा ने जबसे सत्ता संभाली
है, साधारण लूटपाट की घटनाओं को भी सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशें जारी हैं।
चर्च में लूट की घटनाओं को हमले बताकर आखिर देश का मीडिया और राजनीतिक समूह कैसा
माहौल बनाना चाहते हैं? इस बीच एक जज और पुलिस के एक सेवानिवृत्त आफिसर ने जो सवाल उठाए हैं,
वह कहीं न कहीं भाजपा सरकार में सांप्रदायिक आधार के सोच को लक्ष्य कर ही उठाए गए
हैं। कहा नहीं जा सकता कि ये बातें साजिशन हैं या सहज, किंतु इसे भाजपा सरकार
के बारे में राय बिगाड़ने का प्रयास तो माना ही जा सकता है।
भारत जैसे देश में जहां भारतीयता ही सबसे लांछित
किया जाने वाला विचार है वहां भाजपा जैसे दलों का संकट बढ़ जाता है। भाजपा की
सरकारों का नेतृत्व जब बेहतर परिणाम देता है, तो उसे भाजपा का नहीं व्यक्ति का
व्यक्तिगत गुण बता दिया जाता है। जैसे इस देश को गठबंधन का सर्वसरोकारी नेतृत्व
देने वाले अटलबिहारी वाजपेयी को आज भी संघ परिवार और भाजपा की उपलब्धि नहीं बल्कि
उनके व्यक्तिगत गुणों के नाते व्याख्यायित और विश्वेषित किया जाता है। जबकि सत्य
तो यह है कि डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, पं.दीनदयाल उपाध्याय, अटलबिहारी वाजपेयी,
लालकृष्ण आडवानी से लेकर नरेंद्र मोदी तक भाजपा का नेतृत्व सरोकारी और भारतीयता की
उदात्त परंपरा का ही वाहक रहा है। लेकिन आप देखें तो भाजपा नेतृत्व को हर समय में
लांछित करने की कोशिशें हुयीं, जबकि इन नेताओं ने जो सवाल उठाए, वे किसी पंथ के
विरूद्ध न होकर भारतीयता और राष्ट्रवाद के पक्ष में थे।
कश्मीर के सवाल पर डा.श्यामाप्रसाद
मुखर्जी का संघर्ष हो, गांव-गरीबों-किसानों के उत्थान के लिए दीनदयाल जी के संघर्ष
हों या उनका अंत्योदय का विचार हो। दीनदयाल जी द्वारा प्रवर्तित ‘एकात्म मानववाद’ भी कोई पांथिक
अवरधारणा नहीं है, दीनदयाल जी ने तो एकात्म मानववाद की व्याख्या करते हुए अपने चार
मूल भाषणों में हिंदू शब्द पद का ही उपयोग नहीं किया है। यह विचार तो विश्व मानवता
को सुखी करने वाला विचार है। किंतु एकात्म मानववाद को भी पढ़े बिना उसका विरोध
जारी रहा। अटल जी और आडवानी जी ने जब छद्मधर्मनिरपेक्षता के विचार का विरोध किया,
370 पर आपत्तियां कीं, समान नागरिक संहिता की बात की तो इसे सांप्रदायिक विचार कहा
गया। जाहिर तौर पर विरोध के लिए विरोध की राजनीति इन वर्षों में फलती-फूलती रही
है। इसी तरह श्री नरेंद्र मोदी ने तो विकास और सुशासन के सवालों पर ही देश की
राजनीति को संबोधित किया और लोगों का समर्थन जुटाया। उन्होंने किसी सांप्रदायिक
प्रश्न को अपने पूरे चुनाव अभियान का हिस्सा नहीं बनाया। किंतु आज उनकी सरकार को
घेरने के लिए उनके वैचारिक विरोधी लगे हुए हैं। सत्य को तोड़-मरोड़ पेश करना और
दुष्प्रचार इनकी नीति बन गयी है। यह बात देश के राजनीतिक परिवेश को गंदला कर रही
है। आखिर भारतीयता के सवाल उठाना, उन पर विमर्श खड़ा करना कहां से
सांप्रदायिक विचार है? हर देश की एक मूलधारा होती है, एक सांस्कृतिक धारा होती है। वही उस देश
की मुख्यधारा का नेतृत्व करती है, यही उसकी पहचान होती है। भारत के ज्ञान- विज्ञान
को तिरस्कृत करने, उसके राष्ट्रगीत को गाने न गाने की छूट चाहने वाली मानसिकता
आखिर कहां से उपजती है? भारत में कुछ भाजपा सरकारों ने योग को स्वास्थ्य की दृष्टि से
पाठ्यक्रमों में शामिल करने का प्रयास किया तो उसे भी सांप्रदायिक और दकियानूसी
विचार माना गया। जबकि अमरीका की एक अदालत ने यह आदेश दिया है कि “योग एक ज्ञान है और
उसका हिंदुत्व से कोई लेना-देना नहीं है।” योग, सूर्य नमस्कार, आयुर्वेद,
वंदेमातरम्, संस्कृत,ज्योतिष और संस्कृति के सारे प्रतीक सांप्रदायिक खाने में
जोड़ दिए जाते हैं। यह वास्तव में एक इस देश के पारंपरिक ज्ञान, कौशल और मेघा का
ही तिरस्कार है। यह स्थापित करने कोशिश होती है कि जैसे भारत 1947 में ही पैदा हुआ
राष्ट्र है। इसके पूर्व की इसकी परंपराएं, ज्ञान, स्व -बोध सब व्यर्थ है।
यह बात बताती है कि देश ऐसे नहीं चल सकता।
भारतीय जनता पार्टी इस भारतीय परंपरा और ज्ञानधारा का वाहक होने का दावा
करती है, तो उसे
बहुत संयम और साहस के साथ चलना होगा। उसे नैतिकता की बात करनी ही नहीं होगी, बल्कि उसे इसे
स्थापित करना होगा। चरित्र और सार्वजनिक जीवन में आ रही गिरावट के खिलाफ खुद से
पहल करनी होगी। यह हालात चिंतित करने वाले हैं कि बीड़ी और सिगरेट पीने के पक्ष
में भाजपा के तीन सांसद मैदान में कूद पड़े। यह बेहतर है कि पार्टी ने इसका तुरंत
संज्ञान लिया। आज भाजपा के पास एक सांस्कृतिक धारा का उत्तराधिकार का दावा है,
किंतु उसे इसके स्वाभाविक उत्तराधिकारी बनने के लिए नैतिकता को स्थापित करना होगा।
भाजपा की राज्य सरकारों पर जिस प्रकार भ्रष्टाचार के
छींटें हैं, उनसे
बचना होगा। भारतीयता,नैतिकता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करने के साथ-साथ, आचरण
की शुद्धता पर भी जोर देना होगा। इसी आचरण की गिरावट से उबे लोगों ने कांग्रेस
जैसी पार्टी का बुरा हाल किया है। भाजपा के कृति और वाणी में अंतर को भी लोग सहन
क्यों करेंगें? भाजपा
के सामने अलग पार्टी सरीखा व्यवहार करने की चुनौती है। विरोधी एकजुट हो रहे हैं और
उसके खिलाफ दुष्प्रचार तेज हो रहा है। उनके अच्छे कामों के बजाए बुरे कामों का
जिक्र ज्यादा हो रहा है। ऐसे में भाजपा और उनके समविचारी संगठनों को इस चुनौती को
समझकर अपने आचरण में ज्यादा दृढ़ और वैचारिकता का आग्रही दिखना होगा। राजनीतिक दंभ
की देहभाषा से परे अपने काडर को संभालना होगा। दल में वैचारिक प्रशिक्षण पर जोर
देना होगा। सरकारों का आना-जाना कोई बड़ी बात नहीं है, किंतु
मिले हुए अवसर का योग्य इस्तेमाल जरूरी है। भाजपा के सामने आज अवसरों का एक आसमान
है, उसके नेतृत्व का विवेक भी कसौटी पर है कैसे वह इन अवसरों का सही इस्तेमाल करते
हुए देश की राजनीति में कांग्रेस का एक सार्थक विकल्प बन पाती है। आज भाजपा के
आलोचक यह कह रहे हैं कि वह पूंजीपतियों और कारपोरेट की पार्टी है, इस धारणा को
स्थापित करने के लिए काफी यत्न चल रहे हैं। भाजपा को ऐसे प्रचार को काटने की
रणनीति बनानी होगी। किंतु रणनीतियों तभी सफल होती हैं जब उसके साथ में तथ्य और
सत्य हों। अब भाषणों से आगे कृति को ही आकलन का आधार बनाना होगा। अच्छे विचारों को
जमीन पर उतारने का जरूरत है। अगर वे सरकार के काम में दिखते हैं तो बिना विज्ञापनी
वृत्ति के भी लोकस्वीकृति का कारण बनेगें। सवाल यह है कि क्या भाजपा और उसकी
सरकारें इसके लिए तैयार हैं ?
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ब्लाग में व्यक्त विचार निजी हैं। इसका किसी संगठन अथवा मेरे व्यवसाय से संबंध नहीं है।
रविवार, 29 मार्च 2015
नरेंद्र मोदीः देश ने मान लिया दिल्ली कब मानेगी
-संजय द्विवेदी
जमीन की जंग में नरेंद्र
मोदी उलझ से गए लगते हैं। इसने पूरे विपक्ष को एकजुट तो किया ही है, साथ ही यह छवि
भी प्रक्षेपित कर दी है कि सरकार को किसानों की चिंता नहीं है। अध्यादेशी आतुरता
ने सरकार को दर्द के उस चौराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां से आगे जाने और पीछे जाने
दोनों में खतरा है। सरकार चलाना इसीलिए संख्या बल से ज्यादा सावधानी का खेल है।
जमीन को लेकर कौन क्या कहता रहा है, इसे छोड़कर वे सब सरकार के खिलाफ एकजुट हैं,
जिन्होंने यूपीए के भूमिअधिग्रहण कानून पर ही सवाल उठाए थे। यह बात बताती है कि
सारा कुछ इतना सरल और साधारण नहीं है, जैसा समझा जा रहा है।
दिल्ली में पराए हैं वेः
साधारण सी राजनीतिक समझ रखने वाला भी जान रहा है
कि गुजरात से दिल्ली की यात्रा नरेंद्र मोदी ने, जनता के अपार प्रेम के चलते पूरी
जरूर कर ली है पर लुटियंस की दिल्ली में अभी वे पराए ही हैं। टीवी चैनलों के
बहसबाजों, अखबारों के विमर्शकारों, दिल्ली में बसने वाले बुद्धिवादियों के लिए
नरेंद्र मोदी आज भी स्वीकार्य कहां हैं? मोदी
आज भी इस कथित बौद्धिक समाज द्वारा स्वीकारे नहीं जा सके हैं। इस छोटे से वर्ग का
विमर्श सीमित, आत्मकेंद्रित, दिल्लीकेंद्रित और भारतविरोधी है। इसे न तो वे छिपाते
हैं, न ही उन्हें एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन के बाद अपने विमर्शों में संशोधन की
जरूरत लगती है। नरेंद्र मोदी जिस विचार परिवार के नायक हैं, वह विचार परिवार ही इस
वर्ग के लिए स्वीकार्य नहीं है बल्कि उसकी निंदा के आधार पर ही इन सबकी राजनीति बल
पाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके विचार परिवार की यात्रा ने जो
लोकस्वीकृति प्राप्त की है वह चौंकाती जरूर है, किंतु हमारे बुद्धिजीवी उस संदेश
को पढ़कर खुद में बदलाव लाने के बजाए मोदी की सरकार को नाहक सवालों पर घेरने में
लगे हैं। शायद इसीलिए सरकार बनते ही मोदी पर जो हमले शुरू हुए तो मोदी ने इस खेल
को समझकर ही कहा था-“ जिन्होंने साठ
साल तक कुछ नहीं किया वे हमसे पांच महीने का हिसाब मांग रहे हैं।“
भारतद्वेषी
बुद्धिजीवियों के निशाने परः
मोदी का संकट
लुटियंस की दिल्ली में बसने वाले भारतद्वेषी बुद्धिजीवी तो हैं ही, उनके अपने
परिवार में भी संकट कम नहीं हैं। दिल्ली में आए मोदी की स्वीकार्यता स्वयं दिल्ली
के भाजपाई दिग्गजों में भी नहीं थी। परिवार की एक लंबी महाभारत के बाद वे दिल्ली
की गद्दी पर आसीन तो हो गए पर परिणाम देने की चुनौती अभी भी शेष है। आज भी दिल्ली
के टीवी चैनलों का विमर्श क्या है, वही निरंजन ज्योति या हिंदू महासभा के कुछ
नेताओं के बयान। यह आश्चर्यजनक है कि एक ऐसा संगठन हिंदू महासभा,
जिसकी कोई आवाज नहीं है। उसका कोई आधार शेष हो, इसकी जानकारी नहीं। किंतु किस आधार
पर हिंदू महासभा को बीजेपी से जोड़कर मोदी से जवाब मांगे जाते हैं, यह समझना
मुश्किल है। इतिहास में भी हिंदू महासभा और आरएसएस के रास्ते अलग-अलग रहे हैं।
साध्वी निरंजन ज्योति के बारे में अशोक सिंहल कह चुके हैं वे विश्व हिंदू परिषद से
संबंधित नहीं हैं। आखिर क्यों देश के प्रधानमंत्री को इन सबके बयानों के कठघरे में
खड़ा किया जाता है? अपने चुनाव अभियान से आज तक
नरेंद्र मोदी ने कोई कटु बात किसी भी समुदाय के बारे में नहीं कही है। वे आरएसएस
से जुड़े हैं, इसे उन्होंने नहीं छिपाया है। स्वयं संघ के नेतृत्व ने ज्यादा
बच्चों के बयान पर आगे आकर यह कहा कि “हमारी माताएं बच्चा
पैदा करने की मशीन नहीं हैं। वे बच्चों के बारे में स्वयं निर्णय करेंगीं।“
संघ परिवार का राजनीतिक विवेक है कसौटी परः
जाहिर
तौर पर नरेंद्र मोदी को विफल करने के लिए एक बड़ा कुनबा लगा हुआ है। जिसमें
राजनीतिक दलों के अलावा, प्रशासन के आला अफसर, वैचारिक दिवालिएपन के शिकार
बुद्धिजीवी, मीडिया के लोग भी शामिल हैं। यह एक सरकार का बदलना मात्र नहीं है। एक
राजनीतिक संस्कृति का बदलाव भी है। देश की बेलगाम नौकरशाही यह स्वीकार करने के लिए
तैयार नहीं है। वे मोदी को सफल होने देंगे इसमें संदेह है। सरकार की प्रशासनिक मिशनरी
पर किस मन और मिजाज के लोग हैं, कहने की आवश्यक्ता नहीं है। मोदी उन्हें कस रहे
हैं किंतु वे चपल-चालाक लोग हैं, जिन्होंने मनमोहन सिंह जैसे पढ़े-लिखे आदमी का
सत्यानाश कर दिया। 10-जनपथ और प्रधानमंत्री निवास की जंग में देश ने अपने इतिहास
के सबसे बुरे दिन देखे, किंतु नौकरशाही मस्त रही। आज वही नौकरशाही नरेंद्र मोदी के
रास्ते में इतिहास का सबसे बेहतर प्रधानमंत्री हो सकने की संभावना में बाधक है।
मोदी के आलोचक सड़कों पर उतर आए हैं और उनके समर्थक बिना किसी गलती के खुद को
अपराधी समझने की मनोभूमिका में आ गए हैं। इस अवसाद को हटाना भाजपा संगठन की
जिम्मेदारी है। राजनीतिक क्षेत्र में बदलाव के लिए लोग बैचेन हैं। बहुत उम्मीदों
से वे नरेंद्र मोदी को एक असंभव सी दिखने वाली जीत दिला चुके हैं, किंतु अब
डिलेवरी का वक्त है। इतिहास नरेंद्र मोदी, भाजपा, आरएसएस सबसे हिसाब मांगेगा। यह
नहीं चलेगा कि कड़वा-कड़वा थू और मीठा-मीठा गप। इसलिए संघ परिवार का राजनीतिक
विवेक भी कसौटी पर है। उन सबकी पहली जिम्मेदारी सरकार को हमलों से बचाने की है।
छवि को बनाए रखने की है और अपनी ओर से ऐसा कोई काम न करने की है, जिससे सरकार की
गरिमा को ठेस लगे। संघ परिवार और भाजपा में बेहतर समन्वय के लिए अभी और प्रयासों
की जरूरत है। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार पर भरोसा करते हुए उसकी निगहबानी की
जरूरत है। भारत जैसे देश में जहां पिछले तीन दशकों से मिलीजुली सरकारों के प्रयोग
हो रहे हैं, वहां पूरे बहुमत के साथ सत्ता में आना एक उपलब्धि से ज्यादा
जिम्मेदारी है। नरेंद्र मोदी इतिहास के इस क्षण में अपनी जिम्मेदारियों से भाग
नहीं सकते। वे संवाद कुशल हैं। संवाद के माध्यम से उन्होंने एक गांव बड़नगर से
दिल्ली तक की यात्रा तय की है। अब उनके सामने कुछ कर दिखाने का समय है। उन्हें
बताना होगा कि जनता ने अगर उन पर भरोसा किया है तो यह गलत नहीं है। उन्हें अपने
विरोधियों, आलोचकों को गलत साबित करना होगा। क्योंकि अगर उनके आलोचक गलत साबित
होते हैं, तो देश जीतता हुआ दिखता है। उनके आलोचकों की पराजय दरअसल भारत की जीत
होगी। भारत ने भारत की तरह देखना और सोचना शुरू कर दिया है। पर ये अभी पहला मुबारक
कदम है नरेंद्र मोदी को अभी इस देश के सपनों में रंग भरने हैं। उम्मीदों से खाली
देश में फिर से उम्मीदों का ज्वार भरना है। चुनावों के बाद नए चुनाव आते हैं,
इनमें हार या जीत होती है। किंतु देश का नेता उम्मीदों और सपनों की तरफ जनप्रवाह
प्रेरित करता है। मोदी में वह शक्ति है कि वे यह कर सकते हैं। नीतियों के तल पर,
डिलेवरी के मोर्चे पर अभी बहुत कुछ होना शेष है। एक बड़ा हिंदुस्तान अभी भी अभावों
से घिरा है। असुरक्षा से घिरा है। रोजाना रोटी के संघर्षों में लगा है। उसकी उम्मीदें
हर नई सरकार के साथ उगती हैं और फिर कुम्हला जाती हैं। सत्ता के आतंक और सत्ता के
दंभ के किस्से इस देश ने साठ सालों में बहुत देखे-सुने हैं। गुस्से में आकर
सरकारें बदली हैं। मोदी ने भी इस गुस्से का लाभ लेकर अच्छे दिनों का वादा कर
राजसत्ता पाई है। उन्हें हर पल यह सोचना होगा कि वे दिल्ली में आकर दिल्ली वालों
सरीखे तो नहीं हो जाएंगे। उनके विरोध में आ रहे तर्क बताते हैं कि नरेंद्र मोदी
बदले नहीं हैं। वे कुछ करेंगे यह भरोसा भी है। किंतु सबसे जरूरी यह है कि उनके
अपने तो उन पर भरोसा रखें और थोड़ा धीरज भी धरें।
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ब्लाग में व्यक्त विचार निजी हैं। इसका किसी संगठन अथवा मेरे व्यवसाय से संबंध नहीं है।
मंगलवार, 24 मार्च 2015
भाषाई सद्भावना के लिए काम रही मीडिया विमर्शः बृजमोहन
गुजराती पत्रकारिता विशेषांक का
विमोचन
रायपुर। भारतीय नववर्ष के उपलक्ष्य में छत्तीसगढ़ प्रदेश के
कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने अपने निवास पर जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित
पत्रिका “मीडिया विमर्श” के गुजराती पत्रकारिता विशेषांक का विमोचन किया। इस
अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर, पत्रिका के प्रबंध
सम्पादक प्रभात मिश्र, संपादक मंडल की सदस्य डॉ सुभद्रा
राठौर,वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी सहित युवा पत्रकार हेमंत
पाणिग्राही, बिकास कुमार
शर्मा, मनीष शर्मा एवं रोहित साहू उपस्थित थे।
इस अवसर पर
बृजमोहन अग्रवाल उपस्थित जनों को नववर्ष की बधाई देते हुए कहा कि मीडिया विमर्श
पत्रिका लगातार मीडिया के विभिन्न विषयों पर सामग्री उपलब्ध करा रही है जो मीडिया
से जुड़े लोगों एवं मीडिया छात्रों के लिए बहुत उपयोगी है। भारत में हिंदी भाषा के
साथ साथ समस्त क्षेत्रीय भाषाओँ एवं स्थानीय बोलियों का अपना अलग महत्त्व है,हमें
सभी भाषाओं समृद्ध करने की दिशा में कार्य करना चाहिये।मीडिया विमर्श का प्रयास इस
दिशा में सराहनीय है। उन्होंने कहा कि उर्दू पत्रकारिता के बाद पत्रिका ने गुजराती
पत्रकारिता का विशेषांक प्रकाशित है। इससे देश में भाषाई सद् भाव पैदा होगा और
भारतीय भाषाओं में अंतरसंवाद भी होगा। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय भाषाएं
मातृभाषाएं भी हैं इसलिए इनके लिए आपसी संवाद के क्षेत्र तलाशे जाने चाहिए।
पत्रिका के
प्रबंध सम्पादक प्रभात मिश्र ने इस विशेषांक के संबंध में जानकारी देते हुए बताया
कि हिंदी पत्राकारिता के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय भाषायी पत्रकारिता पर भी मीडिया
विमर्श सामग्री उपलब्ध करा रही है। पत्रिका अपने प्रकाशन का एक दशक जल्द ही पूरा
करने जा रही है। पत्रकार श्री रमेश नैयर ने कहा कि पत्रिका सही मायने में
मीडियाकर्मियों के आत्मचिंतन और आत्ममंथन का मंच बन गयी है, इसका हर अंक संग्रहणीय
और पठनीय है,साथ ही विमर्श के नए द्वार खोलता है।
क्या है गुजराती पत्रकारिता अंक मेः
मीडिया विमर्श के गुजराती पत्रकारिता पर आए विशेषांक
में समूची गुजराती पत्रकारिता पर पठनीय और संग्रहणीय सामग्री है। गुजराती
पत्रकारिता के दिग्गज पत्रकारों के अलावा अन्य मीडिया विशेषज्ञों ने गुजराती
पत्रकारिता पर अपनी कलम चलाई है। गुजराती पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों, टेलीविजन चैनल्स, वेब मीडिया के साथ ही गुजराती
फिल्मों के संबंध में भी मीडिया विमर्श का यह अंक महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता
है। इसमें शशिकांत वसानी, पिंकी दलाल, भगवती
कुमार शर्मा, मनीष मेहता, किरीट
गणात्रा, कौशिक मेहता, काना बाटवा,
डा.महेश परिमल और आशीष जोशी के साक्षात्कार प्रकाशित किए गए हैं।
खण्ड ‘नया दौर, नई चुनौतियां’ के अंतर्गत शैलेष रावल, पिंकी
दलाल, कुलवंत हैप्पी, जयेश चितलिया,
अर्चना गुसाणी, तुषार त्रिवेदी, विक्रम वकील, जयेश ठकरार और डॉ. यासीन दलाल के लेख
प्रकाशित हैं। स्वर्णिम अध्याय खण्ड में कमल शर्मा, कौशिक
मेहता, डॉ. किषोर दवे और बादल पंड्या के लेख शामिल हैं। अजय
नायक, हिमांशु किकाणी और कल्याणी देशमुख ने गुजरात की वेब
पत्रकारिता को रेखांकित किया है।
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संजय द्विवेदी
प्रो.संजय द्विवेदी,
पत्रकार एवं लेखक
ब्लाग में व्यक्त विचार निजी हैं। इसका किसी संगठन अथवा मेरे व्यवसाय से संबंध नहीं है।
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